Verses on the Division of the Middle Way

Madhyāntavibhāgakārikā · Mअध्यान्तविभागकारिका

Verses on the Division of the Middle Way

Madhyāntavibhāgakārikā

Mअध्यान्तविभागकारिका

SK
Āर्यमैत्रेयप्रणीता Mअध्यान्तविभागकारिका (Mव्क्)
SK
Lअक्षणपरिच्छेदः प्रथमः
SK
लक्षणं ह्यावृतिस्तत्त्वं प्रतिपक्षस्य भावना / तत्रावस्था फलप्राप्तिर्यानानुत्तर्यमेव च // Mव्क्_१.१ //
SK
अभूतपरिकल्पो ऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते / शून्यता विद्यते त्वत्र तस्यामपि स विद्यते // Mव्क्_१.२ //
SK
न शून्यं नापि चाशून्यं तस्मात् सर्वं विधीयते / सत्त्वादसत्त्वात् सत्त्वाच्च मध्यमा प्रतिपच्च सा // Mव्क्_१.३ //
SK
अर्थसत्त्वात्मविज्ञप्तिप्रतिभासं प्रजायते / विज्ञानं नास्ति चास्यार्थस्तदभावात्तदप्यसत् // Mव्क्_१.४ //
SK
अभूतपरिकल्पत्वं सिद्धमस्य भवत्यतः / न तथा सर्वथाभावात् तत्क्षयान्मुक्तिरिष्यते // Mव्क्_१.५ //
SK
कल्पितः परतन्त्रश्च परिनिष्पन्न एव च / अर्थादभूतकल्पाच्च द्वयाभावाच्च देशितः // Mव्क्_१.६ //
SK
उपलब्धिं समाश्रित्य नोपलब्धिः प्रजायते / नोपलब्धिं समाश्रित्य नोपलब्धिः प्रजायते // Mव्क्_१.७ //
SK
उपलब्धेस्ततः सिद्धा नोपलब्धिस्वभावता / तस्माच्च समता ज्ञेया नोपलम्भोपलम्भयोः // Mव्क्_१.८ //
SK
अभूतपरिकल्पश्च चित्तचैत्तास्त्रिधातुकाः / तत्रार्थदृष्टिर्विज्ञानं तद्विशेषे तु चैतसाः // Mव्क्_१.९ //
SK
एवं प्रत्ययविज्ञानं द्वितीयं चौपभोगिकम् / उपभोगपरिच्छेदप्रेरकास्तत्र चैतसाः // Mव्क्_१.१० //
SK
छादनाद्रोपणाच्चैव नयनात्संपरिग्रहात् / पूरणात् त्रिपरिच्छेदादुपभोगाच्च कर्षणात् // Mव्क्_१.११ //
SK
निबन्धनादाभिमख्याद् दुःखनात् क्लिश्यते जगत् / त्रेधा द्वेधा च संक्लेशः सप्तधाभूतकल्पनात् // Mव्क्_१.१२ //
SK
लक्षणं चाथ पर्यायस्तदर्थो भेद एव च / साधनञ्चेति विज्ञेयं शून्यतायाः समासतः // Mव्क्_१.१३ //
SK
द्वयाभावो ह्यभावस्य भावः शून्यस्य लक्षणम् / न भावो नापि चाभावओ न पृथक्त्वैकलक्षणम् // Mव्क्_१.१४ //
SK
तथता भूतकोटिश्चानिमित्तं परमार्थता / धर्मधातुश्च पर्यायाः शून्यतायाः समासतः // Mव्क्_१.१५ //
SK
अनन्यथाविपर्यासतन्निरोधार्यगोचरैः / हेतुत्वाच्चार्यधर्मणां पर्यायार्थो यथाक्रमम् // Mव्क्_१.१६ //
SK
संक्लिष्टा च विशुद्धा च समला निर्मला च सा / अब्धातुकनकाकाशशुद्धिवच्छुद्धिरिष्यते // Mव्क्_१.१७ //
SK
