The Wish-fulfilling Tree of Stories Avadānakalpalatā
Aवदानकल्पलता
2 SK Bओधिसत्त्वावदानकल्पलता /
5 SK चित्तं यस्य स्फटिकविमलं नैव गृह्णाति रागं कारुण्यार्द्रे मनसि निखिलाः शोषिता येन दोषाः / अक्रोधेन स्वयमभिहतो येन संसारशत्रुः सर्वज्ञो ऽसौ भवतु भवतां श्रेयसे निश्चलाय // KAव्क्_१.१ //
6 SK सच्छायः स्थिरधर्ममूलवलयः पुण्यालवालस्थितिर् धीविद्याकरुणाम्भसा हि विलसद्विस्तीर्णशाखान्वितः / संतोषोज्ज्वलपल्लवः शुचियशःपुष्पः सदासत्फलः सर्वाशापरिपूरको विजयते श्रीबुद्धकल्पद्रुमः // KAव्क्_१.२ //
7 SK जायते जगदुद्धर्तुं संसारमकराकरात् / मतिर्महानुभावानामत्रानुश्रूयते यथा // KAव्क्_१.३ //
8 SK अस्ति प्रभावती नाम हेमहर्म्यगृहैर्वृता / पुरी प्रभावतीव द्यौर्विमानैः पुण्यकर्मणाम् // KAव्क्_१.४ //
9 SK विद्याधरवती सिद्धगन्धर्वगणसेविता / गां श्रिता शक्रनगरी सुकृतेन सतामिव // KAव्क्_१.५ //
10 SK सेविता सततं सत्यव्रतदानदयामयैः / राजधानीव धर्मस्य पुण्यावसथशालिनी // KAव्क्_१.६ //
11 SK अभूद्भूतिलकस्तस्यां प्रभासो नाम भूपतिः / सप्रभा सादरैर्यस्य कीर्तिरभ्यर्च्यते सुरैः // KAव्क्_१.७ //
12 SK गुणसौरभसंभाराः सर्वासां हरिणीदृशाम् / यद्यशःपुष्पमञ्जर्यो याताः कर्णवतंसताम् // KAव्क्_१.८ //
13 SK उपायज्ञस्य यस्याज्ञां सुवणकुसुमोज्ज्वलाम् / मालामिव महीपाला मौलिचक्रेषु चक्रिरे // KAव्क्_१.९ //
14 SK तं कदाचित्समासीनमभ्येत्य भुवनेश्वरम् / उवाच क्षितिविन्यस्तजानुर्नागवनाधिपः // KAव्क्_१.१० //
15 SK देव दिव्यद्युतिर्दन्ती गृहीतो ऽस्माभिरद्भुतः / त्वत्कीर्तिश्रवणाद्भूमिमैरावण इवागतः // KAव्क्_१.११ //
16 SK द्वारि स्थितो ऽसौ द्विरदस्त्रिदशार्हः प्रदृश्यताम् / भृत्यानां प्रभुनां दृष्टः सफलो हि परिश्रमः // KAव्क्_१.१२ //
17 SK एतदाकर्ण्य नृपतिर्निर्गत्यामात्यसंमतः / ददर्श द्विरदं द्वारि कैलासमिव जङ्गमम् // KAव्क्_१.१३ //
18 SK उद्दामसौरभाहूतैर्भ्रमरैर्गण्डडिण्डिमैः / शृङ्गाराभरणोदारं वसन्तमिव सेवितम् // KAव्क्_१.१४ //
19 SK दन्तपर्यन्तविश्रान्तकरं मीलितलोचनम् / स्मरन्तं विन्ध्यकदलीसल्लकीकाननश्रियः // KAव्क्_१.१५ //
20 SK अगस्त्यशासनाद् यातं भुवि कुञ्जरराजताम् / स्फुरत्सप्तच्छदामोदं विन्ध्याचलमिवोन्नतम् // KAव्क्_१.१६ //
21 SK तं विलोक्य क्षितिपतिर्दन्तस्तम्भविभूषितम् / लक्ष्मीविलासभवनं विस्मयादित्यचिन्तयत् // KAव्क्_१.१७ //
22 SK अहो नवनवोत्कर्षा निर्माणाश्चर्यशालिनाम् / कर्मणामनवच्छिन्ना संसारसर्गसंततिः // KAव्क्_१.१८ //
23 SK अमन्थेन सुधाम्भोधेरनायासेन वासुकेः / अनाकर्षेण शैलस्य केनायं जनितो गजः // KAव्क्_१.१९ //
24 SK अथ हस्तिमहामात्रं संयातं नाम भूपतिः / आदिदेशार्चितादेशं गजो ऽयं दम्यतामिति // KAव्क्_१.२० //
25 SK तदादिश्य महीपाले याते ऽन्तःपुरमन्दिरम् / नागं जग्राह संयातः सर्वशिक्षाभरक्षमम् // KAव्क्_१.२१ //
26 SK स सच्छिष्य इव प्राज्ञः प्राग्जन्माभ्यासयन्त्रितः / नीतस्तेन प्रयत्नेन सर्वशिक्षाविनीतताम् // KAव्क्_१.२२ //
27 SK बहुदाननिरुद्वेगः शक्त्युत्साहयुतः क्षमी / रिपुप्रघातसुगतिः स राज्ञस्तुल्यतां ययौ // KAव्क्_१.२३ //
28 SK दम्यक्रियासमुत्तीर्णं ततस्तं कुञ्जरेश्वरम् / नरेश्वराय संयातः कृतकृत्यो न्यवेदयत् // KAव्क्_१.२४ //
29 SK दृष्ट्वा तमङ्कुशायत्तं निर्विकारबलोदयम् / उत्साहशिखरारूढं मेने राजा जयश्रियम् // KAव्क्_१.२५ //
30 SK स संजातप्रहर्षोत्थदाक्ष्यशिक्षादिदृक्षया / तमारुरोह सोत्साहः सहस्रांशुरिवोदयम् // KAव्क्_१.२६ //
31 SK संयातो ऽथ गजेन्द्रस्य मन्त्रीव वशवर्तिनः / सर्वमण्डलसंचारचातुर्थं समदर्शयत् // KAव्क्_१.२७ //
32 SK गजप्रेक्षाप्रसङ्गेन मृगयाकेलिलालसः / राजा निजोत्साहमिव व्यगाहत वनं महत् // KAव्क्_१.२८ //
33 SK स ययौ रत्नकेयूरकिरणैर्दूरसर्पीभिः / सल्लकीपल्लववरैर्दिग्नागानाह्वयन्निव // KAव्क्_१.२९ //
34 SK व्रजन्तं तत्र ददृशुस्तं वने वनदेवताः / प्रहर्षविस्मयाकीर्णकर्णपूरीकृतेक्षणाः // KAव्क्_१.३० //
35 SK शबरीकबरीपाशपुष्पसौरभनिर्भराः / वैन्ध्या वसुंधराधीशं मरुतस्तं सिषेविरे // KAव्क्_१.३१ //
36 SK अथ विन्ध्योपकण्ठेषु स्वच्छन्दसुखशाखिषु / स्मृत्वा विलासवृत्तान्तं गजः सोत्कण्ठतां ययौ // KAव्क्_१.३२ //
37 SK करिण्याः प्रेमबद्धाया गन्धमाघ्राय स द्विपः / नीतिं नृप इवोत्सिक्तस्तत्याजाङ्कुशयन्त्रणाम् // KAव्क्_१.३३ //
38 SK सवेगं धावतस्तस्य रागाकृष्टस्य दण्डिनः / विमूढस्येव संसारे नाभवद्विरतिः क्कचित् // KAव्क्_१.३४ //
39 SK दृष्ट्वा प्रभञ्जनजवं कुञ्जरं राजकुञ्जरः / व्रजन्तं जातसंदेहः संयातमिदमब्रवीत् // KAव्क्_१.३५ //
40 SK अहो बतायं भवता विनयं ग्राहितो गजः / दृष्टः प्रयातो वैमुख्यं गुरोरस्याङ्कुशस्य यः // KAव्क्_१.३६ //
41 SK भ्रमतीव दिशां चक्रमनुयान्तीव पादपाः / पादन्यासभरेणास्य क्षीबेणाधूर्णते क्षितिः // KAव्क्_१.३७ //
42 SK अस्मिन् देव इवाकाले प्रयाते प्रतिकूलताम् / सर्वाः पुरुषकारस्य निष्फला यत्नवृत्तयः // KAव्क्_१.३८ //
43 SK वचः श्रुत्वेति संयातः प्रभोरायातसाध्वसः / शिक्षापवादवैलक्ष्यादुवाच रचिताञ्जलिः // KAव्क्_१.३९ //
44 SK देव सर्वक्रियायत्तः कुञ्जरो ऽयं मया कृतः / करिणीगन्धमाघ्राय यातः किं त्वद्य विक्रियाम् // KAव्क्_१.४० //
45 SK नोपदेशं न नियमं न दाक्षिण्यं न साधुताम् / स्मरन्ति जन्तवः कामं कामस्य वशमागताः // KAव्क्_१.४१ //
46 SK केन रतिरसोत्सिक्ता विषयाभिमुखी मतिः / अदभ्रश्वभ्रविभ्रष्टशओलकुल्येव वार्यते // KAव्क्_१.४२ //
47 SK शरीरश्रमशिक्षायां दमकाः कुशला वयम् / मनोनियमशिक्षायां मुनयो ऽपि न पण्डिताः // KAव्क्_१.४३ //
48 SK रागादगणितायासः स्खलिताखिलसंयमः / एष धावत्यमारेण मूर्खः खल इव द्विपः // KAव्क्_१.४४ //
49 SK वृक्षशाखां समालम्ब्य त्यजेमं पृथिवीपते / व्यसनी पतितः सत्यं पातयत्येव दुर्जनः // KAव्क्_१.४५ //
50 SK संयातस्य वचः श्रुत्वा तत्कालसदृशं नृपः / तेनैव सहितः शाखामाललम्बे महातरोः // KAव्क्_१.४६ //
51 SK अवतीर्य तरोरश्वमारुह्य नृपतौ गते / प्राप्यालिलिङ्ग करिणीं विगाह्य गहनं गजः // KAव्क्_१.४७ //
52 SK ततः शान्तस्मरो हस्ती दिनैरभ्येत्य सप्तभिः / स्वयमालानसंबद्धस्तस्थौ भुक्त्वा यथासुखम् // KAव्क्_१.४८ //
53 SK शिक्षासंयमयन्त्रितं तं दृष्ट्वा स्वयमागतम् / संयातः कौशलोत्कर्षहर्षाद्राज्ञे न्यवेदयत् // KAव्क्_१.४९ //
54 SK रागवागुरयाकृष्टः प्रययौ यः स्मरातुरः / शिक्षायामविसंवादी सो ऽयं प्राप्तः स्वयं गजः // KAव्क्_१.५० //
55 SK संकेतयन्त्रितो वश्यो रसज्ञः सल्लकीभुवाम् / संतप्तलोहकवलं गृह्णाति विनये स्थितः // KAव्क्_१.५१ //
56 SK एष कामरसाकृष्टः कष्टां विकृतिमाययौ / पुनः प्रकृतिमापन्नः प्रशान्तमदनज्वरः // KAव्क्_१.५२ //
57 SK शक्या दमयितुं देव सिंहव्याघ्रगजादयः / न तु रागासवक्षीबविषयाभिमुखं मनः // KAव्क्_१.५३ //
58 SK एतदाकर्ण्य भूपालस्तत्तथेति विचिन्तयन् / उवाच सत्यमुचितं संयात कथितं त्वया // KAव्क्_१.५४ //
59 SK अप्यस्ति कश्चिल्लोके ऽस्मिन् येन चित्तमदद्विपः / नीतः प्रशमशीलेन संयमालानलीनताम् // KAव्क्_१.५५ //
60 SK इत्युक्ते दे वताविष्टः संयातस्तमभाषत / देव सन्ति जगत्क्लेशनिःशेषोन्मूलनोद्यताः // KAव्क्_१.५६ //
61 SK विवेकालोकिता लोके वैराग्यजनिताग्रहाः / शमसंतोषविशदा बुद्धा एव प्रबोधिनः // KAव्क्_१.५७ //
62 SK इति बुद्धाभिधां श्रुत्वा सम्यक्संबोधिचेतसः / राज्ञः प्राग्जन्मजाभ्यासप्रणिधानमजायत // KAव्क्_१.५८ //
63 SK विनिमज्जज्जगदिदं संसारे मकराकरे / संतारयेयं संबोधिमुक्तः कुशलसेतुना // KAव्क्_१.५९ //
64 SK अथोचुर्देवता व्योन्मस्तं शुद्धावासकायिकाः / सम्यक्संबोधिसंबुद्धो भविष्यसि महामते // KAव्क्_१.६० //
65 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा विरजसां वरः / जातिस्मरो दिव्यचक्षुः प्रययौ बोधिसत्त्वताम् // KAव्क्_१.६१ //
66 SK अथ स विपुलसत्त्वस्तत्त्वनिक्षिप्तचक्षुर् भवजलनिधिमज्जत्सर्वभूतानुकम्पी / अभवदभिनवोद्यत्संवुदित्साहयोगाद् दलितकुशलसेतुः सत्त्वसंतारणाय // KAव्क्_१.६२ //
67 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां प्रभासावदानं नाम प्रथमः पल्लवः समाप्तः //
69 SK ते जयन्ति जगत्यस्जिन् पुण्यचन्दनपादपाः / छेदनिर्घर्षदाहे ऽपि ये परार्थेषु निर्व्यथाः // KAव्क्_२.१ //
70 SK गणनीया गुणगणैरस्त्यरिष्टाभिधा पुरी / स्पर्धया शक्रनगरी यस्या न स्याद्गरीयसी // KAव्क्_२.२ //
71 SK तस्यां बभूव भूपालः श्रीसेन इति विश्रुतः / समग्रगुणरत्नानां रत्नाकर इवाकरः // KAव्क्_२.३ //
72 SK परोपकारशक्तस्य चतुरस्य प्रभावतः / अनुरक्ता दिशः सर्वाः सूर्यस्येव प्रभावतः // KAव्क्_२.४ //
73 SK यशोभि शोभितं येन धनदानसुगन्धिभिः / गजैश्च भूतिधवलैर्जगत्कल्पद्रुमैरिव // KAव्क्_२.५ //
74 SK कलालयो ऽपि सरलः सरलो ऽपि महामतिः / यो बभूव प्रजापुण्यैर्मतिमानप्यवञ्चकः // KAव्क्_२.६ //
75 SK यावत्तपति तिग्मांशुर्यावद्वहति मारुतः / तावदाज्ञा च कीर्तिश्च यस्याप्रतिहताभवत् // KAव्क्_२.७ //
76 SK शमव्यायामविदुषां षस्ङ्गुणज्ञानचक्षुषाम् / यं द्वादशसहस्राणि मन्त्रिणां पर्युपासते // KAव्क्_२.८ //
77 SK तस्मिन्धर्मपरे राज्ञि बभूव सुकृती जनः / भर्तृतुल्या भवन्त्येव गुणैः स्त्रिय इव प्रजाः // KAव्क्_२.९ //
78 SK तस्य पुण्याधिवासेन जनास्त्रिदिवगामिनह् / विमानैः शक्रनगरीं निःसंचाराः प्रवक्रिरे // KAव्क्_२.१० //
79 SK दृष्ट्वा मनुजलोकेन सुरलोकसमावृतिम् / जातवैरः क्षितिओपतौ शतक्रतुरचिन्तयत् // KAव्क्_२.११ //
80 SK सेनेव लक्ष्मी वसुधेषु चारस्याश्चर्यकर्तव्य च दत्तनित्यम् / कल्याणशीलेन च स र्वचेतन्यप्रव्यहासामन अस्मकाश्च (?) // KAव्क्_२.१२ //
81 SK तस्याखण्डितचेतसः दद्धिद्वल्यानुभावपाम् (?) / कर्तव्या धैर्याजिज्ञासा मया मायाविधायिना // KAव्क्_२.१३ //
82 SK इति संचिन्त्य सुचिरं सर्वैरनुगतः सुरैः / रूपं शक्रः परावर्त्य मर्त्यलोकमवातरत् // KAव्क्_२.१४ //
83 SK अत्रान्तरे प्रजाकार्यपर्यालोचनतत्परः / राज्यरक्षागुरुर्मन्त्री नृपमूचे महामतिः // KAव्क्_२.१५ //
84 SK राजन् विरजसा राज्यराजमानेन निर्जितः / निर्व्याजदानैर्भवता लज्जते त्रिदशेश्वरः // KAव्क्_२.१६ //
85 SK परस्य पूर्णगुणतामात्मनस्तद्विहीनताम् / दृष्ट्वा को नाम नायाति मात्सर्यस्य विधेयताम् // KAव्क्_२.१७ //
86 SK ईर्ष्यालवः परोत्कर्षसंघर्षस्य जुषो जनाः / प्रायेणोद्वेगमायान्ति महताम् सुकृतेष्वपि // KAव्क्_२.१८ //
87 SK सर्वस्वदानमर्यादादानव्यसनिनो ऽस्तु ते / पुत्रदारात्मदाने तु संकल्पो ह्यतिसाहसः // KAव्क्_२.१९ //
88 SK दृश्यन्ते दारुणास्ते ते स्वप्नाः साध्वसहेतवः / जगतः सूच्यते तीव्रं यैश्चूडामणिखण्डनम् // KAव्क्_२.२० //
89 SK दैवज्ञानां प्रवादश्च श्रूयते तत्त्ववादिनाम् / शरीरं पृथिवीपालो दास्यतीति सुदुःसहः // KAव्क्_२.२१ //
90 SK शरीरदानं सर्वार्थिसार्थनैष्फल्यकारणम् / सर्वप्रदो भवत्येव तिष्ठन् कल्पमहीरुहः // KAव्क्_२.२२ //
91 SK तस्मादस्मान्महीपाल विरम त्यागसाहसात् / रक्षारत्नं हि जगतः प्रजायत्तं वपुस्तव // KAव्क्_२.२३ //
92 SK इति मन्त्रिरेणोक्तमाकर्ण्य वसुधाधिपः / तमूचे सत्त्वधवलस्मितघौताधरद्युतिः // KAव्क्_२.२४ //
93 SK उक्तं हितं म्हामात्य भवता सचिवोचितम् / किं त्वर्थिनवैमुख्यसंतापं नाहमुत्सहे // KAव्क्_२.२५ //
94 SK देहीति वादिषु गिरो निषेधपरुषाक्षराः / स्फुरन्ति वदने येषां सजीवास्ते गतासवः // KAव्क्_२.२६ //
95 SK इदमस्मादवाप्स्यामीत्याधाय हृदि याचकः / प्राप्यः प्रयाति वैमुख्यं यस्मिन् किं तेन जीवता // KAव्क्_२.२७ //
96 SK धिग्जन्म पुण्यहीनस्य तस्य निष्करुणात्मनः / यस्यार्तजनसंतापश्रवणे शीतलं मनः // KAव्क्_२.२८ //
97 SK एतदर्थमयं कायः सापायो ऽपि सतां प्रियः / यत्कस्यचित् क्कचिद् याति कदाचिदुपकारिताम् // KAव्क्_२.२९ //
98 SK श्रुत्वेति नृपतेर्वाक्यममात्यः सत्त्वशालिनः / नोवाच किंचिदचलां विचिन्त्य भवितस्यताम् // KAव्क्_२.३० //
99 SK ततः कदाचिद्भूभर्तुस्तस्य लीलाविहारिणः / जायां जयप्रभां नाम रतिं रतिपतेरिव // KAव्क्_२.३१ //
100 SK दूराद् यदृच्छयायातां चित्तसासङ्गवागुराम् / मुनिरध्यापकः कान्ताम् ददर्श विनिमेषदृक् // KAव्क्_२.३२ //
101 SK प्राग्जन्माभ्याससंबन्धस्नेहात्परिचितामिव / तां दृष्ट्वा स धृतेः प्राप धैर्यराशिरनीशताम् // KAव्क्_२.३३ //
102 SK तस्य वीतस्पृहस्यापि वासनोल्लसितं मनः / उत्सृज्य भववैमुख्यमभिलाषभुवं ययौ // KAव्क्_२.३४ //
103 SK इयं हि सततस्यूता संततप्रीतितन्तुभिः / नापैति सर्वजन्तूनां प्राग्जन्माभ्यासवासना // KAव्क्_२.३५ //
104 SK तदाश्रमपदं प्राप्तः समाप्ताध्ययनव्रतः / शिष्यो माणवकः प्राह दक्षिणा गृह्यतामिति // KAव्क्_२.३६ //
105 SK स तमूचे न मे वत्स वने वृत्तिः प्रयोजनम् / तथापि यदि निर्बन्धः श्रूयतां यदभीप्सितम् // KAव्क्_२.३७ //
106 SK श्रीसेनस्य क्षितिपतेयदि देवी जयप्रभा / लभ्यते भवता दातुं तदसौ मम दक्षिणा // KAव्क्_२.३८ //
107 SK इत्युक्तं गुरुणा श्रुत्वा शिष्यः कम्पितमानसः / अशक्यप्रार्थनालाभे संशयाकुलितो ऽभवत् // KAव्क्_२.३९ //
108 SK स गत्वा सततस्वेच्छाविवृतद्वारमर्थिनाम् / विवेश स्वैरविश्रम्भभवनं भूभृतां प्रभोः // KAव्क्_२.४० //
109 SK अलभ्यार्थार्थनादैन्यचिन्तातिक्लिष्टमानसः / नम्राननो ऽतिवैलक्ष्याद् वीक्षमाण इव क्षितिम् // KAव्क्_२.४१ //
110 SK तं दृष्ट्वार्थिनमायातं प्रहृष्टो ऽभून्महीपतिः / सुधाप्रदानसन्नद्धसमुद्भूतिरिवाम्बुधिः // KAव्क्_२.४२ //
111 SK किं तवेप्सितमित्युक्त्वा पूजितः स महीभुजा / उवाचानुचिताख्यानवैलज्जस्खलिताक्षरः // KAव्क्_२.४३ //
112 SK अनर्थितपरः पूर्वमर्थिकल्पतरोस्तव / गर्वर्थमर्थितां यातः सुदुर्लभपदे ऽप्यहम् // KAव्क्_२.४४ //
113 SK मम विद्याव्रते पूर्णे दक्षिणाभिमता गुरोः / राजन् जयप्रभा देवी दीयता यदि शक्यते // KAव्क्_२.४५ //
114 SK इत्युक्रे मुनिशिष्येण सहसैव महीपतेः / स्नेहदानसाविद्धं द्विधाभूतमभून्मनः // KAव्क्_२.४६ //
115 SK स जगाद् विजं दन्तज्योतिषाग्रविसारिणा / गृह्यतां दयिता स्वच्छवाससाच्छादयन्निव // KAव्क्_२.४७ //
116 SK अविचार्य मया देयमीप्सितं तव यद्गुरोः / वियोगचकितं चेतः सत्यं न गणयाम्यहम् // KAव्क्_२.४८ //
