The Wave of Bliss
�??kt?nandatara?gi??
SK??क्त्?नन्दतर?गि?? प्रथमोल्ल्?स? म?गल्?चर?अम् प्र?अम्य प्रक्?ति? नित्य्?? परम्?त्मस्वर्?पि??म् | तन्यते भुक्तिमुक्त्यर्थ? ??क्त्?नन्दतर?गि??म् || प्रक्?ति?अब्द्?र्थ? अथ क्? प्रक्?ति? ? तथ्?हि ? गु?अत्रयस्?म्य्?वस्थ्? प्रक्?ति? | तथ्? चोक्त? य्?मले ? सत्व? रजस्तम इति गु?अत्रयमुद्?ह्?तम् | स्?म्य्?वस्थितिरेते??मव्यक्त? प्रक्?ति? विदु? | सैव म्?लप्रक्?ति? स्य्?त् प्रध्?न? पुरु?ओऽपि च || अन्यत्र्?पि ? सत्त्व? रजस्तम इति गु??न्?? त्रितय? प्रिये | यद्? स्? परम्? ?अक्तिर्गु??धि??ह्?नम्?चरेत् | प्रक्?तित्व? भवेत्तस्य्?? पुरु?अ? स्य्?त् सद्??इव? || नित्य्??अब्द्?र्थ? नित्य्??अब्द्?र्थम्?ह ?अक्तिय्?मले ? ब्रह्मवि??उ?इव्?द्?न्?? भवो यस्य्?? निजेच्छय्? | पुन? प्रल्?यते यस्य्?? नित्य्? स्? परिक्?र्तित्? || परम्?त्म?अब्द्?र्थ? परम?च्?सौ ?त्म्? चेति परम्?त्म्?, उत्क्???अ ?त्म्? इत्यर्थ? | उत्क्???अत्व? च स्वेच्छय्? ब्रह्मवि??उ?इव्?दि?अर्?र्???मुत्प्?दकत्वम् | अथव्? तत्तदिन्द्रियरहितोऽपि तत्तदिन्द्रियजन्यप्रत्यक्???रय? | तथ्? च ?रुति? (?वेत्?० ३/१९) ? अप्??इप्?दो जवनो ग्?ह्?त्? प?यत्यचक्?उ? स ???ओत्यकर्?अ? | स वेत्ति वि?व? नहि तस्य वेत्त्? तम्?हुर्?द्य? पुरु?अ? मह्?न्तम् || इति | नित्यज्�?नक्?त्य्??रय? परम्?त्म्? | स च ल्?घव्?द् एक एव | स च जन्यज्�?नप्रक्?त्य्??रयो ज्?व्?त्म्?, स च्?नन्त?, मनु?यप?उपक्?य्?दिभेद्?त् | तथ्? ?इववि??उदुर्ग्?द्?न्?? ?अर्?रभेद्?द् परम्?त्म्? न्?न्? एव्?स्तु इति व्?च्यम्, घ??द्युप्?धिभेदेन्?क्??अस्य न्?न्?त्वभ्रमवत् मनु?यप?उपक्?य्?दि?अर्?रभेदेन्?त्मनो भिन्नत्वभ्रम्?त् सु?उप्तिप्रलय्?दौ ?अर्?रन्??ए ?त्मन एकत्वदर्?अन्?त्, तथ्? भक्त्?नुग्रह्?य ग्?ह्?त?अर्?र्???? ?इव्?दिदैवत्?न्?? न्?न्?त्वेन तत्र न्?न्?त्वभ्रम्?त् | नहि भ्रम्?द् वस्तुसिद्धिरिति | अथ उल्ल्?सवि?अयनिर्?अय? प्रतिप्?द्यम्?ह ? उल्ल्?से प्रथमे वक्?ये ?अर्?र? कर्मसम्भवम् | द्?क्?? द्वित्?ये वक्?य्?मि त्?त्?ये योगनिर्?अयम् || प्र्?त?क्?त्य? चतुर्थे तु ?सन? प�चमे तथ्? | अन्तर्य्?गविधि? ?अ??हे नित्यप्?ज्? च सप्तमे ||
SKवसौ म्?ल्?विध्?न? तु नवमे जपलक्?अ?अम् | मह्?सेतु? च सेतु? च कुल्लुक्?? द?अमे तथ्? || मुखस्य ?ओधन? रुद्रे द्व्?द?ए च पुरस्क्रिय्?म् | स?स्क्?र? यन्त्रर्?जस्य बलिद्?न? त्रयोद?ए || फल? चतुर्द?ए चैव उपच्?र्?दिद्?नजम् | न्?मस्मर?अप्?ज्?दिफल? प�चद?ए तथ्? || कलौ स?सर्गदो??दि प्र्?य?चित्त? तु ?ओ?अ?ए | कु??अ? सप्तद?ए चैव होम? च्????द?ए तत? || तत? सर्वम?गल्?दिन्?म्न्?मर्थो निर्?पित? | दुर्ग्?देव्य्??च म्?ह्?त्म्य? वि?ए?ए?अ प्रदर्?इतम् | गुरुप्?दरजो ध्य्?त्व्? क्?त उल्ल्?सनिर्?अय? || ?अर्?रोत्पत्तिक्रम? ज्�?नभ्??ये देव्युव्?च- ?अर्?र? क्?द्??अ? न्?थ मुक्तिर्व्? केन कर्म?? | इद्?न्?? ?रोतुमिच्छ्?मि ब्र्?हि मे ?अ?इ?एखर || ??वर उव्?च ???उ देवि प्रवक्?य्?मि ?अर्?र? कर्मसम्भवम् | रजस्वल्? यद्? न्?र्? वि?उद्ध्? प�चमे दिने || प्??इत्? क्?मब्??एन तत? पुरु?अम्?हते | भगलि?गसम्?योग्?न्मैथुन? स्य्?त्तय्? तयो? || अन्योन्यस्पर्?अन्?द् देवि ! ज्?यते च महत्सुखम् | क्?अरते च तथ्? रेत? प्र्???प्?न्?दिस??रितम् || क्?इतिर्?पस्तथ्? तेजो व्?युर्?क्??अमेव च | सर्वे??? तत्त्व? प्र्?दु? स्य्?द् देहस्थरक्तब्?जयो? || न्?भिरन्ध्रे तद्? देवि ! भ्र्?म्यते च सम्?र?ऐ? | कुम्भक्?रो यथ्? चक्रे घ?अते च घ??दिकम् || तथ्? सम्?र?ओ गर्भे घ?अते प्र्??इन्?? तनुम् | कलल? चैकर्?त्रे?अ बुद्बुद? प�चमे दिने || ?ओ?इत? द?अर्?त्रे?अ म्??सपि??अ? चतुर्द?ए | म्?सैकेऽपि च सम्प्?र्?ए म्??सपि??ओऽ?कुर्?यते || ?दौ स?ज्?यते पि??ओ ब्रह्म्???अ? सद्????कुर? | तस्य मध्ये सुमेरु?च क?क्?लद??अर्?पि?अ? || चर्?चर्???? सर्वे??? देव्?द्?न्?? वि?ए?अत? | ?लय? सर्वभ्?त्?न्?? मेरोरभ्यन्तरेऽपि च || प्रद्?पकलिक्?क्?रो ज्?वो ह्?दि सद्? स्थितम् | रज्जुबद्धो यथ्? ?येनो गतोऽप्य्?क्??यते पुन? || प्र्??अबद्धस्तथ्? ज्?व? प्र्???प्?नेन क्??यते | ज्?वस्य परमे??नि परिव्?रग?अ? ???उ || अक्?इ?? न्?सिके कर्?औ जिह्व्? च कमल्?नने | हस्तौ प्?दौ महे??नि ! गुह्योपस्थौ क्रम्?त् प्रिये ||
SKन्?भि?च परमे??नि ! मन?च परमे?वरि | ज्?ग्रत्स्वप्नसु?उप्त्य्?ख्य्??चेति देहे स?स्थित्?? || इन्द्रिय्???? च सर्वे??? मन? प्रमस्?रथि? | प्?पै? पु?यैर्महे??नि बद्ध? स्य्?द्?त्मन? प्रिये || स्?गत्य्? सदसत्कर्म ज्?व? सर्व? करोति हि | वि?उद्धस्?त्त्विको ज्?व? सदसत्कर्मवर्जित? || मनस्? ज्?वस?योग्?त् सत्क्?र्य? कुरुते सद्? | म्?सद्वये तु सम्प्?र्?ए मेदस्तत्र प्रज्?यते || मज्ज्?स्थ्?नि त्रिभिर्म्?सै? के??स्त्वक् च चतु??अये | कर्??क्?इन्?सिक्? वक्त्र? क??होदर? च प�चमे || रक्त्?दुत्पद्यते ?उक्र? ?उक्र्?द् बिन्दुसमुद्भव? | प्र्??अतो व्?युरुत्पन्न? क्?ल्?ग्नि? स्य्?दप्?नत? || ?उक्रतो न्??इकोत्पत्ति? ?उक्र्?दग्नि? समुद्भव? | म्??सत?च मलोत्पत्तिर्मज्ज्? च्?पि ततो भवेत् || व्?युन्? प्र्??अनि?पत्तिरप्?न्?दग्निसम्भव? | ?उक्रे?ओत्प्?दित्? जिह्व्? न्?सिक्? सर्वदेहिन्?म् || रक्त्?दुत्पद्यते नेत्र? व्?म? चैव तु दक्?इ?अम् | प्र्???दुत्पद्यते ??न्य? प्र्??अरन्ध्रद्वय? तथ्? || ?अ??हे मुख? तथ्? प्?दौ सर्व्??ग्?नि च सप्तमे | सन्धि? स्?म्प्?र्?अत्?? य्?ति अ??अमे म्?सि वै तत? || अ???ध्?रस्तु क?क्?ल ?रभ्य गुदम्?लत? | द्व्?त्रि?अज्ज्�?नविज्�एय ग्रन्थिको वर्द्धत? सद्? | तस्य मध्ये सद्? सर्व्? न्??यस्तत्र व्यवस्थित्?? || ?अर्?स्थन्???निर्?अय? इ?? च पि?गल्? चैव सु?उम्न्? च त्?त्?यिक्? | ग्?न्ध्?र्? हस्तिजिह्व्? च प्??? चैव य?अस्विन्? || अलम्बु?? कुहु?चैव ?अ?खिन्? द?अम्? तथ्? | अन्य्??च न्??इक्?? क्?उद्र्?? सहस्र्???? द्विसप्तति? || इ?? च व्?मभ्?गे तु दक्?इ?ए पि?गल्? तथ्? | ब्रह्मरन्ध्रे सु?उम्न्? च ग्?न्ध्?र्? व्?मचक्?उ?इ || दक्?इ?ए हस्तिजिह्व्? च प्??? कर्?एऽथ दक्?इ?ए | व्?मे य?अस्विन्? चैव मुखे च्?लम्बु?? तथ्? || कुहु?च लि?गम्?ले च ?अ?खिन्? ?इरसोपरि | एव? द्व्?र? सम्?व्?त्य ति??हन्ति द?अन्??इक्?? || क्?इति?च व्?रितेज?च व्?युर्?क्??अमेव च | स्थैर्य? गत्? इमे प�च ब्?ह्य्?भ्यन्तर एव च | भ्?तगु??? अस्थि चर्म तथ्? न्??? लोमम्??सस्तथैव च | एते प�चगु??? प्रोक्त्?? प्?थिव्य्?? च व्यवस्थित्?? ||
SKमलम्?त्र? तथ्? ?उक्र? ?ले?म्? ?ओ?इतमेव च | एते प�चगु??? प्रोक्त्? ?पस्तत्र व्यवस्थित्?? || क्?उध्? त्???? तथ्? निद्र्? प्रमोह? क्??न्तिरेव च | एते प�चगु??? प्रोक्त्?स्तेजस्तत्र व्यवस्थितम् || विरोध्?क्?एप??कु�चध्?र?अ? तर्प?अ? तथ्? | एते प�चगु??? प्रोक्त्?? म्?रुते च व्यवस्थित्?? || र्?गो द्वे?अ?च मोह?च भय? लज्ज्? तथैव च | एते प�चगु??? प्रोक्त्? ?क्??ए च व्यवस्थित्?? || ?अर्?रस्थव्?युनिर्?अय? प्र्???प्?नसम्?न?चोद्?नव्य्?नौ च व्?यव? | न्?ग? क्?र्मोऽथ्? क्?करो देवदत्तो धन�जय? || एते द?अगु??? प्रोक्त्?? सर्वे प्र्??असम्?त्मक्?? | ह्?दि प्र्??ओ वसेन्नित्यमप्?नो गुदम??अले || सम्?नो न्?भिदे?ए च उद्?न? क??हदे?अत? | व्य्?न? सर्व?अर्?रे तु प्रध्?न्?? प�चव्?यव? || नग? क्?र्मोऽथ क्?करो देवदत्तो धन�जय? | एते न्???सहस्रे?उ वर्तन्ते ज्?वर्?पि?अ? || ?अर्?रको?अवर्?अनम् | ब्रह्म्???ए ये गु??? सन्ति ते ति??हन्ति कलेवरे | प्?त्?ल? भ्?धर्? लोक्? ?दित्य्?दि नवग्रह्?? || (भ्?र्?दि सप्तस्वर्ग्??च न्?म्??च सर्वदेहिन्?म्) | पि??अमध्ये स्थित्?? सर्वे स्थ्?न? ते??? वद्?मि ते || ?अर्?रे सप्तप्?त्?लवर्?अनम् प्?द्?धस्त्वतल? विद्य्?त्तद्?र्ध्व? वितल? तथ्? | ज्?नुनो? सुतल? चैव तल? च सन्धिरन्ध्रके | तल्?तल? गुद(ल्फ)मध्ये लि?गम्?ले रस्?तलम् | प्?त्?ल? क?इसन्धौ च प्?द्?दौ लक्?अयेद् बुध? || ?अर्?रे भ्?र्?दिलोककथनम् भ्?र्लोको न्?भिदे?ए तु भुवर्लोकस्तथ्? ह्?दि | स्वर्लोक? क??हदे?ए तु महर्लोक?च चक्?उ?इ || जनलोकस्तद्?र्ध्व�च तपोलोको लल्??अके | सत्यलोको मह्?योनौ भुवन्?नि चतुर्द?ए || ?अर्?रे सप्त्?चलवनर्?अनम् त्रिको?ए च स्थितो मेर्?र्ध्वलोके च मन्दर? | कैल्?सो दक्?इ?ए को?ए व्?मको?ए हिम्?लय? | विन्ध्यो वि??उस्तद्?र्ध्वे च सप्तैते कुलपर्वत्?? || ?अर्?रस्थ सप्तद्व्?पवर्?अनम् अस्थि स्थ्?ने महे??नि ! जम्ब्?द्व्?पो व्यवस्थित? | म्??से?उ च कु?अद्व्?प? क्रौ�चद्व्?प? ?इर्?सु च ||
SK??कद्व्?प? स्थितोरक्ते प्र्??इ??? सर्वसन्धि?उ | तद्?र्ध्व? ??ल्मलिद्व्?प? प्लक्?अ?च लोमस�चये | न्?भौ च पु?करद्व्?प? स्?गरस्तदनन्तरम् || ?अर्?रस्थसप्तस्?गरवर्?अनम् लव?ओदस्तथ्? म्?त्रे ?उक्रे क्??रोदस्?गर? | मज्ज्? दधिसमुद्र?च तद्?र्ध्व? घ्?तस्?गर? || रसोदके रस? प्रोक्त इति पुस्तक्?न्तरे प्??ह? | वस्?प? स्?गर? प्रोक्त इक्?उ? स्य्?त् क?इ?ओ?इतम् | ?ओ?इते?उ सुर्?सिन्धु? कथित्?? सप्तस्?गर्?? || ?अर्?रस्थग्रहम??अलम् ग्रह्???? म??अलम् चैव ???उ वक्?य्?मि प्?र्वति ! | न्?दचक्रे स्थित? स्?र्यो बिन्दुचक्रे च चन्द्र्म्?? || लोचने म?गल? प्रोक्तो ह्?दि सोमसुतस्तथ्? | उदरे च गुरु?चैव ?उक्रे ?उक्रस्तथैव च || न्?भिचक्रे स्थितो मन्दो मुखे र्?हु? स्थित? सद्? | प्?दे न्?भौ च केतु?च ?अर्?रे ग्रहम्??अलम् || गर्भस्थज्?वस्य प्?र्वजन्मस्मर?अम् नवमे म्?सि गर्भस्थ? सर्व्?न् स?स्मरते मन? | नवद्व्?रे पुरे देहि समय्???च विक्?रक्?न् || सुख? दु?ख? सम? क्?त्व्? भुक्त? च ह्?दये न्???म् | सुक्?त? दु?क्?त? चैव यत्क्?त? प्?र्वजन्मनि || तत्सर्व? सफल? ज्�?त्व्? ?र्ध्वप्?दस्त्वधोमुख? | गर्भस्तु स?प्रवि???ऽसौ स्तिमिते घोरदर्?अने || यदि म्?त्? सुख? भु?क्ते अन्नप्?न्?दिक? तत? | जनन्य्? न्?भिदे?ए तु मुख? दत्त्व्? पिवत्यसौ || ततो ज्?वति गर्भेऽसौ अन्यथ्? मर?अ? भवेत् | अभ्यस्य्?मि ?इव? ज्�?न? स्??स्?र्?र्?अवत्?र?अम् || (देवद्विजगुर्???? हि प्?जन? ?अ?कय्?न्वितम्) | करि?य्?मि यथ्? भ्?ग्य? सत्य? सत्य? न स??अय? || चिरयोग्? ततो भ्?त्व्? मुक्तो य्?स्य्?मि तत्पदम् | एव? गर्भस्थितो ज्?वो गर्भय्?तनय्?र्दित? | नित्य? भ्?वयते चित्ते लब्धचैतन्यलक्?अ?अ? | एतस्मिन्नन्तरे देवि वि?वे??? गर्भस?क?ए || नवमे द?अमे म्?सि प्रबलै? स्?तिम्?रुतै? | नि?स्?र्यते ब्??अ इव जन्तु?छिद्रे?अ सज्वर? | पतितोऽपि न ज्?न्?ति म्?र्च्छितोऽपि तत?च्युत? || स्?तिव्?तस्य वेगेन योनिरन्ध्रस्य प्??अन्?त् | विस्म्?त? सकल? ज्�?न? गर्भे यच्चिन्तित? ह्?दि ||
SKयथ्? भवति तत्त्वे?उ स्?तिभ्?ते?उ प्??अन्?त् | म्?तर? स्मरते नित्य? बुभुक्?? द्??हवेदनम् || स्त्र्?-पुरु??दि भेदक्?र?अम् रक्त्?धिक्? भवेन्न्?रो भवेच्छुक्र्?धिक? पुम्?न् | नपु?सक? ततो ज्?त? स्?म्ये च रजब्?जयो? || प�चैत्?न्यपि स्?ज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिन? | ?यु? कर्म च वित्त? च विद्य्? निधनमेव च || ज्?व्?वस्थ्?कथनम् ब्?ल? ?इ?उ?च पोग??अ? कि?ओरकस्तथैव च | अत? पर? तु युवक? प्रौ?ह?चैव तत? परम् || अतिप्रौ?हस्तथ्? व्?द्ध?च्?तिव्?द्धस्तत? परम् | पलित? मर?अ? चैव अवस्थ्?? परिक्?र्तित्?? || तत्क्?अ??देव ग्?ह्??ति ?अर्?रम्?तिव्?हिकम् | केवल? तन्मनु?य्???? न्?न्ये??? प्र्??इन्?? क्वचित् || प्रेतदेहमिति प्रोक्त? क्रम्?देव न स??अय? | तत? सपि???कर?ए ब्?न्धवै? सत्क्?ते नरै? || प्?र्?अस?वत्सरे देहमतोऽन्य? सम्प्रपद्यते | तत? स नरके य्?ति स्वर्गे व्? स्वेन कर्म?? || तत्क्?अ??त् म्?त्युक्?अ??दिति | ज्?व्?न्?? कर्मफलप्रक्?र? देवत्वमथ म्?नु?य? प?उत्व? पक्?इत्?? तथ्? | क्?मित्व? स्थ्?वरत्व? च य्?ति जन्तु? स्वकर्मभि? || स्थ्?वर्? ज?गम्?द्य्??च पक्?इ?अ? प?अवो नर्?? | ज्?यन्ते व्? म्रियन्ते व्? स?स्?रे दु?खस्?गरे || कर्म?? ज्?यते जन्तु? कर्म?ऐव प्रल्?यते | देहे विन??ए तत्कर्म पुनर्देह? प्रपद्यते || तथ्? धेनुसहस्रे?उ वत्सो विन्दति म्?तरम् | तथ्? ?उभ्??उभ? कर्म कर्त्?रमनुगच्छति || प्र्?क्तन? बलवत्कर्म कोऽन्यथ्? तत्करि?यति | देह? कर्म्?त्मक? प्रोक्तस्तत्तद् देवि ! प्रति??हितम् || कर्मयोग्?नुर्?पे?अ निर्म्??अ? विधिर्?दि?एत् | चर्?चरमिद? देवि ! सर्व? कर्म्?त्मक? प्रिये || म्?त्? कर्म पित्? कर्म कर्मैव परमो गुरु? | स्वर्ग? व्? नरक? व्?पि कर्म?ऐव लभेन्नर? || सुखदु?खमयै? स्व्?यै? पु?यप्?पैर्नियन्त्रित? | तत्तज्ज्?तियुत? देह? सम्भोग? च स्वकर्मजम् || मनु?यजन्मोत्कर्?अकथनम् अत्र जन्मसहस्रैस्तु सहस्रैरपि प्?र्वति ! | कद्?चिल्लभते जन्तुर्म्?नु?य? पु?यस�चय्?त् ||
SKनिद्र्? च मैथुन्?ह्?र्?? सर्वे??? प्र्??इन्?? सम्?? | ज्�?नव्?न्म्?नव? प्रोक्तो ज्�?नह्?न? प?उ? प्रिये || सम्पद? स्वप्नस?क्??? यौवन? कुसुमोपमम् | त?इद्वत् परम्?यु?च यस्य ज्�?नवतो ध्?ति? || चतुर??तिलक्?ए?उ ?अर्?रे?उ ?अर्?रिभि? | न म्?नु?य? विन्?न्यत्र तत्त्वज्�?न? तु लभ्यते || ब्रह्मवि??उमहे??दिदेवत्?भ्?तज्?तय? | न्??अमेव्?नुध्?वन्ति तस्म्?च्छ्रेय? सम्?चरेत् || मोहप्रभ्?व? स्वदेहधनद्?र्?दिनिरत्?? सर्वजन्तव? | ज्?यन्ते च म्रियन्ते च ह्? हत्?ऽज्�?नमोहित्?? || प्रभव? सर्वदु?ख्?न्?म्??रय? सकल्?पद्?म् | ?लय? सर्वप्?प्?न्?? स?स्?र? वर्जयेत् प्रिये || प्रतिक्?अ?अमय? क्?य? क्??यम्??ओ न लक्?यते | ?मकुम्भ इव्?म्भस्थो वि??र्?? नैव भ्?व्यते || अपत्य? मे कलत्र? मे धन? मे ब्?न्धव्??च मे | लपन्तमिति मर्त्त्य? तमत्ति क्?लव्?को बल्?त् || प्?थिव्? दह्यते येन मेरु?च्?पि विद्?र्यते | ?ओ?यते स्?गरजल? ?अर्?रे?वपि क्? कथ्? || मोहस्य स?स्?रक्?र?अत्वकथनम् लोहप्??अमयै? प्??ऐर्नरो बद्धोऽपि मुच्यते | स्त्र्?धन्?दि?उ स?सक्तो मुच्यते न कद्?चन || असक्?द् देहकर्म्??इ सुखदु?ख्?नि भु�जते | परत्र्?ऽज्�?निनो देवि ! य्?न्त्य्?य्?न्ति पुन? पुन? || अरज्जुबन्धन? स?गो दु??अस?गो मह्?वि?अ? | सत्स?ग?च विवेक?च निर्मल? नयनद्वयम् | यस्य न्?स्ति नर? सोऽन्ध? कथ? न स्य्?दम्?र्गग? || मोक्?अक्?र?अम् द्वे पदे मोक्?अबन्ध्?य निर्ममेति ममेति च | ममेति बध्यते जन्तुर्निममेति च मुच्यते || ममेत्यध्य्?सन्?द् बन्धो विमुक्तिर्निर्ममेति च | म्??सलुब्धो यथ्? मत्स्यो लौह?अ?कु? न प?यति || सुखलुब्धस्तथ्? देह्? यमब्?ध्?? न प?यति | क्?त्व्? प्?पविनिर्भिन्न? सिक्त? वि?अयसर्पि?? || र्?गद्वे??नलै? पक्व? म्?त्युर?न्?ति म्?नवम् | स्वदेहमपि ज्?वोऽय? त्यक्त्व्? य्?ति कुले?वरि || स्त्र्?म्?त्?धनपुत्र्?दिसम्बन्ध? केन हेतुन्? | स?स्?रस्य दु?खर्?पत्ववर्?अनम् ?अत? ज्?वनमत्यल्प? निद्र्? तस्य्?र्धह्?रि?? | ब्?ल्यरोगजर्?दु?खैरर्द्ध तदपि नि?फलम् ||
SKदु?खम्?लो हि स?स्?र? स यस्य्?स्ति स दु?खित? | तस्य त्य्?ग? क्?तो येन स सुख्? न्?पर? प्रिये || प्रभ्?ते मलम्?त्र्?भ्य्?? मध्य्?ह्ने क्?उत्पिप्?सय्? | र्?त्रौ मदननिद्र्?भ्य्?? ब्?ध्यन्ते म्?नव्?? सद्? || दिव्यौ?अध? न सेवन्ते मह्?व्य्?धिविन्??अनम् | तद् व्य्?धिर्वद्धन्?पथ्य? कुर्वन्ति बहु?ओ जन्?? || सुकर्मफलद? हित्व्? दु?कर्म्??इ करोति य? | क्?मधेनु? सम्?क्रम्य ह्यर्कक्??र? स म्?र्गति? || अनित्य्?नि ?अर्?र्??इ विभवो नैव ???वत? | नित्य? सन्निहितो म्?त्यु? कर्तव्यो धर्मस�चय? || अध्रुवे?अ ?अर्?रे?अ प्रतिक्?अ?अविन्??इन्? | यो ध्रुव? न्?र्जयेद् धर्म स मर्त्यो म्??हचेतन? || न्?मुत्र हि सह्?य्?र्थ? पित्? म्?त्? च गच्छति | न्?पि पुत्रो न व्? ज्?ति धर्मस्ति??हति केवलम् || पुत्रद्?रमयै? प्??ऐ? पुम्?न् बद्धो न मुच्यते | प??इते चैव म्?र्खे च बलिन्यप्यथ दुर्बले || ??वरे च दरिद्रे च म्?त्यो? सर्वत्र तुल्यत्? | र्?जत? सलिल्?दग्ने?चौरत? स्वजन्?दपि || भयमर्थवत्?? नित्य? म्?त्यो? प्?पभ्?त्?मिव | ?व?क्?र्यमद्य कुर्व्?त प्?र्व्?ह्?ए च्?पर्?ह्?इकम् || नहि प्रत्?क्?अते म्?त्यु? क्?तमस्य न व्? क्?तम् | कर्म?? मनस्? व्?च्? य? स कर्मनिरत? सद्? || अफल्?क्??क्?इ चित्तो य? स मोक्?अमधिगच्छति | अफल्?क्??क्?इ स्वक्?यभोगजनक्??क्??रहितमित्यर्थ? | अहो मोहस्य म्?ह्?त्म्य? तन्म्?य्?जनितस्य च | किमन्यमपि देवे?इ मोहयेदमर्?नपि || इति य्?मलवचन्?त् | म्?र्क??एये ? मह्?म्?य्? हरे?चैतत्तय्? सम्मोह्यते जगत् | तय्? मह्?म्?यय्? जगत् स?स्?र? मोह्यते | न केवल? जगत् सम्मोह्यते, देव्?न्?मपि चेत्??सि | ज्�?निन्?मपि चेत्??सि देव्? भगवत्? हि स्? || बल्?द्?क्??य मोह्?य मह्?म्?य्? प्रयच्छति | ज्�?निन्?मिति प्र?अ?स्?य्?मिन्, नित्यज्�?निन्?मित्यर्थ? || मह्?म्?य्??अब्द्?र्थ? महत्? च्?सौ म्?य्? चेति मह्?म्?य्?, ब्रह्मवि??उ?इव्?द्?न्? मोहजनकत्व्?त् मह्?म्?य्? | तथ्? चोक्त? य्?मले ? सैव म्?य्? प्रक्?तिर्य्? सम्मोहयति ?अ?करम् | हरि? तथ्? विर�चि च तथैव्?न्य्???च निर्जर्?न् || क्?लिक्?पुर्??ए (६, ६१-६३) ?
SKगर्भ्?न्तर्ज्�?नसम्पन्न? प्रेरित? स्?तिम्?रुतै? | उत्पन्न? ज्�?नरहित? कुरुते य्? निरन्तरम् || प्?र्व्?तिप्?र्वस?स्क्?रसम्मोह? स?नियोज्य च | ?ह्?र्?दौ ततो मोह? ममत्व? ज्�?नस??अयम् || क्रोधोपरोधन्?दि?उ क्?इप्त्व्? क्?इप्त्व्? पुन? पुनह् | प?च्?त् क्?मे नियोज्य्??उ चिन्त्?युक्तमहर्न्नि?अम् || मह्?म्?य्?भेद? स्? मह्?म्?य्? द्विविध्?-विद्य्?ऽविद्य्? च | य्? मह्?म्?य्? मुक्तेर्हेतुभ्?त्? स्? विद्य्? | य्? मह्?म्?य्? स?स्?रबन्धनहेतुभ्?त्? स्?ऽविद्य्? | म्?र्क??एये ? स्? विद्य्? परम्?मुक्तेर्हेतुभ्?त्? सन्?तन्? | स?स्?रबन्धहेतु?च सैव सर्वे?वरे?वर्? || अन्यत्र्?पि ? विद्य्? व्?प्यथव्?ऽविद्य्? द्वे एते म्?यय्?व्?ते | तत्कर्म यच्च बन्ध्?य स्?ऽविद्य्? परिक्?र्तित्? || यन्न बन्ध्?य तत्कर्म स्? विद्य्? परिक्?र्तित्? || विद्य्? तु सर्वद्? सेव्य्? न्?प्यविद्य्? कथ�चन | अविद्य्? कर्मबन्ध? स्य्?द् तय्? ज्�?न? प्र?अ?यति || ज्�?नन्???द् भवेद्ध्?निर्ह्?न्?त् स?सर?अ? पुन? | स?स्?र्?त्तु भवेद् घोर्?द् घोर? नरकमेव च | तस्म्?दविद्य्? कुत्र्?पि न सेव्य्?पि कद्?चन || विद्य्?प्र?अ?स्? य्? विद्य्? स्? मह्?म्?य्? स्? तु सेव्य्? सद्? बुधै? | ऽअन्ध? तम? प्रवि?अन्ति येऽविद्य्?मुप्?सतेऽ (??अ. ९) इति ?रुते? | अन्यत्र्?पि स?स्?रैकनियतिर्?प्?ऽविद्य्? इति | रुद्रय्?मले ? सुखद्? मोक्?अद्? नित्य्? सर्वभ्?ते?उ स?स्थित्? | यद्? तु??? भवेन्म्?य्? तद्? सिद्धिमुप्?लभेत् || बन्दन्?य्? सद्? स्तुत्य्? प्?जन्?य्? च सर्वद्? | ?रोतव्य्? क्?र्त्तितव्य्? च म्?य्? नित्य्? नग्?त्मज्? || व्?थ्? न क्?ल? गमयेद् द्य्?तक्र्???दिन्? सुध्?? | गमयेद् देवत्?प्?ज्?जपय्?गस्तव्?दिन्? || किमन्यैरसद्?ल्?पैर्यद्?युर्व्ययत्?मिय्?त् | तस्म्?न्मन्त्र्?दिक? सर्व? विज्�?य ?र्?गुरोर्मुख्?त् | सुखेन मुच्यते देवि घोरस?स्?रबन्धन्?त् || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्यपरमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? ?अर्?रनिर्?अयो न्?म प्रथमोल्ल्?स? || द्वित्?योल्ल्?स? ??वर उव्?च ? द्?क्??म्?ह्?त्म्यम् ???उ देवि प्रवक्?य्?मि यन्म्?? त्व? परिप्?च्छसि | विन्? द्?क्??? न मोक्?अ? स्य्?त् प्र्??इन्?? ?इव??सने ||
SKन योगेन विन्? यन्त्रो न मन्त्रे?अ विन्? हि स? | द्वयोरभ्य्?सयोग?च ब्रह्मस?सिद्धिक्?रक? || तम? परिव्?ते गेहे घ?ओ द्?पेन द्??यते | एव? म्?य्?व्?तो ह्य्?त्म्? मनुन्? गोचर्?क्?त? || सम्प्र्?प्ते ?ओ?अ?ए वर्?ए द्?क्??? कुर्य्?त् सम्?हित? | रसैर्मन्त्रैर्यथ्? विद्घमय? सुवर्?अत्?? व्रजेत् || द्?क्??विद्धस्तथ्? ह्य्?त्म्? ?इवत्व? लभते ध्रुवम् | इति कुल्?र्?अव्?त् | मन्त्रमुक्त्?वल्य्?म् ? जपो देव्?र्चनविधि? क्?र्यो द्?क्??न्वितैर्नरै? || न्?स्ति प्?प? यतस्ते??? स्?तक? च यत्?त्मन्?म् | रुद्रय्?मले ? ?गमोक्तविध्?नेन कलौ देव्?न् यजेत् सुध्?? || नहि देव्?? प्रस्?दन्ति कलौ च्?न्यविध्?नत? || ?गमलक्?अ?अम् ?गम?अब्दव्युत्पत्तिम्?ह रुद्रय्?मले ? ?गत? ?इववक्त्रेभ्यो गत?च गिरिज्?मुखे | मत? ?र्?व्?सुदेवस्य तस्म्?द्?गम उच्यते || वक्त्रेभ्य इति बहुवचन? प�च्?म्न्?यल्?भ्?र्थम् | तथ्? च कुल्?र्?अवे ? मम प�चमुखेभ्य?च प�च्?म्न्?य्?? समुद्गत्?? | प्?र्वप?चिममत?चैव दक्?इ?ओत्तरतस्तथ्? | ?र्ध्व? नयत्यध?स?स्थम्?र्ध्व्?म्न्?य इत्?रित? || य्?वन्त? प्???अवो भ्?मेस्त्?वन्त? समुद्?रित्?? | एकैक्?म्न्?यज्? मन्त्र्? भुक्तिमुक्तिफलप्रद्?? || सर्वे??मेव मन्त्र्???? देवत्? तत्फलप्रद्? | इति वचनेभ्यो व्?सुदेवस्य मत? सम्मत इत्यर्थ? | तेन वेद्?विरुद्धत्व्?ल्ल्?भ्?न्न्?गमव्युद्?स? | सद्?गम एव्?गम?अब्दस्य मुख्यत्व्?त् | अत एव्?गस्त्यस?हित्?य्?मसद्?गमस्य निन्द्?म्?ह ?इव? ? कलौ प्र्?ये?अ देवे?इ ! र्?जस्?स्त्?मस्?स्तथ्? || नि?इद्ध्?चर??? सन्तो मोहयन्त्यपर्?न् बह्?न् | ?व्?भ्य्?? पि?इत? रक्त? सुर्?? चैव सुरे?वरि || वर्???रमोचित? धर्ममविच्?र्य्?र्पयन्ति ये | भ्?तप्रेतपि??च्?स्ते भवन्ति ब्रह्मर्?क्?अस्?? || इति वचन्?त् ?र्?क्रमेऽपि ? न दद्य्?द् ब्र्?ह्म?ओ मद्य? मह्?देव्यै कथ�(द्?)चन | ब्र्?ह्म?ओ व्?मक्?मोऽपि मद्य? म्?स? न भक्?अयेत् || देव्य्??च प?चिमे भ्?गे चक्रप्?र्?वे निवेदयेत् | तत्तद्द्रव्य? तु ??द्रस्य न्?न्ये??? च कद्?चन ||
SKवै?यस्य म्?क्?इक? ?उद्ध? क्?अत्रियस्य तु स्?ज्यकम् | ब्र्?ह्म?अ?च गव्?? क्??र? त्?म्रे व्? विस्?जेन्मधु || न्?रिकेलोदक? क्??स्ये सर्वे??? द्रव्य?ओधनम् || इति || अन्यत्र्?पि ? गोक्??र? ब्र्?ह्म?ओ दद्य्?द् गव्यम्?ज्य? च ब्?हुज? | वै?यै?च म्?क्?इक? देय? ??द्र? पै??य्?दिक? चरेत् | पै??य्?दिकमित्यत्र पौ???दिकमिति प्??हो द्??यते, तथ्?त्वे ??द्रस्य्?प्यनुकल्प? | तथ्? च प्?र्वत्र ? न्?रिकेलोदक? क्??स्ये सर्वे??? द्रव्य?ओधनम् | इत्युक्ते? || देव्य्??च प?चिमे भ्?गे चक्रप्?र्?वे निवेदयेत् | तत्तद्द्रव्य? तु ??द्रस्य न्?न्ये??? तु कद्?चन || इति वचन्?त् तथ्? च्?न्यत्र बहु?उ तन्त्रवचने?उ ??द्रस्य मुख्यद्रव्य्?दिद्?नस्य विहितत्व्?त् परस्पर विरोधे विकल्प्??रय?अम्, अतस्ते??? (??द्र्????) सुर्?द्?नस्य ऐच्छिकत्वम्?य्?तम् | न केवल? द्रव्य्?भ्?व एव ??द्रस्य्?नुकल्पो विध्?यते | अपितु द्रव्य्?दिसत्त्वेऽपि स्वेच्छय्? ??द्रोऽनुकल्पेन्?पि प्?ज्?? कर्तुमर्हत्?ति सर्वमनवद्यमिति || तथ्? गुरु?? द्?क्?इत? ?इव?अक्तिभ्य्?? प्रोक्तमन्त्रयोगसम्??रये?अ स्?धक? क्?त्?र्थो भवत्येव | तथ्? च्?गमस्?रे ? ?इवेन परय्? ?अक्त्य्? द्व्?भ्य्?? क्?त्स्न? समुद्ध्?तम् | व्?च्यव्?चकभ्?वेन द्व्?भ्य्?? ब्रह्म प्रक्??इतम् || इति द्?क्???अब्द्?र्थ? द्?क्???अब्द्?र्थम्?ह य्?मले ? द्?प्तज्�?न? तु य्? दद्य्?त् कुर्य्?त् प्?पक्?अय? तथ्? | तेन द्?क्?एति लोकेऽस्मिन् क्?र्तित? तन्त्रप्?रगै? || अद्?क्?इत्?र्चननिन्द्? उपच्?रसहस्रैस्तु प्?जित्? भक्तिस?युतै? | अद्?क्?इत्?र्चन? देव्? न ग्?ह्?अन्ति कद्?चन || तस्य कर्म्?खिल? व्यर्थ? तस्म्?दद्?क्?इत? प?उ? | मन्त्रग्रह?अनियम? क्रिय्?स्?रे ? कल्पे द्???व्? तु यो मन्त्र? जपेद् गुरुमन्??रित? || सुतन्??ओ भवेत्तस्य फल कि�चिन्न विद्यते | य्?मले ? गुरोर्मुख्?न्मह्?विद्य्?? ग्?ह्??य्?त् प्?पन्??इन्?म् || तस्म्?द्यत्न्?द् गुरु? क्?त्व्? मन्त्रस्?धनम्?चरेत् || गुरु?अब्द्?र्थ? गुरु?अब्द्?र्थम्?ह य्?मले ? गुक्?र? सिद्धिद? प्रोक्तो रेफ? प्?पस्य द्?हक? | उक्?र? ?अम्भुरित्युक्तस्त्रितय्?त्म्? गुरु? स्म्?त? || गुरुलक्?अ?अम् स्?रस?ग्रहे ?
SKवि?उद्धम्?त्?पित्?को जितेन्द्रिय? सर्व्?गमज्�अ? परदु?खक्?तर? | यथ्?र्थव्?ग्वेदविद?गप्?रग? ??न्त? कुल्?नो गुरुर्?रितो द्विज? || ब्र्?ह्म?अगुरुकर?अविधि? द्विज इत्युप्?द्?न्?द् ब्र्?ह्म?एभ्यो मन्त्रग्रह?अम् | तन्त्रे ? सद्?च्?रो द्विजो यस्तु वर्??न्?? गुरुरेव स? | अन्यत्र्?पि ? स्वधर्मनिरतो भ्?त्व्? क्?त्व्? द्विजगुरोर्मुख्?त् | सर्वसिद्धिमव्?प्नोति ??घ्र? देवत्वम्?प्नुय्?त् || ??द्र? ??द्रमुख्?च्छ्रुत्व्? विद्य्?? व्? मन्त्रमेव व्? | ग्?ह्?त्व्? नरक? य्?ति दु?खम्?प्नोति नि?चितम् || द्?क्??फलम् नवरत्ने?वरे ? सर्वे??मेव द्?क्????? मुक्ति? फलख??इतम् | अवि?ए??द् भवत्ये?? प्र्?स?गिक्?स्तु भुक्तय? || य्?मले ? द्?क्?इतो ब्र्?ह्म?ओ य्?ति ब्रह्मलोकमन्?मयम् | ऐन्द्रलोक? क्?अत्रियस्तु प्र्?ज्?पत्य? तथ्? वि?अ? || य्?ति गन्धर्वनगर? ??द्रो द्?क्??प्रभ्?वत? || ??द्रद्?क्??विच्?र? अत्र ??द्रद्?क्??धिक्?र ?रुते? न ??द्र्?य मनु? दद्य्?त् इति वचन? वेदमन्त्रपर? देवत्?वि?ए?अपर? मन्त्रवि?ए?अपर? च | व्?र्?ह्?तन्त्रे ? गोप्?लस्य मनुर्देयो महे?अस्य्?पि प्?दजे | तत्पत्न्य्??च्?पि स्?र्यस्य ग?ए?अस्य मनुस्तथ्? | ए?अ द्?क्??धिक्?र्? स्य्?दन्यथ्? प्?पभ्?ग् भवेत् || इति वचन्?त् देवत्?न्तरस्य मन्त्रे ??द्र्?न्?मधिक्?र? | न्?सि?हत्?पन्?ये ?रुति? ? स्?वित्र्?? प्र?अव? यजुर्लक्?म्?? स्त्र्???द्र्?य नेच्छन्ति इति | स्?वित्र्?? लक्?म्?? यजु? प्र?अव? यदि ज्?न्?य्?त् स्त्र्???द्र? स म्?तोऽधो गच्छति (१.३) इति च | लक्?म्?? ?र्?ब्?ज? लक्?म्?मन्त्रमित्यपि क?चित् | गोप्?लस्य द??क्?अर?, ?य्?म्?य्? द्व्?वि??अत्यक्?अर?च मन्त्र? स्व्?ह्?गर्भोऽपि ??द्र्?य देय?, सर्व?उ वर्?ए?उ तथ्??रमे?उ (१.४) इति क्रमद्?पिक्?य्?? अभिध्?न्?त् | न्?त्र सिध्यपेक्??स्ति न च्?ऽमित्र्?दिद्??अ?अम् | न च्?ऽधिक्?रचिन्त्?ऽत्र ग्रह?ए क्?लिक्?मनो? || इति क्?ल्?कुलसर्वस्ववचन्?च्च | तस्म्?द् गोप्?लद??क्?अर?य्?म्?द्व्?वि??अत्यक्?अरमन्त्रग्रह?ए ??द्रस्य्?धिक्?र? | ननु स्व्?ह्?-प्र?अवस?युक्त? ??द्रे मन्त्र? ददद् द्विज? | ??द्रो निरयग्?म्? स्य्?द् ब्र्?ह्म?ओ य्?त्यधोगतिम् ||
SKइति देव्?य्?मलवचन्?त् स्व्?ह्? प्र?अव्?न्वितमन्त्रे?उ ??द्रस्य्?नधिक्?रप्रत्?ते? प्र?अव्?न्वित-गोप्?लमन्त्रे स्व्?ह्?गर्भित- द्व्?वि??अत्यक्?अर ?य्?म्?मन्त्रे च कथ? तस्य्?धिक्?र इति चेन्न | तन्त्रोक्त? प्र?अव? देवि ! वह्निज्?य्?? च सुन्दरि | प्रजपेत् सतत? ??द्रो न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? || इति भ्?त?उद्धिवचनेन तन्त्रोक्त-प्र?अव-वह्निज्?य्?यो? ??द्रोच्च्?र्यत्?-प्रतिप्?दन्?त् तदेकव्?क्यतय्? तन्त्रोक्त स्व्?ह्?प्र?अव्?न्विते?वेव मन्त्रे?उ तस्य्?धिक्?रकल्पन्?त् | एव? यत्र यत्र स्व्?ह्? प्र?अव्?ल्??हे मन्त्रे ??द्रस्य्?धिक्?रोक्ति द्??यते, तत्र न स्वर्?पत?, अपितु वह्निज्?य्?दिस्थले म्?य्?ब्?ज्?दिप्रक्?एपे?अ | तथ्? चोक्तम् ? ?र्?वि??ओ? को?इमन्त्रे च को?इमन्त्रे ?इवस्य च | ??द्र्???मधिक्?रोऽस्ति स्व्?ह्?-प्र?अववर्जिते || वह्निज्?य्?स्थले म्?य्?? दत्त्व्? ??द्रो जपेद्यदि | जप्?त् सिद्ध्??वरो भ्?त्व्? पर? ब्रह्म्?धिगच्छति || तस्म्?त् तन्त्रोक्त-प्र?अव्?द्यन्विते?वेव गोप्?ल्?दिमन्त्रे?उ ??द्र्???मधिक्?र इति सर्वमवद्?तम् | स्त्र्?गुरोर्द्?क्??ग्रह?अफलम् स्त्रियो द्?क्?? ?उभ्? प्रोक्त्? म्?तु?च्???अगु?? स्म्?त्? | स्वप्नलब्ध्? च य्? द्?क्?? तत्र न्?स्ति विच्?र?? || स्त्रिय इति पद? न सर्वस्त्र्?परम् | विधव्?य्? न गुरुत्वम् | तदुक्त? तत्त्वस्?रे ? स्?ध्व्? चैव सद्?च्?र्? गुरुभक्त्? जितेन्द्रिय्? | सर्वतन्त्र्?र्थस्?रज्�? सधव्? प्?जनेरत्? | गुरुयोग्य्? भवेत्स्? हि विधव्?? परिवर्जयेत् || यत्तु ? विधव्?य्?? सुत्?दे??त् कन्य्?य्?? पितुर्?ज्�अय्? | न्?धिक्?रो विन्? न्?र्य्? भ्?र्य्?य्? भर्तुर्?ज्�अय्? || इति विध्?व्?य्? गुरुत्वबोधक? वचनम्, तदम्?लम् | सम्?लत्वेऽपि ? सिद्धमन्त्रो नर? सर्वमयोग्य? योग्यत्?? नयेत् | इति वचनैकव्?क्यतय्? स्?धितमन्त्रवि?अयम् | मन्त्रोद्ध्?र? गुरुद्?क्??तन्त्रे ? म्?तमप्यनुगच्छेत्तु विद्य्?मन्त्रो वि?ए?अत? | मन एव मनु?यस्य प्?र्वकर्म्??इ ?अ?सति || यदि न स्य्?न्महे??नि मनु?यत्व? कथ? भवेत् | द्?क्??य्?? च कथ? तस्य मनो भवति प्?र्वति || तस्म्?त्तु यत्नतो देवि प्?र्वविद्य्?? समुद्धरेत् | मन्त्रलिखननियम? गुरुद्?क्??तन्त्रे ?
SKबकुल्??वत्थव?अक? पत्ररत्न? ???उ प्रिये ! | व?अपत्रे महे??नि ?अक्तिमन्त्र? लिखेत् प्रिये || अ?वत्थे वि??उमन्त्र? च बकुले ?इवमन्त्रकम् | रक्तगन्धेन देवे?इ क्??म्?रैर्व्? महे?वरि || ?अक्तिमन्त्र? लिखेत् देवि चन्दनैर्वि??उमन्त्रकम् | भस्मन्? ?इवमन्त्र? च विलिखेत् परमे?वरि || विलिखेदिति सप्तसप्त?उ पत्रे?उ तत्तद्देवत्?य्?? मन्त्र? लिखेदित्यर्थ? | प्र्??अप्रति??ह्?? तन्मन्त्रे क्?रयेद्यत्नत? सुध्?? | तत्तद् देवत्?य्?? प्र्??अप्रति??ह्?? कुर्य्?दित्यर्थ? | यथ्??अक्त्युपच्?रे?अ सम्प्?ज्य परमे?वरि || तत? ?इ?य?च्?र्घ्यप्?त्र? हस्ते क्?त्व्? महे?वरि | अनेन मनुन्? मन्त्र्? भ्?स्कर्?य निवेदयेत् || अर्घ्यद्रव्यम् अर्घ्यद्रव्यम्?ह ? ?प? क्??र? कु??ग्र्??इ घ्?त? दधि तथ्? मधु | रक्त्?नि करव्?र्??इ तथ्? रक्त? च चन्दनम् || अ????ग? ए?अकोऽर्घ्यो वै भ्?नवे परिक्?र्तित? | ग्?न्धर्वे ? न दद्य्?द् भ्?स्कर्?य्?र्घ्य? ?अ?खतोयैर्महे?वरि | अर्घ्यद्?नमन्त्र? ओ? भो देव प्?थिव्?प्?ल सर्व?अक्तिसमन्वित | मम्?र्घ्य? च ग्?ह्??अ त्व प्?र्वविद्य्?? प्रक्??अय || अर्घ्य? दत्त्व्? नमस्क्?त्य क्?त्?�जलि? प?हेत्तत? | ओ? स्?र्य? सोमो यम? क्?लो मह्?भ्?त्?नि प�च वै | एते ?उभ्??उभस्येह कर्म?ओ नव स्?क्?इ?अ? || सर्वे देव्? ?अर्?रस्थ्? मम मन्त्रस्य स्?क्?इ?अ? | प्?र्वजन्म्?र्जित? विद्य्?? मम हस्ते प्रद्?पय || ??क्तिक्?द्?क्?? प?हित्वेद? महे??नि सत्त्वर? पत्रमुद्धरेत् | उद्ध्?त्य पत्रमेक? तु गुरोर्हस्ते प्रद्?पयेत् || गुरुस्तु अक्?अर?रे??मध्?त्य परमे?वरि | सेतु? दत्त्व्? महे??नि तन्मन्त्र्???अ?अत? जपेत् || ?इ?यस्य मस्तके हस्त? दत्त्व्? च्???अ?अत? जपेत् | (अन्यत्र-गुरुस्तु प्र्??मुखो भ्?त्व्? ?इ?य? प्रत्य?मुखस्थित? |) त्रिव्?र? दक्?इ?ए कर्?ए व्?मकर्?ए तथ्? सक्?त् | स्त्र्???द्रवि?अये कुर्य्?द् वैपर्?त्येन चिन्तनम् || एतच्च वि??व्?दिवि?अयम् | ?अक्तौ च ? ?चम्य स?यतो भ्?त्व्? प्र्???य्?म? विध्?य च | अ??ओत्तर?अत? जप्त्व्? ??य्?दिकसमन्वितम् | अ??अक्?त्व्? वदेन्मन्त्र? व्?मकर्?ए सुरे?वरि ||
SKइय? द्?क्?? सर्वतन्त्रे ??क्तिक्? परिक्?र्तित्? | गुरोर्लब्ध्व्? मह्?विद्य्?? अ??ओत्तर?अत? जपेत् || गुरवे दक्?इ??? दद्य्?द् वित्त???ह्य? न क्?रयेत् | गुरवे गुरुपुत्र्?य तत्पत्न्यै व्? प्रद्?पयेत् || कुल्?र्?अवे ? ?र्?गुरौ प्र्?तिम्?पन्ने देवत्?प्र्?तिम्?प्नुय्?त् | देवे च प्र्?तिम्?पन्ने मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् || पत्ररत्नप्रद्?नेन द्?क्??? कुर्य्?त् कलौ युगे | तत? सिद्धो भवेन्मन्त्र्? न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? || एतज्ज्�?न? विन्? देवि द्?क्??? कुर्य्?च्च यो नर? | द्?क्?? तु विफल्? तस्य च्?न्ते हि नरक? व्रजेत् || तत? ?इ?यो महे??नि प्र?अमेद् द??अवद् भुवि | त्वत् प्रस्?द्?दह देव क्?तक्?त्योऽस्मि सर्वत? | म्?य्?म्?त्युमह्?प्???द् विमुक्तोऽस्मि ?इवोऽस्मि च || एवम्?भ्??य देवे?इ ! ?र्?गुरो?चर??न्तिके | पतितस्तन्मन्?? ?इ?यस्ति??हेद् भ्?मौ तु व्?ग्यत? || अनुज्�?? ?र्?गुरोर्य्?वन्न लभेतोत्थितु? प्रिये ! | उत्थ्?पयेद् गुरु? ?इ?य? मन्त्रमेत? समुच्चरन् || उत्ति??ह वत्स ! मुक्तोऽसि सम्यग्?च्?रव्?न् भव | क्?र्ति? ?र्?? क्?न्तिमेध्?युर्बल्?रोग्य? सद्?स्तु ते || योगिन्?ह्?दये ? मन्त्र? दत्त्व्? चोपव्?स? गुरुर्नैव सम्?चरेत् | मह्?न्धक्?रनरके क्?मिर्भवति च्?न्यथ्? || द्?क्??? लब्ध्व्? यद्? मन्त्र्? चोपव्?स? सम्?चरेत् | तस्य देव? सद्? रु??अ? ??प? दत्त्व्? व्रजेत् पुरम् || उपदे?अद्?क्?? तत्वस्?रे ? चन्द्रस्?र्यग्रहे त्?र्थे सिद्धक्?एत्रे ?इव्?लये | मन्त्रम्?त्रप्रकथनमुपदे?अ? स उच्यते || रुद्रय्?मले ? ?य्?म्?य्?? भैरव्? त्?र्?च्छिन्नमस्त्?सु भैरवे | मज्जुघो?ए तथ्? रौद्रे प�च्??ग? ने?यते बुधै? || तत्र्?पि गुह्यक्?ल्?वि?अये प�च्?यतन्?द्?क्??ऽस्त्येव | यथ्? वि?वस्?रे ? भ्?पुरे?उ चतु?को?ए प्?जयेत् क्रम?अ? सुध्?? | वि??उ? ?इव? ग?ए?अ? च स्?र्य? ?अक्ति? यथ्?क्रम्?त् | प्?जयेच्च महे??नि प्रध्?न? मध्यतो न्यसन् || द्?क्??य्?? चक्र्?दिविच्?रस्य्?न्?व?यकत्वम् || य? कुर्य्?च्चक्रग?अन्?? द्?क्??य्?? प?उप्?मर? | स भ्र??अ? स च प्?पि??हो वि??ह्?य्?? ज्?यते क्?मि? ||
SKकि? ??ऐ? कि? धनैर्व्?पि र्??य्?दिकविच्?र?ऐ? | सिद्धस्?ध्यसुसिद्ध्?रिविच्?र? परिवर्जयेत् || न्?स्ति सत्य? महे??नि नक्?अत्र्य्?दिविच्?र?? | र्??य्?दिग?अन्? न्?स्ति ?अ?करे?एति भ्??इतम् || ?गमकल्पद्रुमे ? रविस?क्रम?ए चैव स्?र्यस्य ग्रह?ए तथ्? | तत्र लग्न्?दिक? कि�चिन्न विच्?र्य? कथ�चन || य्?मले ? ?अरत्क्?ले युग्?द्य्?य्?? ग्रह?ए चन्द्रस्?र्ययो? | बोधने चैव दुर्ग्?य्?? क्?ल्?क्?ल? न ?ओधयेत् || क्?लवि?ए?अ-मन्त्रवि?ए?अग्रह?अनियम? मत्स्यस्?क्ते ? ग्रह?ए च मह्?त्?र्थे न्?स्ति क्?लस्य निर्?अय? | सोमग्रहे वि??उमन्त्र? स्?र्ये ?अक्ति? न च्?चरेत् || य्?मले ? स्?र्यग्रहे ?अक्तिमन्त्र? न प्रदद्य्?ज्जिज्?वि?उ? | न ग्?ह्??य्?दपि तथ्? यद्?च्छेद्?त्मनो हितम् || तत्र वि?ए?अविधि? अत्र ?अक्तिपद? प�चम्?परम्, प्रकर??दित्युदयकर? | अत एव ? ?र्?क्?मक्?ल्?ब्?ज्?नि लोप्?दौर्ग?च यो मनु? | स्?र्यस्योपग्रहे लब्धो न्???? ??घ्रफलप्रद? || इति य्?मलवचनमपि स?गच्छते | पर्??र्?क्?मब्?ज्?न्?ति कुलम्?ल्?वत्?रे प्??ह? | प्?र्ववचने ?अक्तिमन्त्रपद? ?र्?ब्?ज्?द्यतिरिक्तमन्त्रपरमिति तु ?इवद्?क्????क्?क्?त? | य्?मले ? लग्ने व्?प्यथव्?ऽलग्ने यत्र कुत्र तिथ्?वपि | गुरोर्?ज्�?नुर्?पे?अ द्?क्?? क्?र्य्? वि?ए?अत? || न तिथिर्न व्रत? प्?ज्? न स्न्?न? न जपक्रिय्? | द्?क्??य्?? क्?र?अ? कि�चित् स्वेच्छ्?प्र्?प्ते च सद्गुरौ? || सर्वे व्?र्?? ग्रह्?? सर्वे नक्?अत्र्??इ च र्??अय? | यस्मिन्नहनि सन्तु??ओ गुरु? सर्वे ?उभ्?वह्?? | यदैवेच्छ्? तद्? द्?क्?? गुरोर्?ज्�?नुस्?रत? || मन्त्र्???? द?अस?स्क्?रम् अथ द?अस?स्क्?रम्?ह ??रद्?य्?म् (२.११२) ? जनन? ज्?वन? प?च्?त्त्??अन? बोधन? तथ्? | अथ्?भि?एको विमल्?कर??प्य्?यने पुन? || तर्प?अ? द्?पन? गुप्तिर्द?ऐत्? मन्त्रस?स्क्रिय्?? | मन्त्र्???? म्?त्?क्?मध्य्?दुद्ध्?रो जनन? स्म्?तम् || म्?त्?क्?वर्??स्तु अक्?र्?दिक्?अक्?र्?न्त्?? | म्?त्?क्?वर्??स्तु अक्?र्?दिक्?अक्?र्?न्त्? म्?त्?क्?र्??? प्रक्?र्तित्?? इति तन्त्रगन्धर्ववचन्?त् | म्?त्?क्?यन्त्रलेखनम्?ह ?
