२२. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय परिभवनेन कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा ढोस्सभिक्षू ति वा कृत्वा वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा अखल्लमहल्ले ति वा अकुशलो ति वा अप्रतिकृतिज्ञो ति वा कृत्वा न शिरसा पादान् वन्दति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमी वर्षशतोपसम्पन्नाये भिक्षुणीये तदहोपसम्पन्नस्य भिक्षुस्य शिरसा वन्दितव्यं | अयं गौतमी भिक्षुणीनां प्रथमो गुरुधर्मो यावज्जीवं सत्कर्तव्यो गुरुकर्तव्यो मानयितव्यो पूजयितव्यो अनतिक्रमणीयो वेलामिव समुद्रेण ||
अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आमं | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचिवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि | आम | सम्मतासि विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनि | नहि | मा पितृघातिनि | नहि | मा अर्हन्तघातिनी | नहि | मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि | चिरा परिनिवृतो खो पुन सो भगवांस् तथागतो र्हन् सम्यक्सम्बुद्धो ||
SK
मा भिक्षुदूषिका | नहि | मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तिर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा दासि | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटि | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणि | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि | अन्यदापि यद्य् आह उपसम्पन्नपूर्वा ति | वक्तव्या गच्छ नस्य चल प्रपलाहि | नास्ति ते उपसम्पदा |
SK
अथ दान् आह | नहीति | उत्तरि समनुग्राहितव्या मा वातिला | मा पित्तिला | मा पिन्दिला | मा हल्लवाहिनी | मा पूयवाहिनी | मा चक्रवाहिनी | मा आर्द्रव्रणा | मा शुष्कव्रणा | मा शोणितव्रणा | मा शिखिरिणी | मा द्विपुरुषिका | मा स्त्रिपण्डिका | मा पुरुषद्वेषिणी
अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आम | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचीवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि आम | सम्मतासि | विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनि | नहि | मा पितृघातिनि | नहि | मा अर्हद्घातिनि | नहि | मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि |
SK
चिरपरिनिवृतो खो पुन सो भगवांस् तथागतो ऽर्हन् सम्यक्सम्बुद्धो |
SK
४४. मा भिक्षुदूषिका | नहि | मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तिर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा स्वयं सन्नद्धिका | नहि | मा दासि | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटि | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणी | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि अन्यदापि | यद्य् आह उपसम्पन्नपूर्वा ति | वक्तव्या | गच्छ नस्य चल प्रपलाहि नास्ति ते उपसंपदा |
SK
४५. अथाह | नहीति | वक्तव्या | मा वातिला | नहि | मा पित्तिला | नहि | मा पिन्दिला | नहि | मा हल्लवाहिनी | नहि मा पूयवाहिनी | नहि | मा चक्रवाहिनी | नहि | मा आर्द्रव्रणा | नहि | मा शुष्कव्रणा | नहि | मा शोनितव्रणा | नहि | मा शिखरिनी | नहि | मा द्विपुरुषिका | नहि | मा स्त्रीपण्डिका | नहि | मा पुरुषद्वेषिणी | नहि |
SK
४६. सन्ति खो पुनर् इमस्मिं काये विविधा आनुशयिका आबाधा संयथीदं | दर्द्रु कण्डू कच्छू रकचा | विचर्चिका अर्शो भगन्दला | पाण्डुरोग अलसको | लोहितपित्तं | ज्वरो | कासो श्वासो शोषो अपस्मारो | वातोदरं दकोदरं प्लीहोदरं मधुमेहो | सन्ति ते एते वा अन्ये वा विविधा आनुशयिका वा आबाधाः काये ऽस्मिन् न वा | यद्य् आह नहीति वक्तव्यं | तूष्णीका भवाहीति |
बुद्धशोभना च भोसि | धर्मशोभना च भोसि | संघशोभना च भोसि | बुद्ध गुरु च धर्म गुरु च संघ गुरु च | उपाध्यायिनी गुरु च | आचार्यायिणी गुरु च | शिक्षा गुरु च | तथा दानि करोहि | यथा | आरागयित्वा न विरागयसि | दुर्लभा क्षणसंपदा |
६२. अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आम | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचीवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि | आम | सम्मतासि | आम | विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनी | नहि | मा अर्हद्घातिनी | नहि मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि | चिरपरिनिवृत्तो खो पुन सो भगवांस् तथागतो ऽर्हन् सम्यक्सम्बुद्धो |
SK
मा भिक्षुदूषिका नहि मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तीर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा दासी | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटी | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणी | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि अन्यदापि | यद्य् आह | आमन् ति | वक्तव्या | गच्छ नस्य चल प्रपलाय नास्ति ते उपसंपदा | अथाह नहीति | वक्तव्यं | सन्ति खो पुनर् इमस्मिं काये विविधा अनुशायिका आबाधाः | संयथीदं दद्रु कण्डू कच्छू रकचा | विचर्चिका कुष्ठं किटिभं | अर्शा भगन्दला | पाण्डुरोगो आलसो | लोहितपित्तं ज्वरो | कासो श्वासो सोषो अपस्मारो | वातोदरम् दकोदरं | प्लीहोदरं मधुमेहो विसूचिका | सन्ति ते एते वा अन्ये वा विविधा अनुसायिका आबाधा काये ऽस्मिन् न वा | यद्य् आह नहीति | वक्तव्या | तूष्णिका भवाहि |
तथा दानि करोहि यथा | बुद्धशोभना च भोसि धर्मशोभना च संघशोभना च | बुद्ध गुरु च धर्म गुरु च संघ गुरु च | उपाध्यायिनी गुरु च आचार्या गुरु च तथा दानि करोहि यथा |
गुरुधर्म ३ ८३. किन् ति दानि गौतमि आवडो भिक्षुणीनां भिक्षूहि वचनपथो भूतेन वा अभूतेन वा अनावडो भिक्षूणां भिक्षुणीहि वचनपथो भूतेन अभूतेन | न क्षमति भिक्षुणीहि भिक्षुं धर्षिय वक्तुं कोण्टभिक्षू ति वा वैद्यभिक्षू ति वा चूडभिक्षू ति वा अखल्ला महल्लअप्रतिज्ञअकुशलो ति वा वक्तुं | अथैव जल्पति गुरुधर्मम् अतिक्रमति |
SK
८४. अथ दानि भिक्षुणीये कश्चित् प्रव्रजितो भवति ज्ञातिको वा भ्राता वा | सो च भवति उद्धतो उन्नडो | न क्षमति अध्युपेक्षितुं नामपि क्षमति धर्षिय वक्तुं | अथ खलु प्रज्ञया सम्ज्ञापयितव्यो यदि तावत् तरुणको भोति वक्तव्यो | सालोहित इदानीं त्वं न शिक्षसि कदा शिक्षिष्यसि | किन् दानि यदा जीर्णो वृद्धो महल्लको अध्वगतवयन् अनुप्राप्तो भविष्यसि | एतत् तव साधु एतत् प्रतिरूपं यच् च उद्दिशेशि स्वाध्यायेसि भद्रको गुणवान् शिक्षाकामो भवेसि बुद्धानाम् शासने योगम् आपद्येसि |
SK
८५. अथ दानि सो वृद्धो भोति | वक्तव्यो | इदनीं इमीदृशो पुनस् त्वं तरुअणकाले इदानीं त्वं न शिक्षसि कदा शिक्षिष्यसि | किन् दानि यदा मण्डलद्वारम् अनुप्राप्तो भविष्यसि तदा शिक्षिष्यसि या प्य् एषा तव पर्षा सापि तव दृष्टा अनुकृतिम् आपद्यमाना अनयव्यसनम् आपद्यिष्यतीति एतत् तव साधु एतत् प्रतिरूपं यत् त्वम् उद्दिशसि स्वाध्यायेसि भद्रको गुणवान् | शिक्षाकामो भवेसि बुद्धानां शासने योगम् आपद्येसि सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा वैद्यभिक्षू ति वा चूडभिक्षू ति वा अखल्लमहल्लअप्रकृतिज्ञअकुशलो ति वा धर्षिय जल्पति गुरुधर्मम् अतिक्रमति |
अथ दान् आह | आर्ये नास्ति मम तहिं श्रद्धा | नास्ति प्रसादो ति | वक्तव्यं वयं पि न प्रतीच्छामो ति | अथ दान् आह | आर्ये कारापितन् तेषां विहाराः मात्रा वा यावत् समयसम्बन्धेन वा प्रतीच्छन्त्व् आर्यमिश्रिका विहारन् ति अन्तमसतो गोमयगृहं पि पिष्ठगृहं पि भिक्षुसंघस्य दापयित्वा भिक्षुणीसंघो सप्तभूमकं पि विहारं प्रतीच्छत्य् अनापत्तिः |
SK
९२. ता एता भिक्षुणीयो अवज्ञाय परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा | वैद्यभिक्षू ति वा | अखल्लमहल्लाप्रकृतिज्ञो ती वा कृत्वा भक्ताग्रं शयनासनाग्रं विहाराग्रं भिक्षुसंघातो न शातियति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमी भक्ताग्रं शयनासनग्रं विहाराग्रं भिक्षुणीहि भिक्षुसंघातो सातयितव्यो |
किन् ति दानि नाकालो | अकालो नाम अस्तमितो सूर्यो | अन्तर्हितो च अरुणो [१] |
SK
किन् ति दानि नादेशे | अदेशो नाम वेशिकासामन्ते वा द्यूतकरशालासामन्ते वा | पानागारशालासामन्ते वा | वधबन्धनागारशालासामन्ते वा अतिभूण्डे वा अतिप्राकटे वा प्रदेशे [२] |
SK
किन् ति दानि नानागते काले अनागतो नाम कालो प्रतिपदे द्वितीयायाम् वा [३] |
SK
किन् ति दानि नातिक्रान्ते काले | अतिक्रान्तो नाम कालो चतुर्दशीयाम् वा पञ्चदशीयाम् वा | अथ खु तृतीयाप्रभृति तावद् ओवदितव्या यावत् त्रयोदशीति [४] |
SK
किन् ति दानि न छन्दशो | ओवादकस्य भिक्षुणीय छन्दो दातव्यो | अथ खु सर्वाहि आगन्तव्यं [५] |
SK
किन् ति दानि न व्यग्रशो | न भिक्षुणा व्यग्रो भिक्षुणीसंघो ओवदितव्यो | अथ खु सर्वाः समग्रा त्-ओवदितव्याः [६] |
SK
किन् ति दानि न पार्षदो | न तावत् तव पर्षा ओवदितव्या तवाद्य पर्षाये ओवादकवारो तवाद्य पर्षाये ओवादकवारो ति | अथ खु सर्वाः समग्रा त्-ओवदितव्याः [७] |
SK
किन् ति दानि न दीर्घोवादेन ओवदिताः | अथ खु संक्षिप्तेन ओवदितव्याः |
SK
सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा | स्वचित्तपर्योदवनम् एतद् बुद्धानुशासनन् ति ||
१०२. अथ दानि सो भिक्षुणीयोवादको गोचरप्रसृतो रथ्यायं भिक्षुणीन् पश्यति केशावर्तेन वा कृतेन | अक्षीहि वा अञ्चितेहि | आकोटितमष्टेहि वा चीवरेहि | श्वेतेन वा कायबन्धनेन | चित्रकूटाहि वा उपानहाहि न दानि क्षमति नहि कीञ्चिज् जल्पितुं | मा जनो ओज्झापेय पश्यथ भणे श्रमणको भार्याम् इव श्रवणिकाम् ओवदति | अथ खु पृच्छितव्या | कतमहिं एषा विहारके प्रतिवसति | का से उपाध्यायी | का से आचार्या पश्चाद् उक्तं तहिं गत्वा ओवदितय्वा | सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा चूडभिक्षू ति वा कृत्वा | अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा अन्वार्धमासं भिक्षुसंघातो ओवादोपसंक्रमणं न प्रत्याशंसति गुरुधर्मम् अतिक्रमति | एवं गौतमि अन्वर्धमासं भिक्षुणीहि भिक्षुसंघातो ओवादोपसंक्रमणं प्रत्याशंसितव्यं | न प्रत्याशंसति गुरुधर्मम् अतिक्रामति |
१०५. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्ट भिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा कृत्वा चूडभिक्षू ति वा कृत्वा खल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा अभिक्षुके आवासे वर्षाम् उपगच्छति गुरुधर्मम् अतिक्रमति | एवं गौतमि न क्षमति भिक्षुनीय अभिक्षुके आवासे वर्षाम् उपगन्तुं | अयं गौतमि भिक्षुणीनां सप्तमो गुरुधर्मो यो भिक्षुणीहि यावज् जीवं सत्कर्तव्यो यावद् अनतिक्रमणीयो वेलामिव महासमुद्रेण |
SK
गुरुधर्म ८ १०६. किन् ति दानि वर्षोषिताहि भिक्षुणीहि उभयतो संघे प्रवारणा प्रत्याशंसितव्या | यदहो दानि संघस्य प्रवारणा भवति तदहो भिक्षुणीहि प्रवारयितव्यं | अपरेज्जुकातो प्रतिपदे कल्यतो ये च निर्धाविय भिक्षुविहारं गन्तव्यं | यदि ताव समग्रो भिक्षुसंघो भवति न क्षमति सर्वाहि भिक्षुणीहि अपूर्वाचरिमं प्रावरयितुं | अथ खु एका प्रवारायिका संमन्यितव्या | भिक्षुणी प्रतिबला प्रवारायिका |
अथ दानि एका भिक्षुणी भवति | संबहुला च भिक्षू भवन्ति | वक्तव्यं | अहम् इथन्नामा संबहुलान् आर्यमिश्रान् प्रवारेमि दृष्टेन श्रुतेन परिशङ्कया | ओवदन्तु मे आर्यमिश्रा यावद् यथाधर्मं प्रतिकरिष्यामि | एवं द्वितीयम् पि तृतीयम् पि |
SK
अथ दानि एका भिक्षुणी भवति | एक भिक्षु भवति | वक्तव्यं | अहम् इत्थन्नामा आर्यं प्रवारेमि दृष्टेन श्रुतेन परिशङ्कया | ओवदतु मे आर्यो अर्थ कामो हितैषी अनुकम्पको अनुकम्पाम् उपादाय जानन्ती पश्यन्ति स्मरन्ती यथा धर्मं यथा विनयं तथा प्रतिकरिष्यामि | एवं द्वितीयम् पि तृतीयम् पि |
SK
११०. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा | चूडभिक्षू ति वा कृत्वा अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा | वर्षोषिता उभयतो संघप्रवारणान् न प्रत्याशंसयति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमि वर्षोषिताहि भिक्षुणीहि उभयतो संघे प्रवारणा प्रत्याशंसितव्या | अयं गौतमि भिक्षुणीनाम् अष्टमो गुरुधर्मो यो भिक्षुणीहि यावज्जीवं सत्कर्तव्यो गुरुकर्तव्यो मानयितव्यो पूजयितव्यो अनतिक्रमणीयो वेलामिव महासमुद्रेण |
११९. भिक्षू दानीं पृच्छन्ति | केन त्वं भगिनी राष्ट्रा पाण्डुकृशा दुर्वर्णा | किन् ते दुःखति | किन् ते पर्येषामः | सर्पिस् तैलं मधु फाणितं | सा दान् आह भोतु भोतु आर्य एवम् एव वर्ता भविष्यामि | भिक्षुणीयो पृच्छन्ति | आर्ये राष्ट्रे केन त्वम् एवं पाण्डुकृशा दुर्वर्णा | किन् ते दुःखति | किन् ते पर्येषामः | सर्पिस् तैलं मधु फाणितं | सा दान् आह | भोतु भोतु आर्यमिश्रिकायो एवम् एव वर्ता भविष्यामीति | एवं एव उपासिका उपासिकायो | सो पि शाकियकुमारो आह | आर्ये किन् ते दुःखति | केन सि पाण्डु कृशा दुर्वर्णा | आचिक्षाहि कीदृशेहि अत्र भैषज्येहि वा उपकरणेहि वा अर्थो भवेय | सचेद् अस्माकं न भविष्यति प्रातिवेश्य कुलातो उद्धारधर्मणा आनापयिष्यामि | अन्तरापणातो वा ग्रामान्तरातो वा आनापयिष्यामि | सा दान् आह भोतु दीर्घायुः एवम् एव वर्ता भविष्यामि | द्वितीयं तृतीयम् अपि आह | आर्ये किन् ते दुःखति | केनासि पाण्डुकृशा दुर्वर्णा यावद् ग्रामान्तरातो आनापयिष्यामि | सा दान् आह भोतु दीर्घायु एवम् एव वर्ता भविष्यामि | सो दानि शाकियकुमारो आह | न इदं आर्याये किञ्चित् कायिकं गैलायं | चैतसिकं आर्याये गैलान्यं | सा दान् आह | बाढं चैतसिकं गैलान्यं | सो दान् आह कथं सह्यं भवेय | सा दान् आह | यदि एवम् इच्छसि एवं सह्यं भवेय |
SK
१२०. सो दान् आह | आर्ये किम् अर्थम् अहं नेच्छामि | यो दानि अहं जल्पामि | आचिक्षतु आर्या किम् आज्ञापयसि | किं करोमि | कीदृशेहि अत्र भैषज्येहि वा उपकरणेहि वा अर्थो भवेय | सचेद् अस्माकं न भविष्यति प्रातिवेश्यकुलातो उद्धारधर्मणा आनयिष्यामि अन्तरापणातो वा ग्रामान्तरातो वा आनापयिष्यामीति | आचिक्षतु आर्या | सा दान् आह | साधु ते एतम् अर्थम् करोहि | सो दान् आह | न आर्ये एवं वक्तव्यं | अन्याहि अहं काषायवसनाहि नोत्सहाम्य् एतं अर्थं कर्तुं प्राग् एव आर्याय | आर्या मम गुरु च भावनीया च | नाहम् आर्याय एवं वक्तव्यो | नह्य् अहम् उत्सहाम्य् एतं कार्यं कर्तुं | सा दान् आह | साधु ताव मे आलिङ्गस्व चुम्बस्व स्तनोदरञ् च मे परिमर्दस्वेति | लभ्यन् मया एतन् मात्रं कर्तुं | स मात्रालिङ्गति चुम्बति स्तनोदरञ् च से परिमृशति | सा पि दानि तत्तकेनैव विनोदयति | सो पि दानि शाकियकुमारो अभीक्ष्णसंसर्गेण अपम्लायति |