117 SK इत्युक्त्वाहूय दयिताम् राजा राजीवलोचनाम् / सदा हृदयसंसक्ताम् जीववृत्तिमिवापराम् // KAव्क्_२.४९ //
118 SK निवारितो ऽपि गुरुणा वियोगव्यसनाग्निना / निषिद्धो ऽप्यतिवृद्धेन स्नेहेन स्मरबन्धुना // KAव्क्_२.५० //
119 SK प्रददौ मुनिशिष्याय सहसा हरिणीमिव / किमेतदिति सायाससंत्रासतरलेक्षणाम् // KAव्क्_२.५१ //
120 SK दत्तायां त्यागशीलेन प्रियायां पृथिवीभुजा / चकम्पे त्यागभीतेव भूमिर्लोलाब्धिमेखला // KAव्क्_२.५२ //
121 SK यत्कृते दुर्दशां देहे सेहिरे दुःसहामपि / इन्द्रचन्द्रादयो देवास्ताह् प्रियाः कस्य न प्रियाः // KAव्क्_२.५३ //
122 SK शीलं केचिद्धनं केचिद्धर्मं केचित्तपः परे / लज्जां केचित्तनुं केचित्त्यजन्ति योषितां कृते // KAव्क्_२.५४ //
123 SK यदेव रागसर्वस्वं पुंसां जीवितजीवितम् / तदेव स्फीटसत्त्वानाम् दाने तृणलवायते // KAव्क्_२.५५ //
124 SK तामादाय गते तस्मिन् विरहाकुलितो नृपः / विरहेण सुखद्वेषी मनोभव इवाभवत् // KAव्क्_२.५६ //
125 SK शिष्येण मुनिरानीताम् दृष्ट्वा भूपतिवल्लभाम् / रहितां जीवितेनेव परलोकभुवं गताम् // KAव्क्_२.५७ //
126 SK गाढानुशयसंतप्तः परं लज्जानिमीलितः / अचिन्तयदनौचित्यमात्मनः कर्मवुप्लवात् // KAव्क्_२.५८ //
127 SK अहो नु बालकेनेव मया केवलचापलात् / निःशन्कमयशःपङ्के स्वयमात्मा निपतितः // KAव्क्_२.५९ //
128 SK इयं प्रजानां जननी भर्म्याणां धर्मकारिणा / वर्णाश्रमगुरोर्जायाम् मया दुःखानले ऽर्पिता // KAव्क्_२.६० //
129 SK किं तु नाकलितं शीलं न स्मृतः संयमो मया / गणितं नैव वैराग्यं विवेको नावलोकितः // KAव्क्_२.६१ //
130 SK अहो ऽत्र निर्विचाराणां सन्मार्गविमुखं मनः / असंयमासवक्षीबमपथेष्वेव धावति // KAव्क्_२.६२ //
131 SK इति संचित्य स मुनिर्वैलक्ष्यक्षपितद्युतिः / अभ्येत्य राजदयितामुवाच विनताननः // KAव्क्_२.६३ //
132 SK समाश्वसिहि हे मातर्न शोकं कर्तुकर्हसि / भवितव्यतयैवायं क्लेशस्ते दुर्नयश्च मे // KAव्क्_२.६४ //
133 SK त्यक्त्वा हि श्रमसंतापमस्य तीरतरोरधः / अधुनैव निजं धाम सहास्माभिर्गमिष्यसि // KAव्क्_२.६५ //
134 SK इत्युक्ते मुनिना देवी सीक्तेवामृतवृष्टिभिः / अवाप्तजीवितधृतिस्तत्याज भयसंभ्रमम् // KAव्क्_२.६६ //
135 SK श्रुत्वैतत् त्रिदिवव्यापि दातुश्चरितमद्भुतम् / राज्ञः सत्त्वदयाम् ज्ञातुं वासवः समुपाययौ // KAव्क्_२.६७ //
136 SK भक्षिताधःशरीरार्धो व्याघ्रेण विजने वने / पुत्रैश्चतुर्भिराक्रन्दैर्गृहीतो ब्राःमणाकृतिः // KAव्क्_२.६८ //
137 SK प्रस्रवद्भूरिरूधिरो लम्बमानान्त्रमण्डलह् / कृच्छेष्वपगतप्राणः पापैरिव दृढीकृतः // KAव्क्_२.६९ //
138 SK प्रत्यग्रामिष्यागन्धेन क्रव्यादैर्भृशमन्वितः / लुब्धपार्थिवचौरोत्थैरनर्थैरर्थवानिव // KAव्क्_२.७० //
139 SK नगरान्तरमासाद्य स ययौ पुरवासिनाम् / कारुण्यदैन्यदुःखार्तो स्मयाविस्मयहेतुताम् // KAव्क्_२.७१ //
140 SK स शोक इव साकारः स त्रास इव दुःसहः / विदधे साध्वसायासं सहसा पौरयोषिताम् // KAव्क्_२.७२ //
141 SK सो ऽर्थिसंदर्शनस्थानस्थितस्याथ महीपतेः / पुत्ररूपैश्चतुर्भिस्तैर्न्यस्तो ऽग्रे मञ्चिकार्पितह् // KAव्क्_२.७३ //
142 SK तं दृष्ट्वा वैशसावेशविषमक्लेशविह्वलम् / निष्कूणिताननवनो जनो ऽभून्मीलितेक्षणह् // KAव्क्_२.७४ //
143 SK स कम्पविह्वलं वक्षो मुक्तमुद्यम्य दक्षिणम् / भुजं जगाद भूपालं व्यथाशिथिलिताक्षरः // KAव्क्_२.७५ //
144 SK स्वस्ति तुभ्यं महीपते ब्राह्मणो ऽहमिमां दशाम् / तीव्रपाप इव प्रातः पश्य मां करुणानिधे // KAव्क्_२.७६ //
145 SK संसारेघोरगहने वने व्याघ्रेण भक्षितः / जीवाम्यवश्यभोग्यत्वाद्दुःखस्यास्य गरीयसः // KAव्क्_२.७७ //
146 SK अस्मिन्नपि विपत्तापे तीव्रक्लेशसहिष्णवः / विमुञ्चन्ति न मां प्राणाः सहृदः सज्जना इव // KAव्क्_२.७८ //
147 SK ददाति यदि ते कश्चित् छित्त्वा देहार्धमात्मनः / तत्ते जीवितमस्तीति मामूचे व्योमदेवता // KAव्क्_२./ ७९ //
148 SK को ददाति जगत्यस्मिन् जीवितं करुणानिधे / प्रायेण स्वसुखान्वेषी परार्थविमुखो जनः // KAव्क्_२.८० //
149 SK सर्वदा सर्वदातारं दीनव्यसनबान्धवम् / देहदाने ऽप्यविमुखं त्वामस्मि शरणं गतः // KAव्क्_२.८१ //
150 SK एकस्त्वमेव लोके ऽस्मिन् जातः सुकृतपादपः / निर्व्याजमादरोदारं दानं यस्य फलोद्गतिः // KAव्क्_२.८२ //
151 SK किमन्यैर्वा वदान्यस्य कीर्तितैर्भवतो गुणैः / दानमेवाहतो यस्य लोके सुकृतडिण्डिमः // KAव्क्_२.८३ //
152 SK आपन्नार्तिपरित्राणपवित्रचरितव्रताः / प्रायन्ते पुण्यपण्येन विपत्काले भवद्विधाः // KAव्क्_२.८४ //
153 SK अमन्दानन्दसुहृदो हरिचन्दनशीतलाः / हरन्ति सन्तः संतापं दक्षिणाः पवना इव // KAव्क्_२.८५ //
154 SK पूर्णेन्दुसुन्दरादस्मादुदिता वदनात्तव / ज्योप्त्स्नेव जीवयत्येव वाणी पीयूषवर्षिणी // KAव्क्_२.८६ //
155 SK इत्युक्तस्तेन सहसा हृदि संक्रान्ततद्व्यथः / संमोहमूर्च्छितं राजा तमूचे वाचमाकुलम् // KAव्क्_२.८७ //
156 SK समाश्वसिहि मुञ्च त्वं बह्यं प्राणवियोगजम् / प्रयच्छामि शरीरार्धमविचार्यैव ते द्विज // KAव्क्_२.८८ //
157 SK धन्यस्य् अयात्ययं कायः परोपकृतये क्षतिम् / क्षणक्षयी हि देहो ऽयं रक्ष्यमाणो ऽपि नाक्षयः // KAव्क्_२.८९ //
158 SK इत्युक्तवति भूपाले समुत्कम्पितमानसः / वज्राहत इवोवाच महामात्यो महामतिः // KAव्क्_२.९० //
159 SK अहो नु साहसाभ्यासादायासव्यसनी प्रभुः / हितं न गणयत्येव प्रजापुण्यपरिक्षयात् // KAव्क्_२.९१ //
160 SK प्रजानां भूतये शक्तः को ऽन्यस्त्वत्सदृशो गुणी / यद्भक्तिमुखरो भृत्यः श्रोता कर्ता च भूपतिः // KAव्क्_२.९२ //
161 SK न करोति हितं स्वामी गजलीलानिमीलितः / गणनीयाः सुभृत्यानामियत्यो भोगसंपदः // KAव्क्_२.९३ //
162 SK भान्ति त् ए सुचिरं कर्णे यैः कृता मधुमञ्जरी / कल्याणकर्णिकाकीर्णा वाणी विनयवादिनाम् // KAव्क्_२.९४ //
163 SK राक्षसो ऽयं पिशाचो च छद्मना ब्राह्मणाकृतिः / रक्षारत्नस्य जगतां शरीरैरर्थिताम् गतह् // KAव्क्_२.९५ //
164 SK यदि नाम न मायेयं कृता तेन महीयसी / तत्कथं कृत्तदेहस्य क्षणमप्यस्ति जीवितम् // KAव्क्_२.९६ //
165 SK अविचार्यैव सुकृतं क्रियते दुर्ग्रहेण यत् / तदात्मपीडाओपरुषं परलोके ऽपि निःसुखम् // KAव्क्_२.९७ //
166 SK शक्यमेव सदा दद्यादशक्यं दीयते कथम् / सर्वस्वदेहदानादिप्रवाद एव शोभनः // KAव्क्_२.९८ //
167 SK कर्णामृतमिदं दूराद्यन्महार्थिमणिप्रदः / संप्राप्तानां पुनस्तत्र पानमस्यान्यतो ऽर्थिनाम् // KAव्क्_२.९९ //
168 SK रक्ष्यः सर्वप्रयत्नेन परेषामपि जीवितैः / प्रजानां जीवितं राजन्नर्थिचिन्तामणिर्भवान् // KAव्क्_२.१०० //
169 SK प्रसीद दयस्वास्मासु देव मा साहसं कृथाः / न् अकाचशकलस्यार्थे क्रियते चात्मविक्रयः // KAव्क्_२.१०१ //
170 SK इत्युक्त्वा पादयोः पत्युः पपातामात्यपुंगवः / शरीरदानसंकल्पान्नोच्चचाल च भूपतिः // KAव्क्_२.१०२ //
171 SK सो ऽवदत् प्रणयस्मेरचिकसद्दशनद्युतिः / जीवितस्नेहसंमोहतमह् परिहरन्निव // KAव्क्_२.१०३ //
172 SK केवलं भक्तिसंयुक्तमुक्तं व्यक्तमिदं त्वया / न सहे ऽहं महामात्य विप्रस्य प्राणसंशयम् // KAव्क्_२.१०४ //
173 SK हारैस्तुषारैः कमलैर्मृणालैरिन्दुचन्दनैः / निवर्तते ऽन्तःसंतापो नार्थिवैमुख्यदुःखजः // KAव्क्_२.१०५ //
174 SK सर्वथा सर्वदुःखार्तिहरणोद्यतचेतसः / न बोधेरन्तरायं मे सुमते कर्तुमर्हसि // KAव्क्_२.१०६ //
175 SK जन्मान्तरे ऽपि ददतो देहं मे न व्यथाभवत् / स्मराम्यतीतवृत्तस्य सम्यक्संबोधिचेतसा // KAव्क्_२.१०७ //
176 SK पुरा दृष्ट्वोद्यताम् व्याघ्रीं क्षुत्क्षामां पोतभक्षणे / तद्रक्षायै मया दत्तं शरीरमविक्षरिणा // KAव्क्_२.१०८ //
177 SK शिबिजन्मनि चान्धाय दत्तं नेत्रयुगं मया / रक्षितश्च स्वदेहेन कपोतः श्येनकाद्भयात् // KAव्क्_२.१०९ //
178 SK चन्द्रप्रभावतारे च रौद्राक्षायार्पितं शिरः / सर्वस्वपुत्रदारादि दत्तं चान्येषु जन्मसु // KAव्क्_२.११० //
179 SK इत्युक्ते बोधिसत्त्वेन् अभूभुजामात्यपुंगवः / न सजीवो न् अनिर्जीव इवाभूद्व्यथितेन्द्रियः // KAव्क्_२.१११ //
180 SK अलङ्घ्यशासनेनाथ राज्ञा क्रकचधारया / नियुक्तौ पलगण्डाख्यौ शरीरच्छेदकर्मणि // KAव्क्_२.११२ //
181 SK तौ तीव्रशोकविवशौ शक्रमायाविमोहितौ / कथंचिदिव भूभर्तुर्देहच्छेदे समुद्यतौ // KAव्क्_२.११३ //
182 SK नृपतेर्निर्विकारस्य क्रूरक्रकचधारया / विदार्यमाणे देहार्धे पृथिवी समकम्पत // KAव्क्_२.११४ //
183 SK भ्रष्टोल्का रक्तवसना विर्घातच्युततारका / द्यौः सशब्दं रुरोदेव कीर्णाश्रुकणसंततिः // KAव्क्_२.११५ //
184 SK वैशसालोकनेद्भूततीव्रदुःखासहिष्णुना / तूर्णं रजःपटेनेव रविणा पिहितं मुखम् // KAव्क्_२.११६ //
185 SK तस्मिन् प्रजाह् प्रजानाथे क्रकचाक्रान्तविग्रहे / चक्रन्दुः पूरिताक्रन्दा दिग्वधूमिः प्रतिस्वनैः // KAव्क्_२.११७ //
186 SK अक्षुब्धसत्त्वमालोक्य नृपं शक्रो द्विहाकृतिः / विस्मयानुशयाक्रान्तचित्तश्चिरमचिन्तयत् // KAव्क्_२.११८ //
187 SK अहो महामतेरस्य करुणाकोमलं मनः / प्राप्तं परार्थपीडासु वज्रादपि कठोरताम् // KAव्क्_२.११९ //
188 SK सागरादपि गम्भीरं मेरोरपि समुन्नतम् / त्रिदिवादपि साश्चर्यमहो वृत्तं महात्मनाम् // KAव्क्_२.१२० //
189 SK अहि प्राणप्रवासे ऽपि सत्त्वं सत्त्वमहोदधेः / साधोरिव विपत्पाते महत्त्वं नावहीयते // KAव्क्_२.१२१ //
190 SK इति चिन्तयति क्षिप्रं सहस्राक्षे क्षितिप्रभोः / नाभेरधःशरीरार्धं निकृत्तमपतत् क्षितौ // KAव्क्_२.१२२ //
191 SK स द्विधाभूतदेहोअपि हर्षोत्साहमयो ऽभवत् / सर्वभूतपरित्राणसत्त्वेन धृतजीवितः // KAव्क्_२.१२३ //
192 SK तदाज्ञया शरीरार्धे श्लेष्टे संपूर्णविग्रहः / स्वस्थक्षतिः समुत्थाय ब्राःमणस्तमभाषत // KAव्क्_२.१२४ //
193 SK अहो विराजसे राजन् पून्जं विरजसस्तव / निर्व्याजदेहदानेन विशेषं तु ब्न्हवद्यशः // KAव्क्_२.१२५ //
194 SK त्वन्मनोमणिवैमल्यतुल्यं किंचिदकुर्वतः / उपमानेन दारिद्य्रमहो मुग्धस्य वेधसः // KAव्क्_२.१२६ //
195 SK कृत्तः सुवृत्तः सरलः परार्थे मधुराशयः / सहसे दुःसहां पीडामिक्षुकाण्ड इवोन्नतः // KAव्क्_२.१२७ //
196 SK इत्युक्त्वा ब्राह्मणाकारः शक्रस्त स्मृतिजन्मभिः / संजीवनैषधिजातैः सुधास्यन्दैरपूरयत् // KAव्क्_२.१२८ //
197 SK ततः प्रकटिताकारः परितोषात्पुरंदरः / सुश्लिष्टनिजदेहार्धं प्रशशंस महीपतिम् // KAव्क्_२.१२९ //
198 SK अथाब्मरान्निपतितः सितकुसुमसंचयः / तत्कालोल्लासितक्षोणीहर्षहास इवाबभौ // KAव्क्_२.१३० //
199 SK अत्रान्तरे मुनिस्तस्मौ प्रियां जायां जयप्रभाम् / आदायाभ्येत्य तद्वृत्तं जाताश्चर्यो न्यवेदयत् // KAव्क्_२.१३१ //
200 SK पूतया संगतः पत्नया स्वकीर्त्येव विशुद्धया / उवाच पृष्टः शक्रेण निकारे निर्विकारितह् // KAव्क्_२.१३२ //
201 SK ततः सिंहासने दिव्यए विश्वकर्मविनिर्मिते / रत्नवर्षसमाकीर्णे जम्बुद्वीपे स भूपतिः // KAव्क्_२.१३३ //
202 SK अभिषिक्तः सुरेन्द्रेण प्रसाद्य दयितासखः / दानपुण्यप्रभावोत्थकुशलव्यापितप्रजः // KAव्क्_२.१३४ //
203 SK समाप्तसत्त्वसंसारसंतारणकृतव्रतह् / सम्यक्संबोधिसंबुद्धमनाः प्रमुदितो ऽभवत् // KAव्क्_२.१३५ //
204 SK मैत्रं चेतस्तरुणकरुणं सत्त्वसिद्धं विशुद्धं आपन्नार्तिप्रशमनफलस्फूईतमात्मप्रदानम् / दृष्ट्वा राज्ञह् प्रमुदसलिलक्षालिताक्षो विलक्षः शक्रः प्रायादमरनगरीं पूरितां तद्यशोभिः // KAव्क्_२.१३६ //
205 SK इति स विबुधवृन्दैः सिद्धयक्षोरगेन्द्रैः पुलकरुचिरवर्चैरर्च्यमानप्रभावः / अवनिमवनशक्तः कल्पयन्नाककल्पामबह्वविभवशोभामाप्तवान् बोधिसत्त्वः // KAव्क्_२.१३७ //
206 SK पूर्वावतारसंवादे दानोत्कर्षमुदाहरन् / उपदेशाय भिक्षूणामित्याह भगवान् जिनह् // KAव्क्_२.१३८ //
207 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां श्रीसेनावदानं नाम द्वितीयः पल्लवः //
209 SK अस्मिन्नद्भुतसर्गे मकराकरजायमानमणीवर्ते / को ऽपि प्रकटितसुगतिः पुरुषमणिर्जायते (भव्यः) // KAव्क्_३.१ //
210 SK अस्ति सौभिप्रभापूरकर्पूरपरिपाण्डुरम् / साकेतं नाम नगरं सौभाग्यतिलकं भुवः // KAव्क्_३.२ //
211 SK सेव्यैः प्रभासत्त्वमयैर्गङ्गाविमलमानसैः / तीर्थैरिव स्थितं यत्र पवित्रः पुण्यकर्तृभिः // KAव्क्_३.३ //
212 SK यशःकुसुमिते यत्र पुण्यसौरभनिर्भरे / रमन्ते सुकृतोद्याने नन्दने पुरवासिनः // KAव्क्_३.४ //
213 SK तत्राभूद् भूपतिर्भुरिगुणरत्नमहोदधिः / भीतुर्यशःशशाङस्य मेहचूड इति श्रुतः // KAव्क्_३.५ //
214 SK सदा सदाश्रयार्हेण कलिकालापहारिणा / कृतः कृतयुगेनेव येन धर्मधरो जनः // KAव्क्_३.६ //
215 SK महीपतिः क्षमाशक्तः श्रीवृतः करुणारतः / वल्लभो ऽभूत् प्रजानां यः प्रख्यातो विजितेन्द्रियः // KAव्क्_३.७ //
216 SK अमरासवसंपूर्णमहिंसासत्रदीक्षितः / ददौ यः सर्वभूतानां पुण्यामभयदक्षिणम् // KAव्क्_३.८ //
217 SK निर्मदो यः प्रभावे ऽपि विभवे ऽपि प्रियंवदः / क्षमाशीलः प्रभुत्वे ऽपि यौवने ऽपि जितेन्द्रियः // KAव्क्_३.९ //
218 SK गम्भीरेणोन्नतिमता शूरेण शशिकान्तिना / सत्पक्षेण क्षितिभृता येनातन्यत विस्मयः // KAव्क्_३.१० //
219 SK राज्ञस्तस्याद्वितीयस्य बभूवाभरणद्वयम् / त्यागपूर्णं च कारुण्यं तारूण्यं सुकृतश्रियः // KAव्क्_३.११ //
220 SK पद्माकरस्य तस्याभूद्देवी कान्तिमती प्रिया / प्रभातश्रीरिव सदा निर्दोषाभ्युदयोत्सवा // KAव्क्_३.१२ //
221 SK नीतिः प्रभुगुणेवेन त्यागेन श्रीरिवोज्ज्वला / रराज राजचन्द्रेण सा शीलेनेव चारुता // KAव्क्_३.१३ //
222 SK सदानन्दनविख्यातयशःप्रसरया तया / मेरूस्त्रिदिवलक्ष्म्येव बभौ भूमिभृतां वरः // KAव्क्_३.१४ //
223 SK काले कल्याणनिलयं भर्तुः सा गर्भमादधे / भूत्यै भुवनपद्मस्य दिवाकरमिवादितिः // KAव्क्_३.१५ //
224 SK अरणिः पावकेनेव वेलेवाब्धेः सुधांशुना / ब्रह्माब्जेनेव गोविन्दनाभिर्गर्भेण सा बभौ // KAव्क्_३.१६ //
225 SK तस्या गर्भानुभावेन दोहदाभिमतं नृपः / ददौ सर्वार्थिसार्थेभ्यो वाञ्छिताभ्यधिकं वसु // KAव्क्_३.१७ //
226 SK पुनर्भूमिभुजा पृष्टा दोहदं शुभगर्भिणी / सरस्वतीव सा चक्रे स्वयं सद्धर्मदेशनाम् // KAव्क्_३.१८ //
227 SK पूर्णपुण्यमणिर्धर्मनिधिर्विधिसमुद्धृतः / वुपद्विपुलदुःखेभ्यः सदा रक्षति रक्षितः // KAव्क्_३.१९ //
228 SK कान्तारदुर्गेषु परिच्युतानां तापातुराणां परलोकमार्गे / स्निग्धः प्रवृद्धः फलपूरिताशः छायातरुर्धर्मसमो ऽस्ति नान्यः // KAव्क्_३.२० //