SKभ्?मौ गोमयलिप्त्?य्?? विलिख्य्?ऽ??अदल्?न्वितम् | चन्दन्?द्यै? क?हिन्य्? व्? त्?र्त्त्?य? कर्?इक्?गतम् || द्विर्द्वि? स्वर्?न् के?अरे?उ वर्ग्?न??अदले?उ च | त्?र्त्त्?ये हसौ? ? क्?दिम्?न्त्?? प�चवर्ग्? म्?त्?क्?? क्रम?ओदित्?? | य्?दिव्?न्त्?? ??दिह्?न्त्? लक्?अ?ए विलिखेत्तत? || इति म्?त्?क्?यन्त्रम् | तस्म्?च्च गन्धप?केन भ्?र्ज्?दौमन्त्रमुद्धरेत् | प्र?अव्?न्तरित्?न् क्?त्व्? मन्त्रवर्??न् जपेत् सुध्?? | एतज्ज्?वनमित्य्?हुमन्त्रतन्त्रवि??रद्?? || द?अध्? ?अतध्? व्? जप? | यथ्? वि?वस्?रे ? प्?थक् ?अत? व्? द?अध्? मन्त्रवर्??न् जपेत् सुध्?? | मन्त्रवर्??न् सम्?लिख्य त्??अयेच्चन्दन्?म्भस्? || प्रत्येक? व्?युन्? मन्त्र्? त्??अन? तदुद्?ह्?तम् | तन्त्र्?न्तरे ? त्??अन? त्??अयेद् वर्??नखिल्???चन्दन्?म्भस्? | ?अत? व्? द?अध्? व्?पि बोधयेत्तु मनु? तत? | विलिख्य मन्त्र? तन्मन्त्र्? प्रस्?नै? करव्?रजै? | तन्मन्त्र्?क्?अरस?ख्य्?तैर्हन्य्?द् य्?न्तेन बोधनम् || य्?न्तेन रमिति ब्?जेन | स्वतन्त्रोक्तविध्?नेन मन्त्र्? मन्त्र्?र्?अस?ख्यय्? | अ?वत्थपल्लवैर्मन्त्रमभि?इ�चेद् वि?उद्धये || तन्त्र्?न्तरे ? मन्त्रस्य च्?मुक? वर्?अमभि?इ�च्?मि ह्?द्युतम् | अभि?इ�चेद??अध्? व्? प्रत्येकमभि?एचनम् | कु?ओदकेन दुग्धेन्?ऽभि?एचनमुद्?ह्?तम् || इति | स्?�चिन्त्य मनस्? मन्त्र? ज्योतिर्मन्त्रे?अ निर्दहेत् | मन्त्रे मलत्रय? मन्त्र्? विमल्?कर?अ? त्विदम् | त्?र? व्योम्?ग्निमनुयुक् द??? ज्योतिर्मनुर्मत? || मनु?चतुर्द?अस्वरो द??? अनुस्व्?र? | तेन ओ? ह्रौ? इति | कु?ओदकेन जप्तेन प्रत्यर्?अ प्रोक्?अ?अ? मनो? | तेन मन्त्रे?अ विधिवदेतद्?प्य्?पन? मतम् || अन्यत्र ? अमुकमन्त्र? तर्पय्?मि नम इत्यम्भस्? च तम् | मधुन्? ?अक्तिमन्त्रे वै??अवे चेन्दुमज्जलै? || ?ऐवे घ्?तेन दुग्धेन तर्प?अ? समुद्?रितम् | द?अध्? तर्पयेत्त्?वदिति तर्प?अम् | त्?रम्?य्?रम्?योगे मनोर्द्?पनमुच्यते | ?अतम??ओत्तर? चैव द्?पयेत् स्?धकोत्तम? || इति | तन्त्र्?न्तरे सप्तध्? द्?पनमिति | जप्यम्?नस्य मन्त्रस्य गोपन? त्वप्रक्??अनम् || इति मन्त्र्???? द?अस?स्क्?र्?? |
SKइ??अदेवस्य नित्यप्?ज्यत्वकथनम् वि?वस्?रे ? ग्रह्?त्व्? च मह्?विद्य्?? जपेज्ज्?व्?वधि प्रिये | मह्?गुरुनिप्?त्?दौ न प्?ज्?य्?? विकल्पन्? || मोह्?द्व्? यदि व्? दैव्?त् प्?जयेन्न च स्?धक? | तस्य सर्वविन्??अ? स्य्?न्म्?रयेत्त? सद्??इव? || अ?उचौ व्? ?उचौ व्?पि सर्वदे?एऽपि सर्वद्? | प्?जयेत् परय्? भक्त्य्? न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? || रुद्रय्?मले ? प्?जयेन्म्?तके व्?ऽपि जनने सरुजोऽपि व्? | सर्वत्रै?अ विधि? प्रोक्त? सर्वक्?मफलप्रद? || स्?तकिन? प्?ज्?विधि? अथ स्?तकिन? प्?ज्?? वक्?य्?म्य्?गमचोदित्?म् | स्न्?त्व्? नित्य? च निर्वर्त्य म्?नस्य्? क्रियय्? तु वै | ब्?ह्यप्?ज्?क्रमे?ऐव ध्य्?नयोगेन प्?जयेत् || देव्?वि?अये ब्?ह्यप्?ज्? कर्तव्य्? वि?ए?अविध्?न्?त् | तथ्? चोक्त? व्?र्?ह्?तन्त्रे ? त्?र्?य्??चैव क्?ल्य्??च त्रिपुर्?य्??च सुव्रते | स्?तके म्?तके चैव न त्यजेयुर्जप्?र्चनम् || य्?मले ? अ?उचिर्व्? ?उचिर्व्?पि गच्छ?स्ति??हन् स्वपन्नपि | न दो?ओ म्?नसे ज्?प्ये सर्वदे?एऽपि सर्वद्? || वि?वस्?रे ? ज्?ग्रत्?अय्?न उत्ति??हन् गच्छन् भु�ज्?न एव व्? | सिद्धमन्त्रे न दो?अ? स्य्?द?औचेऽपि जपेत् सद्? | न कल्पन्? दिव्? र्?त्रौ न च सन्ध्य्?वस्?नके || अथ गुरुम्?ह्?त्म्यम् गुरु? सर्वसुर्?ध्??ओ गुरु? स्?क्?? क्?त्?क्?ते | सम्प्?ज्य सकल? कर्म कुर्य्?त्तस्य्?ज्�अय्? सद्? || गमन? प्?जन? ज्?प? भोजन? मनन? तथ्? | ग्?ह्?त्व्?ज्�?? गुरो? कुर्य्?त्तस्य सिद्धिर्विन्? जप्?त् || तन्त्रे ? त्रिसन्ध्य? ?र्?गुरोर्ध्य्?न? त्रिसन्ध्य? प्?जन? गुरो? | त्रिसन्ध्य? भ्?वेयेन्नित्य? गुरु? परमक्?र?अम् || स्वगुरु? हि विन्? देवि ! न्?न्य? च गुरुमर्चयेत् | प्रत्यक्?ओ व्? परोक्?ओ व्? प्रत्यह? प्र?अमेद् गुरुम् || एकग्र्?मे स्थितो नित्य? त्रिसन्ध्य? प्र?अमेद् गुरुम् | क्रो?अम्?त्र? स्थितो भक्त्य्? गुरु? प्रतिदिन? नमेत् || अर्द्धयोजनत? ?इ?य? प्र?अमेत् प�चपर्वसु | एकयोजनम्?रभ्य योजनद्व्?द??वधि? || तत्तत्स?ख्य्?गतैर्म्?सै? प्र?अमेत् ?र्?गुरु? प्रिये | यदि द्?रे च च्?र्व?गि ?र्?गुरुर्नगनदिनि | स?वत्सरस्य मध्ये तु द्विव्?र? प्?जयेद् गुरुम् ||
SKद्विव्?रमिति एकधोत्तर्?य?ए एकध्? दक्?इ??यने इत्यर्थ? | एव? यो न्?चरेद् देवि ! स भवेद् ब्रह्मर्?क्?अस? | एकत्र गुरु?? स्?र्द्ध? स्वपित्युपवि?एच्च य? || स य्?ति नरक? घोर? य्?वदिन्द्र्??चतुर्द?अ? | तन्त्रे ? गुरुम्?लोकयन् ?इ?य उत्ति??हन्न्?सन? त्यजेत् || ज्?तिविद्य्?धन्??ह्योऽपि द्?रे द्???व्? गुरु? मुद्? | प्र?अमेद् द??अवद् भ्?मौ प्रदक्?इ?अमथ्?चरेत् || ?य्?न्तमग्रतो गच्छेद् गच्छन्त? तमनुव्रजेत् | प्र?अम्य प्रवसेत् प्?र्?वे तद्? गच्छेदनुज्�अय्? || मुख्?वलोक्? सेवेत् कुर्य्?द्?ज्�?दिम्?दर्?त् | असत्य? न वदेदग्रे न बहुप्रलपेदपि || ??अद्?न? तथ्?द्?न? वस्त्?न्?? क्रयविक्रयम् | न कुर्य्?द् गुरु?? स्?र्द्ध? ?इ?यो भ्?त्व्? कथ�चन || गुरुर्म्?त्? पित्? स्व्?म्? ब्?न्धव्??च सुह्?द् गुरु? | इत्य्?ध्?य मनो नित्य? यजेत् सर्व्?त्म्? गुरुम् || गुरोरग्रे प्?थक् प्?ज्?मौद्धत्य? च विवर्जयेत् | द्?क्??? व्य्?ख्य्?? प्रभुत्व? च गुरोरग्रे परित्यजेत् || ?सन? ?अयन? वस्त्र? भ्??अ?अ? प्?दुक्?? तथ्? | छ्?य्?? कलत्रमन्यद् व्? यद् द्???अ? तत् सुप्?जयेत् || यथ्? देवे मन्त्रे यथ्? मन्त्रे तथ्? गुरौ | यथ्? गुरौ तथ्? स्व्?त्मन्येव? भक्तिक्रम? स्म्?त? || गुरु?अय्य्?सन? य्?न? प्?दुकोप्?नहौ तथ्? | स्न्?नोदक? तथ्?छ्?य्?? ल?घयेन्न कद्?चन || अन्यत्र्?पि ? देवच्छ्?य्?? गुरुच्छ्?य्?? ?अक्तिच्छ्?य्?? न ल?घयेत् | प्रम्?दतोऽपि चेद् देवि ! गुरोरग्रे प्रप्?जयेत् || स य्?ति नरक? घोर? स्? प्?ज्? नि?फल्? भवेत् | रिक्तहस्तेन नोपेय्?द् र्?ज्?न? देवत्?? गुरुम् || फलपु?प्?न् वर्?दनि यथ्??अक्त्य्? समर्पयेत् | भक्त्य्? ?अक्त्यनुस्?रे?अ गुरुमुद्दि?य यत्क्?तम् || स्वल्प? व्? बहुल? तुल्य? फलम्??ह्यदरिद्रयो? | गुर्वर्थे क्?प?ओ देवि ! रौरव? नरक? व्रजेत् || गुरुव्?क्य? म्??? क्?त्व्? ?त्मव्?क्य? तु स्थ्?पयेत् | गुरु? जेतुमन्? य? स? पच्यते नरक्?र्?अवे || गुरोर्न्?म न भ्??एत जपक्?ल्?द्?ते क्वचित् | ब्र्?ह्म??? क्?अत्रिय्? वै?य्?? ??द्र्??च नगनन्दिनि ||
SKभु�जते विबुध्? भक्त्य्? गुरोरुच्छि??अमुत्तमम् | ?गच्छेद् यदि च्?र्व?गि ! गुरु? ?इ?यस्य मन्दिरे || ?इ?यस्य मन्दिर? देवि को?इस्?र्यग्रहै? समम् | चन्द्रग्रह?अक्?लो हि तद्दिन? वरवर्?इनि || गुरोर्दर्?अनम्?त्रे?अ सर्वप्?पै? प्रमुच्यते | गुरु? व्? गुरुपुत्र? व्? पत्न्?? व्? वरवर्?इनि || विल?घ्य यदि च्?र्व?गि गच्छेत् स्?धकसत्तम? | तत्क्?अ??च्च�चल्?प्??गि नरक? चोत्तरोत्तरम् || उत्तरकल्पे ? स्?क्??द्व्?पि परोक्?ए व्? गुरोर्?ज्�?? सम्?चरेत् | (परोक्?ए तदनुज्�?न? विध्?न? ???उ ?अ?करि) || प्?ज्?क्?ले च च्?र्व?गि ?गच्छेच्छि?यमन्दिरम् | गुरुर्व्? तत्सुतो व्?ऽपि तत्पत्न्? व्? महे?वर्? || तद्? प्?ज्?? परित्यज्य प्?जयेत् स्वगुरु? प्रिये | यद्यल्प? हि गुरोर्द्रव्यमदत्त? स्व्?करोत्यपि || तिर?च्?? योनिम्?गच्छेत् क्रव्य्?दैर्भक्?यते सद्? | सहस्र्?रे गुरो? प्?दपद्म? ध्य्?त्व्? प्रप्?ज्य च || स्तुत्व्? करपु?अ? क्?त्व्? मनस्? ध्य्?नतत्पर? | विहित? विदधे न्?थ ! विधेय? यत्क्?प्?? कुरु || अविरुद्ध? भवत्वत्र तत्त्वद्?यप्रस्?दत? | इति मन्त्रे?अ सम्प्र्?र्थ्य तद्?दि??अ? सम्?चरेत् || महि?अमर्दिन्?तन्त्रे ? ?र्?देव्युव्?च देवदेव मह्?देव क्?पय्? परमे?वर | गुरुप्?ज्?विध्?न? मे विस्तर्?द् वद ?अ?कर ! || ??वर उव्?च दिव्य? व्?र? च च्?र्व?गि प्?र्वोक्त? बहु?अ? प्रिये | म्?नवस्य क्रम? देवि स?क्?एप्?न्निगद्?मि ते || गुरु? परगुरु?चैव पर्?परगुरुस्तथ्? | स्वगुरु? परमे??नि स्?क्??द् ब्रह्म न स??अय? || तद् गुरु? स्य्?त् परगुरु? स्वय? वि??उ? क्?इतौ सद्? | पर्?परगुरुस्तस्य गुरु? स्?क्??त्महे?वर? | गुरुर्ब्रह्म्? गुरुर्वि??उर्गुरुर्देवो महे?वर? | अत-एव महे??नि स्?क्??द् ब्रह्ममयो गुरु? || अख??अम??अल्?क्?र? सर्वव्य्?पिनम्??वरम् | सर्वे?अ? सर्वद? देव? प्र?अम्?मि पुन? पुन? || पुरस्त्?त् प्?र्?वयो? प्???हे नमस्तुभ्य? नमोनम? | त्रिसन्ध्य? ?र्?गुरोर्ध्य्?न? त्रिसन्ध्य? प्?जन? गुरो? || त्रिसन्ध्य? भ्?वयेन्नित्य? गुरु? परमक्?र?अम् | गुरु? विन्? वर्?रोहे ! न्?स्ति सिद्धि? कद्?चन ||
SKगुरु? स्म्?त्व्? महे??नि दिवसे दिवसे प्रिये | प्?जयेद् म्?नसैर्गन्धैर्ध्?पैर्द्?पैस्तथोत्तमै? || भक्?यैर्भोज्यैस्तथ्? पेयैर्दधिदुग्धैरनेकध्? | पनसैर्न्?रिकेलै?च तथ्? रम्भ्?फलै? प्रिये || अन्नैर्न्?न्?विधैर्देवि प्?जयेत् स्वगुरु? प्रिये | स्वगुरु? हि विन्? देवि न्?न्य? च गुरुमर्चयेत् || (मत्स्यैर्म्??सैर्महे??नि प्?जयेद् भक्तित? प्रिये |) गन्धैर्म्?ल्यै?च च्?र्व?गि प्?जयेद् भक्तित? सद्? || स्वर्?ऐ?च प??अवस्त्रै?च तथ्? क्?र्प्?ससम्भवै? | अविचित्रैर्विचित्रै?च अतिस्?क्?मैर्मनोहरै? || ?सनैर्विविधैर्देवि रक्तकम्बलस?युतै? | तथ्? न्?न्?विधैर्द्रव्यै? प्?जयेत् स्वगुरु? सद्? || अल?क्?रैस्तथ्? देवि विविधै? स्वर्?अनिर्मितै? | र्?जतै?चैव च्?र्व?गि स्वगुरु? प्?जयेत् सद्? || गुरोर्मन्त्र? महे??नि प्रजयेत् सुरवन्दिते | गुरो? पत्न्?? महे??नि प्?जयेद् विधिन्?ऽमुन्? || गुरुवद् गुरुपुत्रे?उ गुरुवत् तत्सुत्?दि?उ | प्रत्यह? प्?जन? क्?र्य? च्?मुन्? विधिन्? प्रिये || गुरोरभ्?वे च्?र्व?गि गुरुपत्न्?? च प्?जयेत् | तदभ्?वे वर्?रोहे गुरुकन्य्?? च प्?जयेत् || तदभ्?वे महे??नि गुरुस्नु??? प्रप्?जयेत् | ए??मभ्?वे च्?र्व?गि गुरोर्गोत्र? प्रप्?जयेत् || गोत्र्?भ्?वे वर्?रोहे तथ्? म्?त्?मह? गुरो? | म्?तुल? म्?तुल्?न्?? व्? प्?जयेद् विधिन्?ऽमुन्? || यदि नो प्?जयेद् देवि अनेन विधिन्? प्रिये | प्र्?य?चित्त्? भवेद् देवि तत्क्?अ??त् स च स्?धक? || स?वत्सरस्य मध्ये तु न गच्छेत् यदि स्?धक? | मन्दिर? गुरुदेवस्य सद्? क्???पुर्?समम् || क्??? सम? महे??नि य? प?येद् गुरुमन्दिरम् | ?इवतुल्यो भवेद् देवि तत्क्?अ??त् स च स्?धक? || गुरोर्गेह? सम्?स्?द्य उच्छि??अभक्?अ?अ? चरेत् | तदैव सहस्? सिद्धि? स्?धकस्य भवेत् प्रिये || अभुक्त्व्? गुरुदेवस्य चोच्छि??अ? वरवर्?इनि | विद्य्?? व्? परमे??नि मन्त्र? व्? नगनन्दिनि || न जपेत्तु कद्?चित्तु कुत्रचित् क्वचिदेव हि | तन्मुख? च�चल्?प्??गि वि??ह्?क्?पसम? प्रिये ||
SKउच्छि??अभक्?अ??द् देवि मुखस्य ?ओधन? प्रिये | ब्र्?ह्म??? क्?अत्रियो वै?य्?? ??द्र्??च नगनन्दिनि || भु�जते विविध? भक्त्य्? गुरोरुच्छि??अमुत्तमम् | गुरोरुच्छि??अमन्न? च सद्?नन्दमय? प्रिये || गुरु? व्? गुरुपुत्र? व्? पत्न्?? व्? वरवर्?इनि | विल?घ्य यदि च्?र्व?गि गच्छेत् स्?धकसत्तम? || तत्क्?अ??च्च�चल्?प्??गि नरक? चोत्तरोत्तरम् | मन्दिर? गुरुदेवस्य कु??र? यदि प्?र्वति | कैल्??असद्???क्?र? तदेव नगनन्दिनि || यद् यदि??अतम? लोके स्?धकस्य ?उचिस्मिते | तत्सर्व? गुरवे दद्य्?द् भक्त्य्? परमयत्नत? || तदैव सहस्? देवि मन्त्रसिद्धि? प्रज्?यते | गुरोर्?ज्�?? सम्?द्?य प्रजपेदनि?अ? यदि || तदैव सहस्? सिद्धिर??असिद्ध्??वरो भवेत् | प्?ज्?क्?ले च च्?र्व?गि ?गच्छेच्छि?यमन्दिरम् || गुरुर्व्? गुरुपुत्रो व्? पत्न्? व्? वरवर्?इनि | तद्? प्?ज्?? परित्यज्य प्?जयेत् स्वगुरु? प्रिये || देवत्?प्?जन्?र्थ? च गन्धपु?प्?दिक? प्रिये | तत्सर्व? गुरवे दत्त्व्? प्?जयेन्नगनन्दिनि | तदैव सहस्? देवि देवत्? प्र्?तिम्?प्नुय्?त् || रुद्रय्?मले ? गुरुर्व्? गुरुपत्न्? व्? पुत्रो व्?पि सम्?गत? || ज्ये??हो व्?प्यर्चन्?मध्ये ?इ?य? सर्व्?र्चन्?? त्यजेत् | ?ज्�अय्? प्?जयेच्छि?य इति ??स्त्रस्य निर्?अय? || गन्धै? पु?पैस्तथ्? ध्?पैस्तथ्? नैवेद्यकैरपि | प्?जयेद् विविधैर्भक्त्य्? स्वगुरु? तत्सुत? च व्? || (गुरुदेवो हर? स्?क्??त्तत्पत्न्? हरवल्लभ्? | गुरुपुत्रो ग?ए?अ? स्य्?द्विभ्?व्य प्?जन? चरेत्) || गुरुपत्न्? महे??नि स्?क्??द् देव्?स्वर्?पि?? | ग?ए?असद्??अ? देवि गुरुपुत्र? विभ्?वयेत् || ?इ?यस्य तद्दिन? देवि को?इस्?र्यग्रहै? समम् | चन्द्रग्रह?अक्?ल? हितद्दिन? वरवर्?इनि || गुरोर्दर्?अनम्?त्रे?अ सर्वप्?पै? प्रमुच्यते | तत्क्?अ??�च�चल्?प्??गि द्?न? दद्य्?द्विचक्?अ?अ? || स्वर्?अगोतिलवस्त्र्??? रजतस्य वि?ए?अत? | गुरो? प्र्?ति? समुद्दि?य द्?न? कुर्य्?द् विचक्?अ?अ? || ?र्?गुरौ प्र्?तिम्?पन्ने देवत्?प्र्?तिम्?प्नुय्?त् | प्र्?त्?य्?? देवत्?य्?? तु मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ||
SKगुरो? सम्?पे च्?र्व?गि न मिथ्य्? चोच्चरेत् क्वचित् | गुरोर?गो महे??नि देवत्?क्?रमुत्तमम् || गुरो? क्?प्? महे??नि प्?ज्?म्?ल? महत् पदम् | गुरोर्व्?क्य? मन्त्रम्?ल? पर?ब्रह्म स्वय? गुरु? || अनेन विधिन्? देवि प्रत्यह? भ्?वयेद् गुरुम् | तदैव सहस्? सिद्धिर्ज्?यते कमल्?नने || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? द्?क्??निर्?अयो न्?म द्वित्?योल्ल्?स? || २ || त्?त्?योल्ल्?स? योगनिर्?अय? विन्? चोप्?सन्?? देव्? न दद्?ति फल? न्???म् | तन्त्रे ? ध्य्?त? स्म्?त? प्?जितो व्? तुस्तोव्? नमितोऽपि व्? | ज्�?नतोऽज्�?नतो व्?पि प्?जक्?न्?? विमुक्तिद? || इत्य्?दि?उ प्?ज्?दिक? विन्? चतुर्वर्गफल? न सम्भवत्?ति ज्�?यते | विग्रहस्???इक्?र?अम् निर्गु?अस्य ब्रह्म?अ? केन प्रक्?रे?अ प्?ज्?दिक? क्?र्य?, ?अर्?ररहितत्व्?त् | केन प्रक्?रे?अ व्? तन्मुक्त्य्?दिक? द्?तु? ?अक्यते ? अत एव स्?धक्?न्?? हित्?र्थ्?य सगु?अ-निर्गु?अभेद्?द् ब्रह्म?ओ द्वैविध्यम्?ह ? ?र्?र्?मत्?पन्?य?रुतौ कुल्?र्?अवे च ? चिन्मयस्य्?ऽद्वित्?यस्य नि?फलस्य्?ऽ?अर्?रि?अ? | उप्?सक्?न्?? क्?र्य्?र्थ? ब्रह्म?ओ र्?पकल्पन्? || अस्य्?र्थ? ? चिन्मयस्य ज्�?नमयस्य | म्?र्क??एय पुर्??ए ? चितिर्?पे?अ य्? क्?त्स्नमेतद्व्य्?प्य स्थित्? जगत् | अद्वित्?यस्य एकस्य | तथ्? चोक्त? योगिन्?ह्?दये ? एक? हि परम? ब्रह्म न्?न्?त्वेन निर्?प्यते | स्थ्?ल-स्?क्?मविभेदेन पर? ब्रह्मस्वर्?पि?? || गोप्?लत्?पन्?य?रुतिरपि ? एकमेव पर? ब्रह्म म्?यय्? तु चतु??अयम् || तस्म्?द् ब्रह्मैव पु?र्?पे?अ स्त्र्?र्?पे?अ च म्?ययैव न?अवद् बहुध्? भवति | बहुर्?प इव्?भ्?ति म्?यय्? बहुर्?पय्? इति ?रुते? | नि?कलस्य कल्? म्?य्? तय्? रहितस्य | ?ग्नेयपुर्??ए ? सकलो नि?कलो ज्�एय? सर्वज्�अ? परमो हरि? | देहस्थ? सकलो ज्�एयो नि?कलो देहवर्जित? || हरिरित्युपलक्?अ?अम् | य्?मले ? सगु?? निर्गु?? चेति मह्?म्?य्? द्विध्? मत्? | सगु?? म्?यय्? युक्त्? ह्?न्? तु निर्गु?? || अ?अर्?रि?अ? मुखहस्तप्?द्?द्यवयव्?वच्छिन्न ?अर्?ररहितस्य | भ्?त?उद्धौ ?
SKनि?फल? परम? ब्रह्म कुत? प्र्?ति? कुत? सुखम् | निर्?क्?र? निर्?ह�च रहित? त्विन्द्रिये?अ | जन्मकर्म्??इ सर्व्??इ ब्रह्म?ओ न्?स्ति भ्?मिनि || प्रक्?ते? सन्ति भ्?विन्?ति प्??ह?च | उप्?सक्?न्?? सभक्तिकज्�?नकर्मयोगवत्?मित्यर्थ? | लै?गे ? सर्वे??मेव मर्त्य्?न्?? विभोर्दिव्यवयु? ?उभम् | सकल? भ्?वन्?योग्य? योगिन्?मपि नि?फलम् || योगिन्?? कर्मयोगज्�?नयोग भक्तियोगवत्?मित्यर्थ? | ?ग्नेय पुर्??ए ? स्?धुन्?मप्रमत्त्?न्?? भक्त्?न्?? भक्तवत्सल? | उपकर्त्? निर्?क्?रस्तद्?क्?रे?अ ज्?यते | क्?र्य्?र्थ? स्?धक्?न्?�च चतुर्वर्गफलप्रद? || तथ्?चोक्त? म्?र्क??एय पुर्??ए ? ?र्?धित्? सैव न्???? भोगस्वर्ग्?पवर्गद्? | ब्?हन्न्?रद्?ये ? भक्त्?न्?? मोक्?अद्?न्?य भवतो म्?र्तिकल्पन्? || ?र्?धन्?-लक्?अ?अम् ?र्?धन्? तु ध्य्?न? प्?ज्? च | ते च भेदज्�?नप्?र्विके भोगस्वर्गप्रदे | अभेदज्�?नप्?र्विके तु मुक्तिप्रदे | तदर्थ�च ब्रह्मकर्त्?कर्?पकल्पन्? इत्यर्थ? | ध्य्?नन्तु तत्तद्देवत्?य्?स्तत्तन्मन्त्र घ?अक्?भ्?त तत्तद्वर्?ओत्पन्न मुखहस्तप्?द्?द्यवयव्?च्छिन्न?अर्?रवि?अयकज्�?नमिति तु नि?कर्??र्थ? | तथ्?चोक्त? गरु?एऽपि ? अम्?र्त?चेत् स्थिरो न स्य्?त् ततो म्?र्ति विचिन्तयेत् || ध्य्?नद्वैविध्यकथनम् य्?मलेऽपि ? स्थ्?लस्?क्?मविभेदेनध्य्?नन्तु द्विविध? भवेत् | स्?क्?म? मन्त्रपपुर्ज्�?न? स्थ्?ल? विग्रहचिन्तनम् || करप्?दोदर्?स्य्?दि र्?प? यत्स्थ्?लविग्रहम् | स्?क्?म�च प्रक्?ते र्?प? पर? ज्�?नमय? स्म्?तम् || स्?क्?मध्य्?न? महे??नि कद्?चिन्न हि ज्?यते | स्थ्?लध्य्?न? महे??नि क्?त्व्? मोक्?अमव्?प्नुय्?त् || य्?मले ? देवत्?य्?? ?अर्?रन्तु ब्?ज्?दुत्पद्यते ध्रुवम् | तत्तद्व्?ज्?त्मक? मन्त्र? जप्त्व्? ब्रह्ममयो भवेत् || अदि??अ? भ्?वयेद्देवि यथोक्तध्य्?नयोगत? | वर्?अर्?पे?अ स्? देव्? जगद्?ध्?रर्?पि?? || ब्?ज्?त्वर्??त् ब्?जपरिभ्???म्?ह कुलच्???म?औ ? एक्?क्?अर? समुद्ध्?त्य प्?र्वब्?ज? पर? ?अक्तिरिति | प्?र्व? कमिति | परम्?क्?र? | रेफ? क्?लकम् ग्?न्धर्वे ? नित्यमेक्?क्?अर? ब्रह्म अक्?अर? परम? पदम् ||
SKसक्?ज्जप्त्व्?ऽक्?अर? मन्त्र? ब्रह्मभ्?य्?य कल्पते | जप्त्व्? त? स्?धयेत् सर्व? बहुज्?पेन कि? फलम् || स्थ्?ल? स्?क्?म एक एव | तथ्?चोक्त? य्?मले ? घ्?तस्य द्विविध? र्?प? क्??हिन्य? स्वच्छत्? तथ्? | क्??हिन्ये स्वच्छत्?य्?न्तु घ्?तमेव न स??अय? || प्?द्मेऽपि ? द्?प्?दुत्पद्यते द्?पो यथ्? तद्वद् भवि?यति | इति वचन्?त् | अथव्? प्?ज्य-प्?जकयोरभेद�ज्�?न्?र्थ? ब्रह्म?ओर्?पकल्पन्? | तथ्?चोक्त? कौर्मे ? मन्यन्ते ये तु च्?त्म्?न? विभिन्न? परमे?वर्?त् | न ते प?यन्ति त? देव? व्?थ्?ते??? परि?रम? || ??वर इत्युपलक्?अ?अम् | तथ्?चोक्त? रुद्रय्?मले ? सर्वदेवमय्?? देव्?? सर्वमन्त्रमय्?? पर्?म् | ?त्म्?न? चिन्तयेद्देवि परम्?नन्दर्?पि??म् || योगिन्?र्?प?अम् अथ प्रस?ग्?द्योगज्�?न? लिख्यते | अथ्?ऽपर? प्रवक्?य्?मि सम्?धि? भवन्??अनम् || भवन्??अन? जन्मन्??अनमित्यर्थ? | ह्?त्पद्मकर्?इक्?मध्ये ध्य्?येत् सि?ह? मनोहरम् | सि?होपरि स्थित? पद्म? रक्त? तस्योर्ध्वग? ?इवम् || तस्योपरि मह्?देव्? रमते क्?मर्?पि?? | सितप्रेतो मह्?देवो रक्तप्रेतोऽपि पद्मज? || ब्रह्म्? लोहिप?कज इति व्? प्??ह? | हरिर्हरस्तु विज्�एयो व्?हन्?नि महौजस? | ध्य्?येच्च परमे??नि यथोक्त ध्य्?नयोगत? || देव्य्?त्मक? स्वम्?त्म्?न? भ्?वयेद्यतम्?नस? | अस्य्?न्य(नु)र्?प? यद्यत् तत् स्वक्?यमिति भ्?वयेत् || ऐवय? स?भ्?वयेन्नित्य? स्वगुरुदेवत्?त्मन्?म् | ?र्?क्रमेऽपि ? ?त्म्?न? चिन्तयेद्देवि ?अक्ति म्?द्य्?स्वर्?पि??म् || मनस्? वचस्? चैव क्?यिकेन च चिन्तयेत् | अन्यत्र्?पि ? ?त्म्?ऽभेदेन स�चिन्त्य य्?ति तन्मयत्?? नर? || सोऽहमित्यस्य सतत? चिन्तन्?त् तन्मयो भवेत् | अह? देव्? न च्?न्योऽस्मि मुक्तोऽहमिति भ्?वयेत् || रुद्रस्य चिन्तन्?द् रुद्रो वि??उ स्य्?द् वि??उ चिन्तन्?त् | दुर्ग्?य्??चिन्तन्?द् दुर्ग्? भवत्येव न च्?न्यथ्? || एवमभ्यस्यम्?नस्तु अहन्यहनि प्?र्वति | जर्?भर?अदु?ख्?द्यैर्म्?च्यते भवबन्धन्?त् || ध्य्?नयोग-प्र?अ?स्? ध्य्?नयोगपरस्य्?ऽस्य प्?ज्? न्?स्ति कथ�चन ||
SKविन्?न्य्?सैर्विन्? प्?ज्?? विन्? ज्?प्य-पुर?क्रिय्?म् | ध्य्?नयोगद्भवेत् सिद्धिर्न्?न्यथ्? खलु प्?र्वति || एतत्ते कथित? देवि ब्रह्मज्�?नमिद? महत् | विज्�?य गुरुतो देवि स?स्?रस्?गर? तरेत् || अह? ब्रह्म्?स्मि विज्�?न्?दज्�?नविलयो भवेत् | सोऽहमित्येव स�चिन्त्य विहरेत्सर्वद्? प्रिये || यथ्? फेनतर?ग्?दि समुद्र्?दुत्थित? मुने | समुद्रे ल्?यते तद्वद् जगद्?त्मनि ल्?यते || इति गन्धर्वतन्त्रोक्तयोग? || तस्म्?त्स्?धक्?न्?? हित्?र्थ्?य ब्रह्म स्त्र्?पु?र्?प? धत्ते | वि??उय्?मले देव्?? प्रति वि??उवचनम् ? म्?तस्त्वत्परम? र्?प? तन्न ज्?न्?तिक?चन | क्?ल्य्?दि स्थ्?ल? यद्र्?प्? तदर्चन्ति दिवौकस? || स्त्र्?र्?प्?? व्? स्मरेद्देव्?? पु?र्?प्?? व्? स्मरेत् प्रिये | स्मरेद् व्? नि?कल? ब्रह्मसच्चिद्?नन्दर्?पियत् || स्त्र्?र्?प्?वत्?र-लक्?अ?अम् स्तनन्योन्य्?द्यवयव्?वच्छिन्न ?अर्?र्??स्त्र्?र्?प्?वत्?र्?? | तद्यथ्? ? क्?ल्? न्?ल्? मह्?दुर्ग्? त्वरित्? छिन्नमस्तक्? | व्?ग्व्?दिन्? च्?न्नप्?र्?? तथ्? प्रत्य?गिर्? पुन? || क्?म्?ख्य्?व्?सिन्? ब्?ल्? म्?त?ग्? ?ऐलव्?सिन्? | इत्य्?द्य्?? सकल्? विद्य्? कलौ प्?र्?अफलप्रद्? || अन्यत्र्?पि ? उमेति केचिद्?हुस्व्?? ?अक्ति? लक्?म्?ति च्?परे | भ्?रत्?त्यपरे चैन्?? गिरिजेत्यम्बिकेति च || दुर्गेतिभद्रक्?ल्?ति च???? म्?हे?वर्?? तथ्? | कौम्?र्?? वै??अव्?? व्?र्?ह्?ति चैन्द्र्?ति च्?परे || ब्र्?ह्म्?ति विद्य्?विद्येति म्?येति च तथ्? परे | प्रक्?ति? च्?पर्?? चैव वदन्ति परम्?र्?अय? || पुरु??वत्?र-लक्?अ?अम् ?इ?न्?द्यवयव्?वच्छिन्न?अर्?र्?वच्छिन्न्?वत्?र्?? पु?र्?प्?? | यथ्? ब्रह्म्?-वि??उ-?इव्?दय? | एव? ? मत्स्य क्?र्मो वर्?ह?च न्?सि?हो व्?मनस्तथ्? | र्?मो र्?म?च र्?म?च बुद्ध-कल्क्? च ते द?अ || इत्य्?दि | नपु?सक? ग्?हस्थैरनुप्?स्यमेव, फल्?जनकत्व्?त् | ग्?हस्थ्?न्?�च सर्वे स्युर्ब्रह्म वै ब्रह्मच्?रि??म् | ग्?हस्थ्?न्?�च सर्वे स्यु रित्युप्?द्?न्?त् ?इव-दुर्ग्?-वि??उ पुरस्क्?रे?अ उप्?सन्? क्?र्य्? | तथ्? च विमल्?नन्दभ्??ये क्?र्मपुर्??अम् ?
SKमनु?य्???मुम्? देव्? तथ्? वि??उ? सद्??इव? | य्? य्?स्य्?ऽभिमत्? पु?स? स्?हितस्यैव देवत्? | किन्तु क्?र्य्?ऽवि?ए?ए?अ प्?जित्? स्वे??अद्? न्???म् || न्???? मनु?य्???मभेदेन प्?ज्?क्?र्य्? | ?ऐवे देव्?? प्रति ??वरव्?क्यम् ? एक? प्र?अ?सति यस्तु सर्व्?नेव प्र?अ?सति | एक? निन्दति यस्ते??? सर्व्?नेव विनिन्दति || ??वरनिन्द्?फलम् ??वरस्य प्र?अ?स्?य्?? न सुख? निन्द्?य्?? व्? न दुख?, सुखदु?ख रहितत्त्व्?त् | किन्तु निन्दकस्य नरकमेव | तथोचोक्त? भ्??ये ? देव्?-वि??उ-?इव्?द्?न्?मेकत्त्व? परिचिन्तयेत् | भेदक्?न्नरक? य्?ति य्?वद्?ह्?तस?प्लवम् || ?ह्?तस?प्लव? प्रलयक्?ल-पर्यन्तमित्यर्थ? | व्?र्?हे ? यथ्? दुर्ग्? तथ्? वि??उर्यथ्? वि??उस्तथ्? ?इव? | एतप्लयमेकमेव न प्?थग् भ्?वेयेत् सुध्?? || योऽन्यथ्? भ्?वयेदेत्?न् पक्?अप्?तेन म्??हध्?? | स य्?ति नरक? घोर? रौख? प्?पपुरु?अ? || य्?मले ? ध्य्?नगम्य? प्रप?यन्तिरुचिभेद्?त्प्?थग् विधम् | तन्त्रे ? एकैव हिमह्?म्?य्? न्?मभेद? सम्??रित्? | विमोहन्?य लोक्?न्?? तस्म्?त् सममन्? भवेत् || प्रव्?त्तिम्?र्गस?गस्तु द्?क्??भेदेन प्?जयेत् | निव्?त्ति? म्?र्गम्??अस्तु भेदव्?द? विवर्जयेत् || ?अक्त्युप्?सन्?-प्र?अ?स्? ?इववि??ओरुप्?सन्?? त्यक्त्व्? देव्य्? उप्?सन्? कर्तव्य्?, कोमल्?न्त? कर?अत्व्?त् भुक्तिमुक्तिद्?त्?त्व्?च्च | ?इव- वि??उरुप्?सन्?य्?? क्?यक्ले?एन मुक्तिम्?त्रम् | तथ्? च ??रद्?य्?? भुवने?वर्?? प्रति ?इवव्?क्यम् ? ?द्य्?प्य?ए?अजगत्?? नवयौवन्?सि ?ऐल्?धिर्?जतनय्?प्यतिकोमल्?सि समय्?तन्त्रे ? कद्?चित् कस्यमुक्ति? स्य्?त् कस्यचिद् मुक्तिरेव च | एतस्य्?? स्?धकस्य्?थ भुक्तिमुक्ति? करे स्थित्? | रुद्रय्?मले ? यत्र्?स्ति भोगो नच तत्र मोक्?ओ यत्र्?स्ति मोक्?ओ न च तत्र भोग? | ?इव्?पद्?म्भोजयुग्?र्चक्?न्?? भोग?च मोक्?अ?च कस्थ एव | योऽन्येभ्यो दर्?अनेभ्य?च भुक्ति? मुक्ति�च क्??क्?अति | स्वप्नलब्धधनेनैव धनव्?न् कि? भवेन्नर? || ?उक्तौ रजतविभ्र्?न्तिर्यथ्? ज्?येत प्?र्वति | अथ्?न्यदर्?अनेभ्य?च भुक्ति? मुक्ति�च क्??क्?अत? ||
SKइति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?मभेदयोगनिर्?अयो न्?म त्?त्?योल्ल्?स? || ३ || चतुर्थोल्ल्?स? अथ प्र्?त?क्?त्यम् य्?मले ? प्र्?त?क्?त्यमक्?त्व्? तुयो देव्?? भक्तितोऽर्चयेत् | तस्य प्?ज्? च विफल्? ?औचह्?न्? यथ्? क्रिय्? || ब्र्?ह्ये मुह्?र्ते चोत्थ्?य चिन्तयेद् गुरुदैवतम् | स्वम्?र्द्धनि सहस्र्?रे ?इव्?ख्य-परबिन्दुके || ब्र्?ह्यमुह्?र्तस्तु र्?त्रेरुप्?न्त्यो मुह्?र्त? | तथ्? च य्?मले ? द्वौ द??और्?त्रि?ए?ए तु ब्र्?ह्य? मुह्?र्तक? विदु? || ?र्?गुरुध्य्?नम् गुरोर्ध्य्?न? यथ्? ? ?अ???क युतस?क्??अ? वर्?भयलसत्करम् | ?उक्ल्?म्बरपर्?ध्?न? ?उक्लम्?ल्य्?नुलेपनम् || व्?मोरौ रक्त?अक्त्य्? चयुत? देव्?ख्यमव्ययम् | ?इवेनैक्य? समुन्न्?य ध्य्?येत् परगुह? धिय्? || एव? ध्य्?त्व्? पुर?चैव प�चभ्?तमयैर्यजेत् | ?र्?गुरुम्?नसप्?ज्? गन्धतत्त्व? प्?र्थिवन्तु कनि??ह्??गुलियोगत? | ?अब्दमय? मह्?पु?प? प्रथम्??गुलियोगत? | व्?युर्?प? मह्?ध्?प? तर्जन्?भ्य्?? नियोजयेत् || तेजोर्?प? मह्?द्?प? मध्यम्?द्वत्य योगत्?? | अम्?त भोजन? तद्वदम्?त्??गुलि योगत? || नमस्क्?रे??ऽ�जलिन्? व्?ग्भव? त्?म्ब्?ल? स्म्?तम् | स्वस्वब्?जेन सर्वन्तु नमस्क्?रे?अ योजयेत् | गुरोर्मन्त्र? प्रयत्नेन प्रजपेत् सुदवन्रिते || गुरुमन्त्र? गुरुमन्त्रो यथ्? ? व्??? च भुवने??न्? रम्? चैव सुरे?वरि | त्?रत्रयमिद? देवि गुरुमन्त्रे प्रति??हितम् || तत? स्वगुरु न्?म्?न्ते च्?नन्दन्?थम्?लिखेत् | रक्त?अक्तिपद्?न्ते च अम्ब्? पदमथ्?लिखेत् || ?र्?प्?दुक्?? समुच्च्?र्य प्?जय्?म्?ति स?जपेत् | तेजोर्?प? समर्प्य्?थ स्तवेन तो?अयेद् गुरुम् || ?य्?म्?रहस्ये- मनस्? गन्धपु?प्?द्यै? सम्प्?ज्य व्?ग्भव? जपेत् | अथ कुब्जिक्? तन्त्रोक्त्?? स्तुति? कुर्य्?त् || गुरुस्तुति? ओ? नमस्तुभ्य? मह्?मन्त्रद्?यिने ?इवर्?पि?ए | ब्रह्मज्�?नप्रक्???य स?स्?रदु?खत्?रि?ए || अतिसौम्य्?य दिव्य्?य व्?र्?य्?ऽज्�?नह्?हि?ए | नमस्ते कुलन्?थ्?य कुलकौलोन्यद्?यिने ||
SK?इवतत्त्वप्रबोध्?य ब्रह्मतत्त्वप्रक्??इने | नमोऽस्तु गुरवे तुभ्य? स्?धक्?भयद्?यिने || अन्?च्?र्?च्?रभ्?व बोध्?य भ्?वहेतवे | भ्?व्?भ्?व विनिर्मुक्त-म्?र्तये गुरवे नम? || भ्?व्?भ्?वविनिर्मुक्त??क्त्?य इति व्? प्??ह्ययम् | नमोऽस्तु ?अम्भवे तुभ्य? दिव्यभ्?वप्रक्??इने | ज्�?न्?नन्दस्वर्?प्?य विभव्?य नमो नम? || ?इव्?य ?अक्तिन्?थ्?य सच्चिद्?नन्दर्?पि?ए | क्?मर्?प्?य क्?म्?य कग्मकेलि कल्?त्मने || कुलप्?जोपदे??य कुल्?च्?रस्वर्?पि?ए | ?रक्तनिजसच्छक्ति व्?मभ्?ग विभ्?तये || नमस्तेऽस्तु महे??य विद्य्?न्?थ्?य स?विदे | सर्वविद्य्?स्वर्?प्?य नमस्तेऽस्तु नमो नम? || इद? स्तोत्र? प?हेन्नित्य? स्?धको गुरुदि?मुख? | प्र्?तरुत्थ्?य देवे?इ अतोविद्य्? प्रस्?दति || कुलसम्भवप्?ज्?य्?म्?दौ यो न प?हेदिदम् | विफल्? तस्य प्?ज्? स्य्?दभिच्?र्?य कल्पते || इति कुब्जिक्? तन्त्रोक्त? ?र्?गुरुस्तोत्र? सम्?प्तम् | अथ कवचमपि प?हेत् | ततस्तु प्र?अमेत् | ?र्?गुरुप्र??म मन्त्र? अख??अम??अल्?क्?र? व्य्?प्त? येन चर्?चरम् | तत्पद? दर्?इत? येन तस्मै ?र्?गुरवे नम? || अज्�?नतिमिर्?न्धस्य ज्�?न्?�जन ?अल्?कय्? | चक्?उरुन्म्?लित? येन तस्मै ?र्?गुरवे नम? || ?अ?चक्र निर्?प?अम् अथ प्रस?ग्?त् ?अ?चक्रव्यवस्थ्? लिख्यते | तिस्र? को?यस्तदर्द्धेन ?अर्?रे न्??अयो मत्?? | त्?सु मुख्य्? द?अ प्रोक्त्?स्तित्रस्त्?स्?त्तम्? मत्?? || प्रध्?न्? मेरुद???न्त?चन्द्रस्?र्य्?र्ग्निर्?पि?? | ?अक्तिर्?प्? तु स्? न्??? स्?क्??दम्?तविग्रह्? || पि?गल्?ख्य्? च य्? दक्?ए पु?र्?प्? स्?र्यविग्रह्? | मेरुमध्यस्थित्? य्? तु म्?ल्?द्?ब्रह्मरन्ध्रग्? || सर्वतेजोमय्? स्? तु सु?उम्न्? वह्निर्?पि?? | द्??इम्?कुसुमप्रख्य्? ?इव्?ख्य्? च्?पर्? मत्? || सु?उम्न्?न्तर्गत्? चित्र्? चन्द्रको?इसमप्रभ्? | सर्वदेवमय्? स्? तु योगिन्?? ह्?दय?गम्? | तस्य्? मध्ये ब्रह्मन्??? म्???लतन्तुर्?पि?? || म्?ल्?ध्?रचक्र कथनम् सु?उम्न्?ग्रन्थिस?स्थ्?नि ?अ?पद्म्?नि यथ्?क्रमम् | ?ध्?र्?ख्य? म्?लचक्रमतिरक्त? चतुर्दलम् | व्?दिस्?न्त्?र्?अस?युक्त? रक्तवर्?अ? मनोहरम् ||
SKकर्?इक्?य्?? स्थित्? योनि? क्?म्?ख्य्? परमे?वर्? | तद्योनि? परमे??नि इच्छ्?ज्�?नक्रिय्?त्मिक्? || अपर्?ख्यो हि कन्दर्प ?ध्?रे तत्त्रिको?अके | स्वयम्भ्?लि?ग तन्मध्ये सरन्ध्र? प?चिम्?ननम् || ध्य्?येच्च परमे??नि ?इव? ?य्?मल-सुन्दरम् | कु??अल्? तेन म्?र्गे?अ य्?त्?य्?त? करोति हि || भित्व्? भित्व्? पुर्?? य्?ति च्?य्?ति कु??अल्? सद्? | तत्र विद्युल्लत्?र्?प्? कु??अल्? परदेवत्? || प्रसुप्तभुजग्?क्?र्? स्?र्द्धत्रिवलय्?न्वित्? | व्?म्?वर्तक्रमेर्?एव वे??इत्? वि?अतन्तुवत् || ?इव? वे??य महे??नि सर्वद्? परिति??हति | येन म्?र्गे?अ गन्तव्य? पर? ब्रह्म निर्?मयम् | मुखेन्?च्छ्?द्य तद्द्व्?र? प्रसुप्त्? परमे?वर्? || स्व्?धि??ह्?न-म?इप्?रचक्र विवर?अम् लि?गम्?ले मह्?पद्म? स्व्?धि??ह्?नन्तु ?अ?दलम् | य्?दि-ल्?न्त्?र्?अ-स?युक्त? न्?भौ तु म?इप्?रकम् | ??दि-फ्?न्त्?न्वित-दलैररु?ऐर्द?अभिर्युतम् || अन्?हतपद्म-विवर?अम् ह्?दये द्व्?द?अदलमन्?हतसरोरुहम् | क्?दि-?ह्?न्तदलैर्देवि तप्तह?अकसन्निभम् || तन्मध्ये ब्??अलि?गन्तु स्?र्य्?युतसमप्रभम् | ?अब्दब्रह्ममयो मन्त्रोऽन्?हतस्तत्र द्??यते | तेन्?हत्?ख्य? तत्पद्म? योगिभि? परिक्?र्तितम् || वि?उद्धचक्र-निर्?प?अम् क??हदे?ए वि?उद्ध्?ख्य? ध्?म्रवर्?अ? मनोहरम् | अक्?र्?दि-स्वरोपेतैर्दलै? ?ओ?अ?अभिर्युतम् || वि?उद्धिस्तन्यते यस्म्?ज्ज्?वस्य ह?सलोकन्?त् | वि?उद्धपद्मम्?ख्य्?तम्?क्???ख्य? मह्?द्भुतम् || ?ज्�?चक्र-विवर?अम् ?ज्�?न्?म भ्रुवोर्मध्ये अक्र�च द्विदल? परम् | हक्?अ-द्वयक्?अर-स?युक्त? निर्मल? सुमनोहरम् || इतर्?ख्य? मह्?लि?ग? तन्मध्ये क्?�चनप्रभम् | ?ज्�?स?क्रम?अ? तत्र गुरोर्?ज्�एतिवि?रुतम् | कैल्?स्?ख्य? तद्?र्ध्व? तु बोधिन्? तु तद्?र्ध्वत? || सहस्र्?रचक्र-विवर?अम् सहस्र्?र? मह्?पद्म? न्?दबिन्दुसमन्वितम् | ??न्यर्?प? ?इव? स्?क्??द् व्?त्त? परमकु??अल्? | स्?र्द्धत्रिवलय्?क्?र्? को?इविद्युत्समप्रभ्? || य्?मले ? व्?त्त? कु??अलिन्? ?अक्तिर्गु?अत्रयसमन्वित्? | ??न्यभ्?गो मह्?देवि ?इवर्?पो महे?वर? ||
SKसर्प्?क्?र्? ?इव? वे??य सर्वद्? तत्र स?स्थित्? | ?इव?अक्त्य्?त्मको बिन्दुर्मुक्तिमुक्तिफलप्रद? | न्?दर्?पे?अ स्? देव्? योनिर्?प्? सन्?तन्? || भ्?त?उद्धौ ? ?इववि??उब्रह्ममय्? बिन्दुयोनि? ?उचिस्मिते | सर्वोपरि महे??नि बिन्दुर्ब्रह्मस्वर्?पक? || गन्धर्वम्?लिक्?य्?? ? भवो बिन्दुरिति ख्य्?तो भवन�च त्रिको?अकम् | भवन? भवसम्बन्ध्?ज्ज्?यते भुवनत्रयम् || प�चभ्?त्?नि देवे?इ ?अ??हे म्?नसम्??वरि | ?अ?चक्रे?उ स्थित्?न्येव क्रम्?द्देवि विचिन्तयेत् || सहस्?र? ?इवपुर? रम्य? दु?खविवर्जितम् | सर्वतोऽल?क्?तैर्दिव्यैर्नित्यपु?पफलैर्द्रुमै? || सद्??इवपुर? रम्य? कल्पव्?क्?अ? सु?ओभितम् | प�चभ्?त्?त्मक? तच्च गु?अत्रयसमन्वितम् || चतुर्वेदचतु???ख? नित्यपु?पफल्?न्वितम् | प्?त? क्???अ? तथ्? ?वेत? रक्त? पु?प�च प्?र्वति || हरित�च विचित्र�च न्?न्?पु?प? मनोहरम् | एव? कल्पद्रुम? ध्य्?त्व्? तदधो रत्नवेदिक्?म् || तत्रोपरि सुपर्य?क? न्?न्?रत्नो प?ओभितम् | मन्द्?रपु?परचित? न्?न्?गन्ध्?नुमोदितम् || तत्रोपरि मह्?देव? सद्? ति??हति सुन्दरि | ध्य्?येत सद्??इव? देव? ?उद्धस्फ?इकसन्निभम् || बहुरत्नसम्?क्?र्?अ? द्?र्घब्?हु मनोहरम् | सुखप्रसन्ननयन? स्मेर्?स्य? सतत? प्रिये || ?रव?ए कु??अलोपेत? रत्नह्?रे?अ ?ओभितम् | ?ओ?अ(गले)पद्मसहस्रस्य म्?लय्? ?ओभित? वपु? || अ??अब्?हु? त्रिनयन? ?इव? पद्मदलेक्?अ?अम् | प्?दयोर्न्?पुर? रम्य? ?अब्दब्रह्ममय? वपु? || एव? स्थ्?लवपुस्तस्य भवयेत् कमलेक्?अ?ए | पद्ममध्ये स्थित? देव? निर्?ह? ?अब्दर्?पि?अम् || ?अब्दर्?पे मह्?देवेक्?त्य? न्?स्ति कद्?चन | एव? सर्वे?उ चक्रे?उ ?अक्तिर्?प? विचिन्तयेत् || ब्रह्म्? रुद्र?च वि??उ?च ??वर?च सद्??इव? | तत? पर?इव?चैव ?अ? ?इव्?? परिक्?र्तित्?? || ?अक्तिम्?ह ? वि?उद्धौ ??किन्? देवि अन्?हते तु र्?कि?? | ल्?किन्? म?इप्?रस्थ्? क्?किन्? लि?गगोचरे || ?ध्?रे ??किन्? देव्? ?ज्�?य्?? ह्?किन्? तथ्? | य्?किन्? ब्रह्मरन्ध्रस्थ्? सर्वक्?मफलप्रद्? ||
SKध्य्?येत् कु??अलिन्? देव्?? स्वयम्भ्?लि?गस?स्थित्?म् | ?य्?म्?? स्?क्?म्?? स्???इर्?प्?? स्???इस्थितिलय्?त्मिकम् | वि?व्?त्?त्?? ज्�?नर्?प्?? चिन्तयेद्?र्ध्वर्?पि??म् || रक्त्?मिति सुन्दर्? वि?अये ज्�एयम् | हु?क्?रवर्?असम्भ्?त्? कु??अल्? परदेवत्? | विभर्ति कु??अल्? देहम्?त्म्?न? ह?समन्त्रत? || कु??अलिन्? योग? प्रव्?द्धवह्निस?योगमनस्?म्?रुतै? सह | ?र्ध्व? नयेत् कु??अलिन्?? ज्?व्?त्मसहित्?? परम् || गछन्ति ब्रह्मरन्ध्रे?अ भित्व्? ग्रन्थि? चतुर्द?अ? | ?अ?चक्र-सन्धिम्?र्गे?अ सु?उम्न्? वर्त्मन्? तथ्? | ह?सेन मनुन्? देव्?? सहस्र्?र? सम्?नयेत् || सद्??इवो मह्?देवो यत्र्?स्ते परमे?वरि | तत्रगत्व्? मह्?देवि कु??अल्? परदेवत्? || देव्?र्?पवत्? क्?म-समुल्ल्?सविह्?रि?? | मुख्?रविन्दगन्धेन मोदित? परम? ?इवम् || प्रबोध्य परमे??नि तत्रोपरि वसेत् प्रिये | ?इवस्य मुखपद्म? हि चुचुम्बे कु??अल्? ?इवे || सद्??इवेन देवे?इ क्?अ?अम्?त्र? रमेत् प्रिये | अम्?त? ज्?यते देवि तत्क्?अ??त् परमे?वरि || तदुद्भव्?म्?त? देवि ल्?क्??रस सम्?रु?अम् | तेन्?म्?तेन देवे?इ तर्पयेत् परदेवत्?म् || ?अ?चक्रदेवत्?स्तत्र सन्तर्प्य्?ऽम्?तध्?रय्? | ?नयेत् तेन म्?र्गे?अ म्?ल्?ध्?र? पुन? सुध्?? || य्?त्?य्?तक्रमे?ऐव तत्र कुय्?न्मनोलयम् | एवमभ्यस्यम्?नस्तु अहन्यहनि प्?र्वति || जर्?भर?अदु?ख्?द्यैर्मुच्यते भवबन्धन्?त् | इत्युक्त? परमो योगो योनिमुद्र्? प्रबन्धन? || य्?मले ? कुलयो?इत् कुल? त्यक्त्व्? पुनरेव कुल? वि?एत् | रमते सेयमव्यक्त्? पुनरेक्?किन्? सत्? || स?केतपद्धत्य्?म् ? पि??अ? कु??अलिन्??अक्ति? पद? ह?स? प्रक्?र्तित? | र्?प? बिन्दुरिति ज्�एय? र्?प्?त्?त�च नि?फलम् || एतेन ?अ?चक्रभेदक्रमे?अ कु??अलिन्?? सहस्रदल पद्मे न्?त्व्? तत्रस्थ सद्??इवेन स?गमय्यतदुद्भव्?म्?तेन परदेवत्?? ?अ?चक्रस्थ?इव?अक्त्य्?द्???च्?प्ल्?व्य सोऽहमिति मन्त्रे?अ पुन? स्वस्थ्?नम्?नयेदिति तु व्?क्य्?र्थ? | सोऽमिति च मन्त्रे?अ स्वस्थ्?नम्?नयेत् सुध्?? | इति य्?मलवचन्?त् || देव्युव्?च
SKदेवदेव मह्?देव स्???इस्थित्यन्तक्?रक? | म्?र्ध्नि पद्म? सहस्र्?र? रक्तवर्?अमधोमुखम् || तस्य मध्ये स्थित? ध्य्?येद् गुरु? ??न्त? स?अक्तिकम् | म्?ल्?ध्?रे मह्??अक्ति? कु??अल्?रुप-ध्?रि??म् || अधोवक्त्र क्रमे?ऐव सर्वपद्मे?उ भ्?वन्? | तद्? कथ? भवेत् तत्र चिन्तन? गुरुदेवयो? || ?ध्?रे चत् स्थितिस्तत्र त्वधोभ्?गे कथ? भवेत् | अधोवक्त्रे स्थितस्य्?पि चिन्तन? व्? कथ? भवेत् || ?र्?मह्?देव उव्?च यथ्? युक्त? त्वय्? देवि कथित? व्?रवन्दिते | एवमेव तु सन्देहो ज्?यते न्?त्र स??अय? || कथ्यते परमे??नि सन्देहोच्छेदक्?र?अम् | त्?नि पद्म्?नि देवे?इ सु?उम्न्?न्त? स्थित्?नि च || पर?ब्रह्मस्वर्?प्??इ ?अब्दब्रह्ममय्?नि च | तत्सर्व? प?कज? देवि सर्वतोमुखमेव च | प्रव्?त्ति?च निव्?त्ति?च द्वौ भ्?वज्?वस?स्थितौ || प्रव्?त्तिम्?र्ग? स?स्?र? निव्?त्तिपरम्?त्मनि | प्रव्?त्तिम्?वचिन्त्?य्?मधोवक्त्र्??इ चिन्तयेत् || निव्?त्तियोगम्?र्गे?उ सदैवोर्ध्वमुख्?नि च | एवमेव भ्?वभेद्?दसन्देहोऽभिज्?यते || ग्?हस्थयोगस्?धनम् (अथ्?न्यत स?प्रवक्?य्?मि ग्?हस्थ्?न्?�च स्?धनम् | म्?ल्?ध्?रे स्थित्?? देव्?? कु??अल्?? परदेवत्?म् || भोगक्?ले महे??नि ?जिह्व्?न्त? विभ्?व्य च | ?ओधित्?न मत्स्यम्??स्?द्?न् तन्मुखे स्थ्?पयेद् बुध? || म्?लमन्त्र? समुच्च्?र्य जुहोमि कु??अल्?मुखे | प्रतिग्र्?से महे??नि एव? कुर्य्?द् विचक्?अ?अ? || भोजनेच्छ्? भवेत् तस्य्? निर्लिप्तो ज्?वस?ज्�अक? |) एवमेव प्रक्?रे?अ ?र्ध्वपद्म? प्रज्?यते || गुरो? स्थिति?च च्?र्व?गितद्? सम्यक् प्रज्?यते | भिद्यते ह्?दयग्रन्थिच्छिद्यते सर्वस??अय? || गुर्व्?दि भ्?वन्?द्देवि तद्? सिद्धि? प्रज्?यते | स्वगेहे प्?यस? त्यक्त्व्? भिक्??म?अतिदुर्मति? || अत एव महे??नि व्?तुलत्व? प्रज्?यते | इत्येतत्कथित? स्?र? मम ज्�?नविलोकितम् || प्रक्?र्?न्तर-कु??अलिन्?-योगकथनम् अथ योग? प्रवक्?य्?मि येन देवमयो भवेत् | म्?लपद्मे कु??अलिन्? य्?वन्निद्र्?मित्? प्रिये ||
SKत्?वत् कि�चिन्न सिध्येत् मन्त्रयन्त्र्?र्चन्?दिकम् | स्व्?पक्?लो व्?मव्?ह? प्रबोधो दक्?इ??वह? || मन्त्रि??? स्व्?पक्?ले तु जपोऽनर्थ फलप्रद? | प्रबोधक्?ल? ज्?न्?य्?दुमयोरपि प्?र्वति? || ज्?गर्तियदि स्? देवि बहुभि? पु?यस�चयै? | तद्? प्रस्?दम्?य्?न्ति मन्त्रयन्त्र्?र्चन्?दय? || योगयोग्?द्भवेन्मुक्तिर्मन्त्रसिद्धिरख??इत्? | सिद्धे मनौ पर्?व्?प्तिरिति ??स्त्रस्य निर्?अय? || ज्?वनमुक्त?च देह्?न्ते पर? निर्व्??अम्?प्नुय्?त् | स?स्?रोत्तर?अ? मुक्तिर्योग?अब्देन कथ्यते || प्र्???य्?मैर्जपैर्य्?गैस्त्यक्तनिद्र्? जगन्मय्? | चतुर्दल? स्य्?द्?ध्?र? स्व्?धि??ह्?नन्तु ?अ?दलम् | न्?भौ द?अदल? पद्म? स्?र्यस?ख्य्?दल? ह्?दि || क??हे स्य्?त ?ओ?अ?अदल? भ्र्?मध्ये द्विदल? तथ्? | सहस्रदलम्?ख्य्?त? ब्रह्मरन्ध्रमह्?पथे || म्?त्?क्?क्?अर स?युक्त? सहस्र्?र? सरोरुहम् | अधोवक्त्र? ?उक्लवर्?अ? रक्त कि�जिल्कभ्??इतम् || इति || (सुन्दर्?वि?अये तु रक्तवर्?अ? बोध्यम् | समय्?तन्त्रोक्तत्व्?त्, अन्यथ्? | विरोध्?पत्ते? || ब्रह्म्? वि??उ?च रुद्र?च ??वर?च सद्??इव? | तत? पर?इव?चैव ?अ? ?इव्?? परिक्?र्तित्?? || ??किन्? र्?किन्? चैव ??किन्? ल्?किन्? तथ्? | क्?किन्? ??किन्? चैव ?अक्तयस्त्?? परिक्?र्तित्?? || ?ध्?रे ह्?त्प्रदे?ए च भ्रुवोर्मध्ये वि?ए?अत? | स्वयम्भ्?स?ज्�ओ ब्???ख्यस्तथैवेतरस?ज्�अक? || लि?गत्रय? महे??नि प्रध्?नत्वेन चिन्तयेत् | म्?ल्?ध्?रे स्थित्?भ्?मि? स्व्?धि??ह्?ने जल? प्रिये || म?इप्?रे स्थित? तेजो ह्?दये म्?रुतस्तथ्? | वि?उद्धौ तु महे??नि ?क्??अ? कमलेक्?अ?ए || ?ज्�?चक्रे महे??नि मन? सर्व्?र्थस्?धकम् | तद्?र्ध्वे परमे??नि पद्मम्?र्ध्वमुख? सद्? | तस्योपरि महे??नि ध्य्?येत् सद्? ?इव? गुरुम् || ?र्ध्वमुखमिति | अधोमुख सहस्रदल पद्म्?धोगतेर्ध्वमुखद्व्?द?अ-दल-पद्मोपरि ?इवर्?पि?अ? ?र्?गुरु? ध्य्?येदित्यर्थ? | तथ्? चोक्त? य्?मले ? ब्रह्मरन्ध्र सरस्?रुहोदरे नित्यलग्नमवद्?तमद्भुतम् | कु??अल्?विवरक्???अम??इत? द्व्?द??र्?अ सरस्?रुह? भजे ||
SKअह? द्व्?द??र्?अ द्व्?द?अदल? सरस्?रुह? पद्म? भजे | सरस्?रुह? कि? वि?इ??अम् ? कु??अल्?विवर क्???अम??इत? | कु??अल्य्?? विवर? म्?ल्?ध्?रपद्म्?त् सहस्रदलकमलकर्?इक्?न्तर्गतबिन्दुर्?पि-सद्??इव सन्निधौ गमनम्?र्ग?, तस्य क्???अ? तद्?ध्?रभ्?त? न्?ल?, चित्रि??न्???त्यर्थ? | तस्य म??इत? पद्मन्?लवत् चित्रि??न्??य्?? ?इरोभ्??अ?अमित्यर्थ? | तदग्रे द्व्?द??र्?अस्य सरस्?रुहस्य स्थितत्व्?त् भ्??अ?अमित्युक्ति? | पुन? किम्भ्?तम् ? ब्रह्मरन्ध्रसरस्?रुहोदरे नित्यलग्नम्, सहस्र्?रपद्म कर्?इक्?सम्?पे तदधोदे?ए नित्यमविन्?भ्?व सम्बन्धेन लग्न? स्थितमित्यर्थ? | पुन? किम्भ्?तम् ? अवदप्त? गौरम् | पुन? किम्भ्?तम् ? अद्भुत? मनोहरम् | तत्र प्?र्वोक्त क्रमे?अ ?इवर्?पि?अ? ?र्?गुर? ध्य्?येत् || ?अ?चक्र? परमे??नि | सद्??इवपुर? समम् | ?अक्तिपुर? महे??नि सद्??इवपुरोपरि || स एव निर्व्???ख्य कलोपरिगत? निर्व्??अ?अक्ते? पुरम् | ?इवस्थ्?न? ?ऐव्?? परमपुरु?अ? वै??अवग?? लपन्त्?ति प्र्?यो हरिहरपद? केचिदपरे || पद? देव्य्? देव्?चर?अयुगल्?नन्दरसिक्? | मुन्?न्द्र्? अप्यन्ये प्रक्?ति पुरु?अस्थ्?नममलम् || कु??अलिन्? प्रत्य्?वर्तन प्रक्?र? रमित्व्? ?अम्भुन्? स्?र्द्ध? कु??अल्?? परदेवत्?म् | म्?ल्?ध्?र? महे??नि सहस्र्?र्?त् सम्?नयेत् || ?अम्भुन्? त्?? पर्?? ?अक्तिमेक्?भ्?त्?? विचिन्तयेत् | ध्य्?येत् कु??अलिन्?? तत्र इ??अदेवस्वर्?पि??म् || सद्? ?ओ?अ?अवर्??य्?? प्?नोन्नतपयोधर्?म् | नवयौवनसम्पन्न्?? सर्व्?भर?अभ्??इत्?म् || प्?र्?अचन्द्रनिभ्?? रक्त्?? सद्? च�चललोचन्?म् | न्?न्?रत्नयुत्?? धन्य्?? प्?दे न्?पुर?ओभित्?म् || कि?किन्? च तथ्? क?य्?? रत्नक?क?अम??इत्?म् | कन्दर्पको?इ-ल्?व?य्?? सद्? मधुरह्?सिन्?म् || एव? ध्य्?त्व्? जपेन्मन्त्र? ?अतम??ओत्तर? ?इवे | म्?त्?क्?म्?लय्? जप्त्व्? ?ज्�?चक्र? सम्?नयेत् || तत्रेतरे?अ लि?गेन योजयेत् कु??अल्?? पर्?म् | ध्य्?त्व्? ब्रह्ममय्?? तत्र ?अतम??ओतर? जपेत् || ततो वि?उदौ त्?? न्?त्व्? ?इवेन सह योजयेत् | त्?मि??अदेवत्?? ध्य्?त्व्? जपेद??अ?अत? प्रिये ||
SKह्?त्पद्मे त्?? ततो न्?त्व्? ब्??एन सह योजयेत् | देव्?र्?प्?�च त्?? ध्य्?त्व्? जपेद??ओत्तर? ?अतम् || म?इप्?रे तु त्?? न्?त्व्? ?इवेन सह योजयेत् | देव्?र्?प्?? च त्?? ध्य्?त्व्? ?अतम??ओत्तर? जपेत् || स्व्?धि??ह्?ने ततो न्?त्व्? ?इवेन सह योजयेत् | योजयित्व्? जपेन्मन्त्र? देव्?? ध्य्?त्व्? प्रिय? वदे || ?अतम??ओत्तर? जप्त्व्? म्?ध्?ध्?रे तु त्?? नयेत् | तत्र लि?ग? स्वयम्भ्?�च ध्य्?येत्कुन्दसमप्रभम् || ?उक्लवर्?अ? चतुर्ब्?हु? प�चवक्त्र? त्रिलोचनम् | न्?न्?रत्नयुत? रम्य? स्?र्द्धत्रिवलय्?न्वितम् || प्रसन्नवदन? ??न्त? न्?लक??हविर्?जितम् | कपर्दिन? स्फुरत्सर्वभ्??अ? कुन्दसमप्रभम् || ?अ?चक्रे परमे??नि ध्य्?येज्जगन्मय्?? ?इव्?म् | भुज?गर्?पि??? देव्?? नित्य्?? कु??अलिन्?? पर्?म् || वि?अयन्तुमय्?? देव्?? स्?क्??दम्?तर्?पि??म् | अव्यक्तर्?पि??? दिव्य्?? ध्य्?नगम्य्?? वर्?नने || ध्य्?त्व्? जप्त्व्? च देवे?इ स्?क्??द् ब्रह्ममयो भवेत् | एव? द्व्?द?अध्? देवि य्?त्?य्?त? करोति य? || स मुक्त? सर्वप्?पेभ्यो मन्त्रसिद्धो न च्?न्यथ्? | यत्र तत्र म्?त?च्?य? ग?ग्?य्?? ?वपच्?लये | ब्रह्मविद् ब्रह्मभ्?य्?य कल्पते न्?न्यथ्? प्रिये || अथ प्र्?र्थन्? ? अह? देवि न च्?न्योऽस्मि ब्रह्मैव्?ह? न ?ओकभ्?क् | सच्चिद्?नन्दर्?पोऽह? नित्यमुक्त? स्वभ्?वव्?न् || ह्?दिस्थय्? परदेव्य्? प्रेरित?च करोम्यहम् | न मे कि�चिद् क्वचिद्व्?पि क्?त्यमस्ति जगत्त्रयये || ज्?न्?नि धर्म? न च मे प्रव्?त्तिज्?न्?म्यधर्म? न च मे निव्?त्ति? | त्वय्? मह्?देवि ह्?दिस्थ्?य्?ऽह? यथ्? यथ्?नियुक्तोऽस्मि तथ्? करोमि || त्रैलोक्य चैतन्यमयि त्रि?अक्ते ?र्?प्?र्वति त्वच्चर??ज्�?यैव | प्र्?त? समुत्थ्?य तव प्रिय्?र्थ? स?स्?रय्?त्र्?मनुवर्तयि?ये || एव? स�चिन्त्य मनस्? ग्?ह्?न्निर्गत्य स?यत? | ?चम्य प्रयतोमन्त्र्? दन्तध्?वनम्?चरेत् || दन्तध्?वनविधि? तन्त्रगन्धर्वे ? दन्तक्???हमख्?दित्व्? प्?जयेद्यस्तु देवत्?म् | तत्प्?ज्? विफल्? देवि म्?ते च नरक? व्रजेत् || मन्त्रतन्त्रप्रक्??ए ?
