Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra · ब्रह्मसूत्रम्

Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra

ब्रह्मसूत्रम्

Adhyāya 2

SK
स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन् नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् | BBस्_२,१.१ |
SK
इतरेषां चानुपलब्धेः | BBस्_२,१.२ |
SK
एतेन योगः प्रत्युक्तः | BBस्_२,१.३ |
SK
न विलक्षणत्वाद् अस्य तथात्वं च शब्दात् | BBस्_२,१.४ |
SK
अभिमानिव्यपदेशस् तु विशेषानुगतिभ्याम् | BBस्_२,१.५ |
SK
दृश्यते तु | BBस्_२,१.६ |
SK
असद् इति चेन् न प्रतिषेधमात्रत्वात् | BBस्_२,१.७ |
SK
अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गाद् असमञ्जसम् | BBस्_२,१.८ |
SK
न तु दृष्टान्तभावात् | BBस्_२,१.९ |
SK
स्वपक्षदोषाच् च | BBस्_२,१.१० |
SK
तर्काप्रतिष्ठानाद् अपि | BBस्_२,१.११ |
SK
अन्यथानुमेयम् इति चेद् एवम् अप्य् अनिर्मोक्षप्रसङ्गः | BBस्_२,१.१२ |
SK
एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः | BBस्_२,१.१३ |
SK
भोक्त्रापत्तेर् अविभागश् चेत् स्याल् लोकवत् | BBस्_२,१.१४ |
SK
तदनन्यत्वम् आरम्भणशब्दादिभ्यः | BBस्_२,१.१५ |
SK
भावे चोपलब्धेः | BBस्_२,१.१६ |
SK
सत्वाच् चापरस्य | BBस्_२,१.१७ |
SK
असद्व्यपदेशान् नेति चेन् न धर्मान्तरेण वाक्यशेषाद्युक्तेः शब्दान्तराच् च | BBस्_२,१.१८ |
SK
पटवच् च | BBस्_२,१.१९ |
SK
यथा च प्राणादिः | BBस्_२,१.२० |
SK
इतरव्यपदेशाद् धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः | BBस्_२,१.२१ |
SK
अधिकं तु भेदनिर्देशात् | BBस्_२,१.२२ |
SK
अश्मादिवच् च तदनुपपत्तिः | BBस्_२,१.२३ |
SK
उपसंहारदर्शनान् नेति चेन् न क्षीरवद् धि | BBस्_२,१.२४ |
SK
देवादिवद् अपि लोके | BBस्_२,१.२५ |
SK
कृत्स्नप्रसक्तिर् निरवयवत्वशब्दकोपो वा | BBस्_२,१.२६ |
SK
श्रुतेस् तु शब्दमूलत्वात् | BBस्_२,१.२७ |
SK
आत्मनि चैवं विचित्राश् च हि | BBस्_२,१.२८ |
SK
स्वपक्षदोषाच् च | BBस्_२,१.२९ |
SK
सर्वोपेता च तद्दर्शनात् | BBस्_२,१.३० |
SK
विकरणत्वान् नेति चेत् तद् उक्तम् | BBस्_२,१.३१ |
SK
न प्रयोजनवत्त्वात् | BBस्_२,१.३२ |
SK
लोकवत् तु लीलाकैवल्यम् | BBस्_२,१.३३ |
SK
वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति | BBस्_२,१.३४ |
SK
न कर्माविभागाद् इति चेन् नानादित्वाद् उपपद्यते चाप्य् उपलभ्यते च | BBस्_२,१.३५ |
SK
सर्वधर्मोपपत्तेश् च | BBस्_२,१.३६ |
SK
रचनानुपपत्तेश् च नानुमानं प्रवृत्तेश् च | BBस्_२,२.१ |
SK
पयो ऽम्बुवच् चेत् तत्रापि | BBस्_२,२.२ |
SK
व्यतिरेकानवस्थितेश् चानपेक्षत्वात् | BBस्_२,२.३ |
SK
अन्यत्राभावाच् च न तृणादिवत् | BBस्_२,२.४ |
SK
पुरुषाश्मवद् इति चेत् तथापि | BBस्_२,२.५ |
SK
अङ्गित्वानुपपत्तेश् च | BBस्_२,२.६ |
SK
अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् | BBस्_२,२.७ |
SK
अभ्युपगमे ऽप्य् अर्थाभावात् | BBस्_२,२.८ |
SK
विप्रतिषेधाच् चासमञ्जसम् | BBस्_२,२.९ |
SK
महद्दीर्घवद् वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् | BBस्_२,२.१० |
SK
उभयथापि न कर्मातस्तदभावः | BBस्_२,२.११ |
SK
