Essence of Awakening Bodhasāra
Bओधसार
3 SK ॐ किञ्चित्कुतूहलेनैव विदुषां प्रियकाम्यया / मङ्गलाचरणं कृत्वा बोधसारो निरूप्यते // NBस्_१.१ //
4 SK अनन्तशक्तिसन्दोहपूर्णस्य परमात्मनः / विघ्नविध्वंसिनीं शक्तिं गणराजमुपास्महे // NBस्_१.२ //
5 SK या प्रकाशविमर्शाभ्यां स्वरूपावस्थितिङ्गता / स्मरामि तामहं भक्त्या ज्ञानशक्तिं सरस्वतीम् // NBस्_१.३ //
6 SK श्रीगुरून्परमानन्दस्वरूपानभिवादये / तापत्रयापहा येषां कृपा ब्रह्मामृतप्रपा // NBस्_१.४ //
7 SK अथ गुरुस्तवः मदमोहाभिधक्रूरमधुकैटभजिष्णवे / मोक्षलक्ष्मीनिवासाय नमः श्रीगुरुविष्णवे // NBस्_१.५ //
8 SK गुणैर्गौरवमायाता हरिब्रह्महरास्त्रयः / गुणातीततयाऽस्माकं गुरवो गुरुताङ्गताः // NBस्_१.६ //
9 SK पुरान्तकहरो रुद्रः कंसकेशिहरो हरिः / चण्डमुण्डहरा चण्डी सर्वद्वन्द्वहरो गुरुः // NBस्_१.७ //
10 SK यच्छन्ति देवतास्तुष्टा धनमायुः सुतं यशः / ज्ञानं के नाम दास्यन्ति विना श्रीगुरुपादुकाम् // NBस्_१.८ //
11 SK जयति श्रीगुरूणां हि चरणाब्जरजोगुणः / हतास्त्रयो यदेकेन रजःसत्त्वतमोगुणाः // NBस्_१.९ //
12 SK तार्या वयं तरिर्बोधस्तरणीयो भवार्णवः / तत्कर्णधाररूपेण तारकं श्रीगुरुं भजे // NBस्_१.१० //
13 SK तारकस्योपदेशेन गुरुर्भूत्वा विमुक्तिदः / काश्यामपीश्वरस्तस्मादीश्वरादधिको गुरुः // NBस्_१.११ //
14 SK गुरोरनुग्रहादीश ईश्वरानुग्रहाद्गुरुः / श्रीगुरोर्दर्शनं हेतुः परं त्वीश्वरदर्शने // NBस्_१.१२ //
15 SK ईश्वरः सर्वहेतुत्वाद्धेतुःसंसारमोक्षायोः / मोक्षस्यैव गुरुस्तस्मान्नास्ति तत्वं गुरोः परम् // NBस्_१.१३ //
16 SK विनाऽपि क्षेत्रमाहात्म्यं गुरुमाहात्म्यतः किल / विमुक्तिर्यत्र कुत्रापि न काश्यां गुरुणा विना // NBस्_१.१४ //
17 SK क्षम्यतामिति किं वाच्यं प्रसीदेति किमुच्यताम् / क्षमाप्रसादसंपूर्णः स्वभावादेव मे गुरुः // NBस्_१.१५ //
19 SK अथ शिष्यविवेकः | बीजं गुरुपदेशो हि जिज्ञासुः क्षेत्रमुच्यते / विवेकांकुरजो बोधद्रुमो मोक्षस्तु तत्फलम् // NBस्_२.१ //
20 SK यद्यपि क्षेत्रबीजाभ्यां विना न द्रुमसंभवः / किं तु बीजमुपादानं निमित्तं क्षेत्रमुच्यते // NBस्_२.२ //
21 SK द्रुमो बीजपरीणामो न क्षेत्रपरिणामकः / बोधो गुरुपरीणामो न शिष्यपरिणामकः // NBस्_२.३ //
22 SK द्रुमो हि बीजजातीयः क्षेत्रजातीयको न हि / बोधो हि गुरुजातीयः शिष्यजातीयको न हि // NBस्_२.४ //
23 SK बीजेन बीजजातीयस्तरुः क्षेत्रे समर्पितः / गुरुणा स्वात्मजातीयो बोधः शिष्ये समर्पितः // NBस्_२.५ //
24 SK वह्निप्रभा हि वर्त्तिस्था तमो हन्ति प्रकाशते / तमोहन्त्री प्रकाशात्मा प्रभैव न तु वर्त्तिका // NBस्_२.६ //
25 SK गुरुप्रभा हि शिष्यस्था तमो हन्ति प्रकाशते / तमोहन्ता प्रकाशात्मा गुरुरेव न शिष्यकः // NBस्_२.७ //
26 SK यदग्निः काष्ठमारुह्य भस्मसात्कुरुते पुरीम् / भस्मासात्कारणं तत्र गुणो वह्नेर्न काष्ठगः // NBस्_२.८ //
27 SK बोधात्मना गुरुः शिष्यमाविश्य दहति क्षणात् / यद्द्वैतं सा गुरोः शक्तिर्न शिष्यस्येति निर्णयः // NBस्_२.९ //
28 SK यद्यप्युदयने भानोर्यथा पद्मं प्रकाशते / न काशन्ते तथा पद्माः काष्ठपाषाणमृण्मयाः // NBस्_२.१० //
29 SK प्रकाशको रविर्यद्वत्पद्ममेव विकासयेत् / गुरुस्तथा बोधकः सञ्छिष्यमेव प्रबोधयेत् // NBस्_२.११ //
30 SK प्रकाशकस्य महिमा प्रकाश्यादधिकः किल / सूक्ष्मं विशेषं वक्ष्यामि गुरुसूर्यस्य तं शृणु // NBस्_२.१२ //
31 SK तत्तद्विवेकवैराग्ययुक्तवेदान्तयुक्तिभिः / शिष्यं नयति गुर्वर्कः स्वैक्यं स्वाद्भिन्नमप्यहो // NBस्_२.१३ //
32 SK विकासकोऽपि तपनो न पद्मं स्वैकतां नयेत् / तस्मात्सर्वात्मभावेन सेव्या श्रीगुरुपादुका // NBस्_२.१४ //
33 SK तत्सत्यं दातृपात्राभ्यां विना दानं न सिद्ध्यति / तथापि पात्रं पात्रं स्याद्दाता परमकारणम् // NBस्_२.१५ //
34 SK भवेत्स्पर्शमणिस्पर्शाल्लोहं स्वर्णं न तन्मणिः / गुरुस्पर्शमणिस्पर्शात्स एव भवति क्षणात् // NBस्_२.१६ //
35 SK एवं विवेकतो धीमन्नुपयोगो द्वयोरपि / शिष्यो निमित्तमात्रं स्याद्गरिष्ठा गुरुपादुका // NBस्_२.१७ //
36 SK उपदेशक्रमो राम व्यवस्थामात्रपालनम् / इत्यादि वचनं तत्तु शिष्योत्साहविवृद्धये // NBस्_२.१८ //
37 SK सिद्धान्तः सर्वतन्त्राणां सद्यः प्रत्ययकारकः / सर्वदा भावनीयोऽयं गुरुशिष्यविनिर्णयः // NBस्_२.१९ //
39 SK ब्रह्मजिज्ञासा अथातो ब्रह्मजिज्ञासा जिज्ञास्यं ब्रह्म केवलम् / तटस्थलक्षणेनाथ स्वरूपस्य च लक्षणात् // NBस्_३.१ //
40 SK उत्पत्तिस्थितिनाशानां मूलकारणमीश्वरः / सर्वज्ञः सत्यसङ्कल्प इत्यादिषु तटस्थता // NBस्_३.२ //
41 SK सच्चिदानन्दरूपं तत्स्वप्रकाशं परात्परम् / अनण्वित्यादिवेदोक्तं स्वरूपस्य तु लक्षणम् // NBस्_३.३ //
42 SK गुणप्रधानभावेन यद्यत्किञ्चिदपेक्षितम् / नानाप्रकरणव्याजैस्तत्सर्वमभिधीयते // NBस्_३.४ //
43 SK बहिरङ्गान्तरङ्गाणां साधनानामनुक्रमः / यदन्तरङ्गं यस्मात्तु तत्पश्चात्तु निरूप्यते // NBस्_३.५ //
45 SK वैराग्यपीठिकाबन्धः वैराग्यपीठिकाबन्धं प्रथमं शृणु सन्मते / न नेमिरेव यत्रास्ति स्थितिश्चक्रस्य कीदृशी // NBस्_४,१.१ //
46 SK न शूद्रे वेदसंस्कारस्तैलञ्च सिकतासु न / न स्यात्करतले रोम तथा मुक्तिर्न रागिणि // NBस्_४,१.२ //
47 SK वैराग्यं द्विविधं सूक्ष्मं तद्भेदमवधारय / जिज्ञासामुख्यमेकं स्याज्जिहासामुख्यमेव च // NBस्_४,१.३ //
48 SK जिहासा संसृतेर्ब्रह्मजिज्ञासेति द्वयं मुने / एकमेव तथाप्यस्ति विशेषः कश्चिदत्र हि // NBस्_४,१.४ //
49 SK राज्यभ्रष्टा दीर्घरोगाः पराधीना हतश्रियः / ये विरक्तास्तपस्यन्ति जिहासामुख्यमेव तत् // NBस्_४,१.५ //
50 SK आधिव्याधिभयोद्वेगपारतन्त्र्यादिवर्जिताः / ये धीरा मुक्तिमिच्छन्ति शृणु तेषामयं क्रमः // NBस्_४,१.६ //
51 SK कामधेनुर्गृहे येषां निवासो नन्दने वने / कश्यपाद्यास्तपस्यन्ति जिज्ञासामुख्यमेव तत् // NBस्_४,१.७ //
52 SK आधिव्याधिभयोद्वेगपारतन्त्र्यादिपीडिताः / ये जीवा मोक्षमिच्छन्ति जिहासामुख्यता तु सा // NBस्_४,१.८ //
53 SK मानुष्यं दुर्लभं प्राप्तं सच्छास्त्रैः संस्कृता मतिः / यदि न ब्रह्मविश्रान्तिस्तदस्माभिः किमर्जितम् // NBस्_४,१.९ //
54 SK इत्येवं व्यवसायेन ह्याकाशफलपातवत् / जिज्ञासयन्ति ये धीरा जिज्ञासामुख्यता तु सा // NBस्_४,१.१० //
55 SK विरोचनः कार्त्तवीर्यो बलिः श्रीराघवादयः / विरक्ता राजलीलायां ते हि तत्र निदर्शनम् // NBस्_४,१.११ //
56 SK तीव्रात्संसारवैराग्याद्ब्रह्मजिज्ञासनं यदि / वैराग्यं पुण्यजीवानां जिहासामुख्यमेव तत् // NBस्_४,१.१२ //
57 SK ब्रह्मजिज्ञासया तात तीव्रया यो विधीयते / विरागो दृश्यभावेषु जिज्ञासामुख्यमेव तत् // NBस्_४,१.१३ //
58 SK सहजं यस्य वैराग्यं का वाच्या तस्य मुख्यता / अथ दोषाः प्रदर्श्यन्ते वैराग्यं दोषदर्शनात् // NBस्_४,१.१४ //
59 SK कथयामि समासेन सावधानमनाः शृणु / असमञ्जसतां साधो समारभ्य शरीरतः // NBस्_४,१.१५ //
61 SK कायविडम्बना यं भूषयन्ति कनकैर्वसनैश्चन्दनैरपि / अविचारत एवायं कायो रम्यत्वमागतः // NBस्_४,२.१ //
62 SK अस्य क्रव्यादभक्ष्यस्य कृशानोरिन्धनस्य च / परिणामकृशस्यैव केन कायस्य रम्यता // NBस्_४,२.२ //
63 SK कलेर्वरमिदं स्थानं विग्रहो मूर्त्तिमानसौ / पञ्चभूतनिवासोऽयं कथं तत्र सुखी भवेत् // NBस्_४,२.३ //
64 SK कारागृहं गर्भवासो बाल्यं केवलमूढता / तत्रापि दुःसहात्यन्तं पराधीनतया स्थितिः // NBस्_४,२.४ //
65 SK कामबाणैर्यत्र पीडा कामिनीविरहज्वरः / पुष्कला पापसंपत्तिर्यौवनं विपदां वनम् // NBस्_४,२.५ //
66 SK उन्नताऽनततां यातो जराक्षारविधूसरः / पुराणकूष्माण्डसमः कायो वृद्धस्य गर्हितः // NBस्_४,२.६ //
67 SK मरणस्य तु किं वाच्यं मृत्युदूतभयं ततः / नरके तु महद्दुःखं स्वर्गे पतनजं भयम् // NBस्_४,२.७ //
68 SK उत्तमाधमभावेन तत्राप्यस्ति विडम्बना / यदि पश्वादियोनिः स्यात्तदा दुःखस्य का कथा // NBस्_४,२.८ //
69 SK पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः पुनर्दुखं पुनर्भयम् / न जानाति गतिं जन्तुर्निमग्नो मोहसागरे // NBस्_४,२.९ //
71 SK वृत्तिविडम्बना क्षत्रधर्मे परा हिंसा याच्ञायां लाघवं महत् / असत्यमेव वाणिज्ये नानृतात्पातकं परम् // NBस्_४,३.१ //
72 SK सेवायां परमं कष्टं मृत्कीटस्तु कृषीवलः / द्यूते सर्वस्वनाशः स्याच्चौर्ये राजभयं महत् // NBस्_४,३.२ //
73 SK नाकाशात्पतति द्रव्यं जीविका सुखदा कथम् /
75 SK कामविडम्बना चर्वयन्ति महामांसं गते प्राणे पिशाचकाः / जीवत्परस्परं मांसं स्त्रीपुंसाश्चतुराननाः // NBस्_४,४.१ //
76 SK नृदेहैर्निशि नृत्यन्ति श्मशानेषु पिशाचकाः / विचित्रैरङ्गविन्यासैर्गृहेषु गृहमेधिनः // NBस्_४,४.२ //
77 SK लिहति स्पृशति भ्रान्तो मुहुर्जिघ्रति खादति / ग्रामसिंहानुरूपेयं ग्राम्यधर्मव्यवस्थितिः // NBस्_४,४.३ //
78 SK कण्डूयनेन यत्कण्डूसुखं तत्किं भवेत्सुखम् / पश्चाद्यत्र महापीडा तथा वैषयिकं सुखम् // NBस्_४,४.४ //
79 SK नादासक्तं मृगं व्याधश्छिनत्ति निशितैः शरैः / रूपासक्तं नरं नारी रतिच्छुरिकयाऽसकृत् // NBस्_४,४.५ //
81 SK क्रोधविडम्बना रुधिरं पिबति स्वीयं दिवा तमसि नृत्यति / भीषयत्यात्मनात्मानं क्रूरः क्रोधी न राक्षसः // NBस्_४,५.१ //
83 SK लोभविडम्बना न पिशाचा न डाकिन्यो न भुजङ्गा न वृश्चिकाः / संभ्रान्तयन्ति मनुजं यथा लोभो धियं रिपुः // NBस्_४,६.१ //
84 SK मेरवो घृतबिन्द्वाभा दुराशादावपावके / कथं सहस्रलक्षाद्यैस्तर्हि तृप्यतु लोभवान् // NBस्_४,६.२ //
85 SK आनिद्रं प्रातरारभ्य जाग्रति स्वप्नपूर्ष्वपि / भ्रमन्नो लभते शान्तिं स लोभस्य पराक्रमः // NBस्_४,६.३ //
86 SK निधानं यक्षसर्पाद्या यदाक्रामन्ति यत्नतः / न पिबन्ति न खादन्ति तेषां हि गुरवः शठाः // NBस्_४,६.४ //
87 SK दानभोगविहीनं च यदेव धनिनो धनम् / न तु तस्य मुखे धूलिर्दीयते भूमिगोपनैः // NBस्_४,६.५ //
88 SK मूढस्ताम्रमये पात्रे संस्थापयति किं धनम् / पात्रे स्थितं धनं भद्रं किन्तु पात्रं परीक्षय // NBस्_४,६.६ //
89 SK काकविष्ठाधनस्यार्थे कायक्लेशेन भूयसा / मदान्धा धनिनः सेव्या महतीयं विडम्बना // NBस्_४,६.७ //
90 SK न लोभस्योपचाराय मणिमन्त्रौषधादयः / मणिमन्त्रौषधश्लाघी सोऽपि लोभपरायणः // NBस्_४,६.८ //
91 SK किञ्चिद्धनकणं ध्यात्वा मुखमाढ्यस्य पश्यसि / करोषि श्वेव चाटूनि लोभेनापकृतं स्मर // NBस्_४,६.९ //
92 SK लोहार्गलो भद्रहरो लोलताङ्को भयप्रदः / लुनात्युभौ च यल्लोकौ तेन लोभः प्रकीर्त्तितः // NBस्_४,६.१० //
93 SK सकामाः कामिनीलुब्धा निष्कामा मोक्षलोभिनः / भावलुब्धो हि भगवान्निर्लोभोऽत्यन्तदुर्लभः // NBस्_४,६.११ //
94 SK दुग्धफेनोज्ज्वला शय्या बाला चरणसेविनी / निद्रां न लभते भूपः परराष्ट्रजिगीषया // NBस्_४,६.१२ //
95 SK मार्गेषु मिलिताश्चौराः सख्यं तैः सह वर्धितम् / ते गता धनमादाय पश्चाच्छोचति मन्दधीः // NBस्_४,६.१३ //
96 SK स्वामी तु चौरवद्द्रव्यं गोपायति यतस्ततः / भार्यापुत्रादयश्चौरा भुञ्जते स्वामिनो यथा // NBस्_४,६.१४ //
97 SK पुत्रमित्रकलत्रेभ्यो गोप्यते यद्धनं जनैः / तेन मन्येऽवनं पापं सुकृत्या गोप्यते नहि // NBस्_४,६.१५ //
98 SK रागिणी गणिका वित्तं यद्वाञ्छति वरा हि सा / धिक्तं वैराग्यवक्तारं वाचालं वित्तलम्पटम् // NBस्_४,६.१६ //
99 SK धनिभ्यो धनमादाय श्लाघते शास्त्रपाठकः / बहुभ्यो मिथुनीभूय धनिभ्यो गणिका यथा // NBस्_४,६.१७ //
100 SK न शोभते तथैवायं लोभी वेदान्तवाचकः / चौर्येण निगडे दत्तो जटाभस्मधरो यथा // NBस्_४,६.१८ //
101 SK यदि वित्तार्जनेनैव विद्वांसो यान्ति गौरवम् / कस्तर्हि वेश्याविदुषोर्विशेष इति वर्णय // NBस्_४,६.१९ //
102 SK अनित्यमिति यो वक्ति सेवते नित्यमेव तत् / बहिर्मुखस्य तस्यास्यं मा दर्शय महेश्वर // NBस्_४,६.२० //
103 SK कामकिंकरतां प्राप्य सकामाः सर्वकिंकराः / कामेनैव परित्यक्तो निष्कामः कस्य किंकरः // NBस्_४,६.२१ //
105 SK कर्मविडम्बना वंशपात्रमिवापूर्णं पूर्णं घटशतैरपि / क्रियाजालं कथं साधो विरागाय न जायते // NBस्_४,७.१ //
106 SK ब्रह्मणो दिनमारभ्य यावदद्य कृताः क्रियाः / मुहूर्त्तं हन्त संसारी नैव निश्चिन्तताङ्गतः // NBस्_४,७.२ //
107 SK अभाग्यं परमं पुंसां परपिण्डोपजीवनम् / तत्कथं नाम सौभाग्यं पुत्रपिण्डोपजीवनम् // NBस्_४,७.३ //
108 SK मृतशब्देन सम्बोध्य मृतपिण्डं मृताहनि / मृताय दास्यते पुत्रस्तद्वरं किमुतामृतम् // NBस्_४,७.४ //
109 SK अशनायां पिपासां च शोकं मोहं जरां मृतिम् / प्राप्नुवञ्च्छ्रुतिशास्त्रेभ्यो मा भव श्राद्धभक्षकः // NBस्_४,७.५ //
110 SK दीर्घमायुर्जराभुक्त्यै धनं भूरि दुराधये / पुत्राः कलहदुःखाय संसारे दुःखमद्भुतम् // NBस्_४,७.६ //
111 SK छायां पश्यति कायस्य रायो गर्वेण मुह्यति / जायां भजति भावेन मायां नो वेद वैष्णवीम् // NBस्_४,७.७ //
112 SK यात्रासमागमसमे नतर्कितगतागते / पशुपुत्रकलत्रादौ ममता न मता समा // NBस्_४,७.८ //
113 SK सुतरां गुरवोऽस्माकं वैयाकरणसत्तमाः / आदिश्य ममतास्थाने समतां साधयन्ति ये // NBस्_४,७.९ //
114 SK त्यक्ष्यंत्यवश्यं च त्वान्त्वं च त्यक्ष्यसि यानपि / येषां त्यागे महत्सौख्यं तेषां त्यागेऽपि कः श्रमः // NBस्_४,७.१० //
115 SK व्यवहारविमूढानां स्तुतिनिन्दामयः क्रमः / सोऽपि तत्कायपर्यन्तः कायः कतिदिनान्वयी // NBस्_४,७.११ //
116 SK एकतः सकला लोका विकर्षन्ति यथाबलम् / पदार्थमालां बलवानेकः कालो गिलत्यसौ // NBस्_४,७.१२ //
117 SK लोला लक्ष्मीर्वयं लोला लोला विषयवृत्तयः / किं सुखं तत्र यत्राङ्ग जीवनस्यैव संशयः // NBस्_४,७.१३ //
118 SK शोकमोहौ भयं दैन्यमाधिर्व्याधिः क्षुधा तृषा / इत्यादि विविधं दुःखमिति संक्षेपकीर्त्तनम् // NBस्_४,७.१४ //
120 SK धर्मजिज्ञासा अथातो धर्मजिज्ञासा धर्मः प्रोक्तश्चतुर्विधः / नित्यो नैमित्तिकः काम्यः प्रायश्चित्तमिति क्रमात् // NBस्_५,१.१ //
121 SK वर्णाश्रमसमाचाराः शौचस्नानादयश्च ये / आवश्यकास्ते नित्याः स्युरकृत्य प्रत्यवैति यान् // NBस्_५,१.२ //
122 SK देशकालनिमित्ता ये ते तु नैमित्तिकाः स्मृताः / संक्रान्तिग्रहणस्नानदानश्राद्धजपादयः // NBस्_५,१.३ //
123 SK प्रायश्चित्तात्मका धर्माः कृच्छ्रचान्द्रायणादयः / कामनापूर्वकं काम्यं मुमुक्षोर्न विधीयते // NBस्_५,१.४ //
124 SK हरिप्रसादकाम्या च चित्तशुद्धेश्च कामना / मोक्षस्य कामना चेति कामनेयं न कामना // NBस्_५,१.५ //
125 SK तस्मात्तया कामनया स्नानदानजपादिकम् / तीर्थव्रततपोनिष्ठा मोक्षकामैर्विधीयताम् // NBस्_५,१.६ //
126 SK कर्मणां निर्णयं त्वेवं गीतायामाह माधवः / सर्वथा न परित्याज्यं नित्यं कर्म मुमुक्षुणा // NBस्_५,१.७ //
127 SK ज्ञाने जातेऽपि न त्याज्यं लोकानुग्रहहेतुना / यो वासनापरित्यागः कर्मत्यागः स एवहि // NBस्_५,१.८ //
128 SK न कर्मणां परित्यागः कर्मत्यागो मनोमयः / यज्ञो दानं तपश्चेति पावनानि मनीषिणाम् // NBस्_५,१.९ //
129 SK कर्मणा चित्तशुद्धिः स्यात्तया तीव्रा मुमुक्षुता / ततो विवेकान्मुक्तिः स्यात्कर्म त्याज्यं कथं तु तत् // NBस्_५,१.१० //
130 SK ये तु बोधेन संप्राप्तास्तात कर्मातिगां दशाम् / न विधेः किंकरास्तस्मात्स्वच्छन्दं विचरन्तु ते // NBस्_५,१.११ //
132 SK तपस्यातात्पर्यम् कृता कपटभावेन दम्भलोभपरायणैः / हट्टे नगरमध्ये वा सा तपस्याऽधमा स्मृता // NBस्_५,२.१ //
133 SK वेदशास्त्रोक्तविधिना शीतोष्णादिसहिष्णुना / या कृता कामनापूर्वं सा तपस्या तु मध्यमा // NBस्_५,२.२ //
134 SK मनसो निग्रहार्थाय परमार्थपरायणा / अकामा तत्वजिज्ञासोः सा तपस्योत्तमा मता // NBस्_५,२.३ //
135 SK आगते स्वागतं कुर्याद्गच्छन्तं न निवारयेत् / यथाप्राप्तं सहेत्सर्वं सा तपस्योत्तमोत्तमा // NBस्_५,२.४ //
137 SK व्रतव्यवस्था परदारपरद्रव्यपरद्रोहविवर्जनम् / रागद्वेषपरित्यागो व्रतानामुत्तमं व्रतम् // NBस्_५,३.१ //
138 SK तदुक्तं काशीखण्डे परदारपरद्रव्यपरद्रोहपराङ्मुखः / गङ्गाप्याह कदाऽऽगत्य मामयं पावयिष्यति // NBस्_५,३.२ //
140 SK वेषविचारः मुक्तिर्नास्ति जटाजूटे न काषाये न मुण्डने / न भस्मनि न कन्थायां तिलके वा कमण्डलौ // NBस्_५,४.१ //
141 SK द्वेषेन ताड्यते सर्पो वृथा वल्मीकताडनम् / मनसो निग्रहो नास्ति वृथा कायस्य मुण्डनम् // NBस्_५,४.२ //
142 SK चित्तविक्षेपशान्त्यर्थं जटाकन्थादिधारणम् / कुरुते वीतरागश्चेदुत्तमोत्तममेव तत् // NBस्_५,४.३ //
144 SK मौनमीमांसा मौनं चतुर्विधं प्रोक्तं वाग्मौनं वाग्विनिग्रहः / ज्ञानेन्द्रियाणां संरोधस्त्वक्षमौनमुदाहृतम् // NBस्_५,५.१ //
145 SK कर्मेन्द्रियाणां संरोधः काष्ठमौनं तु काष्ठवत् / गौणं तु त्रिविधं मौनमुत्तमं तु मनोलयः // NBस्_५,५.२ //
146 SK न मौनी मूकतां यातो न मौनी दुग्धबालकः / न मौनी व्रतनिष्ठोपि मौनी संलीनमानसः // NBस्_५,५.३ //
147 SK मुनेर्भावस्तु मौनं स्याच्छब्दशास्त्रव्यवस्थया / मुनिभावो यर्हि नास्ति तर्हि मौनं निरर्थकम् // NBस्_५,५.४ //
149 SK दानज्ञानम् कीर्त्तिदानं कामदानं दयादानमित त्रिधा / उत्तरादुत्तरं श्रेष्ठं तेभ्यः कृष्णार्पणं परम् // NBस्_५,६.१ //
151 SK तीर्थतत्त्वम् इदं तीर्थमिदं तीर्थमितस्तीर्थमतः परम् / इतो दूरतरं तीर्थं मया दृष्टं न तु त्वया // NBस्_५,७.१ //
152 SK तव तीर्थफलं स्वल्पं मम तीर्थफलं महत् / इति भ्रमन्ति ये तीर्थं ते भ्रान्ता न तु तैर्थिकाः // NBस्_५,७.२ //
153 SK तीर्थे पापक्षयः स्नानैस्तीर्थं साधुसमागमः / तीर्थे वैराग्यचर्चा स्यात्तीर्थमीश्वरपूजनम् // NBस्_५,७.३ //
154 SK तीर्थं शीतोष्णसहनं तीर्थं निःसङ्गचारिता / इति जानन्ति ये तीर्थं तीर्थतत्त्वविदो हि ते // NBस्_५,७.४ //
156 SK आचारचातुरी अनाचारस्तु मालिन्यमत्याचारस्तु मूर्खता / विचाराचारसंयोगः सदाचारस्य लक्षणम् // NBस्_५,८.१ //
158 SK रागत्यागनिर्णयः न विरक्ता धनैस्त्यक्ता न विरक्ता दिगम्बराः / विशेषरक्ताः स्वपदे ते विरक्ता मता मम // NBस्_६.१ //
159 SK चौरस्त्यजन्ति गेहं स्वं भयेनैव न बोधतः / जारास्त्यजन्ति गेहं स्वं कामेनैव न बोधतः // NBस्_६.२ //
160 SK क्रुद्धस्त्यजति गेहं स्वं प्रतिवादिविरोधतः / रुद्धस्त्यजति गेहं स्वं रोधेनैव न बोधतः // NBस्_६.३ //
161 SK निःसङ्गतासुखं प्राप्ताः कया चिद्बोधलीलया / गृहं त्यजन्ति मुनयो गृहस्था वावने स्थिताः // NBस्_६.४ //
162 SK तदुक्तम् | मूढः किं त्यजतु प्रमत्तमनसस्त्यागेन वा किं फलं / विज्ञः कर्म करोतु वा न कुरुतां त्यागेऽवलिप्तो न यत् / इत्येवं कृतनिश्चयः प्रवचनैरद्वैतविद्यावतां / रागत्यागनिरादरो मुनिजनः पारे गिरां खेलति // NBस्_६.५ //
163 SK इत्ययं योगयुक्तानां रागत्यागविनिर्णयः / त्यजतैव हि तज्ज्ञेयमिति वेदान्तनिर्णयात् // NBस्_६.६ //
165 SK अधिकारपरीक्षा | धर्मा बहुविधाः प्रोक्ताः शास्त्रे धर्माधिकारिणाम् / तत्र तीब्रा मुमुक्षैव मोक्षे मुख्याधिकारिता // NBस्_७.१ //
166 SK ज्योतिष्टोमे स्वर्गकामो विवाहे पुत्रकामवान् / वाणिज्ये लोभवान्मोक्षे मुमुक्षुरधिकारवान् // NBस्_७.२ //
167 SK तीव्रा मुमुक्षा यद्यस्ति प्रज्ञामान्द्यं च वर्त्तते / सच्छास्त्रविद्वच्चर्चाभिः प्रथमं तन्निवारयेत् // NBस्_७.३ //
168 SK वेदे नास्त्यधिकारोऽस्य मुमुक्षा यदि वर्त्तते / विचारस्तेन कर्त्तव्यः पुराणश्रवणादिना // NBस्_७.४ //
169 SK यदेव वेदे कथितं पुराणेऽपि तदेव हि / न तु वेदाक्षरं श्राव्यमिति भाष्ये विनिर्णयः // NBस्_७.५ //
170 SK यथाऽधिकारविहितं कर्म सिध्यति चान्यथा / कार्यसिद्धिर्न जायेत प्रत्यवायो महान्भवेत् // NBस्_७.६ //
172 SK सत्संगसुधा सत्संगसुधया तात मन आनन्दितं यदा / निश्चेतव्यं तदा मोहान्मम मुक्तिर्भविष्यति // NBस्_८.१ //
173 SK साधनानां हि सर्वेषां वरिष्ठा साधुसङ्गतिः / एतया सिद्धया सिद्धं सर्वमेव हि साधनम् // NBस्_८.२ //
174 SK शश्वदीश्वरभक्ता ये विरक्ताः समदर्शनाः / साधवः सेवितव्यास्ते मोक्षशास्त्रविशारदाः // NBस्_८.३ //
175 SK येषां दर्शनमात्रेण मोक्षे श्रद्धा विवर्धते / येषां च वाग्विलासेन संशयो विनिवर्त्तते // NBस्_८.४ //
176 SK उपक्रमादितात्पर्यलिङ्गैस्तात्पर्यनिर्णयः / विशेषसामान्यतया शास्त्रार्थानां व्यवस्थितिः // NBस्_८.५ //
177 SK वेदशास्त्राविरोधेन मोक्षमार्गप्रवेशनम् / संप्रदायपरिज्ञानं मतभेदविनिर्णयः // NBस्_८.६ //
178 SK पूर्वोत्तराभ्यां पक्षाभ्यां येषां वाक्यादवाप्यते / ज्ञानिनः कर्णधारास्ते सेवितव्या हि साधवः // NBस्_८.७ //
179 SK तथा च गीता तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया / उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः // NBस्_८.८ //
181 SK समन्वयसरस्वती अवगाह्या विशेषेण समन्वयसरस्वती / जायेत मतभेदाख्यपङ्कप्रक्षालनं यया // NBस्_९.१ //
182 SK पदं पदार्थो वाक्यार्थस्तत्वानि मनसो यमः / महावाक्यार्थविज्ञानं साधनानि क्रमेण हि // NBस्_९.२ //
183 SK सर्वेषां तत्र तन्त्राणामुपयोगो यथायथम् / वदामि तत्समासेन सर्वमेव यथातथम् // NBस्_९.३ //
184 SK जायते शब्दशास्त्रेण पदव्युत्पत्तिरुत्तमा / व्युत्पत्तिश्च पदार्थानां न्यायवैशेषिकोक्तिभिः // NBस्_९.४ //
185 SK मीमांसया च वाक्यार्थव्युत्पत्तिः परिनिष्ठिता / व्यक्तिः सांख्येन तत्त्वानां योगेन मनसो यमः // NBस्_९.५ //
186 SK महावाक्यार्थविज्ञानं वेदान्तैर्ब्रह्मनिष्ठया / इत्येवं सर्वतन्त्राणां ब्रह्मण्येव समन्वयः // NBस्_९.६ //
188 SK अविरोधबोधः प्रसङ्गादविरोधस्य बोधोऽप्यत्र निरूप्यते / व्यवहारे द्वैतसत्वं द्वैताद्वैतमते समम् // NBस्_१०.१ //
189 SK अद्वैतकल्पितत्वं चाविरोधोऽतो मतद्वये / विवदन्ति मुहुर्वादरसैस्तद्विवदन्तु ते // NBस्_१०.२ //
190 SK यमास्त्वहिंसासत्याद्या नियमाः शुचितादयः / सुखासने च संस्थानं प्रत्याहारस्तु सर्वतः // NBस्_१०.३ //
191 SK धारणा च तथा ध्यानं समाधानं च चेतसः / योगाङ्गसप्तकं त्वेतत्सर्वेषामपि संमतम् // NBस्_१०.४ //
192 SK लये मन्त्रे हठे राज्ञि भक्तौ सांख्ये हरेर्मते / मतैक्यमस्ति सर्वेषां ये बुधा मोक्षमार्गगाः // NBस्_१०.५ //
193 SK हठिनामधिकस्त्वेकः प्राणायामपरिश्रमः / प्राणायामे मनःस्थैर्यं स तु कस्य न संमतः // NBस्_१०.६ //
194 SK विमुक्तिर्वादिनां तस्मान्मतभेदो न कश्चन / कश्चित्कश्चिन्मते भेदस्त्वस्ति वेदान्तिनामपि // NBस्_१०.७ //
196 SK सांख्याञ्जनशलाका नेत्रयोरञ्जनं कार्यं सांख्याञ्जनशलाकया / ततस्तिमिरनाशेन सूक्ष्मवस्तु विलोक्यते // NBस्_११.१ //
197 SK कपिलेन मुकुन्देन देवहूती प्रबोधिता / सर्वतत्त्वविवेकेन तत्सांख्यमभिधीयते // NBस्_११.२ //
198 SK सर्वा विकृतयो यस्याः स्थूलसूक्ष्माश्चराचराः / अस्ति काचिदनिर्देश्या प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका // NBस्_११.३ //
199 SK महतत्त्वमहङ्कारः पञ्च तन्मात्रकाणि च / प्रकृतिर्विकृतिश्चेति सप्तैतानि भवन्ति हि // NBस्_११.४ //
200 SK स्वकारणानां विकृतिः प्रकृतिः स्वोद्भवस्य यत् / एवमष्टौ प्रकृतयस्ततो विकृतयो भवन् // NBस्_११.५ //
201 SK व्योमादिपञ्चभूतानि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च / कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव मनसा सह षोडश // NBस्_११.६ //
202 SK खं वायुरग्निस्तोयं भूर्भूतपञ्चकमुच्यते / शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धस्तेषां गुणाः क्रमात् // NBस्_११.७ //
203 SK श्रोत्रं त्वक्चक्षु रसनं घ्राणं ज्ञानेन्द्रियाणि च / वाक्पाणिपादपाय्वादि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च // NBस्_११.८ //
204 SK उभयात्मा मनस्तेन चतुर्विंशतिरीरिता / तत्त्वानां तद्विकारस्तु सर्वं चैव जगत्त्रयम् // NBस्_११.९ //
205 SK प्रकृतेस्त्रिगुणात्मत्वात्सर्वं हि त्रिगुणात्मकम् / रक्तश्वेतश्यामरूपा रजःसत्त्वतमोगुणाः // NBस्_११.१० //
206 SK रजश्चलं तमः स्तब्धं प्रकाशस्सात्विको मतः / तमोऽधमं रजो मध्यं सत्त्वमुत्तममेव हि // NBस्_११.११ //
207 SK लोभादयो रजोभावास्तमसो जडतादयः / सुखप्रसादबोधाद्या भावाः सत्त्वस्य कीर्त्तिताः // NBस्_११.१२ //
208 SK देवादयः सात्त्विकाः स्युर्नराद्या राजसाः स्मृताः / तामसाः पशुभूताद्या एवं सर्वं विविच्यताम् // NBस्_११.१३ //
209 SK विरोधिनस्सहायाश्च मिथः कार्यं च कारणम् / मिलित्वा कार्यकर्त्तारो गुणा विषमचेष्टिताः // NBस्_११.१४ //
210 SK विश्वं गुणात्मकं सर्वमात्मा निर्गुण एव हि / प्रकाशकतया तत्र प्रविष्ट इव भासते // NBस्_११.१५ //
211 SK यथा द्वात्रिंशद्दन्तस्था रसज्ञा रसवेदिनी / चतुर्विंशतितत्वान्तः स्वात्मज्ञस्तत्त्ववित्तथा // NBस्_११.१६ //
212 SK एकमेव निजं नाथं माया विषयलम्पटा / बहुरूपधरं कृत्वा वेश्येव खलु खेलति // NBस्_११.१७ //
