Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra · ब्रह्मसूत्रम्

Aphorisms on Brahman

Brahmasūtra

ब्रह्मसूत्रम्

Adhyāya 1

SK
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा | BBस्_१,१.१ |
SK
जन्माद्यस्य यतः | BBस्_१,१.२ |
SK
शास्त्रयोनित्वात् | BBस्_१,१.३ |
SK
तत् तु समन्वयात् | BBस्_१,१.४ |
SK
ईक्षतेर् नाशब्दम् | BBस्_१,१.५ |
SK
गौणश् चेन् नात्मशब्दात् | BBस्_१,१.६ |
SK
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् | BBस्_१,१.७ |
SK
हेयत्वावचनाच् च | BBस्_१,१.८ |
SK
प्रतिज्ञाविरोधात् | BBस्_१,१.९ |
SK
स्वाप्ययात् | BBस्_१,१.१० |
SK
गतिसामान्यात् | BBस्_१,१.११ |
SK
श्रुतत्वाच् च | BBस्_१,१.१२ |
SK
आनन्दमयो ऽभ्यासात् | BBस्_१,१.१३ |
SK
विकारशब्दान् नेति चेन् न प्राचुर्यात् | BBस्_१,१.१४ |
SK
तद्धेतुव्यपदेशाच् च | BBस्_१,१.१५ |
SK
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते | BBस्_१,१.१६ |
SK
नेतरो ऽनुपपत्तेः | BBस्_१,१.१७ |
SK
भेदव्यपदेशाच् च | BBस्_१,१.१८ |
SK
कामाच् च नानुमानापेक्षा | BBस्_१,१.१९ |
SK
अस्मिन्न् अस्य च तद्योगं शास्ति | BBस्_१,१.२० |
SK
अन्तस् तद्धर्मोपदेशात् | BBस्_१,१.२१ |
SK
भेदव्यपदेशाच् चान्यः | BBस्_१,१.२२ |
SK
आकाशस् तल्लिङ्गात् | BBस्_१,१.२३ |
SK
अत एव प्राणः | BBस्_१,१.२४ |
SK
ज्योतिश् चरणाभिधानात् | BBस्_१,१.२५ |
SK
छन्दो ऽभिधानान् नेति चेन् न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् | BBस्_१,१.२६ |
SK
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश् चैवम् | BBस्_१,१.२७ |
SK
उपदेशभेदान् नेति चेन् नोभयस्मिन्न् अप्य् अविरोधात् | BBस्_१,१.२८ |
SK
प्राणस् तथानुगमात् | BBस्_१,१.२९ |
SK
न वक्तुर् आत्मोपदेशाद् इति चेद् अध्यात्मसंबन्धभूमा ह्य् अस्मिन् | BBस्_१,१.३० |
SK
शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् | BBस्_१,१.३१ |
SK
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेन् नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वाद् इह तद्योगात् | BBस्_१,१.३२ |
SK
सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् | BBस्_१,२.१ |
SK
विवक्षितगुणोपपत्तेश् च | BBस्_१,२.२ |
SK
अनुपपत्तेस् तु न शारीरः | BBस्_१,२.३ |
SK
कर्मकर्तृव्यपदेशाच् च | BBस्_१,२.४ |
SK
शब्दविशेषात् | BBस्_१,२.५ |
SK
स्मृतेश् च | BBस्_१,२.६ |
SK
अर्भकौस्त्वात् तद्व्यपदेशाच् च नेति चेन् न निचाय्यत्वाद् एवं व्योमवच् च | BBस्_१,२.७ |
SK
संभोगप्राप्तिर् इति चेन् न वैशेष्यात् | BBस्_१,२.८ |
SK
अत्ता चराचरग्रहणात् | BBस्_१,२.९ |
SK
प्रकरणाच् च | BBस्_१,२.१० |
SK
गुहां प्रविष्टाव् आत्मानौ हि तद्दर्शनात् | BBस्_१,२.११ |
SK
विशेषणाच् च | BBस्_१,२.१२ |
SK
अन्तर उपपत्तेः | BBस्_१,२.१३ |
SK
स्थानादिव्यपदेशाच् च | BBस्_१,२.१४ |
SK
सुखविशिष्टाभिधानाद् एव च | BBस्_१,२.१५ |
SK
अत एव च स ब्रह्म | BBस्_१,२.१६ |
SK