SKविध्?य्?व?यक? ?औचम्?च्?म? दन्तध्?वनम् | मुखप्रक्??लन्?द्?नि क्?त्व्? स्न्?न? सम्?चरेत् || अथ मुखप्रक्??लनमन्त्र? दक्?इ??म्?र्तौ ? क्ल्?? क्?मदेवसर्वजनप्रिय्?य नम? | क्ल्?म्?त्मक? क्?मदेव-सर्वजनमथ्?लिखेत् | प्रिय्?य ह्?दय्?न्तोऽय? मनुर्दन्तवि?उद्धये | चतुर्द??क्?अरैर्वक्त्र? क्??लयेत् सिद्धिहेतवे || स्न्?नविधि? य्?मले ? स्न्?नम्?ल्?? क्रिय्?? सर्व्?? ?रुतिस्म्?त्युदित्? न्???म् | तस्म्?त् स्न्?न? नि?एवेत ?र्?पु??य्?रोग्यवर्द्धनम् || मन्त्रतन्त्रप्रक्??ए ? अरु?एऽनुदितेमन्त्र्? त्?र्थे व्? विमले जले | वैदिक? स्न्?नम्?चर्य त्?न्त्रिक? स्न्?नम्?चरेत् || परख्?ते यत्कर्तव्य? तद्?ह वि?वस्?रे ? परख्?ते तु कर्तव्य? प�चपि??ओद्ध्?र? सद्? || स्न्?नमन्त्र? मन्त्रम्?ह ? उत्ति??होत्ति??ह प?क त्व? त्यज पु?य? परस्य च | प्?प्?नि विलय? य्?न्तु ??न्ति? देहि सद्? मम || न्?लतन्त्रे ? पुनर्निमज्य पयसि स?कल्प�च सम्?चरेत् | तत? स?कल्प्य मतिम्?न्न्?भिम्?त्रोदके स्थित? || प्र्?तये स्वे??अदेवस्य स्न्?न? सर्वत्र क्?रयेत् | इ??अदेवत्?प्?ज्?र्थ? स्न्?न? क्?र्य? जल्??अये || मन्त्रतन्त्रप्रक्??ए ? अस्त्रे??न्?य म्?त्स्न्?? वै त्रिभ्?ग? तत्र क्?रयेत् | भ्?गमेक? जले चैव क्?इपेन्मन्त्र? समुच्चरन् || एव? म्?द्ध्?दि न्?भ्यन्तर? प?हन् म्?ल? विलेपयेत् | ?ए?अन्तु प्?दन्?भ्यन्त? तथैव परिलेपयेत् || अ?गे ?अ?अ?ग? विन्यस्य प्र्???य्?मपुर?सरम् | ह्?न्मन्त्र्?? कु?अमुद्र्?भ्य्?? त्?थम्?व्?ह्य म??अल्?त् || म??अल्?त् स्?र्यम??अल्?त् || त्?र्थ्?व्?हनमन्त्र? ब्रह्म्???एय्?नि त्?र्थ्?नि करै? स्प्????नि तेरवे | तेन सत्येन मे देव त्?र्थ? देहि दिव्?कर || ओ? ग?गे च यमुने चैव गोद्?वरि सरस्वति | नर्मदे सिन्धु क्?वेरि जलेऽस्मिन् सन्निधि? कुरु || ओ? ?व्?हय्?मि देवि त्व्?? स्न्?न्?र्थमिह सुन्दरि | एहि ग?गे नमस्तुभ्य? सर्वत्?र्थ समन्विते || एवम्?व्?ह्य विधिवन् म्?लमन्त्रे?अ मन्त्रयेत् | ?मन्त्र्य्?ऽम्भसि स?योज्य सोमस्?र्य्?ग्निम??अलम् || विचिन्त्य मन्त्र्? तन्मध्ये निमज्जेन् म्?लमुच्चरन् | उत्थ्?य्?चम्य तत्प?च्?त् ?अ?अ?गन्य्?स स?युत? ||
SKअच्?मन मन्त्र? य्?मले ? ?त्मविद्य्? ?इवैस्तत्त्वैर्?च्?मेत् स्?धक्?ग्र??? | वह्निज्?य्?? परे दत्त्व्? ?उद्धेन प्?थस्? प्रिये | प्?थस्? जलेन | अभिमन्त्र्य ततस्तोय? म्?लमन्त्रे?अ स्?धक? | क्??लयेत् तेन वपु?अ? कलु?अ? कुम्भमुद्रय्? || ?त्म्?न? द?अध्? सिन्�चेन् मुद्रय्? कल??ख्यय्? | सप्तक्?त्वोऽभि?इ�चेद्व्? मनुन्? मन्त्रितैर्जलै? || ज्�?न्?र्?अवे ? व्?महस्ते क्?त्? मु??इर्दक्?अहस्तस्य प्?र्वति | कल??ख्य्? भवेन्मुद्र्? सर्वप्?पहर्? ?उभ्? || गौतम्?ये ? प्??अयित्व्?ऽम्बर? च्?रु प्रक्??ल्य्?चम्य व्?ग्यत? | ध्?रयेद्व्?सस्? ?उद्धे पर्?ध्?नोत्तर्?यके || अच्छिन्ने सद?ए ?उक्ले ?च्?मेत् प्??हस?स्थित? | मोक्??र्थ्? रक्तवस्त्रे द्वे भोग्?र्थ्? ?वेतव्?सस्? || ??क्ततिलकविधि? तिलक? रक्तगन्धेन चन्दनेन च व्? प्रिये | देव्यस्त्र? विलिखेद्भ्?ले त्?र्?ब्?ज? ततो ह्?दि | ?अक्ति? मध्यगत्?? कुर्य्?त् स्?धको नरपु?गव? || देव्यस्त्र? स्वस्वोप्?सित देव्यस्त्र? लिखेदित्यर्थ? | त्रिपु??रे?अविन्? कुर्य्?द् य्?? क्?�चिद्वैदिक्? क्रिय्?म् | स्? नि?फल्? भवेद् भ्?प ब्रह्म?अपि क्?त्? यदि || इति भवि?यपुर्??अवचन्?त् | क्?र्मपुर्??ए ? वै??अवो व्?थ ?ऐव्? व्? ??क्तो व्? सौर एव व्? | त्रिपु??रे?अ विन्? प्?ज्?? कुर्व्??ओ य्?त्यधोगतिम् || ?इवधर्मे ? सितेन भस्मन्? कुर्य्?ल्लल्??ए यस्त्रिपु??रकम् | सर्वप्?पविनिर्मुक्त? ?इवलोके मह्?यते || भस्मेत्युपलक्?अ?अम्, द्रव्य्?न्तरे??पि त्रिपु??र? क्?र्यम् | तथ्? च भवि?ये ? सर्वस्त्रिपु??रक? कुर्य्?द्यज्�अस्य भस्मन्? सद्? | तदल्?भे चन्दनेन म्?द्? व्? व्?रि??पि व्? || यत्कि�चित् कुरुते कर्म विन्? विप्रस्त्रिपु??रकम् | व्यर्थमेव भवेत्सर्व? बन्ध्य्?स्त्र्?स?गमो यथ्? || सच्छिद्र? कुरुते यस्तु पु??र? प?उमतिर्द्विज? | धर्म्?र्थक्?ममोक्?ए?उ तस्य छिद्र? प्रज्?यते || वैदिक्?? त्?न्त्रिक्?? सन्ध्य्?? तत? कुर्य्?त् सम्?हित? | अ??न्य? च कर? कुय्?त्सुवर्?अरजतै? क?ऐ? || सुवर्?अरजत�चैव जपप्?ज्?दि कर्मसु | ए?अ एव कु?अ? ??क्ते न दर्भो वनसम्भव? | तर्जन्य्?? रजत? ध्?र्य? स्वर्?अ? ध्?र्यमन्?मय्? ||
SKत्?न्त्रिक-सन्ध्य्? अथ सन्ध्य्? प्रवक्?य्?मि त्?न्त्रिक्?? सर्वसिद्धिद्?म् | उपवि?य्?चमेन्मन्त्र्? पयोमिहर्न्?बुद्बुदै? || तत?च ?त्मतत्त्व्?य विद्य्?तत्त्व्?य तत्परम् | ?इवतत्त्व्?य वै प्रोच्य क्रमे?अ वह्निवल्लभ्?म् || म्?ल्?न्तैरेभिर्?च्?मेत् प्?र्वोत्तरमुख? सुध्?? | ?चमन? तत? क्?त्व्? प्र्???य्?म? सम्?चरेत् || ?अ?अ?गन्य्?सम्?चर्य जले म्?ल? जपेद् द?अ | कु?एन तज्जल? भ्?मौ त्रिर्म्?र्ध्नि सप्त निक्?इपेत् || म्?लमुच्च्?र्य देवे?इ व्?महस्ते जल? तत? | ग्?ह्?त्व्? तज्जल? देवि तत्र म्?ल? समुच्चरन् || ?इवव्?युजलप्?थ्व्?वह्निब्?जैस्त्रिध्? पुन? | अभिमन्त्र्य च म्?लेन सप्तध्? तत्त्वमुद्रय्? || गलित्?म्बु क्?इपेन्म्?र्ध्नि ?ए?अ? दक्?ए निध्?य च | इ?अय्?क्??य देह्?न्त? क्??लितै? प्?पस�चयै? || क्???अवर्?अ? तदुदक? दक्?अन्??अय्? विरेचयेत् | दक्?अहस्ते तु तन्मन्त्र्? प्?पर्?प? विचिन्त्य च | पुरतो वज्रप्????ए प्रक्?इपेदस्त्रमन्त्रत? || तर्प?अविधि? जले यन्त्र? सम्?लिख्य तपयेत् परदेवत्?म् | प्?जयित्व्? तत्र देव्?? परिव्?र-समन्वित्?म् || गुरुप?क्त्?? प्रतर्प्य्?थ तर्पयेदि??अदेवत्?म् | उत्त्?भिमुखो भ्?त्व्? देव्?म्?त्र? प्रतर्पयेत् || त्?प्यत्?? जगत्?? म्?त्? भैरवस्त्?प्यत्?? तथ्? | म्?ल्?न्ते न्?म चोच्च्?र्य तर्पय्?मि तत? परम् || स्व्?ह्?न्ते तर्प?अ? त्वेव? प�चवि??अतिस?ख्यय्? | तर्प?अ�च प्रकुर्व्?त द्वित्?य्?न्तमथोच्चरन् || प�चवि??अतिस?ख्य्?त? द?अध्? व्? त्रिध्?पि व्? | एकैक्?�जलितोयेन परिव्?र्??स्तु तर्पयेत् || स्?र्य्?र्घद्?नम् दिने??य क्?इपेत्ति??हन्व्?रि?? च्?�जलित्रयम् | स्?र्यमन्त्र? समुच्चर्य ओ? ह्र्?? ह?स इत्यपि || म्?र्त??अभैरव्?येति प्रक्??अ?अक्तिस?युतम् | ?एन्त? समुच्च्?र्य ग्रहर्??इयुत्?य ?हद्वयम् || त्रिध्?�जलि? क्?इपेन्मन्त्र्? सिद्धये स्??ककर्म??म् | तोय्?�जलि? तत? क्?इप्त्व्? स्?र्यम??अलमध्यग्?म् || ?दित्यम??अले देव्?? ध्य्?येत् स्?र्यस्वर्?पि??म् | तत्तद्ग्?यत्र्?मुच्च्?र्य विस्?जेदनय्?ऽर्घकम् || ग्?यत्र्?? भ्?वयेद्देव्?? स्?य्?सनक्?त्??रय्?म् | प्र्?तर्मध्य्?ह्न स्?य्?ह्ने ध्य्?न? क्?त्व्? जपेत्सुध्?? ||
SKध्य्?न? क्?त्वेति | ब्?जत्रयर्?प्?? कु??अलिन्?? ध्य्?त्व्? जपेदित्यर्थ? || कु??अलिन्?ध्य्?नम् कु??अलिन्?? त्रिध्? देवि तथ्? ब्?जत्रय? त्रिध्? | त्?त्?य्?? कु??अल्?? म्?र्ध्नि नित्य्?नन्द स्वर्?पि??म् || व्?ग्भव? म्?लदे?ए च द्रवस्वर्?अनिभ? स्मरेत् | वह्निकु??अलिन्?? नित्य्?? ब्?ल्?र्कसद्???रु??म् || ह्?दये क्?मब्?ज�च स्?र्यको?इसमप्रभम् | स्?र्यकु??अलिन्?? तत्र नित्य्?नन्दस्वर्?पि??म् || भ्र्?मध्ये ?अक्तिब्?ज�च को?इचन्द्रसमप्रभम् | चन्द्रकु??अलिन्?? तत्र स्रवदम्?तविग्रह्?म् || ब्?जत्रयमय्?? बिन्दौ तुर्य्?? बिन्दुत्रय्?त्मिक्?म् | त्?र्यकु??अलिन्?? देवि केवल्?? ज्�?नविग्रह्?म् || प्र्?त?क्?ले म्?ल्?ध्?रे ? ब्?ल्?र्कम??अल्?भ्?स्?? भ्?नुवह्न्?न्दुलोचन्?म् | प्????कु?औ ?अर्???च्?प? ध्?रयन्त्?? ?इव्?? स्मरेत् || मध्य्?ह्ने ह्?त्पद्मे ? मध्य्?ह्ने चिन्तयेद्देव्?? नवयौवन ?ओभित्?म् | स्?य्?ह्ने भ्र्?मध्ये ? स्?यह्नि चिन्तयेद्देव्?? त्रैलोक्यैकप्रभ्?मय्?म् || नवयौवनसम्पन्न्?मुज्वल्?? परम्?? कल्?म् | र्?त्रौ सहस्र्?रे ? त्?मेव चिन्तयेद्र्?त्रौ भोग्? भोगपर्?य??म् || ग्?यत्र्?जपविधि? ग्?यत्र्?? प्रजपेद् विद्व्?न???वि??अतिस?ख्यय्? | मनस्? प्रजपेन्मन्त्र? ग्?यत्र्?�च वि?ए?अत? || ग्?न्धर्वे ? ग्?यन्त? ग्?यते यस्म्?द् ग्?यत्र्? तेन चोच्यते | मह्?प्?तकयुक्तोऽपि प्रजपेद्द?अध्? यदि || सत्य? सत्य? मह्?देवि मुक्तो भवति तत्क्?अ??त् | अ??ओत्तर ?अत्?व्?त्य्? ग्?यत्र्?? जपते यदि || सर्वप्?पविनिर्मुक्तो भवेत् प्?ज्?धिक्?रव्?न् | अ??ओत्तर ?अत्?व्?त्त्य्? म्?लमन्त्र�च स?जपेत् || ?र्द्रवस्त्रे?अ यत्कर्तव्य? तद्?ह य्?मले ? न्?भिम्?त्रोदके स्थित्व्? देव्?मर्कगत्?? स्मरन् | जपेद??ओत्तर?अत? लभते महत्?? ?रियम् || स?ह्?रमुद्रय्? चैव त्?र्थमुद्व्?स्य व्?ग्यत? | ततोमौन्? वि?उद्ध्?त्म्? ह्?दि विद्य्?? पर्?म्??अन् || अवहिर्म्?नसो भ्?त्व्? य्?गभ्?मिमथ्?वि?एत् | ?अक्तिसन्ध्य्? मय्? प्रोक्त्? कर्तव्य्? स्?धकोत्तमै? | सन्ध्य्?य्?? पतित्?य्?? तु ग्?यत्र्?? द?अध्? जपेत् || सन्ध्य्?�च त्रिक्?ल? कुर्य्?त् | तथ्? ?ऐव्?गमे ? प्र्?तर्मध्य्?ह्ने स्?य्?ह्ने सन्ध्य्?? कुर्य्?च्च मन्त्रवित् |
SKसन्ध्य्?य्?स्त्त्वकर?ए दो?अम्?ह च लक्?म्?कुल्?र्?अवे ? सन्ध्य्?? तु विह्?नो यो न द्?क्??फलम्?प्नुय्?त् || त्?न्त्रिक सन्ध्य्?य्?? ??द्रस्य्?प्यधिक्?र? | वि?उद्धे?वरे ? सन्ध्य्?त्रय? सद्? कुर्य्?द् ब्र्?ह्म?ओविधिप्?र्वकम् | तन्त्रोक्तविधि प्?र्व्?न्तु ??द्र? सन्ध्य्?? सम्?चरेत् || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? प्र्?त?क्?त्यनिर्?अयो न्?म चतुर्थोल्ल्?स? || ४ || प�चमोल्ल्?स? ?सननिर्?अय? ?सनस्य ग्र्?ह्यत्वम्?ह गौर्?य्?मले ? सलिले यदि क्?र्व्?त देवत्?न्?? प्रप्?जनम् | अथ्?प्य्?सन ?स्?नो नोत्यितस्तु तथ्?चरेत् || ?सन? कल्पयित्व्? तु मनस्? प्?जयेज्जले | ?सनस्थो जपेत् सम्य? नन्त्र्?र्थगत-म्?नस? || सम्मोहनतन्त्रे ? रक्त्?सनोपवि??अस्तु ल्?क्??रु?अ ग्?हेस्थित? | मन?कल्पितरक्ते व्? स्?धक? स्थिरम्?नस? || कु?अ(त्?ल) कम्बलवस्त्र्??इ सि?हव्य्?घ्रम्?ग्?जिनम् | कल्पयेद्?सन? ध्?म्?न् सौभ्?ग्यज्�?नवर्द्धनम् || कौ?एय? व्?थच्?र्म? व्? चैलतौलमथ्?पि व्? | ?अरपत्र? त्?लपत्र? कम्बल? दर्भम्?(द्?र व्?) सनम् || क्????जिने ज्�?नसिद्धिर्मुक्ति? स्य्?द्व्य्?घ्रचर्म?इ | क्????जिने ग्?हस्थ्?न्?? न्?धिक्?र? कथ�चन || न्?द्?क्?इतो वि?एज्ज्?तु क्???अस्?र्?जिने ग्?ह्? | वि?एद्यतिर्वनस्थ?च ब्रह्मच्?र्? तु भिक्?उक? || वस्त्र्?सने व्य्?धिन्??अ? कम्बले दु?खन्??अनम् | जपध्य्?नतपोह्?निर्वस्त्र्?सन? करोति य? || अत्र ? वस्त्रनि?एध? केवलवस्त्र्?सनपर? अन्यथ्? विरोध्?पत्ते? | कु??सने भवेद्?युर्मोक्?अ? स्य्?द्व्य्?घ्रचर्म?इ || अजिने च भवेत् पुत्र्? कम्बले सिद्धिरुत्तम्? | ??न्तिके धवल? प्रोक्त? सर्व्?थ?चित्र-कम्बले || स्य्?त्पौ??इके तु कौ?एय? कम्बले दु?खमोचनम् | त्रिपुर्?प्?जने ?अस्त? रक्तकम्बलम्?सनम् || नैतद् द्विहस्ततो द्?र्घ? स्?र्द्धहस्त्?न्न विस्त्?तम् | न त्र्य?गुल्?त् समुच्छ्र्?य? प्?ज्?कर्म?इ स?ग्रहे | ?सन�च तत? कुर्य्?न्न्?तिन्?च? न चोच्छ्रितम् || तन्त्रगन्धर्वे - ध्?र?य्?? दु?खसम्भ्?तिदौर्भ्?ग्य? द्?रुज्?सने ||
SK?म्रनिम्बकदम्ब्?न्?म्?सन? व??अन्??अनम् | बकुलेकि??उके चैव पनसे च हत?र्?क? || व??ए??अक्??मधर??त्??अपल्लवनिर्मितम् | वर्जयेद्?सन? मन्त्र्? द्?रिद्र्यव्य्?धिदु?खदम् || द्?रुज्?सन? वि?ए?अयति गन्धर्वतन्त्रे ? ग्?म्भ्?र्?निर्मित? ?अस्त? न्?न्यद्द्?रुमय? ?उभम् | चतुर्वि????गुल? द्?र्घ? कुर्य्?त्क्???ह्??अन? ?इवे || ?ओ?अ???गुलविस्त्?र्?अमुच्छ्र्?ये चतुर?गुलम् | कम्बल? चर्मज? चैल? मह्?म्?य्? प्रप्?जने || प्र?अस्तम्?सन? प्रोक्त? क्?म्?ख्य्?य्?स्तथैव च | त्रिपुर्?य्??च रुद्रस्य वि??ओ?च्?पि कु??सनम् || त्???सने य?ओह्?नि? पल्लवे चित्तविभ्रम? | यथोक्तम्?सन? कुर्य्?त् सर्वसिद्धिप्रद्?यकम् | न यथे???सनो भ्?य्?त् प्?ज्?कर्म?इ स्?धक? || अन्यत्र ? व????मधर??द्?रुत्??अपल्लवनिर्मितम् | वर्जयेद्?सन? ध्?म्?न्द्?रिद्र्यव्य्?धिदु?खदम् || तन्त्रे ? क्???ह्?सने भवेद्रोग्? व??ए व??अक्?अयो भवेत् | ?ऐल्?सने च व्?गरोध? पल्लवे मतिवभ्रम? || अन्यत्र्?पि ? धर?य्?? ?ओकस?युक्त? क्???हे व्यर्थ?रमो भवेत् || पद्म्?सन? स्वस्तिक्?ख्य? भद्र? वज्र्?सन? तथ्? | व्?र्?सनमिति प्रोक्त? क्रम्?द्?सनप�चकम् || पद्म्?सन्?दिलक्?अ?अम् सव्य? प्?दमुप्?द्?य दक्?ओपरि न्यसेत्तत? | तथैव दक्?इ?अ? सव्यस्योपरि च विध्?नवित् || वि??अम्य को?य्?? प्?र्??? तु न्?स्?ग्रन्यस्तलोचन? | पद्म्?सनमिद? प्रोक्त? जपकर्मसु ?अस्यते || ज्?न्?र्वोरन्तरे सम्यक्क्?त्व्? प्?दतले उभे | ?जुक्?यो वि?एन्मन्त्र्? स्वस्तिक? तत्प्रचक्?अते || स्?वन्य्?? प्?र्?वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्म? सुनि?चलम् | व्??अ??ध? प्?दप्?र्?वौ प्??इभ्य्?? परिबन्धयेत् || भद्र्?सन? समुद्दि??अ? मुनिभि? परिकल्पितम् | ?र्वो? प्?दौ क्रम्?न्न्यस्य ज्?न्वो? प्रत्य?मुख्??गुल्? || करौ निदध्य्?द्?ख्य्?त? वज्र्?सनमनुत्तमम् | एकप्?दमध? क्?त्व्? विन्यस्योरौ तथेतरम् | ?जुक्?यो वि?एन्मन्त्रि व्?र्?सनमित्?रितम् || नित्यनैमित्तिकप्?ज्?कथनम् रुद्रय्?मले ? नित्य? नैमित्तिक? क्?म्य? त्रिविध? प्?जन? स्म्?तम् | न्?लतन्त्रे ? नित्यसेव्?रतो मन्त्र्? कुर्य्?न्नैमित्तिक्?र्चनम् ||
SKनित्यप्?ज्?? दिव्? कुर्य्?त् र्?त्रौ नैमित्तिक्?र्चनम् | उभयो? क्?म्यकर्म्??इ चेति ?अस्त्रस्य नि?चय? || रुद्रय्?मले ? र्?त्रौ प्?ज्?? सद्? कुर्य्?त् र्?त्रौ सिद्धिर्न स??अय? | सफल्? रजन्?प्?ज्? दिव्?प्?ज्? च नि?फल्? || ?अक्तिमन्त्र? जपेद्र्?त्रौ विन्?पि प्?जन? ?उचि? | वि?ए?अतो नि??थे तु तत्र्?ऽतिफलदो जप? || ब्?हत्तो?अलतन्त्रे ? नि??य्?? योऽर्चयेत्क्?ल्?? त्?र्?�च भैरव्?? तथ्? | ?समुद्रक्?इत्???न्?? ?रे??हो भवति सर्वथ्? || अन्यत्र्?पि ? म्?त?ग्?�च तथ्? ब्?ल्?? च्?मु???? छिन्नमस्तक्?म् | भद्रक्?ल्?�च दुर्ग्?�च जयदुर्ग्?? तथैव च || ?स्?? जप?च प्?ज्? च र्?त्रौ चेत् क्रियते सद्? | भुक्त्व्? भोग्?न?ए????च सोऽव?य? य्?ति रुद्रत्?म् || समय्?तन्त्रे ? दिव्? प्रप्?जन? देवि यथोक्तफलद? भवेत् | प्?जन? लक्?अ?अ-गु?इत? नि?इ न्?रजलोचने || अर्धर्?त्र्?त्पर? यच्च मुह्?र्तद्वयमेव हि | स्? मह्?र्?त्रिरुद्दि??? क्?त्? तत्र्?ऽक्?अय्? भवेत् || तन्त्रे ? गते तु प्रथमे य्?मे त्?त्?य? प्रहर्?वधि | नि??य्?�च प्रजप्तव्य? र्?त्रि?ए?ए जपेन्न हि || प्रक?ए ?अक्तिमन्त्रे च ह्?नि? स्य्?दुत्तरोत्तरम् | प?उसन्निधिम्?स्?द्य नित्यप्?ज्?�च वर्जयेत् || प?ओरग्रे क्?त्?य्? तु प्रम्?द्?न्नि?फल्? भवेत् | निजस्?धकमध्ये तु न गोप्तव्य्? कद्?चन || समय्?मन्त्रे ? स्त्र्?सम्?पे क्?त्?प्?ज्? जप?च परमे?वरि | क्?मर्?प्?च्छतगु??वव्ययौ समुद्?रितौ || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्? म्?सननिर्?अयो न्?म प�चमोल्ल्?स? || ५ || ?अ??होल्ल्?स? अन्तर्य्?गविधि? ?त्मस्थ्?? देवत्?? त्यक्त्व्? वहिर्देव? विचिन्तयेत् | करस्थ? कौस्तुभ? त्यक्त्व्? भ्रमन्ते क्?चत्???अय्? || प्रत्यक्??क्?त्य ह्?दये वहिस्थ्?? प्?जयेच्छिव्?म् | यस्य यस्य च देवस्य यथ्? भ्??अ?अव्?हनम् || तदेव प्?जने तस्य चिन्तयेत् परमे?वरि | अथ्?न्तर्यजन? वक्?ये येन देवमयो भवेत् || सुख्?सने सम्?स्?न? प्र्??मुखो व्?प्युद?मुख? || स्वक्?य ह्?दये ध्य्?येत्सुध्?स्?गर मुत्तमम् |
SKरत्नद्व्?प�च तन्मध्ये सुवर्?अव्?लुक्?मयम् || मन्द्?रप्?रिज्?त्?द्यै? कल्पव्?क्?ऐ? सुपु?पितै? | सर्वतोऽल?क्?त? दिव्यैर्नित्यपु?पफलैर्द्रमै? || न्?न्?सुगन्धिकुसुम गन्ध्?मोदितदि?मुखम् | उत्फुल्लकुसुम्?मोद प्रह्???अभ्??गस?कुलम् || क्?जत्कोकिलस?घेन व्?च्?लितदिगन्तरम् | सर्वतोऽल?क्?त? दिव्यैर्लसत्क्?�चनप?कजै? | मौक्तिकै? कुसुमै? स्रग्भिर्दुक्?लै? स्वर्?अतोर?ऐ? || तन्मध्ये स?स्मरेद्देवि कल्पव्?क्?अ? मनोहरम् | चतुर्वेदचतु???ख? गु?अत्रयसमन्वितम् || प्?त? क्???अ? तथ्? ?वेत? रक्त? पु?प�च सुन्दरि | हरित�च विचित्र�च न्?न्?पु?पैर्विर्?जितम् || कोकिलैर्भ्रमरैर्देवि ?ओभित? बहुपक्?इभि? | एव? कल्पद्रुम? ध्य्?त्व्? तदधोरत्नवेदिक्?म् || तत्रोपरि महद्व्य्?प्त? चिन्तयेद्रत्नम??अपम् | उद्यद्?दित्यस?क्??अ? रत्नसोप्?नम??इतम् || ध्वज्?वल्?सम्?क्?र्?अ? चतुर्द्व्?रसमन्वितम् | न्?न्?रत्न्?दि?ओभ्??ह्य? रत्नप्र्?क्?रम??इतम् || स्वस्वस्थ्?नस्थितैस्तैस्तैर्लोकप्?लैरधि??हितम् | मिद्धच्?र?अगन्धर्वैर्विद्य्?धरमहोरगै? || किन्नरैरप्सरोभि?च क्र्??अद्भि? परिव्?रितम् | न्?त्यव्?दित्रनिरतैरमरस्त्र्?ग?ऐर्युतम् || कि?किन्?ज्?लसन्नद्धपत्?क्?भिरल?क्?तम् | मह्?म्??इक्यवैद्?र्य रत्नच्?मर भ्??इतम् || स्थ्?लमुक्त्?फलोन्नद्धवित्?नसमल?क्?तम् | चन्दन्?गुरुक्??म्?रम्?गन्?भिविलेपितम् || तन्मध्ये स?स्मरेद्देवि मह्?म्??इक्यवेदिक्?म् | उद्यदर्केन्दुकिर??? चतु?को?अ प्र?ओभित्?म् | ध्य्?येत्सि?ह्?सन? तत्र ब्रह्मवि??उ?इव्?त्मकम् | सि?ह्?सने महे??नि प्रस्?नतुलिक्?? न्यसेत् || प्??हप्?ज्?? तत? कुर्य्?त् स्वकल्पोक्तक्रमे?अ तु | प्रेतपद्म्?सने तत्र चिन्तयेत्परमे?वर्?म् || ?त्मनोऽभ्???अदेवत्? ध्य्?न? कुर्य्?दित्यर्थ? | ?र्?रत्नपदुके दत्त्व्? न्?त्व्? त्?? स्न्?नमन्दिरे | सि?ह्?सनोपवि??ह्?य्?मुद्वर्तन? सम्?चरेत् || कर्प्?र्?गुरुकस्त्?र्य्? तथ्? म्?गमदेन च | कु?कुमरोचन्?च्??ऐर्न्?न्?गन्धसमन्वितै? || देव्य्?? उद्वर्जन? क्?त्व्? गन्धतैल? विलेपयेत् | देव्?न्?? ?अतस्?हस्रै? स्वर्?अकुम्भसहस्रकै? ||
SK?न्?य व्?रि?? स्न्?त्?? चिन्तयेत्परदेवत्?म् | दुक्?लैर्म्?जित? ग्?त्र? दुक्?ले परिध्?प्य च || क?कत्य्? के?अ? स?स्क्?त्य विधिवद् बन्धन? चरेत् | प??अगुच्छ? के?अप्??ए न्?न्?रत्नोप?ओभितम् || लल्??ए तिलक? दद्य्?त् सिन्द्?र? के?अम्ध्यके | न्?गेन्द्रदन्तखचित? ?अ?ख? दद्य्?न्मनोहरम् || हस्ते केय्?रक�चैव क?क?अ? क?अक? तथ्? | स्वर्???गुर्?यक? दद्य्?न्न्?त्?रत्नोप?ओभितम् || प्?दयोर्न्?पुर? दद्य्?न्?स्?ग्रे गजमौक्तिकम् | निवेदयेद्यथ्? ?अक्त्य्? पु?पम्?ल्?�च भ्??अ?अम् || सर्व्??गे लेपन? कुर्य्?द् गन्धचन्दनसिह्लकै? | क्?�चन्?�चितक�चुल्??ओभित्?? ह्?दयोपरि || सम्?धौ चिन्तयेद्देव्?? भ्?त?उद्ध्य्?दिक? चरेत् | न्य्?सज्?ल? विध्?य्?थ सम्?धौ प्?जयेत्सद्? || ?ओ?अ?ऐरुपच्?रैस्तु ह्?दिस्थ्?? प्?जयेच्छिव्?म् | रत्नसि?ह्?सन? दद्य्?त्स्व्?गत? कु?अल? वदेत् || प्?द्य�च प्?दयोर्देवि ?इवस्यर्घ्य? निवेदयेत् | पर्?म्?त्?चमन? प्रदद्य्?न्मुखप?कजे || मधुपर्क? मुखे दद्य्?त् त्रिध्? त्व्?चमन? मुखे | हेमप्?त्रगत? दिव्य? परम्?न्न? परि?क्?तम् || कपिल्?धतस?युक्तमन्न? व्य�जनस?युतम् | (सुध्?म्बुधि? म्??स?ऐल? मत्स्यर्??इ? फल्?नि च ||) भक्?य? भोज्य? तथ्? लेह्य? चर्व्य? च्??य? तथैव च | सकर्प्?र�च त्?म्ब्?ल? म्?नस? परिकल्पयेत् || ?वर?अ? ततो देव्य्?? प्?जयेन्मनसैव हि | इत्थमन्त? सम्?र्?ध्यमनसैव जपेन्मनुम् || सहस्र्?दि जप? क्?त्व्? देव्यै सोदकमर्पयेत् | ब्रह्म्? वि??उ?च रुद्र?च ??वर?च सद्??इव? || एत एव मह्?देव्य्?? पर्य?क? समुद्?ह्?तम् || पय? फेननिभ्?? ?अय्य्?? न्?न्?पु?पोप?ओभित्?म् | पु?प?अय्य्?�च स?स्कुर्य्?त् तत्र देव्?? सुरे?वर्?म् || चिन्तयेत् स्?धको योग्? न्?न्?सुखविल्?सिन्?म् | न्?त्यग्?तै? सव्?द्य?च तो?अयेत्परमे?वर्?म् || ततो होम? प्रकुर्व्?त प्?ज्?स्?र्थक्यतवे || अथ होम? प्रवक्?य्?मि येन चिन्मयत्?? लभेत् | अथ्?ध्?रमये कु??ए चिदग्नौ होमयेत्तत? || ?त्म्?न्तर्?त्मपरमज्�?न्?त्म्?न? प्रक्?र्तित्?? | एतद्र्?पन्तु चित्कु??अ? चतुरस्र? विभ्?वयेत् ||
SK?नन्दमेखल्?रभ्य्?? बिन्दुत्रिवलय्??कितम् | अर्द्धम्?त्र्?योनिर्?प? ब्रह्म्?नन्दमय भवेत् || न्???मि??? व्?मभ्?गे दक्?इ?ए पि?गल्?? पुन? | सु?उम्न्?? मध्यतोध्य्?त्व्? कुर्य्?द्धोभ? यथ्?विधि || धर्म्?धमौ स्?धकेन्द्रो हवि??वेन प्रकल्पयेत् | म्?लमन्त्र? समुच्च्?र्य तत? ?लोक? जपेदमुम् || न्?भौ चैतन्यर्?प्?ग्नौ हवि?? मनस्? स्रुच्? | ज्�?न प्रद्?पिते नित्यमक्?अव्?त्त्?र्जुहोम्यहम् || वह्निज्?य्?न्तमन्त्रे?अ दद्य्?च्च प्रथम्?हुतिम् | म्?लमन्त्रोपरि ?लोकमपर? प्रप?हेदमुम् || धर्म्?धर्महविर्द्?प्ति ?त्म्?ग्नौ मनस्? स्रुच्? | सु?उम्न्? वर्त्मन्? नित्यमक्?अव्?त्त्?र्जुहोम्यहम् || वह्निज्?य्?न्तमन्त्रे?अ द्वित्?य्?हुतिम्?दि?एत् | म्?लमन्त्र? समुच्च्?र्य तत? ?लोक? जपेदमुम् || प्रक्???क्??अहस्त्?भ्य्?मवलम्ब्योन्मन्?स्रुच्? | ज्�?न प्रद्?पिते नित्यमक्?अव्?त्?र्जुहोम्यहम् || वह्निज्?य्?न्तमन्त्रे?अ त्?त्?य्?हुतिम्?चरेत् | म्?लमन्त्र? समुच्च्?र्य तत? ?लोक? जपेदमुम् || अन्तर्निरन्तरमनिन्धन मेधम्?नेमोह्?न्धक्?रपरिपन्थिनि सम्विदग्नौ | कस्मि??चिदद्भुतमर्?चिविक्??अभ्?मौ वि?व? जुहोमि वसुध्?दि?इव्?वस्?नम् || स्व्?ह्?न्तोन्?ऽमुन्? हुत्व्? प्?र्??हुतिरनन्तरम् | म्?लमन्त्र? समुच्च्?र्य ?लोकमेतमुद्?रयेत् || अह(इद)न्त्?प्?त्रभरितमिद (अह)न्त्? परम्?म्?तम् | पर्?हन्त्?मये वह्नौ प्?र्?अहोम? जुहोम्यहम् || वह्निज्?य्?न्तमन्त्रे?अ दद्य्?त्प�च (प्?र्??)हुति? प्रिये | इत्यन्तर्यजन? क्?त्व्? स्?क्??द् ब्रह्ममयो भवेत् || एवमेव प्?जयन्ति ग्?हस्थ्?? परमे?वर्?म् | योगिनो मुनय?चैव प्?जयन्ति सद्?प्रिये || केवल? म्?नसेनैव नहि सिद्धो भवेत् ग्?ह्? | सव्?ह्येन तु तेनैव सिद्धो भवति यद् ग्?ह्? || भ्?त?उद्धौ ? सर्व्?सु व्?ह्यप्?ज्?सु अन्त?प्?ज्? विध्?यते | अत? प्?ज्?? विन्? नैव व्?ह्यप्?ज्?फल? लभेत् || स्?न्त?प्?ज्? महे??नि व्?ह्य्? को?इफलप्रद्? | कि? तस्य व्?ह्यप्?ज्?य्?? सर्व? व्यर्थ? कदर्थनम् || उपच्?र्?द्यभ्?वे च व्?ह्यप्?ज्? कदर्थनम् | विनोपच्?रैर्य्? प्?ज्? स्? प्?ज्? नि?फल्? भवेत् || तन्त्र्?न्तरे ?