229 SK आलोकस्तिमिरे विपद्विषमणिः पाते करालम्बनं याच्ञाकल्पतरुर्जगज्जयरथः पाथेयमन्थे पथि / दुःखव्याधिमहौषधं भवभयोद्भान्ताशयाश्वासनं तापे चन्दनकाननं स्थिरसुहृद्धर्मः सतां बान्धवः // KAव्क्_३.२१ //
230 SK इत्यादि धर्मधवलं श्रुत्वा नृपवधूवचः / धर्मैकशरणः श्रीमान् बभूव भुवने जनः // KAव्क्_३.२२ //
231 SK ततः कालेन संपूर्णं द्यौरिवामृतदीधितिम् / असूत दारकं देवी जगत्तिमिरदारकम् // KAव्क्_३.२३ //
232 SK अजायतास्य सहजश्चूडालंकरणं मणिः / प्राग्जन्मान्तरसंसक्तो विवेक इव निर्मलः // KAव्क्_३.२४ //
233 SK स बभौ सुभगस्तस्य मूर्ध्नि पुण्यमयो मणिः / यस्य प्रभाप्रभावेण यामिन्यो दिनताम् ययुः // KAव्क्_३.२५ //
234 SK सोष्णीषस्य मणेस्तस्य पीयूषस्यन्दिबिन्दिवः / नयन्ति हेमताम् लोहं दुरितं शमयन्ति च // KAव्क्_३.२६ //
235 SK शिशोर्जातिस्मरस्याथ वचसा तस्य भूपतिः / ददौ हेम सदार्थिभ्यः सर्वं मणिरसोद्भवम् // KAव्क्_३.२७ //
236 SK पुष्परत्नध्वजच्छत्रपताकाव्यजनांशुकैः / अपूरयन् पुरं व्योन्मस्तस्य जन्मनि देवताः // KAव्क्_३.२८ //
237 SK सुप्रकाशोदिताशेषविद्याविद्योतितात्मनः / मणिचूड इति ख्यातं नाम तस्याकरोन्नृपः // KAव्क्_३.२९ //
238 SK स चकाराशयं हर्षपीयूषोच्छलितं पितुः / अभिजातः सुतो जातः पारिजात इवोदधेः // KAव्क्_३.३० //
239 SK पौलोमीव जयन्तेण जननी पूज्यजन्मना / बभौ तेन कुमारेण कुमारेणेव पार्वती // KAव्क्_३.३१ //
240 SK ततः कालेन सुकृतसोपानैः पृथिवीपतौ / दिव्यधामसमारूढे मणिचूडो ऽभवन्नृपः // KAव्क्_३.३२ //
241 SK अर्थिचिन्तामणेस्तस्य दानेन परिपूरिते / लोके पुण्यसुखालोके नार्तो ऽभून्न च याचकः // KAव्क्_३.३३ //
242 SK तस्य भद्रगिरिर्नाम बभूवं गजपुंगवः / प्रभोरिवानुकारेण दानार्द्रकरपुष्करः // KAव्क्_३.३४ //
243 SK तं कदाचिन्महास्थानस्थितं भुवननायकम् / भवभूतिः समभ्यायाद्भृगुवंशभवो मुनिः // KAव्क्_३.३५ //
244 SK दिव्यकान्यां समादाय लावण्यललिताननाम् / मूर्तामिव प्रभालक्ष्मीमक्षीणस्य क्षपापतेः // KAव्क्_३.३६ //
245 SK कुचयोरविवेकेन रागेण चरणाब्जयोः / नेत्रयोश्चापलेनेव सा जगत्यतिलज्जिता // KAव्क्_३.३७ //
246 SK तपःश्रियेव सहितं तं कन्यानुगतं मुनिम् / अओऊजयत् प्रजानाथः कृतासनपरिग्रहम् // KAव्क्_३.३८ //
247 SK कन्यापि नृपमालोक्य धीरं गम्भीरसुन्दरम् / परपीडासु कारुण्यान्न्यस्तचापमिव स्मरम् // KAव्क्_३.३९ //
248 SK चूडारत्नस्य कीरणैर्दुरितक्षयकारिभिः / लिखन्तं कुङ्कुमेनेव दिक्षु रक्षाक्षरावलिम् // KAव्क्_३.४० //
249 SK विक्षेपक्षिप्तमरुता चामरेण विराजितम् / सोच्छासेनेव सत्त्वेन जगत्संतारणं विना // KAव्क्_३.४१ //
250 SK रत्नोदारेण हारेण हृदयग्रहकारिणा / पातालविपदां शान्त्यै शैषेणेव निषेवितम् // KAव्क्_३.४२ //
251 SK वहन्तं महता दोष्णा क्षमां चित्तेन च क्षमाम् / प्रययौ साभिलाषस्य विस्मयस्य विधेयताम् // KAव्क्_३.४३ //
252 SK गृहीत्वा मुनिरुत्सङ्गे कुरङ्गतरलेक्षणाम् / जीवनीं तामनङ्गस्य जगाद् जगतीपतिम् // KAव्क्_३.४४ //
253 SK उदितेन जगन्नेत्रशतपत्रविकाशिना / भवता भाति लोको ऽयं देवेन च विवस्वता // KAव्क्_३.४५ //
254 SK अहो नु तव नास्त्येव विभूतिसुलभोद्भवः / साधोरिव गुणद्वेषः संमोहोपचितो मदः // KAव्क्_३.४६ //
255 SK लोकनाथस्य ते लोककारुण्यपूर्णचेतसः / राजन् मैत्रीजुषा कीर्तिः स्थिरा पारमिता परम् // KAव्क्_३.४७ //
256 SK अखेदसरलो दाता निर्व्याजसुकृतो भवान् / अत एव विशेषेण माननीयो मनीषिणाम् // KAव्क्_३.४८ //
257 SK पद्मोदरसमुद्भूता कन्या कमललोचना / होमावशेषपयसा वर्धितेयं मयाश्रमे // KAव्क्_३.४९ //
258 SK गृह्यतामग्रमहिषी पत्नीत्वे भवता नृप / विष्णोः श्रीरिव योग्येयं तवैव पुरुषोत्तम // KAव्क्_३.५० //
259 SK यज्ञपुण्यफलं पूर्णं कालेन मम दास्यसि / इत्युक्त्वा विधिना राज्ञे कन्यां दत्वा ययौ मुनिः // KAव्क्_३.५१ //
260 SK प्रियां पद्मावतीं राजा रतिं प्राप्येव मन्मथः / अरंस्त रुचिरोद्याने सुकृते पुण्यवानिव // KAव्क्_३.५२ //
261 SK ततः कालेन सा पुत्रं वंशवल्लिव मौक्तिकम् / असूत पद्मचूडाख्यं गुणानां दर्पणं पितुः // KAव्क्_३.५३ //
262 SK शक्रादिभिर्लोकपालैरनुल्लङ्घ्यमहोदयः / संस्तूयमानचरितः स्वयं कमलजन्मना // KAव्क्_३.५४ //
263 SK यशःसौरभसंभारसंपूरितदिगन्तरः / सर्वार्थिसार्थकल्याणकलनाकल्पपादपः // KAव्क्_३.५५ //
264 SK स्मृत्वा मुनेर्वचः काले कर्तुं विपुलदक्षिणाम् / अहिंसावसुसंपूर्णामाजहार महीपतिः // KAव्क्_३.५६ //
265 SK तस्मिन् यज्ञे समाजग्मुः सर्वकामैरनर्गले / मुनयो भार्गवमुखा नृपा दुष्प्रसहादयः // KAव्क्_३.५७ //
266 SK वर्तमाने मखे तस्मिन् निःसंख्यवसुवर्षिणि / रक्षोरूपः समुत्तस्थौ वह्निमध्यात् सुरेश्वरः // KAव्क्_३.५८ //
267 SK उपसृत्य स भूपालं कृशो विकृतविग्रहः / क्षुप्तिपासार्दितो ऽस्मीति ययाचे पानभोजनम् // KAव्क्_३.५९ //
268 SK शासनादथ भूभर्तुस्तस्मै विविधभोजनम् / उपनिन्युः परिचिताः पानं च परिचारकाः // KAव्क्_३.६० //
269 SK ततः किंचिद्विहस्यैव क्षितिपं प्राह राक्षसः / नेदमस्मत्प्रियं राजन् वयं हि पिशिताशनाः // KAव्क्_३.६१ //
270 SK सद्योहतस्य मांसेन रुधिरेण च भूयसा / तृप्तिरुत्पद्यते ऽस्माकं दीयतां यदभीप्सितम् // KAव्क्_३.६२ //
271 SK सर्वकामप्रदो ऽसीति त्वमहं समुपागतः / ददामीति प्रतिश्रुत्य न निषेधस्तवोचितः // KAव्क्_३.६३ //
272 SK इति रक्षवचः श्रुत्वा करुणकुलितो नृपः / अहिंसानियमेनाभूदर्थिवैमुख्यदुःखितः // KAव्क्_३.६४ //
273 SK सो ऽचिन्तयत्तदा दैवाज्जातो ऽयं धर्मसंशयः / न सहे दुःसहां हिंसां नं नैष्फल्यमर्थिनः // KAव्क्_३.६५ //
274 SK न च मांसं शरीरेभ्यो लभ्यते वैशसं विना / नाहं पिपीलकस्यापि कायक्लेशलवं सहे // KAव्क्_३.६६ //
275 SK दत्वाहं सर्वभूतेभ्यः पुण्यामभयदक्षिणम् / कथमस्मै प्रयच्छामि मांसं प्राणिवधोद्भवम् // KAव्क्_३.६७ //
276 SK इति संचित्य नॄपतिस्तमूचे करुणाकुलः / स्वशरीरसमुत्कृत्तमसृङ्भांसं ददामि ते // KAव्क्_३.६८ //
277 SK इत्युक्ते भूमिपतिना बभूवाकुलितं जगत् / न च देहव्ययोत्साहं सचिवास्तसय सेहिरे // KAव्क्_३.६९ //
278 SK प्रणयाद्वार्यमाणो ऽपि भूपालैर्मुनिभिस्तथा / ददौ स्वदेहमुत्कृत्य तस्मै मांसमसृग्वसाम् // KAव्क्_३.७० //
279 SK आकण्ठं पीतरक्तेन राक्षसेन क्षितिप्रभोः / भक्ष्यमाणेषु मांसेषु क्ष्ःअणं ख्षितिरकम्पतः // KAव्क्_३.७१ //
280 SK ततः पद्मावती देवी पतिं दृष्ट्वा तथागतम् / विलपन्ती निपतिता मोहमूर्च्छाकुलाभवत् // KAव्क्_३.७२ //
281 SK मनुजेन्द्रस्य देवेन्द्रस्तद्दृष्ट्वा सत्त्वमूर्जितम् / रक्षोरूपं परित्यज्य तमुवाच कृताञ्जलिः // KAव्क्_३.७३ //
282 SK अहो नु कर्मणा राजन् दुष्करेण तवामुना / रोमाञ्चकञ्चुकाकीर्णः कायः कस्य न जायते // KAव्क्_३.७४ //
283 SK अहो पुण्यमसामान्यमहो सत्त्वमनुत्तरम् / अहो धरियममर्यादं राजान् विरजसस्तव // KAव्क्_३.७५ //
284 SK दुःखिताः परदुःखेषु निर्लोभा दुर्लभेषु च / विपक्षेषु क्षमावन्तः सन्तः सुकृतसेतवः // KAव्क्_३.७६ //
285 SK समुन्मिषति को ऽप्येष सत्त्वोत्साहो महात्मनाम् / त्रैलोक्यं करुणार्द्राणां येन यात्यनुकम्प्यताम् // KAव्क्_३.७७ //
286 SK उक्त्वेति दिव्यौषधिभिस्तं कृत्वा स्वस्थविग्रहम् / प्रसाद्य लज्जावनतः शक्रः स्वनिलयं ययौ // KAव्क्_३.७८ //
287 SK ततः समाप्ते विधिवद्यज्ञे राज्ञां महीपतिः / चक्रे मुनिवराणां च पूजां त्रिदशपूजितः // KAव्क्_३.७९ //
288 SK स रत्नवर्षैर्यज्ञान्ते कन्याग्रामपुरप्रदः / सहितं त्रिदशार्हेण हरिणा हेममालिना // KAव्क्_३.८० //
289 SK ददरु राजगजं ब्रह्मरथाख्याय पुरोधसे / योजनानां शतं तूर्णं एकेनाह्ना प्रयाति यः // KAव्क्_३.८१ //
290 SK तस्मै समर्पितं दृष्ट्वा राज्ञा ब्न्हद्रगिरिं गजम् / अभूद्दुष्प्रसहो राजा तत्स्पृहाकृष्टमानसः // KAव्क्_३.८२ //
291 SK प्रयातेष्वथ भूपेषु विस्मितेषु मखश्रिया / समर्पिते यज्ञफले भार्गवाय महीभुजा // KAव्क्_३.८३ //
292 SK तमुवाच समभ्येत्य स्वस्तिवादपुरःसरम् / मरीचिशिष्यो वाहीकः प्राप्तपूजासनो मुनोः // KAव्क्_३.८४ //
293 SK राजन्नध्ययनस्यान्ते गुरुर्मे गुरुदक्षिणाम् / ईहते परिचर्यार्थी सामान्यजनदुर्लभाम् // KAव्क्_३.८५ //
294 SK एकस्त्वमेव विधिना निर्मितो दुर्लभप्रदः / बहवो जातु जायन्ते न लोके कल्पपादपाः // KAव्क्_३.८६ //
295 SK देवी पद्मावती पुत्रसहिता गुरवे मम / तपःकृशाय वृद्धाय दीयताम् परिचारिका // KAव्क्_३.८७ //
296 SK इत्युक्ते मुनिना राजा दयिताविप्रयोगजाम् / रुजं संस्तभ्य मनस तमूचे धैर्यभूधरः // KAव्क्_३.८८ //
297 SK प्रयच्छामि मुने तुभ्यमीप्सीताम् गुरुदक्षिणाम् / सहितां युवजारेन जीविताभ्यधिकां प्रियाम् // KAव्क्_३.८९ //
298 SK इत्युक्त्वा ससुतां तस्मै ददौ पद्मावतीं नृपः / स्वजीविते विनिस्नेहस्त्यागः सत्त्वमयात्मनाम् // KAव्क्_३.९० //
299 SK आदाय राजदयितां विरहक्लेशकातराम् / सपुत्रामाश्रमं गत्वा प्रददौ गुरवे मुनिः // KAव्क्_३.९१ //
300 SK अत्रान्तरे दुष्प्रसहः कुरुराजः क्षितीश्वरम् / दृप्तो ययाचे दूतेन भूत्यै भद्रगिरिं गजम् // KAव्क्_३.९२ //
301 SK पुरोहितार्पितं राजा न ददौ द् विरदं यदा / तदा विपुलसौन्येन स्वयं योद्धुं समाययौ // KAव्क्_३.९३ //
302 SK बलिना कुरुराजेन रुद्धेषु पुरवत्मसु / बभूव भूमिपालस्य सैन्यं रणरसोद्भटम् // KAव्क्_३.९४ //
303 SK स वीरकुञ्जरहरिः शक्तो ऽप्यरिविदारणे / जनक्षयभयोद्विग्नः कारुण्यात् समचिन्तयत् // KAव्क्_३.९५ //
304 SK अहो ऽनुकूलमित्रम् मे राजा दुष्प्रसहः परम् / मातङ्गलोभमोहेन सहसा शत्रुतां गतः // KAव्क्_३.९६ //
305 SK स्नेहान्ताः सुजनैः स्नेहा निःस्नेहान्ताश्च मध्यमैः / दुर्जनैर्घोरवैरान्ता भवन्ति प्राणहारिणः // KAव्क्_३.९७ //
306 SK अहो बिभवलिभेन क्षणक्षयिणि जीविते / समुद्यमो ऽयमस्माकं परप्राणनिपातने // KAव्क्_३.९८ //
307 SK हिंसयापप्रशान्तानाम् सक्तानां कलिकर्मसु / रणरक्ताभिषिक्तानां भक्तार्थो ऽयं समुद्यमः // KAव्क्_३.९९ //
308 SK सेवाविक्रीतजीवानां चण्डपिण्डार्थिनामयम् / कलहो दुःसहः क्रुर्यपिशुनानां शुनामिव // KAव्क्_३.१०० //
309 SK अहो विभवलुब्धानाम् परसंतापशीतलाः / स्वसुखायैव धावन्ति नृशंसचरिता धियः // KAव्क्_३.१०१ //
310 SK ये युधि सिद्धिसंनद्धा रक्तान्ताम् भुञ्जते श्रियम् / कुतः क्रुरतरे तेषां हृदये करुणाकणः // KAव्क्_३.१०२ //
311 SK एष दुष्प्रहसो राजा लुब्धो विबह्वमोहितः / न वध्यः सापराधो ऽपि कारुण्यायतनं मम // KAव्क्_३.१०३ //
312 SK इति चिन्तयतस्तस्य कारुण्यात काननैषिणः / प्रत्येकबुद्धाश्चत्वारः स्वयं व्योम्ना समाययुः // KAव्क्_३.१०४ //
313 SK प्रातपूजासनाः श्रुत्वा सर्वज्ञास्तत्समीहितम् / राज्ञः प्रशमशीलस्य प्रसन्नास्तत्त्वमूचिरे // KAव्क्_३.१०५ //
314 SK संमोहपटलान्धेषु संसारिषु दयालुता / शोभते तव भूपाल सत्त्वलोकविवेकिनः // KAव्क्_३.१०६ //
315 SK क्रियतामीप्सितं राजन् बोधौ बुद्धिर्निधीयताम् / संप्रति प्रतिरोधे ऽस्मिन् वनमेव विगाह्यताम् // KAव्क्_३.१०७ //
316 SK स्वैरनिर्ज्नरज्नङ्कारकीर्णसंतोषशीकराः / विविक्तकाननोद्देशाः शमिनामेव वल्लभाः // KAव्क्_३.१०८ //
317 SK इत्युक्त्वानुग्रहधिया विधायास्य वियद्गतिम् / प्रभाप्रसाधितदिशस्ते तेन सहिता ययुः // KAव्क्_३.१०९ //
318 SK यातेषु स्वपदं तेषु हिमवत्तटकाननम् / संप्राप्य पृथिवीपालः प्रयतप्रशमो ऽभवत् // KAव्क्_३.११० //
319 SK विवेकविमलास्तस्य धियः सत्त्ववतामिव / बभुः प्रियनिवुः पूर्णनिर्वाण्यो (?)वनभूमयः // KAव्क्_३.१११ //
320 SK भूधरान्तरिते तस्मिन् सहसा भूपभास्वति / शुशुचुर्मोहतिमिरप्राप्तशोकप्रजाः प्रजाः // KAव्क्_३.११२ //
321 SK ततस्तत्सचिवा जग्मुर्मरीचं मुनिमाश्रमे / शक्तं राज्यस्य रक्षायै राजपुत्रैं ययाचिरे // KAव्क्_३.११३ //
322 SK मुनिना निर्विकारेण दत्तमादाय मन्त्रिणः / राजसूनुं स्वनगरे चक्रुः सैन्यसमुद्यमम् // KAव्क्_३.११४ //
323 SK मुनिना निर्विकारेक दत्तमादाय मन्त्रिणः / सुभटाग्रेसरह् प्राप कुरुराजं रणाजिरे // KAव्क्_३.११५ //
324 SK स तेन हतविध्वस्तभग्नस्यन्द्नकुञ्जरह् / पलायनपरित्राणः प्रययौः हस्तिनापुरम् // KAव्क्_३.११६ //
325 SK बलिना राजपुत्रेण जिते दुष्प्रसहे युधि / मन्त्रिभिस्तद्भुजन्यस्ता भूमिः शेषधृतिं ययौ // KAव्क्_३.११७ //
326 SK राज्ञो दुष्प्रसहस्याथ कालेन कलुषात्मनह् / बभूवावृष्टिदुर्भिक्षमरकोपल्पवः पुरे // KAव्क्_३.११८ //
327 SK स विचिन्त्यानुतापार्तस्तीब्रां जनपदापदम् / न विवेद परित्राणं विफलस्वस्तिकक्रियः // KAव्क्_३.११९ //
328 SK पृष्ठा विपत्प्रतीकारं तेनामात्यास्तमूचिरे / दुःसहो ऽयं महाराज प्रजानां व्यसनोद्भवः // KAव्क्_३.१२० //
329 SK मणिचूडस्य भूभर्तुर्यदि चूडामणिः प्रभो / लभ्यते स सुधास्यन्दी तेनेयं तीर्यते विपत् // KAव्क्_३.१२१ //
330 SK चारेभ्यः श्रुतमस्माभिः स राजा हिमवत्तटे / स्थितः संसारवैमुख्यविवेकविमलाशयः // KAव्क्_३.१२२ //
331 SK अर्थितः स ददात्येव विश्वचिन्तामणिर्मणिम् / पुत्रदारशरीरादि नादेयं तस्य किंचन // KAव्क्_३.१२३ //
332 SK इति मन्त्रिवचः श्रुत्वा तथेत्याधार्य चेतसि / स द्विजान् मणियाच्ञायौ विससर्ज तदन्तिकम् // KAव्क्_३.१२४ //
333 SK अस्मिन्नवसरे राजा मणिचूषश्चरन् वने / मरीचेराश्रमोपान्तमवाप विपुलं मुनेः // KAव्क्_३.१२५ //
334 SK देवी पद्मावती तत्र फलमूलधृतव्रता / व्रजन्ती विजने भीता विपुने मुनिशासनात् // KAव्क्_३.१२६ //
335 SK शबरैर्मृगयायातैर्दृष्ट्वा कष्टदशां श्रिता / जुघृक्षुभिः कम्पमान् आचुक्रोश करुणस्वरम् // KAव्क्_३.१२७ //
336 SK आकर्ण्य करुणाक्रन्दे कुररूईकूजितोपमम् / हा राजन् मणिचूडेति त्रायस्वेति सुदुःसहम् // KAव्क्_३.१२८ //
337 SK सहसाभिद्रुतः कान्ताम् ददर्श नृपतिर्निजाम् / राहुसंत्रासितस्येन्दोर्द्युतिं निपतितामिव // KAव्क्_३.१२९ //
338 SK वीतरागाङ्गवसनां निरञ्जनपरिग्रहाम् / वदन्तीमिव संभोगसंयोगानामनित्यताम् // KAव्क्_३.१३० //
339 SK तां राजहंससुगताम् विहारस्तनमण्डलाम् / अश्रुकाषायनयनां विलोक्य करुणावनीम् // KAव्क्_३.१३१ //
340 SK संसारचरिताश्चर्यविचारेष्वपि कर्कशम् / कृपाकृपाणीनिर्लूनमिवासीर्भूपतेर्मनः // KAव्क्_३.१३२ //
341 SK एकाकीनं वने देवी विगतच्छत्रचामरम् / दृष्ट्वा नाथमनाथैव लोकनाथं तथागतम् // KAव्क्_३.१३३ //
