Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra · ब्रह्मसूत्रम्

Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra

ब्रह्मसूत्रम्

Adhyāya 4

SK
आवृत्तिर् असकृदुपदेशात् | BBस्_४,१.१ |
SK
लिङ्गाच् च | BBस्_४,१.२ |
SK
आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च | BBस्_४,१.३ |
SK
न प्रतीके न हि सः | BBस्_४,१.४ |
SK
ब्रह्मदृष्टिर् उत्कर्षात् | BBस्_४,१.५ |
SK
आदित्यादिमतयश् चाङ्ग उपपत्तेः | BBस्_४,१.६ |
SK
आसीनः संभवात् | BBस्_४,१.७ |
SK
ध्यानाच् च | BBस्_४,१.८ |
SK
अचलत्वं चापेक्ष्य | BBस्_४,१.९ |
SK
स्मरन्ति च | BBस्_४,१.१० |
SK
यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् | BBस्_४,१.११ |
SK
आप्रयाणात् तत्रापि हि दृष्टम् | BBस्_४,१.१२ |
SK
तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोर् अश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् | BBस्_४,१.१३ |
SK
इतरस्याप्य् एवम् असंश्लेषः पाते तु | BBस्_४,१.१४ |
SK
अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः | BBस्_४,१.१५ |
SK
अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् | BBस्_४,१.१६ |
SK
अतो ऽन्यापि ह्य् एकेषाम् उभयोः | BBस्_४,१.१७ |
SK
यद् एव विद्ययेति हि | BBस्_४,१.१८ |
SK
भोगेन त्व् इतरे क्षपयित्वाथ संपद्यते | BBस्_४,१.१९ |
SK
वाङ्मनसि दर्शनाच् छब्दाच् च | BBस्_४,२.१ |
SK
अत एव सर्वाण्यनु | BBस्_४,२.२ |
SK
तन्मनः प्राण उत्तरात् | BBस्_४,२.३ |
SK
सो ऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः | BBस्_४,२.४ |
SK
भूतेषु तच्छ्रुतेः | BBस्_४,२.५ |
SK
नैकस्मिन् दर्शयतो हि | BBस्_४,२.६ |
SK
समाना चासृत्युपक्रमाद् अमृतत्वं चानुपोष्य | BBस्_४,२.७ |
SK
तदापीतेः संसारव्यपदेशात् | BBस्_४,२.८ |
SK
सूक्ष्मं प्रमाणतश् च तथोपलब्धेः | BBस्_४,२.९ |
SK
नोपमर्देनातः | BBस्_४,२.१० |
SK
अस्यैव चोपपत्तेर् ऊष्मा | BBस्_४,२.११ |
SK
प्रतिषेधाद् इति चेन् न शारीरात् स्पष्टो ह्येकेषाम् | BBस्_४,२.१२ |
SK
स्मर्यते च | BBस्_४,२.१३ |
SK
तानि परे तथा ह्य् आह | BBस्_४,२.१४ |
SK
अविभागो वचनात् | BBस्_४,२.१५ |
SK
तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच् | BBस्_४,२.१६ |
SK
रश्म्यनुसारी | BBस्_४,२.१७ |
SK
निशि नेति चेन् न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वाद् दर्शयति च | BBस्_४,२.१८ |
SK
अतश् चायने ऽपि दक्षिणे | BBस्_४,२.१९ |
SK
योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते | BBस्_४,२.२० |
SK
अर्चिरादिना तत्प्रथितेः | BBस्_४,३.१ |
SK
वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् | BBस्_४,३.२ |
SK
तटितो ऽधि वरुणः संबन्धात् | BBस्_४,३.३ |
SK
आतिवाहिकास् तल्लिङ्गात् | BBस्_४,३.४ |
SK
वैद्युतेनैव ततस् तच्छ्रुतेः | BBस्_४,३.५ |
SK
कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः | BBस्_४,३.६ |
SK
विशेषितत्वाच् च | BBस्_४,३.७ |
SK
सामीप्यात् तु तद्व्यपदेशः | BBस्_४,३.८ |
SK
कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् अभिधानात् | BBस्_४,३.९ |
SK
स्मृतेश् च | BBस्_४,३.१० |
SK
परं जैमिनिर् मुख्यत्वात् | BBस्_४,३.११ |
SK
दर्शनाच् च | BBस्_४,३.१२ |
SK
न च कार्ये प्रत्यभिसन्धिः | BBस्_४,३.१३ |
SK
अप्रतीकालम्बनान् नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश् च | BBस्_४,३.१४ |
SK
विशेषं च दर्शयति | BBस्_४,३.१५ |
SK
संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् | BBस्_४,४.१ |
SK
मुक्तः प्रतिज्ञानात् | BBस्_४,४.२ |
SK
आत्मा प्रकरणात् | BBस्_४,४.३ |
SK
अविभागेन दृष्टत्वात् | BBस्_४,४.४ |
SK
ब्राह्मेण जैमिनिर् उपन्यासादिभ्यः | BBस्_४,४.५ |
SK
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वाद् इत्य् औडुलोमिः | BBस्_४,४.६ |
SK
एवम् अप्य् उपन्यासात् पूर्वभावाद् अविरोधं बादरायणः | BBस्_४,४.७ |
SK
संकल्पाद् एव तच्छ्रुतेः | BBस्_४,४.८ |
SK
अत एव चानन्याधिपतिः | BBस्_४,४.९ |
SK
अभावं बादरिर् आह ह्य् एवम् | BBस्_४,४.१० |
SK
भावं जैमिनिर् विकल्पामननात् | BBस्_४,४.११ |
SK
द्वादशाहवद् उभयविधं बादरायणो ऽतः | BBस्_४,४.१२ |
SK
तन्वभावे सन्ध्यवद् उपपत्तेः | BBस्_४,४.१३ |
SK
भावे जाग्रद्वत् | BBस्_४,४.१४ |
SK
प्रदीपवदावेशस् तथा हि दर्शयति | BBस्_४,४.१५ |
SK
स्वाप्ययसंपत्योर् अन्यतरापेक्षम् आविष्कृतं हि | BBस्_४,४.१६ |
SK
जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणाद् असंनिहितत्वाच् च | BBस्_४,४.१७ |
SK
प्रत्यक्षोपदेशाद् इति चेन् नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः | BBस्_४,४.१८ |
SK
विकारावर्ति च तथा हि स्थितिम् आह | BBस्_४,४.१९ |
SK
दर्शयतश् चैवं प्रत्यक्षानुमाने | BBस्_४,४.२० |
SK
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच् च | BBस्_४,४.२१ |
SK
अनावृत्तिः शब्दाद् अनावृत्तिः शब्दात् | BBस्_४,४.२२ |

Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Brahmasūtra: corpustei HTML transform of the Brahmasūtra mūla.

Source