213 SK अपृथग्भावरूपेण मिलित्वा पुरुषेण हि / विचित्राकाररूपैस्तं सन्नर्त्तयति नर्त्तकी // NBस्_११.१८ //
214 SK निर्दोषो निश्चलो नाथः सदोषा चञ्चला वधूः / दम्पत्योरनयोर्नूनं रसभङ्गो भविष्यति // NBस्_११.१९ //
215 SK पृथक्त्वेन परिज्ञाता दुष्टरूपतयाऽपि च / न मुखं दर्शयत्येषा सलज्जा म्रियतेऽपि च // NBस्_११.२० //
216 SK प्रकृतिर्विकृतिर्नापि पुरुषो निश्चलात्मकः / शुद्धबुद्धस्वरूपोऽसाविति सांख्यविनिर्णयः // NBस्_११.२१ //
218 SK योगदीक्षाचिन्तामणौ पातञ्जलयोगः अथातो योगदीक्षायाश्चिन्तामणिरुदीर्यते / तत्प्राप्त्याऽबोधदारिद्र्यं सर्वमेव विनश्यति // NBस्_१२,१.१ //
219 SK महायोगेश्वरः शम्भुः महायोगेश्वरो हरिः / महायोगेश्वरो ब्रह्मा भवानी सिद्धयोगिनी // NBस्_१२,१.२ //
220 SK सनकाद्या वसिष्ठाद्याः कचदत्तशुकादयः / अरुन्धतीप्रभृतयो योगात्सिद्धिमुपागताः // NBस्_१२,१.३ //
221 SK आत्मज्ञानेन यो योगो जीवात्मपरात्मनोः / स योगस्तस्य हेतुत्वाद्योगा बहुविधा मताः // NBस्_१२,१.४ //
222 SK विरोधिलक्षणान्यायादभद्रा भद्रिका यथा / सर्वदुःखवियोगस्तु योग इत्याह केशवः // NBस्_१२,१.५ //
223 SK अत्यन्तचपलस्यापि मनसो योगशक्तितः / निश्चलत्वं प्रजायेत विन्ध्यस्येव महागिरेः // NBस्_१२,१.६ //
224 SK तथा च भुशुण्डः नाभसीं धारणां बद्ध्वा तिष्ठामि विगतज्वरः / यावत्पुनः कमलजः सृष्टिकर्मणि तिष्ठति // NBस्_१२,१.७ //
225 SK चित्तवृत्तिनिरोधस्तु मुख्यः पातञ्जलो मतः / प्राणवृत्तिनिरोधस्तु गौणस्तत्साधनत्वतः // NBस्_१२,१.८ //
226 SK तत्र सूत्रं यमनियमासनप्राणायाम प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि यमोऽस्तेयऋताहिंसाब्रह्मचर्यापरिग्रहाः / नियमः शौचसन्तोषतपः पाठेश्वरार्पणम् // NBस्_१२,१.९ //
227 SK आसनं सुखरूपेण शरीरस्थिरता मता / प्राणायामः प्राणदण्डः कुम्भपूरकरेचकैः // NBस्_१२,१.१० //
228 SK प्रत्याहारस्त्विन्द्रियाणां चलानां प्रतिरोधनम् / क्वचित्प्रदेशे चित्तस्य स्थापनं धारणा मता // NBस्_१२,१.११ //
229 SK निरन्तरश्चित्प्रवाहो ध्येयस्य ध्यानमीरितम् / समाधिरष्टमो ज्ञेयस्तदात्मकतया स्थितिः // NBस्_१२,१.१२ //
230 SK संप्रज्ञातस्तदन्यश्च समाधिर्द्विविधो हि सः / यमादिपञ्चबहिरङ्गमन्तरङ्गमथापरम् // NBस्_१२,१.१३ //
231 SK वितर्केण विचारेणानन्देनास्मितया तथा / अनुस्यूतः समाधिस्तु संप्रज्ञातश्चतुर्विधः // NBस्_१२,१.१४ //
232 SK यत्र न ज्ञायते किञ्चित्सोऽसंप्रज्ञात उच्यते / द्विधा भवप्रत्ययवानुपायप्रत्ययश्च सः // NBस्_१२,१.१५ //
233 SK मूढानामपि जायेत तपोदार्ढ्यान्मनोलयः / प्रकृतौ वा महतत्त्वे भवप्रत्यय एव सः // NBस्_१२,१.१६ //
234 SK त्रैलोक्यराज्यकामस्य हिरण्यकशिपोर्यथा / शरीरं क्रिमिभिर्भुक्तं वल्मीकेनापि संवृतम् // NBस्_१२,१.१७ //
235 SK श्रद्धावीर्यस्मृतिप्रज्ञाकामवर्जनपूर्वकम् / मनोलयो मुनीन्द्राणामुपायप्रत्ययस्तु सः // NBस्_१२,१.१८ //
236 SK उक्तं व्युत्थितचित्तानां समाधानमभीप्सताम् / तपश्च वेदपाठश्च सर्वकर्मार्पणं हरौ // NBस्_१२,१.१९ //
237 SK क्लेशकर्मविपाकैश्च चित्ररूपैस्तदाशयैः / अपरामृष्ट एवैकः कश्चित्पुरुष ईश्वरः // NBस्_१२,१.२० //
238 SK स सर्वज्ञः स्वभावेन प्रणवस्तस्य वाचकः / तदयं भावनापूर्वं तज्जपो मोक्षसाधनम् // NBस्_१२,१.२१ //
239 SK यथा रोगस्तन्निदानं भेषजं चाप्यरोगता / विवेचनीयभेदेन चिकित्साऽस्ति चतुर्विधा // NBस्_१२,१.२२ //
240 SK जन्मदुःखं तथा मोहो विज्ञानं च विमुक्तता / विवेचनीयभेदेन योगशास्त्रं चतुर्विधम् // NBस्_१२,१.२३ //
241 SK अविवेकः पुंप्रकृत्योः स मोहो दुःखकारणम् / समत्वपुरुषान्यत्वख्यातिबोधेन नश्यति // NBस्_१२,१.२४ //
242 SK योगाभ्यासप्रसक्तस्य सिद्धयो भोगदायिकाः / आयान्ति नादरः कार्यो ह्यन्तराया मता यतः // NBस्_१२,१.२५ //
243 SK धारणाध्यानवैचित्र्यात्सिद्धिभेदो य ईरितः / अत्यन्तानुपयोगित्वात्स तु नात्र निरूपितः // NBस्_१२,१.२६ //
245 SK शैवयोगः योगः शैवो निरूप्यते मन्त्रो लयो हठो राजयोगो योगश्चतुर्विधः // NBस्_१२,२.१ //
246 SK मन्त्रयोगः नारायणाष्टाक्षरवासुदेवद्वादशाक्षरौ / नृसिंहरामगोपालमन्त्रास्ते तापिनीस्तुताः // NBस्_१२,२.२ //
247 SK शिवपञ्चाक्षरी श्रेष्ठा दक्षिणामूर्त्तिरुत्तमा / यतीनां तु महावाक्यं केवलः प्रणवस्तथा // NBस्_१२,२.३ //
248 SK इत्यादयो महामन्त्राः पुरश्चर्यादिभिः क्रमैः / सिद्धा देवप्रसादेन सद्यो मुक्तिप्रदा मताः // NBस्_१२,२.४ //
250 SK हठयोगः गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डां तपस्विनीम् / बलात्कारेण गृह्णीयात्तद्विष्णोः परमं पदम् // NBस्_१२,३.१ //
251 SK तत्र गोरक्षः | एतद्विमुक्तिसोपानमेतत्कालस्य वञ्चनम् / यद्व्यावृत्तं मनो भोगादासक्तं परमात्मनि // NBस्_१२,३.२ //
252 SK परमं यदि वैराग्यमाहारस्तु यथोदितः / नित्यमेकान्तवासश्चेद्धठयोगो न दुर्लभः // NBस्_१२,३.३ //
253 SK परन्तु गुरुदीक्षाभिर्लभ्यते नान्यथा त्वयम् / व्यतिक्रमे महान्दोषः क्रमलाभे महान्गुणः // NBस्_१२,३.४ //
254 SK अनन्तविस्तारमयो हठः प्रोक्तः पुरारिणा / सारं तु बन्धत्रितयं तावता सिद्धिराप्यते // NBस्_१२,३.५ //
255 SK मूले तु मूलबन्धः स्यान्मध्ये स्यादुडियानकः / कण्ठे जालन्धरस्तेन सिद्धो भवति मारुतः // NBस्_१२,३.६ //
256 SK कुण्डलिन्याः सुषुम्णायां प्रविष्टो ब्रह्मरन्ध्रतः / मूलस्थाने स्थिता शक्तिर्ब्रह्मस्थाने सदाशिवः // NBस्_१२,३.७ //
257 SK अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी / तस्याः सङ्कल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते // NBस्_१२,३.८ //
258 SK आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं तथैव च / मणिपूरं तृतीयं स्याच्चतुर्थकमनाहतम् // NBस्_१२,३.९ //
259 SK विशुद्धिः पञ्चमं चक्रमाज्ञाचक्रं तु षष्ठकम् / सप्तमं ब्रह्मरन्ध्रं स्याद्भ्रमरस्य गुहा हि सा // NBस्_१२,३.१० //
260 SK योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन् मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् / स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्भ्रुवोरन्तरं ह्येतन्मोक्षकपाटभेदनकरं सिद्धासनं प्रोच्यते // NBस्_१२,३.११ //
261 SK कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बध्वा तु सिद्धासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं ततश्चेतसि / वारं वारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोत्सार्य सन्धारयन् प्राणं मुञ्चति बोधयंश्च शनकैः शक्तिप्रबोधो भवेत् // NBस्_१२,३.१२ //
262 SK पुच्छे प्रगृह्य भुजगीं सुप्तां प्रबोधयेत्सुधीः / निद्रां विहाय सा शक्तिरूर्ध्वमुत्तिष्ठते बलात् // NBस्_१२,३.१३ //
263 SK ऊर्ध्वं निलीनप्राणस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः / योगेन सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते // NBस्_१२,३.१४ //
264 SK ज्ञानं कुतो मनसि जीवति देवि यावत् प्राणो न नश्यति मनो म्रियते न तावत् / प्राणो मनो द्वयमिदं प्रलयं प्रयाति मोक्षं स गच्छति नरो न कदाचिदन्यः // NBस्_१२,३.१५ //
265 SK अन्तर्लक्ष्यविलीनचित्तपवनो योगी यदा वर्त्तते दृष्ट्या निश्चलतारया बहिरिदं पश्यन्नपश्यन्नपि / मुद्रेयं किल शाम्भवी भगवती या स्यात्प्रसादाद्गुरोः शून्याशून्यविलक्षणं मृगयते तत्त्वं पदं शांभवम् // NBस्_१२,३.१६ //
266 SK प्राणवृत्तौ विलीनायां मनोवृत्तिर्विलीयते / शिवशक्तिसमायोगो हठयोगेन जायते // NBस्_१२,३.१७ //
267 SK गोरक्षचर्पटिप्राया हठयोगप्रसादतः / वञ्चयित्वा कालदण्डं ब्रह्माण्डं विचरन्ति हि // NBस्_१२,३.१८ //
268 SK शक्तिमध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् / शिवशक्तिसमायोगं कुर्वन्ति हठयोगिनः // NBस्_१२,३.१९ //
270 SK शिवशक्तिपराक्रमः अथ वक्ष्ये स्तुतिव्याजाच्छिवशक्तिपराक्रमम् / शोधिते सूक्ष्मया दृष्ट्या यस्मिन्निर्विस्मयो भवेत् // NBस्_१२,४.१ //
271 SK तां द्वैतरूपिणीमेव द्वैताद्वैतस्वरूपिणीम् / अद्वैतरूपिणीं शक्तिं स्मरामि परमात्मनः // NBस्_१२,४.२ //
272 SK केयं कस्य कुतः केन कस्मै कं प्रति कुत्र वा / कथं कदेत्यनिर्णीता तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.३ //
273 SK शिवः कर्त्ता शिवो भोक्ता शिवो वेत्ता शिवः प्रभुः / उपसर्जनमात्रं या तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.४ //
274 SK स्वयं कर्त्री स्वयं भोक्त्री स्वयं वेत्त्री स्वयं प्रभुः / साक्षिमात्रं शिवो यस्यास्तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.५ //
275 SK स्वलक्षणे महादेवे स्वलक्षणतया स्थिताम् / वित्तां स्वलक्षणैरेव तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.६ //
276 SK सलक्षणे महादेवे सलक्षणतया स्थिताम् / वित्तां सलक्षणैरेव तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.७ //
277 SK विलक्षणे महादेवे विलक्षणतया स्थिताम् / वित्तां विलक्षणैरेव तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.८ //
278 SK अचेत्यचित्स्वरूपत्वादचेतन इव स्थिते / चैतन्ये चेतनाहेतुस्तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.९ //
279 SK चेतिता चेतनेनेति सविकल्पस्वरूपतः / चैतन्ये चेतनाहेतुस्तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.१० //
280 SK शक्तिरेव न यस्यास्ति सोऽशक्तः किं करिष्यति / शक्त्या यया शिवः शक्तस्तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.११ //
281 SK शक्ता नूनं हि कार्येषु शक्तिः शक्तिमति स्थिता / शिवाश्रयादृतेऽशक्ता तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.१२ //
282 SK शक्तिशक्तिमतोर्यस्मान्निर्विकल्पे न वस्तुता / सामरस्यं शिवे याता तां वन्दे शक्तिमद्भुताम् // NBस्_१२,४.१३ //
283 SK भाविते भावुकैरेवं शिवशक्तिपराक्रमे / स्वयमुल्लसति स्वान्ते सामरस्यरसार्णवः // NBस्_१२,४.१४ //
284 SK भक्ते भक्तिमयीं पशौ पशुमयीं विद्वत्सु विद्यामयीं सृष्टौ ब्रह्ममयीं स्थितौ हरिमयीं कल्पात्पुरश्चिन्मयीम् / जीवे वृत्तिमयीं जडे जडमयीं शक्तिं शिवस्याद्भुतां तां ध्यायामि पदे परात्परतरे स्वानन्दलीलामयीम् // NBस्_१२,४.१५ //
285 SK आनन्दानपि संविहाय विषयानन्दानमन्दादरादादानार्थिभिरर्थितानपि जडैरानन्दलेशानमून् / आनन्दोपनिषत्प्रमाणपठितामानन्दसीमाशिखामानन्दामृतवाहिनीं भगवतीमानन्दरूपां भजे // NBस्_१२,४.१६ //
287 SK लययोग चञ्चलं हि न जानाति मनो निश्चलतासुखम् / तद्विचिन्तयितुं तस्मै मुनिभिर्दर्शितो लयः // NBस्_१२,५.१ //
288 SK आख्याताः शम्भुना गौर्यै ह्यसंख्याता लयक्रमाः / केन ज्ञेयाः केन वर्ण्याः किञ्चित्तु कथयाम्यहम् // NBस्_१२,५.२ //
289 SK निद्रादौ जागरस्यान्ते निद्रान्ते जागरोदये / लयो भवति चित्तस्य कार्यं तत्रात्मचिन्तनम् // NBस्_१२,५.३ //
290 SK यदा शिथिलतां याति भारं त्यक्त्वेव भारिकः / आत्माऽऽदरेण कर्त्तव्यं तदैव शिवपूजनम् // NBस्_१२,५.४ //
291 SK यदा यदा शिथिलतां याति चित्तं तदा तदा / चिन्तनीयो महेशानस्तदेव शिवपूजनम् // NBस्_१२,५.५ //
292 SK सर्वेष्टानिष्टभावानामिष्टत्वेनैवभावनात् / नीरागद्वेषता चित्ते या सैव शिवपूजनम् // NBस्_१२,५.६ //
293 SK पीडैव परमा पूजा यथा चरणपीडनम् / दुःखमेव परा पूजा रूक्षमुद्वर्त्तनं यथा // NBस्_१२,५.७ //
294 SK खेद एव परा पूजा खेदे चिति मनोलयः / भयं हि परमा पूजा भीषाऽस्मादिति च श्रुतेः // NBस्_१२,५.८ //
295 SK दानं तु परमा पूजा दीयते परमात्मने / अदानं परमा पूजा यदि चित्तं प्रसीदति // NBस्_१२,५.९ //
296 SK रोगा एव परा पूजा रोगैः पापक्षयो यतः / आरोग्यं परमा पूजा नैरोग्यं मुक्तिसाधनम् // NBस्_१२,५.१० //
297 SK क्रिया तु परमा पूजा शिवार्थं क्रियतेऽखिलम् / अक्रियैव परा पूजा निश्चला ध्यानरूपिणी // NBस्_१२,५.११ //
298 SK सत्सङ्गः परमा पूजा सत्सङ्गो मोक्षसाधनम् / असत्सङ्गः परा पूजा यत्र मोहः परीक्ष्यते // NBस्_१२,५.१२ //
299 SK धैर्यं तु परमा पूजा धीरो ह्यमृतश्नुते / अधैर्यं परमा पूजा शीघ्रं कार्यविमोक्षतः // NBस्_१२,५.१३ //
300 SK स्तुतिरेव परा पूजा स्तुतौ देवः प्रसीदति / निन्दैव परमा पूजा सुहृदां गालयो यथा // NBस्_१२,५.१४ //
301 SK तृष्णैव परमा पूजा देवार्थं वहु काङ्क्षते / सन्तोषः परमा पूजा देवः सन्तोषलक्षणः // NBस्_१२,५.१५ //
302 SK यात्रा हि परमा पूजा देवस्यैतत्प्रदक्षिणम् / आसनं परमा पूजा स्वासनं योग उत्तमः // NBस्_१२,५.१६ //
303 SK भोजनं परमा पूजा देवनैवेद्यरूपतः / अभोजनं परा पूजा ह्युपवासप्रियो हरिः // NBस्_१२,५.१७ //
304 SK स्थितत्वं परमा पूजा तदुपस्थानमात्मनः / पतनं परमा पूजा नमस्कारस्वरूपिणी // NBस्_१२,५.१८ //
305 SK भाषणं परमा पूजा सर्वं स्तुतिमयं हरेः / मौनं तु परमा पूजा मौनं व्याख्यानमस्य तत् // NBस्_१२,५.१९ //
306 SK चेष्टैव परमा पूजा चेष्टते तत्प्रकाशतः / अचेष्टा हि परा पूजा जोषमास्वेति वेदवाक् // NBस्_१२,५.२० //
307 SK जन्मैव परमा पूजा सोऽवतारो हरेः सतः / जीवनं परमा पूजा जीवन्कार्याणि साधयेत् // NBस्_१२,५.२१ //
308 SK दीर्घायुः परमा पूजा योगिनो दीर्घजीविनः / स्वल्पायुः परमा पूजा सद्यो ह्यस्माद्विमुच्यते // NBस्_१२,५.२२ //
309 SK मरणं परमा पूजा निर्माल्यत्यागरूपिणी / शोको हि परमा पूजा शोको वैराग्यसाधनम् // NBस्_१२,५.२३ //
310 SK हर्ष एव परा पूजा हृष्टरूपः सदा हरिः / पुष्टिस्तु परमा पूजा स्वस्थचित्तो हि पुष्टिमान् // NBस्_१२,५.२४ //
311 SK कृशत्वं परमा पूजा कृशगात्रा हि योगिनः / लाभ एव परा पूजा लाभः सन्तोषकारणम् // NBस्_१२,५.२५ //
312 SK हानिरेव परा पूजा तस्मादेव विमुच्यते / गुण एव परा पूजा साधूनां संमतो गुणी // NBस्_१२,५.२६ //
313 SK दोषा एव परा पूजा निरहङ्कारता यतः / मान एव परा पूजा मान्यते परमेश्वरः // NBस्_१२,५.२७ //
314 SK अपमानः परा पूजा योगी सिद्ध्येदमानतः / धनं हि परमा पूजा धनं धर्मस्य साधनम् // NBस्_१२,५.२८ //
315 SK निर्धनत्वं परा पूजा ब्रह्म प्राप्तमकिञ्चनैः / अप्रमादः परा पूजा ह्यप्रमत्तो हि सिद्ध्यति // NBस्_१२,५.२९ //
316 SK प्रमादः परमा पूजा कर्त्तव्यं विस्मरेद्यतः / सुषुप्तिः परमा पूजा समाधिर्योगिनां हि सः // NBस्_१२,५.३० //
317 SK कर्मयोगः परा पूजा कर्म ब्रह्मार्पणं हरौ / भक्तियोगः परा पूजा यो मद्भक्तः स मे प्रियः // NBस्_१२,५.३१ //
318 SK ज्ञानयोगः परा पूजा ज्ञानात्कैवल्यमश्नुते / तुरीयं परमा पूजा साक्षात्कारस्वरूपिणी // NBस्_१२,५.३२ //
319 SK श्रवणं परमा पूजा श्रूयते परमेश्वरः / मननं परमा पूजा मननं ध्यानसाधनम् // NBस्_१२,५.३३ //
320 SK मद्गुरोः सदृशः कश्चिद्गुरुः कर्णे लगेद्यदि / सर्वमेव तदा पूजा देवस्य लयरूपिणी // NBस्_१२,५.३४ //
321 SK लयानामपि सर्वेषां विश्वविस्मृतिहेतुतः / श्रेष्ठं नादानुसन्धानं नादो हि परमो लयः // NBस्_१२,५.३५ //
322 SK मकरन्दं पिबन्भृङ्गो यथा गन्धं न काङ्क्षति / नादासक्तं तथा चित्तं विषयान्नाभिकाङ्क्षति // NBस्_१२,५.३६ //
324 SK भक्तिरसायनम् अथ सिद्धान्तसर्वस्वं शृणु भक्तिरसायनम् / जन्ममृत्युजराव्याधिभेषजं तद्रसायनम् // NBस्_१३.१ //
325 SK धर्मार्थकाममोक्षाणां ज्ञानवैराग्ययोरपि / अन्तःकरणशुद्धेश्व भक्तिः परमसाधनन् // NBस्_१३.२ //
326 SK ययात्र रक्त्या जीवोऽयं दधाति ब्रह्मरूपताम् / साधिता सनकाद्यैः सा भक्तिरित्यभिधीयते // NBस्_१३.३ //
327 SK सर्वा साधनसंपत्तिरस्ति भक्तिस्तु नास्ति चेत् / तर्हि साधनसंपातस्तुषकण्डनवद्वृथा // NBस्_१३.४ //
328 SK यद्यन्यत्साधनं नास्ति भक्तिरस्ति महेश्वरे / तदा क्रमेण सिद्ध्यन्ति विरक्तिज्ञानमुक्तयः // NBस्_१३.५ //
329 SK न हि कश्चिद्भवेन्मुक्त ईश्वरानुग्रहं विना / ईश्वरानुग्रहादेव मुक्तिरित्येष निश्चयः // NBस्_१३.६ //
330 SK ईश्वरः परिपूर्णत्वान्न तु किञ्चिदपेक्षते / प्रीत्यैवाशु प्रसन्नः सन्परं कुर्यादनुग्रहम् // NBस्_१३.७ //
331 SK या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी / त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्माऽपसर्पतु // NBस्_१३.८ //
332 SK परमात्मनि विश्वेशे भक्तिश्चेत्प्रेमलक्षणा / सर्वमेव तदा सिद्धं कर्तव्यं नावशिष्यते // NBस्_१३.९ //
333 SK अपरोक्षानुभूतिर्या वेदान्तेषु निरूपिता / प्रेमलक्षणभक्तेस्तु परिणामः स एव हि // NBस्_१३.१० //
334 SK शास्त्रार्थः संपरिज्ञातो जातं प्रेम महेश्वरे / प्रेमानन्दप्रकारेण द्वैतं विस्मरणं गतम् // NBस्_१३.११ //
335 SK वासुदेवमयं सर्वं वासुदेवात्मकं जगत् / इत्थं द्वैतरसाढ्यस्य ज्ञानं किमवशिष्यते // NBस्_१३.१२ //
336 SK वासुदेवः परं ब्रह्म परमात्मा परात्परः / अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः // NBस्_१३.१३ //
337 SK अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् / इत्यादिवचनैर्भक्तो वैष्णवः स्तौति केशवम् // NBस्_१३.१४ //
338 SK शिवः कर्ता शिवो भोक्ता शिवः सर्वेश्वरेश्वरः / शिव अत्मा शिवो जीवः शिवादन्यन्न विद्यते // NBस्_१३.१५ //
339 SK खंवायुतेजोजलभूक्षेत्रज्ञार्केन्दुमूर्तिभिः / अष्टाभिरष्टमूर्तिं च शांभवः स्तौति शङ्करम् // NBस्_१३.१६ //
340 SK इदं यदा परिणतं प्रेम तज्ज्ञानमेव हि अथ युक्त्यन्तरम् | बालकस्तात तातेति जनकं प्रति भाषते / न पुनस्तातशब्दार्थं स तु जानाति किञ्चन // NBस्_१३.१७ //
341 SK यदा तातपदार्थस्य व्युत्पतिं यात्यसौ क्रमात् / तदा तु सत्यमेवायं तात इत्येति निश्चयम् // NBस्_१३.१८ //
342 SK तथा भक्तो भजन्देवं वेदशास्त्रोदितैः क्रमैः / व्युत्पतिं परमां प्राप्य मुक्तो भवति हि क्रमात् // NBस्_१३.१९ //
343 SK किं च लक्षणभेदो हि वस्तुभेदस्य कारणम् / न भक्तज्ञानिनोर्दृष्टा शास्त्रे लक्षणभिन्नता // NBस्_१३.२० //
344 SK विरागश्च विचारश्च शौचमिन्द्रियनिग्रहः / वेदे च परमा प्रीतिस्तदेकं लक्षणं द्वयोः // NBस्_१३.२१ //
345 SK अध्याये भक्तियोगाख्ये गीतायां भक्तिलक्षणम् / यदुक्तमष्टभिः श्लोकैर्दृष्टं ज्ञानिषु तन्मया // NBस्_१३.२२ //
346 SK तवास्मीति भजत्येकस्त्वमेवास्मीति चापरः / इति किञ्चिद्विशेषेपि परिणामः समो द्वयोः // NBस्_१३.२३ //
347 SK अन्तर्बहिर्यदा देवं देवभक्तः प्रपश्यति / दासोऽहं भावयन्नेव दाकारं विस्मरत्यसौ // NBस्_१३.२४ //
348 SK दृष्टमेकान्तभक्तेषु नारदप्रमुखेषु तत् / किंचिद्विशेषं वक्ष्यामि त्वमेकाग्रमनाः शृणु // NBस्_१३.२५ //
349 SK यदीश्वररसी भक्तस्तदीश्वररसी बुधः / उभौ यद्यप्येकरसौ तथापीषद्विलक्षणौ // NBस्_१३.२६ //
350 SK बुद्धा बोधरसादन्यरसनीरसतां गताः / तथाऽधिकप्रेमरसान्न तु भक्ताः कदाचन // NBस्_१३.२७ //
351 SK अथ प्रश्नः | ननु ज्ञानं विना मुक्तिर्नास्ति युक्तिशतैरपि / तथा भक्तिं विना ज्ञानं नास्त्युपायशतैरपि // NBस्_१३.२८ //
352 SK भक्तेर्ज्ञानं ततो मुक्तिरिति साधारणक्रमः / ज्ञानिनस्तु वसिष्ठाद्या भक्ता वै नारदादयः // NBस्_१३.२९ //
353 SK एवमादिव्यवस्थायाः कारणं किं निरूप्यताम् / अत्रोच्यते विचित्रं यत्कारणं तन्निशामय // NBस्_१३.३० //
354 SK कथयामि सदृष्टान्तं येनार्थः स्फुटतां व्रजेत् / स्यात्तापस्य च पापस्य गंगास्नानेन हि क्षयः // NBस्_१३.३१ //
355 SK यस्तु स्यात्तापशान्त्यर्थी तस्यापि स्यादघक्षयः / यस्तु स्यादघशान्त्यर्थी तापस्तस्यापि नश्यति // NBस्_१३.३२ //
356 SK तापपापक्षयौ स्नानं त्रयमेतत्समं द्वयोः / तथाप्येकस्तु शैत्यार्थी शुद्ध्यर्थी तु द्वितीयकः // NBस्_१३.३३ //
357 SK यथैव भावभेदेन नामभेदस्तयोरभूत् / एवमेव बुधैर्यैस्तु देवो मुक्त्यर्थमाश्रितः // NBस्_१३.३४ //
358 SK भक्त्या ज्ञानमवाप्यैव ये मुक्ता ज्ञानिनो हि ते / यैस्तु संसारविरसैर्भक्त्यर्थं हरिराश्रितः // NBस्_१३.३५ //
359 SK ततो भक्तिप्रभावेन स्वभावाज्ज्ञानमुद्गतम् / तज्ज्ञानं प्राप्य मुक्ता ये ते भक्ता इति वर्णिताः // NBस्_१३.३६ //
360 SK विरक्तिभक्तिविज्ञानमुक्तयस्तु समा द्वयोः / तथापि भावभेदेन नामभेदस्तयोरभूत् // NBस्_१३.३७ //
361 SK मुक्तिर्मुख्यफलं ज्ञस्य भक्तिस्तत्साधनत्वतः / भक्तस्य भक्तिर्मुख्यैव मुक्तिः स्यादानुषङ्गिकी // NBस्_१३.३८ //
362 SK रीत्याऽनयऽपि सुमते वरिष्ठा भक्तिरीश्वरे / अथान्योऽपि महिमा परमानन्दरूपोसौ परमात्मा स्वयं हरिः // NBस्_१३.३९ //
363 SK शिवभक्तिं पुरस्कृत्य भुङ्क्ते भक्तिरसायनम् / सनकाद्या वसिष्ठाद्या नन्दिस्कन्दशुकादयः // NBस्_१३.४० //
364 SK भुञ्जते तत्पदं प्राप्ता अपि भक्तिरसायनम् / द्वैतं विना कथं भक्तिरिति तत्रोत्तरं शृणु // NBस्_१३.४१ //
365 SK द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक्प्राप्ते बोधे मनीषया / भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् // NBस्_१३.४२ //
366 SK तथा चोक्तं भागवते आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे / कुर्वन्त्यहेतुकीं भक्तिमित्थंभूतगुणो हरिः // NBस्_१३.४३ //
367 SK जाते समरसानन्दे द्वैतमप्यमृतोपमम् / मित्रयोरिव दंपत्योर्जीवात्मपरमात्मनोः // NBस्_१३.४४ //
368 SK हृदये वसति प्रीत्या लोकरीत्या च लज्जते / यथा चमत्कारमयी नित्यमानन्दिनी वधूः // NBस्_१३.४५ //
369 SK पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे / तादृशी यदि भक्तिश्चेत्सा तु मुक्तिशताधिका // NBस्_१३.४६ //
370 SK प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम् / विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तद्द्वयं तुल्यमेव // NBस्_१३.४७ //
371 SK विश्वेश्वरस्तु सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः / प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः // NBस्_१३.४८ //
372 SK अथ भक्तिरसमाश्रित्य श्लोकः | योगे नास्ति गतिर्न निर्गुणविधौ सम्भावनादुर्गमे नित्यं नीरसया धिया परिहृते द्वे ऐहिकामुष्मिके / गोपः कोऽपि सखाऽकृतः स तु पुनर्नानाङ्गनासङ्गवानस्माकं पदमर्थयन्ति मुनयश्चित्रं किमस्मात्परम् // NBस्_१३.४९ //
373 SK रोमाञ्चेन चमत्कृता तनुरियं भक्त्या मनो नन्दितं प्रेमाश्रूणि विभूषयन्तिं वदनं कण्ठं गिरो गद्गदाः / नास्माकं क्षणमात्रमप्यवसरः कृष्णार्चनं कुर्वतां मुक्तिर्द्वारि चतुर्विधापि किमियं दास्याय लोलायते // NBस्_१३.५० //
374 SK घनः कामोऽस्माकं तव तु भजनेऽन्यत्र न रुचिस्तवैवांघ्रिद्वन्द्वे नतिषु रतिरस्माकमतुला / सकामे निष्कामा सपदि तु सकामा पदगता सकामाऽस्मान्मुक्तिर्भजति महिमाऽयं तव हरे // NBस्_१३.५१ //
376 SK राजयोगे भूमिकाभेदभास्करः | भूमिकाभेदमारभ्य यावद्ग्रन्थसमापनम् / अगाधबोधसारेऽस्मिन्राजयोगो निरूप्यते // NBस्_१४,१.१ //
377 SK अथायं हृदि कर्तव्यो भूमिकाभेदभास्करः / यस्य प्रसादमात्रेण तमो हार्दं विलीयते // NBस्_१४,१.२ //
378 SK अज्ञानभूमिकाः सप्त सप्तैव ज्ञानभूमिकाः / बीजजाग्रत्तथा जाग्रन्महाजाग्रत्तथैव च // NBस्_१४,१.३ //
379 SK जाग्रत्स्वप्नस्तथा स्वप्नः स्वप्नजाग्रत्सुषुप्तकम् / इति सप्तविधो मोहस्तेषां विवरणं शृणु // NBस्_१४,१.४ //
380 SK कुसूले संस्थितं बीजं तत्र सर्वो यथा द्रुमः / तथा यत्र स्थितं विश्वं न तु व्यक्तिमुपागतम् // NBस्_१४,१.५ //
381 SK बीजरूपं स्थितं जाग्रद्बीजजाग्रत्तदुच्यते / संसारप्रथमावस्था महामोहः स एव हि // NBस्_१४,१.६ //
382 SK तदेवाज्ञानमित्युक्तं यत्स्वबोधेन लीयते / कुसूले संस्थितं बीजं क्षेत्रे निक्षिप्यते यदा // NBस्_१४,१.७ //
383 SK अंकुरोन्मुखतां याति साऽवस्था जाग्रदुच्यते / इदमेव महत्तत्त्वमिति सांख्यैर्निरूप्यते // NBस्_१४,१.८ //
384 SK ईक्षणं चेति वेदान्तैः सामान्याहङ्कृतिस्तथा / आनन्दमयकोशश्च तत्साक्षी त्वीश्वरः स्मृतः // NBस्_१४,१.९ //
385 SK विशेषाहङ्कृतिः सूक्ष्माङ्कुरवद्व्यावहारिकी / महाजाग्रद्बुधैः प्रोक्ता व्यष्ट्यवस्थात्रये तु सा // NBस्_१४,१.१० //
386 SK जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्येऽवस्था जाग्रदिति स्मृता / जाग्रदेव यदा जीवो मनोराज्यं करोति हि // NBस्_१४,१.११ //
387 SK जाग्रतः स्वप्न इव यत्स जाग्रत्स्वप्न उच्यते / लोकप्रसिद्धो यः स्वप्नः स स्वप्न इति कथ्यते // NBस्_१४,१.१२ //
388 SK जातेऽपि जागरे जन्तोः स्वप्नदृष्टार्थभासनम् / प्रत्यक्षमिव संस्कारात्स्वप्नजाग्रत्तदुच्यते // NBस्_१४,१.१३ //
389 SK षडवस्थापरित्यागे सुषुप्तिः सप्तमी मता / अज्ञानभूमिकास्त्वेताः शृणु विज्ञानभूमिकाः // NBस्_१४,१.१४ //
391 SK ज्ञानभूमिकाः जिज्ञासाऽथ विचाराख्या ततस्तु तनुमानसा / सत्त्वापत्तिरसंसक्तिः पदार्थाभाविनी तथा // NBस्_१४,२.१ //
392 SK सप्तमी तुर्यमित्युक्ता तुर्यातीतमतः परम् / आसामेव नामान्तराणि / मुमुक्षा च समक्षा च परीक्षा च परोक्षका // NBस्_१४,२.२ //