SK
१२१. यथा भगवान् आह | नाहम् भिक्षवो ऽन्यम् एकं स्प्रष्टव्यं समनुपश्यामि | एवं रञ्जनीयम् एवं कमनीयम् एवं वञ्चनीयम् एवं मूर्च्छनीयम् एवम् अध्योहारि एवम् अन्तरायकरम् अनुत्तरस्य योगक्षेमस्याधिगमाय यथा पुरुषस्य स्त्री स्प्रष्टव्यं स्त्रीया पुरुष इति दानि तेन अभिक्ष्णसंसेवाय अपम्लायति | सो दानि पुनः पुनः करोति |
SK
१२२. सा दानि भिक्षुणीहि वुच्चति | मा आर्ये एवं करोहि नैवं लभ्या कर्तुं | सा दान् आह | एवं मम क्रियमाणं फासु भवति | एतं प्रकरणं तायो भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसु | महाप्रजापती गौतमी भगवतो आरोचयति | भगवान् आह शब्दापयथ राष्ट्रां | सा दानि शब्दापिता | भगवान् आह | सत्यं राष्ट्रे एवं नाम त्वं अवश्रुता अवश्रुतस्य | पुरुषस्य उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधो कक्षाभ्यां आमोषणपरामोषणं सादियसि | आह | आम् भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते राष्ट्रे | नन्व् अहं राष्ट्रे अनेकपर्यायेण सर्वेषां कामानां कामनन्दीनां कामनिम्नानां काममूर्च्छानां कामपिपासानां कामपरिदाह्यानां कामाध्यवसानानां अन्तम् वदामि | प्रहाणम् वदामि | समतिक्रमणं वदामि | तत्र नाम त्वं इमं एवं रूपत्वं पापम् अकुशलं धर्मं अध्याचरसि | नैष राष्ट्रे धर्म | नैष विनयो | नैवं शास्तुः शासनं | नैवं कर्तव्यं | नैवं करतो वृद्धिर् भवति कुशलेहि धर्मेहि |
१२५ | अथ दानि भिक्षुणी ललाटसिरां वेधापयति द्वितीयाय भिक्षुणीय मूर्ध्नि आक्रमितव्या यथा स्त्री स्प्रष्टव्यं संजानाति न पुरुष स्प्रष्टव्यं संजानाति | अथ दानि बाहुशिरां विन्धापयति अपराय भिक्षुणीय बाहा ग्रहेतव्या यथा स्त्री स्प्रष्टव्यं संजानाति न पुरुष स्प्रष्टव्यं | एवं गुल्फशिरा | एवं जानुमण्डलाधः | अथ दानि गण्डं वा पिटकम् वा क्षतम् वा पुरुषेण पाटापयति वा उपनाहापयति वा अपराय भिक्षुणीय आलम्बयितव्यं | न क्षमति सम्बाधे प्रदेशे गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा पुरुषेण वेधापयितुम् वा पाटापयितुम् वा उपनाहापयितुम् वा | सम्बाधो नाम प्रदेशो उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधः कक्षाभ्याम् | तेन भगवान् आह |
या पुन भिक्षुणी अवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य अन्तो हस्तपाशस्य संतिष्ठेत वा संलपेत वा | हस्तग्रहणम् वा | चीवरग्रहणम् वा सादीयेय | आगतम् वा अभिनन्देय | आसनेन वा उपनिमन्त्रेय | कायम् वा अनुप्रयच्छेय | संकेतकृतम् वा गच्छेय | इयं पि भिक्षुणी पाराजिका भवत्य् असंवास्या |
SK
१२९. या पुन भिक्षुणीति उपसंपन्ना | यावत् सा एषा भिक्षुणी अवश्रुता ति रक्तचित्ता | अवश्रुतस्य पुरुषस्येति रक्तचित्तस्य | अन्तो हस्तपाशस्येति अन्तो व्यायामेति | संलपेया ति उपकर्णं वा जल्पेय | हस्तग्रहणन् ति हस्ते गृह्णिय यावद् अङ्गुष्टके वा | चीवरग्रहणन् ति संघाटीयं वा उत्तरासङ्गे वा अङ्तरेवासे वा संकक्षिकायां वा दकशाटिकायाम् वा | सादियेया ति आस्वादं निगमयेत् | आगतं वा अभिनन्देया ति वा स्वागतन् ते अनुरागतन् ते पुनः पुन आगच्छेसि | प्रीतास्मि तवागमनेन | प्रह्लादितम् मे गात्रं तव दर्शनेन | आसनेनोपनिमन्त्रेया ति आसनम् अस्य ददेय | कायं से अनुप्रयच्छेया ति येनासौ तेन कायं प्रणामेत | संकेतकृतं गच्छेद् इति यस् तस्य अभीक्ष्णं उपचारो भवेद् आपणो वा पीठिका वा क्षेत्रवस्त्रं वा उदकसमीपं वा कर्मान्तं वा उद्यायं वा मार्गे वा तहिं तिष्ठेद् इयं पि भिक्षुणी पाराजिका असंवास्येति यावत् प्रज्ञप्तिः |
या पुन भिक्षुणी अवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य अन्तो हस्तपाशस्य सन्तिष्ठेद् वा | संलपेद् वा | हस्तग्रहणम् वा | चीवरग्रहणम् वा सादीयेय | आगतम् वा अभिनन्देय | आसनेन वा उपनिमन्त्रेयेत | कायम् वा अनुप्रयच्छेय | संकेतकृतम् वा गच्छेय | इयम् पि भिक्षुणी पाराजिका भवत्य् असम्वास्य |
१५३. एषा एवार्थोत्पत्तिः | भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | राजा दानि विरूढको शाकीयान् वधित्वा शाकियकन्यायो आदाय श्रावस्तीं प्रतिगतः तद्यथा | चारू च नाम | उपचारू च नाम | सुमना च नाम | मनोहरा | सालवती | अभया च नाम | सो दानि सार्धं क्रीडन्तो रमन्तो परिचारयन्तः अभिक्ष्णं वदति | निहता मे ग्रामकण्टकाः | शाकियजनपदकण्टकाः | निहता मे प्रत्यर्थिकाः प्रत्यमित्राः | यद् इदम् शाकियाः शाक्यपुत्रा इति |
SK
अथ खल्व् अभया राजधीता राजानं विरूढकम् एतद् अवोचत् | मा देव एवं वद निहता मे ग्रामकण्टकाः शाकिया इति | सन्ति देव शाकियाः क्षान्तिसम्पन्नाः | सौरत्यसम्पन्नाः | एवं शीलश्रुतत्यागसमाधिप्रज्ञासम्पन्नाः | एवं बुद्धं शरणं गताः | धर्मं शरणं गताः | बुद्धे अवेत्य प्रसादेन समन्वागताः | धर्मे संघे अवेत्य प्रसादेन समन्वागताः | प्राणातिपातात् प्रतिविरताः | यावद् आर्यकान्तेः शीलेः समन्वागताः | सन्ति देव शाकियाः श्रोतआपन्नाः सकृदागामिनो नागामिनस् ते देवेन अदूषका अनपराधिनो जीविताद् व्यवरोपिताः | तत् ते दुःखं वेदनीयं भविष्यति | बहु ते पापकं कर्म कृतं | बहु ते अपुण्यं प्रसूतं |
या पुन भिक्षुणी जानन्ती अनवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य प्रतिगृह्णीयात् पात्रं वा चीवरं वा भक्ष्यं वा भोज्यं वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारं वा अयम् अपि धर्मः |
SK
या पुन भिक्षुणीति यावद् उपसम्पन्ना उभयतः संघेन | एषा भिक्षुणी अनवश्रुता ति अरक्तचित्ता | अवश्रुतस्य पुरुषस्येति रक्तचित्तस्य | प्रतिगृह्णेया ति प्रतिच्छेय | पात्रम् इति ज्येष्ठं मध्यमं कन्यसम् वा | चीवरम् इति संघाटिउत्तरासङ्गमन्तर्वासकं कण्ठप्रतिच्छादनं उदकशाटिका | खाद्यम् इति खादनीयं | भोज्यम् इति भोजनीयं | अन्तशः ग्लानभैषज्यम् इति सप्ताहिकं वा यावज्जीविकम् वा | अयम् अपि धर्म | यावत् प्रज्ञप्तिः | एषो तावन् मनुष्यो भिक्षुणीय ददाति पात्रम् वा चीवरम् | भक्ष्यभोज्यम् वा | ग्लानभैषज्यम् वा | तां पुरुषो आह | आर्याय वयम् अर्थिका | आर्याय वयम् ददाम इति | न क्षमति प्रतीच्छितुं | स वक्तव्यः | तवैव भवतु दीर्घायुः लभिष्यामः वयम् अन्यतो पि | अथ प्रतीच्छति संघातिशेषं | अथ वाचं न भाषति हस्तविकारं वा पादविकारं वा अक्षिविकारं वा करोति | हष्तम् वा प्रस्फोटयति | अङ्गुलीं वा अक्षिं वा निपातयति | भूमिम् वा विलिखति विनमति वा | जानाति रक्तचित्तो ति | न क्षमति प्रतीच्छितुं | प्रतीच्छति स्थूलात्ययं |
ये च कुवेगे | ये च महाजने | ये च संघमध्ये विनयातिकरमाः | स्थूलात्ययाः सर्वे ते प्रतिप्रस्रभ्यन्ति स्थापयित्वा अष्टौ स्थूलात्ययाः | न संघम् अगतिगमनेन प्रापयन्ती | अन्तरा प्रतिनिःसरति यथास्थितासु आपत्तिषु कारयितव्या | कथं तावत् प्रतिनिः सर्गार्हं कथम् अप्रतिनिःसर्गार्हं | अभूषि मे संघम् अगतिगमनेन प्रापयिष्यन् ति प्रापयामि प्रापयिष्यामि चेति एवं प्रतिनिःसर्गार्हं | कथं प्रतिनिःसर्गार्हं | अभूषि मे संघम् अगतिगमनेन प्रापयिष्यन् ति प्रापितञ् च | न खल्व् इदानीं प्रापयामि न च प्रापयिष्यामीत्य् अप्रतिनिःसर्गार्हं | तेन भगवान् आह |
SK
भिक्षुणी खलु पुनः संघाक्रोशिका भवति | सा एवम् आह | छन्दगामी | चार्यमिश्रिकायो | संघो दोषगामी च भयगामी च संघो | मोहगामी च संघो | छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहं निश्राय समाक्रोशितव्याम् परिभाषितव्याम् मन्यति | सा भिक्षुणी भिक्षुणीभिर् एवम् अस्य वचनीया | मा आर्ये संघआक्रोशिका भवाहि | न संघो छन्दगामी | न संघो दोषगामी | न संघो भयगामी | न संघो मोहगामी | न च संघो छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहं निश्राय आर्याम् आक्रोशितव्याम् परिभाषितव्याम् मन्यति | आर्या एवं छन्दगामिनी दोषगामिनी भयगामिनी मोहगामिनी | आर्या एव छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहन् निश्राय संएघम् आक्रोशितव्यं रोषितव्यं परिभाषितव्यं मन्यति | विरमार्य संघाक्रोशनातो | एवं च सा भिक्षुणी भिक्षुणीभिर् उच्यमाना तम् एवि वस्तुं समादाय प्रतिगृह्य तिष्ठेत् | न पर्तिनिःसरेय | सा भिक्षुण् भिक्षुनीभिर् यावत्तृतीयकं समनुग्राहितव्या समनुभाषितव्या तस्य वस्तुस्य प्रतिनिःसर्गाय | यावत्तृतीयकं समनुग्राह्यमाना वा समनुभाषियमाना | तं वस्तुं प्रतिनिःसरेय इत्य् एतत् कुशलं | नो चेत् प्रतिनिःसरेय | अयम् अपि धर्मो यावत्तृतीयको |
या पुन भिक्षुणी शय्यासनस्यार्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्तम् वा भोज्यम् वा ग्लानभैषज्यम् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | शय्यासनस्यार्थायेति | शय्यासनं नाम मञ्चं पीठं बिसि चतुरस्रं कुच्चं बिम्बोहनं | याचित्वा ति विज्ञापेत्वा समादापेत्वा | अन्यं चेतापये ति जानापयेत् | पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारान् वा चेतापयति | निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा संघस्य भक्तस्य वा तर्पणस्य वा य्वागूपानस्य वा याचित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्तम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारान् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं | अथ खलु यस्यार्थाय याचति तम् एव जानापयितव्यं | अथ दानि वस्त्रं विप्रणामेति भक्तस्य वा तर्पणस्य वा य्वागूपानस्य वा अर्थाय याचयित्वा वैभङ्गिकं ददाति | शय्यासनम् वा उपस्थापेति वार्षिकम् वा हेमन्तिकम् वा देति | विनयातिक्रमम् आसादयति | सा एषा भिक्षुणी संघस्य भक्तं दापेति | त्यक्तमुक्तम् अनवगृहीतं दातव्यं | यदि तहिं किञ्चिच् छेषं भवति ओदनम् वा सूपम् वा यावद् भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा उपदर्शयितव्यं | यद्य् आदाय गच्छति अध्युपेक्षितव्यं | अथ दान् आह | आर्याय देमीति | वक्तव्यं | न हि | संघस्य देहि | अथाह दिन्नं मया संघस्य | आर्याय देमीती | प्रतीच्छति | अनापत्तिः | भिक्षोर् अपि एवम् एव आपत्तिस् तु विन्यातिक्रमः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्य परिष्कारान् वा चेतापयेन् निःसर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणीचीवरसन्निचयं कुर्यात् निस्सर्गिकपाचत्तिकं ||
SK
निःसर्गिकपाचत्तिकधर्म १६
SK
निःशृजाति
SK
१७७. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | स्थूलनन्दा नाम भिक्षुणी चीवराणि नैव धोवति न सीवेति न रञ्जेति | ताये दानि ओमलिनमलिना संघाटी पाटितविपाटिता | उपाश्रये निक्षिप्ता या इच्छति सा उपादीयतू ति | अथापरा भिक्षुणी जेता नाम लूहचीवरधरा | सा भिक्षुणीहि वुच्चति | आर्ये एतां संघाटिं धोविय सीविय फोषिय प्रावृता | सा दानि स्थूलनन्दा आह | आनेहि आर्ये एतां संघाटिं मह्यं एषा संघाटी | पश्यथ आर्यमिश्रिकायो न किञ्चिच् छक्यते उपाश्रये निक्षिपितुं | लब्धोत्क्षिप्तिकाहि पूरो संघारामो ताव | धृष्टा च मुखरा च प्रगल्भा च सा दानि ताय संघाटी आच्छिन्ना | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती पि गौतमी भगवतो आरोचेति | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुण्युपाश्रये पुराणसंघाटिं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति | उक्त्वा पश्चात् स्वयम् एव उपादियेय निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पेयालं | भिक्षुण्य् उपाश्रये ति भिक्षुणीविहारे | संघाटीति चीवरं | निक्षिपेत्वा ति स्वयं | निक्षिपायेत्वा ति परेण | या इच्छति सा उपादीयतू ति पश्चात् स्वयम् एव उपादीयेत निःसर्गिकपाचत्तिकं | सा एषा भिक्षुणी भिक्षुणीउपाश्रये चीवरं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति यदि काचि उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्दितुं | आच्छिन्दति निःसर्गिकं भवति | अथ दानि न कायचि उपादिन्नम् भवति तस्या एव च ताय अर्थो भवति किञ्चापि गृह्णाति अनापत्तिः | अथ दानि क्षुद्रानुक्षुद्रकं परिष्कारं निक्षिप्तम् भवति यदि कायचि उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्दितुं | आच्छिन्दति विनयातिक्रमम् आसदयति | भिक्षुर् अपि भिक्षुविहारे पात्रम् वा चीवरम् वा उपानहम् वा क्षुद्रानुक्षुद्रकम् वा परिष्कारं निक्षिपित्वा यो इच्छति सो उपादीयतू ति | यदि केनचिद् उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्चितुं | आच्छिन्दति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ न केनचिद् गृहीतम् भवति सो एव तेनार्थिको भवति किञ्चापि गृह्णाति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुण्य् उपाश्रये पुराणसंघाटिं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति उक्त्वा पश्चात् स्वयम् एव उपादीयेय निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
निःसर्गिकपाचत्तिकधर्म १७ निःसीवेति
SK
१७८. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | अपराय दानि भिक्षुणीय पुराणसंघाटी ओमलिनमलिना धोवित्वा निःसीवित्वा आतपे दत्त्वा वातो च प्रवापितो | अग्निश् च उत्थितः | संघाटी दग्धा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचेन्ति | पेयालं यावद् भगवान् आह | एवन् नाम त्वं पुराणसंघाटीं निःसीवित्वा न प्रतिसंधैसि न प्रतिसन्धापयसि | तेन हि प्रतिसन्धेतव्यं प्रतिसन्धापेतव्यं |
या पुन भिक्षुणी पुराणसंघाटिं निःसीवित्वा निःसिवापेत्वा वा उत्तरि षट्पञ्चरात्रम् अगिलाना न प्रतिसन्धाये न प्रतिसन्धापयेन निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पुराणसंघाटीति पुराणचीवरं | संघाटीति द्विपुटा | निःसीवित्वा ति स्वयं | निःसीवापेत्वा ति परेण | उत्तरीति षट्पञ्चरात्रम् इति न दानि षट्पञ्च च | अथ खलु परमं षट्रात्रन् न प्रतिसन्धेयैति स्वयं न प्रतिसन्धापेया ति परेण | न प्रतिसन्धापेयन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं | पेयालं | यावत् प्रज्ञप्तिः |
SK
