Aphorisms on Brahman
Brahmasūtra
ब्रह्मसूत्रम्
SKतदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् | BBस्_३,१.१ |
SKत्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् | BBस्_३,१.२ |
SKप्राणगतेश् च | BBस्_३,१.३ |
SKअग्न्यादिश्रुतेर् इति चेन् न भाक्तत्वात् | BBस्_३,१.४ |
SKप्रथमे ऽश्रवणाद् इति चेन् न ता एव ह्य् उपपत्तेः | BBस्_३,१.५ |
SKअश्रुतत्वाद् इति चेन् नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः | BBस्_३,१.६ |
SKभाक्तं वानात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति | BBस्_३,१.७ |
SKकृतात्यये ऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च | BBस्_३,१.८ |
SKचरणाद् इति चेन् न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः | BBस्_३,१.९ |
SKआनर्थक्यम् इति चेन् न तदपेक्षत्वात् | BBस्_३,१.१० |
SKसुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः | BBस्_३,१.११ |
SKअनिष्टादिकारिणाम् अपि च श्रुतम् | BBस्_३,१.१२ |
SKसंयमने त्व् अनुभूयेतरेषामारोहाव् अरोहौ तद्गतिदर्शनात् | BBस्_३,१.१३ |
SKस्मरन्ति च | BBस्_३,१.१४ |
SKअपि सप्त | BBस्_३,१.१५ |
SKतत्रापि तद्व्यापारादविरोधः | BBस्_३,१.१६ |
SKविद्याकर्मणोर् इति तु प्रकृतत्वात् | BBस्_३,१.१७ |
SKन तृतीये तथोपलब्धेः | BBस्_३,१.१८ |
SKस्मर्यते ऽपि च लोके | BBस्_३,१.१९ |
SKदर्शनाच् च | BBस्_३,१.२० |
SKतृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य | BBस्_३,१.२१ |
SKतत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः | BBस्_३,१.२२ |
SKनातिचिरेण विशेषात् | BBस्_३,१.२३ |
SKअन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् | BBस्_३,१.२४ |
SKअशुद्धम् इति चेन् न शब्दात् | BBस्_३,१.२५ |
SKरेतःसिग्योगो ऽथ | BBस्_३,१.२६ |
SKयोनेःशरीरम् | BBस्_३,१.२७ |
SKसन्ध्ये सृष्टिराह हि | BBस्_३,२.१ |
SKनिर्मातारं चैके पुत्रादयश् च | BBस्_३,२.२ |
SKमायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् | BBस्_३,२.३ |
SKपराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ | BBस्_३,२.४ |
SKदेहयोगाद्वा सो ऽपि | BBस्_३,२.५ |
SKसूचकश् च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः | BBस्_३,२.६ |
SKतदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च | BBस्_३,२.७ |
SKअतः प्रबोधो ऽस्मात् | BBस्_३,२.८ |
SKस एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः | BBस्_३,२.९ |
SKमुग्धेर्ऽधसंपत्तिः परिशेषात् | BBस्_३,२.१० |
SKन स्थानतो ऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि | BBस्_३,२.११ |
SKभेदाद् इति चेन् न प्रत्येकमतद्वचनात् | BBस्_३,२.१२ |
SKअपि चैवम् एके | BBस्_३,२.१३ |
SKअरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् | BBस्_३,२.१४ |
SKप्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् | BBस्_३,२.१५ |
SKआह च तन्मात्रम् | BBस्_३,२.१६ |
SKदर्शयति चाथो अपि स्मर्यते | BBस्_३,२.१७ |
SKअत एव चोपमा सूर्यकादिवत् | BBस्_३,२.१८ |
SKअम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् | BBस्_३,२.१९ |
SKवृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवं दर्शनाच् च | BBस्_३,२.२० |
SKप्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः | BBस्_३,२.२१ |
SKतदव्यक्तमाह हि | BBस्_३,२.२२ |
SKअपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् | BBस्_३,२.२३ |
SKप्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश् च कर्मण्यभ्यासात् | BBस्_३,२.२४ |
SKअतो ऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् | BBस्_३,२.२५ |
SKउभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् | BBस्_३,२.२६ |
SKप्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् | BBस्_३,२.२७ |
SKपूर्ववद्वा | BBस्_३,२.२८ |
SKप्रतिषेधाच् च | BBस्_३,२.२९ |