393 SK अपरोक्षा महादीक्षा पराकक्षेति सप्त ताः / प्रथमा त्वधिकाराख्या द्वितीया श्रवणात्मिका // NBस्_१४,२.३ //
394 SK तृतीया मननप्राया निदिध्यासश्चतुर्थिका / साक्षात्कारः पञ्चमी स्यात्षष्ठी परिणतिः स्मृता // NBस्_१४,२.४ //
395 SK सप्तमी तु परा काष्ठा सैव तुर्यमितीरिता / प्रथमायां तु विद्यार्थी द्वितीयायां पदार्थवित् // NBस्_१४,२.५ //
396 SK निःसंशयस्तृतीयायां चतुर्थ्यां पण्डितो भवेत् / प्राप्तानुभूतिः पञ्चम्यां षष्ठ्यामानन्दघूर्णितः // NBस्_१४,२.६ //
397 SK सप्तमी सहजा तुर्या तुर्यातीतमतः परम् / भूमिका त्रितयं पूर्वं त्वत्र जाग्रदिति स्मृतम् // NBस्_१४,२.७ //
398 SK जिज्ञासोरत्र संसारो यथापूर्वं यतः स्थितः / चतुर्थी स्वप्न इत्युक्ता स्वप्नाभं यत्र वै जगत् // NBस्_१४,२.८ //
399 SK सुषुप्तिः शिथिला गाढा द्विविधाऽऽद्या तु पञ्चमी / षष्ठी गाढसुषुप्तिः स्यात्सप्तमी तुर्यमुच्यते // NBस्_१४,२.९ //
400 SK अत्र प्रश्नः संसारमेव यो वेत्ति मोक्षमार्गं न वेत्ति यः / तस्य संसारिणः पूर्वं मुमुक्षा जायते कथम् // NBस्_१४,२.१० //
401 SK यादृशो यस्य संस्कारस्तादृशी तस्य वासनाः / संसारसंस्कारवतो मुमुक्षा जायते कथम् // NBस्_१४,२.११ //
402 SK मोक्षे तु विषयो नास्ति सुखं न विषयैर्विना / इति मूढधियां पूर्वं मुमुक्षैव कथं भवेत् // NBस्_१४,२.१२ //
403 SK अत्रोतरम् | निष्कामा वा सकामा वा भक्तिर्विष्णोः शिवस्य वा / सप्रेम हृदये जाता मुमुक्षाकारणं हि तत् // NBस्_१४,२.१३ //
404 SK कदाचिच्छुद्धभावेन गङ्गातीरे तपः कृतम् / तत्पुण्यपरिपाकेन मुमुक्षा जायते सताम् // NBस्_१४,२.१४ //
405 SK विदुषां वीतरागाणामन्नपानादिसेवया / सङ्गत्या प्रणयेनापि मुमुक्षाऽऽकस्मिकी भवेत् // NBस्_१४,२.१५ //
406 SK तदुक्तम् | मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये / यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः // NBस्_१४,२.१६ //
407 SK तथा च वासिष्ठे | चलार्णवयुगच्छिद्रकूर्मग्रीवाप्रवेशवत् / अनेकजन्मनामन्ते विवेकी जायते पुमान् // NBस्_१४,२.१७ //
408 SK सोपास्तीनां कर्मणां तु चित्तशुद्धिः फलं मतम् / वेदनेच्छा वेदनं वा चित्रा सत्कर्मणां गतिः // NBस्_१४,२.१८ //
409 SK वेदान्तैरपि जिज्ञासोस् तस्मात्कर्मोररी कृतम् / श्रद्धा चित्तस्य शान्तिश्च दान्तिश्चोपरमस्तथा / मुमुक्षा साधनानां हि संपत्प्रथमभूमिका // NBस्_१४,२.१९ //
410 SK गुरूपसदनं पूर्वं कर्त्तव्यं हि मुमुक्षुणा / गुरुमेवाभिगच्छेच्च विज्ञानार्थमिति श्रुतिः // NBस्_१४,२.२० //
411 SK तल्लक्षणानि | मोक्ष एव ममास्त्वीश माऽस्तु संसारदर्शनम् / इति यः सुदृढो भावो मुमुक्षालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,२.२१ //
412 SK पुण्यक्षेत्रेषु या बुद्धिः पुण्यतीर्थेषु या रुचिः / मोक्षधर्मेषु या श्रद्धा मुमुक्षालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,२.२२ //
413 SK यतः कुतश्चिदानीय ज्ञानशास्त्राण्यवेक्षते / चिन्तयंस्तस्य तात्पर्यं मुमुक्षालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,२.२३ //
414 SK महताऽपि प्रयत्नेन कुर्यात्पण्डितसङ्गतिम् / संस्थापयित्वा मूर्धानं तेषां चरणपङ्कजे // NBस्_१४,२.२४ //
415 SK प्रश्नान्मनोगतान्पृच्छेत्स्वाज्ञानं च प्रकाशयेत् / तेषामुत्तरवाक्यानां तात्पर्यं हृदि भावयेत् // NBस्_१४,२.२५ //
416 SK नाधर्मो रोचते यस्य यस्य धर्मे सदा रुचिः / काम्यधर्मे न च श्रद्धा मुमुक्षालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,२.२६ //
417 SK रागद्वेषमदक्रोधलोभमत्सरवृत्तिषु / स्वभावाद्ग्लानिमाप्नोति मुमुक्षालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,२.२७ //
418 SK तत्र श्लोकः | प्रेक्षितुं न विजानाति प्रेक्षणे कुरुते मनः / लज्जां जहाति नैवेयं वयःसन्धिरयं किल // NBस्_१४,२.२८ //
419 SK चलिता स्वामिगेहाय वधूः खिद्यति रोदिति / इदमत्र समाधानं पदमग्रे दधाति यत् // NBस्_१४,२.२९ //
421 SK अथ द्वितीया | प्रकृतेर्लक्षणं त्वेतदिदं विकृतिलक्षणम् / स्वरूपं पुरुषस्येदं तद्विचारस्य लक्षणम् // NBस्_१४,३.१ //
422 SK इदं सत्यमिदं मिथ्या त्विदं चेत्यमियं हि चित् / इदं ब्रह्म त्वियं माया तद्विचारस्य लक्षणम् // NBस्_१४,३.२ //
423 SK कस्मिन्निदं कुतश्चेदं किमिदं केन वा कृतम् / कथमेतद्विलीयते तद्विचारस्य लक्षणम् // NBस्_१४,३.३ //
424 SK क ईश्वरश्च को जीवः का मुक्तिः किन्तु बन्धनम् / किं द्वैतं कथमद्वैतं तद्विचारस्य लक्षणम् // NBस्_१४,३.४ //
425 SK नित्यानित्यविवेकेन नित्यवस्तुनि वस्तुता / अनित्ये तुच्छताबुद्धिस्तद्विचारस्य लक्षणम् // NBस्_१४,३.५ //
426 SK एवमभ्यासयोगेन विदुषां मनसा सह / जायते ब्रह्मवादो यः सा तु प्रौढविचारणा // NBस्_१४,३.६ //
427 SK स्वयं प्रकाशरूपोऽयं पृष्टः कोऽसीति संवदेत् / अहमज्ञो न जानामि मामहं कोऽहमित्युत // NBस्_१४,३.७ //
428 SK आत्मभानादृते नाहमज्ञ इत्युक्तिसम्भवः / आत्मानमेव नो वेत्ति तर्ह्ययं जड एव हि // NBस्_१४,३.८ //
429 SK जडत्वाच्च घटादीनि कथमेव प्रकाशयेत् / तस्मादयं स्वमात्मानं जानात्येवेति निर्णयः // NBस्_१४,३.९ //
430 SK अथात्मानमसौ वेत्ति परन्तु न हि वेत्ति यत् / विशेषं स्वगतं तस्मात्स्वरूपाज्ञानवानयम् // NBस्_१४,३.१० //
431 SK अत्र ब्रूमो विशेषोऽत्र नास्त्यवाच्ये तु चिद्घने / निर्विशेषस्वरूपेऽत्र विशेषं यदि वेत्ति सः // NBस्_१४,३.११ //
432 SK वेद्यत्वात्कल्पितः स्वस्मिंस्तेन किं तद्विचारणैः / निर्विशेषतया ज्ञातो निर्विशेषस्वरूपवान् // NBस्_१४,३.१२ //
433 SK पूर्णबोधस्तर्हि जातो जिज्ञासैव निरर्थिका / किञ्जातीयः किंगुणोऽसौ किञ्चेष्टो नाम तस्य किम् // NBस्_१४,३.१३ //
434 SK किं प्रकारः किमाकारः किंविकारश्च पृच्छसि / न जातिर्निर्गुणस्यास्य निश्चेष्टो नाम तस्य न // NBस्_१४,३.१४ //
435 SK निष्प्रकारो निराकारो निर्विकारः स निश्चितः / सच्चिदानन्दरूपेण जिज्ञास्य इति चेद्वदेत् // NBस्_१४,३.१५ //
436 SK सच्चिदानन्दरूपेण ज्ञात एवायमेव हि / अस्य विवरणम् / अयमात्मा स्वमात्मानं सद्रूपेण न वेत्ति किम् // NBस्_१४,३.१६ //
437 SK अहमस्मीति जानाति नाहमस्मीति तद्वद / अहमस्मीति जानाति पश्चाद्विज्ञेय आत्मनः // NBस्_१४,३.१७ //
438 SK धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च यतते स्वयम् / तस्मात्सद्रूपतायां तु नास्त्येवाज्ञानमात्मनः // NBस्_१४,३.१८ //
439 SK चेतनोऽहं विजानामि घटादीनीति यो वदेत् / स्वस्य चिद्रूपतायां तु तस्याज्ञानं न विद्यते // NBस्_१४,३.१९ //
440 SK सर्वं प्रियं स्वकामाय तस्मात्प्रियतमः स्वयम् / तेनात्मनस्तु सा युक्ता स्पष्टैवानन्दरूपता // NBस्_१४,३.२० //
441 SK तेनात्मनस्तु सा व्यक्ता सच्चिदानन्दरूपता / तस्मात्स्वयं प्रकाशेऽस्मिन्सच्चिदानन्दरूपिणि // NBस्_१४,३.२१ //
442 SK आकाशे नीलिमा यद्वत्तोयं मरुमरीचिषु / जले च नैल्यमन्येन चेतनेन प्रकल्पितम् / अज्ञानं चित्स्वरूपेण स्वयं स्वस्मिन्प्रकल्पितम् // NBस्_१४,३.२२ //
443 SK मोहस्यापि स्वभावोऽयं विश्वरूपेण भासनम् / विद्यया नाशिते मोहे तत्स्वभावो न भासते // NBस्_१४,३.२३ //
444 SK जीवचैतन्यभास्यानां वृत्तीनां प्रलये लयः / वृत्तीनां प्रलयादेव न भासन्तेऽत्र वृत्तयः // NBस्_१४,३.२४ //
445 SK तत्पुनर्जीवचैतन्यं यथा पूर्वं हि वर्तते / न पुनर्वृत्तिभासात्मा जीवस्तत्र विनश्यति // NBस्_१४,३.२५ //
446 SK आत्मचैतन्यभास्यस्य मोहस्य प्रलये तथा / मोह एव निवर्तेत यथा पूर्वं लसत्यसौ // NBस्_१४,३.२६ //
447 SK दीपप्रभायामायातौ श्वेतकृष्णपटौ यथा / तौ तया काशितौ पश्चात्तन्नाशे सा यथा स्थिता // NBस्_१४,३.२७ //
448 SK आत्मभायां समायातौ मोहबोधौ यथाक्रमात् / तया प्रकाशितौ पश्चात्तन्नाशेन सा यथा स्थिता // NBस्_१४,३.२८ //
449 SK वेदान्तसंप्रदायेन कृत इत्यादिचिन्तने / असम्भावनया युक्ता विपरीतत्वभावना // NBस्_१४,३.२९ //
450 SK सा नश्यति द्वितीयायां प्रज्ञातैक्ष्ण्यं च वर्धते / दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सा बुद्धिस्तस्य जायते // NBस्_१४,३.३० //
451 SK सक्षारैरग्निसंस्कारैर्विहिते हेमशोधने / श्यामिका क्षयमायाति केवलं हेम तिष्ठति // NBस्_१४,३.३१ //
452 SK सतकैर्बोधसंस्कारैर्विहिते ब्रह्मशोधने / अविद्या क्षयमायाति केवलं ब्रह्म तिष्ठति // NBस्_१४,३.३२ //
454 SK अथ तृतीयभूमिकानिर्णयः | भूमिकाद्वितयाभ्यासात्तृतीया तनुमानसा / मननापरपर्याया भवेत्तल्लक्षणं शृणु // NBस्_१४,४.१ //
455 SK सान्धकारगृहस्थस्य पर्यालोचनया चिरम् / सूक्ष्मोऽर्थो भासते यद्वत्तृतीयायां तथा मुनेः // NBस्_१४,४.२ //
456 SK बालस्य शूद्रकल्पस्य गायत्र्या उपदेशतः / यथा द्विजत्वमायाति तथा जात्यन्तरं मुनेः // NBस्_१४,४.३ //
457 SK दृष्ट्वा लोकस्थितिं लोलां सविस्मय इव स्थितः / अन्तरेव विषीदेत तृतीयालक्षणं हि तत् // NBस्_१४,४.४ //
458 SK दिनं गतं गता रात्रिर्गतमायुर्गतं वयः / कदा स्थास्यामि निष्ठायां यत्र मोहो न बाधते // NBस्_१४,४.५ //
459 SK गतेऽह्नि शोचति मुहुर्गतेनाह्ना किमर्जितम् / गतायां च तथा रात्रौ किं मे रात्र्याऽनयाऽर्जितम् // NBस्_१४,४.६ //
460 SK अनिषिद्धेषु भोगेषु प्राप्तेष्वपि यदृच्छया / निषिद्धानिव तान्पश्येत्सा स्थितिस्तनुमानसा // NBस्_१४,४.७ //
461 SK बहिर्मुखजनस्तुत्या लज्जते निन्दितो यथा / परमार्थिजनस्तुत्या प्रसादमधिगच्छति // NBस्_१४,४.८ //
462 SK तत्र श्लोकः | अस्यै तु पतिरात्मानं दातुमुत्कण्ठितः सदा / आदातुं न विजानाति नित्यमुत्कण्ठिताऽपि सा // NBस्_१४,४.९ //
463 SK सौभाग्यकामिनी नारी नायको रतिदायकः / परन्तु मुग्धभावेन किंचित्कालं विलम्बनम् // NBस्_१४,४.१० //
464 SK इदमेव कथं नु स्यादिति क्लिश्यति चात्मना / भूयः कटाक्षकलहं करोति स्वामिना सह // NBस्_१४,४.११ //
466 SK चतुर्थभूमिकानिर्णयः | तृतीयभूमिकाभ्यासान्नाशमेति रजस्तमः / सत्त्वापतिश्चतुर्थी स्यान्निदिध्यासनरूपिणी // NBस्_१४,५.१ //
467 SK अत्राक्षेपपरीहारः | भोगार्थमेव देवत्त्वं प्राप्ता देवा न मुक्तये / मुमुक्षाविरहात्तेषां सत्त्वापत्तिर्न मुक्तिकृत् // NBस्_१४,५.२ //
468 SK अत्र श्लोकः | देवेष्वपि तथा शक्रकुबेरवरुणादयः / ये मुमुक्षां गतास्तेषां मुक्तिप्राप्तिः किमद्भुतम् // NBस्_१४,५.३ //
469 SK अथ लक्षणानि | एकान्ते मुक्तिगाथानां गानं रोदनमेव च / रोमाञ्चो गद्गदः कण्ठे सत्त्वापत्तेस्तु लक्षणम् // NBस्_१४,५.४ //
470 SK स्वमतमाह | वेदान्ताः सभ्यगभ्यस्ता अथ ध्येयो महेश्वरः / प्राप्तातिसौरभे भृङ्गे रसपानं गुणाधिकम् // NBस्_१४,५.५ //
471 SK नित्योऽस्मि शुद्ध एवास्मि क्वाज्ञानं क्व च बन्धनम् / एवमादिचमत्कारः सत्त्वापत्तेस्तु लक्षणम् // NBस्_१४,५.६ //
472 SK यथा निजकथास्तद्वच्छृणोत्युपनिषत्कथाः / यथाऽन्यस्य कथास्तद्वच्छृणोति जनसंकथाः // NBस्_१४,५.७ //
473 SK देहेन्द्रियमनःप्राणबुद्ध्यहङ्कारचेतसाम् / निरीक्ष्य विविधाश्चेष्टा आस्ते विस्मितवन्मुनिः // NBस्_१४,५.८ //
474 SK ज्ञत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वजन्ममृत्युजरादिकान् / भावानन्यस्य जानाति तदन्यं भावमात्मनः // NBस्_१४,५.९ //
475 SK मोहजालाद्विनिर्गत्य जालादिव विहङ्गमः / खेचरत्वमनुप्राप्तो धन्यतामनुविन्दति // NBस्_१४,५.१० //
476 SK दरिद्र इव संप्राप्य निधानं विस्मयं गतः / ईश्वरानुग्रहो जात इति नृत्यति हृष्यति // NBस्_१४,५.११ //
477 SK विषयैः शब्दसंस्पर्शगन्धरूपरसैर्न यः / प्रियैरपि भवेत्तादृक्सात्त्विकानन्दमागतः // NBस्_१४,५.१२ //
478 SK व्यतिरिक्तमिवात्मानं पश्यन्भावेषु सन्नपि / चाण्डालीमिव यो मायां न स्पृशन्दूरवत्स्थितः // NBस्_१४,५.१३ //
479 SK औदासीन्येन यः पश्येत्स्वप्नाभं जागरे जगत् / सत्त्वापत्तिपरीपाकलक्षणं तदुदाहृतम् // NBस्_१४,५.१४ //
480 SK अत्र श्लोकः | भावः सम्यक्परिज्ञातो ग्रहणेऽपि मनः कृतम् / आदानमवशिष्टं हि कृत्वाऽभूषणमात्मनः // NBस्_१४,५.१५ //
481 SK अहं त्वनूढा तरुणी न कस्यापि परिग्रहः / एनमेव वरिष्यामि पतिं को वा हसिष्यति // NBस्_१४,५.१६ //
482 SK हतः कामी कटाक्षेण कयाचिन्मृगचक्षुषा / व्यसनित्वमवाप्नोति तथाऽयं मुक्तिकान्तया // NBस्_१४,५.१७ //
483 SK गुञ्जद्भृङ्गिध्वनिं श्रुत्वा गुञ्जन्कीटो यथा बिले / ब्रह्मास्मीति तथैवायं भवितुं ब्रह्म गुञ्जति // NBस्_१४,५.१८ //
485 SK पञ्चमी भूमिका | दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसक्तिस्तु पंचमी / सुषुप्तिप्रथमावस्था साक्षात्कारनवांकुरा // NBस्_१४,६.१ //
486 SK साऽपरोक्षा नईव निशा शृणु तस्यास्तु लक्षणम् / प्रथमः स्वचमत्कारः स्वरूपानन्दलक्षणम् // NBस्_१४,६.२ //
487 SK ब्रह्मत्वसंस्मृतिः सैव सैव जीवत्वविस्मृतिः / तदेवाज्ञानमरणममृतत्वं तदेव हि // NBस्_१४,६.३ //
488 SK आविर्भूता तु सा नैव नाविर्भूतत्वभाक्पुनः / कथं भूयो भ्रमत्येष भ्रान्तिरेव गता यदि // NBस्_१४,६.४ //
489 SK यथा वर्तुलपाषाणा गिरेः शिखरतश्च्युताः / ध्वंसंत्येव न तिष्ठन्ति विकारास्तद्वदत्र हि // NBस्_१४,६.५ //
490 SK मुनिरर्धकटाक्षेण यं विकारमवेक्षते / सद्यः पतत्यसौ पृथ्व्यां नोत्तिष्ठति यथा पुनः // NBस्_१४,६.६ //
491 SK अविगीते न तुष्येत्तु विगीते न विषीदति / विस्मरत्यखिलं कार्यं रमते स्वात्मनात्मनि // NBस्_१४,६.७ //
492 SK भूताविष्ट इवाकस्माद्वर्णाश्रमविधिक्रमम् / प्रेरितः पूर्वसंस्कारैः करोति न करोत्यपि // NBस्_१४,६.८ //
493 SK यथैव लौकिकज्ञाने प्रमाणं चक्षुरादयः / ब्रह्मज्ञानस्य विषये तथैवोपनिषन्मता // NBस्_१४,६.९ //
494 SK यत्साक्षित्वात्प्रमाणानि तानि कस्तत्र संशयः विधिकिङ्करतां त्यक्त्वा ह्यकिञ्चित्करतां गतः / अकिञ्चनत्वमापन्नो न चिन्तयति किञ्चन // NBस्_१४,६.१० //
495 SK संलग्नेऽप्यातपे भानोर्हिमाचलशिलेव यः / बहिरन्तश्च संपूर्णः शीतलत्वं न मुञ्चति // NBस्_१४,६.११ //
496 SK स्फटिकः स्फटिकत्वज्ञः सलिलं सलिलत्ववित् / गगनं गगनत्वज्ञं यदि स्यात्सा दशा चितः // NBस्_१४,६.१२ //
497 SK बुधो यथा न मुह्येत नानारङ्गगृहेष्वपि / तथा मुह्यति नऽऽत्माऽयं नानारङ्गगृहेष्वपि // NBस्_१४,६.१३ //
498 SK योगी क्रीडति निद्राति हसत्यपि वदत्यपि / बहिर्मुखैरपि जनैः पिशाचैरिव शंकरः // NBस्_१४,६.१४ //
499 SK न प्राप्तपरमार्थस्य तुलामर्हति वासवः / वासवस्तत्पदाकांक्षी न स वासवताप्रियः // NBस्_१४,६.१५ //
500 SK वह्निपक्वं यथा मांसं पूर्ववत्स्थितमस्थिषु / संसक्तमप्यसंसक्तं स्वशरीरे तथा मुनिः // NBस्_१४,६.१६ //
501 SK तत्र श्लोकाः | इयं पराङ्मुखीभूय पतिं प्रत्यगवेक्षते / प्रेमप्रसन्नया दृष्ट्या ह्यस्या यौवनमागतम् // NBस्_१४,६.१७ //
502 SK न खेलति वयस्याभिः शिथिला गृहकर्मणि / रहः पश्यति चिह्नानि प्राप्ता प्राणपतेः सुखम् // NBस्_१४,६.१८ //
503 SK न वेषो विहितः कश्चिन्न वा वचनचातुरी / किन्तु प्रेमातिसातत्याद्बालया लालितो हरिः // NBस्_१४,६.१९ //
504 SK नालङ्कृता नो कुलीना न विदग्धा न सुन्दरी / यस्यां तु रमते स्वामी सा सौभाग्यवती वधूः // NBस्_१४,६.२० //
505 SK यस्मिन्देशे सिता नास्ति तद्देश्यो वेत्ति किं सिताम् / स एव वेद माधुर्यं येनैवास्वादिता सिता // NBस्_१४,६.२१ //
506 SK तृष्णां विहाय तुच्छेभ्यो मुनिर्निःशल्यतां गतः / स्वरसायनतृप्तात्मा दिनानुदिनमेधते // NBस्_१४,६.२२ //
508 SK षष्ठी भूमिका | भूमिकापञ्चकाभ्यासात्पदार्थाभाविनी भवेत् / षष्ठी घनसुषुप्तिः स्यान्महादीक्षेति सा भवेत् // NBस्_१४,७.१ //
509 SK महानिद्रेति सा प्रोक्ता यस्यामानन्दघूर्णिता / पदार्थविस्मृतिः सैव प्रोक्ता परिणतिश्च सा // NBस्_१४,७.२ //
510 SK तल्लक्षणानि | नरवाहनसंरूढाः सुप्ता एव यथा नृपाः / चलन्ति तद्वत्स्वानन्दे सुप्त एव चलत्यसौ // NBस्_१४,७.३ //
511 SK ध्यानाध्वरविधौ यस्य पशवश्चक्षुरादयः / स्वयमेवोपतिष्ठन्ति रन्तिदेवमखे यथा // NBस्_१४,७.४ //
512 SK पूर्णे बोधे समुत्पन्ने मनोबुद्धीन्द्रियादयः / अपूर्णाः पूर्णतां यान्ति का वाच्या तस्य पूर्णता // NBस्_१४,७.५ //
513 SK तत्सर्वममृतं तस्य यत्खादति पिबत्यपि / यत्र तिष्ठति सा काशी स जपो यत्प्रजल्पति // NBस्_१४,७.६ //
514 SK संचारस्तीर्थसंचारः समाधिः शयनं मुनेः / यं पश्यति स विश्वेशः शृणोत्युपनिषच्च सा // NBस्_१४,७.७ //
515 SK पीयते प्रेमपीयूषं श्लिष्यते परमा कला / भुज्यते परमानन्दो योगिना न स भोगिना // NBस्_१४,७.८ //
516 SK संप्राप्ते परमानन्दे न शोचति गतं वयः / भूतं भवद्भविष्यच्च सर्वमानन्दतां गतम् // NBस्_१४,७.९ //
518 SK अथ सप्तमी ततः षष्ठीमतिक्रम्य तुरीयां याति सप्तमीम् / महाकक्षेति सैवोक्ता सैव गूढसुषुप्तिका // NBस्_१४,८.१ //
519 SK योगनिद्रेति सा प्रोक्ता परा काष्ठेति सा स्मृता / अनुत्तरं च सहजं स्वरूपस्थितिरित्यपि // NBस्_१४,८.२ //
520 SK मौनमेवावलम्बन्ते यस्यां हरिहरादयः / सा तु वर्णयितुं शक्या न केनापि कदाचन // NBस्_१४,८.३ //
521 SK चिदङ्गे कोमले लग्नो दैवादज्ञानकण्टकः / तं बोधकण्टकेनायं विनिवार्य सुखं स्थितः // NBस्_१४,८.४ //
522 SK अमृतजलधौ यस्मिन्वार्त्ता न मीनतरंगयोर् न च परिचयः पारावारस्थितेरपि कुत्रचित् / समरसपरब्रह्मानन्दप्रणुन्नविकल्पनः सहजगलितद्वैतज्वालः स भाति महामुनिः // NBस्_१४,८.५ //
523 SK बंधध्वंसमभीप्सुना सुमनसा जिज्ञासया तीव्रया ज्ञाते ब्रह्मणि बाधिताक्षविषये बोधे चमत्कुर्वति / स्वान्तर्मन्तृविमानमान्यविवृतिव्यावृत्तिनिर्भङ्गको भाति ज्ञानसुखात्मकः स्वयमयं योग्यापगानां पतिः // NBस्_१४,८.६ //
524 SK वाचा मौनमयी गतिः स्थितिमयी निद्रामयो जागरो निद्रा बोधमयी निशा दिनमयी नक्तंमयो वासरः / कर्म ब्रह्ममयं जगत्सुखमयं किञ्चिन्न किञ्चिन्मयं दुर्लङ्घ्यं गुणवर्त्म लङ्घितवतो वार्त्ता कथं वर्ण्यताम् // NBस्_१४,८.७ //
525 SK अत्यन्तहीनो बलपौरुषाभ्याम् अकिंचनो यो गलिताभिमानः / तेनैव नीता रिपवो विनाशं न ये हतास्तात महेन्द्रमुख्यैः // NBस्_१४,८.८ //
526 SK ब्रह्मविद्ब्रह्मविद्यायां भवान्यां पुत्रतां गतः / निजाङ्गे लालयत्येनं परमात्मा सदाशिवः // NBस्_१४,८.९ //
528 SK भूमिकाशास्त्रार्थनिर्णयः | भूमिकात्रितयं जाग्रच्चतुर्थी स्वप्न उच्यते / तावती साधकावस्था तारतम्येन योगिनाम् // NBस्_१४,९.१ //
529 SK पञ्चमीं तु समारभ्य सिद्धावस्थैव सा त्रिधा / तिसृणामप्यवस्थानां दृष्टान्तोऽत्र निरूप्यते // NBस्_१४,९.२ //
530 SK सुषुप्तेः प्रथमावस्था तस्यां यत्सुखमाप्यते / सुषुप्तेर्या घनावस्था तस्यामपि तदेव हि // NBस्_१४,९.३ //
531 SK सुखं घनसुषुप्तौ तत्सुखं गाढसुषुप्तके / तुर्यायामपि सप्तम्यामानन्दानुभवः समः // NBस्_१४,९.४ //
532 SK तथा य एव पञ्चम्यां षष्ठ्यामपि स एव हि / तुर्यायामपि सप्तम्यां ब्रह्मानन्दः स एव हि // NBस्_१४,९.५ //
533 SK अभ्यासतारतम्येन तारतम्ये चिरस्थितौ / अपरोक्षानुभूतेस्तु तारतम्यं मनाङ्ग हि // NBस्_१४,९.६ //
534 SK नास्वादिता सिता यावत्तावन्नास्वादितैव सा / एकदास्वादिता चेत्सा नैव नास्वादिता भवेत् // NBस्_१४,९.७ //
535 SK जाता चेत्सा तु जातैव जातु नाजाततां भजेत् / कथं भूयो भ्रमत्येष भ्रान्तिरेव गता यदि // NBस्_१४,९.८ //
536 SK अथ कश्चिद्विशेषः | तुरीया प्रथमाभासे विद्युदाभासलक्षणा / ततश्चञ्चलदीपाभा ततो निश्चलदीपवत् // NBस्_१४,९.९ //
537 SK सूर्यप्रभावच्च ततः सप्तमी चिरवर्त्तिनी / उदयास्तविहीना सा दिनपक्षर्त्तुवत्सरम् // NBस्_१४,९.१० //
538 SK पुष्कला निश्चला पूर्णा परमानन्दसुन्दरी // NBस्_१४,९.११ //
539 SK येषां ध्यानकलायां च लीयन्ते गुणपङ्क्तयः / येषां कृपाकटाक्षेण सद्यो मुक्तिरवाप्यते // NBस्_१४,९.१२ //
540 SK पञ्चमीमथवा षष्ठीं सप्तमीं वा समाश्रिताः / न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि // NBस्_१४,९.१३ //
541 SK पूर्वावस्थाचतुष्के ये स्थिता देहं विहाय ते / पुनर्देहान्तरं प्राप्य ब्रह्माभ्यासं प्रकुर्वते // NBस्_१४,९.१४ //
542 SK योगभ्रष्टास्त उच्यन्ते क्रमेण ब्रह्मगामिनः / योगिनो योगसिद्धाश्च दत्ताद्या जनकादयः // NBस्_१४,९.१५ //
543 SK ईश्वरानुग्रहं प्राप्ता अर्वाचीनाश्च के चन / स्वरूपानुभवं प्राप्ता मुक्तास्ते सर्व एव हि // NBस्_१४,९.१६ //
544 SK सुषुप्तौ केचिदाश्वस्ताः केचिद्घनसुषुप्तके / केचिद्गाढसुषुप्तौ च सर्वेषाममृतं समम् // NBस्_१४,९.१७ //
546 SK अवस्थाव्यवस्था | अथावस्थाव्यवस्थाख्यं किञ्चित्प्रकरणं शृणु / यस्मिन्परीक्षिते सम्यक्परीक्ष्यं नावशिष्यते // NBस्_१५.१ //
547 SK जाग्रत्स्वप्नः सुषुप्तिश्च तथा मूढसमाधिता / मूर्च्छा मृत्युस्तुरीयञ्चेत्यवस्थाः सप्त कीर्तिताः // NBस्_१५.२ //
548 SK जाग्रत्स्वप्नः सुषुप्तिश्च व्यक्ता मूढसमाधिता / मूर्च्छा मृत्युस्तुरीयं च व्यक्ता नित्यानुभूतितः // NBस्_१५.३ //
549 SK उक्तं मूढसमाधानं भवप्रत्ययसंज्ञकम् / पुराऽसंप्रज्ञातनामसमाधेर्भेदवर्णने // NBस्_१५.४ //
550 SK तत्समाधिस्थिता जित्वेन्द्रादीन्स्वर्गेशतां ययुः / मृत्युर्मूर्च्छा प्रसिद्धेति तुरीयमभिधीयते // NBस्_१५.५ //
551 SK वेदान्तसंप्रदायेन निदिध्यासनदार्ढ्यतः / परमात्मनि चित्तस्य लयस्तु तुर्यमुच्यते // NBस्_१५.६ //
552 SK तत्र साक्षात्कृतं ब्रह्म मूलाविद्याविनाशकृत् / तत्र प्रश्नः | स्वप्नजागरयोस्तुल्यः संसाराडम्बरो मुने // NBस्_१५.७ //
553 SK तर्हि केन विशेषेण संज्ञाभेदस्तयोर्वद / अत्रोत्तरम् | जानीहि प्रथमं तात भेदं विस्मृतिबोधयोः // NBस्_१५.८ //
554 SK स्वप्नजागरयोर्भेदं पश्चाज्ज्ञास्यसि तं शृणु / विस्मृतिर्यन्न भासेत बोधो मिथ्यात्वनिश्चयः // NBस्_१५.९ //
555 SK जागरानन्तरं निद्रा तत्र स्वप्नो यदा भवेत् / स्वप्ने स्याज्जागराभानं न तु जागरबोधनम् // NBस्_१५.१० //
556 SK जागरोऽयं तु मिथ्येति बुद्धिः स्वप्ने न वर्तते / किन्तु जागरविस्मृत्या स्वप्ने स्वप्नार्थदर्शनम् // NBस्_१५.११ //
557 SK स्वप्नस्यैतन्निजं रूपं जागरस्याधुना शृणु / स्वप्नस्यानन्तरं तात जागरो हि यदा भवेत् // NBस्_१५.१२ //
558 SK स्वप्नमिथ्यात्वबुध्याऽऽत्मस्वप्नबोधस्तदा भवेत् / अन्यच्च | स्वप्ने तु यादृशी तात भवेज्जागरविस्मृतिः // NBस्_१५.१३ //
559 SK जागरे तादृशी नास्ति स्वप्नसंसारविस्मृतिः / जागरे स्मर्यते स्वप्नस्तस्य मिथ्यात्वदर्शनम् // NBस्_१५.१४ //
560 SK स्वप्ने न स्मर्यते जाग्रन्न तन्मिथ्यात्वदर्शनम् / अनेनातिविशेषेण स्वप्नजागरयोर्भिदा // NBस्_१५.१५ //
561 SK अथ प्रश्नान्तरम् | ननु मूढसमाधौ च मूर्च्छामृत्युसुषुप्तिषु / तुरीये च न दृश्यश्रीस्तर्हि तेषां भिदा कुतः // NBस्_१५.१६ //
562 SK अत्रोत्तरम् | सिद्धिकामनया यैस्तु तप उग्रं कृतं महत् / देहोऽपि विस्मृतस्तैस्तु क्रिमिकीटादिभक्षितः // NBस्_१५.१७ //
563 SK नेयं मूर्च्छा न रोगोऽयं न मृत्युर्जीवनादयम् / सुषुप्तानन्दविरहान्न सुषुप्तिरिति स्फुटम् // NBस्_१५.१८ //
564 SK स्वरूपलाभविरहान्मूढत्वान्न तुरीयकम् / दृश्यभानं तु नास्त्यासु तावता न कृतार्थता // NBस्_१५.१९ //
565 SK व्युत्थानानन्तरं तेषां सम्सारोऽपि यदास्थितः / यदात्मदर्शनं नास्ति संसारोऽबाधितस्ततः // NBस्_१५.२० //
566 SK कथयाम्यत्र दृष्टान्तं सावधानमनाः शृणु / स्वप्ने तु विस्मृतं जाग्रज्जाग्रत्स्वप्ने न बाधितम् // NBस्_१५.२१ //
567 SK तस्मादनन्तरं जाग्रत्स्वप्नस्य च यथास्थितम् / जागरे बाधितः स्वप्नस्तेन मिथ्यात्वमागतः // NBस्_१५.२२ //
568 SK तथा मूढसमाधौ तु विस्मृतं सकलं जगत् / व्युत्थानानन्तरं पश्चाद्यथापूर्वमवस्थितम् // NBस्_१५.२३ //
569 SK तुरीये बाधितं विश्वं तस्मान्मिथ्यात्वमागतम् / व्युत्थानेऽपि मुनेस्तात तन्मिथ्यैव न वास्तवम् // NBस्_१५.२४ //
570 SK रज्जुसर्पं यथा दृष्ट्वा कश्चिद्देशान्तरं गतः / यदा पुनः समायाति तदा तस्माद्बिभेत्यसौ // NBस्_१५.२५ //
571 SK नायं सर्प इति ज्ञात्वा यदि देशान्तरं गतः / यदा पुनः समायाति तदा तस्माद्बिभेति न // NBस्_१५.२६ //
572 SK तथा मूढसमाधानाद्गतः संसारविस्मृतिम् / यदा व्युत्थानमाप्नोति तदा संसारजं भयम् // NBस्_१५.२७ //
573 SK यदि विद्वत्समाधानाद्गतः संसारविस्मृतिम् / यदा व्युत्थानमाप्नोति बाधितत्वाद्विभेति न // NBस्_१५.२८ //
574 SK यदि विस्मरणादेव मुक्तिर्भविति देहिनः / सुषुप्तिर्जायते नित्यं तया मुक्तो न किं भवेत् // NBस्_१५.२९ //
575 SK तस्मात्तुरीया सर्वासामुत्तमा च विलक्षणा / षडप्यवस्था एतस्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम् // NBस्_१५.३० //
576 SK आब्रह्मकल्पं गरुडो यदि धावेत्सवेगतः / न चाप्नोति तथाप्येनं दूराद्दूरतरैव सा // NBस्_१५.३१ //
577 SK श्रद्धा यद्यस्ति वेदान्ते तीव्रा यदि मुमुक्षुता / ध्यानाभ्यासस्तथा गाढः सर्वत्र सुलभैव सा // NBस्_१५.३२ //