समवायाभ्युपगमाच् च साम्याद् अनवस्थितेः | BBस्_२,२.१२ |
SK
नित्यम् एव च भावात् | BBस्_२,२.१३ |
SK
रूपादिमत्त्वाच् च विपर्ययो दर्शनात् | BBस्_२,२.१४ |
SK
उभयथा च दोषात् | BBस्_२,२.१५ |
SK
अपरिग्रहाच् चात्यन्तम् अनपेक्षा | BBस्_२,२.१६ |
SK
समुदाय उभयहेतुके ऽपि तदप्राप्तिः | BBस्_२,२.१७ |
SK
इतरेतरप्रत्ययत्वाद् उपपन्नम् इति चेन् न सङ्घातभावानिमित्तत्वात् | BBस्_२,२.१८ |
SK
उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् | BBस्_२,२.१९ |
SK
असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा | BBस्_२,२.२० |
SK
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिर् अविच्छेदात् | BBस्_२,२.२१ |
SK
उभयथा च दोषात् | BBस्_२,२.२२ |
SK
आकाशे चाविशेषात् | BBस्_२,२.२३ |
SK
अनुस्मृतेश् च | BBस्_२,२.२४ |
SK
नासतो ऽदृष्टत्वात् | BBस्_२,२.२५ |
SK
उदासीनानाम् अपि चैवं सिद्धिः | BBस्_२,२.२६ |
SK
नाभाव उपलब्धेः | BBस्_२,२.२७ |
SK
वैधर्म्याच् च न स्वप्नादिवत् | BBस्_२,२.२८ |
SK
न भावो ऽनुपलब्धेः | BBस्_२,२.२९ |
SK
सर्वथानुपपत्तेश् च | BBस्_२,२.३० |
SK
नैकस्मिन्न् असम्भवात् | BBस्_२,२.३१ |
SK
एवं चात्माकार्त्स्न्यम् | BBस्_२,२.३२ |
SK
न च पर्यायाद् अप्य् अविरोधो विकारादिभ्यः | BBस्_२,२.३३ |
SK
अन्त्यावस्थितेश् चोभयनित्यत्वाद् अविशेषः | BBस्_२,२.३४ |
SK
पत्युर् असामञ्जस्यात् | BBस्_२,२.३५ |
SK
अधिष्ठानानुपपत्तेश् च | BBस्_२,२.३६ |
SK
करणवच् चेन् न भोगादिभ्यः | BBस्_२,२.३७ |
SK
अन्तवत्त्वम् असर्वज्ञता वा | BBस्_२,२.३८ |
SK
उत्पत्त्यसंभवात् | BBस्_२,२.३९ |
SK
न च कर्तुः करणम् | BBस्_२,२.४० |
SK
विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः | BBस्_२,२.४१ |
SK
विप्रतिषेधाच् च | BBस्_२,२.४२ |
SK
न वियदश्रुतेः | BBस्_२,३.१ |
SK
अस्ति तु | BBस्_२,३.२ |
SK
गौण्यसंभवाच् छब्दाच् च | BBस्_२,३.३ |
SK
स्याच् चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् | BBस्_२,३.४ |
SK
प्रतिज्ञाहानिर् अव्यतिरेकात् | BBस्_२,३.५ |
SK
शब्देभ्यः | BBस्_२,३.६ |
SK
यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् | BBस्_२,३.७ |
SK
एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः | BBस्_२,३.८ |
SK
असंभवस् तु सतो ऽनुपपत्तेः | BBस्_२,३.९ |
SK
तेजो ऽतस् तथा ह्य् आह | BBस्_२,३.१० |
SK
आपः | BBस्_२,३.११ |
SK
पृथिवी | BBस्_२,३.१२ |
SK
अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः | BBस्_२,३.१३ |
SK
तदभिध्यानाद् एव तु तल्लिङ्गात् सः | BBस्_२,३.१४ |
SK
विपर्ययेण तु क्रमो ऽत उपपद्यते च | BBस्_२,३.१५ |
SK
अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गाद् इति चेन् नाविशेषात् | BBस्_२,३.१६ |
SK
चराचरव्यपाश्रयस् तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस् तद्भावभावित्वात् | BBस्_२,३.१७ |
SK
नात्मा श्रुतेर् नित्यत्वाच् च ताभ्यः | BBस्_२,३.१८ |
SK
ज्ञो ऽत एव | BBस्_२,३.१९ |
SK
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् | BBस्_२,३.२० |
SK
स्वात्मना चोत्तरयोः | BBस्_२,३.२१ |
SK
नाणुरतच्छ्रुतेर् इति चेन् नेतराधिकारात् | BBस्_२,३.२२ |
SK