342 SK तद्वियोगविषाक्रान्ता तद्दर्शनरसाकुला / शोकहर्षसमाकीर्णा बभूव भृशविह्वला // KAव्क्_३.१३४ //
343 SK सा नीता शबरा राज्ञा शापभीताः प्रदुर्द्रुवुः / न नामाभ्युदये भानोर्दृष्टं सप्रतिभं तमह् // KAव्क्_३.१३५ //
344 SK अत्रान्तरे शमद्वेषी सर् वभूताशयाशयः / मारः पुरुषरूपेण समेत्य नॄपमब्रवीत् // KAव्क्_३.१३६ //
345 SK राजन् राजीवनयनां प्रियां प्रणयिणीमिमाम् / न त्यक्रुमर्हस्यजने वने वनजलोचन // KAव्क्_३.१३७ //
346 SK इयं हि ते मनोवृत्तिरिव निःसुखतां गता / वर्जिता राज्यभोगेन राजराज न राजते // KAव्क्_३.१३८ //
347 SK एतदार्कर्ण्य नृपतिस्तं विज्ञाय मनोभवम् / अन्तरायं विवेकस्य प्रत्यभाषत सस्मितः // KAव्क्_३.१३९ //
348 SK जानामि त्वामहं काममकामं शमसंयमे / संतोषवताम् को नाम भवता न विमोहितः // KAव्क्_३.१४० //
349 SK इतिवादिनि भूपाले सहसान्तरिते स्मरे / बभूव विक्लवा देवी तप्ता विरहवह्निना // KAव्क्_३.१४१ //
350 SK दुःखितां तामार्तदुःखां पतिभोगवियोगिनीम् / उवाचाश्वासयन् राजा जायां जितमनोभवः // KAव्क्_३.१४२ //
351 SK देवि धर्मक्रियायुक्ता न शोकं कर्तुमर्हसि / दुःखावसानी विरसः सर्वो ऽयं भोगचिभ्रमः // KAव्क्_३.१४३ //
352 SK देहिनां यदितासङ्गास्तरङ्गतरलायुषाम् / लोलपद्मपलाशाग्रस्खलज्जललवाकुलाः // KAव्क्_३.१४४ //
353 SK इमा मुहूर्तनर्तक्यः कालमेघतडिल्लताः / संसारसर्परसना विलासचपलाः श्रियाः // KAव्क्_३.१४५ //
354 SK भोगक्षणेनैव वियोगरोगो विभूतयः स्वप्नविवाहतुल्याः / वाताहता दीपशिखा सुखश्रीरुन्मत्तनॄत्यं भववृत्तमेतत् // KAव्क्_३.१४६ //
355 SK सर्वोपजीव्या करुणा न लक्ष्मीः धर्मः प्रकाशः सततं न दीपाः / यशांसि रम्याणि न यौवनानि स्थिराणि पुण्यानि न जीवितानि // KAव्क्_३.१४७ //
356 SK सत्यव्रतस्तामिति सान्त्वयित्वा विसृज्य जायां निलये महर्षेः / चचार संसारपराङ्भुखानां संतोषपुण्येषु तपोवनेषु // KAव्क्_३.१४८ //
357 SK तदागतास्ते त्वरया विसृष्टाः पञ्च द्विजा दुष्प्रसहेन राज्ञा / तमर्थिनामकमकालबन्धुं विशुद्धसत्त्वं ददृशुर्वनान्ते // KAव्क्_३.१४९ //
358 SK ते स्वस्तिवादं शनकौर्विधाय विशस्तधैर्या इव साध्वसेन / तमूचिरे सूचिततीव्रतपाः दीर्घोष्णनिश्वाससमीरणेन // KAव्क्_३.१५० //
359 SK राजन् पुरे दुष्प्रसहस्य राज्ञः क्रूरोपसर्गौर्हतशान्तवर्गः / जनः कृतः कृत्तसमस्तकामः प्रकाममार्तस्वनमात्रशेषः // KAव्क्_३.१५१ //
360 SK अशोषदोषप्रशमैकहेतुः त्रैलोक्यरक्षाप्रथितप्रभावः / चूडामणिर्देव भवद्वितीर्णः करोति तस्योपनिपातशान्तिम् // KAव्क्_३.१५२ //
361 SK दयायुषश्चन्दनपल्लवार्द्राः स्वच्छाशयाश्चन्द्रमणिप्रकाशाः / संतापकाले शरणं जनानां भवद्विधा एव भवे भवन्ति // KAव्क्_३.१५३ //
362 SK इत्यर्थितस्तैरविलुप्तसत्त्वः संपूर्यमाणः करुणारसेन / उवाच संचिन्त्य जनोपतातं संक्रान्तमन्तः श्रुतिवर्त्मनेव // KAव्क्_३.१५४ //
363 SK अहो स राजा सहते कथं नु देवोपघातेन निपीडितानाम् / विदारितान्तःकरणं प्रजानां वियोगःदुःखोद्भवमार्तनादम् // KAव्क्_३.१५५ //
364 SK अयं मणिर्मस्तकमूलजन्मा निष्कृत्त्य तूर्णं प्रतिगृहृतां मे / धन्यो ऽस्मि यद्यर्थिजनस्य दुःखक्षये क्षणं कारणतां व्रजामि // KAव्क्_३.१५६ //
365 SK इत्युक्तमात्रे वसुधाधिपेन धराधराम्भोधिमहीधरित्री / चिरं चकम्पे चकितेव तस्य शिरस्तटोत्पाटनतीव्रदुःखात् // KAव्क्_३.१५७ //
366 SK ततः कृपाकोमलचित्तवृत्तेः सुतीक्ष्णशस्त्रैर्वचसा नृपस्य / सुतीक्ष्णशस्त्रादपि तीक्ष्णचित्तः स्वयं शिरः पाटयितुं प्रवृत्तः // KAव्क्_३.१५८ //
367 SK तद्दुष्करं कर्म नरेश्वरस्य व्योम्नि विमानैर्नलिनासनाद्याः / सुराः सविद्याधरसिद्धसाख्याः समाययुद्रष्टुमलुप्तसत्त्वम् // KAव्क्_३.१५९ //
368 SK विपाट्यमाने शिरसि प्रसह्य रत्नप्रभाविभ्रममादधानैः / स रक्तपूरैरभिक्षिक्तकायः सेहे व्यथामर्थिसुखे प्रवृत्तः // KAव्क्_३.१६० //
369 SK विल्प्क्य तं सत्त्व निबद्धधैर्यं तीव्रव्यथावेगनिमीलिताक्षम् / ययुर्विरामं न नृशंसवृत्तेर्विप्राः क्षणं राक्षसतामवाप्ताः // KAव्क्_३.१६१ //
370 SK विचार्य राजा श्वशरीरदुःखं संसारिणां क्लेशमयं शरीरम् / एवंविधैर्दुःखसहस्रलक्षैराक्रान्तमित्यार्ततरो बभूव // KAव्क्_३.१६२ //
371 SK सो ऽचिन्तयद्देहनिबद्धरत्नदानेन यत्पुण्य्फलं मयाप्तम् / तेनोग्रदुःखं कलयामि मा भूदपुण्यपाके नरके नराणम् // KAव्क्_३.१६३ //
372 SK समुद्धृते रक्रवसवसिक्ते तस्मिन्मणौ निश्चलतालुमूलात् / मूर्च्छाकुलो ऽपि प्रययौ सहर्षं संपूरणेनार्थिमनोरथस्य // KAव्क्_३.१६४ //
373 SK स कम्पमानाङ्गुलिपल्लवेन दत्वा स्वहस्तेन मणिं द्विजेभ्यः / निमीलयन् सम्तमसेन लोकं पपात तिग्मांशुरिवातिरक्तः // KAव्क्_३.१६५ //
374 SK अलुप्तसत्त्वे पतिते पृथिव्यां तस्मिन् सुराणां सह पुष्पवर्षैः / मणिं समादाय ययुर्द्विजास्ते तूर्णं पुरं दुष्प्रसहस्य राज्ञः // KAव्क्_३.१६६ //
375 SK स तेन् असद्यः शमितोपसर्गः स्वर्गोचितासादितभोगवर्गः / तद्बोधिसत्त्वस्य समस्तसत्त्वसंतारणार्हं प्रशशंस सत्त्वम् // KAव्क्_३.१६७ //
376 SK अत्रान्तरे किंचिदवाप्तसंज्ञं नरेश्वरं विश्रुतरत्नदानम् / समाययुर्भार्गवगौतमाद्या मरीचिमुख्या मुनयो वनेभ्यः // KAव्क्_३.१६८ //
377 SK मरीचिमेवानुगता च देवी पद्मावती वीक्ष्य परिक्षतं तम् / संमोहवेगाभिहता पपात क्षणं क्षितौ बाललतेव लूना // KAव्क्_३.१६९ //
378 SK दिगन्तसंचारिणी चारणानां नभश्चराणां नृपसाधुवादे / सराजपुत्राः सह मन्त्रिमुख्यैः प्रजाः प्रजानाथमथोपजग्मुः // KAव्क्_३.१७० //
379 SK वीक्ष्यः क्षितीशं क्षतजोक्षिताङ्गमक्षीणसत्त्वं पतितं पृथिव्याम् / पृथव्यथाक्लेशजुषं जनानामभूदभूतार्थविकल्पजल्पः // KAव्क्_३.१७१ //
380 SK कुठारिकैः कैश्चिदहो दयार्द्रः सर्वार्थिसेव्यः सरलः सुवृत्तः / दुरात्मभिः स्वार्थलवाभियुक्तैः छायातरुः कष्टमयः निकृत्तः // KAव्क्_३.१७२ //
381 SK अहो परार्थोज्झितजीवितो ऽयं परां चमत्कारदशां प्रयातः / ससौरभच्छिन्नतनुर्गतात्मा भवत्युदारः सहकार एव // KAव्क्_३.१७३ //
382 SK लुब्धस्य न स्वः स्वजनो ऽपि जन्तोः न कामकामस्य धने ऽनुरोधः / सर्वात्मना सत्त्वहितोद्यतस्य देहो ऽपि न स्नेहपदं दयालोः // KAव्क्_३.१७४ //
383 SK येषां कृते दैन्यमयं प्रयाति सर्वात्मना चार्थिजनो ऽर्थिभावम् / त एव दीनोद्धरणव्रतानां प्राणाः परित्राणपणे तृणानि // KAव्क्_३.१७५ //
384 SK इति प्रवादे विविधानुभावे विजृम्भमाणे मुनिमण्डलस्य / भूपालमभ्येत्य सबाष्पचक्षुर्मुनिर्मरीचिः प्रणयादुवाच // KAव्क्_३.१७६ //
385 SK अहो नु निष्कारणबन्धुभावमालम्ब्य राजन् दयया जनस्य / प्रजापरित्राणविधानभूमिस्तनुस्तवेयं तृणवद्वितीर्णा // KAव्क्_३.१७७ //
386 SK क्षयः प्रवृत्तो निरपेक्षवृत्तेस्तवार्थिबन्धोर्निजजीविते ऽपि / यदेष कामं कमलानिकायः कायस्त्वयापायपदे नियुक्तः // KAव्क्_३.१७८ //
387 SK अप्यस्ति राजन् सुकृतव्रते ऽस्मिन् फलस्पृहा प्राणपणे ऽपि काचित् / अस्थार्थिहेतोस्तव पालुभेदखेदाद्विकारं भजते न चेतः // KAव्क्_३.१७९ //
388 SK इत्यद्भुताविष्कृतमानसेन मुनीन्द्रमध्ये मुनिना स पृष्टः / उवाच संस्तभ्य रुजं प्रयत्नाद्रक्ताभिषिक्तं वदनं प्रमृज्य // KAव्क्_३.१८० //
389 SK फलस्पृहा नास्ति मुने ममान्या किं त्वेक एव प्रचुरो ऽभिलाषः / यद्धोरसंसारनिमग्नजन्तुसंतारणायैव भवे भवेयम् // KAव्क्_३.१८१ //
390 SK अर्थिप्रिये देहविदारणे ऽस्मिन् नैवास्ति मे को ऽपि विकारलेशः / यद्येष सत्यः समयो मयोक्तस्तदस्तु मे स्वस्थमिदं शरीरम् // KAव्क्_३.१८२ //
391 SK इत्युक्तमात्रे सहजानुभावे सत्त्वोचिते स त्यधनेन राज्ञा / अभूद्वपुः सत्यबलेन तस्य रूढव्रणं तत्क्षणजातरत्नम् // KAव्क्_३.१८३ //
392 SK ततः सुरैः शक्रविरिञ्चिमुख्यैर्नातप्रहर्षैर्मुनिभिश्च सर्वैः / अभ्यर्थितो ऽपि क्षितिपालनाय भोगाभिलाषी न बभूव भूपः // KAव्क्_३.१८४ //
393 SK अवाप्तसंज्ञा मुनिना प्रयुक्ता पद्मावती राजसुतेन सार्धम् / पतिं ययावे विरहोपशान्त्यै सिंहासनाक्रान्तिसुखं प्रजानाम् // KAव्क्_३.१८५ //
394 SK ततस्तमभ्येत्य कृपाकुलास्ते प्रत्येकबुद्धा जगतो हिताय / देहप्रभापूरितदिग्विभागा बभाषिरे हर्षमिवोद्गिरन्तः // KAव्क्_३.१८६ //
395 SK चिरादवाप्ते विरहावसाने पुनः परित्यागदशामसह्याम् / न राजपुत्रः सहते न देवी दुःखानुबन्धो ह्यसमृन्निपातः // KAव्क्_३.१८७ //
396 SK स्वमर्थिने यः रददाति देहमापन्नदुःखप्रशमैकहेतुः / कथं स कुर्यात् स्वजने ऽप्युपेक्षां धर्मो ऽप्ययं यस्य परार्थ एव // KAव्क्_३.१८८ //
397 SK इत्युक्तमाकर्ण्य नरेश्वरस्तैस्तथेति निश्चित्य धिया कथंचित् / व्योम्ना विमानैः स्वपुरीमवाप्य भेजे निजं राज्यपदं सपुत्रः // KAव्क्_३.१८९ //
398 SK इति स विपुलसत्त्वः सत्यवान् बोधिसत्त्वः सुचिरविहितराज्यः सौगतं धाम भेजे / जिनपुरमणिचैत्यच्छत्ररत्नप्रदीपप्रकटितविविधश्रीर्लक्षणाभ्यस्तबोधिः // KAव्क्_३.१९० //
399 SK इत्याह भगवान् बुद्धः स्ववॄत्तान्तनिदर्शने / दानोपदेशे भिक्षूणां सम्यक्संबोधिसिद्धये // KAव्क्_३.१९१ //
400 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां मणिचूडावदानं नाम तृतीयः पल्लवः //
401 SK ४. मान्धात्रवदानम् /
402 SK शोभन्ते भुवनेषु भव्यमनसां यन्नाककान्ताकर- प्रौढोदञ्चितचारुचामरसितच्छत्रस्मिताः संपदः / यच्चोत्सर्पति तर्पितश्रुति यशः कर्पूरपूरोज्ज्वलं स्वल्पं दानकणस्य तत् फलमहो दानं निदानं श्रियः // KAव्क्_४.१ //
403 SK अभूदुपोषधो नाम भूभृध्यस्य विभावतः / विबुधाभिमता कीर्तिः सुधा दुग्धोदधेरिव // KAव्क्_४.२ //
404 SK वसुधामवतो यस्य वसुधामवतः पुरः / ननाम प्रणतौ कस्य न नाम नृपतेः शिरः // KAव्क्_४.३ //
405 SK शुद्धा धीरिव धर्मेण दानेनेव दयालुता / विभूतिर्विनयेनेव भूषिता येन भूरभूत् // KAव्क्_४.४ //
406 SK गुणिनः प्रांशुवंशस्य बभूवेन्दुद्युतेः स्थितिः / यस्य सर्वातपत्रस्य मूर्ध्नि सर्वमहीभृताम् // KAव्क्_४.५ //
407 SK यस्येश्वरशिरःस्थायि शुभं गङ्गाजलोज्ज्वलम् / भ्रमत्यदभ्रं लोकेषु भुवनाभरणं यशः // KAव्क्_४.६ //
408 SK कर्तु क्रतुसहस्राणां सहस्राक्षाधिकश्रियः / यस्य षष्टिसहस्राणि कलत्रं सुदृशामभूत् // KAव्क्_४.७ //
409 SK कदाचिन्मुनिरक्षायै रक्षःक्षयकृतक्षणः / विचचाराश्वमारुह्य स तपोननभूमिषु // KAव्क्_४.८ //
410 SK तत्र राजर्षिभिः कैश्चित्पुत्रेष्टिकलशं धृतम् / दूराध्वश्रमसंतप्तः स पयःपूर्णमापपौ // KAव्क्_४.९ //
411 SK विजनासादितं पीत्वा स मन्त्रकलशात् पयः / राजधानीं समासाद्य गर्भं लेभे विभुर्भुवः // KAव्क्_४.१० //
412 SK स्वप्नमायेन्द्रजालादि यस्याः कौतुकविप्रषुः / जयत्यद्भुतसंभारभूमिः सा भवितव्यता // KAव्क्_४.११ //
413 SK विधेर्विविधवैचित्र्यचित्रकर्मविधायिनः / आश्चर्यरेखाविन्यासं कः परिच्छेत्तुमीश्वरः // KAव्क्_४.१२ //
414 SK कालेन तस्य मूर्धानं भित्त्वा बाल्ॐ ऽशुमानिव / रूढव्रणस्य सहसा दिव्यद्युतिरजायत // KAव्क्_४.१३ //
415 SK तं राजजाया जगृहुर्जगत्साम्राज्यलक्षणम् / वात्सल्यप्रस्रुतक्षीराः पुण्यंमूर्तिमिवाश्रितम् // KAव्क्_४.१४ //
416 SK मां धारयिष्यति शिशुः श्लाघ्यो ऽयं जननीपदे / इति तासां मिथो वाक्यैर्मान्धाताभून्नृपात्मजः // KAव्क्_४.१५ //
417 SK तस्य प्रवर्धमानस्य बालक्रीडाविलासिनः / षडिन्द्रः प्रययौ कालः पुण्यक्रीडक्षयायुषः // KAव्क्_४.१६ //
418 SK नवयौवनमारूढः सर्वविद्यासु पारगः / स याते पितरि स्वर्गं भेजे राज्यं क्रमागतम् // KAव्क्_४.१७ //
419 SK यक्षो दिवौकसो नाम सुकृतेर्दासताम् गतः / अभिषेकोपकरणं दिव्यं तस्योपनीतवान् // KAव्क्_४.१८ //
420 SK स स्वर्णैर्बद्धमुकुटः कल्पितोष्णीषशेखरः / श्रदभ्रावतंसस्य मेरोः शोभामवाप्तवान् // KAव्क्_४.१९ //
421 SK सप्त रत्नानि तस्याथ प्रादुर्भूतानि तक्षणे / चक्राश्वमणिहस्तिश्रीगृहसेनाग्रगाण्यपि // KAव्क्_४.२० //
422 SK बभुव चास्य पुत्राणां तुल्यरूपबलौजसाम् / सहस्रं विजितारातेर्भुजानामिव भूभुजः // KAव्क्_४.२१ //
423 SK वसुंधरां समस्ताब्धुइवेलाकलितमेखलाम् / निखिलां विदधे दोष्णि शेषविश्रान्तिर्निर्वृताम् // KAव्क्_४.२२ //
424 SK भुवनत्राणसंसद्धह् प्रत्यग्रकमलाश्रयः / चक्रवर्ती स सुकृतेर्विष्णोः कर इवाबभौ // KAव्क्_४.२३ //
425 SK त्रिजगज्जाह्नवी कीर्तिः प्रभावाभरणाः श्रियः / सो ऽयं सुकॄतवल्लीनां प्रथमं कुसुमोद्गमः // KAव्क्_४.२४ //
426 SK स कदाचिद्द्वनान्तेषु विकाशिकुसुमश्रियः / रुचिरं सचिवैः सार्धं विचचार विलोकयन् // KAव्क्_४.२५ //
427 SK ददर्श तत्र निष्पक्षान् विहगान् पादचारिणः / व्योममार्गगतिं स्मृत्वा प्रयातान् कृशतामिव // KAव्क्_४.२६ //
428 SK पक्षहीनानगतिकान् वृत्तिक्षीणान्निरम्बरान् / दरिद्रानिव तान् वीक्ष्य प्रोवाच कृपया नृपः // KAव्क्_४.२७ //
429 SK अहो वराकौर्विहगैः किमेतैः कुकृतं कृतम् / यदेते पक्षविकलाः कृच्छ्रचरणचारिणः // KAव्क्_४.२८ //
430 SK इत्युक्ते भूमिपतिना करुणाकुलितात्मना / पुरःस्थितो महामात्यः सत्यसेनस्तमब्रवीत् // KAव्क्_४.२९ //
431 SK श्रुतमेतन्मया देव कथ्यमानं वनेचरैः / कारणं पक्षपतने यदभूत् पक्षिणामिह // KAव्क्_४.३० //
432 SK सन्ति पञ्च शतान्यत्र पुण्यधाम्नि तपोवने / तपःस्वाध्यायसक्तानां मुनीनां दीप्ततेजसाम् // KAव्क्_४.३१ //
433 SK तेषामद्ययनध्यानजपविघ्नविधायिनः / एते लोकाहलं चक्रुः खगास्तरूवने सदा // KAव्क्_४.३२ //
434 SK तस्मै विहगसंघाय कर्णापायकृते परम् / अतिसंवर्धमानाय चुकोप मुनिमण्डलम् // KAव्क्_४.३३ //
435 SK तदुर्भूतमहाशापतापल्पोषेण सर्वतः / क्षणेन पक्षिणां पक्षा व्यशीर्यन्त कृतागसाम् // KAव्क्_४.३४ //
436 SK त एते विहगाः पक्षरहिताः कृच्छ्रवर्तिनः / त्वद्विपक्षा इव वने श्रान्ताश्रचरणचारिणः // KAव्क्_४.३५ //
437 SK महामात्येन कथितं निश्मैतन्महीपतिः / उवाच करुणाक्रान्तस्तप्तः शापेन पक्षिणाम् // KAव्क्_४.३६ //
438 SK अहो तेजः परिणतं शान्तानामपि कानने / अङ्गाराणां मुनीनां च दहत्येवानिवारितम् // KAव्क्_४.३७ //
439 SK मिथ्यातपस्विभिः किं तैः स्वसुखाय न यैः कृतः / मनसः कोपतप्तस्य परिषेकः क्षमाम्बुभिः // KAव्क्_४.३८ //
440 SK प्रसन्ना धीर्मणो मैत्रं दया दानं दमह् क्षमा / येषां तेषां तपः श्लाध्यं शेषाणां कायशोषणम् // KAव्क्_४.३९ //