578 SK मृत्युर्मूर्च्छा सुषुप्तिश्च न तपस्तेन निष्फलाः / रूढमूढसमाधानं तप उग्रं महाफलम् // NBस्_१५.३३ //
579 SK विद्या विद्वत्समाधिस्तु तेन मोक्षप्रदो हि सः / सप्तानामप्यवस्थानामेवंरूपा व्यवस्थितिः // NBस्_१५.३४ //
580 SK सप्तावस्था इमाः सन्ति चित्तस्यैव चितेस्तु न / अवस्थाभवनं चित्तमवस्थासाक्षिणी तु चित् // NBस्_१५.३५ //
581 SK अवस्थानां व्यवस्थेयं यदि भूयो विभाव्यते / अवस्थानां तदा साक्षी साक्षात्प्रत्यक्षमीक्षते // NBस्_१५.३६ //
583 SK मुनीन्द्रदिनचर्या | प्रातर्जागरणार्थनिर्णयः विचित्राक्षरविन्यासैः पवित्रार्थकथारसैः / पावयामि निजां वाणीं मुनीन्द्रदिनचर्यया // NBस्_१६,१.१ //
584 SK गौरीं महेश्वरः प्राह चिदानन्दमयीं स्थितिम् / वदामि तन्मतच्छायां दिनचर्यापदेशतः // NBस्_१६,१.२ //
585 SK यस्मिञ्जागरणे प्राप्ते पुनर्निद्रा न जायते / सुमङ्गलं मुनींद्राणां प्रातर्जागरणं हि तत् // NBस्_१६,१.३ //
587 SK शौचनिर्णयः | देहेन्द्रियमनःप्राणबुद्ध्यहङ्कारचेतसि / अशुचावात्मभावोऽसावशुचित्वस्य कारणम् // NBस्_१६,२.१ //
588 SK साक्षित्वभावनातोयैस्तथा वैराग्यमृत्स्नया / गन्धलेपक्षयकरं शौचं कुर्यादतन्द्रितः // NBस्_१६,२.२ //
589 SK एवंविधेन विधिना यत्सर्वं मंगलार्जनम् / एतदेव मुनीन्द्राणां प्रातःशौचं विशुद्धिकृत् // NBस्_१६,२.३ //
590 SK ज्ञानयोगप्रसन्नानां मुमुक्षा मुखमुच्यते / श्रद्धाजलेन तच्छुद्धिर्मुखप्रक्षालनं हि तत् // NBस्_१६,२.४ //
592 SK अथ प्रातःस्मरणम् | प्रातः स्मरन्ति मुनयो देवस्य सवितुर्महः / वरेण्यं तद्धियः साक्षि तदेवास्मीति संततम् // NBस्_१६,३.१ //
593 SK अन्वयव्यतिरेकाभ्यां जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु / यदेकं केवलं ज्ञानं तदेवाहमहं हि तत् // NBस्_१६,३.२ //
594 SK ज्ञानाज्ञाने तद्विषयौ तदहङ्कार एव च / प्रकाश्यन्ते येन भूम्ना तदहं ह्यहमेव तत् // NBस्_१६,३.३ //
595 SK विश्वश्च तैजसः प्राज्ञो नास्म्यहं सत्स्वरूपतः / यतस्ते तु प्रकाश्यन्ते तदहं नास्मि चेतरत् // NBस्_१६,३.४ //
596 SK ज्ञानाज्ञानप्रपञ्चेऽस्मिञ्ज्ञानाज्ञानेन नाशिते / यत्सच्छिष्टं परं ब्रह्म ह्यहं तन्नेतरत्स्मरेत् // NBस्_१६,३.५ //
598 SK अथ स्नानकालनिर्णयः | अरुणकिरणग्रस्तां प्राचीमवलोक्य स्नायादिति वचनात्स्नानम् // NBस्_१६,४.१ //
599 SK तथाहि | नश्यन्त्यां मोहनिद्रायामन्धकारे गलत्यथ / आरोहति विचाराद्रिशिखरे ज्ञानभास्करे // NBस्_१६,४.२ //
600 SK दिक्षु किंचित्प्रकाशासु दिङ्मोहे गलिते सति / संदेहकौशिके नष्टे जाते प्रागरुणोदये // NBस्_१६,४.३ //
602 SK अथ स्नाननिर्णयः | ज्ञानगङ्गाह्रदे शुद्धे मग्नो नखशिखावधि / यः स्नाति मूलमंत्रेण सर्वदैव स निर्मलः // NBस्_१६,५.१ //
604 SK अथ वस्त्रधारणम् | अथ भक्तिप्रसादाख्ये परिधायांशुके मुनिः / यत्रोदयः सैव पूर्वा काष्ठा तस्याश्च सन्मुखः // NBस्_१६,६.१ //
606 SK अथ पवित्रादिधारणनिर्णयः | पवित्राः सूक्ष्मशास्त्रार्थास्तीक्ष्णाग्रा हरिताश्च ये / शातना कुत्सितस्यैते कुशा इति निरूपिताः // NBस्_१६,७.१ //
607 SK तत्पवित्रकरो भूत्वा मुनिः सव्येन वर्त्मना / वेदान्तसूत्रं यत्सूत्रं यस्याथर्वशिखा शिखा // NBस्_१६,७.२ //
608 SK जिज्ञासा दीर्घतिलको ब्रह्मकर्म समारभेत् /
610 SK अथाचमननिर्णयः | जडं करतले कृत्वा समुद्रमिव कुंभजः / यदाचामति योगीन्द्रस्तदाचमनमुत्तमम् // NBस्_१६,८.१ //
612 SK अथ प्रातःसंध्यानिर्णयः | अथोपयुक्तः क्रियते प्रातःसन्ध्याविनिर्णयः / मनोजन्म जगज्जन्म मनोनाशो जगल्लयः // NBस्_१६,९.१ //
613 SK तस्योन्मेषनिमेषाभ्यामुदयप्रलयौ यतः / समाध्यभ्यासशीलस्य पूर्वसंस्कारकारणात् // NBस्_१६,९.२ //
614 SK यदुत्थानं समाधानात्स सन्धिः सन्धिरत्र हि / तत्रापि प्राप्ततत्त्वानां गुरूणामुपदेशतः // NBस्_१६,९.३ //
615 SK खण्डितं नानुसन्धानं सा सन्ध्येत्युच्यते बुधैः // NBस्_१६,९.४ //
617 SK अथ प्राणायामनिर्णयः | शरीराभ्यन्तरो वायुः प्राणापान इतीरितः / स एव गतिभेदेन संज्ञादशकमागतः // NBस्_१६,१०.१ //
618 SK ऊर्ध्वाधोगतिमुख्यं द्विरूपं तस्य गतिद्वयम् / ऊर्ध्वं गच्छन्भवेत्प्राणस्त्वपानः स्यादधश्चलन् // NBस्_१६,१०.२ //
619 SK अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानं च कर्षति / अनयोः शृङ्खला देहे तेन जीवो न निश्चलः // NBस्_१६,१०.३ //
620 SK चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् / चित्ते चले चलः प्राणो निश्चले निश्चलो भवेत् // NBस्_१६,१०.४ //
621 SK कश्चित्प्राणजयेनैव मनोनिश्चलतां भजेत् / कश्चिन्मनोजयेनैव प्राणनिश्चलतां भजेत् // NBस्_१६,१०.५ //
622 SK कश्चिद्द्वयजयेनैव मनोनिश्चलतां भजेत् / इति योगगतिज्ञानां त्रिविधा योगिनां गतिः // NBस्_१६,१०.६ //
623 SK प्राणद्वारा मनः साध्यं मतं हि हठयोगिनाम् / मनसैव मनः साध्यमिति विज्ञानयोगिनाम् // NBस्_१६,१०.७ //
624 SK मनःप्राणद्वययुजस्ते तु श्रेष्ठतराः स्मृताः / चेच्छुष्कहठिनो मूढास्ते भण्डा न तु योगिनः // NBस्_१६,१०.८ //
625 SK ते त्वर्धयोगिनः प्रोक्ताः क्षुद्रसिद्ध्यर्थयोगिनः / पिङ्गलेडा सुषुम्णा च मुख्यास्तिस्रस्तु नाडिषु // NBस्_१६,१०.९ //
626 SK इडा वामा पिङ्गलान्या सुषुम्णा मध्यवर्तिनी / वामदक्षिणमार्गेण सदा वहति मारुतः // NBस्_१६,१०.१० //
627 SK यदा द्वावपि रुध्येते प्राणमार्गौ सुयोगिना / तदाऽन्यत्सर्पवत्प्राणो रन्ध्रमाविशति स्वयम् // NBस्_१६,१०.११ //
628 SK स्थिता कुण्डलिनी मूले जीवशक्तिरनुत्तमा / तामुत्थाप्य तया सार्धं सुषुम्णां प्राण आविशेत् // NBस्_१६,१०.१२ //
629 SK सुषुम्णावाहिनि प्राणे ब्रह्मरन्ध्रं गते सति / तत्र निश्चलतां याते मनो निश्चलतां व्रजेत् // NBस्_१६,१०.१३ //
630 SK मनो यदि निरुध्येत केवलं ज्ञानयोगिना / प्राणापानौ नश्यतस्तु मनोनाशेन तत्क्षणात् // NBस्_१६,१०.१४ //
631 SK तस्मात्सिद्धान्त एवैको हठविज्ञानयोगिनोः / शास्त्रोक्तमिति विज्ञाय निर्णयं प्राणचेतसोः // NBस्_१६,१०.१५ //
632 SK प्राणायामं मुनिः कुर्यान्मनोलयसमन्वितम् // NBस्_१६,१०.१६ //
634 SK अथार्घदानम् | पूर्णाञ्जलिमयास्त्र्यर्घा भावनागाङ्गवारिणा / सर्वपापविशुद्ध्यर्थं प्रदेयाः कर्मसाक्षिणे // NBस्_१६,११.१ //
635 SK इदं दृश्यमहं द्रष्टा प्रथमोऽर्घो मनीषिणाम् / ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या द्वितीयोर्ऽघस्ततः परः // NBस्_१६,११.२ //
636 SK नेदमस्त्यहमेवास्मि तृतीयोर्घः परात्परः / एवं विधाऽर्घदानेन चिदादित्यः प्रसीदति // NBस्_१६,११.३ //
638 SK अथ गायत्रीजपनिर्णयः | अखण्डमण्डलाकारं देवं ज्योतिर्मयं स्मरन् / उपदेशात्सदाऽऽवृत्तिरिति वेदान्तसूत्रतः // NBस्_१६,१२.१ //
639 SK तिष्ठेज्जपेच्च गायत्रीमष्टोत्तरशतत्रयम् / गायन्तं त्रायत्ते यस्माद्गायत्री तेन सा स्मृता // NBस्_१६,१२.२ //
640 SK अन्तर्यामिस्वरूपेण सर्वधीवृत्तिनोदकम् / सवितृमण्डले ध्येयं गायत्र्यर्थपरं महः // NBस्_१६,१२.३ //
641 SK चतुर्विंशत्यक्षरया गायत्र्या ब्रह्मविद्यया / चतुर्विंशतितत्त्वानां लयकृद्ब्राह्मणः शुचिः // NBस्_१६,१२.४ //
643 SK अथोपस्थाननिर्णयः | मुनिः प्रसार्य सरलौ प्रलम्बौ सपवित्रकौ / सांख्ययोगौ निजौ बाहू उपतिष्ठेत भास्करम् // NBस्_१६,१३.१ //
644 SK नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे / त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चिनारायणशङ्करात्मने // NBस्_१६,१३.२ //
646 SK अथ सहोमाङ्गहोमनिर्णयः | एवं समाप्य विधिना प्रातः संध्याविधिं मुनिः / होमस्यावसरं ज्ञात्वा यज्ञशालां ततो विशेत् // NBस्_१६,१४.१ //
647 SK यज्ञशाला भूमिका स्यात्तृतीया तनुमानसा | सव्यार्हान्सव्यतः कुर्यादसव्यार्हानसव्यतः / संचरेत तथा नैव प्रायश्चित्तीयते यथा // NBस्_१६,१४.२ //
648 SK अथ कर्मातिपातः स्याद्दुर्गत्वाद्ब्रह्मकर्मणः / प्रायश्चित्तविधिं ज्ञात्वा तच्च सद्यः समाचरेत् // NBस्_१६,१४.३ //
649 SK कर्मातिपाते प्रायश्चितं तत्कालमिति वचनात्प्रायश्चित्तानि // NBस्_१६,१४.४ //
650 SK अथ प्रायश्चित्तानि | क्षमयैव जयेत्क्रोधं सत्येनैवानृतं जयेत् / अश्रद्धां श्रद्धया जित्त्वा दानैः कृपणतां जयेत् // NBस्_१६,१४.५ //
651 SK इतीमे सेतुसामोक्ताश्चत्वारः सेतवो दृढाः / उपलक्षणमेवैतदन्यानपि तथा जयेत् // NBस्_१६,१४.६ //
652 SK उत्थानेन जयेन्निद्रां कामं सङ्कल्पवर्जनात् / सन्तोषेण जयेल्लोभं मोहं बोधदृशा जयेत् // NBस्_१६,१४.७ //
653 SK मदमत्सरमुख्यांश्च सर्वभूतात्मभावनात् / अन्यानपि जयेद्दोषान्नित्यानित्यविचारणात् // NBस्_१६,१४.८ //
654 SK लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः / सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् // NBस्_१६,१४.९ //
655 SK नास्वादयेद्रसं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् / विशेदेकाग्रया बुद्ध्या सिद्धिमेवमवाप्नुयात् // NBस्_१६,१४.१० //
656 SK उद्धृते गार्हपत्याग्नौ तत्तत्संस्कारसंस्कृते / सत्यरूपः स्वयं यज्वा श्रद्धा पत्नी पतिव्रता // NBस्_१६,१४.११ //
657 SK गृहं देहः पतिर्जीवश्छादितो मोहभस्मना / जीवस्य गार्हपत्याग्नेस्तदुद्धरणमुत्तमम् // NBस्_१६,१४.१२ //
658 SK द्वे आहुती जुहोत्येते अग्निहोत्रविधानतः / ममतां प्रथमं हुत्वाऽहन्तां च जुहुयात्ततः // NBस्_१६,१४.१३ //
659 SK हुते चेदाहुती एते सर्वमेतद्धुतं भवेत् / श्रद्धापत्नीसमेतानां मुमुक्षागृहवासिनाम् // NBस्_१६,१४.१४ //
660 SK अग्निहोत्रमिदं नित्यम् अकृत्य प्रत्यवैति यत् /
662 SK अथ ब्रह्मयज्ञनिर्णयः | अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ / इति पञ्चाङ्गुलिमयो यमनामा तु सत्करः // NBस्_१६,१५.१ //
663 SK शौचं संतोषः स्वाध्यायस्तप ईश्वरधारणा / इति पञ्चाङ्गुलिमयो नियमो नाम सत्करः // NBस्_१६,१५.२ //
664 SK संपुटीकृत्य हस्तो द्वौ मुनिर्नियमसंयमौ / ब्रह्मस्तुतिमयं साक्षाद्ब्रह्मयज्ञं समाचरेत् // NBस्_१६,१५.३ //
665 SK तदुक्तं पातंजले | स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत् / योगस्वाध्यायसंपत्त्या परमात्मा प्रकाशत इति // NBस्_१६,१५.४ //
666 SK वेदशास्त्रपुराणेषु यद्यत्पुण्यफलं स्मृतम् / सर्वस्मादपि संप्रोक्तं ब्रह्मयज्ञफलं महत् // NBस्_१६,१५.५ //
668 SK अथ तर्पणनिर्णयः | देवर्षिपितृभूतेभ्यो दत्तो येन जलाञ्जलिः / ब्रह्मैवास्मीतिमंत्रेण तर्पणं तत्सुतर्पणम् // NBस्_१६,१६.१ //
670 SK अथ देवपूजानिर्णयः मायाशक्तिविलासतो न गणितब्रह्माण्डभाण्डोदरे क्रीडाकौतुकसंभ्रमात्मकमपि प्रत्यक्प्रकाशात्मकम् / ध्यात्वा किंचिदचिन्त्यचिद्घनरसं स्वानन्दसत्ताद्वयं सिद्धांतस्वरसेन पूजनविधिं वक्ष्यामि विश्वात्मनः // NBस्_१६,१७.१ //
671 SK सेव्यः श्रीगुरुवेदवाक्यजनितश्चिद्बोध आवाहनं सर्वव्यापकताविनिश्चयमतिः पूर्णं पवित्रासनम् / त्वत्तो नान्यदवैमि किंचिदिति तत्पुण्याम्बु पादोदकं त्वय्येवास्त्वचला ममेश मतिरित्यर्घोऽस्तु ते सुंदरः // NBस्_१६,१७.२ //
672 SK शीतोष्णं कटुतिक्तमम्लमधुरं क्षारं विचित्रं रसैर् यत्तस्यास्य समत्वभावमधुना पर्कः कृतश्चेद्यदि / मुख्योयं मधुपर्क उत्तमरसस्तेनामुना सादरं पूज्यानामपि पूज्य एष परमो देवः सदा पूज्यताम् // NBस्_१६,१७.३ //
673 SK सर्वाङ्गीणसुखावहं मुहुरहो यज्जन्मनो मज्जनं शुद्धे बोधसुधाम्बुधौ शुचितरे स्नानं विशुद्धिप्रदम् / आभानं स्फुरति द्वितीयमिव यत्तत्सर्वमाचम्यताम् इत्युक्तो गुरुभिस्तदेष विधृतश्चित्ते स एवाचमः // NBस्_१६,१७.४ //
674 SK श्रद्धा निर्ममता विरागशुचिता निःसङ्गता पूर्णता भक्तिप्रेमरसप्रसादपरमानन्दादयो ये गुणाः / वस्त्रालङ्करणानि तत्र विदुषा देयानि विश्वम्भरे सोऽहं भावमनोहरेण विधिना यद्यद्यथा रोचते // NBस्_१६,१७.५ //
675 SK अद्वैतप्रतिपत्तिरात्मविषया सा सामरस्याञ्चिता गात्रालेपनचारुचन्दनमिदं देवस्य देयं प्रियम् / शान्तिः क्षान्तिरलोलता सरलता निर्मत्सरत्वादयः शास्त्रार्था यदि न क्षताश्च वितुषाः शुद्धास्त एवाक्षताः // NBस्_१६,१७.६ //
676 SK संफुल्लैर्निजभावशुद्धकुसुमैः सद्वासनासुन्दरैः संपूज्यो हि महेश्वरः सुमनसां सा धन्यता वर्णिता / कर्मज्ञानमयो यदिन्द्रियगणः क्षिप्तो विरागानले देवस्यास्य दशाङ्गदाहसुरभिर्धूपः सदा वल्लभः // NBस्_१६,१७.७ //
677 SK यस्मिन्नुज्ज्वलिते न तिष्ठति तमो बाह्यं न चाभ्यन्तरं सोऽयं ज्ञानमयः प्रकाशपरमो दीपः समुज्ज्वाल्यताम् / यद्भक्ष्यं प्रियमस्य यस्य परमा तृप्तिर्भवेद्भक्षणे द्वैतं तत्तु निवेदनीयममितं नैवेद्यमत्युत्तमम् // NBस्_१६,१७.८ //
678 SK पश्चादाचमनीयमत्र विहितं सद्यो विशुद्धिप्रदं सन्तोषामृतमेव पूजनविधौ पानीयमानीयताम् / यन्मैत्र्यादिचतुष्टयं मुनिमते पातञ्जले वर्णितं ताम्बूलं वदनप्रसादजनकं देवाग्रतः स्थाप्यताम् // NBस्_१६,१७.९ //
679 SK निष्कामोत्तमधर्मसंभ्रमजुषां जन्मावलीनां फलं भक्तिः सा परमेश्वरस्य पदयोरावेदनीया मया / सर्वस्वं मम तत्किलेति स मया क्लृप्तस्य पूजाविधेः पूर्णत्वाय निवेदितो निजमनश्चिन्तामणिर्दक्षिणा // NBस्_१६,१७.१० //
680 SK यावन्त्येव भुवां रजांस्यगणितब्रह्माण्डकोटिस्पृशां तावद्भी रजसां गणैर्गणयितुं शक्या गुणा यस्य न / त्वं तादृग्गुणवांस्तथापि मुनिभिर्यन्निर्गुणः स्तूयसे तत्किं स्तौमि महेश हे शिव भवद्रूपं विदूरं धियाम् // NBस्_१६,१७.११ //
681 SK श्वेतं श्याममिति प्रकाशयति चेदर्कः स किं श्यामतां श्वेतत्वं च दधाति तद्वदितरो मुग्धेषु बुद्धेषु यः / द्वैताद्वैतविकल्पजालकलनातीताय शुद्धात्मने जाग्रत्स्वानुभवप्रकाशमहसे देवाय तस्मै नमः // NBस्_१६,१७.१२ //
682 SK संप्राप्यापि पदारविन्दपदवीमद्वैतविद्यावताम् एतावन्तमनेहसं न तु वयं लीनाः सदा ब्रह्मणि / मुक्तानामपि मोहतः समरसत्वद्भावपूर्णात्मनाम् अस्माकं ह्यपराध एव परमः क्षन्तव्य एवं प्रभो // NBस्_१६,१७.१३ //
683 SK आत्मैवायमनन्तचिद्घनरसो नित्यं विमुक्तः स्वयं को बन्धः किमु बन्धनं कथमसौ बद्धो विमुक्तः कथम् / सानन्दाश्रु सगद्गदं सपुलकं चिद्बोधपूजाविधौ देवस्यास्तु मदीयविस्मयमयः संपूर्णपुष्पाञ्जलिः // NBस्_१६,१७.१४ //
685 SK अथ देवपूजोपयुक्तशास्त्रार्थनिर्णयः त्यक्त्वा मोहमयीं पूजां पूजां बोधमयीं कुरु / चन्दनैरर्चनीयोऽयं न तु पङ्केन शंकरः // NBस्_१६,१८.१ //
686 SK परिचीय पुरा देवं देवपूजापरो भव / देवे परिचयो नास्ति वद पूजा कथं भवेत् // NBस्_१६,१८.२ //
687 SK तावत्पूजां न मनुते यावत्परिचयो न हि / जाते परिचये देवः पूजामपि न काङ्क्षति // NBस्_१६,१८.३ //
688 SK पक्षद्वयेऽपि पश्यामि पूजां देवस्य दुर्घटाम् / पूज्यपूजकता न ज्ञे मूर्खस्त्वज्ञानसूतकी // NBस्_१६,१८.४ //
689 SK न जाने क्व पलायन्ते धूपदीपाक्षतादयः / अस्माकं देवपूजायां देव एवावशिष्यते // NBस्_१६,१८.५ //
690 SK देवानुसंधानधिया विस्मृते पूजनक्रमे / पूजायां जायते विघ्नः पूर्णपूजाफलं हि तत् // NBस्_१६,१८.६ //
691 SK आनन्दघनगोविन्दपूजनारम्भकर्मणि / बोधे स्फुरति मोहात्मा यजमानः पलायितः // NBस्_१६,१८.७ //
693 SK अथ पञ्च महायज्ञाः ज्ञाननिष्ठा क्षमा सत्यं विवेकः परिपूर्णता / एते पञ्च महायज्ञाः संमता ब्रह्मवेदिनाम् // NBस्_१६,१९.१ //
695 SK अथोपयज्ञनिर्णयः एतस्यां दिनचर्यायां प्राप्ते पर्वणि पर्वणि / मध्ये मध्ये चोपयज्ञाः कर्तव्या दीक्षितेन हि // NBस्_१६,२०.१ //
696 SK यत्पुरोडाशतां याति कालखण्डं मनः पशोः / कर्त्तव्यास्तादृशा यज्ञा देवेन्द्रप्रीतिहेतवे // NBस्_१६,२०.२ //
697 SK एकीकृत्य सुपर्णौ द्वौ चीयते चेत्सुपर्णचित् / जीयते तन्मुनीन्द्रेण शतस्याग्निचितां फलम् // NBस्_१६,२०.३ //
699 SK अथ नित्यदानम् | समाधितीर्थे मुनिना ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः / दत्तमात्मसमं हेम पात्राय परमात्मने // NBस्_१६,२१.१ //
701 SK अथ मध्याह्नसन्ध्या | दर्शनस्पर्शनघ्राणरसनश्रवणादिषु / यश्चैतन्यचमत्कारो मुनेर्माध्याह्निकं तु तत् // NBस्_१६,२२.१ //
703 SK अथ वैश्वदेवः | आत्मा विश्वस्य देवोऽयं विश्वेन हविषेज्यते / तत्कर्म वैश्वदेवाख्यं सर्वसूनानिवृत्तये // NBस्_१६,२३.१ //
705 SK अथ बलिदानम् | नवद्वारां पुरीमेतामाश्रितेभ्यो दयालुना / भूतेभ्योऽपि बलिर्देयः खानपानादिलक्षणः // NBस्_१६,२४.१ //
707 SK अथ भोजनविधिः | गुरुभिश्च सतीर्थ्यैश्च शिष्यैश्च सहितस्तथा / सुरसं चारु भोक्तव्यं ज्ञानपीयूषमुत्तमम् // NBस्_१६,२५.१ //
709 SK अथ ताम्बूलग्रहणनिर्णयः | सत्यं प्रियं च पथ्यं च ब्रह्मचर्चाऽऽत्मकं वचः / ताम्बूलग्रहणं कार्यं वदनं येन राजते // NBस्_१६,२६.१ //
711 SK अथ वामकुक्षिशयननिर्णयः | यावच्छरीरपतनं प्राचीनैः कर्मभिः कृतौ / योगक्षेमौ न चिन्त्यौ हि निर्योगक्षेम आत्मवान् // NBस्_१६,२७.१ //
712 SK समाधिशयने शुभ्रे सुखनिद्रां विधाय च / क्षणं विश्रम्य तत्पश्चात्पुराणश्रवणं चरेत् // NBस्_१६,२७.२ //
714 SK अथ पुराणश्रवणनिर्णयः | अथ भारतश्रवणनिर्णयः | अष्टादशाध्यायमयी यत्र गीता निरूपिता / सर्वोपनिषदां तत्त्वं तन्महाभारतं शृणु // NBस्_१६,२८.१.१ //
715 SK भारते व्यासमुनिना कथानां विस्तरः कृतः / कथामात्रमिदं विश्वमिति तेन प्रकाशितम् // NBस्_१६,२८.१.२ //
716 SK समाप्ते भारते ग्रन्थे शान्तिपर्व निरूपितम् / तदुक्तं सर्वशास्त्राणां शान्तौ परिसमापनम् // NBस्_१६,२८.१.३ //
717 SK नानाख्यानैर्महारम्या मोक्षधर्मा निरूपिताः / तदुक्तं सर्वधर्माणां मोक्षधर्मा परा मताः // NBस्_१६,२८.१.४ //
719 SK अथ भागवतश्रवणनिर्णयः | वृत्तिगोपीजनैः क्रीडन्ब्रह्मचर्यं न मुञ्चति / यत्रान्तरात्मा गोपालस्तद्भागवतमुत्तमम् // NBस्_१६,२८.२.१ //
720 SK बालानां भक्षिका भीमा पूतना दुष्टवासना / कृष्णेन रुधिरं पीत्वा प्रापिता सापि तत्पदम् // NBस्_१६,२८.२.२ //
721 SK अबलानां स्वनाथानाममृतत्वाय विष्णुना / ताडितः कालसर्पोऽपि सर्वमानन्दितं जगत् // NBस्_१६,२८.२.३ //
722 SK ब्राह्मणा इव ता गावस्तीरस्था वन्यवृत्तयः / मोहाजगरनिर्गीर्णा गोविन्देन समुद्धृताः // NBस्_१६,२८.२.४ //
723 SK स मूर्त्तिमानहङ्कारः कंसो नाम महाबलः / स्वयमुत्पत्य कृष्णेन धृत्वाऽसौ विनिपातितः // NBस्_१६,२८.२.५ //
725 SK अथ रामायणश्रवणनिर्णयः | आभासरेणुभिस्तद्वज्जडं देहादि चेतति / अहिल्याऽपि शिला यद्वद्रामस्य पदपांसुभिः // NBस्_१६,२८.३.१ //
726 SK वानरो यत्प्रसादेन संतीर्णः क्षारसागरम् / नरः किं तत्प्रसादेन न तरेद्भवसागरम् // NBस्_१६,२८.३.२ //
727 SK प्राह रामस्तरन्सिन्धुं शिलारूपेण सेतुना / संसारसिन्धुतरणं निर्विकल्पसमाधिना // NBस्_१६,२८.३.३ //
728 SK शान्तिसीता समानीता निहतो मोहरावणः / आत्मारामेण रामेण तद्रामायणमुत्तमम् // NBस्_१६,२८.३.४ //
729 SK रमन्ते योगिनो यस्मिन्रमते योगिनां हृदि / तारकं ब्रह्म रामाख्यं रमतां हृदये मम // NBस्_१६,२८.३.५ //
731 SK अष्टादशविद्यास्थाननिर्णयः | तदुक्तं याज्ञवल्क्यस्मृतौ पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः / वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश // NBस्_१६,२८.४.१ //
732 SK आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वं चार्थशास्त्रकम् // NBस्_१६,२८.४.२ //
733 SK इत्याष्टादशविद्यास्थानानि
735 SK अथ पुराणनिर्णयः | न घना प्रीतिरुत्पन्ना पुराणपुरुषे यदि / तदाऽष्टादशभेदेन पुराणश्रवणेन किम् // NBस्_१६,२८.४,१.१ //
736 SK पुराणोऽपि न जीर्णो यः स पुराणस्तु न श्रुतः / कायः पुराणतां प्राप्तः पुराणश्रवणेन किम् // NBस्_१६,२८.४,१.२ //
738 SK न्यायशास्त्रनिर्णयः | यदाऽऽत्मतत्त्वे विमले विश्रान्तिरचला भवेत् / स एव न्याय इत्युक्तः शेषं त्वन्यायलक्षणम् // NBस्_१६,२८.४,२.१ //
739 SK अचिन्तनं पदार्थानां न्यायं न्यायविदो विदुः / अन्यायमार्गरसिकः स कथं न्यायशास्त्रवित् // NBस्_१६,२८.४,२.२ //
740 SK स्वयं यत्तार्किकः प्राह तर्कोऽनिष्टप्रसञ्जनम् / तत्तार्किकस्य तर्केण कथमिष्टं प्रसज्ज्यते // NBस्_१६,२८.४,२.३ //
741 SK न तर्कितं परं ब्रह्म मेधया तीक्ष्णतर्कया / तदा कुतार्किकस्यास्य तर्ककर्कशता वृथा // NBस्_१६,२८.४,२.४ //
742 SK षोडशापि पदार्थास्ते त्वया तार्किक तर्किताः / तर्को नावस्थितस्तर्हि तर्कातीते मनः कुरु // NBस्_१६,२८.४,२.५ //
744 SK वैशेषिकादिनिर्णयः | अथ तर्कप्रसङ्गेन निर्णयः क्रियतेऽधुना / वैशेषिकस्य सांख्यस्य तथा पातञ्जलस्य च // NBस्_१६,२८.४,३.१ //
746 SK तत्र प्रथमं वैशेषिकनिर्णयः | सविशेषाः पदार्था ये तत्र वैशेषिकः कृती / निर्विशेषं परं ब्रह्म तत्र वैशेषिकस्य किम् // NBस्_१६,२८.४,३.१,१ //
747 SK मुक्तं साधर्म्यवैधर्म्यैस्तत्त्वज्ञानं हि मुक्तये / साधर्म्यवैधर्म्यकृतं तत्त्वज्ञानं न मुक्तये // NBस्_१६,२८.४,३.१,२ //
748 SK श्रुतिः सर्वपदार्थानां विस्मृत्या मुक्तिमाह यत् / तर्हि सर्वपदार्थानां चिन्तनैः किं प्रयोजनम् // NBस्_१६,२८.४,३.१,३ //
749 SK कथं साधर्म्यवैधर्म्ये तत्त्वज्ञानस्य कारणम् / न च साधर्म्यवैधर्म्यमद्वये परमात्मनि // NBस्_१६,२८.४,३.१,४ //
750 SK पदार्थानां विवेकेन परमात्मा प्रकाशते / इति चेद्वदसि प्राज्ञ तर्हीदं मम संमतम् // NBस्_१६,२८.४,३.१,५ //
751 SK बद्धमुक्तव्यवस्थायां नानात्मानो न वस्तुतः / नानाऽऽत्मानो व्यवस्थान इत्याह मुनिगौतमः // NBस्_१६,२८.४,३.१,६ //
752 SK कल्पनागौरवं दोषः कल्पनालाघवं गुणः / इति यत्तार्किकैरुक्तं तदेव मम रोचते // NBस्_१६,२८.४,३.१,७ //
754 SK अथ सांख्यनिर्णयः | असंख्याः सांख्य तत्वानां संख्याः संख्यातवानसि / किं सांख्यसंख्यया ब्रह्म संख्यातीतं विचिन्तय // NBस्_१६,२८.४,४.१ //
755 SK तत्त्वज्ञानं त्वया प्रोक्तं तत्त्वज्ञानं मतं मम / तत्त्वातीतस्य विज्ञानं तत्त्वज्ञानं हि मुक्तये // NBस्_१६,२८.४,४.२ //
756 SK पुरुषस्य परीक्षार्थं मया संख्या निरूपिता / सांख्य एवं यदि प्राह तर्हीदं मम संमतम् // NBस्_१६,२८.४,४.३ //
757 SK पुरुषान् न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः / पुरुषं पश्य रे सांख्य संख्यया किं प्रयोजनम् // NBस्_१६,२८.४,४.४ //
759 SK अथ पातञ्जलनिर्णयः | योगसिद्धिप्रसक्तोऽयं पातञ्जलपरिश्रमः / कलाकौशलमेवेदं न स्वरूपस्थितिर्हि सा // NBस्_१६,२८.४,५.१ //
760 SK रे योगसिद्ध जीवानां कायव्यूहो न दुर्लभः / विदेहमुक्तता सिद्धिः कायव्यूहो न सिद्धये // NBस्_१६,२८.४,५.२ //
761 SK हे योगसिद्ध जानासि परकायप्रवेशनम् / परं तु नैव जानासि परकायप्रवेशनम् // NBस्_१६,२८.४,५.३ //
762 SK भूतादयोऽपि जानन्ति परकायप्रवेशनम् / सा सिद्धिर्नैव बन्धः सा यद्धि कायप्रवेशनम् // NBस्_१६,२८.४,५.४ //
763 SK अवश्यं मरणं तर्हि कीदृशी चिरजीविता / जन्ममृत्युजराध्वंसि त्वं विज्ञानामृतं पिब // NBस्_१६,२८.४,५.५ //
764 SK परचित्तस्थितं वस्तु त्वया ज्ञातं ततश्च किम् / स्वचित्तसंस्थितं वस्तु परं ब्रह्म विलोकय // NBस्_१६,२८.४,५.६ //
765 SK निकटस्थस्यात्मनश्चेन्न स्याच्छ्रवणदर्शनम् / का सिद्धिः सा तु या सिद्धिर्दूरश्रवणदर्शनम् // NBस्_१६,२८.४,५.७ //
766 SK भवन्ति वायसादीनामपि खेचरताऽऽदयः / सिद्धिभिर्नैव सिध्येत सिद्धिभिः किं प्रयोजनम् // NBस्_१६,२८.४,५.८ //
767 SK न सिद्धिर्योगसिद्धिर्हि बलवीर्यादिसिद्धिकृत् / एतेन योगः प्रत्युक्त इति वेदान्तभाषितम् // NBस्_१६,२८.४,५.९ //
768 SK सिद्धिरात्मपरिज्ञानमन्तरायास्तु सिद्धयः / इति चेद्योगवित्प्राह मतमस्माकमेव तत् // NBस्_१६,२८.४,५.१० //
770 SK अथ मीमांसानिर्णयः | कष्टं कर्मेत्ययं न्यायो मतो मीमांसकस्य चेत् / आत्मनः क्लेशभागित्वं तेनैवांगीकृतं तदा // NBस्_१६,२८.४,६.१ //
771 SK मीमांसकः सत्यमाह कष्टं कर्मेति कर्मवित् / तर्हि तस्यापि जिज्ञास्यं ब्रह्मानिष्टनिवृत्तये // NBस्_१६,२८.४,६.२ //
772 SK कर्मणा संभवेज्जन्म जन्मना कर्मसंभवः / तर्हि कर्मजडस्यास्य जन्ममुक्तिः कथं भवेत् // NBस्_१६,२८.४,६.३ //
773 SK मुक्तिप्राधान्यमेवास्ति बोधप्राधान्यवादिनाम् / जन्मप्राधान्यमेवास्ति कर्मप्राधान्यवादिनाम् // NBस्_१६,२८.४,६.४ //
774 SK यः स्वयं कर्मजाड्येन यज्ञेष्वनधिकारतः / निष्काममशुचिप्रायं जगाद स कथं शुचिः // NBस्_१६,२८.४,६.५ //
775 SK शुद्धिकृत्कामनिर्मुक्तं कर्म मीमांसितं वदेत् / तत्काम्यकर्ममीमांसा केवलं कष्टरूपिणी // NBस्_१६,२८.४,६.६ //
776 SK कर्मभिश्चेतसः शुद्धिः शुद्ध्या विज्ञानमाप्यते / इति चेत्कर्मठः प्राह तर्हीदं मम संमतम् // NBस्_१६,२८.४,६.७ //
778 SK अथ धर्मशास्त्रनिर्णयः | धर्मशास्त्रविचारेण मोक्षधर्मो महाफलः / नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते // NBस्_१६,२८.४,७.१ //
779 SK तथा च याज्ञवल्क्यः | इज्याऽऽचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् / अयमेव परो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् // NBस्_१६,२८.४,७.२ //