स्वशब्दोन्मानाभ्यां च | BBस्_२,३.२३ |
SK
अविरोधश् चन्दनवत् | BBस्_२,३.२४ |
SK
अवस्थितिवैशेष्याद् इति चेन् नाभ्युपगमाद् धृदि हि | BBस्_२,३.२५ |
SK
गुणाद्वा लोकवत् | BBस्_२,३.२६ |
SK
व्यतिरेको गन्धवत् तथा हि दर्शयति | BBस्_२,३.२७ |
SK
पृथगुपदेशात् | BBस्_२,३.२८ |
SK
तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् | BBस्_२,३.२९ |
SK
यावदात्मभावित्वाच् च न दोषस् तद्दर्शनात् | BBस्_२,३.३० |
SK
पुंस्त्वादिवत् त्व् अस्य सतो ऽभिव्यक्तियोगात् | BBस्_२,३.३१ |
SK
नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गो ऽन्यतरनियमो वान्यथा | BBस्_२,३.३२ |
SK
कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् | BBस्_२,३.३३ |
SK
उपादानाद् विहारोपदेशाच् च | BBस्_२,३.३४ |
SK
व्यपदेशाच् च क्रियायां न चेन् निर्देशविपर्ययः | BBस्_२,३.३५ |
SK
उपलब्धिवदनियमः | BBस्_२,३.३६ |
SK
शक्तिविपर्ययात् | BBस्_२,३.३७ |
SK
समाध्यभावाच् च | BBस्_२,३.३८ |
SK
यथा च तक्षोभयथा | BBस्_२,३.३९ |
SK
परात् तु तच्छ्रुतेः | BBस्_२,३.४० |
SK
कृतप्रयत्नापेक्षस् तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः | BBस्_२,३.४१ |
SK
अंशो नानाव्यपदेशाद् अन्यथा चापि दाशकितवादित्वम् अधीयत एके | BBस्_२,३.४२ |
SK
मन्त्रवर्णात् | BBस्_२,३.४३ |
SK
अपि स्मर्यते | BBस्_२,३.४४ |
SK
प्रकाशादिवत् तु नैवं परः | BBस्_२,३.४५ |
SK
स्मरन्ति च | BBस्_२,३.४६ |
SK
अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज् ज्योतिरादिवत् | BBस्_२,३.४७ |
SK
असन्ततेश् चाव्यतिकरः | BBस्_२,३.४८ |
SK
आभास एव च | BBस्_२,३.४९ |
SK
अदृष्टानियमात् | BBस्_२,३.५० |
SK
अभिसन्ध्यादिष्व् अपि चैवम् | BBस्_२,३.५१ |
SK
प्रदेशभेदाद् इति चेन् नान्तर्भावात् | BBस्_२,३.५२ |
SK
तथा प्राणाः | BBस्_२,४.१ |
SK
गौण्यसंभवात् तत्प्राक् श्रुतेश् च | BBस्_२,४.२ |
SK
तत्पूर्वकत्वाद् वाचः | BBस्_२,४.३ |
SK
सप्त गतेर् विशेषितत्वाच् च | BBस्_२,४.४ |
SK
हस्तादयस् तु स्थिते ऽतो नैवम् | BBस्_२,४.५ |
SK
अणवश् च | BBस्_२,४.६ |
SK
श्रेष्ठश् च | BBस्_२,४.७ |
SK
न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् | BBस्_२,४.८ |
SK
चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः | BBस्_२,४.९ |
SK
अकरणत्वाच् च न दोषस् तथा हि दर्शयति | BBस्_२,४.१० |
SK
पञ्चवृत्तिर् मनोवत् व्यपदिश्यते | BBस्_२,४.११ |
SK
अणुश् च | BBस्_२,४.१२ |
SK
ज्योतिर् आद्यधिष्ठानं तु तदामननात्प्राणवता शब्दात् | BBस्_२,४.१३ |
SK
तस्य च नित्यत्वात् | BBस्_२,४.१४ |
SK
त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशाद् अन्यत्र श्रेष्ठात् | BBस्_२,४.१५ |
SK
भेदश्रुतेर् वैलक्षण्याच् च | BBस्_२,४.१६ |
SK
संज्ञामूर्तिकॢप्तिस् तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् | BBस्_२,४.१७ |
SK
मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश् च | BBस्_२,४.१८ |
SK
वैशेष्यात् तु तद्वादस् तद्वादः | BBस्_२,४.१९ |

Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Brahmasūtra: corpustei HTML transform of the Brahmasūtra mūla.

Source
Brahmasūtra — Reader · Sutraya