एषा दानि भिक्षुणीये संघाटी मलिना भवति | यदि ताव लहुका भोति तथा येव धोवितव्या | न क्षमति निःसीवयितुं | अथ दानि सारिका भोति निःसीवेत्वा निःसीवित्वा धोवितव्या | प्रत्यर्गलकानि दत्त्वा आतपे दातव्या | साहरित्वा गोपिटके वा कुण्डके वा पटलके वा स्थापयित्वा काष्ठखण्डेन वा उपलखण्डेन वा आक्रमितव्या | न क्षमति प्रकीर्णम् ओसारयितुं | अथ दानि भाजनन् न भवति एकस्थाने आक्रमिय इष्टकेन वा उपलखण्डेन वा स्थापयितव्या | पश्चाद् अन्तेवासिणीय वा समानोपाध्यायिनीया वा भिक्षुणीय प्रतिसन्धापयितव्या स्वयम् वा प्रतिसन्धेतव्या | अथ दानि जरादुर्बला व्याधिदुर्बला वा भवति किञ्चापि चिरेण प्रतिसन्धेति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी पुराणसंघाटीन् निःसीवित्वा वा निःसीवापेत्वा वा उत्तरि षट्पञ्चरात्रं अग्लाना न प्रतिसन्धे वा न प्रतिसन्धापेय वा निःसर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी पराहृतं खादनीयं वा भोजनीयम् वा पुनो पुनो पचित्वा वा पचापेत्वा वा भृज्जित्वा वा भृज्जापेत्वा वा कठित्वा वा कठापेत्वा वा अगिलाना खादये वा भुञ्जेय वा पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति | पेयालं | पराहृतन् ति ग्रामतो वा आनीतं नगरतो वा आनीतं | खादनीयन् ति खादनीयं भोजनीयन् ति भोजनीयं | पचित्वा ति स्वयं | पचापयित्वा ति परेहि | भृज्जित्वा ति स्वयं | भृज्जापयित्वा ति परेहि | कठित्वा ति स्वयं | कठापयित्वा ति परेहि | अगिलाना ति प्रत्युद्धृतं भगवता पदं अनापत्तिर् गिलानाये | किन् दानि अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | जरादुर्बला वा भोति व्याधिदुर्बला वा भुक्त्वा वा वमति | अफासुं वा भोति इदम् अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | सा एषा भिक्षुणी रसगृध्या पराहृतं पिण्डपातं पुनो पुनो पचेय वा पचापेय वा पाचात्तिकम् आसादयति | अथ दानि शीतलम् भवति लभ्या उष्णीकर्तुं | न दानि थालिकाय वा पिठरिकाय वा | अथ खलु ताम्रपात्रेण वा कुपात्रेण वा कांसिकाय वा उष्णीकर्तव्यं | भिक्षुर् अपि स्वयं पचति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि कल्पियकारेण पचापेति अनापत्तिः | अथ दानि शीतलो भवति पिण्डपातो उष्णीकरोति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी पराहृतं खादनीयम् वा भोजनीयम् व पुनो पचित्वा वा पचापेत्व वा भृज्जित्वा वा भृज्जापयित्वा वा कठित्वा वा कठापयित्वा वा अगिलाना खादेय वा भुञ्जेय वा पाचत्तिकं | ह्रा ||
SK
पाचत्तिकधर्म ७९
SK
दकविजनेन
SK
१९३. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | गर्तोदरो च गर्तोदरमाता च गर्तोदरपिता च अगारस्यानगारियं प्रव्रजिताः | गर्तोदरपिता च गर्तोदरमाता च शाक्येहि प्रव्रजिता गर्तोदर तिर्थकेषु | गतोदरपिता भुञ्जति गर्तोदरमाता वीजयन्ती अग्रतो तिष्ठति पानीयमल्लकं धारेति | सो दानि ताये कानिचित् कानिचित् पूर्वचरितानि जल्पति | यानि ताये अमनआपानि | ताय तस्य पानीयमल्लकं मस्तके आपिट्टितं | वीजनदण्डेन च मस्तके आहतो | अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञः | अद्यापि त्वं अजल्पितव्यानि जल्पसि | सा भिक्षुणीहि दृष्टा | ता दान् आहंसुः | मा आर्ये एवं करोहि | अग्रपरिषा एषा न लभ्या एवं कर्तुं | सा दान् आह | अयं खलु अखल्ल अकुशलो अप्रकृतिज्ञो अद्यापि यानि तानि अजल्पितव्यानि जल्पति | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | यावद् भगवान् आह | दुष्कृतं ते गर्तोदरमाते | नैष धर्मो नैष विनयो | एवं च दानि भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहसि | तेन हि न क्षमति दकवीजनेन उपस्थिहितुं | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पेयालं | भिक्षुन् ति उपसम्पन्नं | पे | भुञ्जन्तं ति पञ्चजातकम् वा पञ्चजातकसंसृष्तम् वा यद् वा किञ्चित् खाद्यं भोज्यं | दकवीजनेन उपस्थिहेया ति पानीयमल्लकं धारयेत् | वीजनवातम् वा दद्यात् पाचत्तिकं | यावत्प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी उदकमल्लकन् धारयति नीवीजनं विनयातिक्रमम् आसादयति | वीजयति न उदकमल्लकन् धारेति विनयातिक्रमम् आसादयति | उभयं करोति पाचत्तिकं | नोभयं अनापत्तिः | सा एषा आपत्तिः एकस्य भिक्षुस्य एकभिक्षुणीये | अथ दानि संबहुला भिक्षू भवन्ति अनापत्तिः | अथ दानि भिक्षुणीये पिता वा भ्राता वा भिक्षुर् भवति किञ्चापि वीजयत्य् अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहेय पाचत्तिकं
या पुन भिक्षुणी लशुनं खादेय पाचत्तिकं || लशुनन् ति लशुनं नाम जातिमं सेविमं नागरं कच्छरुहं पार्वतेयं ब्रह्मदेयं आवरन्तकं मागधकं कोसलकं | यं चा पुनर् अन्य पि किञ्चिल् लशुनं सर्वं लशुनं न क्षमति | आमन् न क्षमति पक्वन् न क्षमति | यकृन् न क्षमति | कापि कापि न क्षमति अभ्यन्तरपरिभोगाय |
SK
अथ दानि भिक्षुणीय गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति लभ्यन् तं म्रक्षितुं | म्रक्षयित्वा न क्षमति अभ्यागमे प्रदेशे स्थातुं | अथ खु प्रतिगुप्ते प्रदेशे स्थातव्यं यावद् वर्त्ता भवति | +++++ धोविय निष्क्रमितव्यं | तेन भगवान् आह |
पूरविंशतिवर्षाम् एका ऊनविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो एका पूरविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो उपसम्पादेन्ति | या ऊनविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो ता विनयातिक्रमम् आसादयन्ति | या पूरविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो तासाम् अनापत्तिः | सा च सूपसम्पन्ना |
या एषा कुमारीभूता आकाङ्क्षति तथागतप्रवेदिते धर्मविनये उपसम्पदं सा दानि समनुग्रहितव्या | कदा त्वं जाता | अथ न जानाति जन्मपद्धिका निशामयितव्या | जन्मपद्धिका न भवन्ति मातापितरौ पृच्छितव्यौ | अथ दानि ते पि न जानन्ति पृच्छितव्या | कतरस्मिं राज्ये जाता | केत्तिका वा तदा त्वं अभूषि | सुदृष्टिर् दुर्दृष्टिर् वा | पृच्छितव्या | न उद्धिकस्य वा चित्रिकस्य वा वशेन गन्तव्यं | अथ खु हस्तपादा निशामेतव्याः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी ऊनविंशतिवर्षां कुमारीभूतां उपस्थापयेत् पाचत्तिकं
२४२. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भिक्षुणीयो दानि सन्निपतिताः पोषध कर्माय | जेता नाम भिक्षुणी | सा नागच्छति | ताये दूतो ऽनुप्रेषितो | आर्ये आगच्छाहि भिक्षुणीयो सन्निपतिताः पोषधकर्माय | सा दान् आह | भगवता विशुद्धस्य विशुद्धिपोषधः प्रज्ञप्तः | यावतिका का विशुद्धा अहन् तासाम् अन्यतमासां तत्र नागच्छामि | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते जेते | त्वञ् च नाम पोषधन् न सत्करोषि | का अन्या सत्करिष्यति को च पोषधस्य सत्कारो | अगिलानाय उपसंक्रमितव्यं | गिलानाय छन्दो दातव्यो | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासंअगिलाना विशुद्धिसंवासं न सत्करेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्वर्धमासं विशुद्धिसंवासं ति चातुर्दशिकेन वा चातुर्दशिकं पाञ्चदशिकेन वा पाञ्चदशिकं | अगिलाना पोषधन् न सत्कारोति | किन् दानि अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | एषा भवति जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा शिराविद्धिका वा भवति असुखा भैषज्यं वा पीतम् भवति | घृतं वा पीतम् भवति | छन्दो दातव्यो |
SK
सा एषा भिक्षुणी अगिलाना पोषधन् न गच्छति | गिलाना वा छन्दन् न देति पाचत्तिकं |
SK
भिक्षुर् अपि अगिलानो नैव पोषधं गच्छति न च्छन्दन् देति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासं अगिलाना विशुद्धिसंवासन् न सत्करेय पाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी अन्वर्ध मासं भिक्षुसंघे ओवादोपसंक्रमणं न सत्करेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्वर्धमासन् ति चातुर्दशिकेन वा चातुर्दशिकं | पाञ्चदशिकेन वा पाञ्चदशिकं | भिक्षुसंघे ओवदोपसंक्रमणं न सत्करेय पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा घृतपीतिका वा भवति वक्तव्यं | ओवादस्य छन्दन् देमि त्रिक्खत्तो | सा एषा भिक्षुणी अगिलाना ओवादोपसंक्रमणं न गच्छति गिलाना वा छन्दन् न देति पाचत्तिकम् आसादयति | यदा पोषधो भवति तदा च्छन्दहारिकाहि भिक्षुविहारङ् गत्वा वक्तव्यं | समग्रो भिक्षुणीसंघो समग्रस्य भिक्षुसंघस्य पादां च्छिरसा वन्दति पोषधञ् च प्रतीच्छति अववादं च याचति एवं त्रिक्खत्तो याचितव्यं | यदि तावत् कोचिद् भिक्षुणीओवादको भवति वक्तव्यं | एष भगिनीयो ओवादको आगमिष्यति | अथ न कोचिद् भवति यो तंहि अङ्गोपेतो भवति सो संमन्यितव्यो | अथ न कोचिद् वक्तव्यं | नास्ति भगिनीयो भिक्षुणीओवादको अप्रमादेन संपादेथ आपत्तिञ् च पोषधं प्रतिजाग्रथ सगौरवा च भवथ स्थविरेहि भिक्षूहि मध्येहि नवकेहीति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासं विशुद्धिपोषधं न सत्करेय पाचत्तिकं ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३३
SK
गण्डम् वा पिटकम् वा
SK
२४४. भगवान् राजगृहे विहरति | जेताये भिक्षुणीये संबाधे प्रदेशे गण्डम् उत्पन्नं | ताये अन्तेवासिनीयो गोचरञ् गतायो | हिण्डिकवैद्यो आगतो | सा दान् आह | दीर्घायुः शक्यसि मम शस्त्रकर्म कर्तुं | सो दान् आह | बाढं | सो दानि पाटयित्वा धोवायित्वा उपनाहयित्वा गतो | तायो भिक्षुणीयो आगतायो | ताहि दानि सो प्रदेशो दृष्टो पूयम्रक्षितो | ता दान् आहंसुः | आर्ये किम् इदं | आह | शस्त्रकर्म कारितं | आहंसुः | साहसम् आर्याय कृतं संबाधे प्रदेशे शस्त्रकर्म कारयन्तीय | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | एवं च नाम त्वं उपरि जानुमण्डलाभ्यां अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं शस्त्रकर्म कारापयसि | तेन हि न क्षमति | पेयालं | यावत् |
SK
या पुन भिक्षुणी उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं पुरुषेण पातापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापयेद् वा पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | उपरि जानुमण्डलाभ्याम् इति ऊरुनाभिभ्यां | अधो कक्षाभ्याम् इति स्तनोदरस्य | गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यन् ति भिक्षुणी वक्तव्यो शस्त्रकर्म कारापयिष्यन् ति |
पुरुषेणेति गृहस्थेन वा प्रव्रजितेन वा पाटापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापेय वा ति यथा जेता भिक्षुणीति पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि संबाधे प्रदेशे गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति अन्तेवासिनीये वा समानोपाध्यायिनीये वा समानाचार्याये वा यस्या विश्वासो ताय आख्यातव्यं | कण्टकेन वा नखेन वा भेदापयितव्यं भैषज्येन वा आलिम्पापेयतव्यं अथ दानि अधो जानुमण्डलाभ्याम् उपरि कक्षाभ्याम् भवति गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा पुरुषेण पाटापयति वा धोवापयति वा उपनाहापयति वा एवम् शिराम् वा वेधापयति नेलाटिकम् वा बाहुशिराम् वा गुल्फशिराम् वा अपराय भिक्षुणीय आक्रमितव्या तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी उपरि जानुमण्डलाभ्यां अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं पुरुषेण पाटापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापयेद् वा पाचत्तिकं ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३४
SK
वर्षोपगता
SK
२४५. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | अथ काली नाम भिक्षुणी वर्षोपगता सांघिकं विहारं बन्धित्वा चारिकां प्रक्रान्ताः | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतम् ते कालि एवन् नाम त्वं वर्षोपगतानां चारिकां प्रक्रमसि | तेन हि न क्षमति वर्षोपगताय चारिकां प्रक्रमितुं | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षोपगता चारिकां प्रक्रामेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | वर्षा ति वर्षारात्रं | उपगता ति पुरिमिकां पश्चिमिकाम् वा वर्षोपनामयिकां उपगता | चारिकां प्रक्रामेया ति अन्यत्र गच्छेय ग्रामान्तरं पि पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी एकरात्रम् पि विप्रवसति पाचत्तिकं | अथ दानि राजभयम् वा सेनाभयम् वा परचक्रभयम् वा जीवितान्तरायो वा ब्रह्मचर्यान्तरायो वा भवेय किञ्चापि गच्छति अनापत्तिः | नास्ति भिक्षुण्या अवलोकनाकर्म सप्ताहं वा किञ्चापि भिकुः अवलोकनाकर्म कृत्वा सप्ताहं वा अधिष्ठिहेय गच्छत्य् अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षोपगता चारिकां प्रक्रमेय पाचत्तिकं
SK
पाचत्तिकधर्म १३५
SK
वर्षावुस्ता
SK
२४६. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भिक्षुणीयो दानि श्रावस्तीयं वर्षोषिताः वैशालीम् आगताः | तायो भद्राये कापिलेयीये ज्ञातिकुलं प्रविष्टाः | ता स्त्रियो आहंसुः | कहिं आर्यमिश्रिका वर्षोषिताः | ता दान् आहंसुः | श्रावस्तीयं | आहंसुः | कीदृशी श्रावस्ती | आहंसुः | इदृशी च इदृशी च एवम् आरामरमणीया | एवं | जेतवनं | एवं गन्धकुटी | एवम् भगवान् विहरति | एवम् आर्यमिश्रिका शारिपुत्रमौद्गल्यायनाः | यदि प्रव्रज्या एषा प्रव्रज्या इयं पुनर् अस्माकम् आर्यधीता इहैव जाता | इहैव सम्वृद्धा | नैव कहिञ्चि गच्छति कूपमण्डूक इव तिष्ठति अनिःक्रमा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | यावद् भगवान् आह | तेन हि वर्षावुस्ताया भिक्षुणीय चारिका प्रक्रमितव्या | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षावुस्ता चारिकां न प्रक्रमेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | वर्षोषितेति वार्षिकां त्रयो मासान् चारिकां न प्रक्रमेया ति अन्तमसतो ग्रामान्तरं पि वा पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी एवं रात्रं पि प्रक्रमति पाचत्तिकं | अथ दानि जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा भोति न प्रतिबला गन्तुं किञ्चापि गच्छति अनापत्तिः | भिक्षुर् अपि वर्षावुस्तो चारिकां न प्रक्रमति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षावुस्ता चारिकां न प्रक्रमेय पाचत्तिकं || ण्क ||
या पुन भिक्षुणी जानन्ती भिक्षुणीं पूर्वोपगतां पश्चाद् आगत्वा उद्वहेय वा उद्वहापेय वा कायेन वा वाचाय वा पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | जानन्तीति स्वयं वा जानेय परतो वा श्रुणेय | भिक्षुणीम् पूर्वोपगताम् इति पुरिमिकायां वर्षोपनायिकायां | पश्चाद् आगत्वेति पश्चिमिकायां | उद्वहेय वा ति स्वयं | उद्वहापेय | वा ति परेण कायेण वा वाचा वा पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणीम् उद्वहति पाचत्तिकं | श्रामणेरीम् वा शिक्षमाणाम् वा उद्वहति देशनागामिविनयातिक्रमम् आसादयति | अन्तमसतो गृहिणीं पि उद्वहति सम्वरगामिविनयातिक्रमः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी जानन्ती भिक्षुणीं पूर्वोपगतां पश्चाद् आगत्वा उद्वहेय वा उद्वहापेय वा कायेन वा वाचा वा पाचत्तिकं || फु ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३८
SK
विघसं
SK