781 SK अथ श्रौतस्मार्त्तनिर्णयः | श्रवणं श्रौतमित्युक्तं स्मरणं स्मार्त्तमुच्यते / श्रवणं मननं चेति श्रौतस्मार्त्तविनिर्णयः // NBस्_१६,२८.४,८.१ //
782 SK श्रुतं श्रीगुरुवक्त्रेभ्यः स्मृतमेव न विस्मृतम् / श्रौतस्मार्तमिदं येषां श्रौतस्मार्त्तविदो हि ते // NBस्_१६,२८.४,८.२ //
784 SK अथाङ्गानि | शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च / ज्योतिषं च षडङ्गानि तेषामेव विनिर्णयः // NBस्_१६,२८.४,९.१ //
785 SK अथ शिक्षानिर्णयः | शुद्धो विदेहभावेन शिक्षितः शिक्षया यया / सा शिक्षा यदि न प्राप्ता शिक्षया शिक्षितं किमु // NBस्_१६,२८.४,९.२ //
787 SK अथ कल्पसूत्रनिर्णयः | कल्पानां प्रथमः कल्पो निर्विकल्पमिदं न चेत् / विकल्पसंकल्पमयैः कल्पसूत्रैः किमर्जितम् // NBस्_१६,२८.४,१०.१ //
788 SK कल्पको येन कल्पेन ब्रह्मभूयाय कल्पते / स कल्पो नैव कॢप्तश्चेत्कल्पसूत्रं निरर्थकम् // NBस्_१६,२८.४,१०.२ //
790 SK अथ व्याकरणनिर्णयः | पदव्युत्पत्तिरन्वेष्या महावाक्यार्थबुद्धये / स एव यदि न ज्ञातस्तर्हि व्याकरणेन किम् // NBस्_१६,२८.४,११.१ //
791 SK येनेदं व्याकृतं विश्वं तदेव व्याकृतं न चेत् / बृहन्नो वेत्ति यत्तर्हि तद्धि व्याकरणेन किम् // NBस्_१६,२८.४,११.२ //
792 SK यतस्तु परिनिष्पन्नैः शब्दैः शास्त्रान्मुहुर्मुहुः / हेयादेयौ न विज्ञातौ तर्हि व्याकरणेन किं // NBस्_१६,२८.४,११.३ //
794 SK अथ निरुक्तनिर्णयः निरुक्तं चिदवस्थानं निरुक्तं बोधनं चितः / तन्निरुक्तं न चेद्वेद निरुक्तस्य किमुक्तिभिः // NBस्_१६,२८.४,१२.१ //
796 SK अथ च्छन्दोनिर्णयः | तच्छन्दो यदि न ज्ञातं स्वच्छन्दो येन खेलति / यरस्तजभ्नमोपेतैश्छन्दोभिः किं प्रयोजनम् // NBस्_१६,२८.४,१३.१ //
798 SK अथ ज्यौतिषनिर्णयः | ज्योतिषा येन सूर्यादि ज्योतिर्भाति न वेत्ति तत् / यदि येन तदा तेन ज्योतिर्ग्रन्थेन किं कृतम् // NBस्_१६,२८.४,१४.१ //
800 SK अथ वेदाः | तत्रादावृग्वेदनिर्णयः | यः परानन्ददः स्वात्मा तं त्वा वयं यजामहे / इत्याहुतो न विश्वात्मा ऋचा हौत्रेण किं तदा // NBस्_१६,२८.४,१५.१ //
802 SK अथ यजुर्वेदनिर्णयः | लोहिता धवला कृष्णा प्रजाहेतुरजा यदि / नोपालब्धा ब्रह्मसत्त्रे यजुषाऽऽध्वर्यवेण किम् // NBस्_१६,२८.४,१६.१ //
804 SK अथ सामवेदनिर्णयः | छान्दोग्येनोपनिषदा प्रेमगद्गदया गिरा / साम्ना गीतं न चेद्ब्रह्म सामोद्गात्रेण किं तदा // NBस्_१६,२८.४,१७.१ //
806 SK अथाथर्वणवेदनिर्णयः | आथर्वणी ब्रह्मविद्या पिप्पलादमुखाच्च्युता / चमत्कृता न हृदये किं फलं तर्ह्यथर्वभिः // NBस्_१६,२८.४,१८.१ //
808 SK अथायुर्वेदनिर्णयः | ज्ञानामृतं न चेत्पीतममृतत्वं न साधितम् / मृत्युरेव पुनः प्राप्त आयुर्वेदो निरर्थकः // NBस्_१६,२८.४,१९.१ //
810 SK अथ धनुर्वेदनिर्णयः | प्रणवेनैव धनुषा प्रबोधेन शरेण च / लक्ष्यं ब्रह्म न चेद्विद्धं धनुर्वेदो निरर्थकः // NBस्_१६,२८.४,२०.१ //
812 SK अथ गान्धर्वनिर्णयः | आत्मा कलेन गीतेन गान्धारेण स्वरेण हि / न चेद्गन्धर्ववद्गीतो गान्धर्वेण कृतं किमु // NBस्_१६,२८.४,२१.१ //
814 SK अथार्थशास्त्रनिर्णयः | अनर्थाः सर्व एवार्थाः सदर्थः परमार्थदृक् / परमार्थो न लब्धश्चेदर्थशास्त्रं निरर्थकम् // NBस्_१६,२८.४,२२.१ //
816 SK अथ सायंसन्ध्यानिर्णयः | इत्थं ज्ञानविनोदेन वेदशास्त्रकुतूहलैः / दिवसं सकलं यातं सायंसन्ध्या समागता // NBस्_१६,२९.१ //
817 SK एवमेव कियत्कालं व्यवहारावलोकिनः / पुनः समाधौ सन्धानं सायंसन्ध्या हि सा स्मृता // NBस्_१६,२९.२ //
819 SK अथ निशाव्यवहारनिर्णयः | यातेऽथ व्यवहारनाम्नि दिवसे भुक्ते च सन्ध्यासुखे जातायां निशि निश्चलेन मनसा दत्वा कपाटार्गलाः / पीत्वा संप्रति शुद्धबोधमधुरं क्षीरं यथेष्टं युवा पर्यङ्के सुसमाधिनामनि मुहुः काञ्चिद्भुनक्ति प्रियाम् // NBस्_१६,३०.१ //
820 SK तन्वङ्गीं तरुणीं विलासरसिकां चित्ते चमत्कारिणीं जाते प्रेमणि नित्यमेव सुखदामानन्दलीलामयीम् / खेलन्तीमुरसि प्रियां निजकलामालिङ्ग्य तत्सङ्गमाद् भोगीन्द्रत्वमुपागतः सुखनिधिर्योगीन्द्रचूडामणिः // NBस्_१६,३०.२ //
822 SK अथ मुनीन्द्रदिनचर्याविचारफलनिरूपणम् | मुनीन्द्रदिनचर्येयं चिन्तनीया दिने दिने / न चिराच्चिन्तनेनास्या नरो निश्चिन्ततां व्रजेत् // NBस्_१६,३१.१ //
823 SK साध्यसाधनसंबन्धफलसंस्कारयुक्तिभिः / ज्ञातायां सम्यगेतस्यां ज्ञातव्यं नावशिष्यते // NBस्_१६,३१.२ //
824 SK मुनीन्द्रदिनचर्येयं मुनीन्द्रैरपि दुर्वचा / मम वाचालतां तत्र क्षम्यतां पार्वतीपतिः // NBस्_१६,३१.३ //
826 SK निरञ्जनपञ्चाशत्कम् यत्र प्रमाणं वेदान्ता अनुभूतिस्तथा सताम् / देवो निरञ्जनः सोऽयं बोधसारे निरूप्यते // NBस्_१७.१ //
827 SK अहमज्ञो न जानामि मामहं कोहमित्युत / अज्ञानप्रभवो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२ //
828 SK यदियं ब्रह्मविषया जीवस्य ध्येयतामतिः / स हि भ्रान्तिमयो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३ //
829 SK त्रिभिर्गुणैर्निबद्धोऽहं संसारे संसराम्यहम् / इत्याद्याः प्राकृता भावाः आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४ //
830 SK मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम् / अन्तःकरणजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.५ //
831 SK यच्च सङ्कल्प्यते पूर्वं सङ्कल्प्य च विकल्प्यते / एते मनोभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.६ //
832 SK इदमित्थमिदं नेत्थमिति निश्चीयते तु यत् / स हि बुद्धिमयो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.७ //
833 SK ज्ञत्वकर्तृत्वभोक्तृत्ववध्यघातकतादयः / अहङ्कारभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.८ //
834 SK स्मृतिः पूर्वानुभूतस्य प्रत्यभिज्ञा च तादृशी / एते चित्तभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.९ //
835 SK ये विश्वतैजसप्राज्ञा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु / अवस्थाभेदजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१० //
836 SK निद्राऽऽलस्यं प्रमादश्च परिमोहो विषादकः / एते तमोभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.११ //
837 SK शमो विवेकः सौम्यत्वं प्रकाशश्च प्रसन्नता / एते सत्त्वमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१२ //
838 SK लोभश्चञ्चलताऽक्षाणामारंभः कर्मणामपि / एते रजोभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१३ //
839 SK विधिश्च च प्रतिषेधश्च धर्माधर्मौ शुभाशुभम् / कर्तृत्वभाविता भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१४ //
840 SK कृतिः कार्यं च करणं तत्र चेष्टाः पृथग्विधाः / कर्तृत्वस्यानुगा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१५ //
841 SK शब्दः स्पर्शश्च रूपं च् रसो गन्धश्च पञ्चमः / पञ्चभूतोद्भवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१६ //
842 SK आकाशमनिलस्तेजस्तोयमुर्वी च पञ्चमी / पञ्चभूतमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१७ //
843 SK श्रोत्रं त्वङ्नयनं जिह्वा गंधग्राहश्च पञ्चमः / ज्ञानेन्द्रियमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१८ //
844 SK वाक्पाणिपादौ पायुश्च तथोपस्थश्च पञ्चमः / कर्मेन्द्रियमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.१९ //
845 SK ध्वनिर्वर्णविभेदा य आहतानाहतादयः / शब्दभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२० //
846 SK निषादऋषभगान्धारषड्जमध्यमधैवताः / स्वरभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२१ //
847 SK शीतोष्णमृदुकाठिन्यतीक्ष्णरूक्षादिभेदतः / स्पर्शभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२२ //
848 SK रक्तं पीतं सितं कृष्णं हरितं चित्रमित्यपि / रूपभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२३ //
849 SK कटुः कषायो मधुरो लवणोऽम्लश्च तिक्तकः / रसभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२४ //
850 SK चित्राः परिमलामोदसौरभासौरभादयः / गन्धभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२५ //
851 SK जरायुजाण्डजस्वेदसंभवोद्भिज्जकादयः / प्राणिभेदमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२६ //
852 SK ससुरासुरगन्धर्वयक्षरक्षोनरादयः / जीवजातिमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२७ //
853 SK शैववैष्णवसावित्रशाक्तगाणपतादयः / इष्टदैवतजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२८ //
854 SK वासिष्ठगार्ग्यशाण्डिल्यभार्गवाङ्गिरसादयः / गोत्रप्रवरजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.२९ //
855 SK पौराणिकच्छान्दसिकज्योतिर्विद्भिषगादयः / विद्यावृत्तिभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३० //
856 SK प्राच्यौदीच्यप्रतीच्याद्या दाक्षिणात्यादयः परे / यागभेदोद्भवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३१ //
857 SK चित्रकृल्लेखकस्तक्षा वाचकः पाठकः परे / क्रियाभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३२ //
858 SK हेमगौरविशालाक्षसिंहसंहननादयः / कायसौन्दर्यजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३३ //
859 SK मूकान्धपङ्गुबधिरकाणकञ्जाक्षकादयः / कायवैरूप्यजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३४ //
860 SK पातालं वसुधा स्वर्गो महस्तपो जनादयः / लोकभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३५ //
861 SK सिंहव्याघ्रवराहर्क्षहरिणप्लवगादयः / पशुभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३६ //
862 SK त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रादयः परे / धातुभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३७ //
863 SK प्राणापानसमानाश्चोदानव्यानौ च पञ्च ते / प्राणभेदभवा भवा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३८ //
864 SK नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः / उपप्राणमया भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.३९ //
865 SK ज्वरापस्मारकुष्ठानि वातपित्तकफादयः / धातुवैषम्यजा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४० //
866 SK पिङ्गलेडा सुषुम्णा च गान्धारी हस्तिकादयः / नाडीभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४१ //
867 SK उत्क्रान्तिगत्यागतयो याः स्वर्गनरकप्रदाः / लिङ्गभेदोद्भवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४२ //
868 SK ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्र इत्येवमादयः / वर्णभेदभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४३ //
869 SK ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो भिक्षुरिति क्रमात् / आश्रमप्रभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४४ //
870 SK कापालिकाः क्षपणकाः स्वेच्छाचारा दिगम्बराः / पाखण्डप्रभवा भावा आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४५ //
871 SK ममता संमता मूढैर्न मता समतास्थितैः / सोऽप्यहन्ताभवो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४६ //
872 SK अहन्ताममते धीमन्नुभे मातृसुते अपि / ते परस्परकुट्टिन्यौ तदेकामपि मा स्पृश // NBस्_१७.४७ //
873 SK सर्वे भावाः प्रलीयन्ते यस्मिन् भावे समुद्गते / सोपि बोधमयो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४८ //
874 SK यत्र बोधमयो भावो नास्ति भावे समुद्गते / स हि शून्यमयो भाव आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.४९ //
875 SK शून्याशून्ये समे यस्मिन् भावे च समतां गते / स भावस्त्वमसि प्राज्ञ आत्मा शुद्धो निरञ्जनः // NBस्_१७.५० //
876 SK निरञ्जनस्य देवस्य पञ्चाशत्कविचारतः / निरञ्जनस्य देवस्य निरञ्जनपदं व्रजेत् // NBस्_१७.५१ //
878 SK यमुनाष्टकम् उज्ज्वला मधुरा शीता पवित्रा यमुनेव चित् / विविच्य दृष्टा हि मया श्यामिका याऽत्र स भ्रमः // NBस्_१८.१ //
879 SK यत्त्वं वदसि चिद्देवी नीरूपा तूज्ज्वला कथम् / तया प्रक्षालितं पश्य निर्मलं हृदयं मम // NBस्_१८.२ //
880 SK यत्त्वं वदसि चिद्देवी नीरसा मधुरा कथम् / आस्वादयन्ति तां नित्यं रसिकाः शङ्करादयः // NBस्_१८.३ //
881 SK यत्त्वं वदसि चिद्देवी निःस्पर्शा शीतला कथम् / पश्य तस्याः प्रसादेन गतं तापत्रयं मम // NBस्_१८.४ //
882 SK यत्त्वं वदसि चिद्देवी निर्गुणा पावनी कथम् / तत्पवित्रीकृतान्पश्य कचदत्तशुकादिकान् // NBस्_१८.५ //
883 SK अथ शिष्यः पृच्छति गुरो लाक्षणिकैरेव किं लक्षयसि लक्षणैः / लक्षणैर्लक्षय स्वामिंस्तल्लक्ष्यं लक्ष्यते यथा // NBस्_१८.६ //
884 SK अत्रोत्तरम् लक्ष्ये लक्षणवल्लक्ष्यमिह लक्ष्ये न लक्षणम् / विलक्षणमिदं लक्ष्यं लक्षणैवात्र लक्षणम् // NBस्_१८.७ //
885 SK पयस्यमलगम्भीरे श्यामिका भ्रान्तिरूपिणी / ब्रह्मण्यमलगम्भीरेऽप्यविद्या भ्रान्तिरूपिणी // NBस्_१८.८ //
887 SK शिलाषट्कम् अनन्तकोटिचन्द्राणां चन्द्रिकाभिः कृता किमु / आह्लादरूपिणी दृष्टा मया धेनुः शिलामयी // NBस्_१९.१ //
888 SK न धावति न हन्त्येव न खादति पिबत्यपि / स्वभावनिर्मला सेयं हृष्टिपुष्टिमती स्थिता // NBस्_१९.२ //
889 SK रोमरेखासु विभ्रान्तास्तस्या ब्रह्माण्डकोटयः / अपर्यन्ता स्थिता धेनुः सा काश्मीरशिलामयी // NBस्_१९.३ //
890 SK आयान्ति यान्ति धावन्ति नृत्यन्ति च हसन्ति च / प्रतिबिम्बा जीवरूपास्तस्याः सा तु यथा स्थिता // NBस्_१९.४ //
891 SK नीरसाऽपि सुधामिष्टा निर्गुणाऽपि प्रिया सताम् / नीरूपाऽप्यतिकान्ता सा मया दृष्टा न तु श्रुता // NBस्_१९.५ //
892 SK स्रवन्तीममृतं नित्यं जिह्वया ब्रह्मविद्यया / वत्सः शिलामयो भूत्वा पिब धेनुं शिलामयीम् // NBस्_१९.६ //
894 SK निद्रापञ्चकम् न सन्ति यस्यां निद्रायां जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः / अवस्थात्रयरूपिण्यः सर्वद्वन्द्वविवर्जनात् // NBस्_२०.१ //
895 SK गुणातीततया तत्र तमोलेशो न विद्यते / स्वयंप्रकाशरूपत्वादप्रकाशोऽपि नास्ति हि // NBस्_२०.२ //
896 SK यत्प्राप्तये महापुण्यास्तपस्यन्ति तपस्विनः / विचारयन्ति विद्वांसो वेदान्तवचनानि च // NBस्_२०.३ //
897 SK सुखभोगः फलं नात्र सैवानन्दस्वरूपिणी / पुरुषार्थस्वरूपत्वान्न कालक्षेपरूपिणी // NBस्_२०.४ //
898 SK सुलभा शुद्धबोधानां दुर्लभा विषयात्मनाम् / सहजा माधवादीनां सा निद्रा तु महाफलम् // NBस्_२०.५ //
900 SK अनुभवनवकम् स्वानन्दबोधगुरुभिर्गुरुभिर्निरुक्तं स्वानन्दबोधघनमेव मम स्वरूपम् / स्वानन्दबोधघनया कलया कया चित् स्वानन्दबोधघनमेव मयाऽनुभूतम् // NBस्_२१.१ //
901 SK श्रद्धाभक्तिभृतां विशेषविदुषां शिक्षावतां योगिनां मिथ्यावस्तुनि वस्तुतां विजहतां त्यागे गते गाढताम् / सत्ये सत्यतया स्फुरत्यविरतं चित्ते चमत्कारिणि स्वैरं स्फूर्जति निर्विकल्पपरमानन्दस्वरूपो हरिः // NBस्_२१.२ //
902 SK तृष्णां संहर संहरेन्द्रियचयं संहृत्य सर्वाः क्रियाश् चेतः संहर संहरान्यधिषणां खादप्यणुस्त्वं भव / अन्तः संप्रविशात्मधामनि मनागासादिते तत्पदे सर्वाज्ञानकपाटभञ्जनपटुर्भावः स्थिरः स्थास्यति // NBस्_२१.३ //
903 SK किं मां पृच्छसि सादरेण मनसा साधो समाधिक्रमं नूनं निर्गतमेव मोहतिमिरं जातः प्रकाशो महान् / आत्मस्नेहघनां दशामुपगते बोधप्रदीपे मयि द्रागुड्डीय पतन्ति वृत्तिनिवहा नष्टुं पतङ्गा इव // NBस्_२१.४ //
904 SK गाढं वाऽस्तु विलीनमस्तु न घृतं साधो घृतत्वाद्गतं चैतन्यस्य चमत्कृतिः किल तथा चित्तं तदेवाद्वयम् / तस्माच्चित्तलयस्य साधनमसौ तत्त्वे तु साक्षात्कृते प्रत्याहारपरिश्रमोऽपि स मया संत्यक्त एवाधुना // NBस्_२१.५ //
905 SK जाते विद्वदनुग्रहेण सहजानन्दागमे साधकैर् औदास्येन यथा यथा परिहृतः कष्टः स योगोद्यमः / आश्चर्यं न मनीषिताऽपि निबिडा निद्रा यथेयं बलाद् आयात्येव तथा तथा मुनिमतो गाढः समाधिक्रमः // NBस्_२१.६ //
906 SK ध्यानामृतार्णवनिमग्नसमस्तमूर्त्त्या तन्व्या धिया निगमिते निगमान्ततत्त्वे / आलोकितेष्वथ तटस्थधियाऽखिलेषु भावेषु बोधघनता सहजाऽभ्युपैति // NBस्_२१.७ //
907 SK एषा मधुमती विद्या सर्वत्र मधुदर्शनात् / स्वशरीरार्कवृक्षेऽपि दृष्टं यत्पुष्कलं मधु // NBस्_२१.८ //
908 SK विष्णोर्मे दर्शनं भूयादेवमासीन्मनोरथः / इदानीं कृपया विष्णोः सर्वं विष्णुमयं जगत् // NBस्_२१.९ //
910 SK विद्वत्प्रभावनवकम् अभावो यत्र भावानां स भावो यत्र वर्णितः / स्वभावसुखदं तात प्रभावनवकं शृणु // NBस्_२२.१ //
911 SK अयं विहाय कामादीन्क्षुद्रान्दूरगतो मुनिः / पश्यत्यपि कदाचित्तान्न चैनं प्राप्नुवन्ति ते // NBस्_२२.२ //
912 SK न यान्ति नूनं तज्ज्ञस्य सम्मुखे द्वैतदृष्टयः / दुष्टा दुष्टतया ज्ञाता दर्शयन्ति मुखं कथम् // NBस्_२२.३ //
913 SK माया मायेति विज्ञाता सर्वाकारविकारिणी / गता कुत्राप्यनावृत्यै संस्थितो निर्मलो मुनिः // NBस्_२२.४ //
914 SK निर्जिता विषया नूनं चपेटाभिश्च ताडिताः / नोपसर्पन्ति ते तस्मादस्मानेष हनिष्यति // NBस्_२२.५ //
915 SK तृष्णां विहाय तुच्छेभ्यो मुनिर्निःशल्यतां गतः / स्वरसायनतृप्तात्मा दिनानुदिनमेधते // NBस्_२२.६ //
916 SK पूर्वां मां वल्लभां त्यक्त्वा रमते विद्ययाऽधुना / इत्यविद्या लज्जितेव नायाति मम संमुखम् // NBस्_२२.७ //
917 SK ब्रह्म वक्तुं न जानाति यथाऽत्यन्तजडो जनः / तथैवात्यन्तबोधात्मा ब्रह्म वक्तुं न बुध्यते // NBस्_२२.८ //
918 SK नूनमालस्यदोषो हि शक्रस्यापि श्रियं हरेत् / यथा यथाऽलसो ज्ञानी वर्धतेऽसौ तथा तथा // NBस्_२२.९ //
920 SK निर्वाणदशकम् न शक्यं वक्तुमेवेदं तथापि कृपया तव / कया चित्कलया वत्स निर्वाणदशकं ब्रुवे // NBस्_२३.१ //
921 SK मोहनिद्रा न तत्रास्ति तेनायं जागरो महान् / भावादयो न भासन्ते तेनायं नैव जागरः // NBस्_२३.२ //
922 SK अपूर्वं भासते वस्तु तेन स्वप्नोऽयमुत्तमः / दृश्यं न भासते तत्र तेन स्वप्नो न चैव सः // NBस्_२३.३ //
923 SK अभावात्सा पदार्थानां सुषुतिः सुखरूपिणी / न जाड्यं न तमस्तत्र सुषुप्तिरपि नैव सा // NBस्_२३.४ //
924 SK अवस्थात्रयनिर्मुक्तं तुरीयमिति कीर्तितम् / नैवैकद्वित्रिविज्ञानं तुरीयं किमपेक्षया // NBस्_२३.५ //
925 SK जीवस्यैतन्निजं रूपं तेन जीवोऽयमुच्यते / जीवचेष्टा न तत्रास्ति तेन निर्जीवता स्फुटा // NBस्_२३.६ //
926 SK सच्चिदानन्दरूपत्वाद्ब्रह्म चेन्नापि तद्भवेत् / यो वेद स तु न ब्रूते यो न वेद गिराऽस्य किम् // NBस्_२३.७ //
927 SK तस्माच्छ्रुतिः प्राह सत्यमवाङ्मनसगोचरम् / यथाऽनुभूतं मुनिभिस्तथैवेदं न संशयः // NBस्_२३.८ //
928 SK एतदन्तः समाम्नाय एतदन्ता तपस्विता / उपदेशोऽप्येतदन्त एतदन्ता विवेकिता // NBस्_२३.९ //
929 SK श्रोतव्यं श्रुतिवाक्येन सर्वं ब्रह्म त्वया श्रुतम् / भवितव्यं यदि ब्रह्म तर्हि ब्रह्मैव भूयताम् // NBस्_२३.१० //
931 SK बोधदीपपञ्चकम् नाधारपात्रमादत्ते न च तैलमपेक्षते / न वर्तिकामाश्रयते न धत्ते कज्जलं मनाक् // NBस्_२४.१ //
932 SK न तापकर्त्ता कस्यापि वायुना न च कम्पते / न विनाशमवाप्नोति तमः सर्वं निहन्ति च // NBस्_२४.२ //
933 SK एकरूपाः प्रकाशन्ते सर्वे भावा यदर्चिषा / यदग्रे न प्रकाशेत च्छाया मायास्वरूपिणी // NBस्_२४.३ //
934 SK यश्चक्षुषामविषयो रूपाकारविवर्जितः / मनसोऽप्यप्रकाश्यश्च रूपाकारप्रकाशकः // NBस्_२४.४ //
935 SK कदाचित्क्वचिदेवासौ तात केनापि हेतुना / प्रवर्तते बोधदीपः सतां हृदयमन्दिरे // NBस्_२४.५ //
937 SK उपदेशषोडशी युक्त्यैव वृत्तिभिः पूर्णं रिक्तीकुरु मनोघटम् / न कश्चिद्भविता तात ब्रह्मणा पूरणे श्रमः // NBस्_२५.१ //
938 SK त्यज चिन्तां महाबुद्धे भज निश्चिन्ततासुखम् / त्वयाऽर्जितामिमां चिन्तां वद कोऽन्यः परित्यजेत् // NBस्_२५.२ //
939 SK चिन्तनीयं त्वया वस्तु चिन्तारोगस्य भेषजम् / अथवा तात चिन्ताऽऽख्यं रोगमेव परित्यज // NBस्_२५.३ //
940 SK वर्धिता वर्धते चिन्ता त्यक्ता नश्यति सत्त्वरम् / ईदृशेनापि रोगेण दुर्धियो मरणं गताः // NBस्_२५.४ //
941 SK कर्कशा कलहा कृत्या वन्ध्या नित्यममङ्गला / त्यज्यतां कामना चण्डी भुज्यतां मुक्तिसुन्दरी // NBस्_२५.५ //
942 SK जनैः पण्डित इत्युक्तः प्राप्नोषि परमं सुखम् / मनसा कर्मणा वाचा भव पण्डित एव तत् // NBस्_२५.६ //
943 SK नित्यमेव स्फुरद्रूपो ननु त्वं चित्स्वरूपतः / स्फूर्त्तिमूर्त्तेस्तवैवेयं काचित्स्फूर्त्तिरिदं जगत् // NBस्_२५.७ //
944 SK भास्वतो मम भामात्रमिति ज्ञाते भ्रमे गते / क्व द्वितीयं क्व संसारः क्व माया तत्कृतं किमु // NBस्_२५.८ //
945 SK ज्ञत्वं कर्तृत्वभोक्तृत्वे जडचैतन्यदृष्टयः / स्फुरणानि स्वकीयानि मणिर्भूत्वा विलोकय // NBस्_२५.९ //
946 SK परस्परमविज्ञाता जाग्रत्स्वप्नसुप्तयः / त्वया तिस्रः स्त्रियो भुक्तास्तुरीयां सुन्दरीं भज // NBस्_२५.१० //
947 SK जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तानि पुनस्तानि त्वमीक्षसे / तुरीयं तव धामैव न तत्किमिति पश्यसि // NBस्_२५.११ //
948 SK मा धाव सुखहेतोस्त्वं धावतां न सुखं सखे / सुखरूपे निजे रूपे सुखं तिष्ठ सुखी भव // NBस्_२५.१२ //
949 SK अत्र श्लोकाः | वरयोग्याऽसि कल्याणि न स्थास्यसि वरं विना / वरणीयो वरस्तादृग्यो भवेदजरामरः // NBस्_२५.१३ //
950 SK न शृणोषि वरं यावत्तावत्ते कम्पते मनः / पश्चान्महोत्सवैर्भद्रे स्वामिनं त्वं वरिष्यसि // NBस्_२५.१४ //
951 SK परेण पुरुषेणाद्य रमस्व वचनान्मम / सखि पश्चात्स्वतश्चित्तं कुरु यत्राधिकं सुखम् // NBस्_२५.१५ //
952 SK यातं दिनं न पुनरेति नवं वयस्ते लज्जां विहाय भज तं रमणीयरूपम् / बाले परः पुरुष एष यदा समेतः स्वर्गेण किं किमु तदा नृसुखेन वा ते // NBस्_२५.१६ //
954 SK ब्रह्मचर्चाविंशतिः अर्चालक्षाऽधिका प्रोक्ता चर्चैव परमात्मनः / अतः शिष्यप्रबोधाय ब्रह्मचर्चा निरूप्यते // NBस्_२६.१ //
955 SK आधारः सर्वभूतानां तस्याधारो न कश्चन / निराधारस्वरूपं चेन्नास्ति ब्रह्म तदा क्वचित् // NBस्_२६.२ //
956 SK अधिष्ठानं विना कार्यं न तिष्ठति कदाचन / सर्वाधिष्ठानरूपं हि कथं ब्रह्म न कुत्रचित् // NBस्_२६.३ //
957 SK सर्वस्मात्तत्पृथग्ब्रह्म त्विति वक्तुं न शक्यते / यदात्मकमिदं सर्वं सर्वस्मात्तत्पृथक्कथम् // NBस्_२६.४ //
958 SK सर्वस्मादपृथग्ब्रह्म वक्तुमित्यपि नार्हसि / सर्वस्मात्पृथगेवेदमनुभूतं महर्षिभिः // NBस्_२६.५ //
959 SK आत्मरूपमिदं वाच्यमिति तर्कस्त्वया कृतः / अनात्मरूपं किं न्वस्ति स्वात्मरूपं यतस्त्विदम् // NBस्_२६.६ //
960 SK ज्ञानस्य ब्रह्म विषय इति वक्तुं न शक्यते / ज्ञानस्वरूपं तद्ब्रह्म ज्ञानस्य विषयः कथम् // NBस्_२६.७ //
961 SK ज्ञानस्वरूपमेवास्तु ब्रह्मेति यदि मन्यसे / ज्ञेयमेव न यत्रास्ति ज्ञानत्वं तस्य कीदृशम् // NBस्_२६.८ //
962 SK ज्ञातृस्वरूपमेवास्तु ब्रह्मेति यदि कल्प्यते / स्वयंप्रकाशरूपे हि ज्ञानस्याश्रयता कथम् // NBस्_२६.९ //
963 SK सर्वरूपमिदं ब्रह्म वक्तुं कः शक्नुयादिति / सदैकरूपमेवेदं यतः शाश्वतमुच्यते // NBस्_२६.१० //
964 SK एकरूपमिदं ब्रह्म न वक्तुमिति शक्यते / निर्गुणं तत्परं ब्रह्म स्यादेकत्वं यतो गुणः // NBस्_२६.११ //
965 SK निर्गुणं तत्परं ब्रह्म नूनमेतदसांप्रतम् / अनन्तेनैव गीयन्ते ह्यनन्ता एव तद्गुणाः // NBस्_२६.१२ //
966 SK ब्रह्म नास्तीति को ब्रूयाद्भातीदं यस्य सत्त्वतः / तर्ह्यस्ति ब्रह्मेत्यपि नो नातः सत्ता पृथग्यतः // NBस्_२६.१३ //
967 SK अस्वरूपमिदं ब्रह्म विद्वानिति कथं वदेत् / स्वस्वरूपमिदं ब्रह्म प्रत्यक्षमनुभूयते // NBस्_२६.१४ //
968 SK स्वस्वरूपमिदं ब्रह्म चेदित्यप्ययथातथम् / तत्र को नु स्वशब्दार्थो यत्स्वरूपमिदं भवेत् // NBस्_२६.१५ //
969 SK परव्यावर्त्तकं स्वत्वमिति चेत्तर्हि तद्वद / यत्र स्वपरभावो न ब्रह्म किं तत्र नास्ति हि // NBस्_२६.१६ //
970 SK अहमेव परं ब्रह्म ब्रह्माहमिति च श्रुतेः / कथं भवेदहं ब्रह्माहन्ता यत्र न विद्यते // NBस्_२६.१७ //
971 SK त्वमेव तत्परं ब्रह्म त्वं ब्रह्मेति श्रुतिर्जगौ / त्वमेव तत्कथं ब्रह्म त्वंता यत्र न वर्त्तते // NBस्_२६.१८ //
972 SK तद्ब्रह्मेति श्रुतेर्वक्तुं तद्ब्रह्मेति न शक्यते / अत्यन्ताव्यवधाने हि परोक्षमिव तत्कथम् // NBस्_२६.१९ //
973 SK नष्टायां मोहनिद्रायां गलिते मानसे मुनेः / यच्छिष्टं तत्परं ब्रह्म मनोवाचामगोचरम् // NBस्_२६.२० //
974 SK चर्चितुं योग्यया भूयस्त्वनया चर्चया बुधाः / चर्चयन्तु परं ब्रह्म तुष्यन्तु च रमन्तु च // NBस्_२६.२१ //
976 SK स्वेच्छाचारचतुष्टयी श्रोतव्या श्रीमता साधो नूनमेकाग्रचेतसा / परमार्थस्य सर्वस्वं स्वेच्छाचारचतुष्टयी // NBस्_२७.१ //