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच् च | BBस्_१,२.१७ |
SK
अनवस्थितेर् असंभवाच् च नेतरः | BBस्_१,२.१८ |
SK
अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् | BBस्_१,२.१९ |
SK
न च स्मार्तम् अतद्धर्माभिलापाच् छारीरश् च | BBस्_१,२.२० |
SK
उभये ऽपि हि भेदेनैनम् अधीयते | BBस्_१,२.२१ |
SK
अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः | BBस्_१,२.२२ |
SK
विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ | BBस्_१,२.२३ |
SK
रूपोपन्यासाच् च | BBस्_१,२.२४ |
SK
वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् | BBस्_१,२.२५ |
SK
स्मर्यमाणम् अनुमानं स्याद् इति | BBस्_१,२.२६ |
SK
शब्दादिभ्यो ऽन्तःप्रतिष्ठानाच् च नेति चेन् न तथा दृष्ट्युपदेशाद् असम्भवात् पुरुषमपि चैनम् अधीयते | BBस्_१,२.२७ |
SK
अत एव न देवता भूतं च | BBस्_१,२.२८ |
SK
साक्षाद् अप्य् अविरोधं जैमिनिः | BBस्_१,२.२९ |
SK
अभिव्यक्तेर् इत्य् आश्मरथ्यः | BBस्_१,२.३० |
SK
अनुस्मृतेर् बादरिः | BBस्_१,२.३१ |
SK
संपत्तेर् इति जैमिनिस् तथा हि दर्शयति | BBस्_१,२.३२ |
SK
आमनन्ति चैनम् अस्मिन् | BBस्_१,२.३३ |
SK
द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् | BBस्_१,३.१ |
SK
मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच् च | BBस्_१,३.२ |
SK
नानुमानम् अतच्छब्दात् प्राणभृच् च | BBस्_१,३.३ |
SK
भेदव्यपदेशात् | BBस्_१,३.४ |
SK
प्रकरणात् | BBस्_१,३.५ |
SK
स्थित्यदनाभ्यां च | BBस्_१,३.६ |
SK
भूमा संप्रसादाद् अध्युपदेशात् | BBस्_१,३.७ |
SK
धर्मोपपत्तेश् च | BBस्_१,३.८ |
SK
अक्षरम् अम्बरान्तधृतेः | BBस्_१,३.९ |
SK
सा च प्रशासनात् | BBस्_१,३.१० |
SK
अन्यभावव्यावृत्तेश्च | BBस्_१,३.११ |
SK
ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः | BBस्_१,३.१२ |
SK
दहर उत्तरेभ्यः | BBस्_१,३.१३ |
SK
गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च | BBस्_१,३.१४ |
SK
धृतेश् च महिम्नो ऽस्यास्मिन्न् उपलब्धेः | BBस्_१,३.१५ |
SK
प्रसिद्धेश् च | BBस्_१,३.१६ |
SK
इतरपरामर्शात् स इति चेन् नासंभवात् | BBस्_१,३.१७ |
SK
उत्तराच् चेद् आविर्भूतस्वरूपस् तु | BBस्_१,३.१८ |
SK
अन्यार्थश् च परामर्शः | BBस्_१,३.१९ |
SK
अल्पश्रुतेर् इति चेत् तद् उक्तम् | BBस्_१,३.२० |
SK
अनुकृतेस् तस्य च | BBस्_१,३.२१ |
SK
अपि च स्मर्यते | BBस्_१,३.२२ |
SK
शब्दाद् एव प्रमितः | BBस्_१,३.२३ |
SK
हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् | BBस्_१,३.२४ |
SK
तदुपर्य् अपि बादरायणः संभवात् | BBस्_१,३.२५ |
SK
विरोधः कर्मणीति चेन् नानेकप्रतिपत्तेर् दर्शनात् | BBस्_१,३.२६ |
SK
शब्द इति चेन् नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् | BBस्_१,३.२७ |
SK
अत एव च नित्यत्वम् | BBस्_१,३.२८ |
SK
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश् च | BBस्_१,३.२९ |
SK
मध्वादिष्व् असंभवाद् अनधिकारं जैमिनिः | BBस्_१,३.३० |