भोक्तृभोजनतद्धेहप्रतिष्ठावस्तुशून्यता / तच्च येन यथा दृष्टं यदर्थं तस्य शून्यता // Mव्क्_१.१८ //
SK
शुभद्वयस्य प्राप्त्यर्थ सदा सत्त्वहिताय च / संसारात्यजनार्थं च कुशलस्याक्षयाय च // Mव्क्_१.१९ //
SK
गोत्रस्य च विशुद्धयर्थं लक्षणव्यञ्जनाप्तये / शुद्धये बु[द्ध]धर्माणां बोधिसत्त्वः प्रपद्यते // Mव्क्_१.२० //
SK
पुद्गलस्याथ धर्माणामभावः शून्यतात्र हि / तदभावस्य सद्भावस्तस्मिन् सा शून्यतापरा // Mव्क्_१.२१ //
SK
संक्लिष्टा चेद्भवेन्नासौ मुक्तास्स्युः सर्वदेहिनः / विशुद्धा चेद्भवेन्नासौ व्यायामो निष्फलो भवेत् // Mव्क्_१.२२ //
SK
न क्लिष्टा नापि व ऽआक्लिष्टा शुद्धाशुद्धा न चैव सा / प्रभास्वरत्वाच्चित्तस्य क्लेशस्यागन्तुकत्वतः // Mव्क्_१.२३ //
SK
// इति लक्षणपरिच्छेदः प्रथमः //
SK
Āवरणपरिच्छेदो द्वितीयः
SK
व्यापि प्रादेशिकोद्रिक्तसमादानविवर्जनम् / द्वयावरणमाख्यातं नवधा क्लेशलक्षणम् // Mव्क्_२.१ //
SK
संयोजनान्यावरणमुद्वेगसमुपेक्षयोः / तत्त्वदृष्टेश्च सत्कायदृष्टेस्तद्वस्तुनो ऽपि च // Mव्क्_२.२ //
SK
निरोधमार्गरत्नेषु लाभसत्कार एव च / सङ्क्लेशस्य परिज्ञाने शुभादौ दशधापरम् // Mव्क्_२.३ //
SK
अप्रयोगो ऽनायतने ऽयोगविहितश्च यः / नोत्पत्तिरमनस्कारः सम्भारस्याप्रपूर्णता // Mव्क्_२.४ //
SK
गोत्रमित्रस्य वैधुर्यं चित्तस्य परिखेदिता / प्रतिपत्तेश्च वैधुर्यं कुदुष्टजनवासता // Mव्क्_२.५ //
SK
दौष्ठुल्यमवशिष्टत्वं त्रयात् प्रज्ञाविपक्वता / प्रकृत्या चैव दौष्ठुल्यं कौसीद्यं च प्रमादिता // Mव्क्_२.६ //
SK
सक्तिर्भवे च भोगे च लीनचित्तत्वमेव च / अश्रद्धानधिमुक्तिश्च यथारुतविचारणा // Mव्क्_२.७ //
SK
सद्धर्मे ऽगौरवं लाभे गुरुताकृपता तथा / श्रुतव्यसनमल्पत्वं समाध्यपरिकर्मिता // Mव्क्_२.८ //
SK
शुभं बोधिः समादानं धीमत्त्वाभ्रान्त्यनावृती / नृत्यत्रासो ऽमत्सरित्वं वशित्वञ्च शुभादयः // Mव्क्_२.९ //
SK
त्रीणि त्रीणि च एतेषां ज्ञेयान्यावरणानि हि / पक्ष्यपारमिताभूमिष्वन्यदावरणं पुनः // Mव्क्_२.१० //
SK
वस्त्वकौशलकौसीद्यं समाधेर्द्वयहीनता / अरोपणाथ दौर्बल्यं दृष्टिदौष्ठुल्यदुष्टता // Mव्क्_२.११ //
SK
ऐश्वर्यस्याथ सुगतेः सत्त्वात्यागस्य चावृतिः / हानिवृद्ध्योश्च दोषाणां गुणानामवतारणे // Mव्क्_२.१२ //
SK
विमोचने ऽक्षयत्वे च नैरन्तर्ये शुभस्य च / नियतीकरणे धर्मसम्भोगपरिपाचने // Mव्क्_२.१३ //
SK