977 SK निजं पतिं परित्यज्य गृहस्थैव प्रपञ्चती / पत्या परेण रमते चतुराख्याऽअभिचारिणी // NBस्_२७.२ //
978 SK अहङ्कारं पृथक्कृत्य तुर्यबुद्धिर्दिने दिने / पत्या परेण रमते पुंश्चली परसङ्गिनी // NBस्_२७.३ //
979 SK पश्चात्तु स्त्रीजितः सोऽपि प्रतिकर्तुमनीश्वरः / अस्याः सम्भोगवेलायां गृहं सन्त्यज्य गच्छति // NBस्_२७.४ //
980 SK ईदृशे व्यवहारे तु दाम्पत्यं वद कीदृशम् / दिनैः कतिपयैरेव स्वेछाचारः प्रवर्त्तते // NBस्_२७.५ //
981 SK स्वानुभवानां सत्यपि बाधिताहन्कारे समाधिभङ्गो नास्तीत्यर्थः // NBस्_२७.६ //
983 SK अहंकारस्याबाधकत्वप्रदर्शनत्रयी भित्तिचित्रकृतं सर्पं दृष्ट्वा बालः पलायते / केनचिद्बालकेनोक्तं चित्रसर्पोऽयमित्युत // NBस्_२८.१ //
984 SK ततः प्रभृत्यसौ विद्वांस्तेनैव सह खेलति / तथाऽऽत्मस्थमहंकारं श्रुत्वा मूढः पलायते // NBस्_२८.२ //
985 SK तत्र सद्गुरुणा प्रोक्तं चिदेवास्तीह नेतरत् / ततः प्रभृत्यसौ विद्वांस्तेनैव सह खेलति // NBस्_२८.३ //
987 SK प्रश्नोत्तरमुक्ताफलद्वयम् तत्र विषयवासनोवाच | अहिक्रीडा न कर्त्तव्या कर्त्तव्यं नात्मचिन्तनम् / अहो जीव महामूढ मरणं ते भविष्यति // NBस्_२९.१ //
988 SK स जीव उवाच | अहिनानेन ये दष्टा अमरत्वं गता हि ते / अस्याऽमृतमयी दंष्ट्रा तत्क्रीडाम्यमुनाऽहिना // NBस्_२९.२ //
990 SK प्रश्नोत्तरचमत्कारत्रयी यथापूर्वं न खेलन्ति यथापूर्वं हसन्ति न / कैश्चित्कामादयः पृष्टाः भवन्तः किं हतप्रभाः // NBस्_३०.१ //
991 SK कामादय ऊचुः | अस्मान्पुष्णाति या नित्यं साऽस्माकं जननी मृता / सुखलुब्धेन पित्रा नः काचिदन्या कृता वधूः // NBस्_३०.२ //
992 SK अस्मान्द्विष्यति सा नित्यं न पुष्णाति कदाचन / दिनैः कतिपयैरेव गृहत्यागो भविष्यति // NBस्_३०.३ //
994 SK स्तनपानलीलाष्टकम् श्रीगुरुरुवाच | उपमाता च माता च बाल मातृद्वयं हि ते / उपमातुः स्तनरसः कट्वम्लमधुतिक्तकः // NBस्_३१.१ //
995 SK जरामरणसंसर्गी चित्रद्वैतरसात्मकः / निजमाता तव तु या तन्माहात्म्यं वदाम्यहम् // NBस्_३१.२ //
996 SK सैव माता पिता सैव जगतामीश्वरी च सा / सा गतिः सा परं तत्त्वं तत्परं नास्ति किञ्चन // NBस्_३१.३ //
997 SK उपमाता कुजातिस्ते माता तव सुजातिका / तां कुजातिं परित्यज्य सुजातिं मातरं श्रय // NBस्_३१.४ //
998 SK निजमातुस्स्तनरसस्त्वद्वैतामृतवर्षणः / जन्मरोगजराध्वंसी सकृत्पीतोऽपि मृत्युजित् // NBस्_३१.५ //
999 SK न ज्ञातं मूढभावेन पूर्वमन्तरमेतयोः / इदानीमन्तरं ज्ञात्वा निजमातुस्स्तनं पिब // NBस्_३१.६ //
1000 SK त्वया स्तने परित्यक्ते सा विदीर्य म्रियेत चेत् / नश्येत्कुजातिसंसर्गो हितमेव तदा भवेत् // NBस्_३१.७ //
1001 SK मायाब्रह्ममयस्तात किमर्थं वर्णसंकरः / मायामेव परित्यज्य शुद्धब्रह्ममयो भव // NBस्_३१.८ //
1003 SK आश्चर्यचतुष्टयी अन्धः पश्यति सर्वं च पङ्गुर्याति पुरात्पुरम् / जडः कार्याणि कुरुते नीरसो रसमश्नुते // NBस्_३२.१ //
1004 SK निश्चेता निश्चिनोत्यन्तं विरक्तो भोगमञ्चति / सर्वस्पर्शविहीनोऽपि ब्रह्मसंस्पर्शमश्नुते // NBस्_३२.२ //
1005 SK सर्वाहारी निराहारमुदरे धारयत्ययम् / मुग्धो भुनक्ति पाण्डित्यं सिद्धान्तं वक्ति मौनवान् // NBस्_३२.३ //
1006 SK निर्वैरो जयमाप्नोति निष्कामः पूर्णकामताम् / सुप्तो जागर्त्ति विज्ञानी मृतोऽप्यमृतमश्नुते // NBस्_३२.४ //
1008 SK तुरीयतुलसीपत्रपूजा तुरीयतुलसीपत्रैर्विष्णुपूजा निरूप्यते / प्रेमप्रधानभावेन शृङ्गाररसरूपिणी// NBस्_३३.१ //
1009 SK तत्र गोपीवाक्यम् दृष्ट्या मया मधुरया कलितोऽधुनाऽयं यत्कामिनीजनमनोहरणो मुकुन्दः / तं चिन्तयामि हृदये न सुखं गृहेऽस्मिंस् तस्मिन्वने भवतु तेन सहैव वासः // NBस्_३३.२ //
1010 SK गोपालिकाऽस्मि चतुरा न च मे मनीषा देहश्रिता विविधगोरसवासना मे / किम्वा विधेयमिति चिन्तयती स्थिताऽहं तावद्बलान्मिलित एव मया मुकुन्दः // NBस्_३३.३ //
1011 SK एकाकिनी बत गताऽस्मि वने निशीथे कुञ्जे निलीय रमणस्य रसो गृहीतः / चित्रं भजामि कलयामि न तत्र हेतुं सर्वाः प्रसन्नवदना यदिमा वयस्याः // NBस्_३३.४ //
1012 SK किं वर्णयामि पुरतः किल कस्य वर्ण्यं किं वर्णितेन सखि वर्णयितुं न शक्यम् / अङ्गानि मे विगलितानि सहैव नीव्या दष्टेऽधरे रतिरसे रतिनायकेन // NBस्_३३.५ //
1013 SK नन्वेतदेव सुकृतं फलितं मदीयं यत्कामिनीषु रसलंपट एष कृष्णः / लक्ष्मीपतेरितरथा न भवेदकस्माद् अस्मासु गोपवनितासु कथाप्रसङ्गः // NBस्_३३.६ //
1014 SK तुरीयतुलसीपत्रैर्वनमाली सुपूजितः / अस्मिन्वने महामिष्टं यत्फलं तत्प्रयच्छति // NBस्_३३.७ //
1016 SK हेतुमालाहीरावली श्रुतिप्रामाण्यसिद्धेऽर्थे हेतुभिः किं तथापि हि / अपूर्वरचनात्मत्वादलङ्कारो महान्यतः // NBस्_३४.१ //
1017 SK जन्म नामासतः सत्ता जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / सद्रूपतामेव गतस्तेन जन्म न विद्यते // NBस्_३४.२ //
1018 SK प्राप्तवानमृतं ब्रह्म जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / अमृतं येन संप्राप्तं स मृतत्वं कथं व्रजेत् // NBस्_३४.३ //
1019 SK मृतिः शरीरसंत्यागो जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / शरीरं त्यक्तवान्पूर्वं मृतस्य मरणं किमु // NBस्_३४.४ //
1020 SK अहन्तया सहैवायं जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / कर्त्तृत्वमत्यजत्तस्मात्कर्मभिर्न स लिप्यते // NBस्_३४.५ //
1021 SK स्वयमेव पवित्रात्मा जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / न च पुण्यैः पवित्रोऽसौ तेन पुण्यैर्न लिप्यते // NBस्_३४.६ //
1022 SK अत्यन्तशुद्धरूपोऽसौ जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / तत्करोति पवित्रं यत्तेन पापैर्न लिप्यते // NBस्_३४.७ //
1023 SK सहजानन्दरूपत्वाज्जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / येन हृष्यति तन्नास्ति तस्मादेष न हृष्यति // NBस्_३४.८ //
1024 SK नापकर्त्तुं क्षमः कश्चिज्जातसाक्षात्कृतेर्भवेत् / अपकर्त्तुरभावेन स तु न द्वेष्टि कंचन // NBस्_३४.९ //
1025 SK अप्राप्यमवशिष्टं किं जातसाक्षात्कृतेर्मुनेः / हानिर्नास्ति ततो हेतोर्न शोचति कदाचन // NBस्_३४.१० //
1026 SK केनाप्येष प्रकारेण जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / ब्रह्म सर्वात्मकं प्राप्य न काङ्क्षति किमप्युत // NBस्_३४.११ //
1027 SK न ह्यन्यो बलवान्कश्चिज्जातसाक्षात्कृतेर्भवेत् / यस्माद्बिभेति तन्नास्ति तस्मादेष बिभेति न // NBस्_३४.१२ //
1028 SK यदस्य कार्यं परमं जातसाक्षात्कृतेर्भवेत् / तत्सर्वमेव संसिद्धं न तस्मात्स विषीदति // NBस्_३४.१३ //
1029 SK मान्यस्तु पद्मजादीनां जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / मानितो यदि लोकेन स तु मानं न विन्दति // NBस्_३४.१४ //
1030 SK मान्य एव सुरेन्द्राणां जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / न मानितो यदि जनैरपमानं न विन्दति // NBस्_३४.१५ //
1031 SK उपकारापकारौ हि जातसाक्षात्कृतेर्मुनेः / शक्यौ न केनचित्कर्तुं तुल्यो मित्रारिपक्षयोः // NBस्_३४.१६ //
1032 SK गुणदोषदशाऽतीतं जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / प्राप्तवान्परमं धाम तुल्यनिन्दास्तुतिर्हि सः // NBस्_३४.१७ //
1033 SK गेहादिममता नास्ति जातसाक्षात्कृतेर्मुनेः / तेनानिकेत इत्युक्तो यत्रसायंगृहो मुनिः // NBस्_३४.१८ //
1034 SK अप्राप्तं प्राप्तवान्बोधं जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / स तु न क्षीयते तेन निर्योगक्षेम आत्मवान् // NBस्_३४.१९ //
1035 SK समो यद्यपि सर्वत्र जातसाक्षात्कृतिर्मुनिः / तथापि तत्स्तावकस्य मम स्तुतिफलं महत् // NBस्_३४.२० //
1036 SK हेतुमालामयी धार्या कण्ठे हीरावली बुधैः / अपूर्वरचनात्मत्वादलङ्कारो महान्यतः // NBस्_३४.२१ //
1038 SK कैवल्यकुञ्चिका कैवल्यकुञ्चिकां तात त्वं सम्यगवधारय / उद्घाटय कपाटं च बोधरत्नं करे कुरु // NBस्_३५.१ //
1039 SK दृष्ट्या श्रुत्याऽनुभूत्या वा यो यो भावः परिस्फुरेत् / तं भावमविलम्बेन पञ्चधा शकलीकुरु // NBस्_३५.२ //
1040 SK अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् / आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं मायारूपं ततो द्वयम् // NBस्_३५.३ //
1041 SK नामरूपे तु नैव स्तस्तत्र हेतुं वदाम्यहम् / नाम तु व्यवहारार्थं कल्पितं न तु वास्तवम् // NBस्_३५.४ //
1042 SK घटो न घो नापि च टस्तावुभौ यत्खमाश्रितौ / घः कण्ठ्यष्टश्च मूर्धन्यस्तावुभावपि नैकदा // NBस्_३५.५ //
1043 SK एवं नामानि सर्वाणि रूपमङ्ग विचारय / घटस्तु पृथिवीरूपं सा जडा जलरूपिणी // NBस्_३५.६ //
1044 SK तेजसो जलमुत्पन्नं तद्वायोः स च खोद्भवः / खादि सर्वमहङ्कारात्स च प्रकृतिसम्भवः // NBस्_३५.७ //
1045 SK गुणात्मा प्रकृतिर्माया मायामय्येव नास्ति सा / नामरूपे ततो न स्तोऽथास्तीत्यादि विचारय // NBस्_३५.८ //
1046 SK अस्ति सत्ता भाति चिच्च प्रियमानन्दलक्षणम् / सच्चिदानन्दरूपं तत्कैवल्यमवशिष्यते // NBस्_३५.९ //
1047 SK समाधिस्तत्र कर्त्तव्यो ह्ययमर्थानुवेधितः / अथ शब्दानुविद्धं तु समाधिं कथयामि ते // NBस्_३५.१० //
1048 SK नित्य एवास्मि शुद्धोऽस्मि चिद्रूपोऽस्मि निरन्तरः / सहजानन्दरूपोऽस्मि न मे माया न मे मलः // NBस्_३५.११ //
1049 SK अस्मिन्नसति सत्ता हि चिद्रूपेण मयार्पिता / उपसंहृत्य सत्तां तां स्वसत्तायामहं स्थितः // NBस्_३५.१२ //
1050 SK विकृत्या विकृतिर्नाहं प्रकृत्या प्रकृतिर्न च / तथापि जातं मयि चेत्तर्हि जातमजातवत् // NBस्_३५.१३ //
1051 SK उपसंहर विश्वात्मन्निति यावद्वदाम्यहम् / उपसंहृतमेवेदं दृश्यते नैव तिष्ठति // NBस्_३५.१४ //
1052 SK इत्याद्युपनिषद्वाक्यपदतात्पर्यचिन्तया / शब्दानुविद्धनामा हि समाधिर्जायते मुनेः // NBस्_३५.१५ //
1053 SK अर्थानुवेधितस्तूक्तस्ततः शब्दानुवेधितः / तावुभौ सम्यगभ्यस्य विशेन्निरनुवेधितम् // NBस्_३५.१६ //
1054 SK शर्कराद्वितयं धृत्वा प्रणवो लिख्यते यथा / समाधिद्वितयं धृत्वा प्रणवार्थोऽपि लिख्यताम् // NBस्_३५.१७ //
1055 SK पटोः प्रणवलेखेषु ते हि नावश्यके यथा / समाधिद्वितयं तद्वत्प्रणवार्थपटोरपि // NBस्_३५.१८ //
1056 SK निर्विकल्पसमाधाने निष्ठा सा बोधयोगिनः / कपाटोद्धाटने हेतुरियं कैवल्यकुञ्चिका // NBस्_३५.१९ //
1057 SK रहस्यं हि रहस्यानां निधीनां परमो निधिः / युक्तीनां परमा युक्तिरियं कैवल्यकुञ्चिका // NBस्_३५.२० //
1058 SK वसिष्ठव्यासपद्धत्या शङ्कराचार्यमार्गतः / सा पुनः शङ्कराचार्यैः करुणारसनिर्भरैः // NBस्_३५.२१ //
1059 SK अर्पितानन्दबोधेभ्यस्तक्रमेण बुधैर्धृता / अवधार्या विशेषण सेयं कैवल्यकुञ्चिका // NBस्_३५.२२ //
1061 SK बुद्धिप्रशंसा व्यवहारस्य सर्वस्य बुद्धिर्मूलं यथा भवेत् / तद्वत्तु परमार्थस्य निदानं बुद्धिरेव हि // NBस्_३६.१ //
1062 SK यद्बुद्धमप्यबुद्धं तद्बुद्ध्या बुद्धं न चेत्तदा / बुद्ध्या बुद्धं तु यद्बुद्धं तन्नाबुद्धं कदापि च // NBस्_३६.२ //
1063 SK बुद्ध्या न बुद्धो यो बोधो द्वैतबोधबुधैरपि / बुद्ध्या बुद्धमिमं विद्धि बुद्धिसाक्षितया बुधैः // NBस्_३६.३ //
1064 SK न बुद्धमपि यद्बुद्धं यच्च बुद्धमबुद्धवत् / बुद्धाबुद्धसमं बुद्ध्या बुद्ध्वाबुद्धविलक्षणम् // NBस्_३६.४ //
1066 SK रङ्गलीलात्रयी रञ्जितं रञ्जनैश्चित्रैश्चित्रं जातं हृदम्बरम् / रङ्गे निरञ्जने क्षिप्तं रङ्गं प्राप्तं निरञ्जनम् // NBस्_३७.१ //
1067 SK रङ्गं निरञ्जनं प्राप्तमिदानीं तु हृदम्बरम् / रञ्जितं रञ्जनैश्चित्रैरपि रङ्गं बिभर्ति न // NBस्_३७.२ //
1068 SK रङ्गलीलाद्वयीमेतां तात चित्तेऽवधारय / रङ्गं परीक्षय धिया साञ्जनं च निरञ्जनम् // NBस्_३७.३ //
1070 SK चन्द्रिकाचन्द्रचमत्कारचतुष्टयी अचन्द्रे चन्द्रिका नास्ति न चन्द्रश्चन्द्रिकां विना / चन्द्रिकाचन्द्रसंयोगः कथं वा विनिवार्यताम् // NBस्_३८.१ //
1071 SK विस्मृत्या चन्द्रिका नाप्ता स्मृत्याऽऽप्तेव तु चन्द्रिका / चन्द्रिकाचन्द्रतादात्म्यं केनाहो विनिवारितम् // NBस्_३८.२ //
1072 SK त्वयाऽनुभूतमेवास्ति चन्द्रिकाचन्द्रकौतुकम् / दृष्टान्तदर्शनायाङ्ग पुनस्तत्प्रकटीकृतम् // NBस्_३८.३ //
1073 SK तावती चन्द्रिका प्रोक्ता यावानेव हि चन्द्रमाः / अनाद्यन्तस्तु चन्द्रोऽयमनाद्यन्ताऽस्य चन्द्रिका // NBस्_३८.४ //
1075 SK अद्भुतशिरश्छेदपञ्चकम् तत्तद्विचारवैराग्याद्वरिष्ठा विश्वविस्मृतिः / छेद्यस्य शिरसश्छेदः प्रत्यङ्गच्छेदनाद्वरः // NBस्_३९.१ //
1076 SK प्रत्यङ्गच्छेदनेऽप्यस्य च्छेद्यमेव शिरो यदि / प्रथमं तच्छिरश्छिन्धि वृथा किं चेष्टयाऽन्यया // NBस्_३९.२ //
1077 SK दयाशीला हि मुनयो मुनेः साऽपि दयालुता / यच्छिनत्ति मनःशीर्षं विनाऽङ्गच्छेदवेदनाम् // NBस्_३९.३ //
1078 SK सद्यो मम शिरश्छिन्धि मामित्याह मनो मम / मया सोढुं न शक्यन्ते प्रत्यङ्गच्छेददुर्दशाः // NBस्_३९.४ //
1079 SK असङ्ख्याश्चित्तजा भावाः शक्याश्छेत्तुं क्रमात्कथम् / चित्तमेतत्समाच्छिन्नमत एव मया मुने // NBस्_३९.५ //
1081 SK जातसाक्षात्कारं शिष्यं प्रति श्रीगुरोः प्रश्नामृतम् | नित्यानुभूतमपि यन्नानुभूतत्वमागतम् / अनुभूतिरसस्पर्शैरनुभूतं परं पदम् // NBस्_४०.१ //
1082 SK प्रत्यक्षलक्षणैरेव पराग्वृत्तिविलक्षणैः / साक्षात्कृतः शिवः साक्षात्सच्चिदानन्दलक्षणैः // NBस्_४०.२ //
1083 SK यशोदागीतमधुरैर्मृदुवेदान्तभाषितैः / लालितः प्रापितो निद्रां मुकुन्द इव मोदसे // NBस्_४०.३ //
1084 SK नवनीतरसग्रासैश्चमत्कारैः स्वसंविदाम् / अन्तराप्यायितो बालमुकुन्द इव खेलसि // NBस्_४०.४ //
1085 SK स्वात्मनि प्रलयं नीत्वा दृश्यमेकाकितां गतः / किं नृत्यसि निजानन्दे महादेव इवात्मनि // NBस्_४०.५ //
1086 SK सायङ्काले समाध्याख्ये स्निग्धां सर्वाङ्गसुन्दरीम् / निजशक्तिमुमां पश्यन्महेश इव नृत्यसि // NBस्_४०.६ //
1087 SK दृश्यं निपीय गरलं पाचयित्वा तदात्मनि / मृत्त्युञ्जयपदं प्राप्तः किं हृष्यसि हरो यथा // NBस्_४०.७ //
1088 SK यथा संमुखतां नीत्वा मुकुरे मुखमीक्षितम् / अखण्डवृत्तौ च तथा स्वरूपं किं विलोकितम् // NBस्_४०.८ //
1089 SK बहिरन्तर्हरिं पश्यन्मायां पश्यञ्जगन्मयीम् / विस्मयं परमं यासि मार्कण्डेय इवात्मनि // NBस्_४०.९ //
1091 SK शिष्यप्रतिवचनम् श्रीगुरो सानुभावानां करुणापूर्णचेतसाम् / श्रीमतां कृपया नूनमस्माकं किमु दुर्लभम् // NBस्_४१.१ //
1093 SK चर्याचतुष्टयी जात्या यद्यपि गौरमेव वदनं रूपस्य नास्ति क्षतिस्तत्किं कज्जलकालिमा मुखतले संलापनीयो बुधैः / अस्तु ब्रह्मविदः कृतैरपि न तैर्दुष्कर्मभिश्चेत्क्षतिः किं कामादिकदर्थिता वरमहो निःसङ्गसौख्यं वरम् // NBस्_४२.१ //
1094 SK विद्यैवाधिगता सदाऽमृतमयी विद्यावता तत्सुखं स्थेयं वर्त्मनि सङ्गदोषरहिते सङ्गः पुनः कीदृशः / किं भूषाऽस्य वरा स्थितिः स्तुतिमयी सा राजसिंहासने द्वारि द्वारि कपर्दिकार्थमटनं किं वाऽस्य राज्ञो वरम् // NBस्_४२.२ //
1095 SK शिष्टाचारपथं विना यदि भवेदात्मप्रबोधो महांस्त्याज्यस्तर्हि तु सर्वदैव विदुषा वर्णाश्रमाणां क्रमः / वर्त्म ज्ञस्य विलक्षणं यदि कृतात्किं चाकृतात्कर्मणः संगृह्णातु जनांस्तदा मुनिजनस्तेनापि नास्य क्षतिः // NBस्_४२.३ //
1096 SK दत्तोऽसावृषभो जडश्च भरतो मङ्किश्च संवर्त्तकः कर्मभ्रष्टपथं गताः कथममी चेत्पूर्वपक्षस्तव / साधो जागरितान्प्रतीदमुदितं पश्यन्ति शृण्वन्ति ये निद्रान्धा न विलोकयन्ति न पुनः शृण्वन्ति वाच्या न ते // NBस्_४२.४ //
1098 SK ज्ञानगङ्गातरङ्गोनाशीतिकम् ज्ञानगङ्गातरङ्गोनाशीतिकं शृणु सांप्रतम् / एकेनाप्यङ्गलग्नेन सर्वपापक्षयो भवेत् // NBस्_४३.१ //
1099 SK वाङ्मयं खं हि सर्वत्र वाचो मूकस्य दुर्लभाः / चिन्मयं ब्रह्म सर्वत्र विद्याहीनस्य दुर्लभम् // NBस्_४३.२ //
1100 SK प्राचीमथ प्रतीचीं वा यत्र क्वचन गच्छतु / तमसा दृश्यते नैषा ब्रह्मचिद्भास्करो यथा // NBस्_४३.३ //
1101 SK आकाशमण्डले शून्ये यथा नक्षत्रमण्डलम् / चिद्ब्रह्ममण्डले शून्ये तथा संसारमण्डलम् // NBस्_४३.४ //
1102 SK जाग्रत्स्वरूप एवायं पश्यन्त्स्वप्नमयं जगत् / सुषुप्त इव चिद्रूपे मुनेस्तुर्यस्थताऽद्भुता // NBस्_४३.५ //
1103 SK मुमुक्षा दम्भमात्रं ते न ते तीव्रा मुमुक्षुता / तीव्रा यदि मुमुक्षा स्यान्न विलम्बो भवेदियान् // NBस्_४३.६ //
1104 SK अभूत्कुहूमयं विश्वं पक्षः स मलिनो गतः / इदानीं निर्मलः पक्षो जातं राकामयं जगत् // NBस्_४३.७ //
1105 SK न तिष्ठति मनो यत्र गोः शृङ्गे सर्षपो यथा / शैला इव समाधिस्थास्तत्रैव स्थितिमागताः // NBस्_४३.८ //
1106 SK जलप्रवाह इव याऽनवच्छिन्ना स्वभावतः / चतुर्दशधियां दूरे सा मुनेर्मननस्थितिः // NBस्_४३.९ //
1107 SK परमात्मपदभ्रष्टः स पुनः परमात्मताम् / यया प्राप्नोति विश्वात्मा सा मुनेर्मननस्थितिः // NBस्_४३.१० //
1108 SK प्रतिबिम्बं न गृह्णाति निर्मलो निकटस्थितः / प्रपञ्चवञ्चने युक्तिः सा मुनेरेव नामुनेः // NBस्_४३.११ //
1109 SK अपसर्पन्त्विति प्रोक्ताः क्षणादपसरन्त्यमी / यदाज्ञया मनोभावाः स वशी कस्य नाद्भुतः // NBस्_४३.१२ //
1110 SK जारणात्कालकूटस्य शम्भोराशीविषा वशाः / मारणान्मनसस्तद्वन्मुनेरिन्द्रियवृत्तयः // NBस्_४३.१३ //
1111 SK अहन्ताममतात्यागः कर्त्तुं यदि न शक्यते / अहन्ताममताभावः सर्वत्रैव विधीयताम् // NBस्_४३.१४ //
1112 SK वर्णाश्रमवयोवेषाध्ययनाचारसुन्दरः / विना विचारवैराग्यैः पशुरेव न संशयः // NBस्_४३.१५ //
1113 SK तीक्ष्णे विचारवैराग्ये चित्ते यस्य निरन्तरे / स पण्डितः किमेतस्य साधनान्तरचिंत्तनैः // NBस्_४३.१६ //
1114 SK वर्धते मूलसेकेन मूलशोषेण शुष्यति / भस्मसात्क्रियते वह्निज्वालयेति तरुस्थितिः // NBस्_४३.१७ //
1115 SK वर्धते मनसः सेकैर्मनःशोषेण शुष्यति / भस्मसात्क्रियते बोधज्वालयेति भवस्थितिः // NBस्_४३.१८ //
1116 SK परपारस्थितं हंसं द्विधेव प्रतिबिम्बितम् / तथात्मानं विजानाति तटस्थः सत्यदर्शनः // NBस्_४३.१९ //
1117 SK चित्रमल्पेन कालेन बोधभर्जितचेतसः / भर्जितस्येव बीजस्य कार्यसाधकता गता // NBस्_४३.२० //
1118 SK पङ्गवस्तु कृता एव दृगाद्या न चलन्ति यत् / अन्धानपि करिष्यामि न पश्यन्ति यथा जगत् // NBस्_४३.२१ //
1119 SK जानातु वा न जानातु ब्रह्म जीवस्य जीवनम् / जानाति चेत्परो लाभो न जानाति भयं महत् // NBस्_४३.२२ //
1120 SK ब्रह्मधेनोः स्वभावोऽयं देवधेनोर्विलक्षणः / भोक्तैव तद्दुग्धपानात्सद्यस्तद्रूपतां व्रजेत् // NBस्_४३.२३ //
1121 SK यदि योगे कृता बुद्धिः सप्तमीं गच्छ भूमिकाम् / मग्नश्चेद्गच्छ पातालमिति नीतिविदां वचः // NBस्_४३.२४ //
1122 SK मध्याह्नभास्करं द्रष्टुं साक्षाद्यदि तु न क्षमम् / पटव्यवहितं पश्येज्जले वा प्रतिबिम्बितम् // NBस्_४३.२५ //
1123 SK तथा चिन्मात्रचण्डांशुं निर्विकल्पं न चेत्क्षमः / सर्वव्यापितया पश्येदन्तर्यामितयाऽथवा // NBस्_४३.२६ //
1124 SK लक्षं शराः प्रयोक्तव्याः सूक्ष्मे लक्ष्येऽपि धन्विना / कदाचिद्दैवसंयोगादेकोऽपि तु लगिष्यति // NBस्_४३.२७ //
1125 SK सदैव चेतसो वृत्तिर्ध्यानाभ्यासे विधीयताम् / कदाचित्कृपया शम्भोरखण्डाकारता भवेत् // NBस्_४३.२८ //
1126 SK ब्रह्मणोऽपि ब्राह्मणः श्रेयानित्याह द्वाभ्याम् | लीलासिन्धोः कियदिव हरेः षोडशस्त्रीसहस्त्रं निःसंख्याता विविधरुचिना येन भुक्ताः स्त्रियस्ताः | तादृङ्नीतः स पुनरनया भामया वश्यभावं / सम्यग्भुक्तो यदुपतिरतः सत्यभामैव धन्या // NBस्_४३.२९ //
1127 SK वर्त्तते ब्रह्म सर्वत्र ब्राह्मणो लभ्यते क्वचित् / समर्घाद्ब्रह्मणस्तस्मान्महर्घो ब्राह्मणो भवेत् // NBस्_४३.३० //
1128 SK परसङ्गसुखासक्तं योगिनां योषितामिव / विहाय लोकसिद्धान्तं रमते स्वमते मनः // NBस्_४३.३१ //
1129 SK तोयरन्ध्रनिरोधेन भाति पूर्णं सरोवरम् / वृत्तिरन्ध्रनिरोधेन पूर्णो बोधः किमद्भुतम् // NBस्_४३.३२ //
1130 SK निर्मूला निष्कला शुष्का कदर्या भोगवासना / तया तिरोहितः स्वामी तृणेनेव महागिरिः // NBस्_४३.३३ //
1131 SK न देशकालौ न वयो न युक्तिर्न विदग्धता / यदैव वासनात्यागस्तव मुक्तिस्तदैव हि // NBस्_४३.३४ //
1132 SK उपायैः शोधिते क्षेत्रे निर्मलं बीजमर्पितम् / किं चित्रं धान्यसम्पत्तौ स देवो यदि वर्षति // NBस्_४३.३५ //
1133 SK कृतवाक्यविचारस्य परमार्थमभीप्सतः / ज्ञानं गरिष्ठमज्ञानमज्ञानं ज्ञानमुत्तमम् // NBस्_४३.३६ //
1134 SK व्याख्यासि वेदान्तगिरो जयसि द्वैतवादिनः / नान्तर्विशसि तन्मन्ये तत्रास्ति मरणं तव // NBस्_४३.३७ //
1135 SK मित्रेण कुशले पृष्टे पूर्वावस्थामनुस्मरन् / इदानीं कुशलं जातमिति हृष्यति योगवित् // NBस्_४३.३८ //
1136 SK कर्मठः काञ्चनालिप्तशून्यताम्रघटोपमः / विद्वांस्तु रत्नसम्पूर्णहेमकुम्भ इवोत्तमः // NBस्_४३.३९ //
1137 SK भूरुहत्वाविशेषेऽपि द्वयोरन्तरमीदृशम् / इक्षुकाण्डसमो विद्वान्दण्डकाष्ठसमः पशुः // NBस्_४३.४० //
1138 SK विशालदृष्टौ रमते न त्वन्यत्र पतिर्मम / येन दृष्टिर्विशाला स्यात्स मन्त्रो मम दीयताम् // NBस्_४३.४१ //
1139 SK पूज्योऽयमिति विज्ञाय पूजितः स्वापितो गृहे / न भुक्तो मूढया स्वामी कश्चित्पुरुष इत्ययम् // NBस्_४३.४२ //
1140 SK भोगयोग्येन वेषेण व्यतीत्य शयने निशाम् / प्रियस्य भोगमप्राप्य प्रातः क्रन्दति कामिनी // NBस्_४३.४३ //
1141 SK चित्रपत्रे कृता नारी विचित्रा रूपसम्पदा / दृश्यते तावदेवाहो यावन्नायाति सुन्दरी // NBस्_४३.४४ //
1142 SK चिन्तामणिं कराद्भ्रष्टं मा शुचः प्राह मे गुरुः / दिनैः कतिपयैरेव पुनरेव मिलिष्यति // NBस्_४३.४५ //
1143 SK करोमि संशयं यावन्मुकुन्दमुखदर्शने / आश्वासयति मां तावत्परमा देवता मनः // NBस्_४३.४६ //
1144 SK कन्दर्पकोटिलावण्यं सत्यमुक्तं जनार्दने / कन्दर्पप्रमुखाः सर्वे तत्प्रकाशे पलायिताः // NBस्_४३.४७ //
1145 SK अश्रु मुक्तं वियोगिन्या राधया मेलनाशया / तत्रैव मायया गुप्तः प्राप्तः प्रकटतां हरिः // NBस्_४३.४८ //
1146 SK सौरभ्याय भ्रमन्त्येके मधु काङ्क्षन्ति चापरे / न भ्रमन्ति न काङ्क्षन्ति मधुमत्ता मधुव्रताः // NBस्_४३.४९ //
1147 SK धनं प्राप्नोति कष्टेन प्रदोषे काष्ठभारिकः / सुखासनस्थो विपुलं धनं रत्नपरीक्षकः // NBस्_४३.५० //
1148 SK नर्त्तकी स्वाङ्गभङ्गेन धनं प्राप्नोति वा न वा / कुलाङ्गना कटाक्षेण स्वं वशीकुरुते पतिम् // NBस्_४३.५१ //
1149 SK तव बुद्धिप्रकाशोऽयं निकटां मुक्तिमाह माम् / नूनं निर्वाणसमये दीपो देदीप्यते भृशम् // NBस्_४३.५२ //
1150 SK एके खनन्ति वसुधां तथा विक्रयिणः परे / घर्षयन्त्यपरे रत्नं भोगं गृह्नाति भाग्यवान् // NBस्_४३.५३ //
1151 SK एके तक्रेण तुष्यन्ति दधिदुग्धेन चापरे / तत्त्वज्ञा नैव तुष्यन्ति नवनीतघृतं विना // NBस्_४३.५४ //
1152 SK यत्र क्वापि स्वपामीति जाता निद्रालुता मम / विस्तीर्णं शयनं प्राप्तं कोमलं ब्रह्म निर्मलम् // NBस्_४३.५५ //
1153 SK दृश्यं बोधेन निर्घृष्टं तच्चिदाकारतां गतम् / यत्र यत्रैव पश्यामि स्वं रूपं तत्र दृश्यते // NBस्_४३.५६ //
1154 SK यदेकोऽपि जनो गीर्णः स्तुवन्त्यजगरं जनाः / मां न स्तुवन्ति किं येन गीर्णा ब्रह्माण्डकोटयः // NBस्_४३.५७ //
1155 SK मय्यसूया न कर्त्तव्या बहु जल्पामि यद्यपि / ब्रह्मास्मीति वदाम्येव श्रुतिर्मां नाभ्यसूयति // NBस्_४३.५८ //
1156 SK सिंहासनं समाधिर्मे वेदान्ता मम वन्दिनः / मारितो मोहनामाऽरिर्मम राज्यमकण्टकम् // NBस्_४३.५९ //
1157 SK दृष्टं चिदम्बरं नाम मया विस्तीर्णमम्बरम् / इदं जडाम्बरं शून्यमत्यल्पं यदपेक्षया // NBस्_४३.६० //
1158 SK ईष्तमन्नं क्षुधार्त्तस्य कृपणस्य धनं प्रियम् / तृषितस्य जलं त्विष्टं चैतन्यं मम वल्लभम् // NBस्_४३.६१ //
1159 SK रसायनप्रसङ्गेन गतं ताम्रमताम्रताम् / तथाऽस्माकमहङ्कारो निरहङ्कारतां गतः // NBस्_४३.६२ //
1160 SK पूर्वमासीदहङ्कारो मम दुःखस्य कारणम् / रिपुरद्य मृतो दृष्टः परमानन्दकारणम् // NBस्_४३.६३ //
1161 SK भोगेप्सूनां सभामध्ये भोक्ता कान्तो यथा युवा / मुमुक्षुणां तथा मध्ये राजते परमार्थवित् // NBस्_४३.६४ //
1162 SK गृहकार्यप्रसक्ताऽपि भुक्तभोगेव कामिनी / मनसैव मनो नूनमानन्दयति योगवित् // NBस्_४३.६५ //
1163 SK मुनिमानन्दितं दृष्ट्वा ग्रामीणो वक्ति तं मुहुः / त्वया यस्तु निधिः प्राप्तस्तं प्रदर्शय मामपि // NBस्_४३.६६ //
1164 SK वञ्चकैर्विषयैस्तात वद के के न वञ्चिताः / गुरुभिः पुरुषव्याघ्रैर्नूनमेतेऽपि वञ्चिताः // NBस्_४३.६७ //
1165 SK शीर्षे घटसहस्राम्भः पातयन्तु जडा जनाः / मौनमेवावलम्बेत शिवलिङ्गमिवात्मवित् // NBस्_४३.६८ //
1166 SK सविचारास्तु गुरवो विरक्ता गुरुसत्तमाः / विचारेऽपि विरक्ता ये गुरूणां गुरवो हि ते // NBस्_४३.६९ //