२४९. भगवान् काशिषु विहरति | अपराय दानि भिक्षुणीय उच्चारमल्लकं अप्रत्यवेक्षित्वा रथ्यायां छोरितं | तहिं दानि अपरो ब्राह्मणो शीर्षस्नातो आहतवस्त्रनिवस्त्रो ताय रथ्याय अतिक्रमति | उच्चारमल्लकं तस्य शीर्षे पतितं | तस्य शीर्षं वस्त्राणि च विनाशितानि | जनेन चोपहासितं ब्राह्मण सुस्नातः सुविलिप्तस् त्वम् इति | सो दानि ताम् आक्रोशति | आह | इतिकितिकाय धीते श्रमणिके न पश्यसि मम शीर्षं वस्त्राणि च विष्ठेन विनाशितानि | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुस्कृतन् ते एवन् नाम त्वम् अप्रत्यवेक्षिय छोरेसि | तेन हि न क्षमति अप्रत्यवेक्षिय छोरयितुं | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी तिरोकुड्यं उच्चारम् वा प्रास्रावम् वा खेटकम् वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा अप्रत्यवेक्षित्वा छोरयेत् पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | तिरोकुड्यन् ति तिरःप्रकारम् उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा वस्त्रधोवनम् वा भाण्डधोवनम् वा केशान् वा नखान् वा | अप्रत्यवेक्षित्वेति अनिरीक्ष्य | छोरेया ति उज्झेय | पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | यदि किञ्चित् उज्झितुकामो भवति प्रत्यवेक्षितव्यं | यदि तावद् आकीर्णबहुजनमनुष्या रथ्या भवन्ति आरामयितव्यं | अथ दानि अनाकीर्णा भवन्ति किञ्चापि छोरयत्य् अनापत्तिः | तं पि दानि न क्षमति अशब्दकर्णिकाये छोरयितुं अपि तु अच्छटिका दातव्या उक्कासितव्यम् वा | सा एषा भिक्षुणी नैव प्रत्यवेक्षति नापि अच्छटिकां दत्त्वा छोरयति पाचत्तिकम् आसादयति | भिक्षुर् अपि अप्रत्यवेक्ष्य अच्छटिकाम् अकृत्वा छोरयति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी तिरोकुड्यं उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटं वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा अप्रत्यवेक्ष्य छोरेय पाचत्तिकं || ग्रा ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३९, १४०
SK
हरित तृणे
SK
उदक २५०. भगवान् श्रावस्तीयं विहरति | राज्ञो दानि प्रसेनजितस्य कोशलस्य पूर्वकोष्ठकं नाम उद्यानम् पुष्किरिणीसम्पन्नं | अनावृतं भिक्षूनां भिक्षुणीनां आवृतं इतराये जनताये | राजा दानि आरामिकस्याह | हो भणे आरामिक पूर्वकोष्ठकम् उद्यानं सिक्तसंसृष्टं करेहि | श्वो हं सान्तःपुरो निर्यास्यं | तं दानि षड्वर्गिणीहि श्रुतं | श्वो राजा सान्तःपुरो उद्यानभूमिन् निर्यास्यतीति | तायो दानि प्रतिकृत्य् एव गत्वा तहिं हरितशाद्वलोपस्तराणायां पक्वखेटेन च पक्वसिंघाणकेन च विनाशयित्वा पदुमपत्रेहि उच्चारस्य पुटकानि बन्धित्वा पुष्किरिणीयं प्रवाहयेंसुः | तायो दानि दिवसं तहिं काकावाहां भञ्जिय सायाह्नसमये नगरं प्रविष्टाः राजा दानि प्रसेनजित कोशलो अपरेज्जुकातो निरगतो सान्तःपुरो | तायो दानि अन्तःपुरिकायो कथञ्चिद् एव सम्रोधाद् अवमुक्ता रन्धनमोक्षम् इव मन्यमानाः चञ्चूर्यन्ते | काश्चिन् निषण्णाः काश्चिन् निपन्नाः | काश्चिद् इतो च इतो च धावन्ति अवकाशं गृह्णन्ति शाद्वलोपस्तरणे परिभ्रामन्ति | तासां दानि पक्वखेटेन पक्वसिंघाणकेन वस्त्राणि विनाशितानि | पुष्किरिणीं ओतीर्णाः स्नानाय | तायो पश्यन्ति पुटकान् प्लवमानान् | तासां भवति कुलपुत्रकेहि श्रुतं श्वो राजा सान्तःपुरो उद्यानं प्रवेक्ष्यतीति तेहि एते गन्धपुटकाः प्रवाहिता इति कृत्वा तायो गृह्णन्ति | ते उदकेन क्लिन्ना उच्चारेण चा खादिताः प्रकृतिसुकुमारं च पद्मपत्रं | गृहीतमात्रम् एव विलीनं | ही ही विष्ठं ता दानि राज्ञो उपसंक्रान्ता आहंसु | महाराज एष तावद् ईदृशी अवस्था राजा आह शब्दापयथ आरामिकं | सो दानि शब्दापितो | राजा आह | हो भणे आरामिक केन उद्यानं विट्टालितं | आह षड्वर्गिणीयो श्रमणीयो एव दिवसं काकवाहा भञ्जित्वा गताः | राजा हसित्वा आह | तासाम् अविनीतानां कर्म भविष्यति | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती पि गौतमी भगवतो आरोचयेत् | यावद्
SK
या पुन भिक्षुणी हरिते तृणे उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणी उदके उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | उच्चारन् ति गूथं | प्रस्रावन् ति मूत्रं | खेटम् इति श्लेष्मा | सिंघाणकन् ति पक्वसिंघाणकं | हरिते तृणे इति शाद्वले अच्छिन्नालूनस्मिं उदन् ति उदकानि नाम दश | नादिकं ताडागं औदुपानिकं श्वभ्रोदकं प्रघारिमं वृष्टिस्थितं उच्छोदकं अन्तरीक्षपानीयं हिमविलीनं सामुद्रम् वा उच्चारम् वा प्रस्रावं वा कुर्यात् पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि प्रावृषेण्या से सर्वभुमिः शाद्वलोपस्तरेणा भवति यहिं प्रदेशे स्वल्पहरितम् भवति तहिं कर्तव्यं | अथ दानि अल्पहरितं न भवति कटाहके वा इष्टकायम् वा उपले वा शुष्कतृणे वा काष्ठखण्डे वा यत्र वा अन्येन उच्चारो कृतो भवति बलीवर्देन वा | यत्र वा अन्येन मनुष्येन कृतो तहिं कर्तव्यं अथ दानि एवं न भवति अन्तमसतो कनीयसिं पि अङ्गुलिं उपद्राहयित्वा कर्तव्यं | तथा कर्तव्यं यथा तहिम् प्रथमम् निपतति | अथ दानि चङ्क्रमति न क्षमति हरितशाद्वले श्लेष्मं छोरयितुं | अथ खु कटे वा पत्रपुटिकायां वा छोरयितव्यं | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी हरिते तृणे उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणी उदके उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
न स्थिता [५०] | न निषण्णा [५१] | न उच्चासना [५२] | उपनह [५३] | न पादुका [५४] | न ओगुण्ठिका [५५] | न संमुख [५६] | न ओसक्तिका [५७] | न पल्लत्थिका [५८] | पूर्यते पञ्चमो वर्गः ||
भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो पश्चिमं प्रहाणं स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदन्ति | अथापराये दानि भिक्षुणीये व्रणमुखेन दीर्घको ऽनुस्रोतेन प्रविष्टो | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती गौतमी भगवतो आरोचयेत् | भगवान् आह | गच्छथ ताये अमुकं भैषज्यं देथ ततो सो दीर्घको निष्क्रमिष्यति | ताये दानि तं भैषज्यं दिन्नं पिबनाये | सो दीर्घको अनुस्रोतम् आगतो न च मृतो | भगवान् आह | एवं च नामा यूयं स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदथ | तेन हि न क्षमति स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदितुं | निषद्याप्रतिसंयुक्तं | न क्षमति भिक्षुणीये पर्यङ्केन निषीदितुं | अथ खल्व् एकिना पदेन पर्यङ्को बद्धव्यः | अपराय पार्ष्णिकाय व्रणमुखं पिथयितव्यं | सा एषा भिक्षुणी स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते निषद्याप्रतिसंयुक्तं ||
SK
भिक्षुणीप्रकिर्णक २
SK
कठिनप्रतिसंयुक्तं
SK
२५६. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | ता दानि भिक्षुणीयो कठिने चीवरं निक्षिपिय सीवन्ति | अपराये भिक्षुणीये वंसविदलिकाय व्रणमुखेन कृतं रुधिरम् उत्पादितं | एतं प्रकरणं | पेयालं | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति कठिने निषीदितुं | कठिनप्रतिसंयुक्तं | एता दानि भिक्षुणीयो चीवर निषीदितुकामा भवन्ति | न क्षमति कठिने निषीदितुं | अथ खु उपस्थानशालायाम् वा प्रासादे वा प्रहाणशालायाम् वा आकार्षान् दत्त्वा चीवरकं प्रज्ञपिय सीवितव्यं | अथ एवं पि न भवति | पीठस्य वा मञ्चस्य वा उपरि प्रज्ञपयित्वा सीवितव्यं | अथैवं पि न भवति जानुकानाम् उपरि स्थापय्यित्वा सीवितव्यं | सा एषा भिक्षुणी कठिने निषीदति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते कठिनप्रतिसंयुक्तं
SK
भिक्षुणीप्रकीर्णक ३
SK
वेठकप्रतिसंयुक्तं
SK
२५७. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | स्थूलनन्दा दानि भिक्षुणी संबहुलानि स्त्रीहि सार्धं नदीम् अजिरावतीङ् गत्वा एकान्ते चीवरकाणी निक्षिपिय स्नानायावतीर्णा | सा दानि प्रतिकृत्येवोत्तरित्वा वेठकेन कायं वेठयित्वा स्त्रीणाम् आह | प्रजापति निध्यापयथ मां | किम् अहं शोभामि न शोभामीति | ता दान् आहंसुः | किम् पुनर् आर्याय मुण्डाय पिण्डिलिकाय एतेन कार्यं | वयं कामोपभोगनीया मानार्थाय एवं करोमः | कुटुम्बिकानां प्रियतरिका भविष्यामो ति | आर्ये किम् एतेन | यं ताहि स्त्रीहि अवध्यापितं तं दानि भिक्षुणीहि श्रुतं | एतं प्रकरणं | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते नन्दे यावत् तेन हि न क्षमति वेठकेन कायं वेठयितुं | वेठकप्रतिसंयुक्तं | सा एषा भिक्षुणी वेठकेन पट्टकेन वा कायं वेठयति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि पट्टिकाय वा लोहकेन वा कायं वेठयति | न क्षमति द्विर् अपि वेल्लकं त्रिर् अपि वेल्लकं वेठयितुं | अथ खु एक परिवेल्लकं वेठयितव्यं | अथ दानि वातेन पार्श्वं गृहीतं भवति | गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति किञ्चापि पट्टकेन कायं वेठयत्य् अनापत्तिः | इदम् उच्यते वेठकप्रतिसंयुक्तं
SK
भिक्षुणी प्रकीर्णक ४
SK
श्रोणिभण्डकप्रतिसंयुक्तं
SK
२५८. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | यथैव वेठकस्य एवम् एवार्थोत्पत्तिः कर्तव्या | सा प्रतिकृत्य्ऽ एव उत्तरित्वा श्रोणीभण्डकम् आबन्धित्वा आह | प्रजापती प्रजापति निध्यायथ मां किम् अहम् शोभामि न शोभामीति | ता दान् आहंसुः | किम् आर्याय | पेयालम् | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह तेन हि न क्षमति श्रोणीभण्डं | श्रोणीभण्डकप्रतिसंयुक्तं | श्रोणीभण्डकन् नाम एते भवन्ति | शङ्खावर्त्तका वा शिरिका वा पीलुका वा विद्रुमा वा अक्षरक्षा वा सुवर्णरूप्यमया वा मणिमया वा प्रकालका वा अन्तमसतो सूत्रमणिका वा बन्धति | तेन च श्रोणीभण्डकछन्दं विनोदयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते श्रोणीभण्डकप्रतिसंयुक्तं || ण्क ||
SK
भिक्षुणीप्रकिर्णक ५ गृहिणिभण्डकप्रतिसंयुक्तं
SK
२५९. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | एषैवार्थोत्पत्तिः यावद् गृहिणीभण्डकम् आबन्धित्वा यावद् भगवान् आह | तेन हि न क्षमति गृहिणीभण्डकं | गृहिणीभाण्डकन् नाम एते भवन्ति | मूर्धापिधानका वा | वलया वा | कर्णिका वा | टिक्का वा | वेठका वा | हर्षका वा | हारा वा | अर्धहारा वा अपरञ्जग वा | कटका वा | शङ्खका वा | नूपुरा वा | अङ्गुलीयका वा | यद् वा पुनर् अन्यद् अपि किञ्चिद् गृहिणीभाण्डं सर्वन् न क्षमति | सा एषा भिक्षुणी गृहिणीभण्डकम् आबन्धयति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि भैषज्यभण्डकम् आबन्धति ज्वरसूत्रकम् वा अनापत्तिः | इदम् उच्यते गृहिणीभाण्डकप्रतिसंयुक्तं || तृ ||
SK
भिक्षूणीप्रकिर्णक ६
SK
गृहिणीअलङ्कारप्रतिसंयुक्तं
SK
२६०. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि शाकियकन्यायो कोलितकन्यायो मल्लकन्यायो महान्तेहि कुलेहि प्रव्रजिता अलङ्कारिकान्य् आदाय | कुमारिकानां वुह्यन्तीनां उत्सवसमये तिथि पर्वण्या देवयात्रादिषु कृतकानि भाण्डकानि ददन्ती | जनो दानि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या वाणिजेयं | एतं प्रकरणं | पेयालं यावद् भगवान् आह | तेन हि न क्षमति गृहिणीअलङ्कारं धारयितुं | यदि काचिद् गृहिणी प्रव्रजति यदि ताय किञ्चिद् अलङ्कारं भवति वक्तव्या विसर्जेहि | अथ दानि पश्यति दुर्भिक्ष वा भवेय पिण्डपातो वा न लभ्येत जरादुर्बला वा भवति व्याधिदुर्बला वा गैलान्यम् वा किञ्चिद् भविष्यति अल्पलाभो मातृग्रामो मा विहन्येया ति | पिण्डं कारयित्वा पर्व्राजयितव्या | सा एषा भिक्षुणी अलङ्कारम् अपरित्याजयित्वा प्रव्रजेति विनयातिक्रमम् आसादयति | भिक्षोर् अप्य् एष एवं विधिर् | इदम् उच्यते गृहिणीअलङ्कारप्रतिसंयुक्तं || फु ||
SK
भिक्षुणीप्रकिर्णक ७
SK
वेश्याप्रतिसंयुक्तं
SK
२६१. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो शाकीयकन्यायो कोलियकन्यायो मल्लकन्यायो महाकुलेहि प्रव्रजिता चेटिकाम् आदाय प्रव्रजन्ति | तायो चेटिकायो प्रासादिकायो दर्शनीयायो वेश्यं (!) वाहयन्ति | जनो दनि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या गणिका इमा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीहि श्रुतं | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | एवं च नाम यूयं वेश्याम् उपस्थापयथ | तेन हि न क्षमति वेश्याम् (!) उपस्थापयितुं | सा एषा भिक्षुणी वेश्याम् उपस्थापयति तेन जीविकां कल्पयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते वेश्याप्रतिसंयुक्तं || ग्रा ||
SK
भिक्षुणीप्रकीर्णक ८
SK
आरामिकिनिप्रतिसंयुक्तं
SK
२६२.भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भगवता दानि शिक्षापदं प्रज्ञप्तं | न क्षमति वेश्याम् उपस्थापयितुं ति | तायो दानि शाकियकन्यायो मल्लकन्यायो कोलितकन्यायो महाकुलेहि प्रव्रजन्ति | तायो दानि पौद्गलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापेन्ति | तायो दानि आरामिकिनीयो प्रासादिकायो जनो दानि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या गणिका इयं | एतं प्रकरणं भिक्षुणीहि श्रुतं यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति पौदगलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापयितुं | न क्षमति आरामिकिनी | ना क्षमति चेटी | न क्षमति कल्पियकारी | सा एषा भिक्षूणी या पौद्गलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते आरामिकिनीप्रतिसंयुक्तम् || ह्रा ||
२७४. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो नानाप्रकारेहि मोचयन्ति मूलकेन पलाण्डूकेबुकाये सोभञ्जनकेन लतिकाय | एतं प्रकरणं यावद् भगवन् | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति विकृतीहि मोचयितुं | विकृतिप्रतिसंयुक्तं | सा एषा भिक्षुणी मूलकेन वा पलाण्डूय वा केबुकाय वा सोभञ्जनकेन वा लतिकाय वा इल्लादुकाय वा त्रपुसेन वा अल्लाबूय वा कक्षारुकेन वा अन्येन वा पुन केनचिन् मोचयति तेन च कामरागं विनोदेति थूल्ऽ-अच्चयम् आसादयति | इदम् उच्यते विकृतिप्रतिसंयुक्तं ||
Aद्देन्द १ (प्. इव्) वर्गावशेषाः देशना च विहारो च भिक्षुणीनाञ् च ये दश प्रणीतसम्मतम् मात्रं | यावत् वासादना इह छदना सहशय्या च | सम्विधानञ् च वुच्चति | निषद्या ऊनविंशो च | अरण्यायां च शाटिका द्वाविंशति शुद्धेकेहि उद्धारा भिक्षुणीनां प्रवुच्चति | देशनाम् उद्धरित्वान संचिन्त्यं समोदहे पुनो चात्र ||
२२. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय परिभवनेन कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा ढोस्सभिक्षू ति वा कृत्वा वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा अखल्लमहल्ले ति वा अकुशलो ति वा अप्रतिकृतिज्ञो ति वा कृत्वा न शिरसा पादान् वन्दति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमी वर्षशतोपसम्पन्नाये भिक्षुणीये तदहोपसम्पन्नस्य भिक्षुस्य शिरसा वन्दितव्यं | अयं गौतमी भिक्षुणीनां प्रथमो गुरुधर्मो यावज्जीवं सत्कर्तव्यो गुरुकर्तव्यो मानयितव्यो पूजयितव्यो अनतिक्रमणीयो वेलामिव समुद्रेण ||
अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आमं | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचिवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि | आम | सम्मतासि विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनि | नहि | मा पितृघातिनि | नहि | मा अर्हन्तघातिनी | नहि | मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि | चिरा परिनिवृतो खो पुन सो भगवांस् तथागतो र्हन् सम्यक्सम्बुद्धो ||
SK
मा भिक्षुदूषिका | नहि | मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तिर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा दासि | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटि | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणि | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि | अन्यदापि यद्य् आह उपसम्पन्नपूर्वा ति | वक्तव्या गच्छ नस्य चल प्रपलाहि | नास्ति ते उपसम्पदा |
SK
अथ दान् आह | नहीति | उत्तरि समनुग्राहितव्या मा वातिला | मा पित्तिला | मा पिन्दिला | मा हल्लवाहिनी | मा पूयवाहिनी | मा चक्रवाहिनी | मा आर्द्रव्रणा | मा शुष्कव्रणा | मा शोणितव्रणा | मा शिखिरिणी | मा द्विपुरुषिका | मा स्त्रिपण्डिका | मा पुरुषद्वेषिणी
अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आम | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचीवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि आम | सम्मतासि | विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनि | नहि | मा पितृघातिनि | नहि | मा अर्हद्घातिनि | नहि | मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि |
SK
चिरपरिनिवृतो खो पुन सो भगवांस् तथागतो ऽर्हन् सम्यक्सम्बुद्धो |
SK
४४. मा भिक्षुदूषिका | नहि | मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तिर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा स्वयं सन्नद्धिका | नहि | मा दासि | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटि | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणी | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि अन्यदापि | यद्य् आह उपसम्पन्नपूर्वा ति | वक्तव्या | गच्छ नस्य चल प्रपलाहि नास्ति ते उपसंपदा |
SK
४५. अथाह | नहीति | वक्तव्या | मा वातिला | नहि | मा पित्तिला | नहि | मा पिन्दिला | नहि | मा हल्लवाहिनी | नहि मा पूयवाहिनी | नहि | मा चक्रवाहिनी | नहि | मा आर्द्रव्रणा | नहि | मा शुष्कव्रणा | नहि | मा शोनितव्रणा | नहि | मा शिखरिनी | नहि | मा द्विपुरुषिका | नहि | मा स्त्रीपण्डिका | नहि | मा पुरुषद्वेषिणी | नहि |
SK
४६. सन्ति खो पुनर् इमस्मिं काये विविधा आनुशयिका आबाधा संयथीदं | दर्द्रु कण्डू कच्छू रकचा | विचर्चिका अर्शो भगन्दला | पाण्डुरोग अलसको | लोहितपित्तं | ज्वरो | कासो श्वासो शोषो अपस्मारो | वातोदरं दकोदरं प्लीहोदरं मधुमेहो | सन्ति ते एते वा अन्ये वा विविधा आनुशयिका वा आबाधाः काये ऽस्मिन् न वा | यद्य् आह नहीति वक्तव्यं | तूष्णीका भवाहीति |
बुद्धशोभना च भोसि | धर्मशोभना च भोसि | संघशोभना च भोसि | बुद्ध गुरु च धर्म गुरु च संघ गुरु च | उपाध्यायिनी गुरु च | आचार्यायिणी गुरु च | शिक्षा गुरु च | तथा दानि करोहि | यथा | आरागयित्वा न विरागयसि | दुर्लभा क्षणसंपदा |
६२. अनुज्ञातासि अनुज्ञापकेहि | आम | याचिता ते उपाध्यायिनी | आम | परिपूर्णन् ते पात्रचीवरं | आम | देशितशिक्षासि | आम | परिपूर्णशिक्षासि | आम | सम्मतासि | आम | विशुद्धासि भिक्षुणीहि | आम | मा मातृघातिनी | नहि | मा अर्हद्घातिनी | नहि मा संघभेदिका | नहि | मा तथागतस्य दुष्टचित्तरुधिरोत्पादिका | नहि | चिरपरिनिवृत्तो खो पुन सो भगवांस् तथागतो ऽर्हन् सम्यक्सम्बुद्धो |
SK
मा भिक्षुदूषिका नहि मा स्तैन्यसम्वासिका | नहि | मा तीर्थिकापक्रान्तिका | नहि | मा दासी | नहि | मा अवपितिका | नहि | मा ऋणहारिका | नहि | मा राजभटी | नहि | मा राज्ञः किल्बिषकारिणी | नहि | उपसम्पन्नपूर्वासि अन्यदापि | यद्य् आह | आमन् ति | वक्तव्या | गच्छ नस्य चल प्रपलाय नास्ति ते उपसंपदा | अथाह नहीति | वक्तव्यं | सन्ति खो पुनर् इमस्मिं काये विविधा अनुशायिका आबाधाः | संयथीदं दद्रु कण्डू कच्छू रकचा | विचर्चिका कुष्ठं किटिभं | अर्शा भगन्दला | पाण्डुरोगो आलसो | लोहितपित्तं ज्वरो | कासो श्वासो सोषो अपस्मारो | वातोदरम् दकोदरं | प्लीहोदरं मधुमेहो विसूचिका | सन्ति ते एते वा अन्ये वा विविधा अनुसायिका आबाधा काये ऽस्मिन् न वा | यद्य् आह नहीति | वक्तव्या | तूष्णिका भवाहि |
तथा दानि करोहि यथा | बुद्धशोभना च भोसि धर्मशोभना च संघशोभना च | बुद्ध गुरु च धर्म गुरु च संघ गुरु च | उपाध्यायिनी गुरु च आचार्या गुरु च तथा दानि करोहि यथा |
गुरुधर्म ३ ८३. किन् ति दानि गौतमि आवडो भिक्षुणीनां भिक्षूहि वचनपथो भूतेन वा अभूतेन वा अनावडो भिक्षूणां भिक्षुणीहि वचनपथो भूतेन अभूतेन | न क्षमति भिक्षुणीहि भिक्षुं धर्षिय वक्तुं कोण्टभिक्षू ति वा वैद्यभिक्षू ति वा चूडभिक्षू ति वा अखल्ला महल्लअप्रतिज्ञअकुशलो ति वा वक्तुं | अथैव जल्पति गुरुधर्मम् अतिक्रमति |
SK
८४. अथ दानि भिक्षुणीये कश्चित् प्रव्रजितो भवति ज्ञातिको वा भ्राता वा | सो च भवति उद्धतो उन्नडो | न क्षमति अध्युपेक्षितुं नामपि क्षमति धर्षिय वक्तुं | अथ खलु प्रज्ञया सम्ज्ञापयितव्यो यदि तावत् तरुणको भोति वक्तव्यो | सालोहित इदानीं त्वं न शिक्षसि कदा शिक्षिष्यसि | किन् दानि यदा जीर्णो वृद्धो महल्लको अध्वगतवयन् अनुप्राप्तो भविष्यसि | एतत् तव साधु एतत् प्रतिरूपं यच् च उद्दिशेशि स्वाध्यायेसि भद्रको गुणवान् शिक्षाकामो भवेसि बुद्धानाम् शासने योगम् आपद्येसि |
SK
८५. अथ दानि सो वृद्धो भोति | वक्तव्यो | इदनीं इमीदृशो पुनस् त्वं तरुअणकाले इदानीं त्वं न शिक्षसि कदा शिक्षिष्यसि | किन् दानि यदा मण्डलद्वारम् अनुप्राप्तो भविष्यसि तदा शिक्षिष्यसि या प्य् एषा तव पर्षा सापि तव दृष्टा अनुकृतिम् आपद्यमाना अनयव्यसनम् आपद्यिष्यतीति एतत् तव साधु एतत् प्रतिरूपं यत् त्वम् उद्दिशसि स्वाध्यायेसि भद्रको गुणवान् | शिक्षाकामो भवेसि बुद्धानां शासने योगम् आपद्येसि सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा वैद्यभिक्षू ति वा चूडभिक्षू ति वा अखल्लमहल्लअप्रकृतिज्ञअकुशलो ति वा धर्षिय जल्पति गुरुधर्मम् अतिक्रमति |
अथ दान् आह | आर्ये नास्ति मम तहिं श्रद्धा | नास्ति प्रसादो ति | वक्तव्यं वयं पि न प्रतीच्छामो ति | अथ दान् आह | आर्ये कारापितन् तेषां विहाराः मात्रा वा यावत् समयसम्बन्धेन वा प्रतीच्छन्त्व् आर्यमिश्रिका विहारन् ति अन्तमसतो गोमयगृहं पि पिष्ठगृहं पि भिक्षुसंघस्य दापयित्वा भिक्षुणीसंघो सप्तभूमकं पि विहारं प्रतीच्छत्य् अनापत्तिः |
SK
९२. ता एता भिक्षुणीयो अवज्ञाय परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा | वैद्यभिक्षू ति वा | अखल्लमहल्लाप्रकृतिज्ञो ती वा कृत्वा भक्ताग्रं शयनासनाग्रं विहाराग्रं भिक्षुसंघातो न शातियति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमी भक्ताग्रं शयनासनग्रं विहाराग्रं भिक्षुणीहि भिक्षुसंघातो सातयितव्यो |
किन् ति दानि नाकालो | अकालो नाम अस्तमितो सूर्यो | अन्तर्हितो च अरुणो [१] |
SK
किन् ति दानि नादेशे | अदेशो नाम वेशिकासामन्ते वा द्यूतकरशालासामन्ते वा | पानागारशालासामन्ते वा | वधबन्धनागारशालासामन्ते वा अतिभूण्डे वा अतिप्राकटे वा प्रदेशे [२] |
SK
किन् ति दानि नानागते काले अनागतो नाम कालो प्रतिपदे द्वितीयायाम् वा [३] |
SK
किन् ति दानि नातिक्रान्ते काले | अतिक्रान्तो नाम कालो चतुर्दशीयाम् वा पञ्चदशीयाम् वा | अथ खु तृतीयाप्रभृति तावद् ओवदितव्या यावत् त्रयोदशीति [४] |
SK
किन् ति दानि न छन्दशो | ओवादकस्य भिक्षुणीय छन्दो दातव्यो | अथ खु सर्वाहि आगन्तव्यं [५] |
SK
किन् ति दानि न व्यग्रशो | न भिक्षुणा व्यग्रो भिक्षुणीसंघो ओवदितव्यो | अथ खु सर्वाः समग्रा त्-ओवदितव्याः [६] |
SK
किन् ति दानि न पार्षदो | न तावत् तव पर्षा ओवदितव्या तवाद्य पर्षाये ओवादकवारो तवाद्य पर्षाये ओवादकवारो ति | अथ खु सर्वाः समग्रा त्-ओवदितव्याः [७] |
SK
किन् ति दानि न दीर्घोवादेन ओवदिताः | अथ खु संक्षिप्तेन ओवदितव्याः |
SK
सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा | स्वचित्तपर्योदवनम् एतद् बुद्धानुशासनन् ति ||
१०२. अथ दानि सो भिक्षुणीयोवादको गोचरप्रसृतो रथ्यायं भिक्षुणीन् पश्यति केशावर्तेन वा कृतेन | अक्षीहि वा अञ्चितेहि | आकोटितमष्टेहि वा चीवरेहि | श्वेतेन वा कायबन्धनेन | चित्रकूटाहि वा उपानहाहि न दानि क्षमति नहि कीञ्चिज् जल्पितुं | मा जनो ओज्झापेय पश्यथ भणे श्रमणको भार्याम् इव श्रवणिकाम् ओवदति | अथ खु पृच्छितव्या | कतमहिं एषा विहारके प्रतिवसति | का से उपाध्यायी | का से आचार्या पश्चाद् उक्तं तहिं गत्वा ओवदितय्वा | सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा चूडभिक्षू ति वा कृत्वा | अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा अन्वार्धमासं भिक्षुसंघातो ओवादोपसंक्रमणं न प्रत्याशंसति गुरुधर्मम् अतिक्रमति | एवं गौतमि अन्वर्धमासं भिक्षुणीहि भिक्षुसंघातो ओवादोपसंक्रमणं प्रत्याशंसितव्यं | न प्रत्याशंसति गुरुधर्मम् अतिक्रामति |
१०५. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्ट भिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा कृत्वा चूडभिक्षू ति वा कृत्वा खल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा अभिक्षुके आवासे वर्षाम् उपगच्छति गुरुधर्मम् अतिक्रमति | एवं गौतमि न क्षमति भिक्षुनीय अभिक्षुके आवासे वर्षाम् उपगन्तुं | अयं गौतमि भिक्षुणीनां सप्तमो गुरुधर्मो यो भिक्षुणीहि यावज् जीवं सत्कर्तव्यो यावद् अनतिक्रमणीयो वेलामिव महासमुद्रेण |
SK
गुरुधर्म ८ १०६. किन् ति दानि वर्षोषिताहि भिक्षुणीहि उभयतो संघे प्रवारणा प्रत्याशंसितव्या | यदहो दानि संघस्य प्रवारणा भवति तदहो भिक्षुणीहि प्रवारयितव्यं | अपरेज्जुकातो प्रतिपदे कल्यतो ये च निर्धाविय भिक्षुविहारं गन्तव्यं | यदि ताव समग्रो भिक्षुसंघो भवति न क्षमति सर्वाहि भिक्षुणीहि अपूर्वाचरिमं प्रावरयितुं | अथ खु एका प्रवारायिका संमन्यितव्या | भिक्षुणी प्रतिबला प्रवारायिका |
अथ दानि एका भिक्षुणी भवति | संबहुला च भिक्षू भवन्ति | वक्तव्यं | अहम् इथन्नामा संबहुलान् आर्यमिश्रान् प्रवारेमि दृष्टेन श्रुतेन परिशङ्कया | ओवदन्तु मे आर्यमिश्रा यावद् यथाधर्मं प्रतिकरिष्यामि | एवं द्वितीयम् पि तृतीयम् पि |
SK
अथ दानि एका भिक्षुणी भवति | एक भिक्षु भवति | वक्तव्यं | अहम् इत्थन्नामा आर्यं प्रवारेमि दृष्टेन श्रुतेन परिशङ्कया | ओवदतु मे आर्यो अर्थ कामो हितैषी अनुकम्पको अनुकम्पाम् उपादाय जानन्ती पश्यन्ति स्मरन्ती यथा धर्मं यथा विनयं तथा प्रतिकरिष्यामि | एवं द्वितीयम् पि तृतीयम् पि |
SK
११०. सा एषा भिक्षुणी अवज्ञाय वा परिभवेन वा कोण्टभिक्षू ति वा कृत्वा | वैद्यभिक्षू ति वा कृत्वा | चूडभिक्षू ति वा कृत्वा अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञो ति वा कृत्वा | वर्षोषिता उभयतो संघप्रवारणान् न प्रत्याशंसयति गुरुधर्मम् अतिक्रामति | एवं गौतमि वर्षोषिताहि भिक्षुणीहि उभयतो संघे प्रवारणा प्रत्याशंसितव्या | अयं गौतमि भिक्षुणीनाम् अष्टमो गुरुधर्मो यो भिक्षुणीहि यावज्जीवं सत्कर्तव्यो गुरुकर्तव्यो मानयितव्यो पूजयितव्यो अनतिक्रमणीयो वेलामिव महासमुद्रेण |
११९. भिक्षू दानीं पृच्छन्ति | केन त्वं भगिनी राष्ट्रा पाण्डुकृशा दुर्वर्णा | किन् ते दुःखति | किन् ते पर्येषामः | सर्पिस् तैलं मधु फाणितं | सा दान् आह भोतु भोतु आर्य एवम् एव वर्ता भविष्यामि | भिक्षुणीयो पृच्छन्ति | आर्ये राष्ट्रे केन त्वम् एवं पाण्डुकृशा दुर्वर्णा | किन् ते दुःखति | किन् ते पर्येषामः | सर्पिस् तैलं मधु फाणितं | सा दान् आह | भोतु भोतु आर्यमिश्रिकायो एवम् एव वर्ता भविष्यामीति | एवं एव उपासिका उपासिकायो | सो पि शाकियकुमारो आह | आर्ये किन् ते दुःखति | केन सि पाण्डु कृशा दुर्वर्णा | आचिक्षाहि कीदृशेहि अत्र भैषज्येहि वा उपकरणेहि वा अर्थो भवेय | सचेद् अस्माकं न भविष्यति प्रातिवेश्य कुलातो उद्धारधर्मणा आनापयिष्यामि | अन्तरापणातो वा ग्रामान्तरातो वा आनापयिष्यामि | सा दान् आह भोतु दीर्घायुः एवम् एव वर्ता भविष्यामि | द्वितीयं तृतीयम् अपि आह | आर्ये किन् ते दुःखति | केनासि पाण्डुकृशा दुर्वर्णा यावद् ग्रामान्तरातो आनापयिष्यामि | सा दान् आह भोतु दीर्घायु एवम् एव वर्ता भविष्यामि | सो दानि शाकियकुमारो आह | न इदं आर्याये किञ्चित् कायिकं गैलायं | चैतसिकं आर्याये गैलान्यं | सा दान् आह | बाढं चैतसिकं गैलान्यं | सो दान् आह कथं सह्यं भवेय | सा दान् आह | यदि एवम् इच्छसि एवं सह्यं भवेय |
SK
१२०. सो दान् आह | आर्ये किम् अर्थम् अहं नेच्छामि | यो दानि अहं जल्पामि | आचिक्षतु आर्या किम् आज्ञापयसि | किं करोमि | कीदृशेहि अत्र भैषज्येहि वा उपकरणेहि वा अर्थो भवेय | सचेद् अस्माकं न भविष्यति प्रातिवेश्यकुलातो उद्धारधर्मणा आनयिष्यामि अन्तरापणातो वा ग्रामान्तरातो वा आनापयिष्यामीति | आचिक्षतु आर्या | सा दान् आह | साधु ते एतम् अर्थम् करोहि | सो दान् आह | न आर्ये एवं वक्तव्यं | अन्याहि अहं काषायवसनाहि नोत्सहाम्य् एतं अर्थं कर्तुं प्राग् एव आर्याय | आर्या मम गुरु च भावनीया च | नाहम् आर्याय एवं वक्तव्यो | नह्य् अहम् उत्सहाम्य् एतं कार्यं कर्तुं | सा दान् आह | साधु ताव मे आलिङ्गस्व चुम्बस्व स्तनोदरञ् च मे परिमर्दस्वेति | लभ्यन् मया एतन् मात्रं कर्तुं | स मात्रालिङ्गति चुम्बति स्तनोदरञ् च से परिमृशति | सा पि दानि तत्तकेनैव विनोदयति | सो पि दानि शाकियकुमारो अभीक्ष्णसंसर्गेण अपम्लायति |
SK
१२१. यथा भगवान् आह | नाहम् भिक्षवो ऽन्यम् एकं स्प्रष्टव्यं समनुपश्यामि | एवं रञ्जनीयम् एवं कमनीयम् एवं वञ्चनीयम् एवं मूर्च्छनीयम् एवम् अध्योहारि एवम् अन्तरायकरम् अनुत्तरस्य योगक्षेमस्याधिगमाय यथा पुरुषस्य स्त्री स्प्रष्टव्यं स्त्रीया पुरुष इति दानि तेन अभिक्ष्णसंसेवाय अपम्लायति | सो दानि पुनः पुनः करोति |
SK