441 SK किं तपोभिः सकोपानां विल्पुतानां वनेन किम् / विभवैः किं सलोभानां दुर्वृत्तानां श्रुतेन किम् // KAव्क्_४.४० //
442 SK एवं कलुषचित्तास्ते तीब्रमन्युपरायणाः / दुःसहा एव मुनयः प्रयान्तु विषयान्मम // KAव्क्_४.४१ //
443 SK इत्युक्त्वा प्राःइणोत्तेभ्यः संदेशं पुरुषैर्नृपः / यावती मद्वशा भूमिस्तावती त्यज्यतामिति // KAव्क्_४.४२ //
444 SK विहंगपक्षपातेन कुपितस्य महीपतेः / संदेशं मुनयः श्रुत्वा विलक्षाः समचिन्तयन् // KAव्क्_४.४३ //
445 SK चतुःसमुद्रपरिखामेखलायाः क्षितेः पतिः / नरेन्द्रो ऽयं क्क्व गच्छामः को देशो ऽस्य वशे न यः // KAव्क्_४.४४ //
446 SK इति संचिन्त्यं मुनयः पार्श्वं कनकभूभृतः / सुरसिद्धसमाकीर्णं जम्बूखण्डान्तिकं ययुः // KAव्क्_४.४५ //
447 SK अथ तस्य महीभर्तुः प्रब्ःआवेण महीयसा / अभूददृष्टशस्या भूद्याश्च रत्नाम्बरप्रसूः // KAव्क्_४.४६ //
448 SK पाकशासनवैलक्ष्यकरणास्तस्य शासनात् / सप्ताहं हेम ववृषुर्मेघाः संग्ःआतवर्षिणः // KAव्क्_४.४७ //
449 SK स प्रभावेण महता सह सैन्यैर्नभोगतिः / चक्रे पूर्वविदेहाख्यं द्वीपं दिव्यजनं वशे // KAव्क्_४.४८ //
450 SK बभूवुरग्रे सौन्यानि स्फीटशौर्यबलौजसां / भटानां व्योमगमने तस्याष्टादशकोटयः // KAव्क्_४.४९ //
451 SK गोदानीयं ततो द्वीपमथोत्तरकुरूनपि / पार्श्वानि स सुमेरोश्च शशासासतशासनः // KAव्क्_४.५० //
452 SK सुखं विहरतस्तस्य मेरोः कनकसानुषु / बहुशक्रो ययौ कालश्चतुर्द्वीपमहीपतेः // KAव्क्_४.५१ //
453 SK स कदाचित् सुरान् द्रष्टुं व्याम्ना गच्चन् सुरोपमः / चकार नीलजलदैर्व्याप्ता इव गजैर्दिशः // KAव्क्_४.५२ //
454 SK अथ तेषां निरस्तानां मेरुपार्श्वे तपस्यताम् / मुनीनामपतन् मूर्ध्नि तद्गजाश्वशकृद्दिवः // KAव्क्_४.५३ //
455 SK ततस्ते क्रोधसंतप्तदृशा व्योमावलोकिनः / चक्रुः पिङ्गपर्भावल्लिकलापकपिला दिशः // KAव्क्_४.५४ //
456 SK कोपात्किमेतदित्युक्त्वा शापाग्निविसिसृक्षता / अभ्येत्य देवदूतस्तान् प्रहर्षाकुलितो ऽवदत् // KAव्क्_४.५५ //
457 SK एषा निःशेषभूपालमौलिविश्रान्तशासनः / पाकशासनतुल्यश्रीर्मान्धाता पृथिवीपतिः // KAव्क्_४.५६ //
458 SK नभसा नरदेवि ऽयं सह सैन्यैः प्रसर्पति / यस्य कीर्तनधन्येयं वाणी पुण्याभिमानिनी // KAव्क्_४.५७ //
459 SK न दृष्टो यस्य निर्दिष्टसर्वलोकसुखश्रियः / मोहः संबिन्मयस्येव विभवप्रभवो मदः // KAव्क्_४.५८ //
460 SK कौबेरं धनदव्यक्त्या कौमारं शक्तिमत्तया / ऐश्वरं वृषसंयोगाद्वैष्णवं श्रीसमागमात् // KAव्क्_४.५९ //
461 SK प्रतापप्रसरात् सौरमैन्दवं जननन्दनात् / ऐन्द्रं दृप्तबलच्छदाद्दिव्यं रूपं बिभर्त्ययम् // KAव्क्_४.६० //
462 SK बलिः प्रयातः पातालं दधीचो ऽप्यस्थिशेषताम् / अस्य त्यागेन जलधिः क्षोभमद्यापि नोज्झति // KAव्क्_४.६१ //
463 SK श्रुत्वेति देवदूतस्य वचनं मुनिमध्यगः / ससर्ज दुर्मुखो नाम मुनिः शापजलं दिवि // KAव्क्_४.६२ //
464 SK प्रहसन्नथ तं प्राह सेनानां परिणायकः / महर्षे संहर रूषं मा कृथास्तपसः क्षयम् // KAव्क्_४.६३ //
465 SK वैफल्यलज्जां शापो ऽथं यास्यत्यग्रे महीपतेः / नैते बत खगा येषां यूयं पक्षक्षयक्षमाः // KAव्क्_४.६४ //
466 SK इत्युक्ते सौन्त्यपतिना शापस्तब्धामनीकिनीम् / दृष्ट्वाग्रे विस्मयादूचे किमेतदिति भूपतिः // KAव्क्_४.६५ //
467 SK संरब्धो ऽथ समभ्येत्य सेनापतिरुवाच तम् / तेषां देव महर्षीणां शापात् सैम्यं न सर्पति // KAव्क्_४.६६ //
468 SK इदं च चक्ररत्नं ते व्योम्नि शापविघूर्णितम् / धत्ते जलदसंरुद्धतिग्मदीधितितुल्यताम् // KAव्क्_४.६७ //
469 SK एतदाकर्ण्य नृपतिर्दृष्टा चाग्रे तथैव तत् / दृशैव दिवधे शापं विफलोच्चण्डविल्पवम् // KAव्क्_४.६८ //
470 SK देहक्षयं महर्षीणां परिरक्षन् कृपाकुलः / जटा न्यपातयद् भूमौ स लीलालसशासनः // KAव्क्_४.६९ //
471 SK अजितक्रोधमोहानां भारभूता वृथा वयम् / इतीव लज्जया तेषां लीनाः क्षितितले जटाह् // KAव्क्_४.७० //
472 SK अथ मेरुशिरः प्राप्य नृपः सुरनिकेतनम् / पुरं सुदर्शनं नाम दर्दर्श प्रियदर्शनम् // KAव्क्_४.७१ //
473 SK नागास्तत्र कृतारक्षाः प्रख्यातोदकनिःसृताः / करोटपाणयो यक्षाः सुरा मालाधराभिधाः // KAव्क्_४.७२ //
474 SK सदामत्तास्तथा देवाः क्रोधोत्तम्भितसैनिकाः / महाराजकायिकाख्यास्त्रिदशा बलवत्तराः // KAव्क्_४.७३ //
475 SK महाराजाश्च चत्वारः संनद्धकवचायुधाः / जित्वा राज्ञा प्रभावेण निजसेनाग्रगाह् कृताः // KAव्क्_४.७४ //
476 SK ततः कल्पद्रुमोदारकोचिदारमनोहरम् / ददर्श पारिजाताख्यं संश्रयं त्रिदिवौकसाम् // KAव्क्_४.७५ //
477 SK मेरोर्मूर्ध्नि ततः शुभ्रप्रभां मालामिवामलाम् / सुधर्माख्यां सभां प्राप स्वभासोद्भासिताम्बराम् // KAव्क्_४.७६ //
478 SK हेमविद्रमवैदूर्यस्तम्भसंब्ःआरभास्वरः / प्रासादो वैजयान्ताख्यः प्रख्यातो यत्र राजते // KAव्क्_४.७७ //
479 SK यत्राब्जेर्वदनैर्भृङ्गैरलकैस्तुल्यतां गताः / पद्मिन्यः सुरनारीणां पद्मिनीनां सुराङ्गनाः // KAव्क्_४.७८ //
480 SK बिम्बतैस्त्रिदशैर्यत्र मणिभूस्तम्भभित्तिषु / सुरलोको बिभर्त्येको ऽप्यनेकसुरलोकताम् // KAव्क्_४.७९ //
481 SK रत्नतोरणहर्म्यांनिवहैर्यत्र चित्रिताः / व्याप्ता विभान्ति ककुभः शक्रायुधशतैरिव // KAव्क्_४.८० //
482 SK यत्र बालानिलालोलकल्पपादपपल्लवैः / नृत्यद्धस्ता इवाभान्ति नन्दिन्यो नन्दनश्रियः // KAव्क्_४.८१ //
483 SK यत्र चैत्ररथं नाम देवोद्यानं मनोरमम् / धत्ते नित्योत्सवं प्रेमिकामं कामवसन्तयोः // KAव्क्_४.८२ //
484 SK सर्वकामं सर्वसुखं सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलम् / सर्वातिशयितं दृष्ट्वा देवानाम् सदनं नृपः // KAव्क्_४.८३ //
485 SK मुहूर्तविसम्यास्पन्दसानन्दस्निग्धलोचनः / अच्नितयत् सुकृतिनामिमास्ताह् फलभूमयः // KAव्क्_४.८४ //
486 SK ऐरावणं सुरपतेर्लोलालिओवलयाकुलम् / ददर्श तत्र सामोदं साकारमिव नन्दनम् // KAव्क्_४.८५ //
487 SK पुरंदरस्ततो ज्ञात्वा प्राप्तं भूमिपुरंदरम् / प्रत्युद्ययौ प्रमुदितः सह सर्वैर्मरुद्गणैः // KAव्क्_४.८६ //
488 SK पूजितः सुरराजेन रत्नराजिविराजितां / राजराजह् सभाभूमिं भेजे विरजसां वरह् // KAव्क्_४.८७ //
489 SK त्रिदशेषूपविष्टेषु रत्नपर्यङ्कपङ्क्तिषु / उपाविशन्नृपः श्रीमानासनार्धे शतक्रतोः // KAव्क्_४.८८ //
490 SK एकासनजुषोस्तत्र सुरेन्द्रमनुजेन्द्रयोः / रूपं गुणगणोदारम् निर्विशेषमदृश्यत // KAव्क्_४.८९ //
491 SK ततह् सर्वसुरोत्सृष्टस्पष्टलोचनषट्पदैः / पीयमानमुखाम्भोजं व्याजहार हरिर्नृपम् // KAव्क्_४.९० //
492 SK अहो उदयः श्लाध्यस्ते तेजसा तेजसां निधे / भवता भूषिता भूमिर्द्यौश्च देवेन भास्वता // KAव्क्_४.९१ //
493 SK अभ्युन्नतप्रभावो ऽयं लसत्सितयश्ॐशुकः / भ्राजते ते त्रिभुवने साम्राज्यविजयध्वजः // KAव्क्_४.९२ //
494 SK त्वत्कथामृतपानस्य त्वद्दर्शनरसस्य च / प्रेर्यते श्रोत्रनेत्रेण सुखाख्याने सरस्वती // KAव्क्_४.९३ //
495 SK स्थिरीकृतस्त्वयैवायं सुकृताप्तविभूतिना / कर्मणां फलवादस्य निश्चरश्छिन्नसंशयः // KAव्क्_४.९४ //
496 SK अत एवेन्द्रियग्रामे चक्षुरेव स्पृहास्पदम् / पुण्यैः पुण्योचिताचारा दृश्यन्ते यद्भवद्विधाः // KAव्क्_४.९५ //
497 SK इत्युक्ते त्रिदशेन्द्रेण मान्धाता यशसां निधिः / त्वत्प्रसादप्रभावो ऽयमित्युवाच नताननः // KAव्क्_४.९६ //
498 SK इत्येवं पूज्यमानस्य तस्य नित्यादरैः सुरैः / षडिन्द्रः प्रणयौ कालस्त्रिदिवे वसतः सतः // KAव्क्_४.९७ //
499 SK तत्पराक्रमविध्वस्तसमस्तासुरमण्डलः / बभूव सुरराजस्य निरपायोदयो जयः // KAव्क्_४.९८ //
500 SK दीप्तदानवसंग्रामे तस्य शौर्यमहातरोः / विश्रान्तिं भेजिरे देवा भुजच्छायोपजीविनः // KAव्क्_४.९९ //
501 SK तस्य पुण्यपणक्रीतं भिञ्जानस्याक्षयं सुखम् / कालप्रवाहे महति प्रययुः षट् पुरंदराः // KAव्क्_४.१०० //
502 SK सत्कर्मफलभोगस्य लाञ्छनं विमलं मनः / कालुष्याज्जायते तस्य प्रत्यासन्नः परिक्षयः // KAव्क्_४.१०१ //
503 SK अथ कालेन कालुष्यकलितस्य मनोरथः / अभूल्लोभाभिभूतस्य भूतपेरभिमानिनः // KAव्क्_४.१०२ //
504 SK त्रिदशानामियं लक्ष्मीर्मद्बाहुबलपालिता / तदिमां न सहे तावदर्धासनविडम्बनाम् // KAव्क्_४.१०३ //
505 SK अहमेकः सुरपतिः प्रभावान्न भवामि किम् / अयं मम भुजः सर्वजगद्भारभरक्षमः // KAव्क्_४.१०४ //
506 SK च्यावयित्वा सुराशीशं स्वर्गसाम्राज्यसंपदम् / एकातपत्रतिलकां स्वयंग्राहोचितां बह्जे // KAव्क्_४.१०५ //
507 SK इति चिन्तयतस्तस्य शक्रद्रोहाभिलाषिणः / शुभ्रप्रभा प्रभावश्रीर्मालेव म्लानताम् ययौ // KAव्क्_४.१०६ //
508 SK घनोदयसमुत्सिक्ता सौजन्यतटपातिनी / लोलं कलुषयत्येव मानसं श्रीतरङ्गिणी // KAव्क्_४.१०७ //
509 SK प्रमादो विपदां दूतो दुःसहो महतामपि / कुशलोन्मूलनायैव किल्बिषाकुलिता मतिः // KAव्क्_४.१०८ //
510 SK पापसंकल्पमात्रेण क्षितौ क्षितिपतिः क्षणात् / पपात विस्रस्तफलश्छिन्नमूल इव द्रुमः // KAव्क्_४.१०९ //
511 SK हन्ति विद्यामनभ्यासः श्रियं हन्ति मदोदयः / विद्वेषः साधुताम् हन्ति लोभः समुन्नतिम् // KAव्क्_४.११० //
512 SK अहो बत महोत्कर्षशृङ्गारोहो महोदयः / विभवोद्भवमत्तानां सहसैव पतत्यधः // KAव्क्_४.१११ //
513 SK तेन सर्वविभुर्नाम पूजितः पूर्वजन्मनि / तत्फलादाप्तवान् राज्यं स्पृहणीयं मरूत्पतेः // KAव्क्_४.११२ //
514 SK सुराधिपाधिकः को ऽपि प्रभावो विस्मयावहः / अनल्पपिण्डस्तस्याभुत् पात्रदानांशसंभवह् // KAव्क्_४.११३ //
515 SK द्बन्धुमत्यभिधानायां नगर्यामुषितः शुचिः / वणिगुत्करिको नाम सो ऽभवत् पूर्वजन्मनि // KAव्क्_४.११४ //
516 SK विपश्यी नाम भिक्षायै सम्यक्संबुद्धां गतः / विवेश त द्गृहं सर्वसत्त्वसंतारणोद्यतः // KAव्क्_४.११५ //
517 SK पात्रे तस्य च चिक्षेप मुद्गमुष्टिं प्रसन्नधीः / फलानि तत्र चत्वारि पेतुः शेषाणी भूतले // KAव्क्_४.११६ //
518 SK तेन दानप्रभावेण मान्धाता पृथिवीपतिः / सर्वद्वीपपतिर्भूत्वा शक्रार्धासनमाप्तवान् // KAव्क्_४.११७ //
519 SK मुद्गशेषश्च्युतो यस्माद् भूतौ तस्यान्यचेतसः / तदसौ फलपर्यन्ते पतितस्त्रिदशालयात् // KAव्क्_४.११८ //
520 SK लुठति विकलकल्पा यत्र संकल्पमाला स्फुरन्ति न च कदाचित् स्वप्नमायान्तरे या / भवति विभवभोगाभोगिनी भाग्यभाजा- मतुलफलततिः सा दानकल्पद्रुमाणाम् // KAव्क्_४.११९ //
521 SK इत्याह भगवान् बुद्धः प्रीत्या दानफलश्रियम् / निजजन्मान्तराख्याने भिक्षूणामनुशासने // KAव्क्_४.१२० //
522 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां मान्धात्रवदानं नाम चतुर्थः पल्लवः //
523 SK ५. चन्द्रप्रभावदानम् /
524 SK दुग्धाब्धिर्विबुधार्थनातिविधुरः क्षुब्धश्चकम्पे चिरं कम्पन्ते च निसर्गतः किल फलोत्सर्गेषु कल्पद्रुमाः / एकः को ऽपि स जायते तनुशतैरभ्यस्तदानस्थितिर् निष्कम्पः पुललोत्करं वहति यः कायं प्रदानेष्वति // KAव्क्_५.१ //
525 SK अस्ति कौलासहासिन्यामुत्तरस्यामनुत्तरा / दिशि भद्रशिला नाम भुवनाभरणं पुरी // KAव्क्_५.२ //
526 SK यस्यां सितयशःपुष्पाः सफलाः सर्वसंपदः / दानोद्यानलताः प्रीत्यै बभूवुः पुरवासिनाम् // KAव्क्_५.३ //
527 SK यत्र त्रिपुरजिन्नेत्रशिखित्रस्तो मनोभवः / अबलाभिश्चलक्रीडभ्रूभङ्गैरेव रक्ष्यते // KAव्क्_५.४ //
528 SK मुक्ताजालोज्ज्वला यत्र् अभाति हेमगृहावली / मेरोः शिखरमालेव विस्फुतत्स्फीततारका // KAव्क्_५.५ //
529 SK तस्यां चन्द्रप्रभः श्रीमानभूद् भूमिभृतां वरः / कौलास इव यः कान्त्या चकार दिनचन्द्रिकाम् // KAव्क्_५.६ //
530 SK यस्य देहप्रभापूरैः पूर्णिन्दुद्युतिहारिभिः / निशासु दीपकाभासु नाभूतु स्नेहगुणक्षयः // KAव्क्_५.७ //
531 SK स्मरज्वरं भजन्ते ऽस्य दर्शनेनैव तारकाः / इति च्छत्रछलादस्य छादितं खमिवेन्दुना // KAव्क्_५.८ //
532 SK प्रदिशत्येष सततं श्रियं सत्कोशसंश्रयाम् / इति तद्दर्शनेनैव संकोचं प्राप पद्मिनी // KAव्क्_५.९ //
533 SK सेनाहंकारमुत्सृज्य त्यागशुभ्रश्रिया श्रियः / निर्दिष्टाश्छत्रमुकुटप्रकटाः पुरव्षिनाम् // KAव्क्_५.१० //
534 SK शुशुभे विभवस्तस्य पुण्यालंकारणोन्नतेः / आरोहति पराम् कोटीं नम्रस्य धनुषो गुणः // KAव्क्_५.११ //
535 SK चत्वारिंशत्सहस्राणि वत्सराणां शताणि च / बभूव देहिनामायुस्तस्य काले कलिद्विषः // KAव्क्_५.१२ //
536 SK तस्य षष्टिसहस्राणि पुरीणां पूर्णसंपदाम् / बभूवुर्लोकपालस्य लोकपालाध्काश्रियः // KAव्क्_५.१३ //
537 SK यज्वानः कीर्तितिलकास्तस्य पुण्यविभूषणाः / यज्ञधूमलताभङ्गैर्बभुर्लोलालकाः श्रियः // KAव्क्_५.१४ //
538 SK तस्य संपत्कुमुदिनीविकासेन सदोदितः / अभून्मन्त्री महाचन्द्रश्चद्रलोक इवोज्ज्वलः // KAव्क्_५.१५ //
539 SK येन निश्चललक्ष्येण प्रभोः प्रज्ञापताकया / राज्याब्धिकर्णधारेण पारमुत्तरितं यशः // KAव्क्_५.१६ //
540 SK महीधराभिधश्चासौ बभूवामात्यकुञ्जरः / भूमिभारसहस्तस्य दिङ्गाग इव पञ्चमह् // KAव्क्_५.१७ //
541 SK मन्त्रणाभिन्नमन्त्रस्य यस्य नीतिबृहस्पतेः / त्याजिताः प्रतिसामन्ताः शौर्यं विषमिवाहयः // KAव्क्_५.१८ //
542 SK तेनामात्येन स नृपः स च राज्ञा विभूषितः / गुणः सत्पुरुषेणेव गुणेनेव च सज्जनः // KAव्क्_५.१९ //
543 SK कृतज्ञः सरलः स्वामी सद्भृत्यो भक्तिनिर्भरः / सुकृतप्रभवेणैव भाग्ययोगेन लभ्यते // KAव्क्_५.२० //
544 SK इयमेव चिरभ्रान्तिविश्रान्तिः सर्वसंपदाम् / यद्गुणज्ञतया वेत्ति स्वामिसत्पुरुषान्तरम् // KAव्क्_५.२१ //
545 SK तौ कदचिद्ददृशतुः स्वप्नमन्ये च मन्त्रिणह् / क्षयो यस्य फलं दानव्यसनेन महीपतेः // KAव्क्_५.२२ //
546 SK तौ दृष्ट्वा दुर्निमित्तानि प्रादुर्भूतानि शङ्कितौ / व्यग्रओ बभूवतुर्नित्यं शान्तिस्वस्तिककर्मसु // KAव्क्_५.२३ //
547 SK निमित्तदर्शनोद्विग्नास्तपिवनगता अपि / विश्वामित्रप्रभृतयः स्वामीत्यूचुर्महर्षयः // KAव्क्_५.२४ //
548 SK अत्राण्तरे ब्रह्मबन्धुः प्राग्जन्मब्रह्मराक्षसः / रौद्राक्षो नाम मात्सर्यक्रौर्यदौर्जन्यदुःसहः // KAव्क्_५.२५ //
549 SK श्रुत्वा दानोद्भवाम् कीर्तिं राज्ञः सर्वगुणोज्ज्वलाम् / निर्गुणः स गुणद्वेषि संतप्तः समचिन्तयत् // KAव्क्_५.२६ //
550 SK अहो बतास्य नृपतेर्गीयते गगने यशः / अनिशं सिद्धगन्धर्वगीर्वाणललनागणैः // KAव्क्_५.२७ //
551 SK सदा विशन्ति मे कर्णे तद्गुणस्तुतिसूचयः / किं करोमि प्रकृत्यैव सहे नान्यगुणोन्नतिम् // KAव्क्_५.२८ //
552 SK तद्गत्वा दानशीलस्य तस्य दानार्जितं यशः / करोम्येष शिरोयाच्ञाप्रतिषेधेन खण्डितम् // KAव्क्_५.२९ //