SKयदि व्?ह्य्?र्चन्? द्रव्यसम्पत्तिरपि वर्तते | अन्तर्य्?ग? विध्?येत्थ? वहियगिविधि? चरेत् || य्?मले ? अर्च्?भ्?वे महे??नि ह्?दये प्?जयेच्छिव्?म् | सर्वप्?ज्?फल? देवि प्र्?प्नोति स्?धक? प्रिये || तन्त्रगन्धर्वे ? मनस्?यि मह्?देव्यै नैवेद्य? द्?यते यदि | योनरो भक्तिस?युक्तो द्?र्घ्?यु? ससुध्? भवेत् || म्?ल्य? पद्मसहस्रस्य मनस्?य? प्रयच्छति | कल्पको?इसहस्र्??इकल्पको?इ?अत्?नि च || स्थित्व्? देव्?पुरे ?र्?म्?न्स्?र्व भौमो भवेत् क्?इतौ | मनस्?ऽपि मह्?देव्यै यस्तु कुर्य्?त्प्रदक्?इ??म् | स दक्?इ?ए यमग्?हे नरक्??इ न प?यति || मनस्?ऽपि मह्?देव्य्? यो भक्त्य्? कुरुते नतिम् | सोऽपि लोक्?न् विनिर्जित्य देव्?लोके मह्?यते || मह्?म्?ये मह्?देव्?मर्चय्?मि च भक्तित? | न्?न्?विधैस्तु नैवेद्यैरिति चिन्त्?कुलस्तु य? || नैवेद्य? देहि मे भ्?तरिति यो भ्?वयेन् मुहु? | सोऽपि लोक्?न् विनिर्जित्य देव्?लोके मह्?यते || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरि क्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्??मन्तयगिविधिर्न्?म ?अ??होल्ल्?स? || ६ || सप्तमोल्ल्?स? गुप्ततन्त्रोक्तप्?ज्?विधि? अथ्?नन्दमय्?प्?ज्?? वक्?य्?मि गुप्तत्?न्त्रिक्?म् | य्?? क्?त्व्? ?इवस्?युज्य? लभेते स्?धकोत्तम? || प्?ज्?ग्?ह? सम्?स्?द्य स्?धकेन्द्रो महे?वरि | प्रथम? जलम्?न्?य प्?दप्रक्??लन? चरेत् || उत्तर्?भिमुखो भ्?त्व्? प्?दप्रक्??लन? चरेत् | दिव्? प्?र्वमुखो भ्?त्व्? र्?त्रौ कुर्य्?दुद?मुख? || देव्य्?? प्?ज्य्?? ?इवस्य्?पि सद्? कुर्य्?दुद?मुख? | प्र?अव? प्?र्वमुच्च्?र्य तदिति च पद? तत? || सदिति तु समुच्च्?र्य कर्म कुर्य्?द् विचक्?अ?अ? | स्मर??त्कर्म??म्?द्ये ब्रह्मभ्?य्?य कल्पते || सर्वद्? सर्वक्?र्ये?उ त्?न्त्रिके वैदिके तथ्? | स्वविद्य्?? स?स्मरन्कुर्य्?त्क्रिय्?? सर्वप्रचोदित्?म् || स्थ्?न?ओधनम्?ह गन्धर्वतन्त्रे ? व्?क्?अ?अ? वर्मब्?जेन य्?गभ्?मे? सम्?रितम् | प्रोक्?अ?अ? च्?स्त्रमन्त्रे?अ य्?गभ्?मे? सम्?चरेत् || अज्�?तद्??इत? स्थ्?न? म्?र्जन्?दौ च यद्भवेद् | एवम्?द्?नि सर्व्??इ न?येत् तल्लोकन्?त् प्रिये ||
SKमधुकै?अभयोर्भेद? स?घ्?तैर्द्??हत्?? गत्? | मेदिन्? सर्वद्?ऽ?उद्ध्? सुरप्?ज्?सु सर्वत? || तस्य दो?अस्य मोक्??य क्?मब्?ज? क्?इतौलिखेत् | प�चवर्?अरज?चित्र्? न्?न्?गन्धसमन्वित्? || पु?पप्रकरस?क्?र्?? घ???च्?मरभ्??इत्? | ब्?ल्?र्कसद्??? रम्य्? मन?सन्तो?अक्?रि?? || एव? भ्?मि? सम्??रित्? प्?जयेत्परमे?वर्?म् | मन्त्रैर्?चमन? कुर्य्?द्देव्?? ध्य्?त्व्? ह्?दम्बुजे | प्??हे चोपवि?एद्देवि बद्ध्? व्?र्?सन्?दिकम् || द्रव्य्?स्?दनम् उपवि?य ततो मन्त्र्? द्रव्य्??इ स्थ्?पयेत्पुर? | गन्धपु?प्?क्?अत्?द्???च दक्?ए द्?प्???च सर्वत? || नैवेद्य? दक्?इ?ए व्?मे पुरतो व्? न प्???हत? | घ्?तद्?प? दक्?इ?ए तु तैलद्?प? तु व्?मत? || व्?मतस्तु तथ्? ध्?पमग्रे व्? न तु दक्?इ?ए | निवेदयेत् पुरोभ्?गे गन्ध? पु?प�च भ्??अ?अम् || सर्व? स्वदक्?इ?ए स्थ्?प्य? व्?मे च्?र्घ्य? निवे?अयेत् | स्थ्?पयेच्च्?र्व्य? च्??य्?दि नैवेद्य्?द्?नि सन्निधौ || करयोक्??लन्?र्थ्?य प्???हे प्?त्र? विनिर्दि?एत् | स्वस्य ?अक्त्य्?नुर्?पे?अ सर्व? सम्प्?द्य यत्नत? || प्?ज्? द्रव्य्??इ स?प्रोक्?य म्?लमन्त्रे?अ स्?धक? | दर्?अयेद्धेनुमुद्र्?�च द्रव्य?उद्धिरित्?रित्? || अन्न? नैवेद्य्?दिक? यत्पु?पगन्ध्?दिक�च यत् | सर्वम्?च्छ्?दित? क्?र्य? य्?वन्न्?व्?हयेत् परम् || र्?क्?अस्?? प्रतिग्?ह्?अन्ति निर्?च्छ्?दनक? यत? || अथ ??न्तिकुम्भप्रम्??अम् ???न्य्?स्थ्?पयेत्कुम्भ? स्वर्?अत्?म्र्?दिनिर्मितम् | दैर्घ्य? वि??अत्य?गुलन्तु ग्र्?व्? वेद्??गुल्?न्वित्? || व्???हम????गुल? प्रोक्त? मुखम????गुल? स्म्?तम् | द्??ह? समतल? क्?र्यो म्?न? तत्परिक्?र्तितम् || कुम्भविध्?नन्तु गौतम्?ये ? हैम? रौप्य? तथ्? त्?म्र? म्?र्त्तिक? व्? स्व?अक्तित? | वित्त???ह्य? न कर्तव्य? क्?ते नै?फल्यम्?प्नुय्?त् || ?अ?त्रि??अद?गुल? कुम्भ? विस्त्?रोन्नति??लिनम् | ?ओ?अ?अ? द्व्?द?अ? व्?पि ततो न्य्?न? न क्?रयेत् || प्रोक्?अ??स्थ्?पनम्?ह ग्?न्धर्वे ? प्?त्रमस्त्र्?म्बुभि? प्रोक्?य दक्?इ?ए स्थ्?पयेत्तत? | ?उद्धोदकेन सम्प्?ज्य म्?लमन्त्र? जपेत्सुध्?? || प्रोक्?अयेत्तेन सकल? प्रोक्?अ?ओस्थने व्?रि?? |
SK?ध्?रस्थ जल?ओधनम्?ह ग्?न्धर्वे ? म??अल? व्? मत? क्?त्व्? जलेन चतुरस्रकम् | ओ? व?अ?क्?र मन्त्रे?अ स्?ध्?र? म??अले घ?अम् || स्थ्?पयेत्तत्र वह्नयर्कसोम्?न्?? म??अल? भजेत् | ?नन्दभैरव? तत्र यजेद्?नन्दभैरव्?म् || यदन्यद्द्??अ?अ? प्?त्रे तोये व्?ऽज्�?नतो भवेत् | तत्सर्व? न्??अम्?य्?ति प्?ज्?र्य? तज्जल? भवेत् || अर्घ्यस्थ्?पनक्रम? अर्घ्य द्व्?रि परि?क्?र्य तत्क्रम? कथ्यतेऽधुन्? | अस्त्रे?अ प्?त्र? प्रक्??ल्य ह्?न्मन्त्रे?अ प्रप्?रयेत् | मन्त्रयेत्प्र?अवेनैव स्?म्?न्य्?र्घ्यमिद? स्म्?तम् || प्र?अवेन द?अध्? मन्त्रयेदित्यर्थ? | फ?? द्व्?र? च स?प्रोक्?य ब्?जेन्?म्यर्च्चयेत् सुर्?न् | ग्?? व्?? क्??? य्?? च ब्?ज्?नि उक्त्?नि परमे?वरि || ग?ए?अव?अकक्?एत्रप्?ल्???च योगिन्?? तथ्? | प्?जयेत्स्?धक?रे??ह? प्रतिद्व्?रमिति क्रम्?त् || वि?वस्?रे ? ए??? प्?ज्?? विल?घ्य्?थ न सिद्धि? स्य्?द्युगेयुगे | उत्तर्?दिक्रमे?ऐव द्व्?रप्?ल्?न् समर्चयेत् | ब्रह्म्??अ? व्?स्तुदेव? च प्?जयेद्ग्?हमध्येत? || ?सने म??अल? क्?त्व्? सम्प्?ज्य्?रोहयेत्सुध्?? | वि?ओध्य व्?क्क्?यचित्त? भ्?मि? सम्यग्वि?ओधयेत् || ओ? पवित्र वज्रभ्?मे हु? फ? स्व्?हेति मन्त्रत? | अनन्तर? दे?इकेन्द्रो दिव्यद्???य्?ऽवलोकनै? || दिव्य्?नुत्स्?रयेद्विघ्न्?नस्त्र्?द्भि?च्?न्तर्?क्?अग्?न् | प्?र्??इघ्?तैस्त्रिभिर्भौम्?निति विघ्न्?न् निव्?रयेत् || वि?वस्?रे ? अनिमे?अद्??? द्???इर्दिव्यद्???इ? प्रक्?र्तित्? | कर?उद्धिर्य्?मले ? प्र्?गुद्?च्?मुखो व्?पि सपु?पैर्म्?र्जयेत्करम् | म्?लमुच्च्?र्य देवे?इ तत्पु?प? व्?मतस्त्यजेत् || मन्त्रम्?ह य्?मले ? भौतिक? ?अ?इकल्?समन्वितो वह्नि?ओ?अ?अकल्? समन्वित? | ?एन्तमन्त्रमथ फ?समन्वित? ?उद्धये मनुरय? प्रक्?र्तित? || भौतिक? ऐक्?र? | ?अ?इकल्? न्?दबिन्दु? | वह्न्?रेफ? | ?ओ?अ?अकल्? अ? क्?र? | तेन ऐ? र? अस्त्र्?य फ? | ?उद्धये कर?उद्धये इत्यर्थ? || तन्त्रगन्धर्वेऽपि ? ग्?ह्?त्व्? रक्तपु?प�च सगन्ध? स्?धकोत्तम? | अनेनैव तु मन्त्रे?अ पु?प? हस्ततलस्थितम् ||
SKसम्म्?र्ज्य सव्यहस्तेन व्?मेन प्??इन्? तत? | निर्म�छयक्?मब्?जेन जिघ्रेत्तद्व्?ग्भवेन च | ऐ??न्य्?? निक्?इपेदेतच्छरब्?जेन प्?र्वति || तत्रैव ? म्?र्जन्?त्करयो? ?उद्धिर्निर्म�छन्?तु प्???हयो? | ग्र्???द्देव्??च तु?यन्ति त्?र्थ्?न्?�च सम्?गम? || क्?एप??त् सर्वविघ्न्?न्?? द्?रस?स्थ्?नमेव च | दुर्गन्धोच्छि??अ स?स्पर्?अद्??अ?अ? करयोस्तु यत् || अज्�?तर्?प? तत्सर्व? न्??अयेद् विधिन्?ऽमुन्? | कर?उद्धि? सम्?स्?द्य कुर्य्?त्त्?लत्रय तत? || ?र्ध्वोर्ध्वमस्त्रमस्त्रे?अ दिग्बन्धमपि दे?इक? | हु? फ? स्व्?हेति मन्त्रे?अ ?र्ध्वोर्ध्वमप्यधस्तथ्? || कुर्य्?त्त्?लत्रय? मन्त्र्? दिग्बन्धनमथ्?चरेत् | दिग्बन्धन? छो?इक्?मिर्द?अभि? क्?रयेत्सुध्?? || विघ्नमुत्स्?रित? क्?त्व्? तत? पु?प? वि?ओधयेत् | क्?त्?�जलिपु?ओ भ्?त्व्? व्?मे गुरुत्रय? नमेत् || गुरुत्रयम्?हतन्त्रे ? गुरु? पर?गुरु�चैव पर्?परगुरु? तथ्? | दक्?अप्?र्?वे ग?ए?अ�च म्?र्ध्नि देव्?? नयेत् प्रिये || गन्धर्वे ? भ्?त?उद्धि??इन्य्?स? प्??हन्य्?सस्तथैव च | कर्??गयो? ?अ?अ?ग्?नि म्?त्?क्?न्य्?स एव च || विद्य्?न्य्?सो महे??नि यै?च देवमयो भवेत् | एतदेव हिनित्य? स्य्?त्क्?म्य? च्?न्यत्प्रक्?र्तितम् || देव एव यदेद्देव? न्?देवो देवमर्चयेत् | अदेव? प्?जयन् देव? न प्?ज्?फलभ्?ग्भवेत् || व्?सि??हर्?म्?य?ए ? अवि??उ? प्?जयन् वि??उ? च प्?ज्?फलभ्?ग्भवेत् | वि??उर्भ्?त्व्?ऽर्चयेद्वि??उरिति स्मरन् || भ्?रते ? न्?वि??उ? क्?र्तयेद्वि??उर्वि??उमर्चयेत् | न्?वि??उ? स?स्मरेद्वि??उ? न्?वि?उर्वि??उम्?प्नुय्?त् || भवि?ये ? न्?रुद्र? स?स्मरेद्रुद्र? न्?रुद्रो रुद्रमर्चयेत् | न्?रुद्र? क्?र्तयेद्रुद्र? न्?रुद्रो रुद्रम्?प्नुय्?त् || न्?देव्? क्?र्तयेद्देव्?? न्?देव्? त्?? समर्चयेत् | न्य्?स्?त्तद्?त्मको भ्?त्व्? देव्?भ्?तस्तु त्?? यजेत् || ?ग्नेये ? रुद्रस्य प्?जन्?द्रुद्रो वि??उ? स्य्?द्वि??उप्?जन्?त् | स्?र्य? स्य्?द् स्?र्यप्?ज्?त? ??क्त्य्?दि? ?अक्तिप्?जन्?त् || ?अक्तिप्?जन्?त् ?अक्त्य्?दिप्?जन्?त् | ?दिपद्?त् ग?ए??दि परिग्रह? |
SKद्येनैव न्य्?सम्?त्रे?अ देववज्र ज्?यतेनर? | प्र्???य्?मैस्तथ्? ध्य्?नैर्न्य्?सैर्देव?अर्?रम्?त् | न्य्?स्?न्?? प्रचुरत्वेन फल्?न्?मपि भ्?रित्? || भ्?त?उद्धि? तन्त्रगन्धर्वे ? स्वभ्?वत? सद्?ऽ?उद्ध? प�चभ्?त्?त्मक? वपु? | मलम्?त्रसम्?युक्त? सर्वदैव महे?वरि || तस्यैव हि वि?उद्ध्यर्थ? व्?य्वग्निसलिल्?क्?अरै? | चन्द्रब्?जेन देवे?इ प्?थ्व्?ब्?जेन दे?इक? || ?ओ?अद्?हौ तथ्? भस्मप्रोत्स्?र्?म्?तवर्?अ?अम् | ?प्ल्?वन�च कर्तव्य? प्?रकुम्भकरेचकै? || ?अर्?र्?क्?रप्र्?प्त्?न्?? भ्?त्?न्?? यद्वि?ओधनम् | अव्यक्तब्रह्मस?स्पर्??द् भ्?त?उद्धिरिय? ?इवे || भ्?त?उद्धि? विध्?ये त्थमर्घ्य्?दिस्थ्?पन? चरेत् | विदध्य्?न्म्?त्?क्?न्य्?स? मन्त्रन्य्?समनन्तरम् || प्र्???य्?मत्रय? कुर्य्?द्??य्?दिन्य्?सम्?चरेत् | न्य्?सौ कर्??गयो? क्?त्व्?त्म्?न? भगवत्?? स्मरेत् || प्र्???य्?म? तत? कुर्य्?त्प्?रकुम्भकरेचकै? | तत्त्रय? तु विध्?तव्यमनुलोमविलोमत? || अर्घ्य? स?स्थ्?पयेन्मन्त्र्? यथ्?न्य्?य? विध्?नत? | त्रिको?अ?अ?को?अव्?त्तचतुरस्र्??इ क्?रयेत् | पु?पैरभ्यर्च्य तन्मन्त्र्? तत्र्?ध्?र? निवे?अयेत् || म? वह्निम??अल्?येति द?अकल्?त्मने नम? | प्?जयित्व्? अर्घ्यप्?त्र? तु तत्रैव स्थ्?पयेद् बुध? || फ?इति प्रक्??लन? क्?त्व्? प्?जयेत्स्?धकोत्तम? | अ? अर्कम??अल्?येति द्व्?द??न्ते कल्?त्मने || नम इत्यन्तमन्त्रे?अ प्?जयेदर्कम??अलम् | म्?लेन्?प्?र्य देवे?इ विमलेन जलेन तु || ओ? सोमम??अल्?येति ?ओ?अ??न्ते कल्?त्मने | नम इत्यन्तमन्त्रे?अ प्?जयेच्चन्द्रम??अलम् || प्?जयित्व्? ?अ?अ?ग्?नि न्यसेत्स्?धकसत्तम? | तत्र्?क्?अत्?नि पु?प्??इ द्?र्व्?द्?ने विनि?क्?इपेत् || म्?लमन्त्र? जपेत् स्प्???व्? अ?गमन्त्र? प्रविन्यसेत् | ह्?न्मन्त्रे??ऽभिसम्प्?ज्य हस्त्?भ्य्?? छ्?दयेदप? || हस्त्?भ्य्?मिति मत्स्यमुद्रय्? इत्यर्थ? | अस्त्रमन्त्रे?अ स?रक्?य कवचेन्?वगु??ह्य च | धेनुमुद्र्?? सम्?प्?द्य रोधयेत् त्स्वमुद्रय्? | अम्?त? तज्जल? चिन्त्य? द्रव्यस?प्रोक्?अ?अ? चरेत् || गन्धपु?प्?क्?अतयवकु??ग्रतिलसर्?अपै? | सद्?र्वै? सर्वदेव्?न्?मेत दर्घ्यमुद्?रितम् ||
SK?इववि?अये ग्?हि??? सगर्भैवि द्?र्व्? | यथ्? ? अन्त? ??न्य्?? त्रिपत्र्?�च योदद्य्?न्मच्छिरोपरि | जन्मन्यत्र दरिद्र? स्य्?दन्ते च नरक? व्रजेत् || अर्घ्यप्?त्रस्थितैस्तोयैर्विन्? यत्तु निवेदनम् | देवेभ्यो द्?यते यद्यद् तत्सर्व? नि?फल? भवेत् || अर्घ्यस्योत्तरत? स्थ्?प्य? प्?द्यम्?चमन्?यकम् | तत्प्?र्?वे मधुपर्क�च दद्य्?त्तु मधुमि?रितम् || एतत् ?य्?म्?कद्?र्व्?ब्जवि??उक्र्?न्त्?भिर्?रितम् | प्?द्यप्?त्रे च द्?तव्यमर्घ्य�चैव्?र्घ्यप्?त्रके || ज्?त्?लव?गक?कोल? दद्य्?द्?चमन्?यके | ?दौ द्रव्य्??इ स?स्क्?त्य प?च्?त्तन्त्रोदित्?न्न्यसेत् | म्?त्?क्? द्विविध्? प्रोक्त्? पर्?च्?प्यपर्? तथ्? | सु?उम्न्?न्त? पर्?ज्�एय्? अपर्?देहम्??रित्? || अथ म्?त्?क्??अ?अ?गन्य्?स? ज्�?न्?र्?अवे ? अ? ??मध्ये कवर्गन्तु इ? ?? मध्ये चवर्गकम् | उ? ?? मध्ये ?अवर्गन्तु ए? ऐ? मध्ये तवर्गकम् || ओ? औ? मध्ये पवर्गन्तु अ? अ? मध्ये यवर्गकम् | न्य्?स? कुय्?न्महे??नि ह्?दय्?दि ?अ?अ?गकम् || म्?ल्?दि ब्रह्मरन्ध्र्?न्त? ध्य्?येद्देव्?? चिद्?त्मिक्?म् | बिन्दुस्रत सुध्?स्?रैस्तर्पयन्म्?त्?क्?? न्यसेत् || अन्तर्म्?त्?क्?न्य्?स? अथ्?ऽन्तर्म्?त्?क्?न्य्?स? ???उ?व कमल्?नने | द्व्य??अपत्र्?म्बुजे क??हे स्वर्?न्?ओ?अ?अ विन्यसेत् || द्व्?द?अच्छदह्?त्पद्मे क्?द्?न्द्व्?द?अ विन्यसेत् | द?अपत्र्?म्बुजे न्?भौ ?अक्?र्?द्?न्न्यसेद्द?अ || ?अ?पत्रे लि?गम्?ले च वक्?र्?द्?न्न्यसेच्च ?अ? | ?ध्?रे चतुरो वर्??न्न्यसेद्व्?द्?न् चतुर्दले || हक्?औ भ्र्?मध्यगे पद्मे द्विदले विन्यसेत्प्रिये | एकैक? वर्?अमुच्च्?र्य मनस्? तु ध्रुव्?दिकम् | नमोऽन्तमिति विन्य्?स ?न्तर? परिक्?र्तित? || ध्रुव्?दिक? प्र?अव्?दिकमित्यर्थ? | ??रद्?य्?म् ? ब्?ह्य? चैव म्?त्?क्?न्य्?स? ???उ?व्?वहितोमम | लल्??अमुखव्?त्त्?क्?इ?रुतिघ्र्??ए?उ ग??अयो? || ओ??हदन्तोत्तम्??गस्यदो?पत्सन्ध्यग्रके?उ च | प्?र्?वयो? प्???हतो न्?भौ ज?हरे ह्?दये?ऽस?के || ककुद्य?से च ह्?त्प्?र्वप्??इप्?दयुगे तथ्? | ज?हर्?ननयोर्न्यसेन्म्?त्?क्?र्??न् यथ्?क्रमम् || म्?त्?क्?न्य्?समुद्र्?म्?ह म्?नसोल्ल्?से ?
SKमनस्? व्? न्यसेन्न्य्?स्?न्पु?पैरेव्?ऽथव्? न्यसेत् | अ?गु??ह्?न्?मिक्?योग्?न्न्यसेद्व्? सर्वकर्मसु || गौतम्?ये ? चतुर्द्ध्? म्?त्?क्? प्रोक्त केवल्? बिन्दुस?युक्त्? | सविसर्ग्? सोभय्? च रहस्य? कथय्?मिते || अन्त्योप्?न्त्यौ स्वरौ बिन्दुसर्गह्?नौ न्यसेत्प्रिये | विद्य्?कर्? केवल्? च सोभय्? मुक्तिद्?यिक्? | सविसर्ग्? पुत्रद्?त्र्? सबिन्दुर्बिन्दुद्?यिन्? || बिन्दुद्?यिन्? मोक्?अद्?यिन्?त्यर्थ? | धन्य? य?अस्यम्?यु?य? कलिकल्म?अन्??अनम् | य? कुर्य्?न्म्?त्?क्?न्य्?स? स एव ?र्?सद्??इव? || अथ विद्य्?न्य्?स? नवरत्ने?वरे ? म्?र्ध्नि म्?ले च ह्?दये नेत्रत्रितय एव च | ?रोत्रयोर्युगले देवि मुखे च भुजयो? पुन? || प्???हे ज्?न्वोस्तथ्? न्?भौ विद्य्?न्य्?स? सम्?चरेत् | एव? न्य्?सक्?त? स्?क्??त्प?उ? प?उपति? स्वयम् || फेत्क्?रि??यतन्त्रे ? ओ?क्?रसम्पु??क्?त्य म्?लेन व्य्?पक? न्यसेत् | प�चध्? नवध्? व्?पि न्यसेद्व्? सप्तध्?ऽथव्? || म्?लमुच्च्?र्य ??र्??दिप्?दपर्यन्त? प्?द्?दि??र्??न्त? ह्?दय्?दिमुख्?न्त? व्य्?पक? न्यसेदित्यर्थ? | इति विद्य्?न्य्?स? || वि?उद्धे?वरे ? प्र्???य्?मत्रय? कुर्य्?द्विद्यय्? तदनन्तरम् | प्?रक? व्?मन्??य्?? तु कुर्य्?द् ?ओ?अ?अध्? जपै? || कुम्भक? मध्यन्??य्?न्तु चतु??अ??इजप्?त्तत? | रेचक? पि?गल्?य्?न्तु तदर्द्धजपस?ख्यय्? || विपर्?त? पुन? कुर्य्?द्यथ्??अक्त्य्? च स्?धक? | तद?अक्तौ चतुर्द्ध्?पि प्र्??अस?यमन? चरेत् || चतुर्द्धेति म्?लविद्य्??चतुर्व्?रजपेन प्?रक?, ?ओ?अ?अव्?र जपेन कुम्भकम??अव्?रजपेन रेचकमिर्त्य? | तत्र्?प्य?अक्तौ समय्??कम्?त्?क्?य्?म् | इ?अय्? प्?रयेद्व्?यु? सक्?च्च म्?लविद्यय्? | मध्यन्??य्? कुम्भयेच्च वेदस?ख्य? वर्?नने || नेत्रस?ख्य्?क्रमे?ऐव रेचयेत् पि?गल्?ध्वन्? | पुन? पुन? क्रमे?ऐव यथ्? व्?रत्रय? भवेत् || ब्?ह्य्?द्?प्?र?अ? व्?योरुदरे प्?रको भवेत् | सम्प्?र्?अकुम्भवद्व्?योर्ध्?र?अ? कुम्भको भवेत् | वहिर्यद्रेचन? व्?योरुदर्?द्रेचको हि स? || ज्�?न्?र्?अवे ?
SKकनि??ह्?न्?मिक्??गु??हैर्यन्न्?स्?पु?अध्?र?अम् | प्र्???य्?म? स विज्�एयस्तर्जन्?मध्यमे विन्? | प्र्???य्?म? विन्? देवि प्?जने न्?स्ति योग्यत्? || य्?मले ? ??इ? न्यसेन्म्?र्ध्नि दे?ए छन्दस्तु मुखप?कजे | देवत्?? ह्?दये चैव ब्?ज? तु गुह्यदे?अके || ?अक्ति? तु प्?दयो?चैव सर्व्??गे क्?लक? न्यसेत् || ??इ न्यसेदिति ? तत्तत्प्रक्?र??यम्??इच्छन्द इत्य्?दिक? न्यसेदित्यर्थ? | ??इच्छन्दो देवत्?न्?? विन्य्?सेन विन्? यद्? | जपेत्तु स्?धको यस्तु न स तत्र फल? लभेत् || कर्??गन्य्?सम्?ह ??रद्?य्?म् ? अ?गु??ह्?दि?व?गुलि?उ न्यसेद?गै? सज्?तिभि? | अ?गैस्तत्तत्कल्पोक्त्??गमन्त्रै? | सज्?तिभि? नम ?दिभि? | ज्�?न्?र्?अवे ? नम? स्व्?ह्? व?अ? हु? वौ?अ? फ?अन्त्?? सज्?तय? | ह्?च्छिर? ?इख्?-कवच-नेत्रत्रय? तथ्?स्त्रकम् || ??रद्?य्?म् ? अस्त्र? तत्तलयोर्न्यस्य कुर्य्?त्त्?लत्रय्?दिकम् | दि?अस्तेनैव बध्न्?य्?च्छो?इक्?भि? सम्?हित? || अथ्??गन्य्?स? ह्?दय्?दि?उ विन्यसेद?गमन्त्र्??स्तत? सुध्?? | ह्?दय्?य नम? प्?र्व? ?इरसे वह्निवल्लभ्? || ?इख्?यै व?अ?इत्युक्त? कवच्?य हुम्?रितम् | नेत्रत्रय्?य वौ?अ? स्य्?दस्त्र्?य फ?इति क्रम्?त् | ?अ?अ?गमन्त्र्?नित्युक्त्?न् ?अ?अ?गे?उ नियोजयेत् || रुद्रय्?मले ? ह्?दय? मध्यम्?ऽन्?म्?तर्जन्?भि? स्म्?त? ?इर? | मध्यम्?र्जन्?भ्य्?? स्य्?द?गु??हेन ?इख्? स्म्?त्? || द?अभि? कवच? प्रोक्त? तिस्?भिर्नेत्रम्?रितम् | प्रोक्त्??गुल्?भ्य्?मस्त्र? स्य्?द?क्?प्तिरिय? मत्? || इति | तिस्?भिरिति तर्जन्?मध्यम्?न्?म्?भि? | तर्जन्?मध्यम्?न्?म्?? प्रोक्त्? नेत्रत्रये क्रम्?त् | यदि नेत्रद्वय? देवि तद्? तर्जन्?मध्यमे || भैरवतन्त्रे ? ?अ?अ?ग्?नि न्यसेन्मन्त्र्? त्रि?सक्?द्व्? यथ्?क्?अमम् | तन्त्रे ? अ?गन्य्?स करन्य्?सौ ?अ?द्?र्घम्?यय्? चरेत् | स्?र्?वल्य्?? ? यद्ब्?ज्?द्य्? भवेद्विद्य्? तद्ब्?जेन्?ऽ?गकल्पन्? | कुलच्???म?औ ? एक्?क्?अरमधिक्?त्य प्?र्व? ब्?ज? पर? ?अक्तिरिति | ?अ?द्?र्घभ्?ज्?ब्?जेन कुर्य्?द?ग्?दिकल्पन्? || क्?ल्?विद्य्?य्?? स्वच्छन्दस?ग्रहे ?
SKस्वर? विह्?य ब्?जस्य द्?र्घ?अ?क? नियोजयन् | ?अ?अ?ग्?नि विदध्य्?द्वै सर्वत्र्?ऽय? विधि? स्म्?त? || प्?ज्?जप्?र्चन्?होम्?? सिद्धमन्त्रै? क्?त्? अपि | अ?गन्य्?सेन ह्?न्?स्तु न द्?स्यन्ति फल्?न्यम्? || इत्य?गन्य्?सस्य नित्यत्वम् | अथ स्वस्वकल्पोक्त?ओ?ह्?न्य्?स? कुर्य्?त् || ?ओ?ह्?न्य्?सफलम् ?ओ?ह्?न्य्?स?अर्?रस्तु भवेद् ग?ग्?धर? स्वयम् | अव?य? प्रत्यह? कुर्य्?त् तत? प्?ज्?? जप? तथ्? | क्?तेऽपि स्?धक ?रे??हो मह्?देवसमो भवेत् || क्?तन्य्?सोऽक्?तन्य्?स? प्र?अमेद्यदि प्?र्वति | तत्क्?अ??दक्?तन्य्?सो विद्?र्?अह्?दयो भवेत् || य? नमन्ति मह्?देवि ?ओ?ह्?पु?इत विग्रह्?? | अल्प्?यु? स भवेत्सद्यो देवत्? कम्पते भिय्? | न्य्?स? निर्वर्तयेद्देवि ?ओ?ह्?न्य्?सपुर?सरम् || ?त्मध्य्?नम् तन्त्रगन्धर्वे ? ?त्म्?न? स्?धको ध्य्?येद्दिव्यस्त्र्?भिरल?क्?तम् | दिव्य? म्?र्ध्नि मह्?च्छत्र? सहस्रदल कल्पितम् || रत्न्?सनोपवि??अन्तु ल्?क्??रु?अग्?हस्थितम् | त्?म्ब्?लरक्तवदन? न्?न्?गन्धसमन्वितम् || चन्दन्?गुरुकस्त्?र्? रक्तचन्दनभ्??इतम् | सर्व्?ल?क्?रभ्????हय? देव्य्? विग्रहर्?पि?अम् || सुगन्धिपु?प्?भर?अरत्न्?दिभिरल?क्?तम् | तस्य हस्तगत्? सिद्धिर्न्?न्यस्य च कद्?चन || देव्?ध्य्?नम् ततो देव्?? ह्?दम्भोजे ध्य्?येत्तद्गतम्?नस? | पु?प? ग्?ह्?त्व्? देवे?इ मुद्रय्? तु त्रिख??अय्? || त्?? कुर्य्?द् ह्?दय्?सन्न्?? निम्?ल्य लोचनद्वयम् | समक्?य?इरोग्र्?व्? भ्?त्व्? स्थिरमन्? बुध? || तत्रैव सफलध्य्?नकर्तव्यत्वम्?ह ? ध्य्?न? सम्?चरेन्मन्त्र्? सर्वप्?पप्र???अनम् | ततो ह्?त्पद्मग्?? देव्?? म्?नसैरुपच्?रकै? || गन्धपु?पध्?पद्?पैर्नैवेद्यैर्बलिभिस्तथ्? | भोर्गे?च प्?जयेदेन्?? स्?धकस्तु यथ्?विधि || ततो वै म्?नस? ज्?प? कुर्य्?द् होम�च स्?धक? | नमस्क्?त्य तथ्? स्तुत्व्? वहिर्यजनम्?चरेत् || ततो ह्?दयपत्र्?न्त? स्फुरन्त्?? परमे?वर्?म् | सु?उम्न्?वर्त्मन्? न्?त्व्? ?इर(व)स्थ्?ने महे?वर्?म् || तत्र्?नन्देन स?योज्य केवल्?नन्दर्?पि??म् | ततो वै ह्?दय्?सन्ने प्?र्वस्थ्?ने सम्?नयेत् ||
SKत्?म्?ज्�?स्थ्?नम्?न्?य वहन्न्?भ्य्? विरेचयेत् | न्?सय्? दक्?अय्? देवि व्?युब्?जेन मन्त्रवित् | करस्थकुसुमे देव्?? स्थ्?पयेद्?सनोपरि || देव्य्?व्?हनम् एह्येहि भगवत्यम्ब भक्त्?नुग्रहविग्रहे | योगिन्?भि? सम? देवि रक्??र्थ? मम सर्व(द्?)थ्? || देवे?इ ! भक्तिसुलभे ! परिव्?र समन्विते | य्?वत् त्व्?? प्?जय्?म्??ए त्?वत्त्व? सुस्थिर्? भव | देव्?? ध्य्?त्व्? सम्?व्?ह्य तत्तन्मुद्र्?? प्रदर्?अयेत् || तत्तन्मुद्र्? ?व्?हन्य्?दि प�चमुद्र्?? | ??लग्र्?म्?द्?व्?हनस्य नि?एधम्?ह ? ??लग्र्?मे म?औ च्?प्सु वह्नौ मनसि पु?पके | ए?उ च्?व्?हन? न्?स्ति तत्र देव्?? सद्? स्थित्?? || द्रव्यद्?ननियम? प्?ज्?प्रक्?रम्?ह य्?मले ? ?दौ म्?ल? समुच्च्?र्य प?च्?द् देय? समुच्चरेत् | सम्प्रद्?न? तदन्ते तु त्य्?ग्?र्थकपद? तत? | एव? कल्पक्रमे?ऐव प्?जयेत् परमे?वर्?म् || न्?र्चयेदेकहस्तेन प�च्?न्?? नखदर्?अनम् | नि?फल्? क्?र्तित्? स्? हि सर्वत्र्?ऽपि न ?ओभते || ?अ?अ?ग्?द्य्?वर?अप्?ज्? चर??ध्?रन्?भ्यन्तर्वक्?ओ मौलि?उ प�चसु | प�च्?�जल्?न्प्रस्?नै?च विक्?र्य्?ऽथ महे?वरि | देव्?प्?द्?म्बुजे द्वन्द्वे त्रिध्? पु?प्?�जल्?न् क्?इपेत् || ?र्?प्?दुक्?? प्?जय्?म्?त्यमु? मन्त्र? समुच्चरन् | अ?गु??ह्?ऽन्?मय्? दक्?ए त्रिध्? पु?प्??इ प्?तयेत् || तर्प?अ? तु मुखे दद्य्?त्त्रिव्?र? तत्त्वमुद्रय्? | अ?गु??ह्?न्?मिक्?योग? ?इव?अक्त्य्?त्मक? स्म्?त? || तयो? स?योगम्?त्रे?अ द्रव्य? स्य्?दम्?तोपरम् | तेन्?म्?तेन दिव्येन तर्पयेत् परदेवत्?म् || व्यक्तम्?ह ? अ?गु??ह्?न्?मिक्?भ्य्?�च व्?महस्तस्य प्?र्वति | तर्पयेत्सुन्दर्?? देव्?? समुद्र्?�च सव्?हन्?म् ||] ?अ?अ?ग? प्?जयेत् तत्र देव्य्? देहेऽथ स्?धक? | ह्?दये ह्?दय्??ग? तु ?इरस्येव ?इरोऽ?गकम् || ?इख्?? ?इख्?य्?? सम्प्?ज्य कवच? सर्वदेहके | नेत्रत्रय? त्रिनेत्रे तु दिक्?वस्त्र? च प्रप्?जयेत् || नम? स्व्?ह्? व?अ? हु�च वौ?अ? फ? ज्?तिस?युतम् | ?अ?अ?गयुवत्? नित्य? देव्यो देहे?उ स?स्थित्? || तन्त्रे ? इज्य? ह्?दयम्?ग्नेय्य्?मै??न्य्?? तु ?इरो यजेत् | नैर्-?त्य्?? तु ?इख्? प्?ज्य्? व्?यव्य्?? कवच? यजेत् ||
SKअभ्यर्च्य पुरतो नेत्र? दिक्?उ च्?त्रथ्?र्चयेत् | प्रध्?नतनुर्?प्??इ ?अ?अ?ग्?नि प्रप्?जयेत् || ??रद्???क्?य्?म् ? व्?यव्य्?द्??अपर्यन्त? गुरुप?क्ति समर्चयेत् | गुरुप?क्त्य्?ज्�?ने य्?मले ? अविज्�?तगुरुर्देवि गुरु�च परम? गुरुम् | पर्?परगुरु? चैव परमे??हिगुरु? तथ्? | ?ग्नेय्?दिचतु?को?ए प्?जयेत् परमे?वरि || ?ग्नेय्?दि को?अम्?ह तन्त्रगन्धर्वे ? ???नमग्निको?अ? स्य्?द्व्?युको?अ तथे?अकम् | र्?क्?अस? व्?युको?अ? स्य्?दग्नि?च र्?क्?अस भवेत् || गन्धर्वतन्त्रे ? अथव्? र?मय? सर्व्? देव्?र्?प्? विचिन्तयेत् | नि?सरन्ति यथ्? नित्य? स्?र्यबिम्ब्?न्मर्?चय? || देव्यस्तथ्? समुत्पन्न्? मह्?देव्य्?? ?अर्?रत? | ?र्?प्?त्र्?म्?ततोयेन र?मिव्?न्द? प्रतर्पयेत् || प्र्?च्?? दि?अ? तु विज्�?य प्?जयेद?गदेवत्?? | स्वस्थ्?नम्??रित्य देव्?? सर्व्?भ्???अफलप्रद्?? | स्वस्थ्?नवर्जित्? देव्?? ?ओकदु?खफलप्रद? || प्?र्व्?दिदिग्निर्?प?अम् प्र्?च्य्?दिदि?अम्?ह नवरत्ने?वरे ? प्?ज्यप्?जकमध्य? तु प्?र्व्??ऐव व्यवस्थित्? | प्?ज्यस्य दक्?इ?ए दक्?? चोत्तरे चोत्तर्? तथ्? | प?चिमे प?चिम्? ज्�एय्? प्?ज्?य्?? सर्वत? ?इवे || सर्वत इति ?अ?अ?गप्?ज्?य्?म् | ?त्मन? सम्मुख�चैव देवत्?य्??च सम्मुखम् | देवस्य मस्तक? कुर्य्?त्कुसुमेन्?चित? सद्? | प्?ज्?क्?ले देवत्?य्? नोपरि भ्र्?मयेत्करम् || त्रिपुर्?वि?अये ? पुरन्दरमुखो देव्? प्?जयेत्त्रिपुर्?? यदि | देव्?प्???ह? भवेत् प्र्?च्? प्रत्?च्? त्रिपुर्?पुर? || क्?त्?�जलि? ? ?र्?मत्यमुकि देवि ?वर?अ? ते प्?जय्?मि इत्यनुज्�?? लब्ध्व्? ?वर?अ? प्?जयेत् | पद्मपत्रे तत?चक्रे देव्य्? अग्रदल्?दित? | व्?म्?वर्तेन देवे?इ क्रमे?अ परिप्?जयेत् | स्वकल्पोक्त क्रमे?ऐव प्?जयेद?गदेवत्?? || कुल्?र्?अवे ? त्रिव्?र? प्?जयेद्व्?पि सक्?द्व्?पि यथेच्छय्? | य्?मले ? देव्यस्त्र? प्?जयेद्दिक्?उ पुनर्देव्?? प्रप्?जयेत् | सव्?हन्?? सवर्ग्??च परिव्?र्?स्तत? परम् || तथ्? सर्वोपच्?रै?च प्?जित्?स्तर्पित्?स्तथ्? | सन्त्वित्येतन्मनु? जप्त्व्? देव्यै प्?ज्?? समर्पयेत् ||
SKप्?ज्?? सर्पयेद्देव्यै गन्धपु?प्?क्?अत्?दिभि? | वि?ए??र्घ्योदकेनैव तर्पयेत्परमे?वर्?म् || मन्त्रजपप्रक्?र? ध्य्?त्व्? क्?मकल्?? देहे विद्य्?जप? सम्?चरेत् | मन्त्र्?र्थस्म्?तिप्?र्व? तु सहस्र्?दिजप? चरेत् || ब्?हच्छ्र्?क्रमे ? न जपेत्त्रि??अत्? न्य्?न? स्?धकस्तु कद्?चन | तन्त्रे ? सहस्र? व्? ?अत? व्?पि द?अ व्?पि जप? तथ्? | कुर्य्?द???धिक? ते??मिति जप्यविधि? स्म्?त? || जप? समर्पयेद्देवि गन्धपु?प्?र्घ्यव्?रिभि? | तेजोमय? जप? देव्य्? व्?महस्ते निवेदयेत् || गुह्य्?तिगुह्यगोप्त्र्? त्वमिति मन्त्रे?अ मन्त्रवित् | ततो न्?र्?जन? कुर्य्?द्द?अव्?र? तु द्?पकै? || स्तुवन् प्रदक्?इ??क्?त्य द??अवद् प्र?अमेद् भुवि | ?त्म्?र्प?एन मनुन्? कुर्य्?द्?त्म्?र्प?अ? प्रिये || ?त्मसमर्प?अम् तदुक्त? य्?मले ? इत? प्?र्वमिति प्रोच्य प्र्??अबुद्ध्?ति चोच्चरेत् | देहधर्म्?धिक्?रतो ज्?ग्रत्स्वप्नसु?उप्ति?उ || सर्व्?वस्थ्?सु मनस्? व्?च्? च कर्म?एति च | हस्त्?भ्य्?मथ पद्भ्य्?�च तथोदरे?अ स?स्मरेत् || ?इ?न्? यत्स्म्?तमित्येतद्यदुक्त? यत्क्?त? तथ्? | सर्वमित्यपि तद्ब्रह्म्?र्प?अमस्त्वग्निवल्लभ्? || प्र?अव�च मद्?य? म्?? सकल? स्?ध्यदेवत्?म् | ?एन्त्?? समर्पित? त्?र? तत्सदित्यपि स?स्मरेत् || अर्घ्योदक्?क्?अतैर्म्?लैर्देव्यै प्?ज्?? समर्पयेत् | प्?जित्?ऽस्त्वियनेनैव देव्यै प्?ज्?? समर्पयेत् | देव्य्? ग्?ह्?तमित्येव? भ्?वयेद्यतम्?नस? || वि?वस्?रे ? ?ज्�?न्?द्व्? प्रम्?द्?द्व्? वैकल्य्?त्स्?धनस्य च | यन्न्य्?नमतिरिक्त? व्? तत्सर्व? क्?अन्तुमर्हसि || द्रव्यह्?न? क्रिय्?ह्?न? ?रद्ध्?भक्तिविवर्जितम् | तत्सर्व? क्?पय्? देवि क्?अमस्व त्व? दय्?निधे || यन्मय्? क्रियते कर्म महद्व्? स्वल्पमेव व्? | तत्सर्व�च जगद्ध्?त्रि क्?अन्तव्यमयम�जलि? || कुल्?र्?अवे ? क्?त्?�जलिर्महे??नि रक्??मन्त्र? प?हेत्सुध्?? | ओ? क्?ल्? विदध्य्?न्मम पुत्ररक्??? तथ्? कर्?ल्? मम देहरक्??म् | दुर्ग्?ऽ??अह्?सैर्मम ?अत्रुन्??अ? करोतु त्?र्? विदधतु र्?ज्यम् ||
SKप?हेत्सहस्रन्?म्?ख्य? स्तोत्र? मोक्?अस्य स्?धनम् | स्तोत्रै? स्तुत्व्? प?हेद्देवि कवच? सर्वक्?मदम् | कवच? हि विन्? देवि ??द्रस्तु जपम्?चरेत् || कवच? हि बिनेति | स्व्?ह्?प्र?अवस?युक्त? कवच? विनेत्यर्थ? | देव्?? प्रदक्?इ??क्?त्य नमस्क्?त्य विसर्जयेत् | विध्?य प?च्?त्स्व्?? विद्य्?? स्व्?यह्?त्सरस्?रुहे || सु?उम्न्?वर्त्मन्? पु?पमघ्र्?योद्व्?सयेत्तत? | क्?अमस्वेति च मन्त्रे?अ ह्?दि देव्?? विसर्जयेत् || भैरव्?तन्त्रे ? स?ह्?र मुद्रय्? देवि क्?अमस्वेति विसर्जयेत् | तन्नैवेद्य?अत्???अ? व्? सहस्र्???अ? च भैरवि | दद्य्?दुच्छि??अच्????ल्यै स्व्?हेति मनुन्? तत? || अथव्? ? निर्म्?ल्येन यजेद्देव्?म्??ए निर्म्?ल्यव्?सिन्?म् | निर्म्?ल्य? ?इरस्? ध्?र्य? सर्व्??गे च्?नुलेपनम् || नैवेद्य�चोपमु�ज्?त दत्त्व्? तद्भक्ति??लिने | ?अत्?भिमन्त्रित? पु?प? चन्दन? म्?र्ध्नि भ्?लत? || ध्?त्व्?ऽव?य? नयेद्व?य? त्रैलोक्यमपि दर्?अन्?त् | य? य? गच्छ्?मि प्?देन य? य? प?य्?मि चक्?उ?? || स एव द्?सत्?? य्?तु यदि ?अक्रसमो भवेत् | अनेन तिलक? क्?त्व्? त्रैलोक्यमपि मोहयेत् || सद्य? पर्युसित? व्?पि निर्म्?ल्य? प्रद्??यति | ब्रह्मरध्रे गुप्तस्थ्?ने यन्त्रलेप? तु ध्?रयेत् | उदक? तरुम्?ले व्? निर्म्?ल्य? तस्य स?त्यजेत् || रुद्रय्?मले ? प्?र्वजन्म्?र्जितै? पु?यैर्ज्�?त्वैन्?? परदेवत्?म् | यो भजेद्भक्तिभ्?वेन सद्य? ?र्?सम्पद्?? पदम् | यद्?र्?धनम्?त्रे?अ ज्?वन्मुक्ति? प्रज्?यते || इति वचन्?त् | देव्य्?? प्?ज्? त्रिध्? प्रोक्त्? स्थ्?लम्?भ्यन्तर? तथ्? | स्थ्?ल? मन्त्रमय्?? प्?ज्?? स्थ्?लविग्रहचिन्तनम् || म्?नसैरुपच्?रैस्तु प्?ज्? च्?भ्यन्तर? प्रिये | कर्मयोग? विन्? देवि ज्�?नयोगो न सिध्यति | ज्�?नेन कर्म?? व्?पि सिद्धिर्भवति न्?न्यथ्? || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्यपरमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? प्र्?त?क्?त्यनिर्?अयो नित्यप्?ज्?प्रम्??अनिर्?अयो न्?म सप्तमोल्ल्?स? || ७ || अ??अमोल्ल्?स? म्?ल्?निर्?अय?
SKअथ वक्?ये महे??नि म्?ल्?य्?? परिनिर्?अयम् | नित्य? जप? करे कुर्य्?द् न तु क्?म्य? कद्?चन् | क्?म्यमपि करे कुर्य्?द् म्?ल्?भ्?वे च सुन्दरि || अथ करम्?ल्? य्?मले ? अन्?म्?य्?स्त्रय? पर्व? कनि??ह्?य्?स्त्रिपर्विक्? | मध्यम्?य्?स्त्रय? पर्व? तर्जन्? म्?लपर्व? च || प्र्?दक्?इ?यक्रमे?ऐव जपेद्द?असु पर्वसु | ?अक्तिम्?ल्? सम्?ख्य्?त्? सर्वमन्त्रप्रद्?पिक्? || पर्वद्वय? तु तर्जन्य्? मेरु? तद्विद्धि प्?र्वति | तर्जन्यग्रे तथ्? मध्ये यो जपेत् तत्रम्?नव? | चत्व्?रि तस्य न?यन्ति ?युर्विद्य्?य?ओबलम् || ?र्?विद्य्?य्?म् ? अन्?म्?मध्यम्?य्??च म्?ल्?ग्र�च द्वय? द्वयम् | कनि??ह्?य्??च तर्जन्य्?स्त्रय? पर्व? महे?वरि || अन्?म्?मध्ययोर्मध्य? मेरु?च द्वितय? स्म्?तम् | प्र्?दक्?इ?यक्रम्?द्देवि जपेत् त्रिपुरसुन्दर्?म् || करम्?ल्?य्?? जपप्रक्?र? ह्?दये हस्तम्?रोप्य तिर्यक् क्?त्व्? कर्??गुल्?? | ?च्छ्?द्य व्?सस्? हस्तौ दक्?इ?एन सद्? जपेत् || अ?गुल्?न्?? वियु�ज्?त कि�चिद्?कु�चयेत्तलम् | अ?गुल्?न्?? वियोग्?च्च छिद्रे?अ स्रवते जप? || अ?गुल्यग्रे?उ यज्जप्तु? यज्जप्तु? मेरुल?धने | सर्वसन्धिसु यज्जप्तु? तत्सर्व? नि?फल? भवेत् || य्?मले म?इनियमम्?ह ? म?य??अक?अतेनैव निर्मित्? य्? तु म्?लिक्? | र्?ज्य? वितनुते नित्य? देह्?न्ते मोक्?अद्?यिन्? || मोक्?अद्? प�चवि??अत्य्? त्रि??अत्? धनव्?द्धिद्? | चतुर्द?अमय्? म्?ल्? मोक्?अद्? भोगवर्द्धिन्? | सर्व्?र्थ्?? सप्तवि??अत्य्? प�चद?य्?भिच्?रिके || (प�चवि??अत्य्?भिच्?रके इत्यपि प्??ह?) प�च्??अत्? क्?र्यसद्धि?चतु?प�च्??अत्? तथ्? | अ??ओत्तर?अतेनैव सर्वसिद्धिरुद्?ह्?त्? | त्रिपुर्?य्??अपे?अस्त्? रुद्र्?क्?ऐ रक्तचन्दनै? || भैरव्?वि?अये व्?र्?ह्?तन्त्रे ? सुवर्?अम?इभिर्म्?ल्? स्फ्??इक्? ?अ?खनिर्मित्? | प्रव्?लैरपि व्? क्?र्य्? पुत्रज्?व? विवर्जयेत् || ?म??नधुस्त्?रैर्म्?ल्?? कुर्य्?द्ध्?म्?वत्? विधौ | रक्तेन चन्दनेन्?ऽपि ब्?ल्?म्?ल्?? प्रकल्पयेत् || दन्तेन क्?लिक्?य्?स्तु र्?जदन्तस्य मेरु?? | उग्रत्?र्?जपे ?अस्त्? मह्??अ?खस्य म्?लिक्? ||
SKउन्मुख्य्??च तथ्? ज्�एय्? म्?लिक्? सिद्धिद्?यिक्? | ??क्त्?न्?? स्फ्??इक्? म्?ल्? रक्तचन्दनसम्भव्? || रुद्र्?क्?अम्?लिक्? ज्�एय्? चतुर्वर्गफलप्रद्? | निर्मित्? रौप्यम?इभिर्जपम्?लेप्सितप्रद्? || हिर?यम?इभिर्म्?ल्? सर्व्?न्क्?म्?न्प्रयच्छति | प्रव्?लैर्विहित्? म्?ल्? प्रयच्छेत् विपुल? धनम् || सौभ्?ग्य? स्फ्??इक्? म्?ल्? मौक्तिकैर्विहित्? तथ्? | निर्मित्? ?अ?खम?इभि? कुरुते क्?र्तिमयव्य्?म् || सुवर्?ऐ रचित्? म्?ल्? सद्? स्य्?न्मुक्तये न्???म् | गोपन्?य्?ऽनि?अ? देवि जपम्?लेप्सित्?प्तये || मु??अम्?ल्?य्?म् ? रुद्र्?क्?ऐर्व्? यदि जपेदिन्द्र्?क्?ऐ? स्फ्??इकैस्तथ्? | न्?न्यमध्ये प्रयोक्तव्य? पुत्रज्?व्?दिक�च यत् || यदन्यत्तु प्रयु�ज्?त म्?ल्?य्?? जपकर्म?इ | तस्य क्?म? च मोक्?अ च नो दद्?ति प्रिय?कर्? || य्?मले ? रुद्र्?क्?ऐ? ?अक्तिमन्त्र�च मन्त्र्? य? प्रजपेत् प्रिये | स दुर्गतिम्?प्नोति नि?फलस्य तस्य तज्जप? || प्रतिप्रसवम्?ह तत्रैव ? क्?लिक्? छिन्नमस्त्? च त्रिपुर्? त्?रि?? तथ्? | एत्?? सर्व्? न द्??यन्ति जप्?द् रुद्र्?क्?अम्?लय्? || रुद्रय्?मले ? दिव्? नैव प्रजप्तव्य? रुद्र्?क्?अम्?लय्? क्वचित् | प्?र्व?चर्य्?द्?ते च्?त्र द्??अ?अ�च वर्?नने || अरुद्र्?क्?अधर? कुर्य्?त्त्?न्त्रिक? वैदिक? तथ्? | जपहोम्?दिक? यद्यत्तत्सर्व? नि?फल? भवेत् || म्?ल्?वि?ए?अफलम्?ह मन्त्रदेवप्रक्??इक्?य्?म् ? पर्वस्व??अगु?अ? पुत्रज्?वे द?अगु?अ? भवेत् | ?अत? स्य्?च्छ?खम्?ल्?य्?? प्रव्?ले च सहस्रकम् || स्फ्??इके द?अस्?हस्र? लक्?अ? तु मौक्तिके भवेत् | पद्म्?क्?ए द?अलक्?अन्तु को?इ? सौवर्?इके तथ्? || कु?अग्रन्थौ च रुद्र्?क्?ए?वनन्तगु?इत? भवेत् | ?वेतपद्म्?क्?अम्?ल्?य्?? जपे स्य्?दमित? फलम् || म्?ल्?विध्?नम् सम्?सेन्?ऽक्?अम्?ल्?न्?? विध्?नमिह कथ्यते | यथ्?ल्?भ? यथ्?र्?पमक्???य्?द्?य यत्नत? || अन्योन्यसमर्?प्??इ न्?तिस्थ्?लक्???नि च | क्???दिभिरदु???नि न ज्?र्??नि कद्?चन || गव्यै?च प�चभिस्त्?नि प्रक्??लयेत्प्?थक् प्?थक् | द्विजस्त्र्?निर्मित? स्?त्र? ?उभ्र? ग्रन्थिविवर्जितम् ||
SKक्?र्प्?सनिर्मित? व्?पि प??अस्?त्रमथ्?पि व्? | त्रिगु?अ? त्रिगु??क्?त्य ग्रथयेच्छिल्प??स्त्रत? || सर्वे??मेव वर्??न्?? प??अ? सर्वेप्सितप्रदम् | क्?र्प्?ससम्भव? स्?त्र? धर्मक्?म्?र्थमोक्?अदम् || म्?ल्?स्त्रे च प?हन् स्?त्र? ब्?ज? प्रक्??लयेत्तत? | म?इमेकैकम्?द्?य स्?त्रे तत्र तु योजयेत् || मुखे मुखन्तु स?योज्य पुच्छे पुच्छ? नियोजयेत् | तत्सज्?त्?यमेक्?क्?अ? मेरुत्वेन्?ऽग्रतो न्यसेत् || एकैकम?इम्?द्?य ब्रह्मग्रन्थि? प्रकल्पयेत् | ग्रथयेन म्?लिक्?? चैव ह्?दि त्?र? मनु? स्मरन् || स्वयमेव जपेन्मन्त्रमन्य? प्र?अवमुच्चरेत् | स्?र्द्धत्रय्?वर्तनेन ग्रन्थि? कुर्य्?दथो द्??हम् || ब्रह्मग्रन्थि? ततो दद्य्?न्न्?गप्??अमथ्?पि व्? | गोपुच्छसद्???? कुर्य्?दथव्? सर्पपुच्छवत् || ग्रन्थिह्?न्? न कर्तव्य्? मेरुप्???हे न द्??यति | द्??अ?अ? त्वत्र न्?स्त्येव ग्रन्थिह्?नैव नित्य?अ? || क्?ल्य्??च त्वरित्?य्??च वज्र्?ख्य्? ?अ?कभेदके | तोतल्?वनव्?सिन्योर्व्?र्?ह्य्??च वि?ए?अत? || न्?न्यस्य्??च??इक्?य्??च ग्रन्थिह्?न्? विध्?यते | एव? निर्म्?य म्?ल्?? वै ?ओधयेत् मन्त्रिसत्तम? || अप्रति??हितम्?ल्?भिर्मन्त्र? जपति यो नर? | सर्व? तद्विफल? विद्य्?त्क्रुद्ध्? भवति च??इक्? || म्?ल्?प्रति??ह्?विधि? अथोच्यते प्रति??ह्? हि म्?ल्?य्?स्तन्त्रवर्त्मन्? | गुरु? तत? प्र?अम्य्?दौ स?स्कुर्य्?ज्जपम्?लिक्?म् || ?उभे लग्ने ?उभे व्?रे ?उभेर्क्?ए च ?उभे तिथौ | प्रति??ह्?? क्?रयेन्मन्त्र्? स्वय? व्? गुरु??ऽथव्? || नित्य? कर्म तत? क्?त्व्? स्?म्?न्य्?र्घ्य? विध्?य च | प�चगव्ये क्?इपेन्म्?ल्?? ?इवमन्त्रे?अ मन्त्रयेत् || ?इवमन्त्रम्?ह य्?मले ? ??न्त? ?अत्रुस्वर्?र्??हो न्?दबिन्दुविभ्??इत? | कथित? ?इवमन्त्रोऽय? स्?धक्?न्?? हित्?य च || ??न्तो हक्?र?, ?अत्रुस्वर? उक्?र? | ??तलेन जलेनैव स्न्?पयेत्तदनन्तरम् | क्??लयेत्प�चगव्येन सद्योज्?तेन म्?र्जयेत् || सद्योज्?तमन्त्रस्तु ? सद्योज्?त? प्रपद्य्?मि सद्योज्?त्?य वै नम? | भवे भवे न्?तिभवे भजस्व म्?? भवोद्भव्?य नम? ||
SKक्??लयेद्??अस्?क्तेन लिम्पेत्तत्पुरु?ए?अ तु | गन्धैरनल्पैर्मतिम्?नघोरे?अ तु ध्?पयेत् || अघोरे?अ तु स्?क्तेन ?अत्?न्य्?न? तु मन्त्रयेत् | व्?मदेवेन मन्त्रे?अ सम्?कुर्य्?द्विचक्?अ?अ? || अ?वत्थपत्रनवकै? पद्म्?क्?र? प्रकल्पयेत् | तन्मध्ये स्थ्?पयेन्म्?ल्?? म्?त्?क्?म्?लमुच्चरन् | स?स्क्?त्यैव? बुधोम्?ल्?? तत्प्र्????स्तत्र योजयेत् || तत्प्र्???न् ?र्?ध्यदेवत्?प्र्???न् | तत्र देव्?? प्रप्?ज्यैव परिव्?रग?ऐ? सह | अनुलोमविलोमेन म्?त्?क्?र्?एन मन्त्रयेत् | मेरु? प्रेतेन स?मन्त्र्त्र भ्?वयेद्देवत्?त्मिक्?म् || प्रेतेन प्रेतब्?जेन हसौ? इति ब्?जेनेत्यर्थ? | वह्नि? स?स्क्?त्य विधिवद??ओत्तर?अत? हुनेत् | हुत?ए?अ? प्रतिक्?तौ प्रदद्य्?द्देवत्?धिय्? || होमकर्म?य?अक्त?चेद् द्विगु?अ? जपम्?चरेत् | त्?र्?क्?अम्?ल्?धिपते सुसिद्धि? देहि देहि मे || सर्वमन्त्र्?र्थस्?धिनि स्?धय द्वितय? तत? | सर्वसिद्धि? परिकल्पय परिकल्पय मे स्व्?ह्? || इत्थम्??अ?सित्? म्?ल्? जपकर्म?इ सर्वद्? | अभ्???अक? दद्?त्यर्थ? सर्वक्?मफल? तथ्? || म्?ल्?य्?? जप विधि? गुरु? सम्प्?ज्य तद्धस्त्?द् ग्?ह्??य्?दक्?अम्?लिक्?म् | जप्?दौ प्?जयेन्म्?ल्?? तोयैरभ्युक्?य यत्नत? || ऐ? ह्र्?? अक्?अम्?लिक्?यै ह्?न्मन्त्रे?अ प्रप्?जयेत् | प्?जयित्व्? ततो म्?ल्?? ग्?ह्??य्?द्दक्?इ?ए करे || ह्?त्सम्?पे सम्?न्?य न तु व्?मेन स?प्??एत् | मध्यम्?य्? मध्यभ्?गे स्थ्?पयित्व्? सम्?हित? || मध्यमस्थ्?मक्?अम्?लम?गु??ह्?ग्रे?अ च्?लयेत् | अ?उचिर्न स्प्??एन्म्?ल्?? करभ्र??ह्?? न क्?रयेत् || तर्जन्य्? न स्प्??एदेन्?? गुरोरपि न दर्?अयेत् | भुक्तौ मुक्तौ तथ्? पु??औ मध्यम्?य्?? जपेत्सुध्?? || एकैकस्य जपेऽप्येव? च्?लयेद्दे?इकोत्तम? | जप्त्व्?ऽक्?अम्?ल्?? सकल्?? भ्र्?मयेदखिल्?न्म??न् || प्रदक्?इ?अ? पुन? क्?त्व्? प्र्?रभ्यैव? सम्?पयेत् | एव? क्रमे?अ देवे?इ जपेद??ओत्तर? ?अतम् || स्थ्?ल्?वधि जपेन्मन्त्र? स्?क्?मभ्?गे समर्पयेत् | हस्तौ च व्?सस्?च्छ्?द्य दक्?इ?एन सद्? जपेत् || एव? स्?क्?म्?वधिस्थ्?ल्?न्तो जप? स?ह्?र? ||