1167 SK दुस्त्यजान्विषयान्मूढो जिज्ञासुरपि मुञ्चति / विदां तद्रागदोषस्य त्यागे किमिव दुष्करम् // NBस्_४३.७० //
1168 SK जायेत जातबोधानामपि सांसारिकी कथा / जागरे समनुप्राप्ते यथा स्वप्नकथा नृणाम् // NBस्_४३.७१ //
1169 SK मोहेन विस्मृते दृश्ये सुषुप्तिरनुभूयते / बोधेन विस्मृते दृश्ये तुरीयमवशिष्यते // NBस्_४३.७२ //
1170 SK दृश्यं चेत्स्याद्रविर्न स्यात्तम एकं तदा किल / रविश्चेत्स्याज्जगच्च स्याद्व्यवहारस्तदा किल // NBस्_४३.७३ //
1171 SK रविरस्ति जगन्न स्याज्ज्योतिरेकं तदा किल / इति लोकस्थितिः पुत्र परमार्थगतिं शृणु // NBस्_४३.७४ //
1172 SK नित्यो हि रविरस्माकं तस्य नाशो न विद्यते / तमोभूतेऽपि सकले तमःसाक्षी सदव्ययः // NBस्_४३.७५ //
1173 SK रविरस्ति जगन्नास्ति समाधानवतो मुनेः / अनेन हेतुना साधो ज्योतिरेकं तदा किल // NBस्_४३.७६ //
1174 SK रविरस्ति जगच्चास्ति व्यवहारावलोकिनः / रविर्नास्ति जगन्नास्ति तम एकं तदा किल // NBस्_४३.७७ //
1175 SK प्रकाश्यापगमे पुत्र प्रकाशः किं प्रकाशयेत् / प्रकाश्यत्वविनाशेऽपि प्रकाशत्वमखण्डितम् // NBस्_४३.७८ //
1176 SK आयातु यातु वा भानोः प्रकाश्यं निजहेतुभिः / न मम स्वप्रकाशस्य किञ्चिदायाति गच्छति // NBस्_४३.७९ //
1178 SK मनोमहिमा किं बद्धमसि मुक्तं वा मनः पृच्छ महामुने / यदि बद्धमिति ब्रूयात्तर्हि बद्धोऽस्यसंशयः // NBस्_४४.१ //
1179 SK किंचिन्मुक्तमिति ब्रूयात्किंचिन्मुक्तोऽसि मोहतः / यदि मुक्तमिति ब्रूयात्तर्हि मुक्तोऽसि मोहतः // NBस्_४४.२ //
1180 SK बद्धेन मनसा बद्धो मुक्तो मुक्तेन चेतसा / न बद्धो न च मुक्तोऽयमिति वेदान्तनिर्णयः // NBस्_४४.३ //
1181 SK स्फुरन्ति महिमानो ये यत्र यत्र जगत्त्रये / ते सर्वे मनसो धर्मा मनो हि महिमाऽऽश्रयम् // NBस्_४४.४ //
1182 SK अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा / प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं मनसो गुणाः // NBस्_४४.५ //
1183 SK मनो धनुर्मनो मौर्वी मन एव धनुर्धरः / मनो लक्ष्यं मनो वेधो मनो विद्धं विमुक्तये // NBस्_४४.६ //
1184 SK मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः / इतोऽधिकं तु किं वाच्यमद्वये तु स्थितं न तत् // NBस्_४४.७ //
1186 SK चिच्चण्डीपशुघातनम् चित्ताहंकृतिबुद्धिमानसमयैर्युक्तं चतुर्भिः पदैश्छित्त्वाऽन्तःकरणं पशुं परशुना बोधेन तीक्ष्णेन यः / चिच्चण्डीचरणाम्बुजार्चनमनुप्राप्तः प्रसादं परं किञ्चित्रं चरणे लुठन्ति रभसात्तस्याखिलाः सिद्धयः // NBस्_४५.१ //
1188 SK जीवन्मुक्त्यष्टादशी संकल्पबद्धं संकल्पाद्विमोच्यात्मानमात्मना / आत्मनाऽऽत्मनि सन्तुष्टः स्वात्मारामः स्वयं हरिः // NBस्_४६.१ //
1189 SK स्वरूपमेव कैवल्यं संसारः शुद्धमूर्खता / अतिचित्रा गतिः पुत्र जीवन्मुक्तस्य या स्थितिः // NBस्_४६.२ //
1190 SK जीवन्मुक्तिसुखप्राप्त्यै स्वीकृतं जन्म लीलया / आत्मना नित्यमुक्तेन न तु संसारकाम्यया // NBस्_४६.३ //
1191 SK यदि न स्यादविद्याऽऽख्यमिदं कपटनाटकम् / कथं लभेत विश्वात्मा जीवन्मुक्तिमहोत्सवम् // NBस्_४६.४ //
1192 SK अद्वैतं न सदेहेऽस्ति विदेहे द्वैतमस्ति न / जीवन्मुक्तस्य नान्यस्य द्वैताद्वैतमहोत्सवः // NBस्_४६.५ //
1193 SK सदेहे न विदेहत्वं विदेहे न सदेहता / सदेहत्वं विदेहत्वं जीवन्मुक्ते प्रवर्त्तते // NBस्_४६.६ //
1194 SK सदेहस्य विदेहत्वं यदि न स्यात्तदा वद / जनकस्य सदेहस्य कथं प्रोक्ता विदेहता // NBस्_४६.७ //
1195 SK विदेहस्य सदेहत्वं यदि न स्यात्तदा वद / जनकस्य विदेहस्य कथं प्रोक्ता सदेहता // NBस्_४६.८ //
1196 SK विमुक्तिर्निश्चिता शास्त्रे जीवन्मुक्तिः सुनिश्चिता / जीवन्मुक्तत्वमप्राप्य न विदेहविमुक्तता // NBस्_४६.९ //
1197 SK ज्ञानं विना न कैवल्यं न मृतो ज्ञानवान्भवेत् / जीवतो ज्ञानलाभः स्यात्सा जीवन्मुक्तिरक्षता // NBस्_४६.१० //
1198 SK जीवन्मुक्तिसुखं स्वल्पकालं किं तेन चेच्छृणु / ब्रह्मलोके विराजन्ते कथं ते सनकादयः // NBस्_४६.११ //
1199 SK तस्मादीश्वरलीलेयं काचिदीश्वररूपिणी / जीवन्मुक्तिर्महामुक्तेः संप्रदायप्रवर्त्तिनी // NBस्_४६.१२ //
1200 SK यस्यां खेलन्ति मुनयो नारदाद्या निरन्तरम् / ज्ञानिभिर्याऽनुभूतैव सा जीवन्मुक्तिरक्षता // NBस्_४६.१३ //
1201 SK चित्तविक्षेपकर्त्तारं विहारं तु विहाय ये / स्थिता निर्वाणनिष्ठायां त एव सनकादयः // NBस्_४६.१४ //
1202 SK अन्तर्बोधमया लोके व्यवहारपरा इव / ये स्थिता निजनिष्ठायां त एव जनकादयः // NBस्_४६.१५ //
1203 SK गृहं वास्तु वनं वाऽस्तु येषां निष्ठा न वर्तते / सनकादिषु नैवैते न च ते जनकादिषु // NBस्_४६.१६ //
1204 SK अन्तःसारा हि गुरवः स्वल्पवाचाऽमृतप्रदाः / मन्द्रं मन्द्रं हि गर्जन्ति प्रावृषेण्याः पयोधराः // NBस्_४६.१७ //
1205 SK सदैवाध्ययनीयेयं भावनीया सदैव हि / जीवन्मुक्तिपदप्राप्त्यै जीवन्मुक्तिचतुर्दशी // NBस्_४६.१८ //
1207 SK ज्ञानिगजगर्जनम् | आयान्ति तत्र विलसन्ति वसन्ति च द्रगुड्डीय यान्ति च कुलानि विहङ्गमानाम्/ भावास्तथा मयि समा विषमा विचित्रा देवालयाग्रमिव केवलमस्मि नित्यः // NBस्_४७.१ //
1208 SK उन्मज्ज्य मज्जति जगन्मयि दैवयोगादुच्चावचा न गणिता अपि ते तरङ्गाः / निष्ठां गतः स्वमहिमन्यचलप्रतिष्ठे तिष्ठामि सागर इव स्वरसादपारः // NBस्_४७.२ //
1209 SK जन्मादयो वनचराः प्रवहन्तु कामं घर्षन्तु कुम्भमभितो मयि वृत्तिनागाः / अस्मिन्युगे परयुगे च युगान्तरे वा तिष्ठामि निश्चलतया गिरिराजतुल्यः // NBस्_४७.३ //
1210 SK नीचैर्निपातितविमोहमहीधरस्य विन्ध्यस्य मूर्धनि पदं विनिधाय सम्यक् / इष्टां दिशं प्रतिगतः पुनरागतो न स्वच्छन्दमेव विहरामि तदस्म्यगस्त्यः // NBस्_४७.४ //
1211 SK दृष्टो मयाऽद्य विगलद्वदनप्रसादः कश्चित्तृतीयपदतः पतितः पृथिव्याम् / तन्मे मतिः समुदियाय परावरज्ञा स्वर्गस्तु हन्त नरकादपि दुर्विपाकः // NBस्_४७.५ //
1212 SK आरुह्य तुङ्गपदवीं पतितादनार्यान्नारूढ एव हि वरं प्रकृतौ स्थितो यः / अङ्गानि हंत किल तस्य न चूर्णितानि खेदो न चेतसि न वा परिहासपीडा // NBस्_४७.६ //
1213 SK नाडीं प्रविश्य यदि जीवति भीतभीतः प्रान्ते च खादति मृतिश्चिरजीवनं किम् / देहस्वभावरहितः परमात्मभावे तिष्ठन्मृतिं जयति चेच्चिरजीवनं तत् // NBस्_४७.७ //
1214 SK आलोकितानि च मतानि मुनीश्वराणामालोकिताश्च बहवो बहुसिद्धमार्गाः / अद्यापि तं मलिनभावमपास्य दूरं सिद्धिस्तु किं न यदि सिध्यति नित्यसिद्धः // NBस्_४७.८ //
1215 SK अङ्गं प्रसार्य पतितः खलु चित्स्वरूपे निद्रालुतां गत इति प्रविनष्टचेष्टः / विन्ध्यस्य योजनशतायतिका शिलेव नैव ह्रसामि न च वृद्धिमुपैमि पूर्णः // NBस्_४७.९ //
1216 SK परिलसति पिता मे सर्वलोकस्य राजा धृतिमतिबलहेतुर्यौवनं मे नवीनम् / इयमपि च सुबुद्धिः काचिदूढा वराङ्गी सुखमधिकमतः किं मत्परो नास्ति धन्यः // NBस्_४७.१० //
1217 SK समरसपदचिन्ताऽनन्तसन्तोषवन्तः क्षणसुखकणतृष्णातन्तुमन्तर्विमुच्य / निजसुखनिधिविद्याराजसिंहासनस्था वयमिह कलयामः कालमालम्ब्य देहम् // NBस्_४७.११ //
1218 SK कति कति न हि जीवा देवराजादयोऽमी पदपतनहताशाः संसृतौ संसरन्ति / गुरुपदमवलंब्य ब्रह्मविद्यातरिस्था अधिगतपरपारास्ते वयं धन्यधन्याः // NBस्_४७.१२ //
1219 SK व्योम व्योमचरैर्न लिप्तमपि यत्तत्सर्वदा नीरसं क्षीराब्धिः सरसोऽपि वृद्धिमधिकां लब्ध्वा पुनर्मुञ्चति / हेमाद्रिर्जनको मुदामपि मुदां नैवाश्रयो नीरसो न क्षीणो न च नैव मोदरहितोऽहं तत्तुला नास्ति मे // NBस्_४७.१३ //
1220 SK सायं प्रातरनेकरङ्गमपि तन्नानेकरङ्गाश्रयं यान्त्यायान्ति पयांसि तत्र न पयोरेखाऽपि दृष्टा क्वचित् / सज्ञानेन मया विगाह्य तदहो दृष्टं नभो निर्मलम् नीलं नीलमिति प्रथैव नभसो मिथ्या नभोनीलिमा // NBस्_४७.१४ //
1221 SK रूप्ये रूप्यमतिः कृता कृतधिया रङ्गे पुनर्दुर्धिया सत्यं द्वावपि संस्थितौ निजधिया स्वे निश्चये निश्चले / एकस्यैव दरिद्रता व्यपगता तस्थौ द्वितीयस्तथा सञ्जाते क्रयविक्रयव्ययविधौ व्यक्तो विशेषस्तयोः // NBस्_४७.१५ //
1222 SK निम्ना नूनमुदन्वतः स्थितिरियं कल्लोलिनी चेत्कृता विक्षिप्तेन कुतश्चिदागतवता विन्ध्याटवीवायुना / तत्किं नायमपां निधिः किमथवा स्थानादसौ चालितः किन्तु प्रत्युत तादृशोऽपि महिमा विख्यापितो वारिधेः // NBस्_४७.१६ //
1223 SK माधुर्यं च पयस्त्वमाश्रितवता तुच्छे दधित्वाम्लते रूपे संप्रति बिभ्रता तु पयसा सर्वं यशो हारितम् / ग्रैवेयत्वमथाङ्गदत्वमथ च क्षुद्रत्वमक्षुद्रतां पर्यायैर्भजतः स्वभामजहतो हेम्नस्तु नास्ति क्षतिः // NBस्_४७.१७ //
1224 SK न हि न हि चतुरास्ते यैर्न बुद्धं विशुद्धं न हि न हि कृतिनस्ते ये न पारं प्रयाताः / न हि न हि तु कुलीना यैर्न तत्त्वं विविक्तं न हि न हि मुनयस्ते यैर्धृता लोभवार्ता // NBस्_४७.१८ //
1225 SK हेऽहंकृते तव न कृत्यमिहास्ति किञ्चिल्लीना भव स्वमहिमन्यचलप्रतिष्ठे / चेतस्त्वमेहि परमं स्वसुखाब्धिमन्तः सोढुं न शक्नुम इमास्तव दुष्टवृत्तीः // NBस्_४७.१९ //
1226 SK आयान्ति नैव सुत तत्र मनोविकारा आयान्ति चेदिह विचारय जोषमास्यम् / त्वं चापि मन्दमिह सञ्चर मुञ्च मोहं सोऽहम्पदे सुखनिधौ यदि ते मनीषा // NBस्_४७.२० //
1227 SK तीव्रं तमः समय एष निशीथनामा देशोऽपि चौरबहुलः शिथिला च भित्तिः / इत्थं स्थिते निजधनं प्रति सावधानो जागर्त्ति चेद्गृहपतिर्विफला हि चौराः // NBस्_४७.२१ //
1228 SK भूपालकैर्निशितशास्त्रधरैरुदारैर्दुष्टं मृगं शमयितुं मृगया विधेया / दुष्टो मृगो न निहतो निहतास्तदन्ये व्यर्थस्य तत्क्षितिपतेर्वद कः प्रभावः // NBस्_४७.२२ //
1229 SK इष्टे नष्टे नश्वरे त्यक्तभोगः सञ्जातालंप्रत्ययो वीतरागः / तां तां कक्षां स्वैरमभ्येति सूक्ष्मां यां यामन्ते साधकाः साधयन्ति // NBस्_४७.२३ //
1230 SK हृदि यदि सविचारास्तर्हि सम्यक्प्रचारा गतिमनुगतिभाजः केवलं दुःखभाजः / परिकलय यदन्धैर्नीयमाना इवान्धा युगपदपि समेता अन्धकूपे पतन्ति // NBस्_४७.२४ //
1231 SK एकः प्राह पठेति मां तदितरः प्राहाट दूराटवीमन्यः प्राह समेधयाग्निमपरः प्राहार्कमालोकय / स्विष्टेप्सुं प्रति मां वचो गुरुजनैरुक्तं त्वमेवासि तत्स्विष्टाप्तेर्मम घूर्णितेऽपि नयने अन्धा न पश्यन्त्यमी // NBस्_४७.२५ //
1232 SK येषां वज्रदृढं कपोलमथवा जिह्वा वितस्त्यायता ख्यात्त्यर्थं कलहाय पुस्तकपिशाचानां कथा तिष्ठतु / मां पृच्छाच्छमते कथं विलसति ध्यानं कथं धारणा को भावः स्वरसेन केन विधिना चेतः परे लीयते // NBस्_४७.२६ //
1233 SK जिह्वे देवि गृहाण मौनमधुना भूयस्त्वया जल्पितं प्रत्यग्वस्तुनि निष्ठिता यदि मतिस्तत्किं प्रलापास्तव / स्वच्छन्दोपरमामृताब्धिलहरीलावण्यलग्ने हृदि प्रायः कर्कशतां गताऽसि कुटिले तस्मान्न मे रोचसे // NBस्_४७.२७ //
1234 SK सम्पूर्णं जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा गाङ्गं वारि समस्तवारिनिचयाः पुण्याः समस्ताः क्रियाः / वाचः प्राकृतसंस्कृताः श्रुतिगिरो वाराणसी मेदिनी सर्वैव स्थितिरस्य मुक्तिपदवी दृष्टे परे ब्रह्मणि // NBस्_४७.२८ //
1235 SK ओतं प्रोतमिदं विचित्रमखिलं यस्मिञ्जगद्वर्त्तते यत्रोदेति विलीयते पुनरिदं तोये तरङ्गादिवत् / तच्चेतो मयि लीयते प्रतिदिनं मय्येव तज्जायते मह्यं तर्हि वदन्तु हे लयविदः सोऽहं तु लीये क्व नु // NBस्_४७.२९ //
1236 SK बाला श्वश्रूजननियमिता देहलीदत्तदृष्टिर्दीर्घं चक्षुः किरति वदने यौवनालंकृतस्य / युक्तस्यैवं न चलति ततो भ्रूतटे दत्तदृष्टेश्चेतोवृत्तिः स्फुरति पुरुषे मोक्षलक्ष्मीनिवासे // NBस्_४७.३० //
1237 SK पर्यन्तै रहितस्य यस्य महती गम्भीरता तादृशी मग्ना यत्र विभान्ति नो अगणिता ब्रह्माण्डमृत्पिण्डिकाः / यादृक्तस्य चिदर्णवस्य सुरसो यादृक्स्वरूपं महत्तत्कस्मै कथयामि कस्य विषयः को वाऽस्य वक्ता भवेत् // NBस्_४७.३१ //
1238 SK आख्यास्यामि रमावरस्य पुरतो गौरीवरस्याथवा शब्दब्रह्ममयीवरस्य पुरतस्त्वअस्य कस्यापि न / प्रह्लादप्रवणं प्रकाशपरमं संवेदितं संविदा शान्ते चेतसि यत्कुतूहलमये निर्जिह्ममुज्जृम्भितम् // NBस्_४७.३२ //
1239 SK तृष्णाभिर्गलितं क्षमाभिरुदितं प्रज्ञाभिरुन्मीलितं मोहैरस्तमितं भ्रमैः प्रचलितं द्वंद्वैश्च दूरं गतम् / बोधैरुल्लसितं सुखैर्विलसितं संमीलितं संशयैः स्वं धाम स्फुरितं यदैव मुनिना निर्मायमालोकितम् // NBस्_४७.३३ //
1240 SK पूर्वं नाम किमन्तरं समभवद्यन्नेदमालोकितं किं वा कारणमस्ति जातमधुना येनेदमालोक्यते / इत्थं विस्मयवन्मनो हि विदुषां विज्ञाननिद्राघने तत्रानन्दवने मुनीन्द्रसदने लीनं परब्रह्मणि // NBस्_४७.३४ //
1241 SK शुद्धे बोधे स्फुरति परितः क्षालिता वासनाङ्काः क्षीणं चित्तं विरतिरुदिता कर्मपाशा विशीर्णाः / भग्नो भेदः सुखमधिगतं कल्पना दूरमुक्ता दृष्टे तत्त्वे करबदरवन्नास्ति कर्त्तव्यशेषः // NBस्_४७.३५ //
1243 SK नरहरिषट्कम् नाम्नैव नो नरहरेर्हि विदीर्यतेऽसौ दुष्टो हिरण्यकशिपुर्नितरां बलिष्ठः / तस्मात्त्वया नृहरिरूपधरेण चित्त मोहो हिरण्यकशिपुस्तु विदारणीयः // NBस्_४८.१ //
1244 SK इन्द्रस्य राज्यमपि सम्प्रतिलभ्य लुब्धस्तृष्णामयो निजरिपुर्न जगाम तृप्तिम् / अस्याधुना प्रलय एव हितं ममेति प्रज्ञात्मना नृहरिणा प्रलयं प्रणीतः // NBस्_४८.२ //
1245 SK वक्षो हिरण्यकशिपोः किल वज्रसारं शस्त्राणि तत्र सकलान्यपि कुण्ठितानि / तादृक्पुनस्तव नखैर्नृहरे विदीर्णमत्यद्भुतो भवत एष नखप्रभावः // NBस्_४८.३ //
1246 SK अध्यात्मदृष्टि हृदयं हृदयाग्रसंस्थं तेजोमयोऽरिमनयन्नृहरिस्तमस्तम् / कष्टं समस्तमपि नष्टदशां प्रयातं प्रह्लाद एव परमं महिमानमाप // NBस्_४८.४ //
1247 SK नान्तस्तु नापि च बहिर्न दिवा न रात्रौ नार्द्रेण शुष्कवपुषा च न मार्यते यः / नायं नरेण न मृगेण निपातनीयस्तादृग्रिपुं नरहरिर्हतवान्विचित्रम् // NBस्_४८.५ //
1248 SK सर्वत्रैव सदा स्थितो नरहरिर्यत्स्थावरे जङ्गमे दैवाद्व्यक्तिमुपागतः पुनरसौ पाषाणपिण्डेऽपि यत् / नास्तित्वं गमितो हिरण्यकशिपुस्तादृक्प्रपञ्चाश्रयः तत्सर्वं किल कौतुकं निजजनप्रह्लादहेतोः कृतम् // NBस्_४८.६ //
1249 SK जित्वेन्द्रियरिपुषट्कं हृदि गायति वारषट्कं चेत् / एतन्नरहरिषट्कं विकारषट्कं निवारयति // NBस्_४८.७ //
1251 SK उन्मत्तप्रलापशतकम् | शुद्धबोधसुधास्वादी प्रलपामि प्रमत्तवत् / तत्प्रलापनिगूढार्थं शोधयन्तु सतां धियः // NBस्_४९.१ //
1252 SK कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहश्च मदमत्सरौ / संसारतारका यद्वत्तथा तद्विवृतिं शृणु // NBस्_४९.२ //
1253 SK विश्रान्तिसुन्दरीसङ्गरतिलावण्यलम्पटाः / एकान्तलीलाचतुराः कामिनो मुक्तिगामिनः // NBस्_४९.३ //
1254 SK यद्बलान्मोहदैत्यस्य योगी नरहरिः स्वयम् / वक्षो विदारयाञ्चक्रे स क्रोधो मुक्तिसाधनम् // NBस्_४९.४ //
1255 SK भ्रुकुटीकुटिलं यस्य मुखमीक्षितुमक्षमाः / कामलोभादयो भावाः स द्वेषी केशवप्रियः // NBस्_४९.५ //
1256 SK शाश्वते सुप्रसन्नानां नश्वरे भृकुटीभृताम् / रागद्वेषवतां तात मुक्तिः करतले स्थिता // NBस्_४९.६ //
1257 SK मनःकाचमणिं दत्त्वा ज्ञानचिन्तामणिं मुनिः / क्रीणाति येन लोभेन स लोभो मुक्तिसाधनम् // NBस्_४९.७ //
1258 SK येन वर्णाश्रमाचारदेहभोगधनादिकम् / विस्मरन्ति चितः प्रेम्णा स मोहः परमं पदम् // NBस्_४९.८ //
1259 SK मत्तो नान्यत्परं किंचिदहमेव महेश्वरः / अहमेवोत्तमश्चेति मदो मुक्तिप्रदो मतः // NBस्_४९.८* //
1260 SK दृश्योत्कर्षं न सहते ज्ञानोत्कर्षबलात्तु यः / स तु सम्वत्सरशतं ज्येष्ठो निर्मत्सरान्मुनेः // NBस्_४९.९ //
1261 SK क्षणं न क्षमते यस्तु बाह्यस्फुरणमक्षमी / तद्वामचरणाङ्गुष्ठे निबद्धाः क्षमिणां गुणाः // NBस्_४९.१० //
1262 SK कामादयो महाधूर्त्ता धूर्त्तितं यैर्जगत्त्रयम् / तान्धूर्त्तयति यो युक्त्या स धूर्तो धूर्जटिप्रियः // NBस्_४९.११ //
1263 SK यो लालयति लोभादीनन्तर्मूलानि कृन्तति / बहिरन्योऽन्य एवान्तर्मुक्तिमेति कपट्यसौ // NBस्_४९.१२ //
1264 SK गुणात्मकेषु सर्वेषु दोषमेवान्तरात्मनः / कर्णे जपति यो नित्यं पिशुनोऽसौ विमुक्तिभाक् // NBस्_४९.१३ //
1265 SK परापवाद एवास्ति हृदये यस्य सर्वदा / परां गतिं गतो दृष्टः स मया मुनिशेखरः // NBस्_४९.१४ //
1266 SK मिथ्यैवेदं जगत्सर्वमिति निश्चितचेतसाम् / स मिथ्यावादिनां लोको दुर्लभः सत्यवादिनः // NBस्_४९.१५ //
1267 SK नैव किंचित्करोमीति यः सदाचारवर्जितः / आचारिणो न गच्छन्ति तस्यानाचारिणो गतिम् // NBस्_४९.१६ //
1268 SK पूर्वं यानि च मित्राणि विचारादीनि तान्यपि / विहाय तत्परं यातो मित्रद्रोही स मुच्यते // NBस्_४९.१७ //
1269 SK पञ्चभूतात्मकं विश्वं निर्मितं येन मायया / स एव हि मया दृष्टो मायावी मुक्तिभाजनम् // NBस्_४९.१८ //
1270 SK स्वेच्छयैव कृतं विश्वं स्वेच्छयैव निहन्ति यः / कृतज्ञादपि पूज्योऽसौ कृतघ्नो मोक्षमश्नुते // NBस्_४९.१९ //
1271 SK आश्चर्यं योऽभिमन्येत जीव आत्मानमीश्वरम् / सोऽभिमानी गतिं याति निरहङ्कारदुर्लभाम् // NBस्_४९.२० //
1272 SK गुणेषु दोषं पश्यन्तो विश्वमात्रविनिन्दकाः / आत्मस्तुतिपरा यान्ति नित्यं वैकुण्ठमन्दिरम् // NBस्_४९.२१ //
1273 SK बुद्ध्वाऽपि शुद्धमात्मानं व्यावहारिकलोकवत् / करोति न करोमीति दम्भकृच्छम्भुवल्लभः // NBस्_४९.२२ //
1274 SK बोधखङ्गेन तीक्ष्णेन मोहाहङ्कारदुर्धियाम् / घातकः पातकं हन्ति पूर्वजन्मशतार्जितम् // NBस्_४९.२३ //
1275 SK अहङ्कारं हरिरहं ब्रह्मैवाहमहं शिवः / इति विश्वास्य हन्तारः पुण्या विश्वस्तघातकाः // NBस्_४९.२४ //
1276 SK मुक्तो विधिनिषेधाभ्यां निश्चिन्तः स्वेच्छया चरन् / कर्मठानामपाङ्क्तेयः सोऽस्माकं पङ्क्तिपावनः // NBस्_४९.२५ //
1277 SK निन्दितावभिनिर्मुक्ताभ्युदितौ यौ तु तौ हि नः / पूतौ कर्माभिनिर्मुक्तोऽभ्युदितश्च चितौ सदा // NBस्_४९.२६ //
1278 SK दत्त्वा द्वारि कपाटं यः खण्डलड्डुकवन्मुनिः / एकाकी मिष्टमश्नाति स याति परमां गतिम् // NBस्_४९.२७ //
1279 SK ज्ञानकर्मेन्द्रियगणो निरुद्ध्य निजमन्दिरे / पङ्क्तीकृत्य हतो येन सोऽस्माकं पङ्क्तिपावनः // NBस्_४९.२८ //
1280 SK पश्य संसारनाशार्थमात्मनाशं सहन्ति ये / संसारद्वेषिणां तेषां मुक्तिः शास्त्रेषु वर्णिता // NBस्_४९.२९ //
1281 SK अहं ममेति सर्वस्वं बोधद्यूतेषु हारितम् / येनासौ मुक्तिभाक्प्रोक्तो बृहदारण्यकश्रुतौ // NBस्_४९.३० //
1282 SK दीनेन्द्रियमृगेष्वेव दया यस्य न विद्यते / स एव देवकीसूनोर्दीनबन्धोरतिप्रियः // NBस्_४९.३१ //
1283 SK आत्मभोगरतो राजा यस्तु नावेक्षते पुरीम् / लिप्यते न स पापेन प्रमाणं मुण्डकश्रुतिः // NBस्_४९.३२ //
1284 SK ज्ञानवैराग्यपाशेन हतो येन मनोधनी / यः स्यादेवंविधः पाशी तस्य काशी पदे पदे // NBस्_४९.३३ //
1285 SK गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डां तपस्विनीम् / बलात्कारेण यो भुङ्क्ते स रण्डाव्यसनी शुचिः // NBस्_४९.३४ //
1286 SK बोधदावाग्निना दग्धं येन द्वैतवनं घनम् / अतिपुण्यां गतिं याति स हि दावाग्निदायकः // NBस्_४९.३५ //
1287 SK गृहे स्थितानामपि यो गवां ग्रासं ददाति न / आचरत्यात्मनः पुष्टिं सर्वपापैः प्रमुच्यते // NBस्_४९.३६ //
1288 SK रसाः सर्वेऽपि विक्रीता धर्माधर्ममजानता / ग्रन्थौ बद्धं बोधधनं स धन्यो रसविक्रयी // NBस्_४९.३७ //
1289 SK अन्तर्याम्यात्मना येन रचितो वर्णसङ्करः / स्वयं शङ्कर एवासौ वर्णितो वर्णसङ्करी // NBस्_४९.३८ //
1290 SK येन वेदाः समभ्यस्य विदित्वाऽर्थं स्वचिन्तया / प्लाविताः सह वेदान्तैर्वेदप्लावी स मुच्यते // NBस्_४९.३९ //
1291 SK शिवे निवेदितं सर्वं शिवनिर्माल्यतां गतम् / तद्भुनक्ति पवित्रात्मा शिवनिर्माल्यभोजनः // NBस्_४९.४० //
1292 SK ब्रह्मचर्यं गतो भुङ्क्ते सर्वा नगरनायिकाः / लिप्यते न स पापेन चित्रं वेदान्तदर्शनम् // NBस्_४९.४१ //
1293 SK योगिनामवधूतानां शुकादीनां मुखाच्च्युतम् / किञ्चिदुच्छिष्टमास्वाद्य मुच्येदुच्छिष्टभोजनः // NBस्_४९.४२ //
1294 SK ब्रह्म जानाति तस्यैव ब्राह्मणस्य स्वचेतसः / वृत्तिलोपः कृतो येन स धन्यो वृत्तिलोपकृत् // NBस्_४९.४३ //
1295 SK यस्तु वृन्ताकदग्धान्नं कलञ्जादि यदृच्छया / लब्धमश्नाति हि मुनिस्तस्यादूरतरो हरिः // NBस्_४९.४४ //
1296 SK भृगवे वरुणेनोक्ता ब्रह्मविद्या तु वारुणी / तद्वारुणीरसास्वादमत्तानामुत्तमा गतिः // NBस्_४९.४५ //
1297 SK पराग्वृत्तिं परित्यज्य या प्रत्यक्सा तु वारुणी / तदभ्यासरतानां च न दूरे परमं पदम् // NBस्_४९.४६ //
1298 SK सुन्दरीं वीक्ष्य चित्कान्तामिन्द्रियेश्वरमिन्द्रियम् / मानसं स्खलितं येषां ते मुक्ता अजितेन्द्रियाः // NBस्_४९.४७ //
1299 SK योगभूमिं समारुह्य गम्भीरे ब्रह्मसागरे / पश्चान्निपतितो लीन आरूढपतितः शुचिः // NBस्_४९.४८ //
1300 SK चिद्विद्याकर्मनाशायां नद्यां स्नानं मया कृतम् / कर्मनाशाजलस्पर्शात्कर्मबन्धो निवर्त्तते // NBस्_४९.४९ //
1301 SK अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु सौराष्ट्रमगधेषु च / सर्वत्र परिपूर्णोऽहं पुनः संस्कारवर्जितः // NBस्_४९.५० //
1302 SK निजं गृहं परित्यज्य रमते परमन्दिरे / स गृहस्थो गतिं गच्छेत्परामिति विदां मतम् // NBस्_४९.५१ //
1303 SK आत्मनः सुखलोभेन सुकृतं येन हारितम् / स एव सुकृती शेषः सुकृत्यपि हि दुष्कृती // NBस्_४९.५२ //
1304 SK अज्ञानमेव विज्ञानमविवेको विवेकिता / सर्वात्मकत्वं कैवल्यं येषां ते सिद्धसत्तमाः // NBस्_४९.५३ //
1305 SK बोधो यदवधानेन तन्मनो नाशयन्ति ये / विपरीतकृतां तेषां मुक्तिरित्याह शङ्करः // NBस्_४९.५४ //
1306 SK वेदान्तपाठरूपेण स्वधर्माः कीर्त्तिता मया / स्वधर्मकीर्त्तनादेव सायुज्यं पदमर्जितम् // NBस्_४९.५५ //
1307 SK द्विभार्यो ब्राह्मणो यस्तु त्यजेत्पूर्वां पतिव्रताम् / परस्या गुणलोभेन स याति परमां गतिम् // NBस्_४९.५६ //
1308 SK एतस्य विवरणम् प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्वेभार्ये वेदबोधिते / प्रथमा कर्मनिष्ठा स्याद्ब्रह्मनिष्ठा तथाऽपरा // NBस्_४९.५७ //
1309 SK कर्कशा रसिका चेति तयोर्नामान्तरं क्रमात् / कर्कशा कर्मकाण्डस्था रसिका ब्रह्मवादिनी // NBस्_४९.५८ //
1310 SK कर्कशा रसिका चेति यद्यपि द्वे पतिव्रते / रसिका स्वपतिं भुङ्क्ते कर्कशा कष्टभागिनी // NBस्_४९.५९ //
1311 SK कर्मनिष्ठा तु दासीव गृहकर्मरता सदा / ज्ञाननिष्ठा महाराज्ञी राजसिंहासने स्थिता // NBस्_४९.६० //
1312 SK पतिहेतोर्दिवा नक्तं गृहकर्म करोतु सा / पतिं नालिङ्ग्य निद्राति कथं सौभाग्यभागिनी // NBस्_४९.६१ //
1313 SK रसरीतिं न जानाति कर्कशा कर्मवादिनी / पतिव्रता स्वभावेन भर्त्तारं स्तौति केवलम् // NBस्_४९.६२ //
1314 SK ज्ञाननिष्ठा तु रसिका तत्तत्संस्कारलक्षणैः / आनन्दयति भर्त्तारं तमेवाश्लिष्य खेलति // NBस्_४९.६३ //
1315 SK आसने शयने याने भोजने सा तदन्विता / क्षणं न तिष्ठति स्वामी तां विना रसलालसः // NBस्_४९.६४ //
1316 SK यस्तु जानाति चातुर्यान्महदन्तरमेनयोः / स कथं तत्र मूढायां रमेत किमु तत्सुखम् // NBस्_४९.६५ //
1317 SK यस्तु कश्चिन्महामूढः पामरः पशुधर्मवान् / कर्कशायां रमते रसिकां च न विन्दति // NBस्_४९.६६ //
1318 SK तस्यां च दुःखमाप्नोति प्रत्यहं कलहायते / भूयस्तामेव भजते दौर्भाग्यं तस्य तादृशम् // NBस्_४९.६७ //
1319 SK अत्र द्विभार्यशास्त्रार्थे विषयोऽयं व्यवस्थितः / निवृत्तिवनितां त्यक्त्वा प्रवृत्तो नरकं व्रजेत् // NBस्_४९.६८ //
1320 SK प्रवृत्तिवनितां त्यक्त्वा निवृत्तो मोक्षमश्नुते / विषमोऽप्येष शास्त्रार्थः प्रमाणं व्यासवाक्यतः // NBस्_४९.६९ //
1321 SK इति प्रवृत्तिनिवृत्तिशास्त्रविवरणम् |
1322 SK अथान्यदपि | एको विष्णुर्महद्भूतं व्यासेनोक्तं लगेद्यदि / तन्महाभूतसञ्चारे न दूरे परमं पदम् // NBस्_४९.७० //
1323 SK डाकिनीसिद्धमन्त्रोऽयं ब्रह्मास्मीत्यक्षरात्मकः / भावनामात्रतो यस्य सद्यस्तद्रूपतां व्रजेत् // NBस्_४९.७१ //
1324 SK गुरुशास्त्रप्रसादेन संप्राप्य परमं पदम् / ममैवेदं मया प्राप्तमिति प्राह स उत्तमः // NBस्_४९.७२ //
1325 SK यत्तु जन्मशताभ्यस्तविज्ञानैरपि वस्तुतः / न किञ्चिदपि सम्प्राप्तं तस्य प्राप्तिर्महीयसी // NBस्_४९.७३ //
1326 SK अणीयसो महीयस्त्वं नेदीयस्त्वं दवीयसः / परस्य निजरूपत्वं यत्प्रत्येति प्रमा हि सा // NBस्_४९.७४ //
1327 SK यद्दृश्यते तत्तु मिथ्या तत्सत्यं यन्न दृश्यते / एतत्प्रामाणिकत्वं हि महोपनिषदां मतम् // NBस्_४९.७५ //
1328 SK विचित्रा यस्य रचना समस्ता भाति नीरसा / जीवन्मृतकतुल्योऽसौ जीवन्मुक्तः श्रुतौ स्तुतः // NBस्_४९.७६ //
1329 SK स्वयमेव प्रकाशेत दीपः शून्यालये यथा / तस्य व्यर्थप्रकाशस्य सार्थकं जन्म वर्णितम् // NBस्_४९.७७ //
1330 SK न बोधयति भावानामात्मनो भेदमण्वपि / अबोधदीप एवायमस्माकं बोधदीपकः // NBस्_४९.७८ //