553 SK यशस्त्याज्यते दानोत्थं शिरश्चेन्न प्रदास्यति / अथ दास्यति विद्वेषप्रशान्तिर्मे भविष्यति // KAव्क्_५.३० //
554 SK इति संचिन्त्य सुचिरं स कौर्यकठिनः शठः / गन्धमादनपादाण्तवासी भद्रशिलां ययौ // KAव्क्_५.३१ //
555 SK इन्द्रजालप्रयोगज्ञः स कृत्वा प्रशमोचितम् / वेषं कलुषसंकल्पः पुरीं प्राप महीपतेः // KAव्क्_५.३२ //
556 SK अस्मिन् भववने नित्यं गुणदोषसमाकुले / कल्पवृक्षाः प्रजायन्ते जायन्ते च विषद्रुमाः // KAव्क्_५.३३ //
557 SK अशेषनाशपिशुनैर्घोरसंत्रासकारिभिः / दुर्निमित्तैरिव खलैः खेदः कस्य न दीयते // KAव्क्_५.३४ //
558 SK गुणिद्वेषः प्रकृत्यैव प्रकाशपरिपन्थिनः / दोषआश्रयस्य को भेदः खलस्य तिमिरस्य च // KAव्क्_५.३५ //
559 SK स्वच्छन्दघाती साधूनां विद्वेषविषदुःसहः / दीर्घपक्षः खलव्यालकरालः केन निर्मितः // KAव्क्_५.३६ //
560 SK तस्मिन् प्रविष्टे नगरं रूपिणी पुरदेवता / उवाचाभ्येत्य भूपालं संत्रासतरलेक्षणा // KAव्क्_५.३७ //
561 SK शिरोयाचक एष त्वां ब्रह्मबन्धुरुपागतः / वध्यो ऽसौ जीवितोच्छेदी जगतो जीवितस्य ते // KAव्क्_५.३८ //
562 SK निरुद्धो नगरद्वारि स मया मलिनाशयः / मम तद्दर्शनत्रस्तं धृतिं न लभते मनः // KAव्क्_५.३९ //
563 SK इति ब्रुवाणां भूपालः प्रोवाच पुरदेवताम् / अर्थिसंरोधसंजातलज्जया नमिताननः // KAव्क्_५.४० //
564 SK देवि याच्ञाभियातो ऽसौ प्रविशत्वनिवारितः / दिर्घोच्छ्वासं सहे नाहमाशावैफल्यमर्थिनः // KAव्क्_५.४१ //
565 SK याच्ञा प्रणयिनामर्थे पुण्यप्राप्तस्तनुव्ययः / युगसंख्यामपि स्थित्वा विपद्यन्ते हि देहिनः // KAव्क्_५.४२ //
566 SK एतदेव सुजातानां पूज्यं जगति जीवितम् / यदेषामग्रतो याति नार्थी भग्नमनोरथह् // KAव्क्_५.४३ //
567 SK क्रियतामानुकूल्यं मे भवत्या कुशलोचितम् / आशाविघाते संतापस्तस्य तूर्णं निवारताम् // KAव्क्_५.४४ //
568 SK इति भूमिभृतः श्रुत्वा वचो निश्चलनिश्चयम् / जगामादर्शनं देवी चिन्तासंतापमानसा // KAव्क्_५.४५ //
569 SK अथाययौ स कुटिलः खलः क्रकचचेष्टितः / दारुणः सरलस्यैव च्छेदाय स्वयमुद्यतः // KAव्क्_५.४६ //
570 SK तस्मिन्नृपगृहं प्राप्ते विवृतद्वारमर्थिनाम् / भूर्भूपतिक्षयभयाच्चकम्पे सधराधरा // KAव्क्_५.४७ //
571 SK नरेन्द्रचन्द्रमासाद्य स राहुरिच दुर्मुखः / समभ्यधाद्विधाय प्रागशिवार्थामिवाशिषम् // KAव्क्_५.४८ //
572 SK स्वस्ति राजन् द्विजन्मा हि विजने सिद्धिसाधकः / प्रातस्त्वामीप्सितप्राप्त्यै सर्वार्थिसुरपादपम् // KAव्क्_५.४९ //
573 SK दृष्टिर्वृष्टिरिवामृतस्य महती सौजन्यमित्रं मनः क्षान्तिः क्रोधरजःप्रमार्जनदी दुःखार्तमाता मतिः / लक्ष्मीर्दानजलाभिषेकविमला सत्योपयुज्क्तं वचः नित्यं यस्य स एक एव हि भवान् जातो जगद्बान्धवः // KAव्क्_५.५० //
574 SK सिद्धये कथितं कैश्चिच्चक्रवर्तिशिरो मम / दीयतां त त्वदन्यो वा दातुं शक्नोति कः परह् // KAव्क्_५.५१ //
575 SK सन्ति स्पष्टार्थदाश्चिन्तामणिकल्पद्रुमादयः / दुर्लभार्थप्रदातारो विरलास्तु भवद्विधाः // KAव्क्_५.५२ //
576 SK इत्युक्ते तेन नृपतिर्निष्कम्पविपुलाशयः / अर्थिसंदर्शनानन्दनिर्भरस्तमभाषत // KAव्क्_५.५३ //
577 SK धन्यो ऽहं यस्य मे ब्रह्मन्नर्थिनामर्थसिद्धये / निर्विकल्पोपकरणं व्ययं याति सुजीवितम् // KAव्क्_५.५४ //
578 SK कदा प्राणाः परार्थे मे प्रयान्तीति मनोरथः / किमेतानि न पुण्यानि प्रार्थ्यन्ते ते यदि त्वया // KAव्क्_५.५५ //
579 SK आहोपकरणसिद्ध्यै श्लाघ्यं मे गृह्यतां शिरः / तत्तदेव स्थिरं लोके यद्यदर्थिसमर्पितम् // KAव्क्_५.५६ //
580 SK इत्युक्ते हर्षयुक्तेन भूभुजा सत्त्वशालिना / तमूचतुर्महामात्यौ महाचन्द्रमहीधरौ // KAव्क्_५.५७ //
581 SK निजजीवितरक्षैव धर्मस्ते प्रथमः प्रभो / त्वयि जीवति जीवन्ति सर्वे जगति जन्तवः // KAव्क्_५.५८ //
582 SK न दातुमर्हसि शिरः सर्वाधारं हि ते वपुः / दीयतां ब्राह्मणायास्मै हेमरत्नमयं शिरः // KAव्क्_५.५९ //
583 SK सर्वार्थैरर्थिसार्थानां पूर्यन्ते यैर्मनोरथाः / तेषां संरक्षणेनैव सर्वं भवति रक्षितम् // KAव्क्_५.६० //
584 SK संकल्पो ऽयं द्विजस्यास्य क्रूरः कलुषचेतसः / मूलच्छेदोपजीव्यो हि न कल्पतरुरर्थिनाम् // KAव्क्_५.६१ //
585 SK हेमरत्नशिरः प्राप्य यात्वेष शिरसास्य किम् / चिन्तामणिर्विनिष्प्रेक्ष्यो भुज्यते न बुभुक्षितैः // KAव्क्_५.६२ //
586 SK इत्युक्ते मन्त्रिमुख्याभ्याम् हेमरत्नमयं शिरः / सिद्धो नैवोपयोग्यं तन्ममेति ब्राह्मणो ऽब्रवीत् // KAव्क्_५.६३ //
587 SK अथोन्मुमोच नृपतिर्मुकुटं मौक्तिकांषुभिः / श्रिरोविरहदुःखेन साश्रुधारमिवाभितः // KAव्क्_५.६४ //
588 SK मुकुटानि क्षणे तस्मिन्निपेतुः पुरवासिनाम् / दिग्दाहोन्मुखतुल्याभिरुल्काभिः सह भूतले // KAव्क्_५.६५ //
589 SK राज्ञा प्रदाने शिरसः सर्वथा परिकल्पिते / तौ चक्रतुस्तनुत्यागं मन्त्रिणौ द्रष्टुमक्षमौ // KAव्क्_५.६६ //
590 SK रत्नगर्भमथोद्यानं प्रविश्य पृथिवीपतिः / उत्फुल्लचम्पकस्याधः शिरश्छेत्तुं समुद्ययौ // KAव्क्_५.६७ //
591 SK उद्यानदेवता दृष्ट्वा तं शिरश्छेत्तुमुद्यतम् / मा कृथाः साहसं राजन्नित्युवाच शुचाकुला // KAव्क्_५.६८ //
592 SK कम्पमानाः प्रलापिन्यस्तं मत्तालुकुलस्वनैः / न्यवारयन्नवलता लोलपल्लवपाणिभिः // KAव्क्_५.६९ //
593 SK सो ऽपि निश्चलसंकल्पः प्रसाद्योद्यानदेवताम् / विमलां बोधिमालम्ब्य बभूव प्रणिधानवान् // KAव्क्_५.७० //
594 SK अस्मिन् रत्नमयोद्याने पुण्यराशिसमुन्नतम् / स्तूपमस्तु प्रशास्तुस्तु सत्त्वसंतारणोचितम् // KAव्क्_५.७१ //
595 SK यत्किंचिदर्जितं पुण्यं संकल्पेन मयामुना / भवन्तु तेन संसारे निःसंसाराः शरीरिणः // KAव्क्_५.७२ //
596 SK ध्यात्वेति चम्पकतरोः शाखायां नृपतिः शिरः / बद्ध्वा कचकलापेन छित्त्वा प्रादाद्द्विजन्मने // KAव्क्_५.७३ //
597 SK अथ नरपते सत्त्वोत्साहस्फुटप्रणिधानतः किमपि विमलैः पुण्यालोकैर्दिगन्तविसारिभिः / विगलितमहामोहौघान्तः श्रितः परिनिर्वृतिं प्रविरतभवाभ्यासायासः क्षणादबह्वज्जनह् // KAव्क्_५.७४ //
598 SK इति प्राग्जन्मवृत्तान्तकथया भगवान् जिनः / भिक्षूणाम् विदधे शुद्धदानसद्धर्मदेशनाम् // KAव्क्_५.७५ //
599 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां चन्द्रप्रभावदानं नाम पञ्चमः पल्लवः //
600 SK ६. बदरद्वीपयात्रावदानम् /
601 SK दानोद्यतानाम् पृथुवीर्यभाजां शुद्धात्मनां सत्त्वमहोदधीनाम् / अहो महोत्साहवताम् परार्थे भवन्त्यचिन्त्यानि समाहितानि // KAव्क्_६.१ //
602 SK हर्म्यारोहणहेलया यदचलाः स्वभ्रैः सहाभ्रंलिहा यद्वा गोष्पदलीलया जलभरक्षोभोद्धताह् सिन्धवः / लङ्घ्यन्ते भवनस्थलीकलनया ये चाटवीनां तटास् तद्वीर्यस्य महात्मनाम् विलसतः सत्त्वोर्जितं स्फूर्जितम् // KAव्क्_६.२ //
603 SK पुरा हि भगवान् बुद्धः श्रावस्त्यां पुरवासिनां / उपदेशप्रकाशेन जहाराज्ञानजं तमः // KAव्क्_६.३ //
604 SK भिक्षुसंघैः परिवॄतः स कदाचिद्वणिग्जनैः / कृतानुयात्रो मगधात् स्वयं चारिकया ययौ // KAव्क्_६.४ //
605 SK महार्थसार्थानुगतं व्रजन्तं वनवर्त्मना / तं दृष्ट्वा तस्करगणः सालाटव्यामचिन्तयत् // KAव्क्_६.५ //
606 SK एष प्रयातु बह्गवान् पुरः सत्त्वहिते रतः / पश्चात् सार्थं ग्रहीष्यामः पूर्णं द्रविणराशिभिः // KAव्क्_६.६ //
607 SK भगवानथ सर्वज्ञस्तेषां ज्ञात्वा समीहितम् / किमेतदिति तानूचे निर्विकारस्मिताननः // KAव्क्_६.७ //
608 SK ते तमूचुः परित्यज्य क्रौर्यं मधुरया गिरा / तत्प्रसादस्मितालोकैर्विनष्टतिमिरा इव // KAव्क्_६.८ //
609 SK भगवन् जीविकास्माकं निन्द्येयं कर्मनिर्मिता / न भृतिर्न कृषिर्नान्यरक्षणं न प्रतिग्रहह् // KAव्क्_६.९ //
610 SK सहजं क्रौर्यमस्माकं निसर्गकलुषात्मनाम् / क्रियते किं स्वभावस्य देव तीक्ष्णा हि कर्णिका // KAव्क्_६.१० //
611 SK तस्मान्न वृत्तिलोपो नः कर्तुमर्हसि गम्यताम् / याते तु त्वयि सार्थस्य वयं सर्वार्थहारिणह् // KAव्क्_६.११ //
612 SK इति तेषां वचः श्रुत्वा करुणापूर्णमानसः / दोलालोलायितमतिर्बभूव बह्गवान् क्षणम् // KAव्क्_६.१२ //
613 SK ततः सार्थधनं सर्वं परिसंख्याय तत्समम् / स ददौ चौरचक्राय तत्क्षणाप्तनिधानतः // KAव्क्_६.१३ //
614 SK तद्विधेन क्रमेणैव पुनः पथि गतागतैः / षट्कृत्वः प्रददौ तेभ्यः सो ऽर्थं सार्थस्य मुक्तये // KAव्क्_६.१४ //
615 SK पुनश्चोपगते तस्मिन् वर्त्मना तेन सानुगे / बभूव बुद्धिश्चओराणां तद्भोजननिमन्त्रणे // KAव्क्_६.१५ //
616 SK दृशा दिशन्ति वैमल्यं शुभं संभाषणेन च / व्रजन्ति संगमाभ्यासैः सन्तः सन्मार्गसेतुताम् // KAव्क्_६.१६ //
617 SK तत्रातिर्यग्दृशा सर्वं सर्वाकुशलसंक्षयात् / तेषां समाहितं शुद्धं विदधे भगवान् जिनह् // KAव्क्_६.१७ //
618 SK येषां संग्रहवस्तूनि वत्वारि नियतात्मनाम् / अर्थचर्या समानार्थब्ःआवस्त्यागः प्रियं वचः // KAव्क्_६.१८ //
619 SK येषां ब्रह्मविहाराश्च चत्वारः सत्त्वशालिनाम् / करुणा मुदितोपेक्षा मैत्री चेति परिग्रहः // KAव्क्_६.१९ //
620 SK येषां कुशलमूलानि सक्तानि त्रीणि चेतसि / अलोभश्चापरिद्वेषो ऽप्यमोहश्च महात्मनाम् // KAव्क्_६.२० //
621 SK दानशीलक्षमावीर्यध्यानप्रज्ञाजुषां सदा / उपायप्रणिधिज्ञानबलैराश्रितचेतसाम् // KAव्क्_६.२१ //
622 SK परित्राणैकवीराणां सदैवाद्वयवादिनाम् / विद्यात्रयप्रदीप्तानां चतुर्वैमल्यशालिनाम् // KAव्क्_६.२२ //
623 SK पञ्चस्कन्धवुमिक्तानां षडयतनभेदिनाम् / सप्तबोध्यङ्गयुक्तानामर्याष्टाङ्गोपदेशिनाम् // KAव्क्_६.२३ //
624 SK नवसंयोगहीनानाम् तेषां दशबलात्मनाम् / किं वस्त्वविदितं लोके जिनानां जनचेष्टितम् // KAव्क्_६.२४ //
625 SK ततस्तेष्वतिकारुण्याच्चरणालीनमूर्धसु / तथेत्युवाच भगवांस्तद्भोज्योपनिमन्त्रणे // KAव्क्_६.२५ //
626 SK तैस्तत्संदर्शनक्षीणकिल्बिषैः सममर्पितम् / भिक्षुस्ंघैर्वृतो भोज्यं विधिवत् सर्वमाददे // KAव्क्_६.२६ //
627 SK ततस्तत्प्रणिधानेन ज्ञानालोकशलाकया / ते समुन्मीलितदृशः प्रकाशं ददृशुः पदम् // KAव्क्_६.२७ //
628 SK ते सद्यस्तीव्रवैराग्यपरिपक्काः प्रसादिनः / प्रव्रज्यायोगमासज्य जग्मुर्जगति पूज्यताम् // KAव्क्_६.२८ //
629 SK तत्तेषां कुशलं दृष्ट्वा सहसोपनतं पुरः / बभाषे भगवान् पृष्टः किमेतदिति भिक्षुभिः // KAव्क्_६.२९ //
630 SK एतैर्यमायं संबन्धः सार्थरक्षणनिष्क्रयैः / द्वीपयात्रागतस्यासीदन्यस्मिन्नपि जन्मनि // KAव्क्_६.३० //
631 SK अस्ति विस्तीर्णमार्गस्य स्वर्गवर्गावधिर्विधेः / पुरी वाराणसी नाम कौशलोत्कर्षहर्षभूः // KAव्क्_६.३१ //
632 SK यस्याममलकल्लोलवाहिनी सुरवाहिनी / सदा दयेव हृदयं प्रसादयति देहिनाम् // KAव्क्_६.३२ //
633 SK अहिंसेव सताम् सेव्या विद्येव विदुषां मता / क्षमेव सर्वभूतानां या विश्रम्भसुखस्थितिः // KAव्क्_६.३३ //
634 SK ब्रह्मकल्पे नृपे तस्या विकसत्कमलाश्रये / ब्रह्मदत्ताभिधे लोकं त्रैलोक्यमिव रक्षति // KAव्क्_६.३४ //
635 SK प्रियसेनाभिधानो ऽभूत् तत्र वैश्रवणोपमः / सार्थवाहो ऽर्थसार्थानाम् स्थानमब्धिरिवाम्भसां // KAव्क्_६.३५ //
636 SK तस्यासीत् सुप्रियो नाम सौजन्यनिलयः सुतः / प्रययौ यं समाश्रित्य गुणसार्थः कृतार्थताम् // KAव्क्_६.३६ //
637 SK दानशीलक्षमावीर्यध्यानप्रज्ञासमन्वितह् / धात्रा विलोभवायैव यः कृतः सुकृतश्रियः // KAव्क्_६.३७ //
638 SK तं सर्वविद्याः विशदाः कलाश्च विपुलाशयम् / विविशुः सरसोदारा महोदधिमिवापगाः // KAव्क्_६.३८ //
639 SK गुणालंकृतचारित्रं लक्षणालंकृताकृतिम् / पुरुषोत्तमलुब्धेव यं श्लाघ्यं श्रीरशिश्रियत् // KAव्क्_६.३९ //
640 SK कालेन सुकृतक्रीतं पितरि त्रिदिवं गते / चक्रे स्कन्धतटे तस्य व्यवहारभरः स्थितिम् // KAव्क्_६.४० //
641 SK सो ऽचिन्तयदियं लक्ष्मीर्विपुलात्मक्रमागता / तथापि मन्ये पर्याप्ता न सर्वार्थिमनोरथे // KAव्क्_६.४१ //
642 SK किं तया सुमहत्यापि श्रिया सत्पुरुषस्थया / पूर्वागतार्थिउभुक्तेव या शेषार्थिषु निष्फला // KAव्क्_६.४२ //
643 SK रत्नाकरस्य वैपुल्यं निष्फलं वेधसा कृतम् / अद्यापि पूरितो येन नैको ऽप्यर्थी स वाडवः // KAव्क्_६.४३ //
644 SK अथवा पृथुसंकल्पः केनार्थी परिपूर्यते / जगामाब्धिरगस्त्यस्य चुलुकाचमनीयताम् // KAव्क्_६.४४ //
645 SK किं करोम्यतितापो ऽयं श्रीरेका बहवि ऽर्थिनः / न तदासाद्यते वित्तं यत् सर्वार्थिभरक्षमम् // KAव्क्_६.४५ //
646 SK पञ्च षट् पूरिता एवं नान्ये श्रीकौस्तुकादिभिः / इतिवाद्यापि तप्तो ऽन्तर्ज्वलदौर्वानलो ऽम्बुधिः // KAव्क्_६.४६ //
647 SK तस्मात् करोमि यत्नेन निंसंख्यद्रविणार्जनम् / न सहे दुःखनिःश्वासं विमुखस्य मुखे ऽर्थिनः // KAव्क्_६.४७ //
648 SK इति संचिन्त्य स चिरं सार्थेन महता वृतः / रत्नद्वीपपुरं गत्वा विदधे रत्नसंग्रहम् // KAव्क्_६.४८ //
649 SK ततः प्रतीपमायान्तं कृतार्थं तं वनेचराः / सार्थार्थरणोन्मुक्ता ददृशुर्दस्यवः पथि // KAव्क्_६.४९ //
650 SK सार्थार्थहरणे दृष्ट्वा स तेषां साहसोद्यमम् / निजसरव्स्वदानेन संररक्षानुयानिम् // KAव्क्_६.५० //
651 SK पुनः क्रमेण तेनैव रत्नद्वीपगतागतिः / सार्थत्राणाय चौराणां षट्कृत्वः प्रददौ धनम् // KAव्क्_६.५१ //
652 SK तथैव त्वां पुण्यविपन्वानिसंप्राप्तस्तथैव तान् (?) / ददर्श चौरान् सार्थार्थहरणे अधिकादरान् // KAव्क्_६.५२ //
653 SK सो ऽचिन्तयदहो वित्तैर्महद्भिः परिपूरिताः / मयैते न निवर्तन्ते परार्थहरणोद्यमात् // KAव्क्_६.५३ //
654 SK जगत् संपूरयाम्यर्थैरियुक्त्वापि मयासकृत् / अहो नु दस्यवो नैते वराकाः परिपूरिताः // KAव्क्_६.५४ //
655 SK अचितोत्साहहीनस्य व्याहतोत्तरवादिनः / विकत्थनप्रतिज्ञस्य धिङ्मे जन्म कुजन्मनः // KAव्क्_६.५५ //
656 SK इति चिन्तयतस्तस्य तप्तस्यानुशयाग्निना / विजने प्रययौ रात्रिः संवत्सरशतोपमा // KAव्क्_६.५६ //
657 SK तं शोकपङ्कसंमग्नं गजेन्द्रमिव निश्चलम् / दीर्घोच्छ्वासं महेशाख्या स्वप्ने प्रोवाच देवता // KAव्क्_६.५७ //
658 SK सुमते मा कृथाः शोकं शरीरोच्छोषणं वृथा / सत्संकल्पाभिरूढस्य भविष्यति तवेप्सितम् // KAव्क्_६.५८ //
659 SK न तदस्ति जगत्यस्मिन् स्वप्नसंकल्पदुर्लभम् / यन्न सिध्यति यत्नेन धीराणां व्यवसायिनाम् // KAव्क्_६.५९ //
660 SK सा काप्यनुपमा शक्तिरेकस्यापि द्विजन्मनः / यदाज्ञास्पन्दितेनैव विन्ध्यः क्ष्मासमताम् ययौ // KAव्क्_६.६० //