सर्वत्रगार्थे अग्रार्थे निष्यन्दाग्रार्थ एव च / निष्परिग्रहतार्थ च सन्तानाभेद एव च // Mव्क्_२.१४ //
SK
निस्सङ्क्लेशविशुद्ध्यर्थे ऽनानात्वार्थ एव च / अहीनानधिकार्थे च चतुर्धावशिताश्रये // Mव्क्_२.१५ //
SK
धर्मधातावविद्येयमक्लिष्टा दशधावृतिः / दशभूमिविपक्षेण प्रतिपक्षास्तु भूमयः // Mव्क्_२.१६ //
SK
क्लेशावरणमाख्यातं ज्ञेयावरणमेव च / सर्वाण्यावरणानीह यत्क्षयान्मुक्तिरिष्यते // Mव्क्_२.१७ //
SK
// इत्यावरणपरिच्छेदो द्वितीयः //
SK
Tअत्त्वपरिच्छेदस्तृतीयः
SK
मूललक्षणतत्त्वमविपर्यासलक्षणम् / फलहेतुमयं तत्त्वं सूक्ष्मौदारिकमेव च // Mव्क्_३.१ //
SK
प्रसिद्धं शुद्धिविषयं सङ्ग्राह्यं भेदलक्षणम् / कौशल्यतत्त्वं दशधा आत्मदृष्टिविपक्षतः // Mव्क्_३.२ //
SK
स्वभावस्त्रिविधो ऽसच्च नित्यं सच्चाप्यतत्त्वतः / सदसत्तत्त्वतश्चेति स्वभावत्रयमिष्यते // Mव्क्_३.३ //
SK
समारोपापवादस्य धर्मपुद्गलयोरिह / ग्राह्यग्राहकयोश्चापि भावाभावे च दर्शनम् // Mव्क्_३.४ //
SK
यज्ज्ञानान्न प्रवर्तेत तद्धि तत्त्वस्य लक्षणम् / असदर्थो ह्यनित्यार्थ उत्पाददव्ययलक्षणः // Mव्क्_३.५ //
SK
समलामलभावेन मूलतत्त्वे यथाक्रमम् / दुःखमादानलक्ष्माख्यं सम्बन्धेनापरं मतम् // Mव्क्_३.६ //
SK
अभावश्चाप्यतद्भावः प्रकृतिः शून्यता मता / अलक्षणञ्च नैरात्म्यं तद्विलक्षणमेव च // Mव्क्_३.७ //
SK
स्वलक्षणञ्च निर्दिष्टं दुःखसत्यमतो मतम् / वासनाथ समुत्थानमविसंयोग एव च // Mव्क्_३.८ //
SK
स्वभावद्वयनोत्पत्तिर्मलशान्तिद्वयं मतम् / परिज्ञायां प्रहाणे च प्राप्तिसाक्षात्कृतावयम् // Mव्क्_३.९ //
SK
मार्गसत्यं समाख्यातं प्रज्ञप्तिप्रतिपत्तितः / तथोद्भावनयौदारं परमार्थन्तु एकतः // Mव्क्_३.१० //
SK
अर्थप्राप्तिप्रपत्त्या हि परमार्थस्त्रिधा मतः / निर्विकाराविपर्यासपरिनिष्पत्तितो द्वयम् // Mव्क्_३.११ //
SK
लोकप्रसिद्धमेकस्मात् त्रयाद् युक्तिप्रसिद्धकम् / विशुद्धगोचरं द्वेधा एकस्मादेव कीर्तितम् // Mव्क्_३.१२ //
SK
निमित्तस्य विकल्पस्य नाम्नश्च द्वयसङ्ग्रहः / सम्यग्ज्ञानसतत्त्वस्य एकेनैव च सङ्ग्रहः // Mव्क्_३.१३ //
SK
प्रवृत्तितत्त्वं द्विविधं सन्निवेशकुपन्नता / एकं लक्षणविज्ञप्तिशुद्धिसम्यक्प्रपन्नता // Mव्क्_३.१४ //
SK
एकहेतुत्वभोक्तृत्वकर्तृत्ववशवर्तने / आधिपत्यार्थनित्यत्वे क्लेशशुद्ध्याश्रये ऽपि च // Mव्क्_३.१५ //
SK
योगित्वामुक्तमुक्तत्वे आत्मदर्शनमेषु हि / परिकल्पविकल्पार्थधर्मतार्थेन तेषु ते // Mव्क्_३.१६ //