1331 SK निशायामेव जागर्मि निद्रामि सकलं दिनम् / न च रोगा प्रबाधन्ते मा जरामरणादयः // NBस्_४९.७९ //
1332 SK उत्तमाधममध्यानां भेदभानं धियां फलम् / ताभिर्हीनस्य हरिणा प्रोक्ता पण्डितराजता // NBस्_४९.८० //
1333 SK जडेन येन संत्यक्ते उभे सुकृतदुष्कृते / बुद्धियुक्तः स एवेति पार्थं प्राह जनार्दनः // NBस्_४९.८१ //
1334 SK कृताकृतैर्न यस्यार्थो नाश्रयो यस्य कुत्रचित् / पार्थसारथिरित्याह स तुच्छः स्वच्छमुक्तिभाक् // NBस्_४९.८२ //
1335 SK धर्माधर्मौ न जानाति न जानाति शुभाशुभे / सुखदुःखे न जानाति स ज्ञानीति मतं हरेः // NBस्_४९.८३ //
1336 SK चिन्तनेनैव मुक्तिः स्यादिति सर्वत्र वर्णितम् / अस्माकं तु मते स्वस्मिन्न किञ्चिदपि चिन्तयेत् // NBस्_४९.८४ //
1337 SK चिन्तनं सर्वशास्त्राणां मतमन्यन्मतं मम / न किञ्चिच्चिन्तनादेव स्वयं तत्त्वं प्रकाशते // NBस्_४९.८५ //
1338 SK स्वयं प्रकाशिते तत्त्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् / एकोऽपि न गुणो यस्मिन्द्वौ त्रयो वा कुतः किल / गुणान्गायति गोविन्दो निस्त्रैगुण्यस्य तस्य हि // NBस्_४९.८६ //
1339 SK यस्य नैवाधिकारोऽस्ति कस्मिंश्चिदपि कर्मणि / मुख्योऽधिकारी कैवल्ये स गीतो नन्दसूनुना // NBस्_४९.८७ //
1340 SK पश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्यः प्रत्यक्षापलापकृत् / नैव किञ्चित्करोमीति तमार्यं प्राह केशवः // NBस्_४९.८८ //
1341 SK जानन्तोऽपि न सन्मार्गं मूढायोपदिशन्ति ये / मूढमार्गं प्रशंसन्ति तान्साधूनाह माधवः // NBस्_४९.८९ //
1342 SK यस्मिन्मार्गे प्रविष्टस्य भ्रष्टताऽग्रिमजन्मनि / तमेव योगिनां मार्गमस्तौषीत्पार्थसारथिः // NBस्_४९.९० //
1343 SK यथेष्टचेष्टारोधो हि सिद्धिदो हठयोगिनाम् / यथेष्टचेष्टा कैवल्यमस्माकं ज्ञानयोगिनाम् // NBस्_४९.९१ //
1344 SK हत्वाऽपि य इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते / अस्माकं तु मते तस्य सङ्गतिः शान्तिसाधनम् // NBस्_४९.९२ //
1345 SK जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च / एतस्यापरिहार्यस्य परिहारो मतं मम // NBस्_४९.९३ //
1346 SK ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि कुरुते यस्य भस्मसात् / न तस्य कर्मभ्रष्टस्य कर्मठैर्लभ्यते पदम् // NBस्_४९.९४ //
1347 SK यस्तु कापुरुषः कामात्सर्वस्मादपि निर्गतः / स एव पुरुषार्थीति जगाद पुरुषोत्तमः // NBस्_४९.९५ //
1348 SK विष्णुगीता मयाऽधीता निर्णयस्तत्र निर्गतः / सर्वधर्मपरित्यागी सर्वपापैः प्रमुच्यते // NBस्_४९.९६ //
1349 SK असङ्गवस्तुविषये प्रलापोऽयं तु सङ्गतः / ध्यातो मुहुर्मुहुर्दद्यात्सतां पूर्णामसङ्गताम् // NBस्_४९.९७ //
1350 SK अगोचरविचारेऽस्य निन्द्यकामादिवर्त्मना / शतकस्य प्रवृत्तस्य व्यक्तोन्मत्तप्रलापता // NBस्_४९.९८ //
1351 SK अस्योन्मत्तप्रलापत्वादुपेक्षां तात मा कुरु / नूनमेतस्य भावार्थो दुर्बोधो विषयात्मभिः // NBस्_४९.९९ //
1352 SK इत्युन्मत्तप्रलापोऽयं नाम्ना प्रोक्तो मया तव // NBस्_४९.१०० //
1353 SK नूनमेकान्तनिष्ठेन नित्यमेकाग्रचेतसा / इत्युन्मत्तप्रलापोऽयं विचार्यः कृतबुद्धिना // NBस्_४९.१०१ //
1354 SK अवस्थाया मनोन्मन्या उन्मत्ता ये महाधियः / निधिस्तेषां प्रलापोऽयं स्थाप्यो हृदयमन्दिरे // NBस्_४९.१०२ //
1356 SK शिवपूजाशतकम् शिवपूजात्मकं कर्म कर्मनिर्मूलनक्षमम् / सङ्कल्पः शिवपूजायाः सर्वसङ्कल्पदुःखहृत् // NBस्_५०.१ //
1357 SK शिवपञ्चाक्षरी दीक्षा शब्दब्रह्ममयी हिता / शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति // NBस्_५०.२ //
1358 SK तिस्रो रेखा विभूतेस्तु श्रद्धाभक्तिविरक्तयः / पूजाधिकारसिद्धर्थं धार्याः स्वाङ्गेषु शाम्भवैः // NBस्_५०.३ //
1359 SK रुद्राभरणमुद्रास्तु धार्या रुद्राक्षमालिकाः / देवो भूत्वा यजेद्देवमितीयं शाश्वती श्रुतिः // NBस्_५०.४ //
1360 SK अथ पूजाक्रमः | आकाराः कल्पिता यस्यां ब्रह्माद्याः स्थिरजङ्गमाः / तन्मृतिकामयं शैवैः शिवलिङ्गं प्रपूज्यते // NBस्_५०.५ //
1361 SK तत्र प्रथमं हराय नम इति मृत्तिकाग्रहणम् | मृत्सत्या यच्छरावास्तु श्रुता ब्रह्माण्डकोटयः / हराय नम इत्येव ग्राह्या सा मृत्तिका बुधैः // NBस्_५०.६ //
1362 SK महेश्वराय नम इति लिङ्गसङ्घट्टनम् | अखण्डाकारवृत्तिस्तु वेदान्ते या निरूपिता / नमो महेश्वरायेति लिङ्गसङ्घट्टनं हि तत् // NBस्_५०.७ //
1363 SK शुलपाणये नम इति प्रतिष्ठापनम् | त्यक्त्वाऽसम्भावनां तद्वद्विपरीतत्वभावनाम् / शुलपाणिः प्रतिष्ठाप्यः पीठे निष्ठामये बुधैः // NBस्_५०.८ //
1364 SK पिनाकधृते नम इत्यावाहनम् | सर्वगस्यापि देवस्य भक्तिरावाहनं तव / आवाहयामि भक्त्या त्वामित्यावाह्यः पिनाकधृत् // NBस्_५०.९ //
1365 SK अथ ध्यानम् | ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् / पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्// NBस्_५०.१० //
1366 SK अथाऽस्य विवरणम् | तत्र ध्यायेदित्यादिपदत्रयस्य विवरणम् | अनित्ये नित्यं विरसा नित्ये नित्यं धृतव्रताः / नित्यं महेशं ध्यायन्ति नित्यानित्यविवेकिनः // NBस्_५०.११ //
1367 SK अथ रजतगिरिनिभमित्यस्य विवरणम् | रजतस्य गिरिः शंभुः शाम्भवानां परं धनम् / धनेन तेन पूर्णानां दरिद्रत्वं न विद्यते // NBस्_५०.१२ //
1368 SK अथ चारुचन्द्रावतंसमित्यस्य विवरणम् | शुद्धात्मा शीतला कान्ता सूक्ष्मा बोधकला परा / वक्रायते दुरापेयं चन्द्रचूडो विभर्ति ताम् // NBस्_५०.१३ //
1369 SK अथ रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गमित्यस्य विवरणम् | योगदीक्षामयान्येव बोधरत्नानि कानिचित् / दधाति शंकरोऽतोऽस्य रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गता // NBस्_५०.१४ //
1370 SK अथ परशुहस्तपदविवरणम् | येन मोहवनं छिन्नं कदाचिन्न प्ररोहति / स बोधः परशुस्तीक्ष्णो हस्ते रुद्रस्य वर्त्तते // NBस्_५०.१५ //
1371 SK अथ मृगहस्तपदविवरणम् | धर्तुं न शक्यते धीरैर्यो धृतोऽपि पलायते / लीलयैव धृतो हस्ते शम्भुना स मनोमृगः // NBस्_५०.१६ //
1372 SK अथ वरहस्तत्वविवरणम् | वरार्थिभिर्वरेण्याय वृतो यैस्तु वरः स तम् / वरं ददाति हस्तेन वरदस्तेन शंकरः // NBस्_५०.१७ //
1373 SK अथाऽभीतिहस्तत्वविवरणम् | मृत्योर्बिभेति ब्रह्माऽपि मृत्युरेव भयं महत् / तस्मादमृत्युरभयं हस्ते मृत्युञ्जयस्य तत् // NBस्_५०.१८ //
1374 SK अथ प्रसन्नमित्यस्य विवरणम् | सिद्धिमेकामपि प्राप्य कश्चिदन्तः प्रसीदति / निधानं सर्वसिद्धीनां प्रसन्नः सर्वदा हरः // NBस्_५०.१९ //
1375 SK अथ पद्मासीनमित्यस्य विवरणम् | सतां हृदयपद्मेषु यदासीनः सदाशिवः / अत एव हि वेदेषु पद्मासीन इतीरितः // NBस्_५०.२० //
1376 SK अथ समन्तात्स्तुतममरगणैरित्यस्य विवरणम् | स्तुवन्ति देवान्मनुजास्ते देवा देवनायकान् / देवदेवो महादेवः स्तूयते देवनायकैः // NBस्_५०.२१ //
1377 SK अथ व्याघ्रकृत्तिं वसानमित्यस्य विवरणम् | शङ्करेण किरातेन मोहव्याघ्रो निपातितः / कटौ कृत्तिस्वरूपेण पश्य तस्य निदर्शनम् // NBस्_५०.२२ //
1378 SK अथ विश्वाद्यं विश्ववन्द्यमित्यस्य विवरणम् | विश्वकृद्विश्वरूपोऽसौ विश्वहृद्विश्वपालकः / विश्वाद्यो विश्ववन्द्यश्च विश्वेशो गिरिजापतिः // NBस्_५०.२३ //
1379 SK अथ निखिलभयहरमित्यस्य विवरणम् | श्रुतिर्भयमिति प्राह द्वितीयाद्वै भयं भवेत् / हरो हरति भक्तानां मुक्तिदो निखिलं भयम् // NBस्_५०.२४ //
1380 SK अथ पञ्चवक्त्रमित्यस्य विवरणम् | ध्यायन्ति भक्ताः सर्वत्र सर्वेषामपि सन्मुखः / उन्मुखो विमुखानां यस्तस्य सा पञ्चवक्त्रता // NBस्_५०.२५ //
1381 SK अथ त्रिनेत्रमित्यस्य विवरणम् | कर्मोपास्ती उभे नेत्रे ज्ञानं नेत्रं तृतीयकम् / ललाटे राजते यस्य त्रिनेत्रस्तेन शङ्करः // NBस्_५०.२६ //
1383 SK अथोपकरणविचारः | तत्रादौ शुद्धस्फटिकसङ्काशताविचारः | निर्मले सर्वमेवेदं यदस्मिन्प्रतिबिम्बति / शुद्धस्फटिकसङ्काशो नीरागः सोऽयमीश्वरः // NBस्_५०.२७ //
1384 SK अथ कर्पूरगौरताविचारः | यद्वासनाप्रसादेन सर्वा दुर्वासना गता / स्वभावशीतला सेयं शिवे कर्पूरगौरता // NBस्_५०.२८ //
1385 SK अथ दिगम्बरताविचारः | निरावरणविज्ञानस्वरूपो हि स्वयं हरः / स्वैरं चरति संसारे तेन प्रोक्तो दिगम्बरः // NBस्_५०.२९ //
1386 SK अथ भस्मोद्धूलनविचारः | ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते किल / तेनैव भस्मना गात्रमुद्धूलयति धूर्जटिः // NBस्_५०.३० //
1387 SK भासते भिन्नभावानामपि भेदो न भस्मनि / स्वस्वभावस्वभावेन भस्म भर्गस्य वल्लभम् // NBस्_५०.३१ //
1388 SK अथ चन्द्रचूडताविचारः | नश्यन्त्यस्य कलाः सर्वाः सा कला नैव नश्यति / याऽर्पिता शङ्करे भक्त्या चन्द्रचूडस्तया हरः // NBस्_५०.३२ //
1389 SK अथ जटाजूटविचारः | विश्रामोऽयं मुनीन्द्राणां पुरातनवटो हरः / वेदान्तसाङ्ख्ययोगाख्यास्तिस्रस्तज्जटयः स्मृताः // NBस्_५०.३३ //
1390 SK अथ गङ्गाधरत्वविचारः | ब्रह्मलोका च या गङ्गा सुषुम्णा शीतलद्रवा / मस्तके राजते यस्य तेन गङ्गाधरो हरः // NBस्_५०.३४ //
1391 SK अथ त्रिनेत्रताविचारः | आप्यायनस्तमोहन्ता विद्यया दोषदाहकृत् / सोमसूर्याग्निनयनस्त्रिनेत्रस्तेन शङ्करः // NBस्_५०.३५ //
1392 SK अथ नीलकण्ठताविचारः | कण्ठे ब्रह्माण्डनभसां गिलितानामनेकधा / छाया स्फटिकसङ्काशे नीलकण्ठत्वकारणम् // NBस्_५०.३६ //
1393 SK यद्ब्रह्माण्डशरीरस्य श्यामलं पार्वतीपतेः / कण्ठदेशे स्थितं व्योम नीलकण्ठस्ततो हरः // NBस्_५०.३७ //
1394 SK शङ्करेणाभ्रशुभ्रेण यद्विषाम्बु दयालुना / कण्ठे धृतमतः कण्ठे नवाम्बुधरसुन्दरः // NBस्_५०.३८ //
1395 SK शुद्धस्फटिकसङ्काशः स्थितोऽयं मन्दराचले / इन्द्रनीलाचलच्छाया नीलकण्ठत्वकारणम् // NBस्_५०.३९ //
1396 SK रामोऽस्य परमो भक्तः शङ्करो भक्तवत्सलः / रामरत्नं धृतं कण्ठे नीलकण्ठत्वकारणम् // NBस्_५०.४० //
1397 SK अथ भुजङ्गभूषणताविचारः | योगिनः पवनाहारास्तथा गिरिबिले शयाः / निजरूपे धृतास्तेन भुजङ्गाभरणो हरः // NBस्_५०.४१ //
1398 SK काचित्कुण्डलिनी शक्तिः शङ्करेण वशीकृता / कुण्डलिन्या कुण्डलिनो देहाभरणतां गताः // NBस्_५०.४२ //
1399 SK अनन्तवासुकी शम्भोः कर्णकुण्डलतां गतौ / तत्प्रधानतयाऽन्येपि ख्याताः कुण्डलिसंज्ञया // NBस्_५०.४३ //
1400 SK अथ त्रिशूलविचारः | शान्तिवैराग्यबोधाख्यैस्त्रिभिरग्रैस्तरस्विभिः / त्रिगुणत्रिपुरं हन्ति त्रिशूलेन त्रिलोचनः // NBस्_५०.४४ //
1401 SK अथ डमरुविचारः | टण्टङ्कारच्छलेनासौ शैवानां मुक्तिहेतवे / नेति नेति मुहुः प्राह डमरुः शाम्भवो हि सः // NBस्_५०.४५ //
1402 SK अथ मुण्डमालाविचारः | अनन्तमृतब्रह्माण्डमुण्डमालाविधारणे / अनाद्यनन्तरूपत्वात्समर्थः शिव एव हि // NBस्_५०.४६ //
1403 SK अथ वृषवाहनविचारः | ब्रह्माद्या यत्र नारूढास्तमारोहति शङ्करः / समाधिं धर्ममेघाख्यं तेनायं वृषवाहनः // NBस्_५०.४७ //
1404 SK अथ कैलासविचारः | कैवल्ये लसते रुद्रस्तद्भक्ता अपि सर्वदा / तत्कैवल्यविलासेन कैलासं शम्भुमन्दिरम् // NBस्_५०.४८ //
1405 SK अथ मन्दरविचारः | मथितो मुक्तिरत्नार्थं येनायं भवसागरः / स बोधो मन्दरो नाम मन्दिरं शङ्करस्य तत् // NBस्_५०.४९ //
1406 SK अथ श्मशानविचारः | नित्यं क्रीडति यत्रायं स्वयं संहारभैरवः / तत्र श्मशाने संसारे शिवः सर्वत्र दृश्यते // NBस्_५०.५० //
1407 SK अथ गणविचारः | आनन्दसागरः शम्भुस्तच्छक्तिर्द्रव उच्यते / शीकरा इव सामुद्रास्तदानन्दकणा गणाः // NBस्_५०.५१ //
1408 SK जगद्विलक्षणः स्वामी स्वरूपाकृतिलक्षणैः / जगद्विलक्षणा एव गणास्तस्य किमद्भुतम् // NBस्_५०.५२ //
1409 SK अथ योगिनीगणविचारः | यैव यैव मनोवृत्तिर्योगाभ्यासेन योगिनाम् / सा समीपं गता शम्भोः सैवायं योगिनीगणः // NBस्_५०.५३ //
1410 SK सखायः शङ्करस्यैते योगिनीभैरवादयः / जीवन्मुक्ता जडैरुक्ता भूतप्रेतपिशाचकाः // NBस्_५०.५४ //
1411 SK अथ कालभैरवविचारः | विवर्त्तितजगज्जालः कालोऽस्य द्वारपालकः / कालाद्बिभेति यद्विश्वं स गणः कालभैरवः // NBस्_५०.५५ //
1412 SK अथ दण्डपाणिविचारः | मनसो दण्डनेनैव दण्डपाणिर्गणो भवेत् / तादृशा एव देवस्य गणत्वमुपयान्ति हि // NBस्_५०.५६ //
1413 SK अथ क्षेत्रपालविचारः | परमात्मा स्वयं शम्भुस्तदंशाः क्षेत्रपालकाः / अंशांशिभावभेदेन क्षेत्रपालैर्वृतो हरः // NBस्_५०.५७ //
1414 SK अथ नन्दिगणविचारः | यस्योपरि स्फुरद्रूपो दृश्यते परमेश्वरः / स बोधः शुद्धभावात्मा गीयते नन्दिकेश्वरः // NBस्_५०.५८ //
1415 SK अथ भृङ्गिविचारः | यः कीटभृङ्गभावेन भक्तः सारूप्यमागतः / स एव खण्डपरशोर्भृङ्गिनामा गणः किल // NBस्_५०.५९ //
1416 SK अथ महाकालविचारः | कालेन भक्षितं विश्वं कालो बोधेन भक्षितः / बोधात्मा कालकालोऽयं महाकालो परो गणः // NBस्_५०.६० //
1417 SK अथ स्कन्दविचारः | बोधस्वसेनया येन मोहस्य स्कन्दनं कृतम् / स बुद्धिमान्महासेनः स्कन्दो नाम शिवात्मजः // NBस्_५०.६१ //
1418 SK अथ गणेशविचारः | सुतोऽन्यो विघ्नराशिघ्नः सर्वविद्याविशारदः / आनन्दतुन्दिलः साक्षात्सिद्धिदाता गणेश्वरः // NBस्_५०.६२ //
1419 SK अथ शिवरात्रिविचारः | या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्त्ति संयमी / जागर्त्ति शिवरात्रौ यः शिवस्तस्मिन्प्रसीदति // NBस्_५०.६३ //
1420 SK पञ्चकर्मेन्द्रियाण्येव पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च / मनोऽहंकृतिचित्तानि त्रीणि बुद्धिश्चतुर्दशी // NBस्_५०.६४ //
1421 SK इयं तु शाम्भवैः प्रोक्ता शिवरात्रिचतुर्दशी / निराहारतया तत्र वृत्तिरोधी भवेद्बुधः // NBस्_५०.६५ //
1422 SK शिवभक्तैः कृता पूर्वं शिवस्यात्यन्तवल्लभा / शिवरात्रिरियं पुत्र शिवसायुज्यदायिनी // NBस्_५०.६६ //
1423 SK निशीथ एव मध्याह्नो रात्रिरेव दिनं विभोः / न यत्र किञ्चित्काशेत स प्रकाशस्तु शाम्भवः // NBस्_५०.६७ //
1424 SK अथ शिवताण्डवविचारः | यस्यानन्दलयेनैव नन्दिता नारदादयः / तदानन्दविनोदाख्यं शाम्भवं विद्धि ताण्डवम् // NBस्_५०.६८ //
1425 SK अथ स्मरहरत्वविचारः | हृते स्मरे हृता एव षडप्येते स्मरादयः / स्मरादिहरणादेव देवः स्मरहरो हरः // NBस्_५०.६९ //
1426 SK अथ गौरीविचारः | सा स्वभावेन वामैव मनोवाचामगोचरा / वामाङ्गी वामदेवस्य वामे गौरी विराजते // NBस्_५०.७० //
1427 SK सा ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठा भवानी ब्रह्मवादिनी / या कटाक्षेण सर्वत्र शिवाख्यं ब्रह्म वीक्षते // NBस्_५०.७१ //
1428 SK मम प्रियो मम स्वामी ममाऽऽत्त्मा मे गृहेश्वरः / इति यस्याः शिवे भावः सा धन्या शैलकन्यका // NBस्_५०.७२ //
1429 SK स ईक्षितः स आश्लिष्टः स भुक्तः स च पूजितः / स एव हृदये ध्यातः पार्वत्या परमेश्वरः // NBस्_५०.७३ //
1430 SK शिवं भजति भावेन पातिव्रत्येन पार्वती / अतः सौभाग्यमेतस्या लोके वेदे च गीयते // NBस्_५०.७४ //
1431 SK योगेश्वराणां योगोऽयं भुज्यते यन्महेश्वरः / तेन योगेन सम्पन्ना भवानी दिव्ययोगिनी // NBस्_५०.७५ //
1432 SK नित्यं नृत्यति पार्वत्याः पुरतः परमेश्वरः / यदन्तस्तादृशं प्रेम तदग्रे किं न नृत्यतु // NBस्_५०.७६ //
1433 SK एकात्मभावसम्पन्नौ स्थितौ भिन्नात्मकाविव / भवानीशङ्करौ वन्दे ब्रह्मविद्ब्रह्मणी यथा // NBस्_५०.७७ //
1434 SK प्रकारद्वितयेनापि पार्वती स्तुतिमर्हति / यदस्याः शङ्करे प्रेम यदस्यां प्रेम शाङ्करम् // NBस्_५०.७८ //
1435 SK पूजनीया विशेषेण शङ्करादपि पार्वती / साक्षादानन्दरूपो यस्तस्याप्यानन्दवर्धिनी // NBस्_५०.७९ //
1436 SK परब्रह्मस्वरूपैव पार्वती नात्र संशयः / यदस्यां प्रचुरप्रेमा ब्रह्मज्ञानी सदाशिवः // NBस्_५०.८० //
1437 SK मन्दारास्तरवो वनेषु परिखातोयं सुधासागरो द्वारेप्यष्टविभूतयो निधिगणैरन्तःपुरे पार्वती / शूलं शस्त्रवरं वृषः प्रियसखा नारः कपालः करे ग्रैवेयं गरलं भुजेषु भुजगा भस्माङ्गरागे रुचिः // NBस्_५०.८१ //
1438 SK चन्द्रादित्यशतप्रकाशजयिनी चन्द्रावतंसोज्ज्वला गङ्गागर्भजटाधरा त्रिनयना गङ्गाम्बुवन्निर्मला / वामे भूधरकन्यका सहचरी भूत्या सदाऽ; लंकृता स्वानन्दा शितिकण्ठिनी पुरभिदो मूर्त्तिः पुरः स्फूर्जति // NBस्_५०.८२ //
1439 SK इति सोपकरणं ध्यानम्
1440 SK पशुपतये नमः स्नानम् | पशुत्ववासना त्याज्या ज्ञानगङ्गाम्बुधारया / पवित्रया शीतलया स्नाप्यः पशुपतिः शिवः // NBस्_५०.८३ //
1441 SK शिवाय नम इति पूजनम् | शिवो देवः शिवो जीवः शिवादन्यन्न विद्यते / एवं शिवे प्रकर्त्तव्यं भक्त्या चन्दनलेपनम् // NBस्_५०.८४ //
1442 SK अथाक्षताः | भजनादक्षता भक्ता देवस्तु स्वयमक्षतः / अतस्त्वक्षतया भक्त्या पूजनीयः शिवोऽक्षतैः // NBस्_५०.८५ //
1443 SK अथार्कपुष्पविचारः | अर्कः पाशुपतो नाम देवः पाशुपतप्रियः / अतः पाशुपतार्कस्य पुष्पं पशुपतेः प्रियम् // NBस्_५०.८६ //
1444 SK कटुपत्रस्तरुः कोऽ; पि भक्तेन गिरिशेऽर्पितः / प्रकाशकस्तमोहन्ता स एवार्कत्वमागतः // NBस्_५०.८७ //
1445 SK पुष्पं कटुदलस्यास्य शाम्भवेन निवेदितम् / शम्भुना स्वीकृतं तेन सा जाता शिवमल्लिका // NBस्_५०.८८ //
1446 SK अथ धत्तूरनिर्णयः | ईश्वरस्य प्रसादेन भासतेऽन्यादृशं जगत् / स्वसमानगुणत्वेन धत्तूरः शिववल्लभः // NBस्_५०.८९ //
1447 SK उन्मन्या स्वयमुन्मत्त उन्मादयति शाम्भवान् / अत एव प्रियं शम्भोः पुष्पमुन्मत्तसम्भवम् // NBस्_५०.९० //
1448 SK कैतवं कितवस्यास्य सर्वगोऽयं न लिप्यते / अतः कितवधूर्त्तस्य कैतवं कुसुमं प्रियम् // NBस्_५०.९१ //
1449 SK कामादयो महाधूर्त्ता धूर्तितं यैर्जगत्त्रयम् / तान्धूर्तयति यो युक्त्या स धूर्तो धूर्जटिप्रियः // NBस्_५०.९२ //
1450 SK अर्पितं शङ्करे धूर्त्तपत्रं कनकपुण्यदम् / अनेन हेतुना जातो धत्तूरः कनकाह्वयः // NBस्_५०.९३ //
1451 SK अथ कण्टकारिकानिर्णयः | भक्त्या भक्तेन चेद् वृत्तिर्मनसः शङ्करेऽर्पिता / सकण्टकस्वभावापि जाता साऽकण्टकारिका // NBस्_५०.९४ //
1452 SK अथ बिल्वविचारः | शिवभक्तिस्वभावेन शाण्डिल्यो हि महामुनिः / तन्नाम्नैव प्रियं शम्भोः पत्रं शाण्डिल्यसम्भवम् // NBस्_५०.९५ //
1453 SK विश्वरूपो महादेवः स्वयं शैलूषलक्षणः / अतः शैलूषपत्राणां पूजया स प्रसीदति // NBस्_५०.९६ //
1454 SK जन्मनस्तु फलं श्रीमद्बिल्वपत्रार्पणाच्छिवे / अतो निरूपितो वृक्षो बिल्वः श्रीफलसंज्ञया // NBस्_५०.९७ //
1455 SK धूपप्रदीपनैवेद्यफलताम्बूलदक्षिणाः / शिवाय नम इत्येव सर्वमेवास्य पूजनम् // NBस्_५०.९८ //
1456 SK विद्यासु श्रुतिरुत्कृष्टा रुद्रैकादशिनी श्रुतौ / तत्र पञ्चाक्षरी श्रेष्ठा सा जप्या शिवतुष्टये // NBस्_५०.९९ //
1457 SK द्रष्टा च दर्शनं दृश्यमिति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे प्रथमा बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०० //
1458 SK कर्त्ता कार्यं च करणमिति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे द्वितीया बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०१ //
1459 SK भोक्ता च भोजनं भोज्यमिति पत्रत्रयात्मिका / शिवे समर्प्या चिद्रूपे तृतीया बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०२ //
1460 SK भूर्भुवश्च तथा स्वर्ग इति पत्रत्रयात्मिका / शिवे समर्प्या चिद्रूपे चतुर्थी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०३ //
1461 SK जाग्रत्स्वप्नस्तथा सुप्तिरिति पत्रत्रयान्विना / शिवे समर्प्या चिद्रूपे पञ्चमी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०४ //
1462 SK स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमिति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे षष्ठिका बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०५ //
1463 SK अविद्या संसृतिर्जीव इति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे सप्तमी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०६ //
1464 SK उत्पत्तिश्च स्थितिर्नाश इति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे ह्यष्टमी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०७ //
1465 SK ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे नवमी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०८ //
1466 SK तमो रजस्तथा सत्त्वमिति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे दशमी बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.१०९ //
1467 SK त्वन्ताऽहन्ता तथेदंत्वमिति पत्रत्रयान्विता / शिवे समर्प्या चिद्रूपे रुद्राख्या बिल्वपत्रिका // NBस्_५०.११० //
1468 SK एकादशैताः कथिताः शाम्भवाः बिल्वपत्रिकाः / एताभिरर्चितः शम्भुः सद्यो मुक्तिं प्रयच्छति // NBस्_५०.१११ //
1469 SK अथाष्टमूर्तिपूजनम् | शर्वो भवो रुद्र उग्रो भीमः पशुपतिस्तथा / महादेवस्तथेशान इति मूर्तिप्रपूजनम् // NBस्_५०.११२ //
1470 SK अष्टौ प्रकृतिरूपाणि कष्टान्यष्टैव देहिनः / स्पष्टं मूर्तिभिरष्टाभिरष्टमूर्तिर्हरत्यसौ // NBस्_५०.११३ //
1471 SK अथ प्रदक्षिणनिर्णयः | अपर्यन्तो महादेवस्तस्य कल्पशतैरपि / न स्यात्प्रदक्षिणं तेन शिवस्यार्धं प्रदक्षिणम् // NBस्_५०.११४ //
1472 SK अथ गल्लवाद्यविचारः | यथा स्वरूपं देवस्य तथा वक्तुं न शक्यते / स्तुतिर्वा गल्लवाद्यं वा तेन शम्भोर्द्वयं समम् // NBस्_५०.११५ //
1473 SK अथ नमस्कारविचारः | प्रेमनिर्भरभावेन दण्डवत्पतितैर्भुवि / महादेवो नमस्कार्यो गलितत्वादहङ्कृतेः // NBस्_५०.११६ //
1474 SK अथ क्षमापनम् | मानुष्यमपि संप्राप्य पूजितो न महेश्वरः / अपराधो महाञ्जातः क्षमस्वेति मुहुर्वदेत् // NBस्_५०.११७ //
1475 SK अथ विसर्जननिर्णयः ज्ञत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वजीवत्वादिविसर्जनम् / एतस्यां शिवपूजायामेतदेव विसर्जनम् // NBस्_५०.११८ //
1476 SK आज्ञाकरत्वमायाति पुरुषार्थचतुष्टयी / यतोऽस्याः शिवपूजाया महिमा केन वर्ण्यताम् // NBस्_५०.११९ //
1477 SK तत्त्वतो यः शिवं वेद स वेद शिवपूजनम् / कस्तत्त्वतः शिवं वेद को वेद शिवपूजनम् // NBस्_५०.१२० //
1479 SK बोधसारप्रशंसा आदौ गुरुस्तवो यत्र प्रान्ते च शिवपूजनम् / मध्ये मुकुन्दस्मरणं बोधसारः स उत्तमः // NBस्_५१.१ //
1480 SK सिद्धार्थः सुगमार्थश्च विशेषैर्बहुभिर्वृतः / ग्रन्थस्त्वेताद्दृशस्तात न भूतो न भविष्यति // NBस्_५१.२ //
1481 SK न स्तोमि न च निन्दामि कथयामि यथास्थितम् / एकैकस्मिन्निह श्लोके प्रोक्तः सिद्धान्तनिर्णयः // NBस्_५१.३ //
1482 SK यथा ब्रह्माण्डसर्वस्वं पिण्डे पिण्डे निरूपितम् / तथा सिद्धान्तसर्वस्वं श्लोके श्लोके निरूपितम् // NBस्_५१.४ //
1483 SK अविद्योन्मूलकुद्दालस्त्वविद्यादावपावकः / अविद्यामृगशार्दूलस्त्वविद्यागजकेसरी // NBस्_५१.५ //
1484 SK अविद्याजीवगरलमविद्याकण्ठकृच्छुरी / अविद्यालवणस्याऽऽप अविद्याप्रलयार्णवः // NBस्_५१.६ //
1485 SK अविद्याशैलदम्भोलिरविद्याऽन्धकशङ्करः / अविद्याकंसगोविन्दस्त्वविद्याचण्डचण्डिका // NBस्_५१.७ //
1486 SK अविद्यादाहशीतांशुरविद्याध्वान्तभास्करः / तथैव बोधसारोऽयमविद्यास्वप्नजागरः // NBस्_५१.८ //
1488 SK बोधसारोपासना गुरुर्मे बोधसारोऽयं यतो ज्ञानप्रदो मम / शिष्यो मे बोधसारोऽयं यमुद्दिश्य वदाम्यहम् // NBस्_५२.१ //
1489 SK स्वामी मे बोधसारोऽयं मां पालयति यः सदा / सेवको बोधसारो मे मम सेवां करोति यः // NBस्_५२.२ //
1490 SK सुहृन्मे बोधसारोऽयं सर्वं जानाति मद्गतम् / सखा मे बोधसारोऽयं यस्मिन्दृष्टे सुखं मम // NBस्_५२.३ //
1491 SK गृहं मे बोधसारोऽयं यत्रैव निवासाम्यहम् / आरामो बोधसारो मे विहारो यत्र मामकः // NBस्_५२.४ //
1492 SK कान्ता मे बोधसारोऽयं यमालिङ्ग्य स्वपाम्यहम् / मनो मे बोधसारोऽयं मननं येन जायते // NBस्_५२.५ //
1493 SK बुद्धिर्मे बोधसारोऽयं परमं बुध्यते यया / चित्तं मे बोधसारोऽयं येन चेतामि तत्पदे // NBस्_५२.६ //
1494 SK अहङ्कारो बोधसारो बोधसारोऽहमेव हि / शरीरं बोधसारो मे ममता यत्र भूयसी // NBस्_५२.७ //
1495 SK प्राणो मे बोधसारोऽयं ममता यत्र भूयसी / जीवो मे बोधसारोऽयं येन जीवाम्यहं सदा // NBस्_५२.८ //
1496 SK ईश्वरो बोधसारो मे यतो मुक्तिप्रदो मम / बोधसारः परं ब्रह्म बोधसारात्परं नहि // NBस्_५२.९ //
1 SK प्रामाण्यसिद्धये उपनिषदि वने ये पुष्पिता मन्त्रवृक्षाः सुरभिकुसुममेषामेकमेकं विविच्य / समरसपदलब्ध्यै वाङ्मयैरेवपुष्पैर्नरहरिसुधियैतत्पूजितं बोधलिङ्गम्
2 SK बुधजनहितकारी संप्रदायानुसारी परमसुखनिधानं मोहमुक्तेर्निदानम् / नरहरिविहितोऽयं बोधवृक्षस्य तोयं कुमतिवनकुठारः पठ्यतां बोधसारः
3 SK गुरुभिर्दीक्षितानां हि सर्वमेवेश्वरार्पणम् / अयं तु बोधसारोऽस्य स्वात्मैव परमेशितुः
Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Narahari: Bodhasāra (sa_narahari-bodhasAra.htm).
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