१२२. सा दानि भिक्षुणीहि वुच्चति | मा आर्ये एवं करोहि नैवं लभ्या कर्तुं | सा दान् आह | एवं मम क्रियमाणं फासु भवति | एतं प्रकरणं तायो भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसु | महाप्रजापती गौतमी भगवतो आरोचयति | भगवान् आह शब्दापयथ राष्ट्रां | सा दानि शब्दापिता | भगवान् आह | सत्यं राष्ट्रे एवं नाम त्वं अवश्रुता अवश्रुतस्य | पुरुषस्य उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधो कक्षाभ्यां आमोषणपरामोषणं सादियसि | आह | आम् भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते राष्ट्रे | नन्व् अहं राष्ट्रे अनेकपर्यायेण सर्वेषां कामानां कामनन्दीनां कामनिम्नानां काममूर्च्छानां कामपिपासानां कामपरिदाह्यानां कामाध्यवसानानां अन्तम् वदामि | प्रहाणम् वदामि | समतिक्रमणं वदामि | तत्र नाम त्वं इमं एवं रूपत्वं पापम् अकुशलं धर्मं अध्याचरसि | नैष राष्ट्रे धर्म | नैष विनयो | नैवं शास्तुः शासनं | नैवं कर्तव्यं | नैवं करतो वृद्धिर् भवति कुशलेहि धर्मेहि |
१२५ | अथ दानि भिक्षुणी ललाटसिरां वेधापयति द्वितीयाय भिक्षुणीय मूर्ध्नि आक्रमितव्या यथा स्त्री स्प्रष्टव्यं संजानाति न पुरुष स्प्रष्टव्यं संजानाति | अथ दानि बाहुशिरां विन्धापयति अपराय भिक्षुणीय बाहा ग्रहेतव्या यथा स्त्री स्प्रष्टव्यं संजानाति न पुरुष स्प्रष्टव्यं | एवं गुल्फशिरा | एवं जानुमण्डलाधः | अथ दानि गण्डं वा पिटकम् वा क्षतम् वा पुरुषेण पाटापयति वा उपनाहापयति वा अपराय भिक्षुणीय आलम्बयितव्यं | न क्षमति सम्बाधे प्रदेशे गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा पुरुषेण वेधापयितुम् वा पाटापयितुम् वा उपनाहापयितुम् वा | सम्बाधो नाम प्रदेशो उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधः कक्षाभ्याम् | तेन भगवान् आह |
या पुन भिक्षुणी अवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य अन्तो हस्तपाशस्य संतिष्ठेत वा संलपेत वा | हस्तग्रहणम् वा | चीवरग्रहणम् वा सादीयेय | आगतम् वा अभिनन्देय | आसनेन वा उपनिमन्त्रेय | कायम् वा अनुप्रयच्छेय | संकेतकृतम् वा गच्छेय | इयं पि भिक्षुणी पाराजिका भवत्य् असंवास्या |
SK
१२९. या पुन भिक्षुणीति उपसंपन्ना | यावत् सा एषा भिक्षुणी अवश्रुता ति रक्तचित्ता | अवश्रुतस्य पुरुषस्येति रक्तचित्तस्य | अन्तो हस्तपाशस्येति अन्तो व्यायामेति | संलपेया ति उपकर्णं वा जल्पेय | हस्तग्रहणन् ति हस्ते गृह्णिय यावद् अङ्गुष्टके वा | चीवरग्रहणन् ति संघाटीयं वा उत्तरासङ्गे वा अङ्तरेवासे वा संकक्षिकायां वा दकशाटिकायाम् वा | सादियेया ति आस्वादं निगमयेत् | आगतं वा अभिनन्देया ति वा स्वागतन् ते अनुरागतन् ते पुनः पुन आगच्छेसि | प्रीतास्मि तवागमनेन | प्रह्लादितम् मे गात्रं तव दर्शनेन | आसनेनोपनिमन्त्रेया ति आसनम् अस्य ददेय | कायं से अनुप्रयच्छेया ति येनासौ तेन कायं प्रणामेत | संकेतकृतं गच्छेद् इति यस् तस्य अभीक्ष्णं उपचारो भवेद् आपणो वा पीठिका वा क्षेत्रवस्त्रं वा उदकसमीपं वा कर्मान्तं वा उद्यायं वा मार्गे वा तहिं तिष्ठेद् इयं पि भिक्षुणी पाराजिका असंवास्येति यावत् प्रज्ञप्तिः |
या पुन भिक्षुणी अवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य अन्तो हस्तपाशस्य सन्तिष्ठेद् वा | संलपेद् वा | हस्तग्रहणम् वा | चीवरग्रहणम् वा सादीयेय | आगतम् वा अभिनन्देय | आसनेन वा उपनिमन्त्रेयेत | कायम् वा अनुप्रयच्छेय | संकेतकृतम् वा गच्छेय | इयम् पि भिक्षुणी पाराजिका भवत्य् असम्वास्य |
१५३. एषा एवार्थोत्पत्तिः | भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | राजा दानि विरूढको शाकीयान् वधित्वा शाकियकन्यायो आदाय श्रावस्तीं प्रतिगतः तद्यथा | चारू च नाम | उपचारू च नाम | सुमना च नाम | मनोहरा | सालवती | अभया च नाम | सो दानि सार्धं क्रीडन्तो रमन्तो परिचारयन्तः अभिक्ष्णं वदति | निहता मे ग्रामकण्टकाः | शाकियजनपदकण्टकाः | निहता मे प्रत्यर्थिकाः प्रत्यमित्राः | यद् इदम् शाकियाः शाक्यपुत्रा इति |
SK
अथ खल्व् अभया राजधीता राजानं विरूढकम् एतद् अवोचत् | मा देव एवं वद निहता मे ग्रामकण्टकाः शाकिया इति | सन्ति देव शाकियाः क्षान्तिसम्पन्नाः | सौरत्यसम्पन्नाः | एवं शीलश्रुतत्यागसमाधिप्रज्ञासम्पन्नाः | एवं बुद्धं शरणं गताः | धर्मं शरणं गताः | बुद्धे अवेत्य प्रसादेन समन्वागताः | धर्मे संघे अवेत्य प्रसादेन समन्वागताः | प्राणातिपातात् प्रतिविरताः | यावद् आर्यकान्तेः शीलेः समन्वागताः | सन्ति देव शाकियाः श्रोतआपन्नाः सकृदागामिनो नागामिनस् ते देवेन अदूषका अनपराधिनो जीविताद् व्यवरोपिताः | तत् ते दुःखं वेदनीयं भविष्यति | बहु ते पापकं कर्म कृतं | बहु ते अपुण्यं प्रसूतं |
या पुन भिक्षुणी जानन्ती अनवश्रुता अवश्रुतस्य पुरुषस्य प्रतिगृह्णीयात् पात्रं वा चीवरं वा भक्ष्यं वा भोज्यं वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारं वा अयम् अपि धर्मः |
SK
या पुन भिक्षुणीति यावद् उपसम्पन्ना उभयतः संघेन | एषा भिक्षुणी अनवश्रुता ति अरक्तचित्ता | अवश्रुतस्य पुरुषस्येति रक्तचित्तस्य | प्रतिगृह्णेया ति प्रतिच्छेय | पात्रम् इति ज्येष्ठं मध्यमं कन्यसम् वा | चीवरम् इति संघाटिउत्तरासङ्गमन्तर्वासकं कण्ठप्रतिच्छादनं उदकशाटिका | खाद्यम् इति खादनीयं | भोज्यम् इति भोजनीयं | अन्तशः ग्लानभैषज्यम् इति सप्ताहिकं वा यावज्जीविकम् वा | अयम् अपि धर्म | यावत् प्रज्ञप्तिः | एषो तावन् मनुष्यो भिक्षुणीय ददाति पात्रम् वा चीवरम् | भक्ष्यभोज्यम् वा | ग्लानभैषज्यम् वा | तां पुरुषो आह | आर्याय वयम् अर्थिका | आर्याय वयम् ददाम इति | न क्षमति प्रतीच्छितुं | स वक्तव्यः | तवैव भवतु दीर्घायुः लभिष्यामः वयम् अन्यतो पि | अथ प्रतीच्छति संघातिशेषं | अथ वाचं न भाषति हस्तविकारं वा पादविकारं वा अक्षिविकारं वा करोति | हष्तम् वा प्रस्फोटयति | अङ्गुलीं वा अक्षिं वा निपातयति | भूमिम् वा विलिखति विनमति वा | जानाति रक्तचित्तो ति | न क्षमति प्रतीच्छितुं | प्रतीच्छति स्थूलात्ययं |
ये च कुवेगे | ये च महाजने | ये च संघमध्ये विनयातिकरमाः | स्थूलात्ययाः सर्वे ते प्रतिप्रस्रभ्यन्ति स्थापयित्वा अष्टौ स्थूलात्ययाः | न संघम् अगतिगमनेन प्रापयन्ती | अन्तरा प्रतिनिःसरति यथास्थितासु आपत्तिषु कारयितव्या | कथं तावत् प्रतिनिः सर्गार्हं कथम् अप्रतिनिःसर्गार्हं | अभूषि मे संघम् अगतिगमनेन प्रापयिष्यन् ति प्रापयामि प्रापयिष्यामि चेति एवं प्रतिनिःसर्गार्हं | कथं प्रतिनिःसर्गार्हं | अभूषि मे संघम् अगतिगमनेन प्रापयिष्यन् ति प्रापितञ् च | न खल्व् इदानीं प्रापयामि न च प्रापयिष्यामीत्य् अप्रतिनिःसर्गार्हं | तेन भगवान् आह |
SK
भिक्षुणी खलु पुनः संघाक्रोशिका भवति | सा एवम् आह | छन्दगामी | चार्यमिश्रिकायो | संघो दोषगामी च भयगामी च संघो | मोहगामी च संघो | छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहं निश्राय समाक्रोशितव्याम् परिभाषितव्याम् मन्यति | सा भिक्षुणी भिक्षुणीभिर् एवम् अस्य वचनीया | मा आर्ये संघआक्रोशिका भवाहि | न संघो छन्दगामी | न संघो दोषगामी | न संघो भयगामी | न संघो मोहगामी | न च संघो छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहं निश्राय आर्याम् आक्रोशितव्याम् परिभाषितव्याम् मन्यति | आर्या एवं छन्दगामिनी दोषगामिनी भयगामिनी मोहगामिनी | आर्या एव छन्दन् निश्राय दोषं भयं मोहन् निश्राय संएघम् आक्रोशितव्यं रोषितव्यं परिभाषितव्यं मन्यति | विरमार्य संघाक्रोशनातो | एवं च सा भिक्षुणी भिक्षुणीभिर् उच्यमाना तम् एवि वस्तुं समादाय प्रतिगृह्य तिष्ठेत् | न पर्तिनिःसरेय | सा भिक्षुण् भिक्षुनीभिर् यावत्तृतीयकं समनुग्राहितव्या समनुभाषितव्या तस्य वस्तुस्य प्रतिनिःसर्गाय | यावत्तृतीयकं समनुग्राह्यमाना वा समनुभाषियमाना | तं वस्तुं प्रतिनिःसरेय इत्य् एतत् कुशलं | नो चेत् प्रतिनिःसरेय | अयम् अपि धर्मो यावत्तृतीयको |
या पुन भिक्षुणी शय्यासनस्यार्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्तम् वा भोज्यम् वा ग्लानभैषज्यम् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | शय्यासनस्यार्थायेति | शय्यासनं नाम मञ्चं पीठं बिसि चतुरस्रं कुच्चं बिम्बोहनं | याचित्वा ति विज्ञापेत्वा समादापेत्वा | अन्यं चेतापये ति जानापयेत् | पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारान् वा चेतापयति | निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा संघस्य भक्तस्य वा तर्पणस्य वा य्वागूपानस्य वा याचित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्तम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कारान् वा चेतापयेन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं | अथ खलु यस्यार्थाय याचति तम् एव जानापयितव्यं | अथ दानि वस्त्रं विप्रणामेति भक्तस्य वा तर्पणस्य वा य्वागूपानस्य वा अर्थाय याचयित्वा वैभङ्गिकं ददाति | शय्यासनम् वा उपस्थापेति वार्षिकम् वा हेमन्तिकम् वा देति | विनयातिक्रमम् आसादयति | सा एषा भिक्षुणी संघस्य भक्तं दापेति | त्यक्तमुक्तम् अनवगृहीतं दातव्यं | यदि तहिं किञ्चिच् छेषं भवति ओदनम् वा सूपम् वा यावद् भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा उपदर्शयितव्यं | यद्य् आदाय गच्छति अध्युपेक्षितव्यं | अथ दान् आह | आर्याय देमीति | वक्तव्यं | न हि | संघस्य देहि | अथाह दिन्नं मया संघस्य | आर्याय देमीती | प्रतीच्छति | अनापत्तिः | भिक्षोर् अपि एवम् एव आपत्तिस् तु विन्यातिक्रमः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्येषाम् अर्थाय याचयित्वा आत्मनो पात्रम् वा चीवरम् वा भक्ष्यम् वा भोज्यम् वा ग्लानप्रत्ययभैषज्य परिष्कारान् वा चेतापयेन् निःसर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणीचीवरसन्निचयं कुर्यात् निस्सर्गिकपाचत्तिकं ||
SK
निःसर्गिकपाचत्तिकधर्म १६
SK
निःशृजाति
SK
१७७. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | स्थूलनन्दा नाम भिक्षुणी चीवराणि नैव धोवति न सीवेति न रञ्जेति | ताये दानि ओमलिनमलिना संघाटी पाटितविपाटिता | उपाश्रये निक्षिप्ता या इच्छति सा उपादीयतू ति | अथापरा भिक्षुणी जेता नाम लूहचीवरधरा | सा भिक्षुणीहि वुच्चति | आर्ये एतां संघाटिं धोविय सीविय फोषिय प्रावृता | सा दानि स्थूलनन्दा आह | आनेहि आर्ये एतां संघाटिं मह्यं एषा संघाटी | पश्यथ आर्यमिश्रिकायो न किञ्चिच् छक्यते उपाश्रये निक्षिपितुं | लब्धोत्क्षिप्तिकाहि पूरो संघारामो ताव | धृष्टा च मुखरा च प्रगल्भा च सा दानि ताय संघाटी आच्छिन्ना | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती पि गौतमी भगवतो आरोचेति | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुण्युपाश्रये पुराणसंघाटिं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति | उक्त्वा पश्चात् स्वयम् एव उपादियेय निस्सर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पेयालं | भिक्षुण्य् उपाश्रये ति भिक्षुणीविहारे | संघाटीति चीवरं | निक्षिपेत्वा ति स्वयं | निक्षिपायेत्वा ति परेण | या इच्छति सा उपादीयतू ति पश्चात् स्वयम् एव उपादीयेत निःसर्गिकपाचत्तिकं | सा एषा भिक्षुणी भिक्षुणीउपाश्रये चीवरं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति यदि काचि उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्दितुं | आच्छिन्दति निःसर्गिकं भवति | अथ दानि न कायचि उपादिन्नम् भवति तस्या एव च ताय अर्थो भवति किञ्चापि गृह्णाति अनापत्तिः | अथ दानि क्षुद्रानुक्षुद्रकं परिष्कारं निक्षिप्तम् भवति यदि कायचि उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्दितुं | आच्छिन्दति विनयातिक्रमम् आसदयति | भिक्षुर् अपि भिक्षुविहारे पात्रम् वा चीवरम् वा उपानहम् वा क्षुद्रानुक्षुद्रकम् वा परिष्कारं निक्षिपित्वा यो इच्छति सो उपादीयतू ति | यदि केनचिद् उपादिन्नम् भवति न क्षमति आच्छिन्चितुं | आच्छिन्दति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ न केनचिद् गृहीतम् भवति सो एव तेनार्थिको भवति किञ्चापि गृह्णाति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुण्य् उपाश्रये पुराणसंघाटिं निक्षिपेत्वा वा निक्षिपायेत्वा वा या इच्छति सा उपादीयतू ति उक्त्वा पश्चात् स्वयम् एव उपादीयेय निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
निःसर्गिकपाचत्तिकधर्म १७ निःसीवेति
SK
१७८. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | अपराय दानि भिक्षुणीय पुराणसंघाटी ओमलिनमलिना धोवित्वा निःसीवित्वा आतपे दत्त्वा वातो च प्रवापितो | अग्निश् च उत्थितः | संघाटी दग्धा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचेन्ति | पेयालं यावद् भगवान् आह | एवन् नाम त्वं पुराणसंघाटीं निःसीवित्वा न प्रतिसंधैसि न प्रतिसन्धापयसि | तेन हि प्रतिसन्धेतव्यं प्रतिसन्धापेतव्यं |
या पुन भिक्षुणी पुराणसंघाटिं निःसीवित्वा निःसिवापेत्वा वा उत्तरि षट्पञ्चरात्रम् अगिलाना न प्रतिसन्धाये न प्रतिसन्धापयेन निःसर्गिकपाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पुराणसंघाटीति पुराणचीवरं | संघाटीति द्विपुटा | निःसीवित्वा ति स्वयं | निःसीवापेत्वा ति परेण | उत्तरीति षट्पञ्चरात्रम् इति न दानि षट्पञ्च च | अथ खलु परमं षट्रात्रन् न प्रतिसन्धेयैति स्वयं न प्रतिसन्धापेया ति परेण | न प्रतिसन्धापेयन् निस्सर्गिकपाचत्तिकं | पेयालं | यावत् प्रज्ञप्तिः |
SK