SKन स्वय? व्?महस्तेन जपम्?ल्?? तु स?स्प्??एत् | जपक्?ले जप? क्?त्व्? ?उद्धस्थ्?ने सद्? न्यसेत् || ज्?र्?एस्?त्रे पुन? स्?त्र? ग्रथयित्व्? ?अत? जपेत् | अद्?क्?इतद्विजेन्?ऽपि स्प्???? चेत् ?उद्धिम्?चरेत् || न ध्?रयेत्करे क??हे म्?र्ध्नि च जपम्?लिक्?म् | उरुप्?द्?धरस्प्???? च्?पसव्यप्रच्?लित्? || अगुप्त्? च्?लित्? व्?पि पुन? स?स्क्?रमर्हति | जपम्?ल्? मय्? देवि कथित्? भुवि दुर्लभ्? | सद्? गोप्य्? प्रयत्नेन यदि त्व्?? मम वल्लभ्? || अथ वर्?अम्?ल्? म्?ल्? प�च्??इक्? प्रोक्त्? स्?त्र? ?अक्ति?इव्?त्मकम् | कु??अल्?ग्रथित्? ?अक्तिरल्?न्ते मेकस?स्थिति? || चित्रि?? विसतन्त्व्?भ्? ब्रह्मन्???गत्?न्तर्? | तय्? स?ग्रथित्? ध्येय्? स्?क्??ज्ज्?ग्रत्स्वर्?पि?? || अन्तर्विद्रुमभ्?सम्?नभुजग्?सप्रोतवर्?ओज्वल्? | ?रोहप्रतिरोहत? ?अतमय्? वर्ग्???अक्???ओत्तर्? || अनुलोमविलोमेन मन्त्रवर्?अविभेदत? | मन्त्रे??ऽन्तरित्?न्वर्??न्वर्?एन्?ऽन्तरित? मनुम् || कुर्य्?द्वर्?अमय्? म्?ल्?? सर्वमन्त्र प्रक्??इन्?म् | चरम्?र्?अ? मेरुर्?प? ल?घन? नैव क्?रयेत् || सबिन्दु? वर्?अमुच्च्?र्य प?च्?न्मन्त्र? जपेत्सुत्ध्?? | अक्?र्?दिलक्?र्?न्तमनुलोम इति स्म्?तम् || पुनर्लक्?रम्?रभ्य ?र्?क??ह्?न्त? मनु? जपेत् | विलोम इति विख्य्?त? क्?अक्?र? केवल? जपेत् || वर्??न्?म??अवर्गे?अ अ??अव्?र? जपेत्सुध्?? | अ??ओत्तर?अत? मन्त्र? ज्�?नेन स?जपेत्सुध्?? | अ क च ह त प य ?? इत्येव? च्???अवर्गक्?? || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? म्?ल्?निर्?अयो न्?म्?ऽ??अमोल्ल्?स? || ८ || नवमोल्ल्?स? जपविधि? जपविधिमह? वक्?ये ???उ?व कमल्?नने | जप्?र्थ? सर्वमन्त्र्???? विन्य्?स�च लिपेर्विन्? || क्?त? तन्नि?फल? विद्य्?त्तस्म्?द्?दौ न्यसेत्प्रिये | जप्?दौ च जप्?न्ते च प्र्???य्?म? सम्?चरेत् || म्?नस्?दि जपभेद? वि?उद्धे?वरे ? जप? स्य्?दक्?अर्?व्?त्तिर्म्?नसोप्???उव्?चिक्?? | निजकर्?अगोचरो यो म्?नस? स जप? स्म्?त? || उप्???उर्निजकर्?अस्य गोचर? परिक्?र्तित? | निगदस्तु जनैर्वेद्यस्त्रिविधो जप ?रित? ||
SKअन्यत्र्?पि ? यद्युच्चन्?चोच्चरितै? स्प??अ?अब्दवदक्?अरै? | मन्त्रमुच्च्?रयेद्व्यक्त? जपयज्�अ? स व्?चिक? || उच्च्?रयेन्मन्त्रम्??अत् कि�चिदो??औ प्रच्?लयन् | कि�चिच्छब्दमय? ब्र्?य्?दुप्???उ? स जप? स्म्?त? || धिय्? यदक्?अर?रो?य्? वर्??द्वर्?अ? पद्?त्पदम् | ?अब्द्?नुचिन्तन्?भ्य्?स? स उक्तो म्?नसो जप? || उच्चैर्जप्?द् वि?इ??अ? स्य्?दुप्???उर्द?अभिर्गु?ऐ? | तस्म्?दपि वि?इ??अ? स्य्?त्सहस्र? म्?नसो जप? || मन्त्रजपपद्धति? देवत्?? चित्तग्?? कुर्य्?त्कुर्य्?च्च ह्?दय? स्थिरम् | ओ??हौ तु सम्पु?औ क्?त्व्? स्थिरचित्त? स्थिरेन्द्रिय? || ध्य्?येच्च मनस्? वर्??न् जिह्वो??हौ न विच्?लयेत् | न कम्पयेच्छिरोग्र्?व्?न्दन्त्?नैव प्रक्??अयेत् | मन्त्रोद्ध्?रक्रमे?ऐव मन्त्र? जपति स्?धक? || तद्? सिद्धि? विज्?न्?त न सिद्धि?च्?न्यथ्? भवेत् || मन्त्रोद्ध्?रक्रमे?ऐव मन्त्रघ?अक्?भ्?त स्वरव्य�जन वर्?अज्�?न क्रमे?एत्यर्थ? | एव-क्?रोऽवध्?र??र्थ? | ?दौ ध्य्?न? ततो मन्त्र? ध्य्?नस्य्?ऽन्ते मनु? जपेत् | ध्य्?नमन्त्रसम्?युक्त? ??घ्र? सिध्यति स्?धक? || कुल्?र्?अवे ? मनस्? प?हित? स्तोत्र? व्?च्? व्?पि मनोर्जप? | उभय? नि?फल? देवि भिन्न भ्???ओदक? यथ्? || भ्?त?उद्धौ ? यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दि??? य्? च देवत्? | चिन्तयित्व्? तद्?क्?र? मनस्? जपम्?चरेत् || ?अनै? ?अनैरविस्प??अ? न द्रुत? न विलम्बितम् | क्रमे?ओच्च्?रयेद्वर्??न्?द्यन्तक्रमयोगत? || अतिह्रस्वो व्य्?धिहेतुरतिद्?र्घो वसुक्?अय? | अक्?अर्?क्?अरस?युक्त? जपेन्मौक्तिक ह्?रवत् || कुल्?र्?अवे ? तन्नि??हस्तद्गतप्र्??अस्तच्चित्तस्तत्पर्?य?अ? | तत्पद्?र्थ्?नुसन्ध्?न? कुर्वन्मन्त्र? जपेत् प्रिये || रुद्रय्?मले ? कथ? मन्त्र्??च सिध्यन्ति मन्त्र्?र्थ्?ज्�?निन? प्रिये | प?उर्भ्?वविह्?न?च न तस्य भजते फलम् | मन्त्र्?र्थस्य्?ऽनभिज्�ओ हि न जपफलम?नुते || मन्त्र्?र्थ? मन्त्रदेवतयोरभेदज्�?नम् | तथ्?चोक्त? य्?मले ? मन्त्र्?र्थो देवत्?र्?प चिन्तन? परमे?वरि | मन्त्र्?त्मक?च देव? स्य्?द् मन्त्रव्?च्य्? च देवत्? ||
SKव्?च्यव्?चकभ्?वेनैव्?ऽभेदो मन्त्रदेवयो? | मन्त्रगच्य्? देवत्? हि मन्त्रो हि व्?चक? स्म्?त? | व्?चकेऽपि च विज्�?ते व्?च्य एव प्रस्?दति || प्रक्?र्?न्तरम्?ह भ्?त?उद्धौ ? मन्त्र्?र्थ? परमे??नि स्?वध्?नऽवध्?रय | ?ध्?रे चिन्तयेद्विद्य्?? ?उद्धस्फ?इकसन्निभ्?म् || बन्ध्?करुचिर्?? लि?गे न्?भौ स्फ?इक सन्निभ्?म् | ह्?दि म्?रकत प्रख्य्?? हरिद्वर्??? वि?उद्धके || ?ज्�?य्?? चिन्तयेद्विद्य्?? चतुर्वर्??नुर�जित्?म् | ?अ?चक्रे परमे??नि ध्य्?येत्स्?धकसत्तम? || मन्त्रपुर?चर?अविधि? रुद्रय्?मले ? मन्त्र? न्?त्व्? गुरो? प्?र्?वे गुरुभक्तिपुर?सर? | मन्त्र?रोत्र्?स्यह्?न्नेत्रप्र्???न्विज्�?य यत्नत? | मन्त्र्???? क्?लक? ज्�?त्व्? कुर्य्?न्मन्त्रपुर?क्रिय्?म् || नचैतद्वचन? पुर?चर?अवि?अयमेवेति बोद्धव्यम् | ?रोत्र्?द्?न्?? ज्�?न्?भ्?वे मन्त्रजपम्?त्रनि?एध्?त् | तथ्? चोक्त? मन्त्रको?ए ? ?रोत्र्?द्?न्?? ज्�?न्?भ्?वे मन्त्रज्?प? करोति य? | द्?रिद्र्य�च विपत्ति�च नरक? प्र्?प्नुय्?त्तु स? || अन्यत्र्?पि ? ह्?न्नेत्रविह्?नो मन्त्रो द्?रिद्र्यक्ले?अद्?यक? | तन्त्र्?न्तरे ? ?रो??स्यनेत्रह्?दयज्�?न्?न्मोक्?अमव्?प्नुय्?त् | सद्य? सिद्धि? सर्वविद्य्? स्य्?त्स्?क्??च्छिव एव स? || भ्?त??मरे ? इन्द्रियमनोवि?उद्ध्य्? मनोर्?स्य्?दिक? वक्?ये | ???उ देवि प्रवक्?य्?मि क्?ल्?मन्त्रतनुक्रमम् || क्?ल्?मन्त्र्?द्?न्?? तनुक्रम? बिन्दु? ?रोत्र? न्?दम्?स्य? कक्?र? ह्?दय? बिदु? | वह्नि? नेत्र? क्?लक�च द्?र्घेक्?र? प्रिय?वदे || तक्?र? त्?रि??मन्त्रो ह्?दय? विद्धि प्?र्वति | हक्?र? विद्धि सर्वत्र ?अक्तिमन्त्रे सुरे?वरि || उत्तरतन्त्रे ? प्र्??अविद्य्? मह्?विद्य्? स्? विद्य्? मुक्तिद्?यिक्? | ?य्?म्?य्? द्व्?वि??अत्यक्?अरविद्य्?य्?? वि?ए?अम्?ह उत्तरतन्त्रे ? क्र्?? क्?रोमस्तक? देवि क्र्??क्?र?च लल्??अकम् | नेत्रत्रय? क्र्??क्?रे?अ ह्??क्?रे?अ च न्?सिक्? || ह्??क्?रो मुखपद्य? स्य्?द् ह्र्??क्?र? कर्?अयुग्मकम् | ह्र्??क्?रे?अ भवेद् ग्र्?व्? दक्?र?चिद्रुक? भवेत् || क्?इक्?रे?अ भवेद्दन्तो ?एक्?रे?औ??हयुग्मकम् | क्?क्?रे?अ स्तनद्वन्द्व? लिक्?र? प्???हदे?अकम् ||
SKकेक्?रे?अ भवेद्ब्?हु? क्र्??क्?रे?ओदर? भवेत् | क्र्??क्?रो न्?भिदे?अ? स्य्?त् क्र्??क्?र?च नितम्बकम् || ह्??क्?रो योनिर्?प? स्य्?द् ह्??क्?रे?ओरुयुग्मकम् | ह्र्??क्?रो ज्?नुयुग्म? स्य्?द् ह्र्??क्?रो गुल्फदे?अक? | स्व्?क्?रे?अ पदद्वन्द्व? ह्?क्?रे?अ नख्?स्तथ्? || त्?र्?विद्य्?य्?? य्?मले ? व्?ग्देव्य्?? समुद्?य? स्य्?द्?क्?ति? प्र?अवोमुखम् | म्?य्?वधुस्थितौ बिन्दु लोचने समुद्?ह्?ते || हसक्?रो ?रुत्? द्?र्घस्वरौ ह्?दयर्?पि?औ | फ?अक्?रौ योन्युदर्?वक्?रे?अ स्तन द्वयम् || रेफयुग्म? पदद्वन्द्व? तक्?र? म्?ललोचनम् | वेदभुजस्वर्?प�च न्?दयुग्ममुद्?ह्?तम् || क्?र्च? प्र्??? एकज?? ?अर्?र? सर्वमि?यते | क्?र्च? मुखन्तु विज्�एयमन्यमन्त्रे?उ प्?र्वति || अन्य मन्त्रे?उ एकज?? य्? प्र?अवरहितमन्त्रे?उ क्?र्च? मुख? तेन तत्तन्मन्त्रघ?अक्?भ्?त तत्तद्वर्?ओत्पन्नमुखन्?सौ??हदन्त्?धरहस्तप्?दस्तनयोन्य्?द्य- वयव्?वच्छिन्न?अर्?र? ज्�?नवि?अय्?क्?त्य जपेदित्यर्थ? || क्?मिन्?तत्त्वम् क्?मधेनुतन्त्रे ? अथ्?न्यत्स?प्रवक्?य्?मि क्?मिन्?तत्त्वमद्भुतम् | ???उ तत्त्व? महे??नि कक्?रस्य्?ऽतिदुर्लभम् || रहस्य? परम्??चर्य? त्रिको??न्?�च स????उ | व्?मरेख्? भवेद् ब्रह्म्?वि??उर्दक्?इ?अरेखिक्? || अधोरेख्? भवेद् रुद्रो म्?त्र्? स्?क्??त्सरस्वत्? | कु??अल्? च्??कु??क्?र्? मध्य??न्य? सद्??इव? || ज्व्?य्?वकस?क्??? व्?मरेख्? वर्?नने | ?अरच्चन्द्रप्रत्?क्??? द?अरेख्? समुर्तिक्? || अधोरेख्? भवेद् रुद्रो मह्?मरकतद्युति? | ?अ?ख दुग्धसम्?भ्?स्? म्?त्र्? स्?क्??त्सरस्वत्? || अ?कु??कु??अल्? य्? तु को?इविद्युल्लत्?क्?ति? | को?इचन्द्रप्रत्?क्??ओ मध्य??न्य? सद्??इव? || ??न्ये?उ परमे??नि सर्वव्य्?प्? सद्??इव? | इ?वरो यस्तु देवे?इ कल्?चतु??य्?त्मक? || इच्छ्??अक्तिर्भवेद् ब्रह्म्? वि??उस्तु ज्�?न?अक्तिम्?न् | क्रिय्??अक्तिर्भवेद्रुद्र? सर्व? प्रकतिम्?र्तिम्?न् || ?त्मविद्य्??इवैस्तत्त्वै? सद्??इव? प्रति??हित? | ??न्ये?उ स?स्थित्? क्?ल्? कैवल्यपदद्?यिन्? || मर्दिन्? स?स्थित्? तस्य दक्?अभ्?गे सम्?र्तिक्? | व्?मभ्?गे स्थित्? लक्?म्??चतुर्वर्गप्रद्?यिन्? ||
SKत्?स्?? गर्भे स्थित्? स्? च सुन्दर्? परदेवत्? | तिस्???? गर्भसम्भ्?त्? त्रिपुर्? च्?त एव हि || परम्?त्मस्वर्?पत्व्?त्त्?स्?? गर्भे प्रति??हित्? | अन्ये च क्?लिक्?य्?? स्यु? सर्व्? भेद्??च प्?र्वति || तत्र स्थित्व्? स्?जेद् ब्रह्म्? वि??उ? प्?लनतत्पर? | रुद्र? स?ह्?रकर्त्? च ??वरस्तुसद्??इव? || ??वरो यस्तु देवे?इ त्रिको?ए तस्यस्थिति? | त्रिको?अमेतत्कथित? योनिम??अलमुत्तमम् || कक्?र्?ज्ज्?यये देवि सर्व�च वरवर्?इनि | कक्?र्?त्सर्वमुत्पन्न? क्?म? कैवल्यमेव च || अर्थोऽपि ज्?यते देवि सोऽपि धर्मबल्?द् तथ्? | सर्व्?स्?? देवत्?न्?�च कक्?रो म्?लमेव च || ?सन? त्रिपुर्?देव्य्?? कक्?र? प�चदैवत? | कक्?र्?त्क्?मद्? क्?मर्?पि?? स्फुरदव्यय्? || म्?त्? स्? सर्वदेव्?न्?? कैवल्यपदद्?यिन्? | कैवल्य? प्रपदे य(स्य्??)स्म्?त्क्?मिन्? स्? प्रक्?र्तित्? || क्?मिन्? ध्य्?नम् जव्?य्?वकसिन्द्?रसद्???? क्?मिन्?? पर्?म् | चतुर्भुज्?? त्रिनेत्र्?�च ब्?हुवल्ल्? विर्?जित्?म् || कदम्ब कोरक्?क्?रस्तनद्वयविभ्??इत्?म् | ?अ?खक?क?अकेय्?रैर?गदैरुप?ओभित्?म् || रत्नह्?रै? पु?पह्?रै? ?ओभित्?? परमे?वर्?म् | एव? हि क्?मिन्?? ध्य्?त्व्? कक्?र? द?अध्? जपेत् || प्रफुल्ल�च ततो जप्त्व्? जपस्य फलभ्?ग् भवेत् | एतत्ते कथित? देवि कक्?रतत्त्वमद्भुतम् || एतत्तु क्?लिक्?ब्?ज? प्रफुल्ल? ???उ सुन्दरि | प्?थ्व्?ब्?ज? ततो ध्?त्व्? व्?म्?क्?इस?युत? कुरु || बिन्द्वर्द्धस?युतो भ्?त्व्? प्रफुल्ल? भवति प्रिये | लक्?र? प्?थिव्? स्?क्??त्सर्वरत्नप्रद्?यिन्? || प्?त्??ग्?? प्?तवसन्?? प्?तविद्युल्लत्?क्?तिम् | सुखप्रसन्नवदन्?? रत्नकु??अल म??इत्?म् || एव? हि स?स्मरेद् ब्?ज? तद्?र्ध्वे क्?मिन्? पर्?म् | कक्?र स?युत? क्?त्व्? प्रफुल्ल? भ्?वयेत्प्रिये || मर्दिन्? य्? महे??नि स्? व्?म्? परमे?वरि | प्रतप्तक्?�चन्?भ्?स्?? द?अब्?हुसम्?न्वित्?म् || त्रिभ?गललित्?क्?र्?? ज??ज्??अविभ्??इत्?म् | त्रिलोचन्?? चन्द्ररेख्?? महि??सुरमर्दिन्?म् | सि?ह्?सनगत्?? देव्?? म्?वये द्वै??अवोत्तग? ||
SKबहुर्?पमय्?? देव्?? कक्?र? क्?मिन्? पर्?म् | ?उक्लवर्??? रक्तवर्??? (प्?तवर्???) प्?तचम्पकह्?सिन्?म् || हरिद्वर्??? क्???अवर्??? न्?न्?चित्रस्वर्?पि??म् | उत्पत्ते? क्?र?अ? भ्?मेर्देव्?न्?? चैव प्?र्वति || ब्?जमेतन्मह्?गुह्य? वि??ओर्जन्मस्थल? सद्? | तद्?र्ध्वे न्?दतत्त्व�च योनिर्?प्?? सन्?तन्?म् || प्रतप्तक्?�चन्?भ्?स्?? त्रिको??? ?अ?इ?एखर्?म् | ???ग्?ररससन्दोहै? प्?रि(जि)त्?? परमे?वर्?म् || तद्?र्ध्वे भ्?वयेद्बिन्दु? ?इव?अक्तिमय? सद्? | ??न्यर्?प? ?इव? स्?क्??द्बिन्दु? परमकु??अल्? || ??न्यभ्?ग? कल्?युक्तो बिन्दु?च मोक्?अदोऽव्यय? | स्?र्द्धत्रिवलय्?क्?र्? को?इविद्युत्समप्रभ्? || सर्प्?क्?र्? ?इव? वे??य तत्रैव स?स्थित्? सद्? | एव? हि स?स्मरेद्भक्त्य्? ब्?ज?अक्तिसम्??रित्?म् || ब्?ज्?त्तु ज्?यते ब्रह्म्? ज्�?न्?त्म्? परमे?वर? | ?अब्द ब्रह्ममयो भ्?त्व्? ??वर? क्?र्यक्?र?अम् || क्???अस्य च�चल्?प्??गि म्?त्? स्? क्?मिन्? पर्? | ब्?ज्?च्चैव्?ऽ?कुरे ज्?ते ब्?ज? नि?फलत्?? व्रजेत् || एतद्ब्?ज? वर्?रोहे सद्? स्?रमय? विभु | लक्?रस?युत? भ्?त्व्? प्रस्?ते हरिमव्ययम् || स्वय? ?अक्तिर्हरिर्भ्?त्व्? ज्?यते न्?त्र स??अय? | कक्?रस?युत्? भ्?त्व्? ?अक्तिर्?विरभ्?त्स्वयम् || जन्मकर्म्??इ सर्व्??इ प्रक्?तेरस्ति भ्?मिनि | जपे ध्य्?ने च प्?ज्?य्?? प्रक्?ति? सुप्रति??हित्? || कक्?रस्योर्ध्वको?ए तु प्र्??ओ व्?यु? प्रति??हित? | अप्?नो व्?मको?ए च स?स्थित?च सद्? प्रिये || सम्?नोदक्?इ?ए को?ए ?उद्धस्फ?इक सन्निभ? | उद्?नस्त्व???क्?रे म्?त्र्?य्?? व्य्?न एव च | एतत्ते कथित? देवि कक्?रतत्त्वमद्भुतम् || नवतत्त्व? कक्?रस्य ज्�?त्व्? य? कुरुते जपम् | स जप?च�चल्?प्??गि जप एव न स??अय? || एतत्तत्वमविज्�?य प्रजपेद्यदि को?इध्? | न तज्जप्त? वर्?रोहे सद्? त्व्?वर्तन? भवेत् || नवतत्त्वनिर्?प?अम् देवतत्त्व? प्र्??अतत्त्व? बिन्दुतत्त्व�च सुन्दरि | ज्�?नतत्त्व? ?अक्तितत्त्व? योनितत्त्व? तथैव च || नवतत्त्वमिद? प्रोक्त? क्?मधेनुमत? प्रिये | क्?लितो नहिदेवो हि विद्य्? मन्त्र?च सर्वथ्? ||
SKन ?अप्त? परमे??नि न विद्धो वरवर्?इनि | सर्वे??? ज?गम्?द्?न्?? स्थ्?वर्???न्तु योगिनि || देवत्? म्?त्?क्? म्?य्? स्???इस्थित्यन्तक्?रि?? | एक्?क्?अरविह्?नत्व्?द् ब्रह्महत्य्? वर्?नने || कस्य स्य्?द्व?अग्? देव्? ह्?दये भ्?वयेत्प्रिये | भ्?वन्?दक्?अर?रे?य्?? स्?क्??द् ब्रह्म न स??अय? || अक्?अरे द्??अ?अ? न्?स्ति ?अप्त्?दि कमल्?नने | द्??अ?अ? यत्क्?त? देवि ह्?दिस्थ? भ्?वयेत्प्रिये || रक्?अ??र्थ? सुर्???�च ह्य्?त्मनो गोपन्?य च | म्?नव्?? परमे??नि वर्?क्?? क्?उद्रबुद्धय? || म्?नवस्य च रक्??र्थ? रक्??र्थ? पन्नगस्य च | मयैव निर्मितौ देवि विद्य्?मन्त्रौ पुरैव हि || अत-एव महे??नि ह्यसुर्?? क्?अयम्?गत्?? | तस्म्?त्सर्व प्रयत्नेन जप? कुरु वर्?नने || मन्त्र्?र्थनिर्?प?अम् य्?मले ? देवत्?य्?? ?अर्?रन्तु ब्?ज्?दुत्पद्यते ध्रुवम् | भ्?त?उद्धौ ? ध्य्?नेन परमे??नि यद्र्?प? समुपस्थितम् | तदेव परमे??नि मन्त्र्?र्थ? विद्धि प्?र्वति || मन्त्रस्थ्?नम्?ह तन्त्रे ? स्थ्?नस्थ्? वरद्?मन्त्र्? ध्य्?नस्थ्??च फलप्रद्?? | ध्य्?नस्थ्?नविनिर्मुक्त्?? सुसिद्ध्? अपि वैरि?अ? || मन्त्रस्थ्?नम् मन्त्रस्थ्?न? प्रवक्?य्?मि ???उ देवि वर्?नने | सकल? नि?फल? स्?क्?म? तथ्? सकलनि?फलम् || कल्?भिन्न? कल्?भ्?त? ?ओ?ह्?मन्त्र? ?इवोऽव्रव्?त् | सकल? ब्रह्मरन्ध्रस्थ? तदधो विद्धि नि?फलम् || म्?नस? स्?क्?मम्?ख्य्?तो ह्?त्स्थ? सकलनि?फल? | बिन्दुस्थित? कल्?भिन्न? कल्?त्?तस्तद्?र्ध्वत? || कल्? कु??अलिन्? चैव न्?द? ?अक्ति? ?इवोदित्? | ?अ?कस्थ्?नस्थित्? मन्त्र्?? स्थ्?नस्थ्?? परिक्?र्तित्?? || ध्य्?नन्तु स्वरव्य�जनभेदेन मन्त्रघ?अक्?भ्?तवर्?अचिन्तनमेवेत्यर्थ? | भ्?त?उद्धौ ? चैतन्यरहित? मन्त्र? यो जपेत्स च प्?पक्?त् | मन्त्र्??चैतन्यसहित्?? सर्वसिद्धिकर्?? स्म्?त्?? || मन्त्रचैतन्य्?दिनिर्?प?अम् चैतन्य? सर्वमन्त्र्???? ???उ?व कमल्?नने | सहस्र्?र? ?इवपुर? कल्पव्?क्?अ? मनोहरम् || चतुर्वेद चतु???ख? नित्य? पु?पफल्?न्वितम् | प्?त? रक्त? तथ्? ?वेत? क्???अ�च हरित? तथ्? ||
SKभ्रमरै? कोकिलैर्देवि बहुपु?पोप?ओभितम् | एव? कल्पद्रुम? ध्य्?त्व्? तदधोरत्नवेदिक्?म् || तत्रोपरि महे??नि पर्य?क? सुमनो हरम् | न्?न्?पु?पस?युतय्? रचित? हेमम्?लय्? || तत्रोपरि मह्?देव? मह्?कु??अलिन्?युतम् | एव? ध्य्?त्व्? जपेन्मन्त्र? मह्?देवि त्रिवर्गद्?म् || ?नन्द्??र?इ पुलको देह्?वे?अ? सुरे?वरि | गद्गदोक्ति?च सहस्? ज्?यते न्?त्र स??अय? || सक्?दुच्चरितेऽप्येव? मन्त्रे चैतन्यस?युते | ?अते सहस्रे लक्?ए व्? को?इज्?पेन तत्फलम् || इत्येतत्कथित? देवि मन्त्रचैतन्यमुत्तमम् | वि??उमन्त्रे तथ्? ?ऐवे ?अक्तिमन्त्रे सुरे?वरि | मन्त्र्?र्थ? मन्त्रचैतन्य? यत्नत? समुप्?चरेत् || योनिमुद्र्? योनिमुद्र्?म्?ह तन्त्रमुक्त्?वल्य्?? ? उपवि?य्?सने मन्त्र्?प्र?मुखो व्?प्युद?मुख? | ?अ?चक्र? चिन्तयेद्देवि प्र्???य्?मपुर?सरम् || चतुर्दल? स्य्?द्?ध्?र? स्व्?धि??ह्?नन्तु ?अ?दलम् | न्?भौ द?अदल? पद्य? स्?र्यस?ख्यदल? ह्?दि || क??हे स्य्?त्?ओ?अ?अदल? भ्र्?मध्ये द्विदल? तथ्? | सहस्रदलम्?ख्य्?त? ब्रह्मरन्ध्रे मह्?पथे || ?ध्?रे कन्दमध्यस्थ? त्रिको?अमतिसुन्दरम् | त्रिको?अमध्ये देवे?इ क्?मब्?ज? सुलक्?अ?अम् || क्?मब्?जोद्भव? तत्र स्वयम्भ्?लि?गमुत्तमम् | तस्योपरि पुनर्ध्य्?येत् चित्कल्?? ह?सम्??रित्?म् || ध्य्?येत्कु??अलिन्?? देव्?? स्वयम्भ्?लि?ग वे??इत्?म् | चित्कल्?? त्?? कु??अलित्?? तेजोर्?प्?? जगन्मय्?म् || ?ध्?र्?द्?नि पद्म्?नि भित्त्व्? तेज? स्वर्?पि??म् | ह?सेन मनुन्? देव्?? ब्रह्मरन्ध्र? नयेत्सुध्?? || सद्??इवेन देव्? स्? क्?अ?अम्?त्र? रमेत्प्रिये | अम्?त? ज्?यते देवि तत्क्?अ??त्परमे?वरि || तदुद्भव्?म्?त? देवि ल्?क्??रस समोपमम् | तेन्?म्?तेन देवे?इ तर्पयेत्परदेवत्?म् || ?अ?चक्रदेवत्?स्तत्र सन्तर्प्य्?ऽम्?तध्?रय्? | ?नयोत्तेन म्?ग्रे?अ म्?ल्?ध्?र? पुन? सुध्?? || ततस्तु परमे??नि अक्?अम्?ल्?? विचिन्तयेत् | चित्रि?? विसतन्त्व्?भ्? ब्रह्मन्???गत्?न्तर्? || तय्? स?ग्रथित्? मध्ये स्?क्??ज्ज्?ग्रत्स्वर्?पि?? | अनुलोम विलोमेन मन्त्रवर्?अविभेदत? ||
SKमन्त्रे??ऽन्तरित्?न्वर्??न्वर्?एन्?ऽन्तरित? मनुम् | कुर्य्?द्वर्?अमय्?? म्?ल्?? सर्वमन्त्रप्रक्??इन्?म् || चरम्?र्?अ? मेरुर्?प? ल?घन? नैव क्?रयेत् | सबिन्दु? वर्?अमुच्च्?र्य प?च्?न्मन्त्र? जपेत्सुध्?? || अक्?र्?दि लक्?र्?न्तमनुलोम इति स्म्?तम् | पुनर्लक्?रम्?रभ्य ?र्?क??ह्?न्त? मनु? जपेत् || विलोम इति विख्य्?त? क्?अक्?र? केवल? जपेत् | वर्??न्?म??अवर्?एन त्व??अव्?र? जपेत्सुध्?? || अ क च ?अ त प य ?? इत्येव? च्???अवर्गक्?? | अ??ओत्तर?अत? म्?लमन्त्र? ज्�?नेन स?जपेत् | योनिमुद्र्? महे??नि तव स्नेह्?त्प्रक्??इत्? || मन्त्र्?र्थ? मन्त्रचैतन्य? योनिमुद्र्?? नवेत्ति य? | ?अतको?इजपेन्?ऽपि तस्य सिद्धिर्न ज्?यते || इति योनिमुद्र्? मन्त्र?इख्?निर्?प?अम् मन्त्र?इख्?म्?ह य्?मले ? ???उदेवि प्रवक्?य्?मि सर्वज्�?नोत्तमोत्तमम् | यस्य विज्�?नम्?त्रे?अ क्?इप्र? विद्य्? प्रस्?दति || म्?लकन्दे तु य्? देव्? भुजग्?क्?रर्?पि?? | तद्भ्रम्?वर्तव्?तो य? प्र्??अ इत्युच्यते बुधै? || भिल्ल्?व्?ऽव्यक्तमधुर्? कुजन्तो सततोत्थित्? | गच्छन्त्? ब्रह्मरन्ध्रे?अ प्रवि?अन्ति स्वकेतनम् || य्?त्?य्?तक्रमे?ऐव तत्र कुर्य्?न्मनोत्नयम् | तेन मन्त्र?इख्? ज्?त्? सर्वमन्त्रप्रद्?पिक्? || तम?प्?र्?ए ग्?हे यद्वत् न कि�चित्प्रतिभ्?सते | ?इख्?ह्?न्?स्तथ्? मन्त्र्? न सिद्ध्यन्ति कद्?चन || ?इख्?पदे?अ? सर्वत्र गोपित? परमे?वरि | विन्? येन न सिद्धि? स्य्?द्वर्?अको?इ?अतैरपि | तस्म्?त्त्वय्?पि गिरिजे गोपन्?य? प्रयत्नत? || अ?औचभ?ग? रुद्रय्?मले ? ज्?तस्?चकम्?दौ स्य्?दन्ते च म्?तस्?तकम् | स्?तकद्वयस?युक्तो न मन्त्र? सिद्धिद्?यक? || जप्?दौ ज्?तस्?तक? जप्?न्ते च म्?तस्?तकमिति स्?तकद्वयमित्यर्थ? | य्?मले ? ब्रह्मब्?ज? मनोर्दत्त्व्? च्?द्यन्ते परमे?वरि | सप्तव्?र? जपेन्मन्त्र? स्?तकद्वयमुक्तये || स्?तकद्वयमुक्तये मनोर्?द्यन्ते ब्रह्मब्?ज? प्र?अव? दत्त्व्? जप्?दौ सप्तव्?र? जप्?न्ते च सप्तव्?र? त? मनु? जपेदित्यर्थ? |
SKस्?तकद्वयमुक्तो य? स मन्त्र? सर्वसिद्धिद? | चतुर्द?अ स्वरो देवि पु?य? सिद्धि प्रद्?यक? | न्?दबिन्दुसमोपेतो द्?र्घ प्र?अव उच्यते || स्त्र्???द्र्???म?ऐचभ?ग? तन्त्रोक्त? प्र?अव? सोऽपि स्त्र्???द्र्???? प्र?अस्यते | तस्म्?त्स्त्र्???�च ??द्र्???? स एव परिक्?र्तित? || भ्?त?उद्धौ ? तन्त्रोक्त? प्र?अव? देवि वह्निज्?य्?? सुरे?वरि | प्रजपेत्सतत? ??द्रो न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? || तेन प्र?अवपु?इतमन्त्रजपस्थले स्त्र्? ??द्र?च ओ?क्?रपु?इत? क्?त्वैव मन्त्र? जपेत् | तन्त्रोक्त्? वह्निज्?य्? तु ह्?दयमेव (नम?) स्व्?ह्?स्थ्?ने च नम? पद? प्रयोज्य न्य्?सजप्?दिक? कुर्य्?दिति ज्�एयम् || ग?अन्?विधि? ग?अनविधिम्?हय्?मले ? ग?अन्?विधिमुल्ल?घ्य यो जपेत् तज्जप? यत? | ग्?ह्?अन्ति र्?क्?अस्?स्तेन ग?अयेत्सर्वथ्? बुध? || न्?क्?अतैर्हस्तपर्वैर्व्? न ध्?न्यैर्न च पु?पकै? | न चन्दनैर्म्?तिकय्? जपस?ख्य्?? तु क्?रयेत् || ल्?क्??कु??दसिन्द्?र? गोमय�च कर्??अकम् | विलो?य गु?इक्?? क्?त्व्? जपस?ख्य्?? तु क्?रयेत् || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरि क्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? जपलक्?अ??दिनिर्?अयो न्?म नवमोल्ल्?स? || ९ || द?अमोल्ल्?स? मह्?सेतुनिर्?प?अम् अथ मह्?सेत्त्व्?द्?न्?? प्रयोजनम्?ह ? मह्?सेतु? विन्? देवि यो जपेत् सतु प्?पभ्?क् | ?दौ जप्त्व्? मह्?सेतु? तत? सेतु? ततो मनुम् | एव? क्रमैर्वर्?रोहे यथे??अ? जपम्?चरेत् || सेतुम?गलतन्त्रे ? यो जपेत्परमे??नि विन्? सेतु? मह्?मनुम् | तस्य सर्व्?र्थह्?नि? स्य्?न्म्?ते च नरक? व्रजेत् || मह्?सेतु? मह्?सेतुम्?ह य्?मले ? मह्?सेतु?च देवे?इ सुन्दर्य्? भुवने?वर्? | क्?लिक्?य्?? स्वब्?जन्तु त्?र्?य्? क्?र्च उच्यते | अन्ये??न्तु वध्?ब्?ज? मह्?सेतुर्वर्?नने || वध्?ब्?जम्?ह रुद्रय्?मले ? ?क्???द्य? चतुर्थ्?द्य? यक्?र्?न्त? च स?हतम् | लक्?म्?बिन्दुयुत? देवि वध्?ब्?जमुद्?ह्?तम् ||
SK?क्???द्य? सक्?र? चतुर्थ्?द्य? तक्?र?, यक्?र्?न्त? रेफ? | स?हत? एतत्त्रितय स?युक्तम् | लक्?म्?? ?क्?र? बिन्दुरनुस्व्?र?, त्?भ्य्?? युतम् | एतेन स्त्र्?मिति | मह्?सेतु? विन्? देवि न जप्तव्य? कद्?चन | ?अतको?इजपेन्?ऽपि तस्य सिद्धिर्न ज्?यते || सेतुनिर्?प?अम् सेतुमन्त्र? महे??नि सर्वे??? कुल्लुक्?? ???उ | सेतुविद्य्? महे??नि स्?क्??द् ब्रह्मस्वर्?पि?? || ?द्?वन्ते च देवे?इ जपेत्त्?? तु जप्?न्मनो? | तत? सिद्धो भवेद्देवि मन्त्रो विद्य्? वि?ए?अत? || अन्यथ्? विफल? देवि नि?चय? वचन? मम | प्?र्?वयो? सेतुम्?ध्?य जपकर्म सम्?चरेत् || नि?सेतुसलिल? यद्वत्क्?अ??न्निम्न? प्रसर्पति | मन्त्रस्तथैव नि?सेतु? क्?अ??त्क्?अरति यज्वन्?म् || ?द्?वन्तेचेति | मनोर्जप्?त् ?दौ तदन्ते च सेतुविद्य्?? जपे दित्यर्थ? | सम्?न्यसेतु? स्?म्?न्यसेतुम्?ह ? विप्र्???? प्र?अव? सेतु? क्?अत्रिय्???? तथैव च | वै?य्?न्?? तु फ?अर्?अ? स्य्?न्म्?य्? ??द्रस्य कथ्यते || वि?ए?असेतु? वि?ए?असेतुम्?ह य्?मले ? ???उ देवि प्रवक्?य्?मि सुन्दर्य्?? सेतुमुत्तमम् | म्?य्?ब्?ज? समुद्ध्?त्य सौभ्?ग्य? च तत? परम् || पुनर्म्?य्?? समुद्ध्?त्य विद्येय? त्र्यक्?अर्? पर्? | सुन्दर्?वि?अये सेतु? कथित? परमे?वरि || सौ स्वर्?पम् | भ्?ग्य? विसर्ग? | मन्त्रो यथ्? ? ह्र्?? सौ? ह्र्?? | अथ वक्?ये महे??नि भैरव्य्?? सेतुमुत्तमम् | हरप्रिय्?? समुद्ध्?त्य सुरस्? च तत? परम् || औदर्यस?युत क्?त्व्? बिन्द्वर्द्ध स?युत? कुरु | इय? विद्य्? वर्?रोहे भैरव्य्?? सेतुर्?पि?? | मन्त्रो यथ्? ? ह्स | प्र?अव? प्?र्वमुद्ध्?त्य ह्?ल्लेख्? तदनन्तरम् | ए?? च द्व्यक्?अर्? विद्य्? त्?र्?य्?? सेतुरुच्यते || मन्त्रो यथ्? ? ओ? ह्र्?? | ?य्?म्?य्?? ? ऐ?वर्य ब्?जमुद्ध्?त्य क्?र्चब्?ज? समुद्धरेत् | पुनरै?वर्यमुद्ध्?त्य बिन्द्वर्द्ध स?युत? कुरु || सेतुरे?? महे??नि ?य्?म्?य्?? परिक्?र्तित्? | मन्त्रो यथ्? ? ऐ? ह्?? ऐ? | भुवने?य्?? ? प्र?अव? प्रथम? देवि ह्?ल्लेख्?द्वितय? तत? | तत?च परमे??नि प्र?अवद्वयमुद्धरेत् ||
SKभुवने?य्?? महे??नि विद्येय? सेतुरुच्यते | मन्त्रो यथ्? - ओ? ह्र्?? ह्र्?? ओ? ओ? | अन्नद्?य्?? ? अथ वक्?ये महे??नि च्?न्नद्?सेतुमुत्तमम् | ?दौ म्?य्?? समुच्च्?र्य वह्निज्?य्? समुद्धरेत् || मन्त्रो यथ्? ? ह्र्?? स्व्?ह्? | महि?अमर्दिन्य्?? ? अथ वक्?ये महे??नि मर्दिन्य्?? सेतुमुत्तमम् | ह?स-(वर्?अ?)र्?प? समुद्ध्?त्य र?जिन्युपरि स?स्थितम् || ?तिवर्?अयुत? क्?त्व्? विन्द्वर्द्ध स?युत? कुरु | तत?च परमे??नि वह्निज्?य्?? उद्धरेत् || त्र्यक्?अर्?य? सेतुविद्य्? मर्दिन्य्?? परिक्?र्तित्? | मन्त्रो यथ्? ? ह्र्?? स्व्?ह्? | वि??ओ? ? प्र?अव? प्?र्वमुद्ध्?त्य व्?सव्? द्य? तत? परम् | इन्दिर्?स?युत? कुर्य्?द्यत्नत? परमे?वरि || प्.२०७) ???त्मकमक्?अर? चोक्त्व्? तत? परमुद्?रयेत् | ब्?लिब्?ज? समुद्ध्?त्य एधित्? सयुत? कुरु || पुन? प्र?अवमुद्ध्?त्य वि??ओ? सेतु? ?उचिस्मिते | मन्त्रो यथ्? - ओ? वि??एव ओ? ?र्?क्???अस्य ? प्र?अव? प्?र्वमुद्ध्?त्य मन्मथ? तदनन्तरम् | पुन? प्र?अवमुद्ध्?त्य सेतुमन्त्र? मनोहरम् || ?र्?क्???अवि?अये सेतुस्त्र्यक्?अर? समुद्?ह्?त? || मन्त्रो यथ्? - ओ? क्ल्?? ओ? र्?मस्य ? ???उ कमलपत्र्?क्?इ सेतु? र्?मस्य सुन्दरम् | प्र?अव? प्?र्वमुद्ध्?त्य र्?जह?स? तत? परम् || ?च्?र्य स?युत? क्?त्व्? बिन्द्वर्द्धस?युत? कुरु | पुन? प्र?अवमुद्ध्?त्य विद्येय? सेतुर्?पि?? || त्र्यक्?अर्?य? मह्?विद्य्? सेतुविद्य्? प्रक्?र्तित्? | मन्त्रो यथ्? - ओ? र्?? ओ? ?इवस्य ? ह?सयुक्त? समुद्ध्?त्य समुद्रर्?पि?अ? तत? | चन्द्र्?र्द्ध स?युत? देवि कुरु यत्नेन प्?र्वति | ए?? च द्व्यक्?अर्? विद्य्? ?इवस्य सेतुर्?पि?? || मन्त्रो यथ्? ? ह?स? | अन्ये?उ देवोदेवे?उ प्र?अव? सेतुरुच्यते | सर्वे??? ??द्रज्?त्?न्?मौ?क्?र? सेतुरुच्यते || अथ कवचसेतु? यत्र यत्र विनिर्दि??अ? सेतुमन्त्र? ?उचिस्मिते | तन्मन्त्र? त्रिगु?अ? क्?त्व्? सेतुमन्त्र? कुरु प्रिये || कवचस्य महे??नि सेतुर्भवति सुन्दरि | सेतु? विन्? महे??नि कवच? य? प?हेन्नर? ||
SKस भक्?ये ज्?यते देवि योगिन्?न्?? ?उचिस्मिते | वै??अवे ग्??अपत्ये च ?ऐवे ??क्ते ?उचिस्मिते | ?द्?वन्ते मह्?सेतु? दत्त्व्? तु कवच? प?हेत् || कुल्लुक्? प्रयोजनम् अथ कुल्लुक्? प्रयोजनम्?ह ? रुद्रय्?मले ? अज्�?त्व्? कुल्लुक्?? देवि मह्?मन्त्र? जपेत्तु य? | तस्य न?यन्ति चत्व्?रि ?युर्विद्य्? य?ओ बल(धन)म् || कुल्लुक्?�च न ज्?न्?ति मह्?मन्त्र? जपेन्नर? | प�चत्व? ज्?यते तस्य अथव्? व्?तुल्? भवेत् || अज्�?त्व्? कुल्लुक्?मेत्?? जपते योऽधम? प्रिये | प�चत्वम्??उ लभते सिद्धिह्?नि?च ज्?यते || तथ्? जप्?दिक? सर्व? नि?फल? न्?त्र स??अय? | तस्म्?त्सर्वप्रयत्नेन प्रजपेन्म्?र्ध्नि कुल्लुक्?म् || व्?र्?ह्? तन्त्रे ? जप? सम्?रभेन्मन्त्र्? कुल्लुक्?द्य? यथ्?विधि | प्?ज्?? जप? सम्?प्यैव स्तुत्व्? च कवच? प?हेत् || कुल्लुक्?निर्?प?अम् वि?उद्धे?वरतन्त्रे ? गुह्य्?द् गुह्यतर? देवि तव स्नेहेन कथ्यते | त्?र्?य्?? कुल्लुक्? देवि मह्?न्?लसरस्वत्? || मन्तो यथ्? ? ह्र्?? स्त्र्?? ह्?? | प�च्?क्?अर्? क्?लिक्?य्?? कुल्लुक्? परिक्?र्तित्? | क्?ल्? क्?र्च? वध्?र्म्?य्? फ?अन्त्? परमे?वरि || मन्त्रस्तु ? क्र्?? ह्?? स्त्र्?? ह्र्?? फ? | छिन्न्?य्?स्तु महे??नि कुल्लुक्?ऽ???क्?अर्? भवेत् | वज्रवैरोचन्?ये च अन्ते वर्म प्रक्?र्तयेत् || मस्त्रस्तु ? वज्रवैरोचन्?ये ह्?? | प्रस्?दब्?ज? ?अम्भोस्तु म�जुघो?ए ?अ?अक्?अर्? | लल्??अवचन? चैव ध्यर्?अ? चन्द्रयुत? स्मरेत् || मन्त्रस्तु ?इवस्य ? हौ?, म�जुघो?अस्य तु अरवचन ध्?? | भुवने?य्??च ह्र्?? ब्?ज? वि??ओर्वै च्???अवर्?इक्? | नमो न्?र्?य??येति प्र?अव्?द्य्? च कुल्लुक्? || भुवने?वय्?? ? ह्र्?? | वि??ओ? - ओ? नमो न्?र्?य??य | वर्मब्?ज? तु भैरव्य्?? कुल्लुक्? परिक्?र्तित्? | मन्त्रो यथ्? ? ह्?? | ?र्?मत्त्रिपुरसुन्दर्य्?? कुल्लुक्? द्व्?द??क्?अर्? | व्?ग्भव? क्?मब्?ज�च लज्ज्?�च त्रिपुरे तत? | भगवतिपद? प?च्?दन्ते ?हद्वयमुद्धरेत् || मन्त्रस्तु ? ऐ? क्ल्?? ह्र्?? त्रिपुरे भगवति स्व्?ह्? | अथव्? ? व्?ग्भव? प्रथम? ब्?ज? क्?मर्?जमनन्तरम् |
SKलज्ज्?ब्?ज? क्रोधब्?ज? फ?अन्त�च समुद्धरेत् || मन्त्रस्तु ? ऐ? क्ल्?? ह्र्?? ह्?? फ? | अथव्? क्?मब्?ज्?ख्य्? कुल्लुक्? परिक्?र्तित्? | मन्त्रस्तु ? क ए ? ल ह्र्?? | सरस्वत्य्? व्?ग्भव�च अन्नद्?य्?स्त्वन?गकम् || सरस्वत्य्?? ऐ? | अन्नद्?य्?? ? क्ल्?? | म्?त?ग्य्?? प्रथम? ब्?ज? म्?य्? ध्?म्?वत्?? प्रति | म्?त?ग्य्?? - ओ?; ध्?म्?वत्य्?? ह्र्?? | बगल्?य्? वध्?ब्?ज? लक्?म्य्??च निजब्?जकम् || बगल्?य्?? स्त्?? | लक्?म्य्?? ? ?र्?? | धनद्?य्? वध्?ब्?ज? कुल्लुक्? परिक्?र्तित्? | मन्त्रो यथ्? ? स्त्र्?? | अपरे??�च देव्?न्?? स्वमन्त्र? परिक्?र्तित? | अन्य्?स्?? तु पर्?ब्?ज? कुल्लुक्? परमे?वरि || र्?मस्य ? प्र?अव? प्?र्वमुद्ध्?त्य र्?जह?स? तत? परम् | ?च्?र्य स?युत? क्?त्व्? बिन्द्वर्द्ध? स?युत? कुरु || पुन? प्र?अवमुद्ध्?त्य विद्येय? सेतुर्?पि?? | एत्?? विद्य्?? वर्?रोहे मन्मथै? पु?इत्?? कुरु | तद्? भवति देवे?इ र्?मस्य स्वर्गदुर्लभ्? || प�च्?क्?अर्? मह्?विद्य्? सर्वतन्त्रे?उ गोपित्? | मन्त्रस्तु ? क्ल्?? ओ? व्?? ओ? क्ल्?? | इत्येव? कथित्? देवि स?क्?एप्?त्कुल्लुक्? मय्? || सेतुम?गलतन्त्रे ? व्?ग्भव? प्?र्वमुद्ध्?त्य मन्मथ? तदनन्तरम् | भ्?गुब्?ज? समुद्ध्?त्य मनुसर्गयुत? कुरु || सुन्दर्?वि?अये बोध्य्? कुल्लुकेय? महे?वरि | मन्त्रो यथ्? ? ऐ? क्ल्?? सौ? | क्?मधेनु? समुद्ध्?त्य लोकबन्ध्?? तत? परम् | व्?मन्?यकब्?जस्तु पुनरुद्ध्?त्य सुन्दरि | ?तिब्?जयुत? क्?त्व्? बिन्द्वर्द्ध स?युत? कुरु || कुल्लुकेय? मह्?विद्य्? भैरव्य्?? परिक्?र्तित्? | मन्त्रस्तु ? कलर्?? | त्?र्?य्?? ? म्?य्?ब्?ज? समुद्ध्?त्यतत?च प्र?अवद्वयम् | पुनर्म्?य्?? समुद्ध्?त्य कुल्लुक्?जपम्?चरेत् || कुल्लुक्?जपम्?त्रे?अ सर्वसिद्ध्??वरो भवेत् || मन्त्रो यथ्? ? ह्र्?? ओ? ओ? ह्र्?? | क्?लिक्?य्?? ? प�च्?क्?अर्? क्?लिक्?य्?? कुल्लुक्? परिक्?र्तित्? | क्?ल्? क्?र्च? वध्?म्?य्? फ?अन्त्? परमे?वरि || मन्त्रो यथ्? ? क्र्?? ह्?? स्त्र्?? ह्र्?? फ? | भुवने?य्?? ?
SKक्?लक्??अप्र?अमन्?ब्?जमुद्ध्?त्य सुन्दरि | व्?मन्?यकब्?जेन स?युत? कुरु सुन्दरि | बिन्द्वर्द्ध स?युत? क्?त्व्? त्रिगु?अ? कुरु सुन्दरि || ए?? विद्य्? महे??नि कुल्लुक्? वि??उप्?जित्? || मन्त्रो यथ्? ? ह्र्?? ह्र्?? ह्र्?? | ?द्य्?न्ते परमे?अनि क्?र्चब्?जद्वय? कुरु | तद्? भवति विधेय? मर्दिन्य्?? कुल्लुक्? प्रिये || ?द्यन्ते ओ? ह्र्?? स्व्?ह्? ओ? इति मन्त्रस्य्?द्यन्तयो? ह्?? इति ब्?ज? क्?त्वेत्यर्थ? | तेन ह्?? ओ? ह्र्?? स्व्?ह्? ओ? ह्?? | प?उभ्?वे स्थित्? मन्त्र्?? केवल्? वर्?अर्?पि?अ? | एव? क्?ते महे??नि प्रभुत्व? प्र्?प्नुवन्ति ते | अन्यथ्? प?उवद्देवि न जपेत्तु कद्?चन || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरि क्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? सेतु मह्?सेतुकुल्लुक्? निर्?अयो न्?म द?अमोल्ल्?स? || १० || एक्?द?ओल्ल्?स? मुख?ओधनम् मुख?ओधनम्?ह स्?रस्वततन्त्रे ? अथ वक्?ये महे??नि मुख?ओधनमुत्तमम् | यन्न क्?त्व्? वर्?रोहे जप-प्?ज्? व्?थ्? भवेत् || अ?उद्ध जिह्वय्? देवि यो जपेत्सतु प्?पभ्?क् | द?अध्? प्रजपित्व्? वै मुख?ओधन म्?चरेत् || देव्युव्?च ? देवदेव मह्?देव ??लप्??ए पिन्?क्ध्?क् | प्?थक् प्?थग् देवत्?न्?? कथयस्व दय्?र्?अव | ?ओधन? सर्वविद्य्?न्?? मुखस्य द?अनस्य च || ?र्?मह्?देव उव्?च ? मह्?त्रिपुरसुन्दर्य्?? ???उ?व मुख?ओधनम् | ?र्?ब्?ज? प्र?अवो लक्?म्?स्त्?र? ?र्?? प्र?अवस्तथ्? || इम? ?अ?अक्?अर? मन्त्र? सुन्दर्य्? द?अध्? जपेत् | मन्त्रस्तु ? ?र्?? ओ? ?र्?? ओ? ?र्?? ओ? | ब्?ल्?य्?? ???उच्?र्व?गि सुख?ओधनमुत्तमम् | व्?ग्भव? भुवने?? च व्?ग्भव? सुरवन्दिते || ए?? च त्र्यक्?अर्? विद्य्? सद्?म्?तमय्? प्रिये | मन्त्रस्तु ? ऐ? ह्र्?? ऐ? | भैरव्य्?? ???उ च्?र्व?गि मुख?ओधनमुत्तमम् | प्र?अव�च हसौब्?ज? प्र?अव? सुरवन्दिते || इम? त्र्यक्?अरमन्त्र? च प्रथम? द?अध्? जपेत् || मन्त्रस्तु - ओ? हसौ? ओ? | ???उसुन्दरि ?य्?म्?य्?? मुख?ओधनमुत्तमम् | निज ब्?जत्रय? देवि प्र?अवत्रितय? तत? ||
SKक्?मत्रय? वह्निबिन्दुरतिचन्द्र्?र्द्धभ्??इतम् | ए?? नव्?क्?अर्? विद्य्? मुख?ओधन क्?रि?? || मन्त्रस्तु ? क्र्?? क्र्?? क्र्?? ओ? ओ? ओ? क्र्?? क्र्?? क्र्?? | त्?र्?य्?? ???उच्?र्व?गि अप्?र्व? मुख?ओधनम् | ज्?वन्? मध्य(म्?)ग्? लज्ज्? भुवने?? तत? परम् || त्र्यक्?अर्?य? मह्?विद्य्? जिह्व्?गेऽम्?तवर्?इ?? || मन्त्रस्तु ? ह्र्?? ह्?? ह्र्?? | अप्?र्व? ???उ च्?र्व?गि भुवन्?मुख?ओधनम् | द्व्?द?अस्वरमुद्ध्?त्य न्?दबिन्दुयुत? कुरु | एत्त्रिक? द?अध्? भुवने?? जपेत्सुध्?? || त्र्यक्?अर्?य? सम्?ख्य्?त्? न्?न्?सुख विल्?सिन्? ? मन्त्रस्तु? ऐ? ऐ? ऐ? | दुर्ग्?य्?? ???उच्?र्व?गि मुख?ओधनमुत्तमम् | द्व्?द?अ स्वरमुद्ध्?त्य बिन्दुयुक्त�चतत्त्रिकम् || मन्त्रस्तु ? ऐ? ऐ? ऐ? | अथ देवि प्रवक्?य्?मि बगल्?मुख?ओधनम् | व्?ग्भव? भुवने??न्? व्?ग्ब्?ज? सुरवन्दिते || ए?? तु त्र्यक्?अर्? विद्य्? सद्?ऽम्?तमय्? प्रिये | मन्त्रस्तु ? ऐ? ह्र्?? ऐ? | म्?त?ग्य्?? ?ओधन? देवि अ?कु?अ? व्?ग्भव? तथ्? | ब्?ज�च्??कु?अमेतद्धि विज्�एय? त्र्यक्?अर्?त्मकम् || त्र्यक्?अर्?य? सम्?ख्य्?त्? मुख?ओधनदुर्लभ्? | मन्त्रस्तु ? क्रो? ऐ? क्रो? | अपरैक? ???उ ?औ?हे लक्?म्य्??च मुख?ओधनम् | ?रिय्??च परमे??नि ब्?ज्?न्ते कमल्?नने | पुन? ?र्?ब्?जमुद्ध्?त्य मुख?ओधनम्?चरेत् || इय? सप्त्?क्?अर्? विद्य्? चतुर्वर्गमय्? सद्? | मन्त्रस्तु ? ?र्?? कमल्?नने ?र्?? | अपरैक? प्रवक्?य्?मि दुर्ग्?य्? मुख?ओधनम् | व्?ग्ब्?जपु?इत्? म्?य्? दुर्गे स्व्?ह्? तत? प्रिये || भुवने?? पुन?चैव व्?ग्ब्?जद्वय मेव च | इय? द??क्?अर्? विद्य्? सद्? मम ह्?दि स्थित्? || मन्त्रस्तु ? ऐ? ह्र्?? ऐ? दुर्गे स्व्?ह्? ह्र्?? ऐ? ऐ? | अपरैक? प्रवक्?य्?मि धनद्?मुख?ओधनम् | प्र?अव? द्?न्तमुद्ध्?त्य व्?मकर्?अ विभ्??इतम् || बिन्दुयुक्त? ब्रह्मब्?ज? विज्�एय? त्र्यक्?अर्?त्मकम् | मन्त्रस्तु - ओ? ध्?? ओ? ध्?म्?वत्य्? महे??नि ?ओधन? चैतदेव हि | मन्त्रस्तु - ओ? ध्?? ओ? भुवन्?य्?? स्वब्?जन्तु प्र?अव? व्? वि?ओधनम् || मन्त्रस्तु ? ह्र्? अथव्? ओ? | रुद्र्?र्??द??अमो देवि भ्?पु??यक्र्?रस?युत? |
SKएक्?क्?अर्?य? विद्य्? तु च्?न्नद्?मुख?ओधने || मन्त्रस्तु ? क्ल्?? | उच्छि??हच्????ल्?देव्य्? भद्रक्?ल्य्?स्तथैव च | जिह्व्?य्?? ?ओधन? भद्रे ???उ?व वरवर्?इनि | ?अ??हस्वर? बिन्दुयुक्त? लज्ज्?ब्?जनन्तरम् || पुनर्?द्य? महे??नि च्????ल्य्? मुख?ओधनम् || मन्त्रस्तु - ओ? ह्र्?? ओ? | चतुर्द?अस्वरे???ह्य? बिन्दुचन्द्र्?र्द्धभ्??इतम् | ?इवब्?ज? महे??नि भद्रक्?ल्य्? वि?ओधनम् | मन्त्रस्तु ? ह्रौ? | अन्य्?स्?? देवत्?न्?�च तथ्? वि??ओ? ?इवस्य च | अन्ये??�चैव देव्?न्?? प्र?अव? मुख?ओधनम् | म्?य्? व्? परमे??नि प्रजप्य मुख?ओधनम् || कुर्य्?दिति ?ए?अ? | अन्यदेवदेव्?न्?? मन्त्रस्तु - ओ? अथव्? ह्र्?? | अन्ये?उ सर्वदेवे?उ देव्??उ च वर्?नने | द?अध्? प्र?अवेनैव मुख?ओधन म्?चरेत् || मुख?ओधन म्?त्रे?अ जिह्व्?ऽम्?तमय्? भवेत् | अन्यथ्? वि?अस?युक्त्? जिह्व्? भवति सर्वद्? || भक्?अ?ए द्??इत्? जिह्व्? मिथ्य्?व्?देन द्??इत्? | कलहैर्दु?खित्? जिह्व्? न्?न्?दो?ए?अ द्??इत्? || त? कथ? प्?मरो लोको जिह्व्?य्?? प्रजपेन्मनुम् | स??ओधनमन्?चर्य न जपेत्प्?मर? क्वचित् || ??क्तो व्? वै??अवो व्?पि ग्??अप? सौर एव व्? | ?ऐवो व्?ऽप्यन्यभक्तो व्? क्?रयेन्मुख?ओधनम् | देवो यदि जपेन्मन्त्रमक्?त्व्? मुख?ओधनम् | सर्व? तस्य व्?थ्? देवि मन्त्रसिद्धिर्न ज्?यते || तस्म्?त्प्रयत्नतो देवि जिह्व्??ओध म्?चरेत् | अन्यथ्? प्रजपेन्मन्त्रमक्?त्व्? मुख?ओधनम् || पतन? तस्य देवे?इ यो जपेत्स च प्?पभ्?क् | तस्य्?त्प्रयत्नतो देवि जिह्व्??ओधन म्?चरेत् || इति स्?रस्वत तन्त्रोक्तमुख?ओधन विध्?नम् | निद्र्?भ?ग देव्युव्?च ? प्?ज्?क्?ले महे??न यदि निद्र्?तुरो मनु? | तत्कथ? सिध्यते मन्त्र? कि? कर्तव्य? तद्? प्रभो || प्रजपेत्केन विधिन्? न जपेद्व्? वद प्रभो | निद्र्?य्??चैव देवे?अ लक्?अ?अ? वद मे प्रभो || ??वर उव्?च ? ???उ देवि प्रवक्?य्?मि यन्म्?? त्व? परिप्?च्छसि | इ??य्?�च गते व्?यौ ?अक्तिमन्त्र? जपेत् प्रिये | र्?त्रौ जपैकम्?त्रे?अ च??इक्? वरद्? भवेत् || रुद्रय्?मले ?