661 SK विषमं समतां याति दूरमायाति चान्तिकम् / सलिलं स्थलतामेति कार्यकाले महात्मनाम् // KAव्क्_६.६१ //
662 SK परार्थो ऽयं तवारम्भः फलत्येव न संशयम् / न भवन्ति विसंवादसंदिग्धाः सत्त्ववृत्तयः // KAव्क्_६.६२ //
663 SK रत्नानि बदरद्वीपे सन्ति त्रिदशसेविते / येषामेकप्रभावो ऽपि त्रिजगत्पूरणक्षमः // KAव्क्_६.६३ //
664 SK मर्त्यभूमिमतिक्रम्य सा हि भूमिर्महीयसी / आसाद्यते पुण्यमयी नासत्त्वैर्नाकृतात्मभिः // KAव्क्_६.६४ //
665 SK विषादस्त्यज्यताम् पुत्र स्थिरा बुद्धिर्विधीयताम् / बदरद्वीपयात्रायामुत्साहः परिगृह्यताम् // KAव्क्_६.६५ //
666 SK श्रूयतामेष तत्प्राप्त्यौ दिङ्भात्रानुक्रमक्रमः / स्फीतसत्त्वप्रभावस्त्वं संसारोत्तरणक्षमह् // KAव्क्_६.६६ //
667 SK अस्ति पश्चिमदिग्भागे समुल्लङ्घ्य महीयसाम् / शतानि सप्त द्वीपानां तथा सप्त महाचलान् // KAव्क्_६.६७ //
668 SK सप्तापताश्चानुलोमप्रतिलोमाभिधो ऽम्बुधिः / अनुकूलानिलैर्यस्मिन् पारमाप्नोति पुण्यवान् // KAव्क्_६.६८ //
669 SK ततस्तत्तुल्यनामाद्रिर्वातैस्तिमिरमिहकृत् / यत्राक्ष्णोर्दिशति स्वास्थ्यममोघाख्या महौषधिः // KAव्क्_६.६९ //
670 SK अथावर्ताभिधो ऽम्भोधिर्वैरम्भैर्यत्र वायुभिः / मज्जनोन्मज्जनैर्जन्तुः सप्तावर्तेषु तार्यते // KAव्क्_६.७० //
671 SK आवर्ताख्यस्ततः शैलः शङ्खनाभो निशाचरह् / घोरः प्राणहरो यत्र त्रिदशत्रासकृत् स्थितः // KAव्क्_६.७१ //
672 SK कृष्णसर्पावृता यत्र शन्खनाभिर्महौषधिः / त्रायते पुण्यसंपन्नं नेत्रे शिरसि चार्पिता // KAव्क्_६.७२ //
673 SK अथ नीलोदनामाब्धी रक्ताक्षो यत्र राक्षसः / मकर्याभिभूतां बुद्धविद्याविद्वान् वशे (?) // KAव्क्_६.७३ //
674 SK अथ नीलोदनामाद्रिर्नीलग्रीवः क्षपाचरः / प्रतीप्तनेत्रो यत्रास्ते रक्षसां पञ्चभिः शतैः // KAव्क्_६.७४ //
675 SK तत्रओषधिममोघाख्याम् रक्षत्याशीविषः सदा / दृष्टिनिः श्वाससंस्पर्शदंष्ट्रोत्सृजद्विषानलः // KAव्क्_६.७५ //
676 SK उपोषधव्रतवता मैत्रेण करुणात्मना / लभ्यते सा समुत्सार्य कृष्णसर्पं महौषधिः // KAव्क्_६.७६ //
677 SK तं रक्षःशकटं शैलं निष्फलश्लक्ष्णकन्दरम् / तामज्जने शिखायां च कृत्वा तरति पुण्यवान् // KAव्क्_६.७७ //
678 SK अथ वैरम्भनामाद्रिः पारे यस्योत्तरा तटे / घोरा ताम्राटवी नाम महाशालवनान्तरा // KAव्क्_६.७८ //
679 SK महानजगरस्तत्र ताम्राक्षो नाम दुःसहः / आस्त यस्योग्रगन्धेन वायुनैव न जीव्यते // KAव्क्_६.७९ //
680 SK षण्मासान् स्वपतो यस्य लाला व्याप्नोति योजनम् / क्षुत्संतप्तस्य षण्मासानल्पीभवति जाग्रतः // KAव्क्_६.८० //
681 SK वेणुगुल्मशिलाबद्धां गुहामुत्पाट्य मेदिनीम् / प्रायौषधीं दिवारात्रं ज्वलन्तीमञ्जनोचिताम् // KAव्क्_६.८१ //
682 SK तस्मादजगराद् घोरादन्यतो वा महौजसः / अवैराख्यां बुद्धविद्यां जपतो न भवेद्भयम् // KAव्क्_६.८२ //
683 SK ततः सप्त महाशैला वेणुकण्टकसंकटाः / ताम्रपटाङ्कपादेन तीर्यन्ते वीर्यशालिना // KAव्क्_६.८३ //
684 SK ततश्च शाल्मलीवनं सप्त क्षारतरङ्गिणीः / उत्तीर्यासाद्यते प्राङ्गुस्त्रिशङ्कुर्नाम पर्वतः // KAव्क्_६.८४ //
685 SK तत्र त्रिशङ्कवो नाम कण्टका वज्रभेदिनः / पादयोर्न विशन्त्येव ताम्रपट्टावनद्धयोः // KAव्क्_६.८५ //
686 SK त्रिशन्कुर्नाम तटिनी तत्रायःशङ्कुपर्वतः / उपस्कीलनदी तत्र ततो द्विधा द्विधा सरित् // KAव्क्_६.८६ //
687 SK अथाष्टादशवक्राख्यः पर्वतो निरवग्रहः / तत्तुल्यसंज्ञाथ नदी श्लक्ष्णि नाम गिरिस्ततः // KAव्क्_६.८७ //
688 SK अथाद्रिधूमनेत्राख्यो धूमनिर्दिग्धदिक्तटः / दृष्टिस्पर्शविषैर्व्याप्तः क्रूराशीविषमण्डलैः // KAव्क्_६.८८ //
689 SK तन्मूर्ध्नि पल्वलस्यान्तः शिलाबद्धा महागुहा / ज्योतीरसो मणिर्यस्यां जीवनी च महौषधिः // KAव्क्_६.८९ //
690 SK भित्त्वा गुहाम् तदभ्यक्रशिरःपादकरोदरः / वज्र-मन्त्रबलोपेतः क्रूरसर्पैर्न बाध्यते // KAव्क्_६.९० //
691 SK अथोग्रसत्त्वसंकीर्णाः सप्ताशीविषपर्वताः / नद्यश्च तद्विधा यासामपारवारिसंपदः // KAव्क्_६.९१ //
692 SK एतदुत्तीर्य निखिलं पुण्यैः परहितोद्यतः / आरोहति सुधाशैलं शृङ्गैरालिङ्गिताम्बरम् // KAव्क्_६.९२ //
693 SK ततस्तस्यापरे पार्श्वे कल्पवृक्षोपशोभितम् / पुरं रोहितकं नाम दृश्यते स्वर्गसंनिभम् // KAव्क्_६.९३ //
694 SK अस्ति तत्र मघो नाम मघवानिव विश्रुतः / सार्थवाहो महासत्त्वः सर्वसत्त्वहिते रतः // KAव्क्_६.९४ //
695 SK बदरद्वीपयात्रायामुद्यतस्यानवद्यधीः / मार्गोपदेशं देशज्ञः स ते सर्वं करिष्यति // KAव्क्_६.९५ //
696 SK इत्युक्त्वोत्साह्य बहुशः शुभद्रैरिव सुप्रियम् / वचोभिरिचितैर्देवी सहसान्तरधीयत // KAव्क्_६.९६ //
697 SK प्रबुद्धः सुप्रियः सर्वं तत्तथेति विचिन्तयन् / प्रतस्थे सत्त्वमारुह्य निजोत्साहपुरःसरः // KAव्क्_६.९७ //
698 SK स व्रजन् विनितायासस्तेन निर्दिष्टवर्त्मना / पुण्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः प्राप र्फितकं पुरम् // KAव्क्_६.९८ //
699 SK अत्रान्तरे कर्मयोगात् तत्र सार्थपतिर्मघः / व्याधिना दुश्चिकित्स्येन बभूवास्वस्थविग्रहः // KAव्क्_६.९९ //
700 SK अलब्धान्तःप्रवेशो ऽथ गृहे राजगृहोपमे / तस्य व्यलम्बत द्वारं सुप्रियः कार्यसिद्धये // KAव्क्_६.१०० //
701 SK ततो वैद्यापदेशेन स प्रवेशमवाप्तवान् / उपयोगकथाप्रज्ञा न कस्यादरभूमयः // KAव्क्_६.१०१ //
702 SK आयुर्वेदविधानज्ञः स तस्यारिष्टलक्षणैः / षण्मासशेषमेवायुर्ज्ञात्वा चिन्तान्तरो ऽभवत् // KAव्क्_६.१०२ //
703 SK तस्य प्रियहितप्रायो भैषज्यपरिचर्यया / अत्यल्पेनैव कालेन सुप्रियः प्रियतां ययौ // KAव्क्_६.१०३ //
704 SK भैषज्ययुक्तिस्तत्प्रीत्या तस्य वल्लभतां ययौ / प्रियोपनीतं यत्किं चित् तत्सर्वं मनसः प्रियम् // KAव्क्_६.१०४ //
705 SK प्रियोपचारैस्तस्याथ व्याधिराद्रावमाययौ / आधिः शाम्यति सत्सङ्गात् तओ व्याधिर्विशीर्यते // KAव्क्_६.१०५ //
706 SK ततः संजातविश्रम्भः सुप्रियः प्रणयान्मघम् / चक्रे विदितवृत्तान्तं पश्चान्निजकथाक्षणे // KAव्क्_६.१०६ //
707 SK बदरद्वीपयात्रायां तस्योत्साहं महात्मनह् / परार्थे निश्चलं ज्ञात्वा तमूचे विस्मयान्मघः // KAव्क्_६.१०७ //
708 SK अहो बतास्मिन् संसारे विःसारे साररूपिणः / जायन्ते मणयः केचित् परचिन्तापरायणाः // KAव्क्_६.१०८ //
709 SK नवं वयः प्रिया मूर्तिः परार्थप्रवणं मनः / पुण्योचितस्तथैवायं स्थाने गुणसमागमः // KAव्क्_६.१०९ //
710 SK इयतीं भूमिमुल्लङ्घ्य परार्थे त्वमुपागतः / करोमि तव साहाय्यं किं त्वहं भृशमातुरः // KAव्क्_६.११० //
711 SK निबद्धावधयः प्राणाः प्रयान्त्येव शरीरिणाम् / ते व्रजन्तु ममान्ते ऽपि त्वत्समाहितहेतुताम् // KAव्क्_६.१११ //
712 SK एवमेव व्ययो यस्तु व्ययः स परिगण्यते / परार्थे जीवितस्यापि व्ययो लाभशतैः समः // KAव्क्_६.११२ //
713 SK न मया बदरद्वीपं दृष्टं किं तु श्रुतं मया / महाब्धौ दिस्कमुद्देशं तैस्तैर्जानामि लक्षणैः // KAव्क्_६.११३ //
714 SK इत्युक्त्वा भूपतिं सुहृद्बन्धुवाक्ये ऽप्यनादरः / स मङ्गलप्रवहणं सुप्रियेण सहादधे // KAव्क्_६.११४ //
715 SK ततः प्रवहणारूढौ तौ योजन्शतान्यपि / पवनस्यानुलोम्येन जग्मतुर्विपुलाशयौ // KAव्क्_६.११५ //
716 SK स्थाने स्थाने जलं दृष्ट्वा नानावर्णं महोदधेः / किमेतदिति प्रपच्छ सुप्रियः कौतुकान्मघम् // KAव्क्_६.११६ //
717 SK जले लोहाचलाः पञ्च सन्त्यस्य पयसां निधेः / ताम्ररूप्यमयाश्चान्ये हेमरत्नमयाः परे // KAव्क्_६.११७ //
718 SK तेषां छायाविशेषेण नानावर्णः पदे पदे / दृश्यते ऽब्धिरयं दीप्तः प्राप्तान्तरोद्गतौषधिः // KAव्क्_६.११८ //
719 SK इत्युक्त्वा व्याधिनाक्रान्तः प्राप्तकालावधिर्मघः / प्राणान्मुमोच सत्कीतिविन्यस्तस्थिरजीवितः // KAव्क्_६.११९ //
720 SK वज्रलेपादपि दृढं यथा सत्त्वं महात्मनाम् / तथा यदि भदेदायुः किमसाध्यं भवे बह्वेत् // KAव्क्_६.१२० //
721 SK कूलावाप्तप्रवहणह् सुप्रियस्तद्वियोगजम् / शुचं संस्तभ्य विदधे सुहॄदस्तनुसत्क्रियाम् // KAव्क्_६.१२१ //
722 SK एतदेवोन्नतं लक्ष्म सत्त्वोत्साहमहात्मनाम् / विच्छिन्नालम्बने काले यत्कर्तव्यदृढं मनः // KAव्क्_६.१२२ //
723 SK पुनः प्रवहणारूढः स समुत्तीर्य वारिधिम् / रत्नपर्वतपार्श्वेन विवेश विकटाटवीम् // KAव्क्_६.१२३ //
724 SK न वियोगैर्न चोद्वेगैर्नाभियोगैर्द्विषामपि / न रोगैः क्लेशभोगैर्वा हीयते महतां मतिः // KAव्क्_६.१२४ //
725 SK स तत्राक्रान्तगगनं निरुद्धाशेषदिक्तटम् / दुरारोहं ददर्शाग्रे मूर्तं विघ्नमिवाचलम् // KAव्क्_६.१२५ //
726 SK उपायहीनस्तं दृष्ट्वा गिरिं मूर्खमिवोद्धतम् / अधः पल्लवशय्यायाम् सुप्तः सो ऽचिन्तयत् क्षस्णम् // KAव्क्_६.१२६ //
727 SK अहो बत कियान् कालः प्रयातः प्रस्थितस्य मे / बदरद्वीपनामापि न नाम श्रूयते क्कचित् // KAव्क्_६.१२७ //
728 SK व्यवसायसहायो मे यो ऽभूत्पुण्यपणैः परम् / भग्नप्लव इवाकाले सो ऽपि कर्मोर्मिविप्लवैः // KAव्क्_६.१२८ //
729 SK नष्टोपाये ऽप्युपाये ऽस्मिन् व्यवसायान्महीयसः / न नाम विनिवर्ते ऽहं सिद्धिर्निधनमस्तु वा // KAव्क्_६.१२९ //
730 SK तदेकं जन्मयात्रासु पूज्यं जन्म जगत्र्त्रये / यस्मिन् परोपक्राराय जायते जीवितव्ययः // KAव्क्_६.१३० //
731 SK इति चिन्ताकुलं तत्र तं ज्ञात्वा सत्यसागरम् / नीलो नाम समभ्येत्य यक्षः प्राहाचलाश्रयः // KAव्क्_६.१३१ //
732 SK पूर्वेण योजनं गत्वा त्रीणि शृङ्गाणि भूभृतः / वेत्रसोपाननिश्रेण्या समारुह्याथ गम्यताम् // KAव्क्_६.१३२ //
733 SK इति यक्षोपदेशेन स विलङ्घ्य महाचलम् / ददर्शाग्रे समुत्तुङ्गश्रृङ्गं स्फटीकभूधरम् // KAव्क्_६.१३३ //
734 SK तस्मिन्नेकशिलाश्लक्ष्णे दुर्गमे पक्षिणामपि / मुहूर्तमभवत्तस्य निर्व्यापारो मनोरथः // KAव्क्_६.१३४ //
735 SK अभ्युन्नतम् निरालम्बं स्वसंकल्पमिवाचलम् / स तं विचार्य सुचिरं चित्रन्यस्त इवाभवत् // KAव्क्_६.१३५ //
736 SK अथ चन्द्रप्रभो नाम यक्षः शैलगुहाशयः / अभ्येत्यः सत्त्वसंपन्नं तमभाषट वुस्मितः // KAव्क्_६.१३६ //
737 SK क्रोशमात्रमितो गत्वा पूर्वेणापूर्वविभ्रमम् / दृश्यते चन्दनवनं बालानिलचलल्लतम् // KAव्क्_६.१३७ //
738 SK तत्रास्ते प्रसरा नाम गुहालीना महौषधिः / लभ्यते देहरक्षायै समुत्तोल्य महाशिलाम् // KAव्क्_६.१३८ //
739 SK तत्प्रभावकृतालोकं सोपानैः स्फटिकाचलम् / सहसैव समारुह्य गम्यतामीप्सिताप्तये // KAव्क्_६.१३९ //
740 SK तत्क्षणात् कृतकार्थेव सा प्रयाति महाउषधिः / न खेदस्तत्कृते कार्यस्तडिल्लोलाः प्रियाप्तयः // KAव्क्_६.१४० //
741 SK इति यक्षोपदिष्टेन विधानेन स भूधरम् / समुत्क्रम्य ददर्शाग्रे नगरं हेममन्दिरम् // KAव्क्_६.१४१ //
742 SK मेरूकूटैरिवाकीर्णं प्रकाशैरिव निर्मितम् / सवाश्चर्यैरिव कृतं तद् दृष्ट्वा विस्मितो ऽभवत् // KAव्क्_६.१४२ //
743 SK महाहेमकपाटाभ्यां रुद्धद्धारम् विलोक्य तत् / निर्जनं वारसंचारं वनान्ते निषसाद सः // KAव्क्_६.१४३ //
744 SK अत्रान्तरे दिनस्यान्ते व्योमानन्तपथाध्वगः / अवापास्ताचलोपान्तं परिश्रान्त इवांशुमान् // KAव्क्_६.१४४ //
745 SK अस्तं गते सहस्रांशौ रजनीरमणी शनैः / तारापतिमिवान्वेष्टुं प्रससाराभिसारिका // KAव्क्_६.१४५ //
746 SK अथ प्रकाशविबह्वैः सर्वाशापूरणोन्मुखः / बोधिसत्त्व इव स्वच्छः सुधादीधितिरुद्ययौ // KAव्क्_६.१४६ //
747 SK स्फीटा तमः समूहस्य निःशेषप्रशमोचिता / मानसोल्लासिनी ज्योत्स्ना सत्त्ववृत्तिरिवाबभौ // KAव्क्_६.१४७ //
748 SK तमोमोहं जहारेन्दुर्दिशां दिनवियोगजम् / परोपकारे हि परो दूरारोहो महात्मनाम् // KAव्क्_६.१४८ //
749 SK सुप्रियश्चन्द्रकिरणैः पूर्यमाणतनुः क्षणम् / निद्रां कार्यसमुद्रोर्मिक्षोभमुद्रामवाप्तवान् // KAव्क्_६.१४९ //
750 SK क्षपायाम् क्षीयमाणायां गुणदाक्षिण्यसादरा / जगाद देवता स्वप्ने महेशाख्या समेत्य तम् // KAव्क्_६.१५० //
751 SK अहो बत महासत्त्व सत्तत्त्वाभिनिवेशिना / परार्थे विपुलः क्लेशः कृतः सुकृतिना त्वया // KAव्क्_६.१५१ //
752 SK अल्पशेषे प्रयासे ऽस्मिन् नोद्वेगं कर्तुमर्हसि / अपर्युषितसत्त्वानां स्वाधीनाः सर्वसिद्धयः // KAव्क्_६.१५२ //
753 SK हैमं यदेतन्नगरं त्रीणि चान्यान्यतः परम् / सन्ति रत्नपुराण्यत्र विचित्राण्युत्तरोत्तरम् // KAव्क्_६.१५३ //
754 SK तेभ्यो निर्यान्ति किन्नर्यश्चतश्रो ऽष्टौ च षोडश / द्वात्रिंशच्च क्रमेणैव त्वया द्वारि विघट्टिते // KAव्क्_६.१५४ //
755 SK जितेन्द्रियस्य भवतस्तत्प्रमादमवेदिनः / किमन्यदचिरेणैव् वाञ्छिताप्तिर्भविष्यति // KAव्क्_६.१५५ //
756 SK इत्युक्तः सादरं देव्या प्रतिबुद्धो ऽथ सुप्रियः / जघान नगरद्वारं त्रिः समभ्येत्य पाणिना // KAव्क्_६.१५६ //
757 SK ततश्चतस्रः क् इन्नर्यो निर्ययुस्तरलेक्षणाः / आश्चर्यतरुमञ्जर्य इव लीलानिलाकुलाः // KAव्क्_६.१५७ //
758 SK मानसिल्लासकारिण्यो नयनामृतवृष्टयः / वदनेन्दुसमुद्योतैर्दिवापि कृतचन्द्रिकाः // KAव्क्_६.१५८ //
759 SK ताः संपूज्य स्मरोदारं सुप्रियं प्रियदर्शनाः / तस्याभिलाषप्रणयैरातिथ्यमिव चक्रिरे // KAव्क्_६.१५९ //
760 SK चन्द्रकान्तसमासीनं कृतासनपरिग्रहाः / जीवनौषधयो जाताः स्मरस्येव सविग्रहाः // KAव्क्_६.१६० //
761 SK तास्तमूचुः समुन्मीलद्विलासहसितत्विषः / ददत्य इव कर्पूरं प्रेमोपायनताम् पुरः // KAव्क्_६.१६१ //
762 SK अहो धन्या वयं यासां सद्गुणालकृताकृतिः / स्वयएम्वाभिगम्यो ऽपि भवानद्यागतो गृहम् // KAव्क्_६.१६२ //
763 SK विधेषः कस्य पीयूषे चन्दने कस्य वारुचिः / इन्दौ मन्दादरः को वा साधुः कस्य न संमतः // KAव्क्_६.१६३ //
764 SK स्त्रीणां यद्यपि सौभाग्यभङ्गाय प्रणयः स्वयम् / क्रमस्त्वद्दर्शनेनैव तथापि मुखरीकृताः // KAव्क्_६.१६४ //
765 SK इदं च किन्नरपुरं वयं च प्रणयार्पिताः / रत्नं च सौभाषणिकं साधो स्वाधीनमेव ते // KAव्क्_६.१६५ //
766 SK इति तासां वचः श्रुत्वा सुप्रियः प्रणयोचितम् / उवाच सत्त्वधवलां दिशन् दशनचन्द्रिकाम् // KAव्क्_६.१६६ //
767 SK बहुमानास्पदं कस्य नेदं संभाषणामृतम् / आत्मनो ऽप्यादरस्थानम् बह्वतीभिः कृतादरः // KAव्क्_६.१६७ //
768 SK श्लाघ्यं दर्शनमेवेदं तत्राप्ययमनुग्रहः / मुक्तालतास्तापहराः किं पुनश्चन्दनोक्षिताः // KAव्क्_६.१६८ //
769 SK एवं विधानाम् स्वच्छानामैन्दवीनामिव त्विषाम् / आकृतीनाम् समुचिता रुचिरा लोकवृत्तयः // KAव्क्_६.१६९ //