SK
अनेकत्वाभिसङ्क्षेपपरिच्छेदार्थ आदितः / ग्राहकग्राह्यतद्ग्राहबीजार्थश्चापरो मतः // Mव्क्_३.१७ //
SK
वेदितार्थपरिच्छेदभोगायद्वारतो ऽपरम् / पुनर्हेतुफलायासानारोपानपवादतः // Mव्क्_३.१८ //
SK
अनिष्टेष्टविशुद्धीनां समोत्पत्त्याधिपत्ययोः / सम्प्राप्तिसमुदाचारपारतन्त्र्यार्थतो ऽपरम् // Mव्क्_३.१९ //
SK
ग्रहणस्थानसन्धानभोगशुद्धिद्वयार्थतः / फलहेतूपयोगार्थनोपयोगात्तथापरम् // Mव्क्_३.२० //
SK
वेदनासनिमित्तार्थतन्निमित्तप्रपत्तितः / तच्छमप्रतिपक्षार्थयोगादपरमिष्यते // Mव्क्_३.२१ //
SK
गुणदोषाविकल्पेन ज्ञानेन परतः स्वयम् / निर्याणादपरं ज्ञेयं सप्रज्ञप्तिसहेतुकात् // Mव्क्_३.२२ //
SK
निमित्तात् प्रशमात् सार्थात् पश्चिमं समुदाहृतम् //
SK
// इति तत्त्वपरिच्छेदस्तृतीयः //
SK
Pरतिपक्षभावनावस्थाफलपरिच्छेदश्चतुर्थः
SK
दौष्ठुल्यात् तर्षहेतुत्वाद् वस्तुत्वादविमोहतः / चतुस्सत्यावताराय स्मृत्युपस्थानभावना // Mव्क्_४.१ //
SK
परिज्ञाते विपक्षे च प्रतिपक्षे च सर्वथा / तदपायाय वीर्यं हि चतुर्धा सम्प्रवर्तते // Mव्क्_४.२ //
SK
कर्मण्यता स्थितेस्तत्र सर्वार्थानां समृद्धये / पञ्चदोषप्रहाणाष्टसंस्कारासेवनान्वया // Mव्क्_४.३ //
SK
कौसीद्यमववादस्य सम्मोषो लय उद्धवः / असंस्कारो ऽथ संस्कारः पञ्च दोषा इमे मताः // Mव्क्_४.४ //
SK
आश्रयो ऽथाश्रितस्तस्य निमित्तं फलमेव च / आलम्बने ऽसम्मोषो लयौद्धत्यानुबुद्ध्यना // Mव्क्_४.५ //
SK
तदपायाभिसंस्कारः शान्तौ प्रशठवाहिता / रोपिते मोक्षभागीये च्छन्दयोगाधिपत्यतः // Mव्क्_४.६ //
SK
आलम्बने ऽसम्मोषाविसारविचयस्य च / विपक्षस्य हि संलेखात् पूर्वस्य फलमुत्तरम् // Mव्क्_४.७ //
SK
द्वौ द्वौ निर्वेधभागीयाविन्द्रियाणि बलानि च / आश्रयाङ्गं स्वभावाङ्गं निर्याणाङ्गं तृतीयकम् // Mव्क्_४.८ //
SK
चतुर्थमनुशंसाङ्गं निःक्लेशाङ्गं त्रिधा मतम् / निदानेनाश्रयेणेह स्वभावेन च देशितम् // Mव्क्_४.९ //
SK
परिच्छेदो ऽथ सम्प्राप्तिः परसम्भावना त्रिधा / विपक्षप्रतिपक्षश्च मार्गस्याङ्गं तदष्टधा // Mव्क्_४.१० //
SK
दृष्टौ शीले ऽथ संलेखे परविज्ञप्तिरिष्यते / क्लेशोपक्लेशवैभुत्वविपक्षप्रतिपक्षता // Mव्क्_४.११ //
SK
अनुकूला विपर्यस्ता सानुबन्धा विपर्यया / अविपर्यस्तविपर्यासाननुबन्ध च भावना // Mव्क्_४.१२ //
SK
आलम्बनमनस्कारप्राप्तितस्तद् विशिष्टता / हेत्ववस्थावताराख्या प्रयोगफलसंज्ञिता // Mव्क्_४.१३ //