SKपरमतस्सेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः | BBस्_३,२.३० |
SKसामान्यात् तु | BBस्_३,२.३१ |
SKबुद्ध्यर्थः पादवत् | BBस्_३,२.३२ |
SKस्थानविशेषात्प्रकाशादिवत् | BBस्_३,२.३३ |
SKउपपत्तेश् च | BBस्_३,२.३४ |
SKतथान्यप्रतिषेधात् | BBस्_३,२.३५ |
SKअनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः | BBस्_३,२.३६ |
SKफलमत उपपत्तेः | BBस्_३,२.३७ |
SKश्रुतत्वाच् च | BBस्_३,२.३८ |
SKधर्मं जैमिनिरत एव | BBस्_३,२.३९ |
SKपूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् | BBस्_३,२.४० |
SKसर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् | BBस्_३,३.१ |
SKभेदान् नेति चेद् एकस्याम् अपि | BBस्_३,३.२ |
SKस्वाध्यायस्य तथात्वे हि समाचारे ऽधिकाराच् च सववच् च तन्नियमः | BBस्_३,३.३ |
SKदर्शयति च | BBस्_३,३.४ |
SKउपसंहारोर्ऽथाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च | BBस्_३,३.५ |
SKअन्यथात्वं शब्दाद् इति चेन् नाविशेषात् | BBस्_३,३.६ |
SKन वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् | BBस्_३,३.७ |
SKसंज्ञातश् चेत् तद् उक्तम् अस्ति तु तद् अपि | BBस्_३,३.८ |
SKव्याप्तेश् च समञ्जसम् | BBस्_३,३.९ |
SKसर्वाभेदादन्यत्रेमे | BBस्_३,३.१० |
SKआनन्दादयः प्रधानस्य | BBस्_३,३.११ |
SKप्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे | BBस्_३,३.१२ |
SKइतरे त्वर्थसामान्यात् | BBस्_३,३.१३ |
SKआध्यानाय प्रयोजनाभावात् | BBस्_३,३.१४ |
SKआत्मशब्दाच् च | BBस्_३,३.१५ |
SKआत्मगृहीतिर् इतरवद् उत्तरात् | BBस्_३,३.१६ |
SKअन्वयाद् इति चेत् स्याद् अवधारणात् | BBस्_३,३.१७ |
SKकार्याख्यानादपूर्वम् | BBस्_३,३.१८ |
SKसमान एवं चाभेदात् | BBस्_३,३.१९ |
SKसम्बन्धादेवमन्यत्रापि | BBस्_३,३.२० |
SKन वा विशेषात् | BBस्_३,३.२१ |
SKदर्शयति च | BBस्_३,३.२२ |
SKसंभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः | BBस्_३,३.२३ |
SKपुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् | BBस्_३,३.२४ |
SKवेधाद्यर्थभेदात् | BBस्_३,३.२५ |
SKहानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाच्छन्दस्स्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् | BBस्_३,३.२६ |
SKसांपराये तर्तव्याभावात् तथा ह्य् अन्ये | BBस्_३,३.२७ |
SKछन्दत उभयाविरोधात् | BBस्_३,३.२८ |
SKगतेर् अर्थवत्त्वम् उभयथान्यथा हि विरोधः | BBस्_३,३.२९ |
SKउपपन्नस् तल्लक्षणार्थोपलब्धेर् लोकवत् | BBस्_३,३.३० |
SKयावदधिकारम् अवस्थितिर् आधिकारिकाणाम् | BBस्_३,३.३१ |
SKअनियमस्सर्वेषामविरोधश्शब्दानुमानाभ्याम् | BBस्_३,३.३२ |
SKअक्षरधियां त्ववरोधस्सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् | BBस्_३,३.३३ |
SKइयदामननात् | BBस्_३,३.३४ |
SKअन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनो ऽन्यथा भेदानुपपत्तिर् इति चेन् नोपदेशवत् | BBस्_३,३.३५ |
SKव्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् | BBस्_३,३.३६ |
SKसैव हि सत्यादयः | BBस्_३,३.३७ |
SKकामादीतरत्र तत्र चाऽयतनादिभ्यः | BBस्_३,३.३८ |
SKआदरादलोपः | BBस्_३,३.३९ |
SKउपस्थिते ऽतस्तद्वचनात् | BBस्_३,३.४० |
SKतन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम् | BBस्_३,३.४१ |
SKप्रदानवदेव तदुक्तम् | BBस्_३,३.४२ |
SKलिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि | BBस्_३,३.४३ |
SKपूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् | BBस्_३,३.४४ |
SKअतिदेशाच् च | BBस्_३,३.४५ |
SKविद्यैव तु निर्धारणाद्दर्शनाच् च | BBस्_३,३.४६ |
SKश्रुत्यादिबलीयस्त्वाच् च न बाधः | BBस्_३,३.४७ |
SKअनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टश् च तदुक्तम् | BBस्_३,३.४८ |
SKन सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः | BBस्_३,३.४९ |
SKपरेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्व् अनुबन्धः | BBस्_३,३.५० |