SKपि?गल्?य्?? गते व्?यौ तद्? निद्र्?तुर? प्रिये | इ??य्?�च गते व्?यौ तद्? निद्र्?तुरो मनु? || एतत्ते कथित? देवि निद्र्?य्? लक्?अ?अ? प्रिये | प्रजपेद्यदि निद्र्?य्? कि? तस्य जप प्?जने || सर्व? तस्य व्?थ्? देवि अर?ये रोदन? यथ्? | रहस्य्?नेन च्?र्व?गि त्यक्तनिद्र्? सन्?तन्? || निद्र्?भ?गमन्त्र? ?दौक्?मकल्?ब्?ज? स्वमन्त्र्?न्तेऽपि तद् जपेत् | प्र्?य?चित्तमिद? देवि क्?त्व्? मन्त्र? जपेद्यदि | कि? तस्य दक्?इ?ओ व्?युस्तस्य निद्र्?तुरे?अ किम् || मन्त्रविद्य्?लक्?अ?अम् वि?वस्?रे ? मन्त्र्?? पु?दैवत्? ज्�एय्? विद्य्? स्त्र्?दैवत्? स्म्?त्? | पु?मन्त्र्? ह्?? फ?अन्त्?? स्युर्द्वि?ह्?न्त्?? स्यु? स्त्रियो मत्?? | नपु?सक्? नमोऽत्?? स्युरित्युक्त्? मनवस्त्रिध्? || द्?पन्? लक्?अ?अम् द्?पन्?म्?ह तन्त्रे ? योनिमन्त्र? मनोर्दत्त्व्? च्?द्यन्ते परमे?वरि | सप्तव्?र? जपेत्त? तु द्?पन्?य? प्रक्?र्तित्? || योनिमन्त्र ??क्?र? | त्?म्य्?? पु?इ?अ? म्?ल? सप्तव्?र? जपेदित्यर्थ? | तन्त्रे ? योनिमन्त्रे??ऽवय? सकल? तु विभ्?वयेत् | स्वक्?य्?त्म्?न? क्?मकल्?? विभ्?व्य जपप्?ज्?दिक? क्?र्यम् | तथ्?चोक्तम् ? ध्य्?त्व्? क्?मकल्?? देहे विद्य्?ज्?प? सम्?चरेत् | ध्य्?त्व्? क्?मकल्?र्?प म्?त्म्?न? चिन्तयेत्सद्? || तन्त्रे ? ?र्ध्वविन्द्व्?त्मक? वक्त्रमधोविन्दुस्तनद्वयम् | हक्?र्?र्ध? क्?मपुर? तथ्?त्मन? विचिन्तयेत् || एतत्क्?मकल्?ध्य्?न? गुह्य्?द्गुह्यतम? महत् | न्?ऽ?इ?य्?य प्रवक्तव्य? न्?मक्त्?य कद्?चन || लोम्?न्महोच्च देवे?इ यत्र कुत्र प्रक्??अयेत् | सोऽचिर्?न्म्?त्युम्?प्नोति ?अस्त्र्?घ्?तवि??दिभि? || योनिमन्त्र? योनिमन्त्रम्?ह य्?मले ? त्?र्यस्वरो बिन्दुयुतो न्?देन परिभ्??इत? | क्?मकल्? मह्?मन्त्रो मह्?क्?लेन क्?र्तित? | तस्य्?त्स्वक्?यम्?त्म्?न? ध्य्?येद्देव्य्?? स्वर्?पकम् || इतिपरिव्र्?चक्?च्?र्य परमह?सत्?थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्मनन्दगिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? मुख?ओधन निर्?अयो एक्?द?ओल्ल्?स? || ११ || द्व्?द?ओल्ल्?स? पुर?चर?अलक्?अ?अम् पुर?चर?अलक्?अ?अम्?ह ह?सम्?हे?वरे ? जपो होमस्तर्प?अ�च सेको ब्र्?ह्म?अभोजनम् | प�च्??गोप्?सन? लोके पुर?चर?अमि?यते ||
SKय्?मले ? प�च्??गोप्?सन? लोके ??क्तवै??अव भेदत? | पुर?चर?अमित्युक्त? ?इवेन परम्?त्मन्? || पुर?चर?अ प्रयोजनम् य्?मले ? ज्?वह्?नो यथ्? देह्? सर्वकर्मसुन क्?अम? | पुर?चर?अह्?नोऽपि तथ्? मन्त्र? प्रक्?र्तित? | तस्म्?दौ स्वय? कुर्य्?द् गुरु? व्? क्?रयेद् बुध? || रुद्रय्?मले ? पुर?चर?अ सम्पन्नो मन्त्रो हि फलद्?यक? | तत? पुरस्क्रिय्?? कुर्य्?द् मन्त्रवित् सिद्धिक्??क्?अय्? || कि? होमै? कि? जपै?चैव कि? मन्त्रन्य्?स विस्तरै? | रहस्य्?न्?�च मन्त्र्???? यदि न स्य्?त्पुरस्क्रिय्? | पुरस्क्रिय्? हि मन्त्र्???? प्रध्?नो ज्?व (ब्?जमु) उच्यते || पुर?चर?अप्?र्वदिनक्?त्यम् हवि?येनैव भोक्तव्य? क्?त्व्? देहवि?ओधनम् | प्र्?त? स्न्?त्व्? तु स्?वित्र्?? जपेत्प�चसहस्रकम् || त्रिसहस्र? सहस्र? व्? जपेद??ओत्तर? ?उचि? | ज्�?त्?ज्�?तस्य प्?पस्य क्?अय्?र्थ? प्रथम? तत? | विप्र्?न्सन्तो?अयेदन्नभोजन्?च्छ्?दन्?सनै? || तत्र्?दौ भ्?मिपरिग्रह? क्?र्य? | तदुक्त? वै?अम्प्?यन स?हित्?य्?म् ? ?द्?वमुकमन्त्रस्य पुर?चर?असिद्धये | मयेय? ग्?ह्यते भ्?मिर्मन्त्रो मे सिध्यत्?मिति || भ्?मे? परिग्रह? कुर्य्?त् परिम्???च्च सर्व?अ? | ग्र्?मे क्रो?अमित? स्थ्?न? नद्य्?दौ स्वेच्छय्? मितम् || नगर्?द्? वपि क्रो?अ? क्रो?अयुग्ममथ्?पि व्? | ?ह्?र्?दिविह्?र्?र्थ? तवत्?? भ्?मिम्??रयेत् | द्?पस्थ्?न? सम्??रित्य क्?त? कर्म फलप्रदम् || द्?पस्थ्?नम् द्?प्यते पुरु?ओ यत्र द्?पस्थ्?न तदुच्यते | चतुरस्र्?? भुव? भित्त्व्? को??ह्?न्?? नवक? लिखेत् || प्?र्वको??ह्?दि?उ लिखेत्सप्तवर्ग्?ननुक्रम्?त् | लक्?अम्??ए लिखेन्मन्त्र्? स्वरन्य्?सक्रम? ???उ || पुनरेव? मध्यको??ह? नवध्? विभजेत्सुध्?? | मध्य प्?र्व्?दिको??हे?उ स्वर्?न्युग्मक्रम्?ल्लिखेत् || यत्र प्?र्व्?दिको??हे?उ ग्र्?म्?द्य्?क्?अर स?स्थिति? | मुखन्तु तस्य ज्?न्?य्?द् हस्त्?वुभयत? स्थितौ || को??हे कुक्?? उभे प्?दौ द्वे ?इ??अ? पुच्छम्?रितम् | मुखस्थो लभते सिद्धि? करस्थ? स्वल्पज्?वन? ||
SKउद्?स्?न? कुक्?इस?स्थ? प्?दस्थो दु?खम्?प्नुय्?त् | पुच्छस्थ? प्??यते मन्त्र्? बन्धनोच्च्??अन्?दिभि? || क्?र्मचक्रमिद? प्रोक्त? मन्त्रि??? सिद्धिद्?यकम् | निर्म्?य विधिवत्कुर्य्?द् जप? तत्र ?उभे दिने || चन्द्रत्?र्?नुक्?ले च ?उक्लपक्?ए ?उभेऽहनि | ?रभेत पुर?चर्य्?? हरौ सुप्ते न च्?चरेत् || हरौ सुप्ते दक्?इ??यने इत्यर्थ? | तेन यद्दक्?इ??यन? नि?इद्धमुक्त?, तद्वि??उवि?अयम् | ?अक्तिवि?अये दक्?इ??यनेऽपि पुर?चर?अ? कर्तव्यम् | तथ्?चोक्त? य्?मले ? ?अरत्क्?ले मह्?प्?ज्? क्रियते य्? च व्?र्?इक्? | तस्मिन्पक्?ए वि?ए?ए?अ पुर?चर?अ म्?चरेत् || अन्यत्र्?पि ? ?अरत्क्?ले चतुर्थ्य्?दिनवम्?न्त? वि?ए?अत? | भक्तित? प्?जयित्व्? तु र्?त्रौ च्???असहस्रकम् | एक्?क्? निर्जने दे?ए जपे�च तिमिर्?लये || अ??असहस्रकमिति | अ???धिकसहस्र? प्रत्यह? जपेदित्यर्थ? | तिमिर्?लये अन्धक्?रवद् ग्?हे, न त्व्?लोक युक्ते इत्यर्थ? | केचित्तु तिमिर्?लये र्?त्र्?विति वदन्ति | तदसत् र्?त्रौ च्???असहस्रकमिति र्?त्रे? प्?र्व? प्र्?प्तत्व्?दिति दिक् || अथ पुर?चर?अदिन-क्?त्यम् बहुभि? र्वस्त्रभु??भि? सम्प्?ज्य गुरुम्?त्मन? | ?रभेत् जप? प?च्?त् तदनुज्�?पुर? सरम् || प्र्?त? स्न्?त्व्? महे??नि क्?ल्?न्?द्?य स्?धक? | कु??निक?अ म्?गत्य कुर्य्?त्तन्त्रोदित्?? क्रिय्?म् || क्??रिव्?क्?ओद्भव्?न् क्?ल्?नस्त्रमन्त्र्?भिमन्त्रित्?न् | निखनेद्द?अदिग्भ्?गे ते?वस्त्र�च प्रप्?जयेत् || क्?एत्रे तु क्?लिते मन्त्रो न विघ्नै? परिभ्?यते | अ?वत्थो?उम्बरप्लक्?अव???च क्??रि??खिन? || क्?एत्रप्?ल्?न्प्?जयित्व्? बलि? दद्य्?द्विध्?नत? | दिक्पतिभ्यो बलि? दत्त्व्? तत? क्?एत्र? सम्??रयेत् || क्?एत्रपलमन्त्रम्?ह तन्त्रे ? वर्??न्त औ बिन्दुयुत? क्?एत्रप्?ल्?य ह्?न्मनु? | त्?र्?द्यो वसुवर्?ओऽय? क्?एत्रप्?लस्य क्?र्तित? || मन्त्र? - ओ? क्?औ? क्?एत्रप्?ल्?य नम? | ?अ?द्?र्घभ्?ज्? ब्?जेन ?अ?अ?गन्य्?स म्?चरेत् | न्?ल्?�जन्?द्रिनिभ म्?र्द्धपि?अ?ग के?अ? व्?त्तोग्रलोचनमुप्?त्त गद्?कप्?लम् | ???म्बर? भुजगभ्??अ?अमुग्रद???र? क्?एत्रे?अमन्दुतमह? प्र?अम्?मि देवम् ||
SKइति ध्य्?त्व्? क्?एत्रपलम्?व्?ह्य अ??अदलपदे प्?जयेत् | अनल्?क्?अमग्निके?अ? कर्?ल? तदनन्तरम् | घ???ख? मह्? (क्रोध?) कोप? पि?इत्??अनमप्यथ || पि?गल्?क्?अम्?र्द्धके?अ? पत्रे?उ प्?र्वतोऽर्चयेत् | लोकप्?ल्??स्तदस्त्र्??इ यथ्?प्?र्व? प्रप्?जयेत् || ततो म्??अभक्तबलि? दद्य्?त् || मन्त्रम्?ह ??रद्?य्?म् ? प्?र्वमेहिद्वय? प?च्?द् विदु(द्वि)?इ स्य्?त्सुरद्वयम् | भ�जय द्वितय? भ्?यो तर्जय द्वितय? तत? || ततो विघ्नपदद्वन्द्व? मह्?भैरव तत्परम् | क्?एत्रप्?लबलि? ग्?ह्?अद्वय? प्?वकसुन्दरि | बलिमन्त्रोऽयम्?ख्य्?त? सर्वक्?मफलप्रद? || बद्ध्?�जलि ? ओ? त्?क्??अद???र मह्?क्?(ल)य कल्प्?न्त दहनोपम | भैरव्?य नमस्तुभ्यमनुज्�?? द्?तुमर्हसि || इत्यनुज्�?? लब्ध्व्? इन्द्र्?दिदिक्प्?ल्?न्प्?जयित्व्? भ्??अभक्तबलि? दद्य्?त् | ??रद्?य्?म् ? कु??निक?अम्?गत्य स्?म्?न्य्?र्ध? विध्?य च | द्व्?रप्?ज्?? विध्?य्?थ जपस्थ्?न? वि?ओधयेत् || व्?क्?अ?अ? म्?लमन्त्रे?अ ?अरे?अ प्रोक्?अ?अ? मतम् || पुर?चर?अ स?कल्प सनत्कुम्?रस?हित्?य्?म् ? प्र?अव? तत्सदद्येति म्?सपक्?अतिथ्?रपि | अमुकगोत्रोऽमुकोऽह? म्?लमुच्च्?र्य तत्परम् || सिद्धिक्?मोऽस्य मन्त्रस्य इयत्स?ख्यजप? तत? | द????अ? हवन? होम्?द्द????अ? तर्प?अ? तत? || द????अ? म्?र्जन? तस्य्?द्द????अ? विप्रभोजनम् | पुर?चर?अमेव? हिकरि?ये प्र्?गुद?मुख? || भ्?त?उद्धि? विध्?य्?दौ प्र्???य्?म? सम्?चरेत् | ??य्?दिक? तत? क्?त्व्? कल्पोक्तन्य्?सम्?चरेत् || तत? प्?ज्?दिक? क्?त्व्? यथ्?विधि जप? चरेत् | ?अनै? ?अनैरविस्प??अ? न द्रुत? न विलम्बितम् || क्रमे?ओच्च्?रयेद्वर्??न्?द्यन्त क्रमयोगत? | देवत्?? चित्तग्?? कुर्य्?त्कुर्य्?च्च ह्?दय? स्थिरम् | प्र्?त?क्?ल? सम्?रभ्य जपेन्मध्यन्दिन्?वधि || कुल्?र्?अवे ? यत्स?ख्य्? सम्?रब्ध? तज्जप्तव्य? दिने दिने | न्य्?न्?धिक? न कर्तव्य म्?सम्?प्त? कद्?चन || न्य्?न्?तिरिक्त कर्म्??इ न फलन्ति कद्?चन | यथ्?विधि क्?त्?न्येव तत्कर्म्??इ फलन्ति हि ||
SKस्न्?न? त्रिसवन? प्रोक्तम?अक्तौ द्वि?सक्?च्च व्? | मन्त्र? स्?धयम्?नस्तु त्रिसन्ध्य? देवमर्चयेत् || द्विक्?लमेकक्?ल? व्? न मन्त्र? केवल? जपेत् | उपच्?रै यथ्??अक्ति देवत्?मन्वह? यजेत् || न क्?उज्ज्?म्भ?अहिक्क्?दि विकल्?क्?तम्?नस? | मन्त्रसिद्धिमव्?प्नोति तस्म्?द्यत्नपरो भवेत् || यदि दैव्?द् ज्?म्भ??दिक? भवति, तद्? ?चम्य प्र्???य्?म? ?अ?अ?गन्य्?स? च क्?त्व्? ?ए?अ? जपेत् | स्?र्य? द्???व्? व्? जपेत् | तथ्? च योगिन्? ह्?दये ? पतित्?न्?मन्त्यज्?न्?? दर्?अने भ्??अ?ए क्?ते | क्?उतेऽधोव्?युगमने ज्?म्भ?ए जपमुत्स्?जेत् || तथ्?चम्य च तत्प्र्?प्तौ प्र्???य्?म? ?अ?अ?गकम् | क्?त्व्? सम्यग्जपेच्छे?अ? यद्व्? स्?र्य्?दि दर्?अनम् || क्?त्व्? जपेदिति परे??न्वय? | ?दिपद्?द्देव ब्र्?ह्म??द्?न्?? परिग्रह? || ?अय्?त दर्भ?अय्य्?य्?? विन्यस्य भुवि च्?त्मन? | तद्व्?स? क्??लयेन्नित्यमन्यथ्? विघ्नम्? (वहेत्) पतेत् | न दिव्? ?अयन? कुर्य्?त्कुकुर्?द्?न्न स?स्प्??एत् || न सेवेत स्त्रिय? म्??स? मधु व्? स्?धकोत्तम? | एत्?नि सेवम्?नस्य न सिध्यन्ति पुरस्क्रिय्?? || भक्?य्?दि नियम? कुल्?र्?अवे ? भु�ज्?नो व्? हवि?य्?न्न? ??क? यवकमेव व्? | पयो म्?ल? फल? व्?पि यत्र यच्चोपलभ्यते || भिक्???? व्? जपेद् यद्व्? क्?च्छ्रच्?न्द्र्?य??दिक्?त् | ?म्रम्?मलक�चैव फल? के?अरिसम्भवम् || रम्भ्?फल? तिन्ति??क? कमल्? न्?गर?गकम् | फल्?न्येत्?नि भोज्य्?नि तदन्य्?नि विवर्जयेत् || विहित??क? यथ्? ? कल्?य? क्?ल??क�चव्?स्तुक? हिलमोचिक्? || हवि?य्?न्न लक्?अ?अम् हवि?य्?न्न? यथ्? ? हैमन्तिक? सित्?स्विन्न? ध्?न्यमुद्ग्?स्तिल्? यव्?? | कल्?यक? गुन्?व्?र्? व्?स्तुक? हिलमोचिक्? || य??इक्? क्?ल??क�च म्?लक? केमुकेतवत् | लव?ए सैन्धव स्?मुद्रे गव्ये च दधिसर्पि?? || पयोऽनुद्ध्?तस्?र�च पनस्?म्रहर्?तक्? | पिप्पल्? ज्?रक�चैव न्?गर?ग�च तिन्ति?? || कदल्? लवल्? ध्?त्र्? फल्?न्यगु?अमैक्?अवम् | अतैलपक्व? मुनयो हवि?य्?न्न? प्रचक्?अते || म्?ल? केमुक केन्द्?न्?? वर्जयेद्विहित? मुने | ध्?त? दधि फल? व्?पि न्?रिकेल? यथोचितम् ||
SKहवि?य्?न्न? तथ्?ऽ?न्?य्?च्छक्तु? यव समुद्भवम् | नेन्द्रिय्???? यथ्? व्?द्धिस्तथ्? भु�ज्?त स्?धक? || ग्?हस्थ्?न्?? वद्?न्य्?न्?? भिक्???इनोऽग्रजन्मन्?म् | पुर?चर?अ मध्ये तु यदिस्य्?न्म्?तस्?तकम् || तथ्?पि क्?तस?कल्पो जप? नैव परित्यजेत् | स्वकल्पोक्त क्रमे?ऐव जप? क्?त्व्? वर्?नने || होमयेत्तद्द????एन तद्द????एन तर्प?अम् | तर्प?अस्य द????एन च्?भि?इ�चेज्जगन्मय्?म् || अभि?एक द????एन कुर्य्?द् ब्र्?ह्म?अ भोजनम् | गुखे दक्?इ??? दत्त्व्? द्?न्?न्धक्?प??न् बह्?न् || ज्�?त्?न्द्विज्?न्पर्?न्भक्त्य्? भोजयेच्च यथेप्सित्?न् | एव? क्?तपुर?चर्य? स्?धयेदि??अम्?त्मन? || होम्?दि नियम? गौतम्?ये ? जप्?न्ते प्रत्यह? मन्त्र्? होमयेत्तद्द????अत? | तर्प?अ? च्?भि?एक�च तत्तद्द????अतो मुने || प्रत्यह? भोजयेद्विप्र्?न् न्य्?न्?धिक्यप्र??न्तये | अथव्? सर्वसम्प्?र्तौ होम्?दिकमथ्?चरेत् || अथव्? हेमपत्र्?दौ यन्त्र? क्?त्व्? तत? परम् | प्?जयित्व्? तत्र देव्?? परिव्?र समन्वित्?म् || तर्प?अ विधि? तर्पयेत्त्?? पर्?? देव्?? तत्प्रक्?रमिहोच्यते | तर्पयित्व्? गुर्?न्?दौ म्?लदेव्?�च तर्पयेत् || म्?ल्?न्ते न्?म चोच्च्?र्य तर्पय्?मि तत? परम् | स्व्?ह्?ऽन्ते तर्पयेन्मन्त्र्? यथ्?स?ख्य? विध्?नत? || योगिन्? ह्?दये ? तर्प?अ�च प्रकुर्व्?त द्वित्?य्?न्तमथोच्चरन् | एकेकम�जलि? दत्त्व्? तर्पयेद्र?मिव्?न्दकम् || तर्प?अद्रव्यम् तर्प?अद्रव्यम्?ह वि?उद्धे?वरे ? तर्प?अ? चेन्दुमत्तोयैस्त्?र्थतोयैस्तथ्? पुन? | गुर्?पदि??अ विधिन्? मधुन्? व्?थ तर्पयेत् || तन्त्र्?न्तरे ? त्?र्थतोयेन दुग्धेन सर्पि?? मधुन्?ऽपि व्? | गन्धोदकेन व्? कुर्य्?त्सर्वत्र स्?धकोत्तम? || क्?ल्?गुरुद्रवैरेव व?अयेज्जगद्?दिकम् | सचन्दनेन तोयेन सौभ्?ग्य? लभते नर? || तोयै? कु?कममि?रै?च स्तम्भयेदखिल? जगत् | सितमि?रिततोयेन ब्?हस्पति समो भवेत् || कर्प्?र्?क्त जलेनैव सुर्?न्न्?कर्?अयेन्नर? | रोचन्?युत तोयेन सर्वविघ्न्?त्प्रमुच्यते ||
SKध्य्?त्व्? देव्?? मुखे तस्य्?स्तर्प?अ�च सम्?चरेत् | सर्व??स्त्रे?उ कथित? तर्प?अ? ?उभद्?यकम् || एतत्तु तर्प?अ? क्?त्व्?ऽभि?एक? तद्द????अत? | ?त्म्?न? देवबुद्ध्य्? तु सम्प्?ज्य तन्मय? सुध्?? || म्?लविद्य्?? समुच्च्?र्य्?ऽमन्त्?? च देवत्?भिध्?म् | तदन्ते च्?भि?इ�च्?मि नमोऽन्तेन्?ऽभि?एचयेत् || इति मन्त्र्? स्वक? मन्त्र? चिन्तयित्व्? स्वम्?र्द्धनि | अभि?एक? स्व्?यस?ख्य? विदध्य्?त् तदनन्तरम् || तत्र स�चिन्तयेद्देव्?? स्??ग्?वर?अदेवत्?म् | क्?इपेत्तोय? यथ्?स?ख्य? ग??न्सि�चेत्सक्?त्सक्?त् || अभि?एक? सम्?प्यैवमभि?एक द????अत? | ब्र्?ह्म??न् देवबुद्ध्य्? च भोजयेत्स्?धकोत्तम? || य्?मले ? ब्र्?ह्म??न् भोजयेद्देवि तथैव च कुम्?रिक्?? | स्?धक? प?उत्?मेति कुम्?र्? भोजन्?हते || ततो मन्त्रयुत्?न्विप्र्?न् भोजयेद्देवत्?धिय्? | तत? सम्प्?जयेद्भक्त्य्? सम्भ्?रै विविधैर्गुरुम् || दक्?इ??? गुरवे दद्य्?द्यथ्? विभवविस्तरै? | दत्त्व्? च स्?धक ?रे??होमह्?पुज्?? सम्?चरेत् | सिद्धमन्त्रो भवेन्मन्त्र्? न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? || तन्त्रे ? विभवे सति यो मोह्?न्न कुर्य्?द्विधिविस्त(रै?)रम् | नैतत्फलमव्?प्नोति देवद्रोह्? स उच्यते || अ?गह्?नेजपविधि? मु??अम्?ल्?य्?म्- यधद?गविह्?न? स्य्?त्तत्स?ख्य्?द्विगु?ओ जप? | कर्तव्य? स्??गसिद्ध्यर्थ? तद?अक्तेन भक्तित? || रुद्रय्?मले ? होमकर्म?य?अक्त्?न्?? विप्र्???? द्विगु?ओ जप? | इतरे??न्तु वर्??न्?? त्रिगु??दिक ?रित? || योगिन्? ह्?दये ? होम्??अक्तौ जप? कुर्य्?द् होमस्य द्विगु?ओ बुध? | ब्र्?ह्म??दित्रिवर्??न्?? स्त्र्???? स?ख्य्? विध्?यते || य? वर्?अम्??रित? ??द्रो द्?क्??? कुर्य्?द्यथेप्सित्?म् | तस्यस्त्र्?न्?न्तु य्? स?ख्य्? स्? स?ख्य्? तस्य विद्यते | ??द्रस्य य्?द्??? स?ख्य्? द्विगु?? स्? स्त्रिय? प्रिये || अन्यत्र्?पि ? य? वर्?अम्??रित? ??द्र? स च तस्य विधि? चरेत् | अन्??रितस्य ??द्रस्य दिक्स?ख्य्?क? सम्?रित? || ??द्रस्य विप्रभ्?त्यस्य तत्पत्नय्?? सद्??ओ जप? | होम??न्यस्य विप्रस्य यो जप? स तु तत्स्त्रिय? | इतरे??न्तु वर्??न्?? सर्वे??? त्रिगु??दिक? ||
SKत्रिगु??दिक इति होमस?ख्य्? त्रिगु?अ जप? क्?अत्रिये?अ क्?र्य? | वै?येन चतुर्गु?अ? ??द्रे?अ च प�चगु?ओ बोध्य? | ??द्रस्य द्विगु?अ? ?अक्तिवि?अये ज्�एय? | वै??अव्?न्?? चतुवर्??न्?? चतुर्गु?अ?अ?गु????अद?अगु?ओ बोद्धव्य? | अन्यथ्? कुत्र्?पि द्विगु??दिक कुत्र्?पि चतुर्गु??दि इति विरोध्?पत्ते? | तथ्?चोक्त? गौतम्?ये ? होम्?भ्?वे जप? क्?र्यो होमस?ख्य्? चतुर्गु?अ? | विप्र्???? क्?अत्रिय्???�च रसस?ख्य्?गु?अ? स्म्?त? | वै?य्?न्?? वसुस?ख्य्?क ए??? स्त्र्???मय? विधि? || इति | य्?मले ? यदि होमे न ?अक्त? स्य्?त्प्?ज्?य्?? तर्प?एऽपि व्? | त्?वत्स?ख्यजपेनैव सर्वसिद्धि? प्रज्?यते || य्?मले ? कुत्र्?पि यदि ह्?न? स्य्?द्द?अकस्य्?ऽ?गकर्म?इ | तत्तद्द?ऐव कर्य्??इ द?अन्य्?न? न क्?रयेत् || य्?मले ? लक्?अमेक? जपेद्विद्व्?न् हवि?य्??? सद्? ?उचि? | ततस्तु तद्द????एन होमयेद्धवि?? प्रिये || तर्पयेत्तद्द????एन त्?र्थतोयेन प्?र्वति | च्?भि?इ�चेत्ततस्तोयैस्तर्प?अस्य द????अत? || तद्द????अ? हवि?य्?न्नैर्भक्तितो भोजयेद् द्विज्?न् | गुरवे दक्?इ??? दद्य्?द्यथ्? विभवविस्तरै? | प्??अव? कथित? कल्प? ???उ व्?रमत? परम् || व्?रकल्प? मु??अम्?ल्?य्?? ? मत्स्यम्??स्??अने ?अक्त? कुर्य्?न्मन्त्रपुरस्क्रिय्?म् | र्?त्रौ प्र्?ग्?स्य? ?अय्य्?य्?? प्रजपेल्लक्?अम्?नत? || ततस्तु तद्द????एन होमयेद्धवि??नले | द????अ? तर्पयेद् द्रव्यैर्म्??समि?रै? सुस्?धक? || तर्प?अस्य द????एन च्?भि?इ�चेज्जगन्मय्?म् | द????अ? भोजयेद्देवि स्?धक? देवत्?प्रियम् || मधुम्??स�च मत्स्य�च चर्व?अ�च प्रद्?पयेत् | ततस्तु तो?अयेद्भक्त्य्? गुरु? स्वर्??दिभि? प्रिये | एतत्कल्पद्वय्?द्देवि मन्त्र? सिध्यति नि?चतम् || अत्र लक्?अपद? स्वस्वकल्पोक्तस?ख्य्?परम् | तथ्?चोक्त? कुम्?र्?तन्त्रे ? तस्मिन्क्?ले स्?धकेन्द्र? स्वकल्पोक्त? जप? चरेत् | तस्मिन्क्?ले पुर?चर?अक्?ले | यत्तु कुम्?र्?तन्त्रे ? लक्?अमेक? जपेन्मन्त्र? हवि?य्??? दिव्? ?उचि? | र्?त्रौ त्?म्ब्?लप्?र्?स्य? ?अय्य्?य्?? लक्?अम्?नत? | एव? लक्?अद्वय? जप्त्व्? तद्द????एन मन्त्रवित् ||
SKइति वचन्?द्वि?इ??अ पुर?चर?ए लक्?अद्वयजप इति वदन्ति | तन्त्र मनोरमम् | यद्दिने हवि?य्???, तद्दिने मत्स्य्?द्य?अने हवि?य्?न्नव्य्?घ्?त्?न् न्?न्?च्?रस्य प्रसक्ते?च | तथ्?चोक्त? य्?मले ? न्?न्?च्?रो न कर्तव्यो न्?न्?च्?ररतो यत? | इति वचन्?त् | तस्म्?त्कुम्?र्? तन्त्रोक्त वचनस्य पुर?चर?अद्वये त्?त्पर्यम् | एतत्कल्पद्वय? दिव्यव्?रयो? पर्य्?ये?अ कर्तव्यम् | दिव्येन तु एतत्कल्पद्वय? युगपत्कर्तुमपि ?अक्यम् | यत? स तत्त्वज्�?न्? सन् म्?नसक्रिय्?व्?न्, अतो न्?स्य म्?नसकियय्? व्?ह्यकिय्?य्? विरोध? | व्?रस्तु अतत्त्वज्�?न्? सन्ब्?ह्य्?न्तरोभयक्रिय्?व्?न् | अस्यैतत्कल्पद्वययौगपद्य न्?स्ति, उद्धतम्?नसत्त्व्?त्, ?च्?रस्??कर्य्?प्?त्?च्चेति सर्वमवद्?तम् | तथ्?चोक्त? तन्त्रे ? दिव्यस्तु देववत्प्र्?यो व्?र?चोद्धतम्?नस? | योगिन्?ह्?दये ? सर्वहि?स्? विनिर्मुक्त? सर्वप्र्??इहिते रत? | क्?मक्रोधलोभमोहर्?गद्वे?अ विवर्जित? || प्?ज्?पम्?ने सन्तु??ओऽप्यधिक्?र्? स एव हि | सोऽस्मिन् ??स्त्रेऽधिक्?र्? स्य्?त्तदन्यो भ्र??अस्?धक? || प?उस्तु स??अयज्�?न्? सन्क्रिय्?व्?न् | मत्स्यम्??स्?दिक? न ग्र्?ह्यम्, न स्त्रिय? मनस्?ऽपि स्मरेत्, न त्?म्ब्?ल भक्?अयेत्, किन्तु हवि?य्?न्न? भक्?अयेत् | ?तुक्?ल? बिन्? न स्त्रियमपि गच्छेत् | दक्?इ?अम्?र्गे?अ प्?ज्? कर्तव्य्? | तथ्?चोक्त य्?मले ? यो द्?क्?इ?य? विन्? देवि मह्? म्?य्?? समर्चति | स प्?प? सर्वलोकेभ्य?च्युतो भवति न्?न्यथ्? || अनेन यद्दिव्?विध्?न?, तद्दिव्यव्?र वि?अयेऽपि बोद्धव्यम् | तथ्?चोक्त? य्?मले ? दिव्? दक्?इ?अम्?र्गे?अ व्?मेन च तथ्? नि?इ | यदि त्?र्?अ? फल्?व्?प्तौ यु?म्?क? मतमेव च || इति वचन्?त् || अथ ग्रह?अपुर?चर?अ ?र्?ब्?ज्?र्?अवतन्त्रे ?ओ?अ?अ प?अले देव्?? प्रति?इवव्?क्यम् ? एकद्? परमे??न्? क्?म्?ख्य्?य्?? महे?वर्? | द्???वोपर्?ग? यत्क्?र्य? तत् प्?च्छति महे?वरम् | ये नैव विधिन्? देव सिद्धो भवति न्?न्यथ्? || ?र्??इव उव्?च ? कुत? स्न्?न? कुत? सन्ध्य्? प्र्???य्?म? कुत? प्रिये | भ्?त?उद्धि? कुतो भद्रे कुत? प्?ज्? वर्?नने ||
SKक्?ल्?त्?तभय्?द्देवि सर्व? सन्त्यज्य क्?मिनि | स?कल्प? म्?नस? क्?त्व्? जप? कुर्य्?द्वर्?नने || प�च्??ग विधिन्? देवि सिद्धो भवति न्?न्यथ्? | मन्त्रो विद्य्? महे??नि कवच? स्तव एव व्? || ध्य्?न? व्? परमे??नि न्य्?सो व्? कमलेक्?अ?ए | एकोच्च्?रे?अ देवे?इ भवन्ति द?अको?अय? || अस?ख्यस्तज्जपो देवि ग्रह?ए चन्द्रस्?र्ययो? | तत् कथ? परमे??नि जपस?ख्य्? विध्?यते || अत एव महे??नि होमो न्?स्ति ?उचिस्मिते | अभि?एक?च देवे?इ तथ्? च तर्प??दिकम् || भोजन? च महे??नि न्?स्ति वै कमल्?नने | स्?र्यचन्द्रग्रहे देवि प�च्??ग? न्?स्ति क्?मिनि || प�च्??गेन विह्?नोऽपि सिद्धो भवति न्?न्यथ्? | स?कल्प? विद्धि देवे?इ म्?नस? यद्युपस्थितम् || तत्स?कल्प? विज्?न्?य्?द् ग्रह?ए चन्द्रस्?र्ययो? | तस्म्?त्तु च�चल्?प्??गि स?कल्प? नैव क्?रयेत् || स?कल्पो म्?नसो देवि चतुर्वर्गफलप्रद? | अत एव महे??नि स?कल्पो म्?नस? स्म्?त? || स्थ्?लो हि परमे??नि स?कल्पो व्यर्थ उच्यते | स?कल्पेन विन्? देवि यत्कि�चित्कुरुते सुध्?? | व्यर्थमेव हि देवे?इ तत्सर्व? म्?नसो न हि || ग्रह?ए भोजनक्?ल? प्रथमप्रहरे भद्रे चन्द्रग्र्?सो यद्? भवेत् | तदैव दिवसे भुक्त्व्? सत्वर? नरक? व्रजेत् || नि??थे च महे??नि यदैव ग्रह?अ? भवेत् | तदैव दिवसे भुक्त्व्? प्?त्व्?नन्दमयो भवेत् || चन्द्रग्रह?अक्?ले तु जपयज्�?दिक? चरेत् | दिवसे च यद्? भद्रे भ्?स्करग्रह?अ? भवेत् | र्?त्रौ भुक्त्व्? च प्?त्व्? च जपयज्�?दिक? चरेत् || सौरे?उ (सर्वे?उ) वि??उमन्त्रे?उ ?ऐवे (सौरे) ग्??अपत्यौ तथ्? | ?अक्तिमन्त्रो महे??नि प्र?अस्त? सतत? जपेत् | इति ब्?ज्?र्?अवे तन्त्रे ?इवेनैव प्रक्?र्तितम् || एतत्सर्व? ज्�?निन्?मेव कर्तव्यम् | ?ज्�?निन्?मपि प??न्?? कर्तव्यम्?ह गन्धर्वतन्त्रे ? अथव्?ऽन्यप्रक्?रे?अ पुर?चर?अमि?यते | ग्रह?एऽर्कस्य चेन्दोर्व्? ?उचि? प्?र्वमुपो?इत? || नद्य्?? समुद्रग्?मिन्य्?? न्?भिम्?त्रोदके स्थित? | ग्रह??दि विमोक्??न्त? जपेन्मन्त्र? सम्?हित? || सनत्कुम्?रतन्त्रे ?
SKद्???व्? स्न्?त्व्? सुस?कल्पो विमोक्??न्त? जप? चरेत् | जपस्य च द????एन होम? कुर्य्?द्यथ्?विधि || होम्?र्थ? द्विगु?अ? व्?पि जपेन्मन्त्र? सम्?हित? | होमस्य तु द????एन तर्प?अ? समुप्?चरेत् || तर्प?अस्य द????एन त्वभि?एक? सम्?चरेत् | अभि?एक-द????एन कुर्य्?द् ब्र्?ह्म?अ भोजनम् || तदन्ते महत्?? प्?ज्?? कुर्य्?त्स्?धक सत्तम? | गुरवे दक्?इ??? दद्यद्भक्त्य्? विप्र्?न्प्रतर्पयेत् || ?य्?म्?विद्य्?य्?? वि?ए?अम्?ह क्?ल्?तन्त्रे ? अथव्?ऽन्यप्रक्?रे?अ पुर?चर?अमि?यते | चन्द्रस्?र्यग्रहे चैव ग्र्?स्?वधिविमुक्तित? | य्?वत्स?ख्य? मनु? जप्त्व्? त्?वद् होम्?दिक? चरेत् || यदि नक्र्?दिद्??इत्? नद्? भवति समुद्रग्?मिन्? व्? न भवति, तद्? कि? कर्तव्य? तद्?ह रुद्रय्?मले ? यद्व्? ?उद्धोदकै? स्न्?त्व्? ?उचौ दे?ए सम्?हित? | ग्रह??न्मुक्तिपर्यन्त? जपेन्मन्त्र?मनन्यध्?? | इति क्?त्व्? न सन्देहो जपस्य फल भ्?ग्भवेत् || ये तु ग्रह?अप्?र्व दिने उपव्?स्??अक्त्य्? हवि?य्?न्न? फल? दुग्ध? व्? भु�ज्?तेति वदन्ति | तन्न मनोरमम्, प्रम्???भ्?व्?त्, उपव्?सस्य्?व?यकत्त्व्?च्च || जपप्र्?ध्?न्यम् ये तु वदन्ति ? अत्र ?र्?द्धमकुर्व्??अ? प?के गौरव स्?दति | इति निन्द्?व्?द ? ?रव??त् ?र्?धस्य्?व?यकत्व?, न जपस्येति तत तथ्?ऽह | सनत्कुम्?रतन्त्रे ? ?र्?द्ध्?देरनुरोधन यदि ज्?प्य? त्यजेन्नर? | स भवेद् देवत्?द्रोह्? पित्?न्सप्त नयत्यध? || महि?अमर्दिन्?तन्त्रे ? चन्द्रस्?र्यग्रहे जप्त्व्? कैवल्य? प्र्?प्नुय्?न्नर? | अक्?त्व्? मन्त्रज्?प? च सत्वर? नरक? व्रजेत् || गुप्तद्?क्??तन्त्रे ? चन्द्रस्?र्यग्रहे यस्तु सम्यग् ज्?प? न च्?चरेत् | स दु(भ्र)??अ? स च प्?पि??ह? सहस्? ??करो भवेत् || तस्य्?न्नमुदक? देवि म्?त्र?ओ?इत वि?समम् | ज्?यते न्?त्र सन्देहो मम व्?क्य्?द्वर्?नने || अन्यत्र्?पि ? जपयज्�अ? विन्? देवि य? करोत्य्?न्यचिन्तनम् | स भवेद् रौरवे मग्नो य्?वद्?ह्?त स?प्लवम् || रौरव्?त्पुनरगत्य प्?पयोनि?उ ज्?यते | नि?क्?तिर्न्?स्ति च्?र्व?गि तस्य्?पि च कद्?चन ||
SKतस्म्?त्सर्व? परित्यज्य चन्द्रपर्व?इ स?जपेत् | स्?र्य पर्व यथ्? देवि चन्द्रपर्व तथ्? प्रिये | सर्व? त्यक्त्व्? महे??नि जपयज्�अ? सम्?चरेत् || इत्य्?दि न्?न्?तन्त्र वचनेभ्यो जप? विन्? क्?र्य्?न्तरस्य निन्द्??रुतेर्जपस्यैव्?व?यकत्वम् || र्??य्? दिग?अन्?य्?? दो?अम्?ह य्?मले ? अज्�?न्?द्य्?दि व्? मोह्?द्र्??य्?दिग?अन्?? चरेत् | विच्?र्य च�चल्?प्??गि न प?येद् ग्रह?अ? यदि | प्?र्वजन्म्?र्जित? पु?य? तत्क्?अ??देव न?यति || क्?मधेनुतन्त्रे ? चन्द्रपर्व स्?र्यपर्व न विच्?र्य? कद्?चन | स्?र्यपर्व? वर्?रोहेन प?येद्यदि प्?मर? | अस्तु त्?वत्परोधर्म? प्?र्वधर्मो विन?यति || य्?मले ? जन्म सप्त्???अ - ?प्फ्??कद?अमस्थे नि??करे | द्????ऽरि??अप्रदो र्?हुर्जपप्?ज्?? विन्? भवेत् || कवच पुर?चर?अम् भैरवतन्त्रे ? अथ व?ये महे??नि कवच्?न्?? पुरस्क्रिय्?म् | अ??ओत्तर?अत? जप्त्व्? पुर?च्?र्य्?? सम्?चरेत् || द????अतोऽ?गकर्म्??इ होम्?द्?नि प्?थक् प्?थक् | तत?च सिद्धकवच? पु?य्?त्म्? मदनोपम? || स्वयम?अक्तौ प्रतिनिधिद्व्?र्? कर्तव्यम् | ज्�?नप्रद्?पे ? विदध्?त पुर?चर्य्?? गुरु?? त्?द्??एन व्? || इति परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? पुर?चर?अनिर्?अयो न्?म द्व्?द?ओल्ल्?स? || १२ || त्रयोद?ओल्ल्?स? यन्त्र-स?स्क्?र? विन्? यन्त्रे?अ प्?ज्?य्?? देवत्? न प्रस्?दति | सर्वे??मपि देव्?न्?? यन्त्रे प्?ज्? प्र?अस्यते || सुवर्?अ? रजत? त्?म्र? ?रे??ह? मध्यमथ्?धमम् | त्?म्र? लक्?अगु?अ? प्रोक्त? रौप्य? को?इगु?अ? भवेत् || स्वर्?अ? त्वनन्तफलद? स्फ्??इक�च तथ्? भवेत् | एकतोल? द्वितोल? व्? त्रितोल? प�चतोलकम् || रसतोल? चतुस्तोल? सप्ततोल? पल? तु व्? | स्?धकस्य मनु? ज्�?त्व्? क्?त्व्? प्??हे?उ स्?धक? || अथव्? प्रतिम्?? क्?त्व्? निजदेवस्वर्?पि??म् || प्?जयेदिति ?ए?अ? || सम्मोहनतन्त्रे ? म्?लमुच्चरयन्सम्यग्?लिखेद्यन्त्रमुत्तमम् | तन्त्रे ? तन्मध्ये विलिखेद्यन्त्र? सुवर्?एन कु?एन व्? | ?र्ध्व्?म्न्?यतन्त्रो ?
SKप्र्??अन्?थ ! जगन्न्?थ ! ब्रह्मवि??उप्रप्?जित् | इद्?न्?? चक्रर्?जस्य प्रति??ह्? कर्म मे वद् || ?र्?-??वर उव्?च ? यथ्? मन्त्रस्य स?स्क्?र? तथ्? यन्त्रस्य कल्पयेत् | अस?स्क्?तौ यन्त्रमन्त्रौ रोग?ओकभयप्रदौ || कथितो मन्त्रस?स्क्?रो द?अध्? सर्वतन्त्रके | यन्त्रस?स्क्?र मधुन्? ???उ देवि सम्?हित्? || यन्त्रस?स्क्?र स?कल्प? चक्रर्?ज? विनिर्म्?य तत? स?स्क्?र म्?चरेत् | प्रति??ह्? द्विविध्? देवि मध्यम्? चोत्तम्? तथ्? || स्न्?त्व्? स?कल्पयेन्मन्त्र्? गुरोर्व्?क्येन च्?दर्?त् | प्र?अव? तत्सदद्येति म्?सपक्?अतिथोरपि || अमुकोऽमुकगोत्र्?न्तेऽमुकदेव्य्??च प्र्?तये | चक्रेऽस्मिन्नमुकदेव्य्?? प्र्??अज्?वेन्द्रियेति च || प्रति??ह्?कर्म?अब्द्?न्ते करि?ये प्र्?गुद?मुख? | ततो गुरु�च व्??उय्?द्वस्त्र्?ल?क्?रचन्दनै? || भ्?त?उद्ध्य्?दिक्?न्न्य्?स्?न्विन्यसेत्तदनन्तरम् | प�चगव्य? निजैर्मन्त्रै? ?इवमन्त्रे?अ मन्त्रितम् || तस्मिन् चक्र? क्?इपेन्मन्त्र्? प्र?अवेन विलोकयेत् | तत?चक्र? समुद्ध्?त्य स्थ्?पयेच्चक्रभ्?जने || यन्त्रस्न्?नम् ?अ?खतोयेन देवे?इ तथ्? पु?पोदकेन च | व्?रि?? चन्दनेन्?ऽपि स्न्?पयेत्परमे?वर्?म् || न्?रिकेलोदकै?चैव सर्वो?अधिजलैरपि | प�च्?म्?तै? प�चगव्यै? स्न्?पयेत्परमे?वर्?म् || तप्त? ??त? जल? वर्ज्य? कि�चिदु??एन स्न्?पयेत् | अत्यु??ए वज्रप्?त? स्य्?त्तस्म्?त्तपरिवर्जयेत् || प�च्?म्?तम्?हय्?मले ? ध्?त? दधि तथ्? क्??र? ?अर्कर्? मधुस?युतम् | प�च्?म्?तमिद? ख्य्?त? प्रत्येकन्तु पल? पलम् || प�चगव्यपरिम्??अम् प�चगव्यपरिम्??अम्?ह तन्त्रे ? पलम्?त्र? दुग्धभ्?ग? गोम्?त्र? त्?वदि?यते | घ्?त�च पलम्?त्र? स्य्?द् गोमय? तोलकद्वयम् || दधि प्रस्?तिम्?त्र? स्य्?त्प�चगव्यमिति स्म्?तम् | अथव्? प�चगव्य्?त्?? सम्?नो भ्?ग इ?यते || अतिक्र्?न्त? तु ?अ?र्?त्र? दधि स्न्?ने विवर्जयेत् | स?वत्सर्?त्पर? त्व्?ज्य? ?अ?म्?स्?न्ते च म्?क्?इकम् | गु?अ�च ?अर्कर्?? चैव सर्व? ब्र्?हि�च वत्सर्?त् || विवर्जयेदिति प्?र्वे??न्वय? | एत्?नि न दद्य्?दित्यर्थ? ||
SKदेव्?न्?? प्रतिम्? यत्र घ्?त्?म्य?गक्?अम्? भवेत् | पल्?नि तत्र देय्?नि ?रद्धय्? सप्तवि??अति? || अ??ओत्तर?अतपल? स्न्?ने देय�च सर्वद्? | द्वे सहस्रे पल्?न्?न्तु मह्?स्न्?ने तु स?ख्यय्? || पल? तु लौकिकैर्म्?नै? स्???अरत्ति द्विम्?सकम् | तोलकत्रितय? ज्�एय? ज्योतिर्ज्�ऐ? स्म्?तिसम्मतम् || पल? पल? प�चगव्य? नित्यस्न्?ने तदर्द्धकम् | अ?अक्त्?न्?? विधि? व?ये क्?च्छ्र्???? परमे?वरि || गु?अतोलकह्?न? च न दद्य्?त् स्न्?नकर्म?इ | स्न्?न? सम्?प्य त्?? देव्?? स्थ्?पयेत् स्वर्?अप्??हके || तस्म्?दुद्ध्?त्य मतिम्?न्न्?भेर्?र्ध्व? निवे?अयेत् | तत्रैव प्??ह? सम्प्?ज्य च्?र्घप्?त्र्?दिक? चरेत् | स्प्???व्? यन्त्र? कु??ग्रे?अ ग्?यत्र्य्? च्?भिमन्त्रयेत् || ग्?यत्र्?म्?ह ? प्र?अव? यन्त्रर्?ज्?य विद्महे तदनन्तरम् | मह्?यन्त्र्?य ध्?महि तन्नो यन्त्र? प्रचोदय्?त् | ?व्?ह्य प�चमुद्र्?भि? प्र्??अस्थ्?पनम्?चरेत् || ज्�?न्?र्?अवे ? अन्?मिक्?म्?लपर्वस?सक्त्??गु??हयुग्मकम् | उत्त्?न? हस्तयुगल? योजयेत् स्?धक्?ग्र??? || ?र्ध्व्?�अजलिमध? कुर्य्?दियम्?व्?हन्? भवेत् | इय? तु विपर्?त्? स्य्?न्मुद्र्? स्थ्?पनकर्म?इ || युक्तोच्छ्रित्??गु??हमु??? मुद्र्? स्य्?त्सन्निध्?पन्? | अ?गु??हगर्भि?? सैव मुद्र्? स्य्?त्सन्निरोधिन्? || उत्त्?नमु??इयुगल्? सम्मुख्?कर?? मत्? | देवत्??गे ?अ?अ?ग्?न्?? न्य्?स? स्यत् सकल्?क्?ति? || कर्?वेकत्र स?योज्य अधोभ्?त्?विव प्रिये | परम्?कर?अ? न्?म मुद्रेयन्तु तत? परम् | व? ब्?जेन्?म्?त्?कुर्य्?त् मुद्रय्? धेनुस?ज्�अय्? || अन्योन्य्?भिमुखे ?लि??ए कनि??ह्?न्?मिके पुन? | तथैव तर्जन्?मध्ये धेनुमुद्र्? प्रक्?र्तित्? || धेनुमुद्र्? मह्?देव्? अम्?त्?कर?ए भवेत् | प्रति??ह्?प्य्?ऽर्चयेद् देव्?मन्यथ्? नि?फल? भवेत् || प्रति??ह्?प्येति ? यन्त्रे प्रतिम्?य्?? व्? प्र्??अप्रति??ह्?? विध्?येत्यर्थ? || प्र्??अमन्त्रम्?ह य्?मले ? उच्च्?र्य भुवने??न्?? प्????कु?अपु??? तत? | य्?द्य्?? सप्तम्?त्??क्??य्? व्योम सत्येन्दुस?युतम् || व्योम बिन्दुसम्?युक्त? सर्ग्?व्?न् भ्?गुरित्ययम् | न्?म्न्? देव्य्?स्तत? प्र्??? इह प्र्???स्तत? प्रिये ||
SKपुनर्मन्त्र? पुरस्क्?त्य तथैव स्?धकोत्तम? | न्?म्न्? च देवत्?य्?स्तु ततो ज्?व इह स्थित? || तथैव देवदेवे?इ ! उक्त्व्? सर्वेन्द्रिय्??इ च | व्??मन?चक्?उरित्यन्ते ?रोत्रघ्र्??अपद? तत? || तत? प्र्??? इह्?गत्य सुखमुक्त्व्? चिर? प?हेत् | ति??हन्तु वह्निज्?य्?न्त? प्र्??अमन्त्र उद्?ह्?त? || स्व स्व न्?म्न्? महे??नि मन्त्रोऽय? सर्वदैवत? | इति प्र्???न् प्रति??ह्?प्य तत? प्?ज्?? सम्?रभेत् || स्वकल्पोक्त विध्?नेन मुद्र्?? प्रदर्?य स्?धक? | उपच्?रै? ?ओ?अ?अभिर्देव्?? प्रप्?जयेद् क्रम्?त् || देव्य्?ज्�अय्? पर्?व्?र्?न्प्?जयेत् परमे?वरि | ततो जपेत् सहस्र? तु ?अतम??ओत्तर? प्रिये || बलिद्?न? तत? क्?त्व्? प्र?अमेच्चक्रर्?जकम् | ?अतम??ओत्तर? होम? कुर्य्?च्च स्?धकोत्तम? || निजमन्त्रे?अ देवे?इ जुहुय्?च्चक्रसिद्धये | ?हुत्यन्ते चक्रर्?जे हुत?ए?अ? विनिक्?इपेत् || पुर्??न् दत्त्व्? तु होम्?न्ते तज्जलैरभि?एचयेत् | मन्त्र्?भि?इक्त? चक्र? तत्सर्वे??? सिद्धिद्?यकम् || गुरुवे दक्?इ??? दद्य्?द् ग्?? च दद्य्?त्पयस्विन्?म् | भ्?मि? व्?त्तिकर्?? दद्य्?त् पुत्रपौत्र्?नुय्?यिन्?म् || स?ह्?रमुद्रय्? देव्य्? विसर्जनमत?परम् | प्रति??हयेच्चक्रर्?जमनेन विधिन्? यदि || पुर?चर्य्?फल? तस्य सर्वसिद्धियु तस्य च | गुरोर्?ज्�?? प्रम्??एन यन्त्र? म्?र्ध्नि निध्?पयेत् || ग्?ह्?त? यन्त्रमेवेद? क्व्?पि नैव प्रक्??अयेत् | यन्त्र मन्त्र प्रक्??ए तु क्रुद्ध्? भवति प्?र्वत्? || निजमन्त्र्?भि?इक्त�च गुरोरपि न दर्?अयेत् | यन्त्रग्रह?अक्?ले च यदि स्य्?त् मेघगर्जनम् || उल्लुलुध्वनिर्?कस्म्?दथव्? ?अ?ख निस्वन? | तद्? मन्त्र्? झ?इत्येव सिद्धक्?र्यो न स??अय? || अयने वि?उवे चैव ग्रह?ए चन्द्रस्?र्ययो? | ग्रह?अ? यन्त्रमन्त्र्???? ?उभद? तत् प्रक्?र्तितम् || अथ बलिद्?नम् मु??अम्?ल्?य्?म् ? नर?छ्?गस्तथ्? मे?ओ महि?अ? ?अ?अकस्तथ्? | ?अल्लक्? ??कर?चैव बलय? परिक्?र्तित्?? || नरबलिस्तु र्?ज्�?मेव ? र्?ज्? नरबलि? दद्य्?न्न्?न्यो हि परमे?वरि | सि?हव्य्?घ्र नर्?न्दत्त्व्? ब्र्?ह्म?ओ रौरव? व्रजेत् ||
SKयुव्?न? व्य्?धिह्?न? च सु?र्?क? लक्?अ??न्वितम् | सर्व्?वयव सम्पन्न? बलि? दद्य्?त् सु?ओभनम् || तरु?अ? सुन्दर? क्???अ? क्?अत्?दिदो?अवर्जितम् | स्न्?पयित्व्? बलि? तत्र भ्??अयेत् पु?पचन्दनै? || भ्??अयेद् रक्तम्?ल्येन सिन्द्?रे?अ वि?ए?अत? | उत्तर्?भिमुखो भ्?त्व्? बलि? प्?र्वमुख? तथ्? || सम्?न्?य स्वव्?मे च म्?लेन प्रोक्?अ?अ? चरेत् | स?प्रोक्?अ?अ? विध्?यैव बलि? सम्प्?जयेदथ || ब्रह्मरन्ध्रे च ब्रह्म्??अ? तन्न्?स्?य्?�च मेदिन्?म् | कर्?अयो?च तथ्?क्??अ? जिह्व्?य्?? सर्वतोमुखम् || ज्योत्??इ नेत्रयोर्वि??उ? वदने परिप्?जयेत् | लल्??ए प्?जयेच्चन्द्र? ?अक्र? दक्?इ?अग??अत? || व्?मग??ए तथ्? वह्नि? ग्र्?व्?य्?? समवर्तनम् | रोमक्?पे ध्?ति? चैव भ्रुवोर्मध्ये प्रचेतसम् || न्?स्?म्?ले च ?वसन? स्कन्धे चैव महे?वरम् | ह्?दये सर्पर्?जेन्द्र? प्?जयित्व्? प?हेदिदम् || मह्?तपोभिर्ज्�?नै?च यज्�एर्यत्स्?ध्यते न्?भि? | तन्मे देहि मह्?भ्?ग ! सत्वर? च्?प्नुय्?? ?रियम् || ?इवबुद्ध्य्? च सम्प्?ज्य उत्स्?जेच्च तत? परम् | ततो देव्?? समुद्दि?य क्?ममुद्दि?य च्?त्मन? || इत्युत्स्?ज्य बलि? प?च्?त् करव्?ल? प्रप्?जयेत् | ख?मग्रे प्?जयेन्मन्त्र्? ब्रह्म-व्?ग्??वर्?? तथ्? || मध्ये च प्?जयेद्देवि ! लक्?म्?न्?र्?य??वपि | म्?ले च प्?जयेन्मन्त्र्? उमय्? च महे?वरम् || एव? विध्?नै? सम्प्?ज्य नमस्कुर्य्?त् प्रयत्नत? | ख?गत्व? ?इवर्?पोऽसि क्रोधभैरव स?ज्�अक? || दुर्ग्? प्र्?तिकरो नित्य? क्?ल्??अक्तेरिव्?ऽपर्? | ख?ग्?य खर??न्?य ?अक्तिक्?र्य्?र्थ तत्पर ! || प?उच्छेद्यस्त्वय्? ??घ्र? ख?गन्?थ ! नमोऽस्तुते | एव? सम्प्?ज्य त? ख?गमुत्तोल्य स्?धकोत्तम? || छेत्त्? प्?र्वमुखो भ्?त्व्? बलिमुत्तरवक्त्रकम् | (?) ?? हु? फ? इति मन्त्रे?अ छेदयित्व्? तत? प?उम् || ततो बल्?न्?? रुधिर? तोयसैन्धवसत्फलै? | मधुभिर्गन्धपु?पै?च स्वधिव्?स्य प्रयत्नत? || गन्धपु?पोक्?इत? क्?त्व्? चोत्स्?जेन्म्?लमुच्चरन् | प्र?अव? व्?ग्भव? लक्?म्?? तत? कौ?इक्?? ?अब्दत? ||
SKरुधिरे?अ तत? प?च्?द्?प्य्?यत्?? समुच्चरेत् | निवेद्य रुधिर? देवि ! ?इवे दद्य्?त् प्रद्?पकम् | ततो निवेदयेन्मन्त्र्? त्?म्ब्?ल? सुमनोहरम् || रुधिर-मस्तक स्थ्?नपन क्रम? रुधिरमस्तक स्थ्?पनक्रमम्?ह तन्त्रे ? न्?र? सव्ये ?इरोरक्त? देव्य्?? सम्यग्नियोजयेत् | छ्?ग? तु व्?मतो दद्य्?न्म्?हि?अ? वितरेत् पुर? | दक्?इ?ए व्? मतो दद्य्?दग्रतो देह?ओ?इतम् || य्?मले ? यद्? क?अक???अब्दो दन्त्?न्?? ?र्?यते क्वचित् | तद्? तु मर?अ? विद्य्?द्ध्?नि? तत्र विनिर्दि?एत् | यद्??रु द्??यते नेत्रे तद्? ह्?नि? विनिर्दि?एत् || बलिमस्तकपतन फलम् प्?र्वोत्तरे च दिग्भ्?गे पतते यदि मस्तकम् | सर्वसम्पत्कर? विद्य्?द् र्?ज्�?? र्?ज्य? विनिर्दि?एत् || ???न्?ग्न्योर्मध्यभ्?गे पतते यदि मस्तकम् | तत? स्वल्पेन क्?लेन सर्वसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् || यदि व्?यव्यदिग्भ्?गे नैर्-?ते दक्?इ?एऽपि व्? | मस्तक? पतते ज्?तु तस्य ह्?नि? विनिर्दि?एत् || बलिमस्तके द्?पद्?नम् य्?मले ? ग्रह्???? कच्छप्?न्?�च गोध्?न्?�च वि?ए?अत? | मत्स्य्?न्?? पक्?इ??? चैव न द्?प? द्?पयेच्छिरे || ??र्?ओपरि ज्वलद्द्?पो य्?वत्क्?ल? प्रवर्तते | त्?वत्क्?ल? वसेत्स्वर्गे तस्म्?द्यत्नेन द्?पयेत् || रुद्रय्?मले ? लोमद्?होद्भव? गन्ध? घ्रत्व्? देव्? प्रस्?दति | तस्म्?त्समर्पयेद्द्?प? तस्य प्?त्र? विवर्जयेत् | विधिवद्बलिद्?नेन चतुर्वर्गफल? भवेत् || अवैध हि?स्?य्?? दो?अ? अविध्?नेन हि?स्?य्?? दो?अम्?ह कुल्?र्?अवे ? अविध्?नेन यो हन्य्?द्?त्म्?र्थ? प्र्??इन? प्रिये | निवसेन्नरके घोरे युग्?नि प?उलोमभि? || स रक्तबिन्दुप्?त्? च तिर्यग्योनौ प्रज्?यते | अनुमन्त्? वि?असित्? निहन्त्? क्रयविक्रय्? | स?स्कर्त्? चोपहर्त्? ख्?दित्?ऽ??औ च घ्?तक्?? || रुद्रय्?मले ? धनेन क्रयिको हन्त्? ख्?दित्? चोपभोगत? | घ्?तको वधत?चैव त्रिविधो वधव्?न् ध्रुवम् || य्?मले ? पित्?दैवतयज्�ए?उ वैधहि?स्? विध्?यते | अन्यत्र्?पि ? अहि?स्? परमो धर्मोन्?स्त्यहि?स्? पर? सुख? | विधिन्? य्? भवेत् हि?स्? स्? त्वहि?स्? प्रक्?र्तित्? ||
SKभ्?तहि?स्? न कर्तव्य्? प?उहि?स्? वि?ए?अत? | बलिद्?न? विन्? देवि हि?स्?? सर्वत्र वर्जयेत् || य्?मले ? हन्य्?न्मन्त्रे?अ च्?नेन त्वभिमन्त्र्य प?उ? ?इवे | गन्धपु?प्?क्?अतै? प्?ज्य त्वन्यथ्? नरक? व्रजेत् || प्?पोपजनिक्? हि?स्? तत्कथ? स्वर्गस्?धनम् | अ?वमेध्?दियज्�ए?उ व्?जिहत्य्?? कथ? चरेत् || द्????न्तम्?ह य्?मले ? येनैव वि?अख??एन म्रियन्ते सर्वजन्तव? | तेनैव वि?अख??एन भि?अग्न्??अयते वि?अम् || तस्म्?दविधिन्? हि?स्? प्?पजनिक्?, विधिबोधित्? हि?स्? स्वर्गजनिक्? इति निर्गलित्?र्थ? || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त ?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरि क्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? यन्त्रप्रति??ह्?दि निर्?अयो न्?म त्रयोद?ओल्ल्?स? || १३ || चतुर्द?ओल्ल्?स? उपच्?रविधि? उपच्?र? प्रवक्?य्?मि ???उ प्?र्वति ! स्?दरम् | विनोपच्?रैर्य्? प्?ज्? स्? प्?ज्? न प्रस्?दति || अ???द?ओपच्?र्?स्तु सर्वे??मुत्तम्?? प्रिये | ?ओ?अ?एति प्रध्?न्??च द?अध्?स्तदनु स्म्?त्?? | प�चध्?स्तदनु प्रोक्त्?? कर्तव्य्? भ्?तिमिच्छत्? || फेत्क्?रि??तन्त्रे ? ?सन? स्व्?गत? प्?द्यमर्घ्यम्?चमन? तथ्? | स्न्?न? व्?स?चोपव्?त? भ्??अ??नि च सर्व?अ? || गन्धपु?प ध्?पद्?पौ तथ्?न्न? च्?पि दर्प?अम् | म्?ल्य्?नुलेपन? चैव नमस्क्?र विसर्जनम् | अ???द?ओपच्?रैस्तु मन्त्र्? प्?ज्?? सम्?चरेत् || तन्त्रे ? ?सन? स्व्?गत? प्?द्यमर्घ्यम्?चमन्?यकम् | मधुपर्क्?चमनस्न्?नवसन्?भर??नि च || गन्धपु?पध्?पद्?पनैवेद्यवदन? तथ्? | प्रयोजयेदर्चन्?य्?मुपच्?र्??स्तु ?ओ?अ?अ || प्?द्य्?र्घ्य्?चमन्?य च मधुपर्क्?चम? तथ्? | गन्ध्?दयो नैवेद्य्?न्त्? उपच्?र्? द?अ स्म्?त्?? || गन्ध? पु?प? तथ्? ध्?प? द्?प? नैवेद्यमेव च | प्रदद्य्?त् परमे??नि ! प�च प्?जोपच्?रक्?न् || प्?द्य्?दिनिर्?प?अम् प्?द्य्?र्थमुदक? प्?द्य? चन्दन्?गुरु स?युतम् | एतच्छ्य्?म्?कद्?र्व्?ब्ज वि??उक्र्?न्त्?मित्?रितम् || प्?द्य? प्?त्रे प्रद्?तव्यमर्घ्य? चैव्?र्घ्यप्?त्रके | रक्तबिल्व्?क्?अतै? पु?पैर्दधिद्?र्व्?तिलैर्जलै? ||
SKस्?म्?न्य? सर्वदेव्?न्?मर्घोऽय? परिकल्पित? | अभ्?वे दधिदुग्ध्?द्यैर्म्?नस? परिकल्पयेत् || अन्त???न्य्?? त्रिपत्र्?�च द्?र्व्?? च्?र्घेन निक्?इपेत् | ज्?त्?लव?गकक्कोलैर्दद्य्?द्?चमन्?यकम् || तत् तैजसेन प्?त्रे?अ ?अ?खेन व्? प्रद्?पयेत् | उदक? द्?यते यद्यत्सुगन्ध? फेनवर्जितम् || ?चमन्?यक? देव्यै तद्?चमन मुच्यते | दद्य्?द्?चम्?य? तु सुगन्धसलिलै? ?उभै? || मधुपर्कनिर्?प?अम् ब्?हत्?र्?क्रमे ? न्?रिकेलोदक? स्वल्प? सित्? दधि घ्?त? समम् | सर्वे??म्धिक? क्?औद्र? मधुपर्के प्रयोजयेत् || ?ज्य? दधि मध्?न्मि?र? मधुपर्क? विदुर्बुध्?? | तद्दद्य्?त्क्??स्यप्?त्रे?अ ?ओभनेन वि?ए?अत? || इति वचन्?त् क्??स्यप्?त्रे?अ मधुपर्के न्?रिकेलोदकद्?ने दो??भ्?व? | यथ्? त्?म्रप्?त्रे?अ चरुप्?के दो??भ्?वस्तद्वत् | तथ्?चोक्तम् ? तत?च स?स्क्?ते वह्नौ गोक्??रे?अ चरु? पचेत् | अस्त्रे?अ क्??लिते प्?त्रे नवे त्?म्रमय्?दिके || पयोऽनुद्ध्?तस्?र�च त्?म्रप्?त्रे न दु?यति | इति वचन्?त् | प्?त्रपरिम्??अम्?ह ? वस्व?गुलन्य्?नम्?न? न प्?त्र? क्?रयेद् बुध? || गन्धकथनम् सर्वे??? गन्धज्?त्?न्?? प्रक्???औ मलयोद्भव? | तस्म्?त् सर्वप्रयत्नेन दद्य्?न्मलयज? सद्? || मध्यम्?न्?मिक्?ग्र्?म्य्?म?गु??ह्?ग्रे?अ प्?र्वति | दद्य्?च्च विमल? गन्ध? म्?लमन्त्रे?अ स्?धक? || पु?पप्रकर?अम् सर्वे??? पु?पज्?त्?न्?? रक्त? ?अस्त? वर्?नने ! | देव्? प्र्?तिकर? प्र्?ज्�ए ! सर्वक्?मफलप्रदम् || रक्तपु?प�च देवे?इ ! तथ्? स्वर्??दि निर्मितम् | रक्तपद्म? च वज्र�च क्???? तु च्?पर्?जित्? || प�चदेवमय? पु?प? करव्?र? मनोहरम् | वि??उर्लम्बोदर? स्?र्यो ब्रह्म्? च क्?लिक्? तथ्? || प�चदेव्?? प�चदले सद्? ति??हन्ति न्?न्यथ्? | जव्?पु?प? महे??नि ! करव्?र्?पर्?जिते || मह्?देव्यै निवेद्यैव को?इप्?ज्?फल? लभेत् | ए??? मध्ये वसेद् ब्रह्म्? ए??? म्?ले जन्?र्दन? | ए??मग्रे वसेद् रुद्र? सर्वे देव्?? स्थित्? दले || ए??? करव्?र्?पर्?जित्?जव्?पु?प्??अम् इत्यर्थ? |