SK
कार्याकार्यविशिष्टा च उत्तरानुत्तरा च सा / अधिमुक्तौ प्रवेशे च निर्याणे व्याकृतावपि // Mव्क्_४.१४ //
SK
कथिकत्वे ऽभिषेके च सम्प्राप्तावनुशंसने / कृत्यानुष्ठान उद्दिष्टा धर्माधातौ त्रिधा पुनः // Mव्क्_४.१५ //
SK
अशुद्धाशुद्धशुद्धा च विशुद्धा च यथार्थतः / पुद्गलानां व्यवस्थानं यथायोगमतो मतम् // Mव्क्_४.१६ //
SK
भाजनत्वं विपाकाख्यं बलन्तस्याधिपत्यतः / रुचिर्वृद्धिर्विशुद्धिश्च फलमेतद् यथाक्रमम् // Mव्क्_४.१७ //
SK
उत्तरोत्तरमाद्यञ्च तदभ्यासत् समाप्तितः / आनुकूल्याद् विपक्षाच्च विसंयोगाद् विशेषतः // Mव्क्_४.१८ //
SK
उत्तरानुत्तरत्वाच्च फलमन्यत् समासतः /
SK
// इति प्रतिपक्षभावनादिपरिच्छेदश्चतुर्थः //
SK
५ Yआनानुत्तर्यपरिच्छेदः पञ्चमः
SK
आनुत्तर्यंप्रपत्तौ हि पुनरालम्बने मतम् / समुदागम उद्दिष्टं प्रतिपत्तिस्तु षड् विधा // Mव्क्_५.१ //
SK
परमाथ मनस्कारे अनुधर्मे ऽन्तवर्जने / विशिष्टा चाविशिष्टा च परमा द्वादशात्मिका // Mव्क्_५.२ //
SK
औदार्यमायतत्वञ्च अधिकरो ऽक्षयात्मता / नैरन्तर्यमकृच्छ्रत्वं वित्तत्वञ्च परिग्रहः // Mव्क्_५.३ //
SK
आरम्भप्राप्तिनिष्यन्दनिष्पत्तिः परमा मता / ततश्च परमार्थेन दश पारमिता मताः // Mव्क्_५.४ //
SK
दानं शीलं क्षमा वीर्यं ध्यानं प्रज्ञा उपायता / प्रणिधानं बलं ज्ञानमेताः पारमिता दश // Mव्क्_५.५ //
SK
अनुग्रहो ऽविघातश्च कर्म तस्य च मर्षणम् / गुणवृद्धिश्च सामर्थ्यमवतारविमोचने // Mव्क्_५.६ //
SK
अक्षयत्वं सदा वृत्तिर्नियतं भोगपाचने / यथाप्रज्ञप्तितो धर्ममहायानमनस्क्रिया // Mव्क्_५.७ //
SK
बोधिसत्त्वस्य सततं प्रज्ञया त्रिप्रकारया / धातुपुष्टयैप्रवेशाय चार्थसिद्ध्यै भवत्यसौ // Mव्क्_५.८ //
SK
संयुक्ता धर्मचरितैः सा ज्ञेया दशभिः पुनः / लेखना पूजना दानं श्रवणं वाचनोद् ग्रहः // Mव्क्_५.९ //
SK
प्रकाशनाथ स्वाध्यायश्चिन्तना भावना च तत् / अमेयपुण्यस्कन्धं हि चरितं तद् दशात्मकम् // Mव्क्_५.१० //
SK
विशेषादक्षयत्वाच्च परानुग्रहतो ऽशमात् / अविक्षिप्ताविपर्यासप्रणता चानुधार्मिकी // Mव्क्_५.११ //
SK
व्युत्थानं विषये सारस्तथास्वादलयोद्धवः / सम्भावनाभिसन्धिश्च मनस्कारे ऽप्यहंकृतिः // Mव्क्_५.१२ //
SK
हीनचित्तञ्च विक्षेपः परिज्ञेयो हि धीमता / व्यञ्जनार्थमनस्कारे ऽविसारे लक्षणद्वये // Mव्क्_५.१३ //
SK
अशुद्धशुद्धावागन्तुकत्वे ऽत्रासितानुन्नतौ / संयोगात् संस्तवाच्चैव वियोगादप्यसंस्तवात् // Mव्क्_५.१४ //