SKएक आत्मनः शरीरे भावात् | BBस्_३,३.५१ |
SKव्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् | BBस्_३,३.५२ |
SKअङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् | BBस्_३,३.५३ |
SKमन्त्रादिवद्वाविरोधः | BBस्_३,३.५४ |
SKभूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्वं तथा हि दर्शयति | BBस्_३,३.५५ |
SKनाना शब्दादिभेदात् | BBस्_३,३.५६ |
SKविकल्पो ऽविशिष्टफलत्वात् | BBस्_३,३.५७ |
SKकाम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् | BBस्_३,३.५८ |
SKअङ्गेषु यथाश्रयभावः | BBस्_३,३.५९ |
SKशिष्टेश् च | BBस्_३,३.६० |
SKसमाहारात् | BBस्_३,३.६१ |
SKगुणसाधारण्यश्रुतेश् च | BBस्_३,३.६२ |
SKन वा तत्सहभावाश्रुतेः | BBस्_३,३.६३ |
SKदर्शनाच् च | BBस्_३,३.६४ |
SKपुरुषार्थो ऽतः शब्दाद् इति बादरायणः | BBस्_३,४.१ |
SKशेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्व् इति जैमिनिः | BBस्_३,४.२ |
SKआचारदर्शनात् | BBस्_३,४.३ |
SKतच्छ्रुतेः | BBस्_३,४.४ |
SKसमन्वारम्भणात् | BBस्_३,४.५ |
SKतद्वतो विधानात् | BBस्_३,४.६ |
SKनियमात् | BBस्_३,४.७ |
SKअधिकोपदेशात् तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् | BBस्_३,४.८ |
SKतुल्यं तु दर्शनम् | BBस्_३,४.९ |
SKअसार्वत्रिकी | BBस्_३,४.१० |
SKविभागः शतवत् | BBस्_३,४.११ |
SKअध्ययनमात्रवतः | BBस्_३,४.१२ |
SKनाविशेषात् | BBस्_३,४.१३ |
SKस्तुतये ऽनुमतिर्वा | BBस्_३,४.१४ |
SKकामकारेण चैके | BBस्_३,४.१५ |
SKउपमर्दं च | BBस्_३,४.१६ |
SKऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि | BBस्_३,४.१७ |
SKपरामर्शं जैमिनिरचोदनाच्चापवदति हि | BBस्_३,४.१८ |
SKअनुष्ठेयं बादरायणस्साम्यश्रुतेः | BBस्_३,४.१९ |
SKविधिर् वा धारणवत् | BBस्_३,४.२० |
SKस्तुतिमात्रम् उपादानाद् इति चेन् नापूर्वत्वात् | BBस्_३,४.२१ |
SKभावशब्दाच् च | BBस्_३,४.२२ |
SKपारिप्लवार्था इति चेन् न विशेषितत्वात् | BBस्_३,४.२३ |
SKतथा चैकवाक्योपबन्धात् | BBस्_३,४.२४ |
SKअत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा | BBस्_३,४.२५ |
SKसर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेर् अश्ववत् | BBस्_३,४.२६ |
SKशमदमाद्युपेतस् स्यात् तथापि तु तद्विधेस् तदङ्गतया तेषाम् अप्य् अवश्यानुष्ठेयत्वात् | BBस्_३,४.२७ |
SKसर्वान् नानुमतिश् च प्राणात्यये तद्दर्शनात् | BBस्_३,४.२८ |
SKअबाधाच् च | BBस्_३,४.२९ |
SKअपि स्मर्यते | BBस्_३,४.३० |
SKशब्दश् चातो ऽकामकारे | BBस्_३,४.३१ |
SKविहितत्वाच् चाऽश्रमकर्मापि | BBस्_३,४.३२ |
SKसहकारित्वेन च | BBस्_३,४.३३ |
SKसर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् | BBस्_३,४.३४ |
SKअनभिभवं च दर्शयति | BBस्_३,४.३५ |
SKअन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः | BBस्_३,४.३६ |
SKअपि स्मर्यते | BBस्_३,४.३७ |
SKविशेषानुग्रहश् च | BBस्_३,४.३८ |
SKअतस् त्व् इतरज्ज्यायो लिङ्गाच् च | BBस्_३,४.३९ |
SKतद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेर् अपि नियमात् तद्रूपाभावेभ्यः | BBस्_३,४.४० |
SKन चाधिकारिकम् अपि पतनानुमानात् तदयोगात् | BBस्_३,४.४१ |
SKउपपूर्वम् अपीत्य् एके भावमशनवत् तद् उक्तम् | BBस्_३,४.४२ |
SKबहिस् तूभयथापि स्मृतेर् आचाराच् च | BBस्_३,४.४३ |
SKस्वामिनः फलश्रुतेर् इत्य् आत्रेयः | BBस्_३,४.४४ |
SKआर्त्विज्यम् इत्य् औडुलोमिः तस्मै हि परिक्रीयते | BBस्_३,४.४५ |
SKसहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् | BBस्_३,४.४६ |
SKकृत्स्नभावात् तु गृहिणोपसंहारः | BBस्_३,४.४७ |
SKमौनवद् इतरेषाम् अप्य् उपदेशात् | BBस्_३,४.४८ |
SKअनाविष्कुर्वन्न् अन्वयात् | BBस्_३,४.४९ |
SKऐहिकम् अप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् | BBस्_३,४.५० |
SKएवं मुक्तिफलानियमस् तदवस्थावधृतेस् तदवस्थावधृतेः | BBस्_३,४.५१ |