SKव्?क्?ए विकसिते क्?ले देवत्?दिग्विनिर्?अय? | प?चिमस्थदले वि??उ? उत्तरे ग?अन्?यक? || ऐ??न्य्?? स्?र्यदेव?च प्?र्वे ब्रह्म्? प्रक्?र्तित? | दक्?इ?ए क्?लिक्? देव्? य्? तु मुक्तिप्रद्?यिन्? || करव्?र? यथ्? देवि ! जव्?पु?प? तथैव हि | यथ्? ?उभ्र? तथ्? रक्त? हरित? क्???अमेव च || ग?ग्?दि सर्वत्?र्थ्?नि ति??हन्ति बिन्दुगह्वरे | तन्मध्ये ?इवलि?ग�च मह्?कु??अलिन्?युतम् || गह्वर? बिन्दुर्?प? च कैवल्यपदमुत्तमम् | ?इव?अक्तिमय? पु?प? चतुर्वर्गफलप्रदम् || सर्वपु?प्??इ चैकत्र जव्?ब्जप्?रिज्?तकै? | न सम्?नि भवन्त्येव लक्?अको?इ ?अत्?न्यपि || यत्र्?ऽपर्?जित्?पु?प? करव्?र? जव्?पि च | ति??हन्ति तत्र वै देव्? ब्रह्म्?वि??उमहे?वर्?? || ग?ग्?दि सर्वत्?र्थ्?नि तन्म्?ले निवसन्ति वै | तन्म्?ल? सि�चित? तेन प्?जित्?स्तेन देवत्?? || अपर्?जित्?म्?ह्?त्म्य? वक्तु? न ?अक्यते मय्? | मल्लिक्?मुत्पल? रम्य? ?अम्?? पुन्न्?गचम्पके || अ?ओक? कर्?इक्?र�च द्रो?अपु?प? तथैव च | करव्?र? जव्?पु?प? कु?कुम? न्?गके?अरम् || य? प्रयच्छति दुर्ग्?यै स गच्छेत् परम? पदम् | पु?पम्?ले वसेद् ब्रह्म्? पु?पमध्ये जन्?र्दन? || पु?प्?ग्रे च वसेद्रुद्र? सर्वे देव्?? स्थित्? दले | चर्?चर्??च सकल्?? सद्? पु?पव??? स्म्?त्?? || सर्वदेवमय? पु?प? तस्म्?द्देव्यै समर्पयेत् || पु?पैरर?यसम्भ्?तै? पत्रैर्गिरिसमुद्भवै? | अपर्यु?इतनि?छद्रै? प्रोक्?इतेर्जलवर्जितै? || ?त्म्?र्?मोद्भवैर्व्?पि पु?पै? सम्प्?जयेच्छिव्?म् | प्?रोपित व्?क्?एभ्य? पु?प्??य्?न्?य योऽर्चयेत् | अविज्�?प्यैव तस्यैव नि?फल? तस्य प्?जनम् || इति तु स्?क्??त्स्व्?मिपरम् | देव्?र्थे कुसुमस्तेयमस्तेय? मनुरव्रव्?त् | इति वचन्?त् || पु?प्?द्?न्?? पर्यु?इतक्?ल? सर्व? पर्यु?इत? वर्ज्य? पत्र? पु?प? फल? जलम् | अवर्ज्य? ज्?ह्नव्?तोयमवर्ज्य? तुलस्?दलम् || अवर्ज्य? बिल्वपत्र? स्य्?दवर्ज्य? जलज? तथ्? | पु?पै? पर्यु?इतैर्देवि ! न्?र्चयेत् स्वर्?अजैरपि ||
SKबिल्वपत्र? च म्?घ्य�च तम्?ल्?मलक्?दलम् | कह्ल्?र? तुलस्?पत्र? पद्म�च मुनिपु?पकम् || एत? पर्यु?इत? न स्य्?त् यच्च्?न्यत् कलिक्?त्मकम् | ति??हेद्दिनत्रय? ?उद्ध? पद्मम्?मलक? तथ्? || दिनैक? करव्?र्??इ योग्य्?नि च तपोधन | पद्म्?नि सितरक्त्?नि कुमुद्?न्युत्पल्?नि च || ए??? पर्यु?इत्? ?अ?क्? क्?र्य्? प�चदिनोर्ध्वत? | अन्ये??? कुसुम्?न्?? च य्?वद् गन्धविपर्यय? || पु?प? च प�चगव्य? च उपच्?र्??स्तथ्?ऽपर्?न् | घ्र्?त्व्? निवेद्य देवे?इ ! नरो नरकम्?प्नुय्?त् || अ?ग स?स्प्???अम्?घ्र्?त? त्य्?ज्य? पर्यु?इत? बुधै? | के?अक्???पविद्ध्?नि ??र्?अपर्यु?इत्?नि च || स्वय? पतितपु?प्??इ त्यजेदुपहत्?नि च | ?एफ्?ल्? बकुल? चैव स्वय? ??र्?अ? न द्??यति || सर्व? भ्?मिगत? त्य्?ज्य? ?एफ्?ल्?बकुल? विन्? | क्?मिभक्?य्??इ भग्न्?नि वर्ज्य्?नि पतित? भुवि || तम्?लस्य च पद्मस्य छिन्नभिन्न? न द्??यति | वि??उक्र्?न्त्?-जव्?-न्?गके?अर? न्?गवल्लभम् || बन्ध्?क? चैव मन्द्?(कह्ल्?)र? सव्?न्त? ?अस्तमर्चने | स्वय? विकसित? पु?प? त्य्?ज्य�च पतित? भुवि || न्?गवल्लभ? न्?गचम्पकमित्यर्थ? | स्वय? विकसित? पुरु?ए?अ विकसित मित्यर्थ? || म्?घम्?से तु देवे?इ ! प्?ज्यपु?प्??इ द्व्?द?अ | कुन्द? कुरुवक? झि???? केतक? निचुल? तथ्? || न्?ल�च विक?अ? ??र्?अ? भ्??गर्?ज? च क्?उद्रकम् | बकुल? र?गन? चैव न्?न्यम्?से यजेत् क्वचित् || न्?क्?अतैरर्चयेद् वि??उ? न तुलस्य्? विन्?यकम् | न द्?र्वय्? यजेद् दुर्ग्?? बिल्वपत्रैर्दिव्?करम् || द्?र्व्? नि?इद्धेति यदुक्त?, तत् ?वेतद्?र्व्?परम् | तथोचोक्त? य्?मले ? रक्तम्?ध्य? ?वेतद्?र्व्?? न्?लक??ह? कुरु??अकम् | न दद्य्?च्च मह्?देव्यै यद्?च्छेच्छुभम्?त्मन? || पु?प्?भ्?वे यजेद् पत्रै? पत्र्?भ्?वे तु तत्फलै? | अक्?अतैर्व्? जलैर्व्?पि न प्?ज्?? व्यतिल?घयेत् || ?इवे विवर्जयेत् कुन्दमुन्मत्त�च हरेस्तथ्? | देव्?न्?मर्कमन्द्?रौ स्?र्यस्य तगर? तथ्? ||
SKदेव्?न्?मिति ?द्येतरदेव्?न्?मित्यर्थ? | अर्कपु?पैर्?द्य्?प्?ज्?य्?? प्र्??अस्त्यकथन्?त्, सहस्र? त्वर्क्???मिति कर्प्?र्?दिस्तव्?च्च | तगर? क्???हतगरमित्यर्थ? || ?इवप्?ज्?य्?? य्?मले ? बकुल? म्?लत्?? ज्?त्?? कुन्द? ?एफ्?लिक्?? जव्?म् | न दद्य्?च्च मह्?देवे यद्?च्छेच्छुभम्?त्मन? || म्?लत्? मल्लिक्? ज्?त्? य्?थिक्? म्?धव्? तथ्? | तगर? कर्?इक्?र?च द्रो?अ?चोत्पलचम्पकौ || अ?ओक? कुमुद?चैव ?एफ्?लिक्?कदम्बकौ | केतक्? वनम्?ल्? च कुसुम्भकि??उकौ तथ्? || कह्ल्?रबकुल? चैव लव?ग न्?गके?अरौ | एत्?न्यपि प्रिय्??इ स्युर्न पत्रैरर्चयेच्छिव्?म् || जव्?भि?चैव गन्ध्??ह्यैर्द्?र्वय्? ?र्?फलच्छदै? | विन्? वै द्?र्वय्? देव्?प्?ज्? न्?स्ति च कर्हिचित् || प्.२७९) तस्म्?द द्?र्व्? ग्रह्?तव्य्? सर्वपु?पमय्? हि स्? | देवेभ्य? सर्वगन्ध्??ह्यमभ्?वे तुलस्?दलम् || तुलस्य्? प्?जयेद् देव्?न् न्?त्र क्?र्य्? विच्?र?? | विन्? तुलस्य्? स्न्?न्?दि ?र्?द्ध? यज्�अ�च न प्रिये || सर्व�च नि?फल? प्र्?हु? सर्वत्रैव? विनि?चितम् | द्?र्व्? व्? तुलस्? तस्म्?त् ग्रह्?तव्य्? च स्?धकै? || सुन्दर्? भैरव्?क्?ल्? ब्रह्मविघ्न विवस्वत्?म् | तुलस्?वर्जित्? प्?ज्? स्? प्?ज्?ऽविफल्? भवेत् || तुलस्?पत्रै? ?अक्तेरर्चनम् ?अक्तिवि?अये य्?मले ? स्?वित्र्?? च भव्?न्?? च दुर्ग्?देव्?? सरस्वत्?म् | योऽर्चयेत् तुलस्?पत्रै? सर्वक्?मै? सम्?ध्यते || य्?मले ? र्?त्र्?व्?स्?? तु प्?ज्?य्?? तुलस्?? वर्जयेत् सद्? | तुलस्?घ्र्??अम्?त्रे?अ क्रुद्ध्? भवति च??इक्? || तुलस्? ब्रह्मर्?प्? च सर्वदेवमय्? ?उभ्? | सर्वदेवमय्? स्? तु ग?ए?अस्य प्रिय्? नहि || लक्?म्?देव्य्??च्?प्रिय्? हि त्?र्?देव्य्?स्तथैव च | अ?गु??हतर्जन्? योगैर्दक्?इ?ए पु?पप्?तनम् || पु?प? व्? यदि व्? पत्र? फल? ने??अमधोमुखम् || दु?खद? तत्सम्?ख्य्?त? यथोत्पन्न? तथ्?र्पयेत् | पु?प्?�जलि? विन्? देवि ! तथोत्पन्न? तथ्?र्पयेत् || पु?प्?दिचयनक्?ल? य्?मले ? स्न्?न? क्?त्व्? तु ये केचिद् पु?प? ग्?ह्?अन्ति वै द्विज्?? | देवत्?स्तन्न ग्?ह्?अन्ति न च्?पि पितरस्तथ्? ||
SKएतत् तु मध्य्?ह्नस्न्?न परम् | प्र्?त?स्न्?न्?न्तर? तु पु?प्?दिचयन? कर्तव्यमिति सम्प्रद्?यिक्?? | तन्त्रे ? स्न्?त्व्? मध्य्?ह्नसमये न छिन्द्य्?त् कुसुम? बुध? | तत्पु?पैरर्चयन्देव्?? निरये परिपच्यते || देव्?त्युपलक्?अ?अम् | न्?न्यदेव्?नपि यजेदिति | प्र्?त?स्न्?न्?दिक? क्?त्व्? पु?प्??यपि सम्?हरेत् | तत्पु?पैरर्चयन्देव्?? स प्?पैर्मुच्यते क्?अ??त् || देव्?त्युपलक्?अ?अमन्यदेव्?नपि अर्चयेदिति | नपु?पच्छेदन? कुर्य्?द्देव्?र्थ? व्?महस्तत? | न दद्य्?त्तेन तेभ्यो व्? स?स्थ्?प्य व्?महस्तत? || ध्?पप्रकर?अम् अगुर्???रगुग्गुल?अर्कर्?मधुचन्दनै? | स्?म्?न्य? सर्वदेव्?न्?? ध्?पोऽय? परिक्?र्तित? || सर्वे??मेव ध्?प्?न्?? दुर्ग्?य्?? गुग्गुलु? प्रिय? | घ्?तयुक्तो वि?ए?ए?अ सतत? प्र्?तिवर्धन? || ध्?पभ्?जनमस्त्रे?अ प्रोक्?य्?ऽभ्यर्च्य ह्?द्??उन्? | अस्त्रे?अ प्?जित्?? घ???? व्?दयन् गुग्गुलु? दहेत् || ध्?पस्थ्?न? समभ्यर्च्य तर्जन्य्? व्?मय्? स्प्??अन् | जय ध्वनि ततो मे म्?त?? स्व्?हेत्युद्?रयन् || अभ्यर्च्य व्?दयन् घ???? तैर्ध्?पैर्ध्?पयेत्तत? | मध्यम्?न्?मिक्?भ्य्?�च मध्यपर्व?इ दे?इक? || अ?गु??ह्?ग्रे?अ देवे?इ ! ध्?त्व्? ध्?प? निवेदयेत् | उत्तोल्य म्?र्ध्नि पर्यन्त? घ???व्?देन ध्?पकम् || ध्?पयेद्?ज्यस?मि?र? न्?चैर्देवस्य दे?इक? | न भ्?मौ वितरेद् ध्?प? न्?सेन न घ?ए तथ्? || यथ्? तथ्?धरगत? ध्?त्व्? त? विनिवेदयेत् | र्???क्?तैर्न चैव्?त्र त्वेतैर्ध्?पैर्विध्?पयेत् || तु??ग्निवत् तथ्? क्?त्व्? न तत्फलमव्?प्नुय्?त् | द्?पप्रकर?अम् न मि?र्?क्?त्य दद्य्?त्तु द्?पस्नेहघ्?त्?दिक्?न् | दत्त्व्? मि?र्?क्?त? स्नेह? तमिस्र? नरक? व्रजेत् || वर्त्य्? कर्प्?रगर्भि?य्? सर्पि?? तिलजेन व्? | ?रोप्य दर्?अयेद्द्?प्?नुच्चै? सौरभ??लिन? || उच्चैरिति देवस्य मस्तकपर्यन्तमित्यर्थ? | उत्तोलन? त्रिध्? क्?त्व्? ग्?यत्र्?म्?लयोगत? | ततो न्?र्?जन? कुर्य्?द्द?अव्?र? तु द्?पकै? || द्?तव्य? प्?त्रे द्?पस्तु न तु भ्?मौ कद्?चन | कुर्वन्त? प्?थिव्?त्?प? यो द्?पमुत्स्?जेन्नर? ||
SKतमिस्र? नरक? घोर? प्र्?प्नोत्येव न स??अय? | सर्व?सह्? वसुमत्? सहते न त्विद? द्वयम् || अक्?र्यप्?दध्?त? च द्?पत्?प? तथैव च | तस्म्?त्कुर्व्?त प्?थिव्?त्?प? न्?प्नोति वै यथ्? || नैव निर्व्?पयेद्द्?प? देव्?र्थमुपकल्पितम् | द्?पहर्त्? भवेदन्ध? क्??ओ निर्व्?पको भवेत् | न तेन व्यवह्?रोऽपि कर्तव्य? स्?धकोत्तमै? || नैवेद्यप्रकर?अम् नैवेद्यम्?ह ? कन्दुपक्व? स्नेहपक्व? घ्?तस?युक्त प्?यसम् | मन? प्रिय�च नैवेद्य? दद्य्?द्देव्यै पुन? पुन? || कन्दुपक्वमिति म्???अत??उल प्?थुक्?द्?नि देय्?न्?त्यर्थ? | यद्यद् हि व्?च्छित? वस्तु दद्दद्य्?त्देवप्?जने | बलप्रिय? च नैवेद्य? दत्त्व्? देव्?? प्रप्?जयेत् || ?त्म्?ऽप्रिय? च नैवेद्य? न दद्य्?द्देवप्?जने | स्त्र्???? प्र्?तिकर? यच्च तच्च्?पि विनिवेदयेत् | त्?म्ब्?लस्य प्रद्?नेन देव्? प्र्?तिमत्? भवेत् || प्रदक्?इ?अविधि? ?अ?खहस्तेन सर्वत्र सक्?द् द्विर्व्? प्रदक्?इ?अम् | वे??अन�च तत? क्?त्व्? प्र?अमेद्द??अवद् भुवि || तथ्? त्रिध्?चरेत् सम्यक् देवत्?य्?? प्रदक्?इ?अम् | एक? च??य्?? रवौ सप्ते त्र्??इ कुर्य्?द्विन्?यके || चत्व्?रि के?अवे कुर्य्?च्छिवे च्?र्द्धप्रदक्?इ?अम् | दक्?इ??द्व्?यव्?? गत्व्? दि?अस्तस्य्??च ??म्भव्?म् || ततोऽपि दक्?इ??? गत्व्? नमस्क्?रस्त्रिको?अवत् | त्रिको?ओऽय? नमस्क्?रस्त्रिपुर्?प्र्?तिवर्द्धन? || नतिस्त्रिको??क्?र्? च त्?र्?देव्य्?? सम्?रित्? | दर्?अयन्दक्?इ?अ? हस्त? मनस्?पि च दक्?इ?अ? || स च प्रदक्?इ?ओ ज्�एय? सर्वदेवौघतु??अये | प?च्?त्क्?त्व्? तु यो देव? भ्रभित्व्? प्र?अमेन्नर? | तस्येह च फल? न्?स्ति न परत्र दुर्?त्मन? || प्र??मविधि? नमन? म्?नस? प्रोक्त? व्?चिक? क्?यिक? तथ्? | त्रिविध?च नमस्क्?र? क्?यिक?चोत्तम? स्म्?त? || क्?यिकै?च नमस्क्?रैर्देव्?स्तु?यन्ति नित्य?अ? | ज्?नुभ्य्?मवन्?? गत्व्? ?इरस्? स्प्??य मेदिन्?म् || क्रियते यो नमस्क्?र उत्तम? क्?यिक? स्म्?त? | पद्भय्?? कर्?भ्य्?? ज्?नुभ्य्?मुरस्? ?इरस्? द्??? || वचस्? मनस्? चैव प्र??मोऽ????ग ?रित? | पद्भय्?? कर्?भ्य्?? ज्?नुभ्य्?मुरस्? ?इरस्?ऽपि च ||
SKप�च्??गोऽसौ नमस्क्?र? सर्वत्र्?य? विधि? स्म्?त? | पु??क्?त्य करौ ??र्?ए द्?यते च यथ्? तथ्? || अस्प्???व्? ??र्?अज्?नुभ्य्?? क्?इति? सोऽप्यधम स्म्?त? | क्?यिकस्त्रिविध? प्रोक्तो ह्य????ग्?दिविभेदत? || अ????ग उत्तम? प्रोक्त? प�च्??गो मध्यम? स्म्?त? | अधम? कर??र्??भ्य्?? नमस्क्?र? विवर्जयेत् || अयमेव नमस्क्?रो द??अवदिति न्?मत? | प्र??म इति विज्�एय? स प्?र्व? प्रतिम्?दित? || य्? स्वय? गद्यपद्य्?भ्य्?? घ?इत्?भ्य्?? नमस्क्?ति? | क्रियते भक्तियुक्तेन व्?चिक्? त्?त्तम्? स्म्?त्? || पौर्??इकैवैदिकैर्व्? मन्त्रैर्य्? क्रियते नति? | स मध्यमो नमस्क्?रो भवेद्व्?चनिक? सद्? || यत्तु म्?नु?अव्?क्येन नमन? क्रियते सद्? | स व्?चिकोऽधमो ज्�एयो नमस्क्?रस्तु प्?र्वति ! || उपच्?रप्रकर?अम् अथोपच्?र्?न्कुर्व्?त तन्त्रोक्त्?न्?सन्?दिक्?न् | ?सन? कुसुम? दद्य्?त् स्व्?गत? कु?अल? वदेत् || देवस्य व्?मभ्?गे तु दद्य्?न्म्?लेन च्?सनम् | पौ?प? द्?रुमय? व्?स्त्र? च्?र्म? कौ?अ? च तैजसम् || ?अ?विद्य? च्?सन? प्रोक्त? देवत्?प्र्?तिक्?रकम् | नमोऽन्त? प्?दयो? प्?द्य? ?इरोमन्त्रे?अ दे?इक? || अर्घ्य? दद्य्?त्ततो म्?र्ध्नि स्वधेत्य्?चमन? मुखे | स्वधेत्य्?चमन्?य�च तिव्?र? मुखप?कजे || स्वध्?न्तेनैव मनुन्? मधुपर्क? मुख्?म्बुजे | स्न्?न? गन्ध? ह्?द्? दद्य्?त् पु?प्??इ वौ?अ?इत्यपि || स्न्?न्?र्थमुदक? दद्य्?त्सर्व्??गे परमे?वरि ! | त्?येन प्रोक्?अ?अ? क्?त्व्? दुक्?ल? विनिवेदयेत् || स्न्?ने वस्त्रे च नैवेद्ये दद्य्?द्?चमन्?यकम् | सर्व्?ल?कर?अ? दद्य्?द्यत्र यत् तु विर्?जते || प्रतिम्?दौ यथ्?योग्य? ग्?त्रे दद्य्?त्तु तत्वग? | सर्व्??गे चन्दन? दद्य्?त्पु?प? दद्य्?च्छिरोपरि || नमोऽन्तकौ ध्?पद्?पौ सव्यदक्?अक्रमे?अ तु | दद्य्?त्तु योग्य? पुरतो नैवेद्य? भोजन्?दिकम् || नैवेद्य�च सुध्?न्त? हि कल्पय्?मि नमो वदेत् | निवेदय्?मि नैवेद्य? यद्द्रव्यै? परिकल्पितम् | ततो निवेदय्?म्?ति सर्व? दद्य्?न्महे?वरि || नैवेद्य्?द्?न्?म्?च्छ्?दन्?व?यकत्वम् ग्?न्धर्वे ?
SKसुनैवेद्य्?दिक? यत्तु गन्धपु?प्?दिक�च यत् | सर्वस्य्?च्छ्?दन? क्?र्य? य्?वद्?व्?हयेत्पर्?म् || र्?क्?अस्?? प्रतिग्?ह्?अन्ति निर्?च्छ्?दनक? यत? | देव्य्? नैवेद्यद्?न्ते तु यो विधि? स तु कथ्यते | अस?स्क्?त? न द्?तव्य? देवत्?भिर्न ग्?ह्यते || नैवेद्यद्?नविधि? स?स्क्?रम्?ह य्?मले ? ?न्?य देव्?पुरत? स?प्रोक्?य च्?र्घ्यव्?रि?? | अस्त्रमन्त्रे?अ च्?भ्युक्?य धेनुमुद्र्?? प्रदर्?अयेत् || तस्योपरि म्?लमन्त्रम??अव्?र? जपेत् सुध्?? | चक्रमुद्र्?? विध्?यैव चिन्तयेत्तत्सुरक्?इतम् || य? मन्त्रै? ?ओ?अयेद् दो?अ? र? मन्त्रैर्द्?हयेच्च तम् | व? मन्त्रै?च्?म्?त? भ्?व्य? ?ह? मन्त्रै? प्ल्?वयेच्च तत् || सर्वत्र भक्?यद्रव्ये?उ एव? स?स्क्?रम्?चरेत् | अम्?तोऽपस्तर?अमसि स्व्?हेति जलमर्पयेत् || अमुक्?देव्यै एतज्जल? ओ? अम्?तोपस्तर?अमसि स्व्?ह्? इति मन्त्रे?अ दद्य्?त् | ?पो??न? जल? दत्त्व्? मह्?देव्यै निवेदयेत् | इदमन्न? सोपकर?अ? मह्?देव्यै स्व(सु) ध्?पि च || प्र?अव्?द्यैरुक्तमन्त्रैर्देव्?वक्त्रे हुनेत् गुरु? || गुरुवित्युपलक्?अ?अम् अग्रे देवस्य हस्त्?भ्य्?मुत्थ्?प्य मुखसन्निधौ | जगन्म्?तर्जगद्ध्?त्र्यमुकि देवि तत? परम् || निवेदय्?मि यत्कि�चिद् जु??(ग्?ह्?)?एद? हविर्मम | अनेन मनुन्? देवि ! निवेद्य प्र?अव्?दिन्? || व्?मे व्? दक्?इ?ए व्?पि प�चमुद्र्?? प्रदर्?अयेत् | अ?गुल्य? कु?इल्?भ्?त्? विरल्?ग्र्?? परस्परम् | ग्र्?समुद्र्? सम्?ख्य्?त्? सव्ये प्??औ नियोजयेत् || प्र्???दिमुद्र्? प्र्???प्?न सम्?न्??चोद्?नव्य्?नौ च व्?यव? | सम्?न? प�चमो ज्�एय? प्र्???? प�च सम्?रित्?? || प्र्??अमुद्र्? सम्?ख्य्?त्? प्र्??ए हवनकर्म?इ | तर्जन्? मध्यम्??गु??हैस्त्रिभिरेक्?क्?त? यदि || स्य्?दप्?न्?हुतौ मुद्र्? तथ्?ऽन्?मिकमध्यमे | कनि??हेन सम्?युक्त्? नियुक्त्? व्य्?नहोमके || नि?कनि??हेन य्? मुद्र्? सोद्?न हवने स्म्?त्? | सर्व्?भि? स?स्क्?त्? मुद्र्? सम्?न्?हुतिकर्म?इ || क्?अ?अ? विलम्ब्य देव्य्? तु स्व्?क्?त? तद् विभ्?वयेत् | य्?वद् भु?क्ते हविर्देवि ! त्?वन्म्?ल? जपेत्सुध्?? ||
SKततो म्?लेन सलिल? दत्त्व्? हव्???इ स्?धक? | तस्म्?त्तेज? समुन्नत्यै दत्त्व्?ऽपो??नमुत्तरम् || एतज्जलम् अम्?त्?पिध्?नमसि स्व्?हेति दद्य्?त् | तत? ?चमन? तोय? दद्य्?च्च मुखव्?सनम् | स्थ्?न? वि?ओध्य तन्मन्त्र्? त्?म्ब्?ल? च निवेदयेत् || उक्ते?वेते?उ द्रव्ये?उ यत्कि�चिद् दुर्लभ? यदि | तत्कल्पन्?य? देवे?इ मनस्? भ्?वनेन तु | सर्वत्रैव जल? देयमुप च्?र्?न्तर्?न्तरे || द्रव्य्???? निर्म्?ल्यत्?क्?ल? द्रव्यवि?ए????? निर्म्?ल्यत्?नियमम्?ह योगिन्?ह्?दये ? म?इमुक्त्?सुवर्??नि देवे दत्त्?नि य्?नि वै | न निर्म्?ल्य? द्व्?द??ब्द? त्?म्रप्?त्र? तथैव च || प?? ???? च ?अन्म्?स? नैवेद्य? दत्तम्?त्रत? | मोदक? क्??अर? चैव य्?म्?र्द्धेन च सुन्दरि || प??अवस्त्र? त्रिम्?स्?च्च यज्�अस्?त्र? त्वह? स्म्?तम् | य्?वदु??अ? भवेदन्न? परम्?न्न? तथैव च || मस्तक? रुधिर? चैव अहोर्?त्रे?अ प्?र्वति ! | मुह्?र्त? दधि दुग्ध? च त्व्?ज्य? य्?मेन ?अ?करि ! || करव्?रमहोर्?त्र? बिल्वपत्र? तथैव च | जव्?रक्त? च निर्म्?ल्य? भवेत् स्?र्द्धैकय्?मके || य्?म्?र्द्धेन्?प ???नि ! त्?म्ब्?ल? दत्तम्?त्रत? | न निर्म्?ल्य�च द्??इम्ब? तथ्? बिल्वफल? प्रिये ! || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? मुपच्?र्?दि निर्?अयो न्?म चतुर्द?ओल्ल्?स? || १४ || प�चद?ओल्ल्?स? अथ ??क्त्?च्?र? कुलच्???म?औ ? देव्युव्?च? ???उपुत्र ! रहस्य? मे? समय्?च्?र सम्भवम् | येन ह्?न्?? न सिद्ध्यन्ति जन्मको?इ?अतैरपि || अनित्यकर्म स?त्य्?ग्? नित्य्?नु??ह्?न तत्पर? | परस्य्?? देवत्?य्?न्तु सर्वकर्म निवेदयेत् || व्?थ्? न क्?ल? गमयेद्युत क्र्???दिन्? सुध्?? | नयेत् तु देवत्?प्?ज्?जपयज्�?दिकर्मभि? || अन्त? ??क्त्? वहि? ?ऐव्?? सभ्?य्?? वै??अव्? मत्?? | सर्वद्? वि??उ भ्?वस्तु भवेत् स्?धकपु?गव? || यदि प?येत् कुलतरु? प्र?अमेत् स्?धकस्तद्? || कुलव्?क्??? कुलव्?क्?अम्?हतन्त्रे ?
SKअ?ओक? के?अरो बिल्व?कर्?इक्?र?च्?तस्तथ्? | नमेरुस्तथ्? प्रिय्?ल?च सिन्दुव्?र कदम्बकौ | मरुवक?चम्पक?च बिल्व?च द्व्?द?अ स्म्?त्?? || नमेरु रुद्र्?क्?अ? | पिय्?लो व्?क्?अवि?ए?अ? | सिन्धुव्?रो नि?उन्द्?ख्यय्?ख्य्?त? | मरुवको झि??इक्? | एते द्व्?द?अ कुलव्?क्?? ज्�?तव्य्?? | अन्यत्र्?पि ? ?ले?म्?क? कर�ज्?ख्यो निम्ब्??वत्थ कदम्बक्?? | बिल्वोऽ?ओक?चम्पक?च इत्य??औ कुलप्?दप्?? || ?ले?म्??तको बहे??व्?क्?अ इतिख्य्?त? | ति??हन्ति कुलयोगिन्य? सर्वे?वेते?उ सर्वद्? | न स्वपेत् कुलव्?क्??धोन चोपद्रवम्?चरेत् || य्?मले ? ?र्?मे पर्वते चैव निर्जने ??न्यम??अपे | चतु?पथे कल्?मध्ये यदि दैव्?द् गतिर्भवेत् || क्?अ?अ? स्थि(ध्य्?)त्व्? मनु? जप्त्व्? नत्व्? गच्छेद् यथ्?सुखम् चतु?पथे देव्य्?? प्??हे इत्यर्थ? | तथ्?चोक्त? य्?मले ? चतु?पथ? स विज्�एयो यत्र स्य्?त् त्?रि?? ?उभ्? | तर?अकर्त्?त्व्?त् त्?रि??त्यर्थ? || प्??हनिर्?प?अम् प्??हम्?ह ग्?न्धर्वे ? क्?मर्?प? मह्?प्??ह? व्?र्??अस्?? तत? परम् | नेप्?ल�च मह्?प्??ह? पौ??उवर्द्धनक? तथ्? || पुरस्थिर? मह्?देवि ! चरस्थिरमत? परम् | प्?र्?अ?ऐल? मह्?प्??ह? अर्बुद? च तत? परम् || क्??म्?र�च तथ्? प्??ह? क्?न्यकुब्जमथो भवेत् | ?म्र्?त के?वर? प्??हमेक्?म्र�च तथ्? ?इवे ! || तिस्रोत प्??हमुद्दि??अ? क्?मको?इमत? परम् | कैल्?स? भ्?तनगर? केद्?र? प्??हमुत्तमम् || ?र्?प्??ह�च तथो?क्?र? ज्?लन्धरमत? परम् | म्?लव�च कल्?न्त�च देवम्?त्?क मेव च || गोकर्?अ�च तथ्? देवि ! म्?रुते?वर मेव च | अ??अह्?स? च विरज? र्?जगिरिमत? परम् || प्??ह? कोल्वगिरि�चैव एल्?पुरमत? परम् | क्?ले?वर? मह्?प्??ह? प्र?अव�च जयन्तिक्?म् || प्??हमुज्जयिन्?? चैव क्??रिक्?प्??हमेव च | हस्तिन्?पुरक? प्??ह? प्??हमु????अमेव च || प्रय्?ग? चैव ?अ??ह्??अ? म्?य्?पुरजले?वरौ | मलय�च मह्?प्??ह? ?र्??ऐल? च तथ्? प्रिये || मेरुगिरि मेहेन्द्र�च व्?मन�च महे?वरि | हिर?यपुरक? प्??ह? मह्?लक्?म्?पुर? तथ्? ||
SKउ???य्?न? मह्?प्??ह? छ्?य्?पुर (प्??ह)मत? परम् | (प्??ह्?न्येत्?नि देवे?इ ! ?अस्त्?नि जपकर्मसु ||) प्??हस्थ्?नजपफलम् फलम्?ह योगिन्? ह्?दये ? व्?र्??अस्य्?? सद्?प्?ज्? सम्प्?र्?अफलद्?यिन्? | ततस्त द्विगु?? प्रोक्त्? पुरु?ओत्तम सन्निधौ || ततऽपि द्विगु?? प्रोक्त्? द्व्?र्?वत्य्?? वि?ए?अत? | सर्वक्?एत्रे?उ त्?र्थे?उ प्?ज्? द्व्?र्?वत्?सम्? || विन्ध्यो?अतगु?? प्रोक्त्?ग?ग्?य्?मपि तत्सम्? | ?र्य्?वर्ते मध्यदे?ए ब्रह्म्?वर्ते तथैव च || विन्ध्यवत् फलद्? प्रोक्त्? प्रय्?गे पु?करे तथ्? | तत?चतुर्गु?? प्रोक्त्? करतोय्? नद्?त?ए || तत?चतुर्गु?? प्रोक्त्? नद्?कु??ए च भैरवे | तत?चतुर्गु?? प्रोक्त्? व्?ल्म्?क्??वर सन्निधौ || तत्र सिद्धे?वर्?योनौ ततोऽपि द्विगु?? स्म्?त्? | तत?चतुर्गु?? प्रोक्त्? लौहित्यनदकु??अके || तत्सम्? क्?मर्?पेतु सर्वत्रैव जले स्थले | देव्?प्?ज्? तथ्? ?अस्त्? क्?मर्?पे सुर्?लये || देव्?क्?एत्र? क्?मर्?पे विद्यतेऽन्यन्न तत्समम् | अन्यत्र विरल्? देव्? क्?मर्?पे ग्?हे ग्?हे || तत?चतुर्गु?? प्रोक्त्? नद्?कु??अस्य मस्तके | ततोऽपि द्विगु?? प्रोक्त्? द्?रुके ?इवलि?गके || ततोऽपि द्विगु?? प्रोक्त्? ?ऐलपुत्र्य्?? स्वयोनि?उ | तत??अतगु?अ? प्रोक्त? क्?म्?ख्य्? योनिम??अलम् || क्?म्?ख्य्?य्?? मह्?म्?य्? प्?ज्?? यदि सक्?च्चरेत् | स चेहलभते क्?म? परत्र ?इवर्?पत्?म् || ए?उ स्थ्?ने?उ देवे?इ ! यदि दैव्?द् गतिर्भवेत् | तद्? प्?ज्?दिक? क्?त्व्? नत्व्? गच्छेद् यथ्? सुखम् || कल्?मध्ये कल्? प्रक्?तिस्तस्य्?? सम्?हमध्ये गत्व्? प्?ज्?दिक? क्?त्व्? नत्व्? सुख? गच्छेदित्यर्थ? | तथ्?चोक्त? समय्?तन्त्रे ? स्त्र्?सम्?पे क्?त्? प्?ज्? जप?च परमे?वरि ! | क्?मर्?प्?च्छतगु?ओऽव्यय?च समुद्?रित? || कुल्?र्?अवेऽपि ? एकलि?गे ?म??न�च सम्?ह? यो?इत्?मपि | न्?र्?�च रक्तवसन्?? द्???व्? वन्देत भक्तित? || ग्?ध्र? व्?क्?य मह्?क्?ल्?? जम्बुक्?? यमद्?तिक्?म् | क्???अम्?र्ज्?रभ्?क्?कौ ?येन? क्?एम?कर्? तथ्? ||
SKकुरर�च नमस्कुर्य्?दिद? मन्त्र? प?हेन्नर? | क्??ओदरि ! मह्?च??ए ! मुक्तके?इ ! बलिप्रिये | कुल्?च्?रप्रसन्न्?स्ये नमस्ते ?अ?करप्रिये || पित्?भ्?मि? व्यसु? द्???व्? प्रदक्?इ?अमनुव्रजन् | प्र?अभ्य्?ऽनेन मनुन्? मन्त्र्?सुखमव्?प्नुय्?त् || ओ? घोरद???रे ! कर्?ल्?स्ये ! कि?इ?अब्द वि(प्र)न्?दिनि ! | गुरुघोररव्?स्फ्?ले ! नमस्ते चितिव्?सिनि || रक्तवस्त्र? तथ्? पु?प? विलोक्य? त्रिपुर्?म्बिक्?म् | प्र?अमेद्द??अवद् भ्?म्?विम? मन्त्र? प?हेन्नर? || ओ? बन्ध्?कपु?पस?क्??ए त्रिपुरेभयन्??इनि | भ्?ग्योदय समुत्पन्ने ! नमस्ते वरवर्?इनि || क्???अवस्त्र? तथ्? पु?प? र्?ज्?न? र्?जपुत्रक(रु?अ)म् | हस्त्य?वरथ?अस्त्र्??इ फलक्?न् व्?रपुरु??न् || महि?ए कुलदेव? च द्???व्? महि?अमर्दिन्?म् | प्र?अमेद् जयदुर्ग्?? च स च विघ्नैर्न लिप्यते || फलकोन?अ इति ख्य्?त्?? | ओ? जयदेवि ! जगद्ध्?त्रि ! त्रिपुर्?द्ये ! त्रिदैवते ! भक्तेभ्यो वरदे देवि ! महि?अघ्नि ! नमोऽस्तुते | मद्यभ्???अ? सम्?लोक्य? मत्स्य? म्?स? वरस्त्रियम् || द्???व्? च भैरव्?? देव्?? प्र?अमेद्विम्??अन् मनुम् | ओ? घोरविघ्न विन्???य कुल्?च्?र सम्?द्धये || नम्?मि वरदे ! देवि ! मु??अम्?ल्? विभ्??इते | रक्तध्?र्? सम्?क्?र्?अवदने त्व्?? नम्?म्यहम् || सर्वविघ्नहरे देवि ! नमस्ते हरवल्लभे ! | य? ?इव्?रुदित? ?रुत्व्? ?इवद्?त्?? ?उभप्रद्?म् || प्र?अमेत् स्?धको भक्त्य्? तस्य क्?म?करे स्थित? | एते??? दर्?अनेनैव यदि नैव? प्रकुर्वते || ?अक्तिमन्त्र? पुरस्क्?त्य तस्य सिद्धिर्न ज्?यते | एते??? म्?र?ओच्च्??अ हि?सन? व्?गुर्?दिभि? || कुरुते यदि प्?पत्म्? स मद्भक्त? कथ? भवेत् | एतत् कर्तु? प्रसक्तोयस्य्?र्थ? तमस्? लिखेत् || नित्यस?केत? स्तव? कुलच्???म?औ नित्यस?केतस्तवम्?ह ? ?र्?देव्युव्?च ? ओ? त्रिपुर्? त्रिपुरे?? च सुन्दर्? पुरसुन्दर्? | ?र्?म्?लिन्? च सिद्ध्?म्ब्? मह्?त्रिपुरसुन्दर्? || प्रक??स्य्? तथ्? निद्र्? गुप्त्? गुप्तर्?पर्? | सम्प्रद्?यकुल्? कौलरहस्य्?तिरहस्यग्? ||
SKपर्?पररहस्य्? च तथ्? क्?मे?वर्? ?उभ्? | भगम्?ल्? तथ्? क्लिन्न्? भेरु??? वह्निसुन्दर्? || मह्?विद्ये?वर्? द्?त्? त्वरित्? कुलसुन्दर्? | नित्य्? न्?लपत्?क्? च विजय्? सर्वम?गल्? || ज्व्?ल्???उम्?लिन्? चित्र्? व?इन्? ?उभग्? कुल्? | प्?र्??ख्य्? च तथ्? वत्स ! क्?मे?? मोदिन्? तथ्? || विमल्? अरु?? देव्? जयन्त्? कुलभैरव्? | सर्वे?वर्? तथ्? कौल्? व्?गि?? सर्वक्?मिन्? || सिद्धे?वर्? तथ्? चोग्र्? दुर्ग्? महि?अमर्दिन्? | स्वप्न्?वत्? ??लिन्? च म्?त?ग्? सुरसुन्दर्? || मह्?क्?ल्? महोग्र्? च चित्रर्?प्? महोदर्? | प्र्??अविद्य्? तथैक्?क्?? चैकप्?द्? मह्??कु?? || व्?म्? ?इव्? तथ्? ज्ये??ह्? सुर्?प्? च्?रुह्?सिन्? | त्रिख??? त्रि?इर्?सौर्? गौर्? विन्ध्यनिव्?सिन्? || क्?ओभि?? न्?दिन्? भद्र्? ललित्? बहुर्?पिक्? | सर्वसम्पत्कर्? त्?र्? भ्?व्?न्? वि?वव्?सिन्? || क्??ए?वर्? मह्?विद्य्? कथित्? तव भैरव ! | उप्?सक्?न् मह्?देव ! ???उ चैकमन्?? स्वयम् || मनु?चन्द्र? कुबेर?च मन्मथस्तदनन्तरम् | लोप्?मुद्र्?पति(मुनि)र्नन्द्? ?अत्रु? स्कन्द? ?इवस्तथ्? || क्रोधभ???रक?चैव ?अक्तिर्न्?म प्रक्?र्तित्? | दुर्व्?स्? व्य्?सस्?र्यौ च व?इ??ह?च पर्??अर? || और्वो वह्निर्यम?चैव निर्-?तिर्वरु?अस्तथ्? | व्?युर्वि??उ? स्वयम्भ्??च भैरवो ग?अकस्तथ्? || अनिरुद्धो भरद्व्?जो दक्?इ??म्?र्ति रेव च | ग?अप्?? कुल्?प्??चैव लक्?म्?र्ग?ग्? सरस्वत्? || ध्?त्र्? ?ए?अ? प्रमत्त?च उन्मत्त? कुलभैरव? | क्?एत्रप्?लो हन्?म्???च दक्?ओ गरु?अ एव च || ?उकदेव? प्रह्ल्?द?च र्?मो र्?व?अ एव च | क्??यप? कौत्सकुम्भौ च जमदग्निर्भ्?गुस्तथ्? || ब्?हस्पतिर्यदु?रे??हौ दत्त्?त्रेयोयुधि??हिर? | अर्जुनो भ्?मसेन?च द्रो??च्?यर्?ओ व्???कपि? || दुर्योधनस्तथ्? कुन्त्? स्?त्? च रुक्मि?? तथ्? | सत्यभ्?म्? द्रौपद्? च उर्व?? च तिलोत्तम्? || पु?पदन्तो मह्?बुद्धो ब्?ल? क्?ल?च मन्दर? | कैल्?स? क्??रसिन्धु?च उदधिर्हिमव्??स्तथ्? || न्?रद?च मह्?व्?र्?? कथित्? व्?रस्?धक्?? | मह्?विद्य्?प्रस्?देन स्वस्वकर्म सम्?हित्?? ||
SKएते??? वत्स ! न्?म्?नि नित्यविद्योपसेविन्?म् | प्र्?त?क्?ले ?उचिर्भ्?त्व्? य? प?हेत् प्रयत्?त्मव्?न् || प्?ज्?क्?ले ?उचिर्भ्?त्व्? प्रप?हेत् स्तोत्रमुत्तमम् | अ?उचिर्व्? निर्?लम्ब्?म्?लम्ब्य च कुल्?न्तिके || नित्यप्?ज्?फल? तस्य दद्?मि वरम्?प्सितम् | चक्रस?केतक? चैव गुरुस?केतक? तथ्? || मन्त्र स?केतक�चैव न्?मस?केतक? तथ्? | समय्?च्?र स?केत? न ज्�?त्व्? योऽत्र वर्तते || जपप्?ज्?र्चन्? होमस्त्वभिच्?र्?य कल्पते | इद? स्तोत्र? प?हित्व्? तु भवेत् स?केतव्?न् ध्रुवम् || इति कुलच्???म?औ नित्यस?केतस्तवर्?ज? सम्?प्त? | देहप्?तेऽपि मोक्?अ? स्य्?त् समय्?च्?र प्?लन्?त् | इति फल?रुते? क्?म्यमपि || अथ ?इव्?बलि? वि?वस्?रे ? ?इव्?बलि? निवेद्य्?थ तो?अयेद् जगदम्बिक्?म् | न दद्?ति बलि? यस्तु ?इव्?य्?? ?इवत्?प्तये || स प्?पि??हो न सह्यते कुलदेव्य्?? प्रप्?जयेन् | इति य्?मल वचन्?त् तथ्? च य्?मले ? प?उर्?प्?? ?इव्?? देव्?? यो न्?ऽर्चयति निर्जने | ?इव्?र्?वे?अ तस्य्?ऽ?उ सर्व? न?यति नि?चितम् || जपप्?ज्? विध्?न्?नि यत्कि�चित् सुक्?त्?निच | ग्?ह्?त्व्? ??यम्?द्?य ?इव्? रोदिति निर्जने || तन्त्रे ?क्?लिक्?न्?ति वक्तव्ये तत्रोम्? ?इवर्?पि?? | ?इव्?र्?पधर्?ऽय्?ति परिव्?रग?ऐ? सह | अव?यमन्नद्?नेन नियत? तो?अयेच्छिव्?म् || ?इव्?बलेर्नित्यत्वम् नित्य?र्?द्धे यथ्? सन्ध्य्? ? वन्दने पित्?तर्प?ए | तथैव बलिद्?नेऽपि नित्यत्? कुलप्?जनम् || य्?मले ? बिल्वम्?ले नद्?त्?रे ?म??ने व्?पि स्?धक? | म्??सप्रध्?न? नैवेद्य? सन्ध्य्?क्?ले निवेदयेत् || ?इवबलिद्?नमन्त्र? बलिमन्त्रम्?ह ? ओ? ग्?ह्य देवि ! मह्?भ्?गे ! ?इवे ! क्?ल्?ग्निर्?पि?इ ! | ?उभ्??उभफल? व्यक्त? ब्र्?हिग्?ह्य बलि? तव || एवमुच्?र्य द्?तव्यो बलि? कुलजनै? प्रिये ! | एकय्? भुज्यते यत्र स्?धक्?न्?? हित्?य च || तदैव सर्व?अक्त्?न्?? प्र्?ति? परमदुर्लभ्? | भुक्त्व्? रौति यदै??न्य्?? मुखमुत्तोल्य सुस्वरम् || तदैव म?गल? देवि ! न्?न्यथ्? भवति ध्रुवम् | यद्? न ग्?ह्यते न्य्?न? तद्? नैव ?उभ? भवेत् ||
SKएव? ज्�?त्व्? महे??नि ! ??न्तिस्वस्त्यन? चरेत् | प?उ?अक्ति? पक्?इ?अक्तिर्नर?अक्तिर्यथ्?क्रम्?त् || प्?जन्?द्विगु?अ? कर्मसगु?अ? स्?धयेद्यत? | तेन सर्वप्रयत्नेन कर्तव्य? प्?जन? महत् || ?इव्?प्?ज्?दिफलम् प्?ज्?जप्?दे? फलम्?ह ? दहेत् त्??अ? यथ्? वह्निस्तथ्? ?अत्र्?न् जयेत् सद्? | स्वय? ब्रह्म्? स्वय? वि??उ? स्वय? रुद्रो न स??अय? || अन्ते निर्?मय? ब्रह्म मन्त्र्? भवति न्?न्यथ्? | य्? न्?र्? प्रजपेद्विद्य्?? स्? भवेत् परमे?वर्? || क्?कबन्ध्य्? च य्? न्?र्? बन्ध्य्? व्? भ्?तमुगि?? | प्?जयित्व्? लभेत् पुत्र? सत्य? सुचिरज्?विनम् || स्व्?मिन्? दुर्लभ्? स्? स्य्?द् धनध्?न्यसमन्वित्? | अन्ते न ज्?यते गौर्? सत्य? सत्य? न स??अय? || योगिन्?ह्?दये ? मह्?विद्य्?? जपेन्नित्य? स्मरेद्व्?पि सम्?हित? | तस्य गेहे वसेल्लक्?म्?र्जिह्व्?य्?? च सरस्वत्? || ह्?दये च वसेद्देव्? न्?र्?य?अ इति ?रुति? | ब्रह्म्?ऽस्ति क??हदे?ए च अह? ति??ह्?मि सन्मुखे || एक्?भ्?य समस्तै?च देव्? रक्?अति स्?धकम् | लक्?अमेक? जपन्मन्त्र्? मह्?प्?प्?त् प्रमुच्यते || लक्?अद्वयेन प्?प्?नि सप्तजन्मक्?त्?न्यपि | हन्ति लक्?अत्रये?ऐव जन्म स्?हस्रिक्??यपि || चतुर्लक्?अजप्?न्मन्त्र्? व्?ग्??वरसमो भवेत् | प�चलक्??द्दरिद्रोऽपि स्?क्??द् वै?रव?ओ भवेत् || जप्त्व्? ?अ?अलक्?अक? देवि मह्?विद्य्?धरो भवेत् | प्रजपन्सप्तलक्???इ खेचर्?सिद्धिभ्?ग् भवेत् || अ??अलक्?अप्र????न्तु जप्त्व्? विद्य्?? महे?वरि | अ?इम्?द्य??असिद्ध्??ओ ज्?यते न्?त्र स??अय? || नवलक्?अजप्?द्देवि ! रुद्रम्?र्तिरिव्?ऽपर? | कर्त्? हर्त्? मह्?देवि ! लोकेऽप्रतिहत? प्रभु? | द?अलक्?अफल? देवि ! वर्?इतु? नैव ??क्यते || ?र्?क्रमेऽपि ? मन्त्रप्??एन देवे?इ ! देवत्?म्?नयेद् ध्रुवम् | स्?धकस्य क्?र्यसिद्धि? क्?त्व्? देव्? गमि?यति || अथ देव्?प्र??मफलम् अ??ओत्तर?अत? कुर्य्?त् क्?लिक्?य्?? प्रदक्?इ?अम् | सर्वक्?म? सम्?स्?द्य प?च्?न्मोक्?अमव्?प्नुय्?त् || अत्र प्?र्व्?पर्?र्द्धेयोर्यथ्?क्रम? य? स इति योज्यम् |
SKये नमन्ति नर्? दुर्ग्?? ?रद्धय्? परय्?ऽन्वित्?? | अ?वमेधफल? प्र्?प्य दुर्ग्?लोक? व्रजन्ति ते || ???ह्येन्?पि नमस्क्?र? य? करोति सक्?न्नर? | भगवत्यै तथ्?ऽभक्त्य्? स गच्छति सुर्?लयम् || सर्वयज्�ओपव्?से?उ सर्वत्?र्थे?उ यत्फलम् | तत्फल? लभते लोक? प्र?अम्य ?इरस्? सत्?म् || स?प्रस्?रितदेहो यो द??अवत् पतितो भुवि | च??इक्?पुरतो भक्त्य्? स य्?ति परम्?? गतिम् || ?र्?मद्भ्?गवते द?अम?स्कन्धे रुक्मि??वचनम् ? क्?त्य्?यनि ! मह्?म्?ये ! मह्?योगिन्यध्??वरि ! | नन्दगोपसुत? देवि पति मे कुरुते नम? || हे क्?त्य्?यनि ! क्?त्य्?यनमुनिनिमित्तप्र्?दुर्भ्?ते | हे मह्?म्?ये ! महत्? च्?सौ म्?य्? चेति मह्?म्?य्? ब्रह्मवि??उ?इव्?द्?न्?मपि मोहहेतुत्व्?त् मह्?म्?य्? | वि??उ? ?अर्?रग्रह?अमहम्???न एव च | क्?रित्?स्ते यतोऽतस्त्व्?? क? स्तोतु? ?अक्तिम्?न् भवेत् || इति म्?र्क??एय पुर्???त् | हे मह्?योगिनि ! मह्?योगो जगत्स्???य्?दिक्?र?अत्रिगु??त्मकम्?य्? विद्यते यस्य्?? स्? मह्?योगिन्? | हे अध्??वरि ! ??वर्???? ?इवभक्तिब्रह्म??म्??वरो | ?ऐव सर्वे?वरे?वर्? ति म्?र्क??एयवचन्?त् | नन्दगोपसुत? नन्दनन्दनत्वेन्?भिमत? परमे?वर? ?र्?क्???अ? तथैव देवत्?र्?प? मे मम पति? प्??इग्रह्?त्?र? कुरु | त्वत्प्रस्?द? विन्? किमपि क्?र्य? न सिद्धयेदतस्ते तुभ्य? नम? | क्?यिकव्?चनिकम्?नसिको नमस्क्?र? || इति परिव्र्?जक्?च्?र्यपरमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरि- क्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? जप्?दिफलनिर्?अयो न्?म प�चद?ओल्ल्?स? || १५ || ?ओ?अ?ओल्ल्?स? जप्?दिफल्?भ्?वहेतुनिर्?अय? महि?अमर्दिन्?तन्त्रे ? ?र्?देव्युव्?च केन व्? जप्यते विद्य्? केन व्? न प्रजप्यते | फल्?भ्?व?च नियत? कथ? न्?थ प्रज्?यते || ?र्?मह्?देव उव्?च तवैव विदित? सर्व? जगदेतच्चर्?चरम् | तथ्?पि ???उ च्?र्व?गि ! रहस्य? परमे?वरि ! || स?सर्गदो?अ? कलिक्?ले महे??नि ! प्??अ??? बहवो जन्?? | स?गदो??न् महे??नि ! तत्क्?अ??द्ध्?नित्?? व्रजेत् ||
SKतस्म्?त्प्रयत्नतो देवि ! स?सर्ग? वर्जयेत् सुध्?? | वर? च्????ल स?स्पर्?अ? कुर्य्?त् तु स्?धकोत्तम? || तथ्?प्यसिद्धिजनक? सर्वद्? त? परित्यजेत् | द्??इत्?? कलिक्?ले?उ भ्?रते विविध्?? प्रज्?? || अत एव महे??नि ! सर्वे स?सर्गद्??इत्?? | घ?अक? ब्र्?ह्म?अ? देवि ! स?स्पर्?ए यत्नतस्त्यजेत् || भ्?रते बहवो दो??? कलिक्?ले सुर्?र्चिते ! | ब्र्?ह्म??? कलिक्?ले तु ??द्रगेहे वर्??गने ! || पुर्??अव्?चन्?सक्त्? दम्भम्?त्सर्यतत्पर्?? | प्?पि??ह्? ब्र्?ह्म??स्ते तु च्????लसद्???? प्रिये ! || न त्?च्चरेत् पुर्???नि कलौ ??द्रग्?हे द्विज? | ??द्रगेहे महे??नि ! पुर्??अ? प्रप?हेद्यदि || एतस्य स?गम्?त्रे?अ सर्व्?वस्थ्? भवन्ति हि | स?सर्ग्?त् सिद्धिह्?नि? स्य्?त् न सिध्यन्ति कद्?चन || कलौ च भ्?रते देवि ! निन्दक्? बहवो जन्?? | ?इवनिन्द्?पर्?? केचिद् वि??उनिन्द्?पर्??परे || सर्वे??? देवत्?न्?�च देव्?न्?�च तथैव च | सतत? कुर्वते निन्द्?? न्?त्र कुर्यु विच्?र??म् || परस्त्र्?स?गम्?च्चैव पुत्रमुत्प्?दयन्ति च | ?त्म्?न? वै??अव? मत्व्? अधम्? भ्?रते कलौ || कर्?ए क??हे तथ्? हस्ते ह्?दये नगनन्दिनि ! | विध्?त्य तुलस्?म्?ल्?? तिलक? हरिमन्दिरम् || ग्?ह्???उर्हरिन्?म्?नि सुस्वर्??इ ग्?हे ग्?हे | अन्यस्य स�चय? कुर्य? प्??अ??? म्?नव्?धम्?? || ते??? प्?प? महे??नि ! वर्?इतु? नैव ?अक्यते | अधर्मनिरतो भ्?त्व्? हरेर्न्?म वदेद्यदि || तद्? प्?प्?न्य?ए???इ न्??अयत्येव नि?चितम् | विह्?य सन्ध्य्?? ग्?यत्र्?? हरिन्?म स्मरेद्यदि || य्?न्यक्?अर्??इ न्?म्न्येव वसन्ति च ?उचिस्मिते ! | त्?वत् स?ख्य्?न्यनेक्?नि प्?प्?नि च पदे पदे || अन्न? जल? तथ्? पु?प? यद्दत्त? वि??अवे प्रिये ! | अन्न? वि??ह्?सम? तस्य जल? म्?त्रसम? स्म्?तम् || गेहे गेहे महे??नि ! वै??अव्? वै??अव्? जन्?? | स?क?अ वै??अव्? यत्र स दे?अ? पतित? सद्? || ग्?तमत्त्? व्?द्यमत्त्? ब्र्?ह्म?? न्?त्यतत्पर्?? | ग्?ते?उ ज्?यते भ्?वो ब्र्?ह्म??न्?? ग्?हे ग्?हे || सद्भ्?वो नहि च्?र्व?गि ! नरकस्य पद? ध्रुवम् | भ्?रते ब्र्?ह्म??? सर्वे प्?थिव्य्?? प्?दत्??अनम् ||
SKये करि?यन्ति च्?र्व?गि ! वि??ओरग्रे द्विज्?धम्?? | प्?दत्??अनस?ख्य्?त्??स्तत्प्?र्वपुरु??न् बह्?न् || स्वर्ग्?च्च नरक? देवि ! प्?तयन्ति न च्?न्यथ्? | प्?ज्?क्?ले तु च्?र्व?गि ! ध्य्?न्?नन्दो भवेद्यदि || तदैव ग्?त? न्?त्य? च ये कुर्वन्ति द्विज्?तय? | वि??उद्रुग्??इव्?ग्रे तु तद्? प्?प? विन?यति || ग्?तभ्?वमयो भ्?त्व्? यदि न्?त्य? करोति हि | को?इव? ?य्?न् सम्?द्?य स द्विजो नरक? ब्रजेत् || कलिक्?ले भ्?रते य्? ब्र्?ह्म?यो ग्?ततत्पर्?? | तथ्? व्?द्यरत्? भ्?त्व्? न्?त्यन्ति च्?धम्? द्विज्?? || त्?स्?? स?सर्गम्?त्रे?अ सर्व? च ह्?नित्?मिय्?त् | तस्म्?त् तु यत्नतो देवि ! स?सर्ग? तैर्न क्?रयेत् || कलौ तु भ्?रते वर्?ए स?सर्ग्?न्नहि सिध्यति | यदि सिध्यति च्?र्व?गि ! तद्? बहुदिने गते || भ्?रत? कलिक्?ले च सर्वदो?अमय? यत? | तत्रैक? च�चल्?प्??गि ! वर्तते मोक्?अस्?धनम् || मह्?म्?ये ! मह्?विद्य्?मेकध्? यदि चोच्चरेत् | सर्वप्?पविनिर्मुक्तो मह्?मोक्?अ? स गच्छति || वर्?अस?करज्?त्?न्?? वै??अव्?न्?? सह प्रिये | ??क्त? ?ऐवो वै??अव?च स?सर्ग? यत्नतस्त्यजेत् || अथ प्र्?य?चित्तम् प्?पम्?त्रन्??अक? कर्म प्र्?य?चित्तम् | यथ्?ह तन्त्रे ? देहस्थसर्वप्?पस्य न्??अन? यदि चेच्छति | क्?म? म्?य्?? तथ्? देवि ! मन्मथ? परमे?वरि ! || विद्य्?मेत्?? जपेद् देवि ! तत्प्?पस्य्?पनुत्तये | अ??ओत्तर?अत? जप्त्व्? तस्म्?त् प्?प्?द् विमुच्यते || य्?मले च ? ज्?म्ब्?नदस्य म्?लिन्य? परि?उद्ध? यथ्?ऽग्निन्? | अन्?च्?रस्य कलु?अ प्र्?य?चित्त्?ग्निन्? तथ्? || प्र्?य?चित्त? तु प्?प्?न्?? म्?लम??असहस्रकम् | ग्?यत्र्?? व्? जपेद् देवि ! सर्वप्?पप्र???इन्?म् || अ??असहस्रकमिति अ??ओत्तरसहस्रमित्यर्थ? | ग्?यत्र्?? वैदिकग्?यत्र्?म् ! ??द्रस्य तत्र्?ऽनधिक्?र्?द् म्?लम??ओत्तरसहस्र? त्?न्त्रिकग्?यत्र्?? व्? जपेत् | स्त्र्???न्तु ??द्रतुल्यत्व्?त् अथैव्?च्?र? || अथ ध्?तकवचन्??अ-प्र्?य?चित्तम् य्?मले ? विध्?त? कवच? देवि ! यदि न?यति कर्हिचित् | तदुप्?य? प्रवक्?य्?मि ???उ?व कमल्?नने ||
SKउपवि?य तथ्?चम्य भ्?त?उद्धिमथ्? चरेत् | ?अ?चक्र्??इ विचिन्त्य्?ऽथ गुरु? ?इरसि चिन्तयेत् || अनुलोम-विलोम्?भ्य्?? म्?त्?क्?ब्?जस?पु?अम् | कवच? तत्प?हेद् देवि ! ह्यर्क्?व्?त्तमनुक्रम्?त् || ततो जपेन् मह्?विद्य्?? सहस्र? व्? ?अत? क्रम्?त् | विलिख्य कवच? देवि ! रक्तस्?त्रे?अ वे??अयेत् || स्वर्?एन्?ऽपि पुनर्देवि ! वे??अयेत् तत् सुदुर्लभम् | वे??अयित्व्? मह्?देवि ! स्वर्?ऐ? परमदुर्लभम् | ध्?रयेतत् त्प्रति??ह्?प्य? न्?तन? कवच? तत? || न??अकवचप्रति??ह्?क्रम? प्रति??ह्?क्रमम्?ह ? प�च्?म्?तै? प�चगव्यै? स्न्?पयित्व्? ?उभेऽहनि | प्र्??अप्रति??ह्?मन्त्रे?अ प्र्???स्तत्र निवे?अयेत् || सम्प्?ज्य देवत्?र्?प? कवच? सर्वक्?मदम् | ततो जपेन्मह्?विद्य्?? सहस्र? व्? ?अत? क्रम्?त् | ध्?रयेत् तन्मह्?देवि ! यथ्?स्थ्?ने?उ स्?धक? || इति कवचन्??अप्र्?य?चित्तम् | अथ यन्त्रन्??अप्र्?य?चितम् नवरत्ने?वरे ? यदि प्रति??हत? यन्त्र? दैव्?द् देवि ! विन?यति | उपो?अ?अमहोर्?त्रम्?दरे?अ सम्?चरेत् || येन स्वर्??दिन्? यन्त्र? द्रव्ये?अ परिनिर्मितम् | विलिख्य यन्त्र? तत्पत्रे देवत्?? परिप्?जयेत् || उपच्?रै? ?ओ?अ?अभि? ?अक्तित? सुसम्?हित? | अयुत? प्रजपेन्मन्त्र? प्?जयित्व्? यथ्?विधि || मन्त्र्? विलो?य तत्तोय? प्?त्व्? भक्?अ?अम्?चरेत् | त्?वत् क्?ल? ब्रह्मचर्य? य्?वद्यन्त्र? न क्?रयेत् || पुनर्यन्त्र? नव? रम्यम्?हरेच्छुद्धय्?ऽन्वित? | ?ह्?त्य च नव? यन्त्र? प्रति??ह्?? तस्य क्?रयेत् | तत? प्रति??हिते तस्मिन् प्?र्ववत् प्?जन? चरेत् || अथ प्?ज्?क्?ले यन्त्र्?दिपतनप्र्?य?चित्तम् यन्त्र? यदि पतेद् देवि ! प्?ज्?क्?ले कद्?चन || लि?ग? व्?पि ?इवो व्?पि तत्फल? ???उ प्?र्वति | ?युर्ह्?निर्धनग्ल्?निर्बन्धुन्??अस्तथैव च || भवत्?ति विनि?चित्य प्र्?य?चित्तमथ्?चरेत् | त्रिर्?त्रमेकर्?त्र? व्? उपव्?स? सम्?चरेत् || म्?लविद्य्?? जपेद् देवि ! सहस्र? स्???अक? तथ्? | जप्?पु?पै?च जुहुय्?च्छतम??ओत्तर? तथ्? || ब्र्?ह्म??न् भोजयेद्भक्त्य्? यजेद्यन्त्र? सम्?हित? | यन्त्रमिति ?इव्?देरप्युपलक्?अ?अम् || म्?ल्?पतनप्र्?य?चित्तम्
SKम्?ल्? यदि पतेद्धस्त्?त् तथैव च विन?यति | सहस्र? तत्र स?जप्य ब्र्?ह्म??न् भोजयेत्तत? || भोजन? ब्र्?ह्म??न्?? तु सर्व्?नि??अस्य न्??अनम् | ग्?यत्र्?? व्? जपेद् देवि ! ?अत? स्???अ? सम्?हित? || ग्?यत्र्?? जपेदिति ! तत्तद् देवत्?य्? ग्?यत्र्?? जपेदित्यर्थ? | तत? सम्प्?ज्य त्?? म्?ल्?? ग्?ह्??य्?त् पुनरेव हि | एव? क्?ते वर्?रोहे ! न विघ्नैरभिभ्?यते || अथ म्?ल्?विन्??अप्र्?य?चित्तम् म्?ल्? यदि विन??? स्य्?त् प्?र्ववत् सकल? चरेत् | तत?च्?प्यपर्?? म्?ल्?? तज्ज्?त्?य्?? वर्?नने || सम्?ह्?त्य प्रति??ह्?प्य ग्?ह्??य्?त् पुनरेव हि | य्?मले ? मह्?पतकयुक्तोऽपि ग्?यत्र्?? प्रजयेद्यदि | सत्य? सत्य? मह्?देवि ! मुक्तो भवति तत्क्?अ??त् || अ?उचिर्न स्प्??एन्म्?ल्?? करभ्र???? न क्?रयेत् | ?अब्दे ज्?ते भवेद्रोग? करभ्र??? विन्??अक्?त् | छिन्ने स्?त्रे भवेन्म्?त्युस्तस्म्?द्यत्नपरो भवेत् || तन्त्र्?न्तरे ? हस्त्?त् पतति चेन्म्?ल्? न जप्तव्य्? तु स्? बुधै? | प्र्?य?चित्त? विध्?तव्य? जप्त्व्? मन्त्र? सहस्रकम् || सहस्रकमिति | अ???धिकसहस्रमित्यर्थ? | ज्?र्?ए स्?त्रे पुन? स्?त्रैर्ग्रथयित्व्? ?अत? जपेत् | ?अतमिति ? म्?लमन्त्रम??ओत्तर?अत? जपेदित्यर्थ? | छिन्न्? भवति चेन्म्?ल्? प्?ज्?? कुर्य्?त् ततोऽधिक्?म् | पुनर्ग्रथित्व्? त्?? म्?ल्?? प्रति??ह्?? प्?र्ववच्चरेत् | ततस्तु प्रजपेन्म्?ल्?? न तत्र दो?अभ्?ग्भवेत् || अथ गुरुक्रोधोपसमनप्र्?य?चित्तम् ?इवे रु??ए गुरुस्त्र्?त्? गुरौ रु??ए न क?चन | उपव्?स? गुरुक्रोधे क्?त्व्? त? तु प्रस्?दयेत् || य्?वत् प्रस्?द? न्?य्?ति त्?वद्वै भोजन? त्यजेत् | गुरौ प्रसन्ने भु�ज्?त एव? दो?? न ज्?यते || अथ्?ऽनिवेदितभोजनप्र्?य?चित्तम् मत्स्यस्?क्ते ? अनिवेद्य न भु�ज्?तभक्?य भोज्य्?दिक? च यत् | अन्न? वि??ह्? पयो म्?त्र? यद्वि??ओरनिवेदितम् || वि??उपद? स्वस्वस्?ध्यदेवत्? परम् | अन्यत्र्?पि ? अदत्त? नैव भोक्तव्यमभक्?ये?अ सम? स्म्?तम् | पत्र? पु?प? फल? म्?लमन्नप्?नौ?अध? प्रिये | अनिवेद्य? न भु�ज्?त भु�ज्?तैव निवेदितम् || क्?लिक्?पुर्??ए ?