SK
ज्योतिषि भावाच् च | BBस्_१,३.३१ |
SK
भावं तु बादरायणो ऽस्ति हि | BBस्_१,३.३२ |
SK
शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि | BBस्_१,३.३३ |
SK
क्षत्रियत्वगतेश् च | BBस्_१,३.३४ |
SK
उत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् | BBस्_१,३.३५ |
SK
संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच् च | BBस्_१,३.३६ |
SK
तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः | BBस्_१,३.३७ |
SK
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् | BBस्_१,३.३८ |
SK
स्मृतेश् च | BBस्_१,३.३९ |
SK
कम्पनात् | BBस्_१,३.४० |
SK
ज्योतिर् दर्शनात् | BBस्_१,३.४१ |
SK
आकाशो ऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् | BBस्_१,३.४२ |
SK
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर् भेदेन | BBस्_१,३.४३ |
SK
पत्यादिशब्देभ्यः | BBस्_१,३.४४ |
SK
आनुमानिकम् अप्य् एकेषाम् इति चेन् न शरीर-रूपक-विन्यस्त-गृहीतेर् दर्शयति च | BBस्_१,४.१ |
SK
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् | BBस्_१,४.२ |
SK
तदधीनत्वाद् अर्थवत् | BBस्_१,४.३ |
SK
ज्ञेयत्वावचनाच् च | BBस्_१,४.४ |
SK
वदतीति चेन् न प्राज्ञो हि प्रकरणात् | BBस्_१,४.५ |
SK
त्रयाणाम् एव चैवम् उपन्यासः प्रश्नश् च | BBस्_१,४.६ |
SK
महद्वच् च | BBस्_१,४.७ |
SK
चमसवदविशेषात् | BBस्_१,४.८ |
SK
ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्य् अधीयत एके | BBस्_१,४.९ |
SK
कल्पनोपदेशाच् च मध्वादिवदविरोधः | BBस्_१,४.१० |
SK
न संख्योपसंग्रहादपि ज्ञानाभावाद् अतिरेकाच् च | BBस्_१,४.११ |
SK
प्राणादयो वाक्यशेषात् | BBस्_१,४.१२ |
SK
ज्योतिषैकेषाम् असत्यन्ने | BBस्_१,४.१३ |
SK
कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः | BBस्_१,४.१४ |
SK
समाकर्षात् | BBस्_१,४.१५ |
SK
जगद्वाचित्वात् | BBस्_१,४.१६ |
SK
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेत् तद्व्याख्यातम् | BBस्_१,४.१७ |
SK
अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् अपि चैवम् एके | BBस्_१,४.१८ |
SK
वाक्यान्वयात् | BBस्_१,४.१९ |
SK
प्रतिज्ञासिद्धेर् लिङ्गम् आश्मरथ्यः | BBस्_१,४.२० |
SK
उत्क्रमिष्यत एवं भावाद् इत्य् औडुलोमिः | BBस्_१,४.२१ |
SK
अवस्थितेर् इति काशकृत्स्नः | BBस्_१,४.२२ |
SK
प्रकृतिश् च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् | BBस्_१,४.२३ |
SK
अभिध्योपदेशाच् च | BBस्_१,४.२४ |
SK
साक्षाच् चोभयाम्नानात् | BBस्_१,४.२५ |
SK
आत्मकृतेः | BBस्_१,४.२६ |
SK
परिणामात् | BBस्_१,४.२७ |
SK
योनिश् च हि गीयते | BBस्_१,४.२८ |
SK
एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः | BBस्_१,४.२९ |

Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Brahmasūtra: corpustei HTML transform of the Brahmasūtra mūla.

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