एषा दानि भिक्षुणीये संघाटी मलिना भवति | यदि ताव लहुका भोति तथा येव धोवितव्या | न क्षमति निःसीवयितुं | अथ दानि सारिका भोति निःसीवेत्वा निःसीवित्वा धोवितव्या | प्रत्यर्गलकानि दत्त्वा आतपे दातव्या | साहरित्वा गोपिटके वा कुण्डके वा पटलके वा स्थापयित्वा काष्ठखण्डेन वा उपलखण्डेन वा आक्रमितव्या | न क्षमति प्रकीर्णम् ओसारयितुं | अथ दानि भाजनन् न भवति एकस्थाने आक्रमिय इष्टकेन वा उपलखण्डेन वा स्थापयितव्या | पश्चाद् अन्तेवासिणीय वा समानोपाध्यायिनीया वा भिक्षुणीय प्रतिसन्धापयितव्या स्वयम् वा प्रतिसन्धेतव्या | अथ दानि जरादुर्बला व्याधिदुर्बला वा भवति किञ्चापि चिरेण प्रतिसन्धेति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी पुराणसंघाटीन् निःसीवित्वा वा निःसीवापेत्वा वा उत्तरि षट्पञ्चरात्रं अग्लाना न प्रतिसन्धे वा न प्रतिसन्धापेय वा निःसर्गिकपाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी पराहृतं खादनीयं वा भोजनीयम् वा पुनो पुनो पचित्वा वा पचापेत्वा वा भृज्जित्वा वा भृज्जापेत्वा वा कठित्वा वा कठापेत्वा वा अगिलाना खादये वा भुञ्जेय वा पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति | पेयालं | पराहृतन् ति ग्रामतो वा आनीतं नगरतो वा आनीतं | खादनीयन् ति खादनीयं भोजनीयन् ति भोजनीयं | पचित्वा ति स्वयं | पचापयित्वा ति परेहि | भृज्जित्वा ति स्वयं | भृज्जापयित्वा ति परेहि | कठित्वा ति स्वयं | कठापयित्वा ति परेहि | अगिलाना ति प्रत्युद्धृतं भगवता पदं अनापत्तिर् गिलानाये | किन् दानि अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | जरादुर्बला वा भोति व्याधिदुर्बला वा भुक्त्वा वा वमति | अफासुं वा भोति इदम् अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | सा एषा भिक्षुणी रसगृध्या पराहृतं पिण्डपातं पुनो पुनो पचेय वा पचापेय वा पाचात्तिकम् आसादयति | अथ दानि शीतलम् भवति लभ्या उष्णीकर्तुं | न दानि थालिकाय वा पिठरिकाय वा | अथ खलु ताम्रपात्रेण वा कुपात्रेण वा कांसिकाय वा उष्णीकर्तव्यं | भिक्षुर् अपि स्वयं पचति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि कल्पियकारेण पचापेति अनापत्तिः | अथ दानि शीतलो भवति पिण्डपातो उष्णीकरोति अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी पराहृतं खादनीयम् वा भोजनीयम् व पुनो पचित्वा वा पचापेत्व वा भृज्जित्वा वा भृज्जापयित्वा वा कठित्वा वा कठापयित्वा वा अगिलाना खादेय वा भुञ्जेय वा पाचत्तिकं | ह्रा ||
SK
पाचत्तिकधर्म ७९
SK
दकविजनेन
SK
१९३. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | गर्तोदरो च गर्तोदरमाता च गर्तोदरपिता च अगारस्यानगारियं प्रव्रजिताः | गर्तोदरपिता च गर्तोदरमाता च शाक्येहि प्रव्रजिता गर्तोदर तिर्थकेषु | गतोदरपिता भुञ्जति गर्तोदरमाता वीजयन्ती अग्रतो तिष्ठति पानीयमल्लकं धारेति | सो दानि ताये कानिचित् कानिचित् पूर्वचरितानि जल्पति | यानि ताये अमनआपानि | ताय तस्य पानीयमल्लकं मस्तके आपिट्टितं | वीजनदण्डेन च मस्तके आहतो | अखल्लमहल्लअकुशलअप्रकृतिज्ञः | अद्यापि त्वं अजल्पितव्यानि जल्पसि | सा भिक्षुणीहि दृष्टा | ता दान् आहंसुः | मा आर्ये एवं करोहि | अग्रपरिषा एषा न लभ्या एवं कर्तुं | सा दान् आह | अयं खलु अखल्ल अकुशलो अप्रकृतिज्ञो अद्यापि यानि तानि अजल्पितव्यानि जल्पति | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | यावद् भगवान् आह | दुष्कृतं ते गर्तोदरमाते | नैष धर्मो नैष विनयो | एवं च दानि भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहसि | तेन हि न क्षमति दकवीजनेन उपस्थिहितुं | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | पेयालं | भिक्षुन् ति उपसम्पन्नं | पे | भुञ्जन्तं ति पञ्चजातकम् वा पञ्चजातकसंसृष्तम् वा यद् वा किञ्चित् खाद्यं भोज्यं | दकवीजनेन उपस्थिहेया ति पानीयमल्लकं धारयेत् | वीजनवातम् वा दद्यात् पाचत्तिकं | यावत्प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी उदकमल्लकन् धारयति नीवीजनं विनयातिक्रमम् आसादयति | वीजयति न उदकमल्लकन् धारेति विनयातिक्रमम् आसादयति | उभयं करोति पाचत्तिकं | नोभयं अनापत्तिः | सा एषा आपत्तिः एकस्य भिक्षुस्य एकभिक्षुणीये | अथ दानि संबहुला भिक्षू भवन्ति अनापत्तिः | अथ दानि भिक्षुणीये पिता वा भ्राता वा भिक्षुर् भवति किञ्चापि वीजयत्य् अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी भिक्षुं भुञ्जन्तं दकवीजनेन उपस्थिहेय पाचत्तिकं
या पुन भिक्षुणी लशुनं खादेय पाचत्तिकं || लशुनन् ति लशुनं नाम जातिमं सेविमं नागरं कच्छरुहं पार्वतेयं ब्रह्मदेयं आवरन्तकं मागधकं कोसलकं | यं चा पुनर् अन्य पि किञ्चिल् लशुनं सर्वं लशुनं न क्षमति | आमन् न क्षमति पक्वन् न क्षमति | यकृन् न क्षमति | कापि कापि न क्षमति अभ्यन्तरपरिभोगाय |
SK
अथ दानि भिक्षुणीय गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति लभ्यन् तं म्रक्षितुं | म्रक्षयित्वा न क्षमति अभ्यागमे प्रदेशे स्थातुं | अथ खु प्रतिगुप्ते प्रदेशे स्थातव्यं यावद् वर्त्ता भवति | +++++ धोविय निष्क्रमितव्यं | तेन भगवान् आह |
पूरविंशतिवर्षाम् एका ऊनविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो एका पूरविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो उपसम्पादेन्ति | या ऊनविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो ता विनयातिक्रमम् आसादयन्ति | या पूरविंशतिवर्षसंज्ञिनीयो तासाम् अनापत्तिः | सा च सूपसम्पन्ना |
या एषा कुमारीभूता आकाङ्क्षति तथागतप्रवेदिते धर्मविनये उपसम्पदं सा दानि समनुग्रहितव्या | कदा त्वं जाता | अथ न जानाति जन्मपद्धिका निशामयितव्या | जन्मपद्धिका न भवन्ति मातापितरौ पृच्छितव्यौ | अथ दानि ते पि न जानन्ति पृच्छितव्या | कतरस्मिं राज्ये जाता | केत्तिका वा तदा त्वं अभूषि | सुदृष्टिर् दुर्दृष्टिर् वा | पृच्छितव्या | न उद्धिकस्य वा चित्रिकस्य वा वशेन गन्तव्यं | अथ खु हस्तपादा निशामेतव्याः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी ऊनविंशतिवर्षां कुमारीभूतां उपस्थापयेत् पाचत्तिकं
२४२. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भिक्षुणीयो दानि सन्निपतिताः पोषध कर्माय | जेता नाम भिक्षुणी | सा नागच्छति | ताये दूतो ऽनुप्रेषितो | आर्ये आगच्छाहि भिक्षुणीयो सन्निपतिताः पोषधकर्माय | सा दान् आह | भगवता विशुद्धस्य विशुद्धिपोषधः प्रज्ञप्तः | यावतिका का विशुद्धा अहन् तासाम् अन्यतमासां तत्र नागच्छामि | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते जेते | त्वञ् च नाम पोषधन् न सत्करोषि | का अन्या सत्करिष्यति को च पोषधस्य सत्कारो | अगिलानाय उपसंक्रमितव्यं | गिलानाय छन्दो दातव्यो | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासंअगिलाना विशुद्धिसंवासं न सत्करेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्वर्धमासं विशुद्धिसंवासं ति चातुर्दशिकेन वा चातुर्दशिकं पाञ्चदशिकेन वा पाञ्चदशिकं | अगिलाना पोषधन् न सत्कारोति | किन् दानि अत्र गैलान्यम् अभिप्रेतं | एषा भवति जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा शिराविद्धिका वा भवति असुखा भैषज्यं वा पीतम् भवति | घृतं वा पीतम् भवति | छन्दो दातव्यो |
SK
सा एषा भिक्षुणी अगिलाना पोषधन् न गच्छति | गिलाना वा छन्दन् न देति पाचत्तिकं |
SK
भिक्षुर् अपि अगिलानो नैव पोषधं गच्छति न च्छन्दन् देति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासं अगिलाना विशुद्धिसंवासन् न सत्करेय पाचत्तिकं |
या पुन भिक्षुणी अन्वर्ध मासं भिक्षुसंघे ओवादोपसंक्रमणं न सत्करेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | अन्वर्धमासन् ति चातुर्दशिकेन वा चातुर्दशिकं | पाञ्चदशिकेन वा पाञ्चदशिकं | भिक्षुसंघे ओवदोपसंक्रमणं न सत्करेय पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा घृतपीतिका वा भवति वक्तव्यं | ओवादस्य छन्दन् देमि त्रिक्खत्तो | सा एषा भिक्षुणी अगिलाना ओवादोपसंक्रमणं न गच्छति गिलाना वा छन्दन् न देति पाचत्तिकम् आसादयति | यदा पोषधो भवति तदा च्छन्दहारिकाहि भिक्षुविहारङ् गत्वा वक्तव्यं | समग्रो भिक्षुणीसंघो समग्रस्य भिक्षुसंघस्य पादां च्छिरसा वन्दति पोषधञ् च प्रतीच्छति अववादं च याचति एवं त्रिक्खत्तो याचितव्यं | यदि तावत् कोचिद् भिक्षुणीओवादको भवति वक्तव्यं | एष भगिनीयो ओवादको आगमिष्यति | अथ न कोचिद् भवति यो तंहि अङ्गोपेतो भवति सो संमन्यितव्यो | अथ न कोचिद् वक्तव्यं | नास्ति भगिनीयो भिक्षुणीओवादको अप्रमादेन संपादेथ आपत्तिञ् च पोषधं प्रतिजाग्रथ सगौरवा च भवथ स्थविरेहि भिक्षूहि मध्येहि नवकेहीति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी अन्वर्धमासं विशुद्धिपोषधं न सत्करेय पाचत्तिकं ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३३
SK
गण्डम् वा पिटकम् वा
SK
२४४. भगवान् राजगृहे विहरति | जेताये भिक्षुणीये संबाधे प्रदेशे गण्डम् उत्पन्नं | ताये अन्तेवासिनीयो गोचरञ् गतायो | हिण्डिकवैद्यो आगतो | सा दान् आह | दीर्घायुः शक्यसि मम शस्त्रकर्म कर्तुं | सो दान् आह | बाढं | सो दानि पाटयित्वा धोवायित्वा उपनाहयित्वा गतो | तायो भिक्षुणीयो आगतायो | ताहि दानि सो प्रदेशो दृष्टो पूयम्रक्षितो | ता दान् आहंसुः | आर्ये किम् इदं | आह | शस्त्रकर्म कारितं | आहंसुः | साहसम् आर्याय कृतं संबाधे प्रदेशे शस्त्रकर्म कारयन्तीय | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | एवं च नाम त्वं उपरि जानुमण्डलाभ्यां अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं शस्त्रकर्म कारापयसि | तेन हि न क्षमति | पेयालं | यावत् |
SK
या पुन भिक्षुणी उपरि जानुमण्डलाभ्याम् अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं पुरुषेण पातापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापयेद् वा पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | उपरि जानुमण्डलाभ्याम् इति ऊरुनाभिभ्यां | अधो कक्षाभ्याम् इति स्तनोदरस्य | गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यन् ति भिक्षुणी वक्तव्यो शस्त्रकर्म कारापयिष्यन् ति |
पुरुषेणेति गृहस्थेन वा प्रव्रजितेन वा पाटापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापेय वा ति यथा जेता भिक्षुणीति पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि संबाधे प्रदेशे गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति अन्तेवासिनीये वा समानोपाध्यायिनीये वा समानाचार्याये वा यस्या विश्वासो ताय आख्यातव्यं | कण्टकेन वा नखेन वा भेदापयितव्यं भैषज्येन वा आलिम्पापेयतव्यं अथ दानि अधो जानुमण्डलाभ्याम् उपरि कक्षाभ्याम् भवति गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा पुरुषेण पाटापयति वा धोवापयति वा उपनाहापयति वा एवम् शिराम् वा वेधापयति नेलाटिकम् वा बाहुशिराम् वा गुल्फशिराम् वा अपराय भिक्षुणीय आक्रमितव्या तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी उपरि जानुमण्डलाभ्यां अधो कक्षाभ्यां गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा अकृत्वा पूर्वकृत्यं अनवलोकयित्वा संघं पुरुषेण पाटापयेद् वा धोवापयेद् वा उपनाहापयेद् वा पाचत्तिकं ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३४
SK
वर्षोपगता
SK
२४५. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | अथ काली नाम भिक्षुणी वर्षोपगता सांघिकं विहारं बन्धित्वा चारिकां प्रक्रान्ताः | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतम् ते कालि एवन् नाम त्वं वर्षोपगतानां चारिकां प्रक्रमसि | तेन हि न क्षमति वर्षोपगताय चारिकां प्रक्रमितुं | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षोपगता चारिकां प्रक्रामेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | वर्षा ति वर्षारात्रं | उपगता ति पुरिमिकां पश्चिमिकाम् वा वर्षोपनामयिकां उपगता | चारिकां प्रक्रामेया ति अन्यत्र गच्छेय ग्रामान्तरं पि पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी एकरात्रम् पि विप्रवसति पाचत्तिकं | अथ दानि राजभयम् वा सेनाभयम् वा परचक्रभयम् वा जीवितान्तरायो वा ब्रह्मचर्यान्तरायो वा भवेय किञ्चापि गच्छति अनापत्तिः | नास्ति भिक्षुण्या अवलोकनाकर्म सप्ताहं वा किञ्चापि भिकुः अवलोकनाकर्म कृत्वा सप्ताहं वा अधिष्ठिहेय गच्छत्य् अनापत्तिः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षोपगता चारिकां प्रक्रमेय पाचत्तिकं
SK
पाचत्तिकधर्म १३५
SK
वर्षावुस्ता
SK
२४६. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भिक्षुणीयो दानि श्रावस्तीयं वर्षोषिताः वैशालीम् आगताः | तायो भद्राये कापिलेयीये ज्ञातिकुलं प्रविष्टाः | ता स्त्रियो आहंसुः | कहिं आर्यमिश्रिका वर्षोषिताः | ता दान् आहंसुः | श्रावस्तीयं | आहंसुः | कीदृशी श्रावस्ती | आहंसुः | इदृशी च इदृशी च एवम् आरामरमणीया | एवं | जेतवनं | एवं गन्धकुटी | एवम् भगवान् विहरति | एवम् आर्यमिश्रिका शारिपुत्रमौद्गल्यायनाः | यदि प्रव्रज्या एषा प्रव्रज्या इयं पुनर् अस्माकम् आर्यधीता इहैव जाता | इहैव सम्वृद्धा | नैव कहिञ्चि गच्छति कूपमण्डूक इव तिष्ठति अनिःक्रमा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | यावद् भगवान् आह | तेन हि वर्षावुस्ताया भिक्षुणीय चारिका प्रक्रमितव्या | यावद् भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षावुस्ता चारिकां न प्रक्रमेय पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | वर्षोषितेति वार्षिकां त्रयो मासान् चारिकां न प्रक्रमेया ति अन्तमसतो ग्रामान्तरं पि वा पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणी एवं रात्रं पि प्रक्रमति पाचत्तिकं | अथ दानि जरादुर्बला वा व्याधिदुर्बला वा भोति न प्रतिबला गन्तुं किञ्चापि गच्छति अनापत्तिः | भिक्षुर् अपि वर्षावुस्तो चारिकां न प्रक्रमति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी वर्षावुस्ता चारिकां न प्रक्रमेय पाचत्तिकं || ण्क ||
या पुन भिक्षुणी जानन्ती भिक्षुणीं पूर्वोपगतां पश्चाद् आगत्वा उद्वहेय वा उद्वहापेय वा कायेन वा वाचाय वा पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | जानन्तीति स्वयं वा जानेय परतो वा श्रुणेय | भिक्षुणीम् पूर्वोपगताम् इति पुरिमिकायां वर्षोपनायिकायां | पश्चाद् आगत्वेति पश्चिमिकायां | उद्वहेय वा ति स्वयं | उद्वहापेय | वा ति परेण कायेण वा वाचा वा पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | सा एषा भिक्षुणीम् उद्वहति पाचत्तिकं | श्रामणेरीम् वा शिक्षमाणाम् वा उद्वहति देशनागामिविनयातिक्रमम् आसादयति | अन्तमसतो गृहिणीं पि उद्वहति सम्वरगामिविनयातिक्रमः | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी जानन्ती भिक्षुणीं पूर्वोपगतां पश्चाद् आगत्वा उद्वहेय वा उद्वहापेय वा कायेन वा वाचा वा पाचत्तिकं || फु ||
SK
पाचत्तिकधर्म १३८
SK
विघसं
SK
२४९. भगवान् काशिषु विहरति | अपराय दानि भिक्षुणीय उच्चारमल्लकं अप्रत्यवेक्षित्वा रथ्यायां छोरितं | तहिं दानि अपरो ब्राह्मणो शीर्षस्नातो आहतवस्त्रनिवस्त्रो ताय रथ्याय अतिक्रमति | उच्चारमल्लकं तस्य शीर्षे पतितं | तस्य शीर्षं वस्त्राणि च विनाशितानि | जनेन चोपहासितं ब्राह्मण सुस्नातः सुविलिप्तस् त्वम् इति | सो दानि ताम् आक्रोशति | आह | इतिकितिकाय धीते श्रमणिके न पश्यसि मम शीर्षं वस्त्राणि च विष्ठेन विनाशितानि | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुस्कृतन् ते एवन् नाम त्वम् अप्रत्यवेक्षिय छोरेसि | तेन हि न क्षमति अप्रत्यवेक्षिय छोरयितुं | अथ खलु भगवान् यावत् पर्यवदातानि भविष्यन्ति |