SKमह्?ध्?रो मुनिर्व्?पि ब्र्?ह्म?अ?चेतरोऽपि व्? | यद्यद्भक्?य? समर्थस्तु प्रक्???अ? स्य्?द्यथ्? तथ्? | प्रदद्य्?दि??अदेवेभ्यो ग्?ह्??य्?च्च तथ्? स्वयम् || य्?मले ?यद्यथ्? भक्?यते भक्?य? तत्तथैव प्रद्?पयेत् | अन्यथ्? तत् प्रद्?नेन न तत् फलमव्?प्नुय्?त् || यद्यद् द्रव्य? येन प्रक्?रे?अ भोक्तव्य? तद् द्रव्यमन्यथ्? प्रक्?रे?अ न द्?तव्यम् | अनिवेद्य हरेर्भु�जन् सप्तजन्मनि न्?रक्? | हरेरित्युपलक्?अ?अम् | तथ्?चोक्त? क्?लिक्?पुर्??ए ? फल? पु?प? च त्?म्ब्?लमन्नप्?न्?दिक�च यत् | अदत्त्व्? तन्मह्?देव्यै न भोक्तव्य? कद्?चन || अनिवेद्य न भु�ज्?त प्र्?य?चित्त्?भवेन्नर? | देव्य्??च्???अ?अत? मन्त्र? जप्त्व्? प्?तो भवेन्नर? || देव्य्? इत्युपलक्?अ?अ? स्वस्वोप्?सित देवत्?न्?म् | तथ्?चोक्त? य्?मले ? अनिवेद्य महे??नि ! भु�ज्?न? प्?तक्? भवेत् | इ??अमन्त्र? ?अत? जप्त्व्? तस्म्?त् प्?प्?द् वि?उध्यति || न च ? यो यद् देव्?र्चनरत? स तन्नैवेद्यभुग् भवेत् | इति वचन्?द् देवत्?न्तरनैवेद्यभक्?अ?अ? न कर्तव्यमिति व्?च्यम् | अग्र्?ह्य? ?इवनिर्म्?ल्यमितिवचनमज्�?निन्?म्, ज्�?निन्?म् तु प्रस्?दभक्?अ?अमेव्?व?यकम् | तथ्? चोक्तम् य्?मले ? ?इवदत्त? वि??उदत्त? गिरिज्?दत्तमेव च | प्र्?प्तिम्?त्रे?अ भोक्तव्यमन्यथ्? प्?तक्? भवेत् || अग्निपुर्??ए ? ?इवदत्त? वि??उदत्त? प्?र्वत्?दत्तमेव च | नैवेद्यमुदरे क्?त्व्? नर? स्?युज्यम्?प्नुय्?त् || लै?गे ? लि?गे त्यक्त्व्? तु नैवेद्य? भु?क्ते मोह्?द्विम्??हध्?? | कुम्भ्?प्?के च नरके पच्यते न्?त्र स?सय? || एतत्तु ?इवमस्तकदत्त? ? नैवेद्यपरम् | स्कन्दपुर्??ए ? ब्??अलि?गे स्वयम्भ्?वे स्फ्??इके म्?दि स?स्थिते | अत? ?अतक्रतो? पु?य? ?अम्भोर्नैवेद्य भक्?अ??त् || ?दित्यपुर्??ए ? निर्म्?ल्य? ध्?रयेद्यस्तु ?इरस्? प्?र्वत्?पते? | र्?जस्?यस्य यज्�अस्य फलम्?प्नोत्यनुत्तमम् || तथ्? च लि?ग्?र्चनतन्त्रे ? ब्रह्मत्व? प्र्?प्तव्?न् ब्रह्म्? योग? च्?न्ये महर्?अय? | वि??उत्वमपि वि??उ?च ?इव? केन न सेव्यते ||
SKनिर्म्?ल्य? सर्वप्?प्?नि ?अम्भोर्हरति नि?चितम् | निवेदित�च नैवेद्य? भु�ज्?त न्?त्र स??अय? || न हि ये भु�जते म्?र्ख्? नरक? तै? प्रपद्यते | नैवेद्य? चोपभु�ज्?त दत्त्व्? तद्भक्ति??लिने | अन्यथ्? नैव सिद्धि? स्य्?दर्चको नरक? व्रजेत् || इत्य्?दि न्?न्?तन्त्रपुर्??अवचनै? निवेदितम्?त्र? भोक्तव्य? न तु अनिवेदितमिति नि?चय? || नैवेद्यनिन्दक? द्???व्? न्?त्यन्ति योगिन्?ग??? | रक्तप्?नोद्यत? सर्व्? म्??स्?स्थिचर्व?ओद्यत्?? || तस्म्?न्निवेदित? देव्यै द्???व्? ?र्?त्व्? च म्?नु?अ? | न निन्देत् मनस्? व्?च्? कु??हव्य्?धिपर्??मुख? || इति क्?ल्?कुलसर्वस्ववचन्?त् | कुम्?र्?तन्त्रे ? देवत्?न्?�च नैवेद्य? स्त्र्?भ्यो दद्य्?न्न कुत्रचित् | तन्त्रे ? स्व?अक्तिभ्योऽन्य?अक्तिभ्यो दत्त्व्? च स्वयम्?हरेत् | य्?मले ? अनेकध्? प?ओरन्न? भु�जते ये च स्?धक्?? | तेभ्य? प्रकुप्यते देव्? तत् स?सर्ग? न क्?रयेत् || तन्त्रे ? अनस्थिप्र्??इस?घ्?त? हत्त्व्? च द?अक? जपेत् | हत्व्? च पक्?इ?अ? सर्व? त्रिरेक्?द?अक? जपेत् || य्?मले ? पर्व?यप्?ज्य देवे??? गुरु? ?अक्ति�च ?अक्तित? | अदत्त्व्? च बलि? तत्र म्?लम??अ?अत? जपेत् || वर्?अस?करज्?त्?यैर्वै??अवैस्तु सह प्रिये ! | ??क्त? ?ऐवो वै??अव?च स?सर्ग? यत्नतस्त्यजेत् || ते??? मुख? सम्?लोक्य स्?र्यदर्?अनम्?चरेत् | इ??अमन्त्र? ?अत? जप्त्व्? तस्म्?त् प्?प्?द्वि?उध्यति || इति || वैदिककर्मम्?त्रम् इ??अदेवत्?प्र्?त्यर्थ? क्?र्यम् | तन्त्रे ? देवत्?प्र्?तिक्?मस्तु कर्म कुर्य्?त् सद्??इवे | अन्यक्?मस्तु चेत्कर्म करोति विधिमोहित? || फल? न ज्?यते तस्य देवस्तस्मै प्रकुप्यति | अन्यच्च ? ये त्वक्?म्? नर्?? सम्यग्कर्म कुर्वन्ति ?ओभने ! | ते??? दद्?ति वि?वे?ओ भगव्?न् मुक्तिम्??वर? || सक्?म्?न्?? स्?युज्य्?दि मुक्ति?, स्?युज्य? न पर्?मुक्ति? ?अर्?रसम्बन्ध्?त् | अक्?म्?न्?? निर्व्??अमेव मुक्ति?, परमपुरुर्थत्व्?त् | न च पुनर्?वर्तते इति ?रुते? | ननु ? अव?यमेव भोक्तव्य? क्?त? कर्म ?उभ्??उभम् | म्?मुक्त? क्??यते कर्म कल्पको?इ?अतैरपि ||
SKइति वचन्?त् कर्मम्?त्रस्य भोगन्??यत्वे बहुजन्म्?र्जित्?नन्तकर्म??त् | भोगेन विनिवर्तन्?सम्भव्?द् ज्?वस्य कथ? मुक्तिरिति चेत् | उच्यते ? देवत्? प्र्?तिक्?मस्तु कर्म कुर्य्?त् सद्??इवे | देवस्तु प्र्?तिम्?पन्नो भुक्तिमुक्तिफलप्रद? || अक्?म? स्?त्त्विको लोके यत्कि�चिद् विनिवेदयेत् | स तत्स्थ्?नम्?प्नोति यत्र गत्व्? न ?ओचति | अत्यन्तदु?खविरहो मुक्तिरित्युच्यते बुधै? || य्?मले ? धर्म्?धर्म्?विति प्रोक्तौ द्वौ प्??औ कर्मस?ज्�इतै | देवत्?प्र्?तिकर्म्??इ न बन्ध्?य विमुक्तये | म्?र्ध्न्? प्रत्?छते देवस्तत्क्?मेन क्?त? तु यत् || इत्य्?दिवचन्?त् वर्तम्?न ? कर्म??म् ??वर प्र्?तिम्?त्रस्?धकत्वेन्?ऽद्???ओ जनकत्व्?त् प्र्?रब्ध्?तिरिक्तकर्म??म्??वरप्रस्?दलब्ध ज्�?नेन न्???त् प्र्?रब्ध्?न्?�च भोग्?देव क्?अय्?ल्लि?गदेहन्??ए विमुक्ति? स्य्?दिति || लि?गदेहम्?हग्?न्धर्वे ? प�चप्र्??अमनोबुद्धिर्द?एन्द्रियसमन्वितम् | ?अर्?र? सप्तद?अक? स्?क्?मैतल्लि?गमुच्यते || ?र्?भ्?गवते द्व्?द?ए ? घ?ए भिन्नेघ??क्??अम्?क्??अ? स्य्?द्यथ्? पुर्? | एव? देहे म्?ते ज्?वो ब्रह्म सम्पद्यते पुन? || देहे म्?ते लि?गदेहे ध्वस्ते इत्यर्थ? | अन्यथ्? पुन? पुनर्जन्मम्?त्युर्भवत्येव | तथ्? चोक्त? वि??उधर्मोत्तरे ? तत्क्?अ??देव ग्?ह्??ति ?अर्?रम्?तिव्?हिकम् | केवल? तन्मनु?य्???? न्?न्ये??? प्र्??इन्?? क्वर्चित् || तत? सपि???कर?ए ब्?न्धवै? स क्?ते नर? | प्?र्?ए स?वत्सरे देहमतोऽन्य? प्रतिपद्यते || तत? न नरके य्?ति स्वर्ग? व्? स्वेन कर्म?? | तत्क्?अ??त् म्?त्युक्?अ??त् | प्रेत?अर्?र�च प्?र्वदेहर्?पमत्यन्तगतिमत् | तद्?ह म्?र्क??एयपुर्??अम् ? व्?युप्रस्?रिते देहमतोऽन्य? प्रतिपद्यते | तत्प्रम्??अ-वयोवस्थस?स्थ्?न? प्र्?ग्भव? यथ्? || इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्यपरमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? स?सर्गदो??दिनिर्?अयो न्?म ?ओ?अ?ओल्ल्?स? || १६ || सप्तद?ओल्ल्?स? अथ कु??अविधि? गोविन्दव्?न्द्?वने ? भ्?मे? परिग्रह? कुर्य्?द्य्?वद्?यतन? भवेत् | गुरुर्?चम्य विधिवद्?सने उपवि?य च ||
SKम्??अभक्तिबलि? दद्य्?द्यथोक्तविधिन्? तत? | ओ? स्वर्गप्?त्?लमध्ये च ये सन्ति व्?स्तुदेवत्?? || ग्?ह्?अन्त्विम? बलि? दत्त? तु???य्?न्तु स्वमन्दिरम् | म्?तरो भ्?तवेत्?ल्? ये च्?न्ये बलिक्??क्?इ?अ? || देव्य्?? प्?रि?अद्? ये च ते च ग्?ह्?अन्त्विम? बलिम् | म??अपनिर्म्??अम् ??रद्?य्?म् ? पु?य्?ह? व्?चयित्व्? तु म??अप? रचयेच्छुभम् | प�चभि? सप्तभिर्हस्तैर्नवभिर्व्? मित्?न्तरम् || ?ओ?अ?अस्तम्भस?युक्त? चत्व्?रस्ते?उ मध्यग्?? | अ??अहस्तसमुच्छ्र्?य्?? स?स्थ्?प्य द्व्?द??ऽमित? || चतुर्वि????गुल? हस्त? तन्त्रवेदविदो विदु? | ग्?ह्?दिकु??अकर?ए वेदिक्?म??अपे तथ्? | म्?न्??गुलेन कर्तव्य? न्?न्यैर्व्?पि कद्?चन || म्?न्??गुलिलक्?अ?अम् म्?न्??गुलिम्?ह तन्त्रे ? कर्तुर्दक्?इ?अहस्तस्य मध्यम्??गुलिपर्व?अ? | मध्यस्य दैर्घ्यम्?नेन म्?न्??गुलिरुद्?ह्?त्? || म??अपस्थ्?नपरिम्??अम् सिद्ध्?न्त?एखरे ? स्थल्?दर्क्??गुलोच्छ्व्?य? म??अपस्थ्?नम्?रितम् | न्?रिकेलदलैर्व?ऐ?छ्?दयेन् म??अप? तत? | चतुर्द्व्?रै? सम्?युक्त? कदल्?स्तम्भस?युतै? || ?म्रपत्रसम्?युक्त रज्जुभि? परिवे??हितम् | अ??अदिक्?उ ध्वज्?न??औ चतुर्दिक्प्?लवर्?अत? || दिक्प्?लवर्?अ? दिक्प्?लवर्?अम्?ह ??रद्?य्?म् ? प्?तो रक्तो सितो ध्?म्र? ?उक्लो ध्?म्र? सित्?वुभौ | गौरोऽरु?अ? क्रम्?देते वर्?अत? परिक्?र्तित्?? || कु??अ?अर्?रम् न्?स्ति होमो विन्? कु??अ? तस्म्?त् कु??अ? प्र?अस्यते | कु??अस्य र्?प? ज्?न्?य्?त् परम? प्रक्?तेर्वपु? || प्र्?च्य्?? ?इर? सम्?ख्य्?त? ब्?हु दक्?इ?असौम्ययो? | उदर? कु??अमित्युक्त? योनि? प्?दौ तु प?चिमे || चतुरस्रकु??अलक्?अ?अम् प्?र्व्?पर्?यत? स्?त्र? विन्यसेद्धस्तम्?नत? | दक्?इ?ओत्तरग? स्?त्र? तथैव च प्रविन्यसेत् || तदग्रयो? प्रविन्यस्य तथ्? स्?त्रचतु??अयम् | चतुरस्र? मह्?कु??अ? सर्वयोग प्रक्?र्तितम् || मु??इम्?त्रमित? कु??अ? ?अत्?र्धे स?प्रचक्?अते | ?अतहोमेऽरत्निम्?त्र? हस्तम्?त्र? सहस्रके || द्विहस्तमयुते लक्?ए चतुर्हस्तमुद्?रितम् | नियुते ?अ?कर? प्रोक्त? को?य्?म??अकर? स्म्?तम् || ख्?तपरिम्??अम्
SKय्?व्?न् कु??अस्य विस्त्?र? खनन? त्?वद्?रितम् | चतुर्वि??अत्य?गुल�च यव??न्य? सहस्रके || ततो द्विहस्तम्?ने तु त्रि??अद?गुलक? स्म्?तम् | चतुर्हस्ते मध्यम्?नम??अत्रि??अत्प्रकल्पितम् || अ?गुल? यव??न्य? स्य्?ल्लक्?अहोमे प्रक्?र्तितम् | ?तुहस्ते तथ्? म्?न? चत्व्?रि??अत्त्रय्?धिकम् || अ?गुल? नियुते प्रोक्तमधिक? यवचतु??अयम् | चत्व्?रि??अद??अयुत? यवसप्तसमन्वितम् | वसुहस्ते तथ्? म्?नम?गुल? कथित? बुधै? || ?ओभन? कमल? कुर्य्?त् कु??अमध्ये सरन्ध्रकम् | सर्वे??मेव कु???न्?? मेखल्?स्तिस्र एव च || एक्??गुल? विह्?य्?ऽन्ते मेखल्?स्तस्य क्?रयेत् | अर्द्ध्??गुलप्रम्??एन क??ह�च वर्द्धयेत् क्रम्?त् || तन्त्र्?न्तरे ? को?अस्?त्रप्रम्??एन द्विहस्त? कु??अमुद्धरेत् | एव? लक्??दिके ज्�एय? कु??अ? तत्र विध्?नत? || एकहस्त कु??अस्य को?अस्?त्रे?अ ???नको?अस्?त्रे?अ परितो यन्म्?न? तदेव प्?रिभ्??इक? द्विहस्त्?दिकु??अम्?न? न तु प्रक्?तहस्त्?द् द्वैगु?य्?दिकमिति || मेखल्?निर्?प?अम् इद्?न्?? मेखल्?द्?न्?? म्?न? तस्य निगद्यते | कु???न्?? य्?द्??अ? र्?प? मेखल्?न्?�च त्?द्??अम् || कु???न्?? मेखल्?स्तिस्रो मु??इम्?त्रे तु त्?? क्रम्?त् | उत्सेध्?य्?मतो ज्�एय्? द्वयेक्?र्द्ध?गुलिसम्मित्?? || युग्??गुल? योनिम्?न? योन्यग्रमेकम?गुलम् | युग्??गुल? न्?भिपद्म? ?अत्?र्द्धे स?प्रचक्?अते || अरत्निम्?त्रकु??ए त्?स्त्रिद्वयेक्??गुलिक्?त्मिक्?? | कर्तव्य्? मेखल्? योनि?चतुर?गुलसम्मित्? || एक्??गुल? तु योन्यग्र? कुर्य्?द्??अदधोमुखम् | अ?गुलित्रितय? चैव न्?भिपद्म? सु?ओभनम् || एकहस्तमिते कु??ए वेद्?ग्निनयन्??गुल्?? | कर्तव्य्? मेखल्? योनि? कुर्य्?च्चैव ?अ?अ?गुलम् || वेद्??गुल? न्?भिपद्म? योन्यग्रैक्??गुल? स्म्?तम् | कु??ए द्विहस्ते त्? ज्�एय्? रसवेदगु???गुल्?? || योनि? सप्त्??गुलोपेत्? योन्यग्र? च्??गुलिद्वयम् | प�च्??गुल? न्?भिपद्म? कुर्य्?च्चैव मनोहरम् || चतुर्हस्तमिते कु??ए वसुतर्कयुग्??गुल्?? | कर्तव्य्? मेखल्?स्तिस्रो योन्यग्र? च्??गुलित्रयम् ||
SKयोनिर????गुलोपेत्? न्?भिपद्म? ?अ?अ?गुलम् | कु??ए रसकरे त्?? स्युर्द????अर्त्व?गुल्?न्वित्?? || योनिर्न व्??गुलोपेत्? योन्यग्र? चतुर?गुलम् | सप्त्??गुल? न्?भिपद्म? कुर्य्?च्च सुमनोहरम् || अ??अहस्तमिते कु??ए भ्?नुप?क्त्य??अक्??गुल्?? | योनिर्द???गुलोपेत्? कर्तव्य्?ऽधोमुख्? तथ्? || प�च्??गुल? तु योन्यग्र? कुर्य्?द????गुअल्? तथ्? | न्?भिपद्म? लक्?अहोमे तन्त्रवित् परिकल्पितम् || होतुरग्रे तु त्?? योनि? मेखल्?न्?? परिस्थित्?म् | गजकुम्भवद्?क्?र्?? कुर्य्?दो?अदधोमुख्?म् || प?चिम्?भिमुख्?? योनि? कु??अको?ए?उ न्?र्पयेत् | एव? समस्तकु???न्?? व्यवस्थेय? प्रक्?र्तित्? || न्?लनिर्?प?अम् स्थल्?द्?रभ्य न्?ल? स्य्?द्योन्य्? मध्ये सरन्ध्रकम् | सरन्ध्रकमित्युभयत्र सम्बध्यते | तथ्? चोक्त? रुद्रय्?मले ? योन्य्? मध्ये बिल? कुर्य्?त् तद्?ज्यग्र्?हिस?ज्�अकम् | स्थलनियमम्?ह क्रिय्?स्?रे ? होमस्थ्?न्?द् बहि?स्थ्?न? स्थलमित्यभिध्?यते | गौतम्?ये ? स्?क्?म्?ग्र? स्थ्?लम्?ल�च सरन्ध्रक? न्?लमि?यते | सम्मोहनतन्त्रे ? म्?ल? मध्य? तथ्? च्?ग्र? क्रम्?च्च ?अ?चतुस्त्रिकम् | तथ्? च त्रयोद???गुल्?द्?र्घ? न्?लमित्यर्थ? | न्?लमेखलयोर्मध्ये परिधे? स्थ्?पन्?य च | रन्ध्र? कुर्य्?त्ततो विद्व्?न् द्वित्?यमेखलोपरि || कु??अदो??? कु??अदो?अम्?ह वि?वकर्म्? ? ख्?त्?धिके भवेद् रोग्? ह्?ने चैव धनक्?अय? | वक्रकु??ए च सन्त्?पो मर?अ? छिन्नमेखले || मेखल्?रहिते ?ओको ह्यधिके वित्तस?क्?अय? | भ्?र्य्?विन्??अक? कु??अ? प्रोक्त? योन्य्? विन्? क्?तम् || अपत्य ध्वसन? प्रोक्त? कु??अ? यत्क??हवर्जितम् | कु??अमेव? विध? न स्य्?त् स्थ??इल? व्? सम्??रयेत् || स्थ??इललक्?अ?अम् य्?मले ? नित्य? नैमित्तिक? क्?म्य? स्थ??इले व्? सम्?चरेत् | हस्तम्?त्रे तु तत्कुर्य्?द् ब्?लुक्?भि? सु?ओभनम् | अ?गुलोत्सेधस?युक्त? चतुरस्र? समन्तत? || चतुरस्र? चतु?को?अमित्यर्थ? | इति ?र्?परिव्र्?जक्?च्?र्यपरमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्द- गिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? कु??अनिर्?अयो न्?म सप्तद?ओल्ल्?स? || १७ || अ???द?ओल्ल्?स?
SKअथ होमविधि? अथ्?ऽग्निजनन? वक्?ये सर्वतन्त्र्?नुस्?रत? | गोमयेन सम्?लिप्य कु??अ? सर्वत्र मन्त्रवित् | स्?म्?न्य्?र्घ्य? प्रकल्प्य्?ऽथ प�चगव्यैर्वि?ओधयेत् || अ???द?अकु??अस?स्क्?र्?? ??रद्?य्?म् ? अ???द?ओक्त्?? स?स्क्?र्?? कु???न्?? तन्त्रदे?इत्?? | व्?क्?अ?अ? म्?लमन्त्रे?अ ?अरे?अ प्रोक्?अ?अ? मतम् || तेनैव त्??अन? दर्भैर्वर्म??भ्युक्?अ?अ? स्म्?तम् | अस्त्रे?अ खननोद्ध्?रौ ह्?न्मन्त्रे?अ प्रप्?र?अम् | सम्?कर?अमस्त्रे?अ सेचन? वर्म?? मतम् || कु??अन? हेतिमन्त्र?अ वर्ममन्त्रे?अ म्?र्जनम् | विलेपन? कल्?र्?पकल्पन? तदनन्तरम् || त्रिस्?त्र्?कर?अ? प?च्?द् ह्?दयेन्?ऽर्चन? मतम् | अस्त्रे?अ वज्र्?कर?अ? ह्?न्मन्त्रे?अ कु?ऐ? ?उभै? || चतु?पथ? तनुत्रे?अ तनुय्?दक्?अप्??अनम् | य्?गे कु???नि स?स्कुर्य्?त् स?स्क्?रैरेभिर्?रितै? || अस्य्?र्थ? ? कु??अन? द्??ह्?कर?अम् | विलेपन? गोमयोदकेन | कल्?र्?पकल्पन? सोमस्?र्य्?ग्निकल्?त्मकचिन्तनम् | त्रिस्?त्र्?कर?अ? रक्तस्?त्रे?अ त्रि?परिवे??अनम् | वज्र्?कर?अ? वज्रर्?पे?अ चिन्तनम् | चतु?पथ? चतुरस्र्?कर?अम् | अक्?अप्??अनमिन्द्रियोद्घ्??अनम् इति | प्रक्?र्?न्तरस?स्क्?र? अथव्? त्?नि स?स्कुर्य्?च्चतुर्भिर्व्?क्?अ??दिभि? | तिस्रस्तिस्रो लिखेल्लेख्? ह्?द्? प्र्?गुदगग्रिक्?? | प्र्?गग्र्???? स्म्?त्? देव्? मुकुन्दे?अपुरन्दर्?? || रेख्???मुदगग्र्???? ब्रह्मवैवस्वतेन्दव? || अथव्? त्रिको?अ? तद्वहि? ?अ?को?अ? तद्बहिर??अदलपद्म? परिकल्पयेत् | चतुरस्र? चतुर्द्व्?रमेव? व्? वह्निम??अलम् | कु??अस्योत्तरभ्?गे च त्रिरेख्? हस्तम्?नत? || दक्?इ?ओत्तरतस्तद्वल्लिखेद्रेख्?त्रय? ?उभम् | अर्घ्य्?द्भि? प्रोक्?य सर्व? हि प�च?उद्धि? सम्?चरेत् || सर्व्??इ त्?रे??ऽभ्युक्?येति ?ए?अ? || प�च?उद्धि? प�च?उद्धिम्?ह ??रद्?य्?म् ? व्?क्?अ?अ? म्?लमन्त्रे?अ ?अरे?अ प्रोक्?अ?अ? मतम् | त्??अन? हेतिमन्त्रे?अ कवचेन्?ऽथ लेपयेत् || अस्त्रे?अ रक्?अ?अ? क्?त्व्? तत? स?स्क्?रम्?चरेत् | ततो वह्नेगर्योप्??हमर्चयेत् कर्?इकोपरि | धर्म? ज्�?न�च वैर्?ग्यमै?वर्यमग्नितो यजेत् ||
SKप्?र्व्?दि दिक्?उ च्?प्?र्व्?नथ धर्म्?दिक्?न यजेत् | मध्ये च प्?जयेद्वह्नेर्नव?अक्त्?र्विध्?नवित् || प्?त्? ?वेत्?ऽरु?? क्???? ध्?म्र्? त्?व्र्? स्फुलि?गिन्? || रुचिर्? ज्व्?लिन्? प्रोक्त्? क्रम?ओ नव ?अक्तय? | प्?जयेन्म??अल? ते??? कल्?भि? सहमन्त्रवित् || अ? अर्कम??अल? ?एन्त? तथ्? उ? सोमम??अलम् | म? वह्निम??अल? तद्वदर्चयेद् गन्धपु?पकै? || व्?ग्??वर्?म्?तुस्न्?त्?? न्?लेन्द्?वरसन्निभ्?म् | व्?ग्??वरे?अ सहित्?मुपच्?रै? समर्चयेत् || अग्निप्र?अयनम् विहित्?ग्निम्?ह तन्त्रे ? स्?र्यक्?न्त्?दिसम्भ्?त? यद्व्? ?रोत्रियगेहजम् | अग्निप्र?अयनम्?ह ? प्?त्र्?न्तरे?अ पिहिते त्?म्रप्?त्र्?दिके ?उभे | अग्निप्र?अयन? कुय्?च्छर्?वे व्?पि त्?द्??ए || यत्तु स्म्?तिस्?रे ? ?अर्?वे भिन्नप्?त्रे व्? कप्?ले वोल्मुकेऽपि व्? | न्?ग्निप्र?अयन? कुर्य्?द् व्य्?धिह्?नि-भय्?वहेम || इत् || तस्य ? मुख्यप्?त्रसम्भवे ?अर्?वो न ग्र्?ह्य इत्यत्र त्?त्पर्यम् | ?न्?य्?स्त्रे?अ नै-?त्य्?? क्रव्य्?द्???अ? परित्यजेत् | अस्त्रे?ऐव च तत्क्???ह? नैर्-?त्य्?? वर्जयेत् प्रिये || ??रद्?य्?म् ? स?स्कुर्य्?त् त? यथ्?न्य्?य? दे?इको व्?क्?अ??दिभि? | ओदर्य वैन्दव्?ग्निभ्य्?? भौमस्यैक? स्मरन् वसो? || योजयेद्वह्निब्?जेन चैतन्य? प्?वके तद्? | त्?रे?अ मन्त्रित? क्?त्व्? धेनुमुद्र्?म्?त्?क्?तम् || अस्त्रे?अ रक्?इत? प?च्?त् तनुत्रे??ऽवगु??हितम् | अर्चित? त्रि?परिभ्र्?म्य कु??अस्योपरि दे?इक? | प्रदक्?इ?अ? तद्? त्?रमन्त्रोच्च्?र?अप्?र्वकम् || ?त्मनोऽभिमुख? वह्नि? ज्?नुस्प्???अमह्?तल? | ?इवब्?जधिय्? देव्य्? योन्?वेन? विनिक्?इपेत् || समय्?तन्त्रे ? कु?एन्?च्छ्?द्य तद्योनि? चतु?को?अ? प?अ? न्यसेत् | ततो देव्?य देव्यै च दद्य्?द्?चमन्?यकम् | गर्भन्??य्? ध्?त? ध्य्?येद्वह्निर्?प? हरि? गुरु? || हरिरित्युपलक्?अ?अ? स्वस्वे??अदेव्?न्?म् | समय्?तन्त्रे ? देव्य्? व्?मकरे दद्य्?द्रक्??र्थ? दर्भक?क?अम् | भ्???भिर्भ्??अयेद्देव्?? त्रैलोक्योत्पत्तिम्?त्?क्?म् | जिह्व्?मन्त्र? रेफव्?य्वर्घ्??ऐर्युक्त्? न्?दबिन्दुविभ्??इत्?? | स्?दिय्?न्त्??च जिह्व्?न्?? मनव? परिक्?र्तित्?? ||
SKप्?यौ लि?गे च न्?मौ च ह्?दये क??हम्?लत? | लम्बिक्?य्?? भ्रुवोर्मध्ये जिह्व्? ज्व्?ल्?रुचो न्यसेत् || जिह्व्?स्तस्त्रिविध्?? प्रोक्त्? गु?अभिन्ने?उ कर्मसु | हिर?य्? गगन्? रक्त्? क्????ऽन्य्? सुप्रभ्? मत्? || बहुर्?प्? सुवर्??न्य्? त्?त्?य्? भद्रलोहित्? | लोहित्?ऽनन्तर? ?वेत्? ध्?मिन्? च कर्?लिक्? || र्?जस्यो रसन्? वह्ने विहित्? क्?म्यकर्मसु | वि?वम्?र्तिस्फुलि?गिन्यै ध्?म्रवर्?? मनोजव्? || लोहित्?न्य्? कर्?ल्?स्य्? क्?ल्? त्?मस्य ?रित्?? | एत्?? सप्त नियुज्यन्ते क्र्?रकर्मसु मन्त्रिभि? || जिह्व्?धिपति देवत्? अमर्त्य-पित्?-गन्धर्व-यक्?अ-न्?ग-पि??चक्?? | र्?क्?अस्?? सप्त जिह्व्?न्?म्?रित्? ह्यधिदेवत्?? || वह्नेर?गमनु? न्यस्येत तन्?वुक्तेन वर्त्मन्? | सहस्र्?र्चि? स्वस्तिप्?र्?अ? उत्ति??हपुरु?अस्तथ्? || धुमव्य्?प्? सप्तजिह्वो धनुर्धर इत्?रित्?? | ?अ?अ?गमनव? प्रोक्त्? ज्?तिभि? सह स?युत्?? || म्?र्तिन्य्?स? ??रद्?य्?म् ? म्?र्तिर??औ तनौ न्यस्येद्दे?इको ज्?तवेदस? | म्?र्ध्निस्कन्धे व्?मप्?र्?वे क?यन्धु क?इप्?र्?वके || तथ्? स्कन्धे च विन्यस्येत् प्र्?दक्?इ?यक्रमे?अ तु | ज्?तवेद्?? सप्तजिह्वो हव्यव्?हनस?ज्�अक? || अ?वोदरजस?ज्�ओऽन्य? पुनर्वै?व्?नर्?ह्वय? | कौम्?रतेज्?? स्य्?द् वि?वमुखो देवमुख? स्म्?त्?? || त्?र्?ग्नये पद्?द्यो? स्युर्नत्यन्त्? वह्निम्?र्तय? | एव? विन्यस्तदेह? सन् ज्व्?लयेन्मनुन्?ऽमुन्? || ज्व्?लयेदिति ज्व्?लिन्?मुद्र्?? प्रदर्?य इत्यर्थ? | तल्लक्?अ?अ? र्?घव्?ये ? म?इबन्धौ समौ क्?त्व्? करौ तु प्रस्?त्??गुल्? | मध्यमे मिलिते क्?त्व्? अन्तर?गु??हकौ क्?इपेत् | मुद्र्? स्? ज्व्?लिन्? प्रोक्त्? वह्नेर्ज्व्?लनकर्म?इ || इति || वह्निप्रज्व्?लनमन्त्र? ??रद्?य्?म् ? चित्पि?गल? हन दह पच युग्म्?नुद्?र्य च | सर्वज्�?ज्�?पय स्व्?ह्? मन्त्रोऽय? परिक्?र्तित? || अग्नि? प्रज्व्?लित? वन्दे ज्?तवेद? हुत्??अनम् | सुवर्?अवर्?अममल? समिद्ध? वि?वतो मुखम् || उपति??हेत विधिवन्मनुन्?ऽनेन प्?वकम् | स्?रद्?य्?म् ? परि?इ�चेत् ततस्तोयै वि?उद्धैर्मेखलोपरि | दर्भै? क्???है?च ?उद्धै?च म्?लमध्य्?ग्रच्छ्?दितै? ||
SKस?स्तरेद्विधिवन्मन्त्र्? प्रदक्?इ??व?अक्तत? | एव? स?स्तर?अ? कुर्य्?द्वर्जयित्व्?त्मनो दि?अम् || ग?ए?वरविमर्?इन्य्?म् ? प्र्?गग्रैरुदग्रै?च दर्भैर्वह्नि? परिस्तरेत् | यज्�अव्?क्?ओद्भव? तद्वत् क्???है?च परिधित्रयम् || मध्ये तु मेखल्?य्?न्तु स?स्तरेत् तन्त्रवित्तम? | अथ चेत् स्थ??इले मन्त्र्? भ्?मौ सर्व? परिस्तरेत् || परिधिलक्?अ?अम् यज्�अक्???हसमुद्भत? प्र्?दे?अप्रमित? ?उभ? | परिधि? कथित? सर्वैर्दे?इकैस्तन्त्रवित्तमै? || निक्?एपेद्दिक्?उ परिध्?न् प्र्?च्?वर्ज्य? गुर्?त्तम? | प्र्?दक्?इ?येन सम्प्?ज्य्?स्ते?उ ब्रह्म्?दिम्?र्तय? | गन्ध्?दिभि? समभ्यर्च्य वह्निदेव? विभ्?वयेत् || वह्निध्य्?न? वह्नेर्ध्य्?न? यथ्? ? त्रिनयनमरु??भ? बद्धमौलि? तु ?उक्ल्?? ?उकमरु?अमनेक्? कल्पमम्भोजस?स्थम् | अभिमतवर?अक्ति? स्वस्तिक्?भ्?तिमुच्चै- र्नमतकमलम्?ल्?ल?क्?त्???अ? क्???नुम् || एव? हि मनस्? ध्य्?येच्छ्?न्तिक्?दौ गुर्?त्तम? || क्???अ क्???अगतेर्वर्?अ? ध्य्?येन्म्?र?अकर्म?इ | म्?र्तिर??औ समभ्यर्च्य ?अ?को?ए तु ?अ?अ?गकम् | मध्ये ?अ?स्वपि को?ए?उ जिह्व्? ज्व्?ल्?रुचो यजेत् || के?अरे??क्तम्?र्गे?अ? प्?जयेद?गदेवत्? | दले?उ प्?जयेन्म्?र्त्?? ?अक्तिस्वस्तिकध्?रि??? | लोकप्?ल्??स्ततो दिक्?उ प्?जयेदुक्तलक्?अ??म् || ??रद्?य्?म् ? ध्य्?त? वह्नि? यजेन्मध्ये गन्ध्?द्यैर्मनुन्?ऽमुन्? | वै?व्?नरज्?तवेदपदे प?च्?दिह्?वह || लोहित्?क्?अपदस्य्?ऽन्ते सर्वकर्म्??इ स्?धय | वह्निज्?य्?वधि? प्रोक्तो मन्त्र? प्?वकवल्लभ? || कुल्?र्?अवे ? ब्रह्म्??अ? दक्?इ?एऽभ्यर्च्य घ्?तस्थ्?ल्?? प्रप्?जयेत् | ?ज्यस्थ्?ल्?? सम्?न्?य क्??लयेदस्त्रमन्त्रत? || कु????ग्?र्?म्समुत्तोल्य न्यसेत् तत्र्?ऽस्त्रमन्त्रत? | तस्य्?म्?ज्य? विनिक्?इप्य ज्?न्?य्?त् तपन? हि तत् || ??रद्?य्?म् ? तस्य्?म्?ज्य? विनिक्?इप्य स?स्क्?त? व्?क्?अ??दिभि? | निरुह्य व्?यव्यऽ?ग्?र्?न् ह्?द्? ते?उ निवे?अयेत् | इद? त्?पनमुद्दि??अ? दे?इकैस्तन्त्रवेदिभि? || अर्?अवे ? प्रज्व्?ल्य कु?अगुच्छन्तु ?ज्ये क्?इप्त्व्?ऽनले क्?इपेत् | अभिद्योतनमित्युक्त? सर्वत्र सर्वकर्मसु || ??रद्?य्?म् ?
SKद्?प्तेन दर्भयुग्मेन भ्?र्?ज्य्?ज्य? स वर्म?? | अग्नौ विसर्जयेद् र्दर्भमभिद्योतनम्?रितम् || पुन? क्???न् समुज्व्?ल्य निक्?इपेद्?ज्यमध्यत? | म्?लमन्त्रे?अ मतिम्?न्?ज्यस?स्क्?र ?रित? || सन्द्?प्य दर्भयुगलम्?ज्ये क्?इप्त्व्?ऽनले क्?इपेत् | गुरुर्ह्?दयमन्त्रे?अ पवित्र्?कर?अ? त्विदम् || अभिमन्त्र्य च म्?लेन रक्?अयेदस्त्रमुच्चरन् | प्रदर्?य धेनुयोन्? च तद्?ज्यमम्?त्?त्मकम् || होमविधि? प्र्?दे?अम्?त्र? सग्रन्थिदर्भयुग्म? ध्?त्?न्तरे | निक्?इप्य भ्?गौ द्वौ क्?त्व्? पक्?औ ?उक्लेतरौ स्मरेत् || व्?मे न्???मि??? भ्?गे दक्?इ?ए पि?गल्?? पुन? | सु?उम्न्?? मध्यतो ध्य्?त्व्? कुर्य्?द्धोम? यथ्?विधि || स्रुक् स्रुवौ च सम्?द्?य विधिन्? निर्मितौ गुरु? | प?च्?द्?द्?य प्??इभ्य्?? स्रुक्स्रुवौ त्?वधोमुखौ || त्रि?अ? प्रत्?पयेद्वह्नौ दर्भ्?न्?द्?य दे?इक? | तदग्रमध्यम्?ल्?नि ?ओधयेत् तैर्यथ्?क्रमम् || ग्?ह्?त्व्? व्?महस्तेन प्रोक्?अयेद्दक्?इ?एन तौ | पुन? प्रत्?प्य तौ मन्त्र्? दर्भ्?नग्नौ विनिक्?इपेत् || स्रुवम्?द्?य मतिम्?न् ध्?रयेत् तु त्रिभ्?गत? | वेद्??गुल? परित्यज्य ध्?रयेच्छ?खमुद्रय्? || ??रद्?य्?म् ? स्रुवे?अ दक्?इ??द्भ्?ग्?द्?द्?य्?ज्य? ह्?द्? गुरु? | जुहुय्?दग्नये स्व्?हेत्यग्नेर्दक्?इ?अलोचने || व्?मतस्तद्व्?द्?द्?य व्?मे वह्निविलोचने | जुहुय्?दथ सोम्?य स्व्?हेति ह्?दय्??उन्? || मध्य्?द्?ज्य? सम्?द्?य वह्नेर्भ्?लविलोचने | जुहुयद्?ग्न्??ओम्?भ्य्?? स्व्?हेति मनुन्? गुरु? || ह्?न्मन्त्रे?अ स्रुवेन्?ज्य? भ्?ग्?द्?द्?य दक्?इ??त् | जुहुय्?दग्नये स्वि??अक्?ते स्व्?हेति तन्मुखे || इत्यग्नेर्नेत्रवक्त्र्???? कुर्य्?च्चोद्घ्??अन? गुरु? | सत्?र्?भिर्व्य्?ह्?तिभिर्?ज्येन जुहुय्?त् पुन? | वैस्व्?नरे?अ मन्त्रे?अ त्रिव्?र? जुहुय्?द् गुरु? || समय्?तन्त्रे- एकैक्?गुतिभि? कुर्य्?द् गर्भ्?ध्?न्?दिक्?? क्रिय्?? | क्रमे?अ देवदेवे?इ ! स्व्?ह्?न्तम्?लविद्यय्? || गर्भ्?ध्?न? पु?सवन? स्?मन्तोन्नयन? तथ्? | ज्?तकर्म न्?मक्?तिर्?पनि?क्रम?अ? तथ्? || च्??ओपनयन? भ्?यो वेद्?ध्ययनमेव च | गोद्?न? च विव्?ह?च स?स्क्?र्?? ?उभकर्म?इ ||
SKतत?च पितरौ वह्नै? सम्प्?ज्य ह्?दय? नयेत् | वह्निमन्त्रे?अ विधिवत् कुर्य्?द्?हुतिप�चकम् || जुहुय्?त् समिध? प�च म्?ल्?ग्रघ्?तस?प्लुत्?? | गुरुर्ह्?दयमन्त्रे?अ विधिवत् स्व्?हय्? विन्? || ??रद्?य्?म् ? मन्त्रैर्जिह्व्??गम्?र्त्?न्?? क्रम्?द् वह्नेर्यथ्?विधि | प्रत्येक? जुहुय्?देक्?म्?हुति? मन्त्रवित्तम? || अवद्?य स्रुवे??ज्य? चतु? स्रुचि पिध्?य त्?म् | स्रुवे?अ ति??हन्नेव्?ऽग्नौ दे?इको यतम्?नस? | जुहुय्?द्वह्निमन्त्रे?अ वौ?अ?अन्तेन सम्पदे || म्?धव्?यस?हित्?य्?म्- पल्??अस्य्?पर्? व्?पि यज्�?य्? द्व्?द???गुल्?? | अवक्र्??च स्वय? ?उ?क्?? सत्वचो निर्व्र??? सम्?? || द???गुल्? व्? विहित्?? कनि??ह्??गुलिसम्मित्?? | प्र्?दे?अम्?त्तस्य्?ऽल्?भे होतव्य्?? सकल्? अपि || गौतम्?ये- मह्?ग?ए?अमन्त्रे?अ हुनेदेक्?द??हुत्?? | स्?म्?न्य? सर्वदेव्?न्?मेतदग्निमुख? स्म्?तम् || बहुर्?प्?ख्यजिह्व्?य्?म्?ज्य�च परमे?वरि | गन्ध्?दिभि? समभ्यर्च्य जुहुय्?त् ?ओ?अ??गुत्?? | म्?लमन्त्रे?अ विधिवद्वक्त्रैक्?कर?अ? त्विदम् || ??रद्?य्?म्- तत? प्??ह? समभ्यर्य देवत्?य्? हुत्??अने | अर्चयेदग्निर्?प्?? त्?? देवत्?मि??अद्?यिन्?म् || तन्मुखे जुहुय्?न्मन्त्र्? प�चवि??अतिस?ख्यय्? | ?ज्येन म्?लमन्त्रे?अ वक्त्रैक्?कर?अ? त्विदम् || वह्निदेवतयोरैक्यम्?त्मन्? सह भ्?वयन् | म्?लमन्त्रे?अ जुहुय्?द्?ज्येनैक्?द??हुत्?? || न्???सन्ध्?नमुद्दि??अमेतद्?गमवेदिभि? | अ?ग्?दिपरिव्?र्???मेकैक्?म्?हुति? हुनेत् || पुनर्व्य्?ह्?तिभिर्हुत्व्? होम? क्?त्व्? यथ्?विधि | तिलेन्?ज्येन जुहुय्?त् सहस्र्?दि यथ्?विधि || अनुक्ते तु हविर्द्रव्ये तिल्?ज्य? हविरुच्यते | अल्प? तु जुहुय्?द्वह्ने? प??इत? सर्वकर्मसु | तथ्? सम्प्?तयेद्भ्?गे?व्?ज्यस्य्?न्व्?हुति? क्रम्?त् || वि?ए?अम्?ह तन्त्र्?न्तरे- अग्नौ स्व्?हेति तद्भ्?गे ?ए?अमग्नौ विनि?क्?इपेत् | ओ? भ्?रग्नये प्?थिव्यै महते च स्व्?ह्? | ओ? भुवो व्?यवे अन्तर्?क्??य च दिवे महते च स्व्?ह्? | ओ? स्व?चन्द्रमसे नक्?अत्रेभ्यो दिग्भ्यो महते च स्व्?ह्? | ओ? भ्?र्भुव?स्व?चन्द्रमसे नक्?अत्रेभ्यो दिग्भ्यो महते च स्व्?ह्? |
SKस्रुव�चैव सम्?द्?य घ्?तेन्?प्?र्यते पुन? | होमद्रव्य्??इ निक्?इप्य न्?भौ स?स्थ्?प्यते पुन? || अग्नेर्न्?मक्?ति? क्?त्व्? दद्य्?त् प्?र्??हुति? प्रिये | ब्रह्म्?र्प?एन न मनुन्? दद्य्?त् प्?र्??हुति? पुन? | योजयेद् ह्?दये ध्?म्नि स्वे??अ? स्?धकसत्तम? || अग्निमुखनिर्?प?अम् ??रद्?य्?म् ? यत? क्???ह? तत? ?रोत्र? यतौ ध्?मोऽत्र न्?सिक्? | यत्र्?ल्पज्वलन? नेत्र? यतो भस्म तत? ?इर? | यत्र प्रज्वलितो वह्निस्तन्मुख? ज्?तवेदस? || ?रोत्र्?दि?उ होमफलम् फलम्?ह ??रद्?य्?म् ? वधिरत्व? कर्?अहोमे नेत्र क्?अतमव्?प्नुय्?त् | न्?सिक्?य्?? मन?प्??? ?इवोहोमो हि ??लद? | मुखे सिन्द्?रव्?ल्?र्क वह्नेर्होम? ?उभ्?वह? || भेर्?व्?रिदहस्त्?न्द्रध्वनिर्वह्ने? ?उभप्रद? || चन्द्रचन्दनकुन्द्?भो ध्?म? सर्व्?र्थसिद्धिद? | खरव्?यसवच्छब्दो वह्नि? सर्वविन्??अक्?त् || क्???अ? क्???अगतेर्वर्?औ यजम्?न? विन्??अयेत् | न्?गचम्पकपुन्न्?गप्??अल्?य्?थिक्?निभ? || पद्मेन्द्?वरकह्ल्?रसर्पिर्गुग्गुलसन्निभ? | प्?वकस्य ?उभो गन्ध इत्युक्तस्तन्त्रवेदिभि? || प्?तिगन्धो हुतभुजो होतुर्दु?खप्रदो भवेत् | एव? विधे?उ दो?ए?उ प्र्?य?चित्त्?य दे?इक? | म्?लेन्?ज्येन जुहुय्?त् प�चवि??अतिक्?हुत्?? || इति होमविधिनिर्?अय? | सर्वम?गल्?दिन्?म्?र्थ? सर्वम?गल्?दिन्?म्न्?? योग्?र्थ्?न्?ह ? म?गल्?ऽर्हसि सर्वे??? तेन त्व? सर्वम?गल्? | वरद्?ऽसि च मर्त्य्?न्?? वरद्? तेन क्?र्त्यसे || अ?ए?अ? जयसे दुर्ग? दुर्ग्? तेन निगद्यसे | भक्त्?न्?? ?अ? करोस्?ति ?अ?कर्? त्व? तु ग्?यसे || स?स्?र्?र्?अवमग्न्?न्?? सर्वे??? प्र्??इन्?मिह | दुर्गैक्? हि पर? पोतो नर्???? मुक्तये सद्? || स?स्?र्?र्?अवमग्न्?न्?? दुर्गैक्? परम? पदम् | दुर्गैक्? देवत्?? सर्व्? दुर्गैक्? कर्म वैदिकम् || दुर्गैक्? परम? ज्�?न? दुर्गैक्? परम? बलम् | न त्वय्? रहित? कि�चिद् भ्?त? स्थ्?वरज?गमम् || दुर्गैक्? परम्? देव्? दुर्गैक्? परम? पदम् | दुर्गैक्? परम? ज्�?न? दुर्गैक्? ज्�?नमेव च ||
SKदुर्गैक्? परम? सत्य? दुर्गैक्? परम्? गति? | दुर्गैक्? परम? दैव? दुर्गैक्? परमौ?अधम् || दुर्गैक्? सुखमत्यन्त? दुर्गैक्? निर्व्?ति? पर्? | दुर्गैक्? परम्? तु??इ दुर्गैक्? परम? य?अ? || दुर्गैक्? परम? तत्व? दुर्ग्?भिन्नमिद? जगत् | प्र्??अप्रय्??अप्?थेय? स?स्?रव्य्?धिभे?अजम् | दुर्ग्?र्?अवपरित्र्??अ? दुर्ग्?न्?म्?क्?अरद्वयम् || इति ?र्?परिव्र्?चक्?च्?र्य परमह?सत्?र्थ्?वध्?त?र्?मद्ब्रह्म्?नन्दगिरिक्?त्?य्?? ??क्त्?नन्दतर?गि?य्?? होम्?दिनिर्?अयो न्?म्????द?ओल्ल्?स? सम्?प्त? || १८ || सम्?प्तोऽय? ग्रन्थ?