SK
अर्थसत्त्वमसत्त्वञ्च व्यञ्जने सो ऽविपर्ययः / द्वयेन प्रतिभासत्वं तथा चाविद्यमानता // Mव्क्_५.१५ //
SK
अर्थे स चाविपर्यासः सदसत्त्वेन वर्जितः / तज्जल्पभावितो जल्पमनस्कारस्तदाश्रयः // Mव्क्_५.१६ //
SK
मनस्कारे ऽविपर्यासो द्वयप्रख्यानकारणे / मायादिवदसत्त्वञ्च सत्त्वञ्चार्थस्य तन्मतम् // Mव्क्_५.१७ //
SK
सो ऽविसारे ऽविपर्यासो भावाभावाविसारतः / सर्वस्य नाममात्रत्वं सर्वकल्पाप्रवृत्तये // Mव्क्_५.१८ //
SK
स्वलक्षणे ऽविपर्यासः परमार्थे स्वलक्षणे / धर्मधातुविनिर्मुक्तो यस्माद् धर्मो न विद्यते // Mव्क्_५.१९ //
SK
सामान्यलक्षणन्तस्मात् स च तत्राविपर्ययः / विपर्यस्तमनस्काराविहानिपरिहाणितः // Mव्क्_५.२० //
SK
तदशुद्धिर्विशुद्धिश्च स च तत्राविपर्ययः / धर्मधातोर्विशुद्धत्वात् प्रकृत्या व्योमवत्पुनः // Mव्क्_५.२१ //
SK
द्वयस्यागन्तुकत्वं हि स च तत्राविपर्ययः / संक्लेशश्च विशुद्धिश्च धर्मपुद्गलयोर्न हि // Mव्क्_५.२२ //
SK
असत्त्वात् त्रासतामानौ नातः सो ऽत्राविपर्ययः / पृथक्त्वैकत्वमन्तश्च तीर्थ्यश्रावकयोरपि // Mव्क्_५.२३ //
SK
समारोपापवादान्तो द्विधा पुद्गलधर्मयोः / विपक्षप्रतिपक्षान्तः शाश्वतोच्छेदसंज्ञितः // Mव्क्_५.२४ //
SK
ग्राह्यग्राहकसंक्लेशव्यवदाने द्विधा त्रिधा / विकल्पद्वयतान्तश्च स च सप्तविधो मतः // Mव्क्_५.२५ //
SK
भावाभावे प्रशाम्ये ऽथ शमने त्रास्यतद्भये / ग्राह्यग्राहे ऽथ सम्यक्त्वमिथ्यात्वे व्यापृतौ न च // Mव्क्_५.२६ //
SK
अजन्मसमकालत्वे स विकल्पद्वयान्तता / विशिष्टा चाविशिष्टा च ज्ञेया दशसु भूमिषु // Mव्क्_५.२७ //
SK
व्यवस्थानन्ततो धातुः साध्यसाधनधारणा / अवधारप्रधारा च प्रतिवेधः प्रतानता // Mव्क्_५.२८ //
SK
प्रगमः प्रशठत्वञ्च प्रकर्षालम्बनम्मतम् / अवैकल्याप्रतिक्षेपो ऽविक्षेपश्च प्रपूरणा // Mव्क्_५.२९ //
SK
समुत्पादो निरूढिश्च कर्मण्यत्वाप्रतिष्ठिता / निरावरणता तस्याप्रश्रब्धिसमुदागमः // Mव्क्_५.३० //
SK
शास्त्रं मध्यविभागं हि गूढसारार्थमेव च / महार्थञ्चैव सर्वार्थं सर्वानर्थप्रणोदनम् // Mव्क्_५.३१ //
SK
// इति यानानुत्तर्य परिच्छेदः पञ्चमः //
SK
समाप्ता मध्यान्तविभागकारिकाः

Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Maitreya (attrib.): Madhyāntavibhāgakārikā (sa_maitreya-madhyAntavibhAgakArikA.htm).

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