SK
या पुन भिक्षुणी तिरोकुड्यं उच्चारम् वा प्रास्रावम् वा खेटकम् वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा अप्रत्यवेक्षित्वा छोरयेत् पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | तिरोकुड्यन् ति तिरःप्रकारम् उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा वस्त्रधोवनम् वा भाण्डधोवनम् वा केशान् वा नखान् वा | अप्रत्यवेक्षित्वेति अनिरीक्ष्य | छोरेया ति उज्झेय | पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | यदि किञ्चित् उज्झितुकामो भवति प्रत्यवेक्षितव्यं | यदि तावद् आकीर्णबहुजनमनुष्या रथ्या भवन्ति आरामयितव्यं | अथ दानि अनाकीर्णा भवन्ति किञ्चापि छोरयत्य् अनापत्तिः | तं पि दानि न क्षमति अशब्दकर्णिकाये छोरयितुं अपि तु अच्छटिका दातव्या उक्कासितव्यम् वा | सा एषा भिक्षुणी नैव प्रत्यवेक्षति नापि अच्छटिकां दत्त्वा छोरयति पाचत्तिकम् आसादयति | भिक्षुर् अपि अप्रत्यवेक्ष्य अच्छटिकाम् अकृत्वा छोरयति विनयातिक्रमम् आसादयति | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी तिरोकुड्यं उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटं वा सिंघाणकम् वा विघसम् वा संकारम् वा अप्रत्यवेक्ष्य छोरेय पाचत्तिकं || ग्रा ||
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पाचत्तिकधर्म १३९, १४०
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हरित तृणे
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उदक २५०. भगवान् श्रावस्तीयं विहरति | राज्ञो दानि प्रसेनजितस्य कोशलस्य पूर्वकोष्ठकं नाम उद्यानम् पुष्किरिणीसम्पन्नं | अनावृतं भिक्षूनां भिक्षुणीनां आवृतं इतराये जनताये | राजा दानि आरामिकस्याह | हो भणे आरामिक पूर्वकोष्ठकम् उद्यानं सिक्तसंसृष्टं करेहि | श्वो हं सान्तःपुरो निर्यास्यं | तं दानि षड्वर्गिणीहि श्रुतं | श्वो राजा सान्तःपुरो उद्यानभूमिन् निर्यास्यतीति | तायो दानि प्रतिकृत्य् एव गत्वा तहिं हरितशाद्वलोपस्तराणायां पक्वखेटेन च पक्वसिंघाणकेन च विनाशयित्वा पदुमपत्रेहि उच्चारस्य पुटकानि बन्धित्वा पुष्किरिणीयं प्रवाहयेंसुः | तायो दानि दिवसं तहिं काकावाहां भञ्जिय सायाह्नसमये नगरं प्रविष्टाः राजा दानि प्रसेनजित कोशलो अपरेज्जुकातो निरगतो सान्तःपुरो | तायो दानि अन्तःपुरिकायो कथञ्चिद् एव सम्रोधाद् अवमुक्ता रन्धनमोक्षम् इव मन्यमानाः चञ्चूर्यन्ते | काश्चिन् निषण्णाः काश्चिन् निपन्नाः | काश्चिद् इतो च इतो च धावन्ति अवकाशं गृह्णन्ति शाद्वलोपस्तरणे परिभ्रामन्ति | तासां दानि पक्वखेटेन पक्वसिंघाणकेन वस्त्राणि विनाशितानि | पुष्किरिणीं ओतीर्णाः स्नानाय | तायो पश्यन्ति पुटकान् प्लवमानान् | तासां भवति कुलपुत्रकेहि श्रुतं श्वो राजा सान्तःपुरो उद्यानं प्रवेक्ष्यतीति तेहि एते गन्धपुटकाः प्रवाहिता इति कृत्वा तायो गृह्णन्ति | ते उदकेन क्लिन्ना उच्चारेण चा खादिताः प्रकृतिसुकुमारं च पद्मपत्रं | गृहीतमात्रम् एव विलीनं | ही ही विष्ठं ता दानि राज्ञो उपसंक्रान्ता आहंसु | महाराज एष तावद् ईदृशी अवस्था राजा आह शब्दापयथ आरामिकं | सो दानि शब्दापितो | राजा आह | हो भणे आरामिक केन उद्यानं विट्टालितं | आह षड्वर्गिणीयो श्रमणीयो एव दिवसं काकवाहा भञ्जित्वा गताः | राजा हसित्वा आह | तासाम् अविनीतानां कर्म भविष्यति | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती पि गौतमी भगवतो आरोचयेत् | यावद्
SK
या पुन भिक्षुणी हरिते तृणे उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
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या पुन भिक्षुणी उदके उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
SK
या पुन भिक्षुणीति उपसम्पन्ना | उच्चारन् ति गूथं | प्रस्रावन् ति मूत्रं | खेटम् इति श्लेष्मा | सिंघाणकन् ति पक्वसिंघाणकं | हरिते तृणे इति शाद्वले अच्छिन्नालूनस्मिं उदन् ति उदकानि नाम दश | नादिकं ताडागं औदुपानिकं श्वभ्रोदकं प्रघारिमं वृष्टिस्थितं उच्छोदकं अन्तरीक्षपानीयं हिमविलीनं सामुद्रम् वा उच्चारम् वा प्रस्रावं वा कुर्यात् पाचत्तिकं यावत् प्रज्ञप्तिः | अथ दानि प्रावृषेण्या से सर्वभुमिः शाद्वलोपस्तरेणा भवति यहिं प्रदेशे स्वल्पहरितम् भवति तहिं कर्तव्यं | अथ दानि अल्पहरितं न भवति कटाहके वा इष्टकायम् वा उपले वा शुष्कतृणे वा काष्ठखण्डे वा यत्र वा अन्येन उच्चारो कृतो भवति बलीवर्देन वा | यत्र वा अन्येन मनुष्येन कृतो तहिं कर्तव्यं अथ दानि एवं न भवति अन्तमसतो कनीयसिं पि अङ्गुलिं उपद्राहयित्वा कर्तव्यं | तथा कर्तव्यं यथा तहिम् प्रथमम् निपतति | अथ दानि चङ्क्रमति न क्षमति हरितशाद्वले श्लेष्मं छोरयितुं | अथ खु कटे वा पत्रपुटिकायां वा छोरयितव्यं | तेन भगवान् आह |
SK
या पुन भिक्षुणी हरिते तृणे उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं |
SK
या पुन भिक्षुणी उदके उच्चारम् वा प्रस्रावम् वा खेटम् वा सिंघाणकम् वा कुर्यात् पाचत्तिकं ||
न स्थिता [५०] | न निषण्णा [५१] | न उच्चासना [५२] | उपनह [५३] | न पादुका [५४] | न ओगुण्ठिका [५५] | न संमुख [५६] | न ओसक्तिका [५७] | न पल्लत्थिका [५८] | पूर्यते पञ्चमो वर्गः ||
भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो पश्चिमं प्रहाणं स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदन्ति | अथापराये दानि भिक्षुणीये व्रणमुखेन दीर्घको ऽनुस्रोतेन प्रविष्टो | एतं प्रकरणं भिक्षुणीयो महाप्रजापतीये गौतमीये आरोचयेंसुः | महाप्रजापती गौतमी भगवतो आरोचयेत् | भगवान् आह | गच्छथ ताये अमुकं भैषज्यं देथ ततो सो दीर्घको निष्क्रमिष्यति | ताये दानि तं भैषज्यं दिन्नं पिबनाये | सो दीर्घको अनुस्रोतम् आगतो न च मृतो | भगवान् आह | एवं च नामा यूयं स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदथ | तेन हि न क्षमति स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदितुं | निषद्याप्रतिसंयुक्तं | न क्षमति भिक्षुणीये पर्यङ्केन निषीदितुं | अथ खल्व् एकिना पदेन पर्यङ्को बद्धव्यः | अपराय पार्ष्णिकाय व्रणमुखं पिथयितव्यं | सा एषा भिक्षुणी स्वस्तिकपर्यङ्केन निषीदति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते निषद्याप्रतिसंयुक्तं ||
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भिक्षुणीप्रकिर्णक २
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कठिनप्रतिसंयुक्तं
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२५६. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | ता दानि भिक्षुणीयो कठिने चीवरं निक्षिपिय सीवन्ति | अपराये भिक्षुणीये वंसविदलिकाय व्रणमुखेन कृतं रुधिरम् उत्पादितं | एतं प्रकरणं | पेयालं | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति कठिने निषीदितुं | कठिनप्रतिसंयुक्तं | एता दानि भिक्षुणीयो चीवर निषीदितुकामा भवन्ति | न क्षमति कठिने निषीदितुं | अथ खु उपस्थानशालायाम् वा प्रासादे वा प्रहाणशालायाम् वा आकार्षान् दत्त्वा चीवरकं प्रज्ञपिय सीवितव्यं | अथ एवं पि न भवति | पीठस्य वा मञ्चस्य वा उपरि प्रज्ञपयित्वा सीवितव्यं | अथैवं पि न भवति जानुकानाम् उपरि स्थापय्यित्वा सीवितव्यं | सा एषा भिक्षुणी कठिने निषीदति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते कठिनप्रतिसंयुक्तं
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भिक्षुणीप्रकीर्णक ३
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वेठकप्रतिसंयुक्तं
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२५७. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | स्थूलनन्दा दानि भिक्षुणी संबहुलानि स्त्रीहि सार्धं नदीम् अजिरावतीङ् गत्वा एकान्ते चीवरकाणी निक्षिपिय स्नानायावतीर्णा | सा दानि प्रतिकृत्येवोत्तरित्वा वेठकेन कायं वेठयित्वा स्त्रीणाम् आह | प्रजापति निध्यापयथ मां | किम् अहं शोभामि न शोभामीति | ता दान् आहंसुः | किम् पुनर् आर्याय मुण्डाय पिण्डिलिकाय एतेन कार्यं | वयं कामोपभोगनीया मानार्थाय एवं करोमः | कुटुम्बिकानां प्रियतरिका भविष्यामो ति | आर्ये किम् एतेन | यं ताहि स्त्रीहि अवध्यापितं तं दानि भिक्षुणीहि श्रुतं | एतं प्रकरणं | पे | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | दुष्कृतं ते नन्दे यावत् तेन हि न क्षमति वेठकेन कायं वेठयितुं | वेठकप्रतिसंयुक्तं | सा एषा भिक्षुणी वेठकेन पट्टकेन वा कायं वेठयति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि पट्टिकाय वा लोहकेन वा कायं वेठयति | न क्षमति द्विर् अपि वेल्लकं त्रिर् अपि वेल्लकं वेठयितुं | अथ खु एक परिवेल्लकं वेठयितव्यं | अथ दानि वातेन पार्श्वं गृहीतं भवति | गण्डम् वा पिटकम् वा क्षतम् वा उपहतम् वा भवति किञ्चापि पट्टकेन कायं वेठयत्य् अनापत्तिः | इदम् उच्यते वेठकप्रतिसंयुक्तं
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भिक्षुणी प्रकीर्णक ४
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श्रोणिभण्डकप्रतिसंयुक्तं
SK
२५८. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | यथैव वेठकस्य एवम् एवार्थोत्पत्तिः कर्तव्या | सा प्रतिकृत्य्ऽ एव उत्तरित्वा श्रोणीभण्डकम् आबन्धित्वा आह | प्रजापती प्रजापति निध्यायथ मां किम् अहम् शोभामि न शोभामीति | ता दान् आहंसुः | किम् आर्याय | पेयालम् | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह तेन हि न क्षमति श्रोणीभण्डं | श्रोणीभण्डकप्रतिसंयुक्तं | श्रोणीभण्डकन् नाम एते भवन्ति | शङ्खावर्त्तका वा शिरिका वा पीलुका वा विद्रुमा वा अक्षरक्षा वा सुवर्णरूप्यमया वा मणिमया वा प्रकालका वा अन्तमसतो सूत्रमणिका वा बन्धति | तेन च श्रोणीभण्डकछन्दं विनोदयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते श्रोणीभण्डकप्रतिसंयुक्तं || ण्क ||
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भिक्षुणीप्रकिर्णक ५ गृहिणिभण्डकप्रतिसंयुक्तं
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२५९. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | एषैवार्थोत्पत्तिः यावद् गृहिणीभण्डकम् आबन्धित्वा यावद् भगवान् आह | तेन हि न क्षमति गृहिणीभण्डकं | गृहिणीभाण्डकन् नाम एते भवन्ति | मूर्धापिधानका वा | वलया वा | कर्णिका वा | टिक्का वा | वेठका वा | हर्षका वा | हारा वा | अर्धहारा वा अपरञ्जग वा | कटका वा | शङ्खका वा | नूपुरा वा | अङ्गुलीयका वा | यद् वा पुनर् अन्यद् अपि किञ्चिद् गृहिणीभाण्डं सर्वन् न क्षमति | सा एषा भिक्षुणी गृहिणीभण्डकम् आबन्धयति विनयातिक्रमम् आसादयति | अथ दानि भैषज्यभण्डकम् आबन्धति ज्वरसूत्रकम् वा अनापत्तिः | इदम् उच्यते गृहिणीभाण्डकप्रतिसंयुक्तं || तृ ||
SK
भिक्षूणीप्रकिर्णक ६
SK
गृहिणीअलङ्कारप्रतिसंयुक्तं
SK
२६०. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि शाकियकन्यायो कोलितकन्यायो मल्लकन्यायो महान्तेहि कुलेहि प्रव्रजिता अलङ्कारिकान्य् आदाय | कुमारिकानां वुह्यन्तीनां उत्सवसमये तिथि पर्वण्या देवयात्रादिषु कृतकानि भाण्डकानि ददन्ती | जनो दानि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या वाणिजेयं | एतं प्रकरणं | पेयालं यावद् भगवान् आह | तेन हि न क्षमति गृहिणीअलङ्कारं धारयितुं | यदि काचिद् गृहिणी प्रव्रजति यदि ताय किञ्चिद् अलङ्कारं भवति वक्तव्या विसर्जेहि | अथ दानि पश्यति दुर्भिक्ष वा भवेय पिण्डपातो वा न लभ्येत जरादुर्बला वा भवति व्याधिदुर्बला वा गैलान्यम् वा किञ्चिद् भविष्यति अल्पलाभो मातृग्रामो मा विहन्येया ति | पिण्डं कारयित्वा पर्व्राजयितव्या | सा एषा भिक्षुणी अलङ्कारम् अपरित्याजयित्वा प्रव्रजेति विनयातिक्रमम् आसादयति | भिक्षोर् अप्य् एष एवं विधिर् | इदम् उच्यते गृहिणीअलङ्कारप्रतिसंयुक्तं || फु ||
SK
भिक्षुणीप्रकिर्णक ७
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वेश्याप्रतिसंयुक्तं
SK
२६१. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो शाकीयकन्यायो कोलियकन्यायो मल्लकन्यायो महाकुलेहि प्रव्रजिता चेटिकाम् आदाय प्रव्रजन्ति | तायो चेटिकायो प्रासादिकायो दर्शनीयायो वेश्यं (!) वाहयन्ति | जनो दनि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या गणिका इमा | एतं प्रकरणं भिक्षुणीहि श्रुतं | यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | एवं च नाम यूयं वेश्याम् उपस्थापयथ | तेन हि न क्षमति वेश्याम् (!) उपस्थापयितुं | सा एषा भिक्षुणी वेश्याम् उपस्थापयति तेन जीविकां कल्पयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते वेश्याप्रतिसंयुक्तं || ग्रा ||
SK
भिक्षुणीप्रकीर्णक ८
SK
आरामिकिनिप्रतिसंयुक्तं
SK
२६२.भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | भगवता दानि शिक्षापदं प्रज्ञप्तं | न क्षमति वेश्याम् उपस्थापयितुं ति | तायो दानि शाकियकन्यायो मल्लकन्यायो कोलितकन्यायो महाकुलेहि प्रव्रजन्ति | तायो दानि पौद्गलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापेन्ति | तायो दानि आरामिकिनीयो प्रासादिकायो जनो दानि ओज्झायति | नेयं प्रव्रज्या गणिका इयं | एतं प्रकरणं भिक्षुणीहि श्रुतं यावद् आम भगवन् | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति पौदगलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापयितुं | न क्षमति आरामिकिनी | ना क्षमति चेटी | न क्षमति कल्पियकारी | सा एषा भिक्षूणी या पौद्गलिकाम् आरामिकिनीम् उपस्थापयति विनयातिक्रमम् आसादयति | इदम् उच्यते आरामिकिनीप्रतिसंयुक्तम् || ह्रा ||
२७४. भगवान् श्रावस्तीयम् विहरति | तायो दानि भिक्षुणीयो नानाप्रकारेहि मोचयन्ति मूलकेन पलाण्डूकेबुकाये सोभञ्जनकेन लतिकाय | एतं प्रकरणं यावद् भगवन् | भगवान् आह | तेन हि न क्षमति विकृतीहि मोचयितुं | विकृतिप्रतिसंयुक्तं | सा एषा भिक्षुणी मूलकेन वा पलाण्डूय वा केबुकाय वा सोभञ्जनकेन वा लतिकाय वा इल्लादुकाय वा त्रपुसेन वा अल्लाबूय वा कक्षारुकेन वा अन्येन वा पुन केनचिन् मोचयति तेन च कामरागं विनोदेति थूल्ऽ-अच्चयम् आसादयति | इदम् उच्यते विकृतिप्रतिसंयुक्तं ||
Aद्देन्द १ (प्. इव्) वर्गावशेषाः देशना च विहारो च भिक्षुणीनाञ् च ये दश प्रणीतसम्मतम् मात्रं | यावत् वासादना इह छदना सहशय्या च | सम्विधानञ् च वुच्चति | निषद्या ऊनविंशो च | अरण्यायां च शाटिका द्वाविंशति शुद्धेकेहि उद्धारा भिक्षुणीनां प्रवुच्चति | देशनाम् उद्धरित्वान संचिन्त्यं समोदहे पुनो चात्र ||