770 SK औचित्यचारुचरितं प्रसादविशदं मनह् / वात्सल्यपेशला वाणी न कस्यादरभूमयः // KAव्क्_६.१७० //
771 SK गृहीतो ऽस्माभिराचारः पूजापरिकरोचितह् / आत्मार्पणं कुलान्तं वः परायत्ता हि योषितः // KAव्क्_६.१७१ //
772 SK कन्याभावादपक्रान्ता यूयं परपरिग्रहाः / विश्रम्भेण भगिण्यो मे जनन्यः स्नेहगौरवात् // KAव्क्_६.१७२ //
773 SK परवित्तं विषं येषां जनन्यश्चान्ययोषितः / परहिंसात्महिंसौव पक्षास्तेषां निरत्ययाः // KAव्क्_६.१७३ //
774 SK पौशुन्यासत्यपारुष्यभिन्नवादोज्झितं वचः / सदैव वदने येषाम् तेषाम् सर्वाशिषा दिशः // KAव्क्_६.१७४ //
775 SK अभिध्यारहितं चेतो व्यापारपरिवर्जितम् / मिथ्यादृष्टिविहीनं च येषां ते सत्पथं श्रिताः // KAव्क्_६.१७५ //
776 SK दशाकुशलमार्गेभ्यो निर्गतानां निसर्गतः / एते कुशलवर्गस्य मार्गाः स्वर्गे निरर्गलाः // KAव्क्_६.१७६ //
777 SK धीरेव धन्यं धनमुन्नतानां विद्यैव चक्षुर्विजितेन्द्रियाणाम् / दयैव पुण्यं पुरुषोत्तमानां आत्मैव तीर्थं शुचिमानसानाम् // KAव्क्_६.१७७ //
778 SK एवंविधो ऽयं गुणसंनिवेशः शीलेन वैमल्यमुपैति पुंसाम् / सद्रत्नमुक्तानिकरातिरितं शीलं सतामाभरणं वदन्ति // KAव्क्_६.१७८ //
779 SK इत्युक्तमाकर्ण्य गुणानुरूपं सत्त्वार्थिना तेन जितेन्द्रियेण / तुष्टास्तमूचुर्भुवि चन्द्रलोकं ताः कौतुकायैवमुखैः सृजन्त्यः // KAव्क्_६.१७९ //
780 SK मणेरिवानर्घगुणोज्ज्वलस्य दृष्टैव साधोरुचिता रुचिस्ते / ययैव मौलौ हृदये श्रुतौ च सद्भिः सदैवाभरणीकृतो ऽसि // KAव्क्_६.१८० //
781 SK मणिर्महार्हः प्रथितप्रभावः प्रगृह्यतामात्मसमस्त्वयायम् / ध्वजार्पितो वर्षति योजनानां सहस्रमेवार्थिसमीहितं यः // KAव्क्_६.१८१ //
782 SK उक्त्वेति रत्नप्रवरं तरुण्यस्तस्मेइ ददुर्मूर्तमिव प्रसादम् / आदाय तं च प्रणयोपचारं सो ऽपि द्वितीयं पुरमाप रौप्यम् // KAव्क्_६.१८२ //
783 SK तत्रादरात्तद्द्विगुणाभिरेव स पूजितह् किन्नरकामिनीभिः / क्रमेण तेनैव विशुद्धबुद्धिर्लेभे मणिं तद्द्विगुणप्रभावम् // KAव्क्_६.१८३ //
784 SK * * * * * * * * * * * * * * * * / * * * * * * * * * * * * * * * * // KAव्क्_६.१८४ //
785 SK प्राप्तश्च तं रत्नमयं चतुर्थं पुरं ततः सर्वपुराधिकश्चि / सो ऽभ्यर्थितस्तद्द्विगुणाभिरग्रे गुणाधिकः किन्नरसुन्दरीभिः // KAव्क्_६.१८५ //
786 SK तथैव सद्धर्मकथाप्रसङ्गैस्तातोषितास्तेन सुसंयतेन / उत्फुल्लनीत्पलदामदीर्घकटाक्षविक्षिप्तकरास्तमूचुः // KAव्क्_६.१८६ //
787 SK भ्रातास्ति नः किन्नरराजवंशरत्नाकरेन्दुर्बदराभिधानः / तस्यास्पदं द्वीपमिदं महार्हं स्वनामचिह्नं प्रथितं समृद्ध्या // KAव्क्_६.१८७ //
788 SK रत्नं चेदम् नियमविधिना पोषधाख्यव्रतेन न्यस्तं भास्वत्किरणनिकरं पुण्यभाजां प्रयत्नात् वर्षत्येव स्थिरपरहितव्याप्तये गृह्यताम् तत् // KAव्क्_६.१८८ //
789 SK इत्युत्पाट्यामरतरुफलं सादरं सुन्दरीभिः प्रेमोद्दामप्रणयसुभगं दत्तमासाद्य रत्नम् / बालाहाख्यं विजितपवनं तं प्रकृष्टं तुरङ्गं सो ऽप्यारुह्य स्वनगरमगाल्लब्धमार्गोपदेशः // KAव्क्_६.१८९ //
790 SK तस्मिन् काले विपुलकुशलैः स्वर्गमार्गं प्रयाते वाराणस्यां विशदयशसि क्ष्मापतौ ब्रह्मदत्ते / श्रीमान् सर्वप्रणयिफलदः सुप्रियः पौरमुख्यैर् लोकत्राणे विनिहितमतिर्धर्मराज्ये ऽभिषिक्तः // KAव्क्_६.१९० //
791 SK ततः शिरःस्नानविधिक्रमेण तत्पञ्चदश्याम् ध्वजमूर्ध्नि रत्नम् / स पोषधोपोषित एव धृत्वा चकार विश्वं परिपूर्णकामम् // KAव्क्_६.१९१ //
792 SK कृत्वा यात्राम् परहितफलां वत्सराणाम् शतेन स्थित्वा राज्ये महति निखिलं पूरयित्वा च लोकम् / पुत्रं धृत्वा नरपतिपदे प्राप्य सर्वोपशान्तिं तत्त्वज्ञो ऽसौ किमपि परमं ब्रह्मभावं जगाम // KAव्क्_६.१९२ //
793 SK स्युरेते दस्यवः सर्वे पूर्वं ये पूरिता मया / रत्नद्रीपाभिगमने तस्मिन् सुप्रियजन्मनि // KAव्क्_६.१९३ //
794 SK इति शास्ता स्ववृत्तान्तकथया विदधे विभुः / दानवीर्योपदेशेन भिक्षूणामनुशासनम् // KAव्क्_६.१९४ //
795 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां बदरद्वीपयात्रावदानं नाम षष्ठः पल्लवः //
796 SK ७. मुक्तालतावदानम् /
797 SK कुश्लप्रणिधानशुद्धधान्मां विमलालोकविवेकबोधकानाम् / परिकीर्तनमात्रमेव येषां भवमोहापहतेस्त एव धन्याः // KAव्क्_७.१ //
798 SK पुरा पर्षत्सहस्राणां न्यग्रोधोपवनस्थितिः / कपिलाख्ये पुरे चक्रे भगवान् धर्मदेशनाम् // KAव्क्_७.२ //
799 SK अमन्दानन्दसंदोहस्यन्दि चन्दनशीतलम् / तस्य वागमृतं धन्याः कृताङ्जलिपुटाः पपुः // KAव्क्_७.३ //
800 SK राजा शुद्धोदनस्तत्र धर्मश्रवणसंगमे / पुण्योपदेशसलिलैर्लेभे वैमल्यनिर्वृतिम् // KAव्क्_७.४ //
801 SK अथ तत्र महानामा शाक्यराजकुलोद्भवः / धर्मोपदेशमाकर्ण्य प्रातः स्वगृहमब्रवीत् // KAव्क्_७.५ //
802 SK अहो नु भगवान् बुद्धो धर्मः संघश्च सिद्धये / बुद्धोत्पादो ऽयमस्माकं निर्वाणाय महाफलः // KAव्क्_७.६ //
803 SK उपदेशविशेषाप्तानिर्वृतेस्तस्य तद्वचः / श्रुत्वा शशिप्रभा पत्नी प्रणयात्तमभाषतः // KAव्क्_७.७ //
804 SK अनुग्राह्या भगवतः पुरुषाः पुण्यभागिनह् / निन्द्यास्तदुपदेशानामनर्हा योषितो वयम् // KAव्क्_७.८ //
805 SK इति जायावचः श्रुत्वा स जगाद जगद्गुरोः / भद्रे भगवतो नास्ति भेदः कारुण्यदर्शने // KAव्क्_७.९ //
806 SK समा सर्वत्र भा भानोः समा वृष्टिः पयोमुचः / समा भगवतो दृष्टिः सर्वसत्त्वानुकम्पिनः // KAव्क्_७.१० //
807 SK महाप्रजापतेर्वाक्यादपराह्णक्षणं तपः / शुद्धोदनः करोत्येव राजा बह्गवतो ऽन्तिके // KAव्क्_७.११ //
808 SK इति पत्युः प्रियगिरा वृता शाक्याङ्गनागणैः / याचने तद्भगवतह् सा पुण्योपवनं ययौ // KAव्क्_७.१२ //
809 SK सा सत्वकुसुमं तत्र तं ददर्श महाफलम् / प्रशमामृतसंसिक्तं करुणाकल्पपादपम् // KAव्क्_७.१३ //
810 SK लतेव पवनानम्रा तं दूरात् प्रणनाम सा / लोभेनेव परित्यक्रा च्युतकर्णोत्पलच्छलात् // KAव्क्_७.१४ //
811 SK विलोक्य काञ्चनरुचिं रत्नभूषणभूषिताम् / आनन्दनामा भिक्षुस्तामुवाच प्रहितोद्यतः // KAव्क्_७.१५ //
812 SK वेषः प्रशमशून्यो ऽयं मातर्मुनितपोवने / दर्पोत्सिक्तो न युक्तस्ते विरक्तानामिदं पदम् // KAव्क्_७.१६ //
813 SK गुणसंयमसिक्तानि मुखराभ्रणान्यहो / नेहास्तद्ग्रहणं युक्तमितीवोपदिशन्ति ते // KAव्क्_७.१७ //
814 SK इत्युक्ता तेन सा तन्वी वैलज्यविनतानना / उन्मुच्याभरणं सर्वं प्राःइणोन्निजमद्निरम् // KAव्क्_७.१८ //
815 SK उपविष्टेषु सर्वेषु निर्दिष्टकुशलस्ततः / अनित्यतैवं भगवानुपदेशं प्रवक्रमे // KAव्क्_७.१९ //
816 SK महामोहप्रभावो ऽयं येन नित्यमनित्यताम् / नित्यतामिव मन्यन्ते मूढा जगति जन्तवः // KAव्क्_७.२० //
817 SK असत्ये रमते लोकः सत्यप्रत्ययमोहितः / न वेत्ति सर्वभावानामभावानुभवां स्थितिम् // KAव्क्_७.२१ //
818 SK केचिद् व्याकरणैः परे श्रुतिपथैस्तर्कप्रवादैः परे केचित्तन्त्रपरिग्रहैर्बहुविधैरन्यैः कलाकौशलैः / संसक्ताः पुनरुक्तजन्मशरणौ याता सहैव क्षयं तत्राप्यक्ष्ययलीलया क्षणपदं मुग्धौर्निबद्धा धृतिः // KAव्क्_७.२२ //
819 SK विषयविषमापायः कायः प्रपञ्च(म)याशया खरतरमरुस्फाराकारो मोहभावो भवः / हितभूमि (?) तथाकार्यं कार्यं विवेकिनां तथा निरवधिरयं दृष्ट्वा व्याधिर्यथा (हि) निवर्तते // KAव्क्_७.२३ //
820 SK इत्याद्यनित्यसंस्कारसंयुक्तं युक्तमुद्यते / धर्मोपदेशकुशलं वक्तुं भगवति स्वयम् // KAव्क्_७.२४ //
821 SK एका शाक्यवधूस्तत्र रूपसौभाग्यगर्विता / स्थिता शौशवतारुण्यसंघौ वयसि दुःसहे // KAव्क्_७.२५ //
822 SK मुक्ताहारं स्तनतटे लोलापाङ्गैर्मुहुर्मुहुः / आलिलोके यशःस्फारसारं रतिपतेरिव // KAव्क्_७.२६ //
823 SK हारावलोकिनीं दृष्ट्वा तामनेकाग्रहादसौ / अचिन्तयाद्विरक्तेन मगत्पत्नी शशिप्रभा // KAव्क्_७.२७ //
824 SK इयं धर्मोपदेशे ऽपि चपला हारमीक्षते / भावानां न शृणोत्येव मूढा क्षणिकतामिमाम् // KAव्क्_७.२८ //
825 SK स्वं हारं दर्शयित्वास्या हारोत्साहं हराम्यहम् / अधिकालोकनेनैव दर्पः शाम्यति देहिनाम् // KAव्क्_७.२९ //
826 SK इति संचिन्त्य सा दासीं रोहिकाख्यामभाषत / रोहिके गच्छ मे हारं गृहात् सत्वरमाहर // KAव्क्_७.३० //
827 SK इत्युक्ता सा तया तत्र प्रवृत्ते धर्मसंश्रवे / अकालगमनोद्विग्ना निःश्वस्याचिन्तयत् क्षणम् // KAव्क्_७.३१ //
828 SK अहो बतान्तरायो ऽयं संजातः कुशले मम / नास्मिन् श्रोतुं लभे धर्मं यत्परायत्तजीविता // KAव्क्_७.३२ //
829 SK पुण्यसौरभसंभारात् कीर्णकारुण्यकेसरात् / मुखपद्माद् भगवतो धन्यः प्राप्नोति वाङ्भधुः // KAव्क्_७.३३ //
830 SK अहो स्वाच्छन्द्यविच्छेदस्तनुभङ्गः सुखक्षयः / सेवा जगति जन्तूनां दुःखे दुःखपरंपरा // KAव्क्_७.३४ //
831 SK सेवाप्रयाससंप्राप्तं धनमानकणोदयम् / तत्पमत्युष्णनिःश्वासैरहो कृच्छ्रेण पीयते // KAव्क्_७.३५ //
832 SK मानग्लानिर्गुणग्लानिरोजःपुनशमः श्रमह् / प्रथमं सेवकस्यैतत् फलमीश्वरदर्शने // KAव्क्_७.३६ //
833 SK लौही बन्धनशृङ्खला चरणयोर्हेलावमानावनी स्वव्यापारनिषेधनित्यनियती निद्रासुखद्रोहिणी / आशास्यस्य विशालजालसरणिः सत्सङ्गभोगाशनिः मुग्धानां मृगतृष्टिकामरुमही सेवा शरीरक्षयः // KAव्क्_७.३७ //
834 SK इति संचिन्त्य सुचिरं सा जगाम तदाज्ञया / सेवाविक्रीतकायानां स्वेच्छाविहरणं कुतः // KAव्क्_७.३८ //
835 SK व्रजन्तीं ताम् परप्रेष्यां कृपणां करुणाकुलः / निरीक्ष्य बह्गवान् दिव्यचक्षुषाचिन्तयत् क्षस्णम् // KAव्क्_७.३९ //
836 SK अस्मिन् जन्मनि शेषो ऽस्या संपूर्णो जीवितावधिः / इयं वराकी संसारादुद्धर्तव्या स्वयं मया // KAव्क्_७.४० //
837 SK अथ ताम् कर्मयोगेन व्रहन्तीं सहसा पथि //
838 SK वत्सवात्सल्यविवशा शृङ्गाभ्यामाजघान गौः // KAव्क्_७.४१ //
839 SK सा प्रदघ्यौ भगवतः प्रसादात् तन्मयस्मृतिः / जन्मान्तराधिवासेन बुद्धालम्बनमानसा // KAव्क्_७.४२ //
840 SK अहो कर्मोर्मिभिः शीर्णे संसारमकराकरे / जन्मावर्तेषु जन्तूनां मज्जनोन्मज्जनक्रमः // KAव्क्_७.४३ //
841 SK पुंसो ललाटविपुलोपलपट्टिकासु निःशर्मकर्मघटितप्रकटाङ्कटङ्कैः / नयस्तानि जन्ममरणप्रसराक्षराणि नैतानि पाणिपरिमार्जनया चलन्ति // KAव्क्_७.४४ //
842 SK इयं कर्मायत्ता प्रचुरचित्रवैचित्ररचना नराणां मायूरच्छदपटलतुल्या परिणतिः / यया गर्भारम्भे क्रमनिपतने वृद्धिसमये क्षये वा नान्यत् प्राभजत तनुलेखाच्छविरति // KAव्क्_७.४५ //
843 SK संचिन्त्याथ पुरः प्रवृत्तसुदशासन्नावसन्नस्थितिं प्राप्तेवासमदासभावकलनावैलक्ष्यनिः स्पन्दताम् / आधाय प्रणिधानधाम्नि धवले सद्धर्मशुद्धां धियं संसारे विचिकित्स्य एव मलिनं तत्याज सा जीवितम् // KAव्क्_७.४६ //
844 SK ततः सा सिंहलद्वीपे समीपे स्वर्गसंपदाम् / चन्द्रलेखेव दुग्धाब्धौ दिव्यद्युतिरजायत // KAव्क्_७.४७ //
845 SK आधानजन्मनस्तस्य मुक्तावर्षें दिवश्च्युते / साभून्मुक्तालता नाम सिंहलाधिपतेः सुता // KAव्क्_७.४८ //
846 SK सा पुण्यमिव लावण्यं वहन्ती वृद्धिमागता / लेभे विवेकेनाङ्गानां संतोषमिव यओवनम् // KAव्क्_७.४९ //
847 SK ततः कदाचिद्वणिजः श्रावस्तीपुरवासिनः / मकराकरमुत्तीर्य सिंहलद्वीपमाययुः // KAव्क्_७.५० //
848 SK ते तत्र रात्रिपर्यन्ते विश्रान्तिसुखमाजगुः / धर्मार्थगाथासंनद्धप्रबुद्धबुद्धभाषितम् // KAव्क्_७.५१ //
849 SK त्दन्तःपुरहर्म्यस्था श्रुत्वैव श्रवणामृतम् / किमेतदिति पप्रच्छ तानानाय्य नृपात्मजा // KAव्क्_७.५२ //
850 SK ते तामूचुः प्रमुदितामिदं बुद्धस्य ब्ःआषितम् / स्वभावार्हं भगवतः सर्वसत्त्वानुकम्पिनह् // KAव्क्_७.५३ //
851 SK बुद्धामिधानं श्रुत्विव पुलकालंकृताकृतिः / सा बभूव समुद्भूतसंविद्भव्यानुभावभूः // KAव्क्_७.५४ //
852 SK उन्मुभी सामयूरिव शब्दैरेव पयोमुचः / क एष भगवान् बुद्ध इति पपर्च्छः तान् पुनः // KAव्क्_७.५५ //
853 SK ततस्ते निखिलं तस्यै श्रद्धासंवर्धितादराः / न्यवेदयन् पुण्यमयीं भगवच्चरितस्थितिम् // KAव्क्_७.५६ //
854 SK अथ सा तत्कथावाप्तप्राग्जन्मकुशलोदया / विज्ञप्तिलेखं प्रददौ तेषां भगवतः कृते // KAव्क्_७.५७ //
855 SK कालेन सिन्धुमुत्तीर्य संर्पाप्तास्ते निजां पिरीम् / प्रणम्यावेद्य तद्वृत्तं ददुर्लेखं महात्मने // KAव्क्_७.५८ //
856 SK भगवानपि सर्वज्ञः पूर्वमेव विभाव्य तत् / मुक्तालतायाः कृपया स्वयं लेखमवाचयत् // KAव्क्_७.५९ //
857 SK अहो स्मरणमेव ते किमपि पुण्यपण्यं सतां भवातिबह्वभैषजं व्यसनतापतृष्णापहत् / भवन्मयकथाक्रमोपनतसंविदास्वादभूः स एष भगवन् महानमृतसंविभागो मम // KAव्क्_७.६० //
858 SK इति संक्षिप्तलेखार्थं विभाव्य भगवान् स्वयम् / ईषत्स्मित्विषा सत्त्वप्रकाशमदिशद्दिशाम् // KAव्क्_७.६१ //
859 SK ततश्चित्रकराशक्यां प्रभावैरनुपूरिताम् / भगवान् प्राहिणोत् तस्यै न्यस्तां स्वप्रतिमां पटे // KAव्क्_७.६२ //
860 SK पुनः प्रवहणारूढा वणिजस्ते तदाज्ञया / अवाप्य सिंहलद्वीपं तस्यै पटमदर्शयन् // KAव्क्_७.६३ //
861 SK हेमसिंहासनन्यस्ते पटे दृष्ट्वा तथागतम् / जनस्तन्मयताध्यानादेकीभावमिवाययौ // KAव्क्_७.६४ //
862 SK अधस्ताल्लिखितं तस्मिन् पुण्यप्राप्तमदृश्यत / तिस्रः शरण्या गतयः पञ्च शिक्षापदाणि च // KAव्क्_७.६५ //
863 SK सप्रतीत्यसमुत्पादः सानुलोमविपर्ययः / आर्याष्टाङ्गस्तथा मार्गः परमामृतनिर्भरः // KAव्क्_७.६६ //
864 SK स्वयं भगवता व्यस्तं तस्योपरि सुभाषितम् / शोभते भावनालीनं भ्राजिष्णु कनकाक्षरम् // KAव्क्_७.६७ //
865 SK विषमविषयालोलव्यालावलीवलयाकुलात् तरुणतिमिरान्निष्क्रम्यास्मात् प्रमोहमयाद्गृहात् / जननमरणक्लेशावेशप्रवृत्तपृथिव्यथा व्रजत शरणं बौद्धं धर्मं न चात्र भवाद्भयम् // KAव्क्_७.६८ //
866 SK जिनप्रतिकृतिं पुण्याम् पश्यन्ती पार्थिवात्मजा / अनादिकालोपचितां मुमोचाज्ञानवासनाम् // KAव्क्_७.६९ //
867 SK प्रांशुं कवत(?) काञ्चनकान्तकायं सुस्कन्धमाजानुभुजाभिरामम् / ध्यानावधानार्थनिमीलिताक्षं लावण्यधारायिततुङ्गनासम् // KAव्क्_७.७० //
868 SK स्वभावभव्यं प्रविभासमानं प्रलम्बनिर्भूषणकर्णपाशम् / बालप्रवालारुणवल्कलाङ्कं संसक्तसंध्याभ्रमिवामराद्रिम् // KAव्क्_७.७१ //
869 SK त्विषा दिषां शीलमिवादिशन्तं आनन्ददानोद्यतवक्त्रचन्द्रम् / क्षमागुणं क्षामिव शिक्षयन्तं पुण्योचिता सा सुभगं विलोक्य // KAव्क्_७.७२ //
870 SK प्रणामपर्यन्तकपोलचुम्बिकर्णोत्पलानां परिवर्तनेन / निरस्य निःसारशरीरतृप्तिं सत्यानुभावं परमं प्रपेदे // KAव्क्_७.७३ //
871 SK स्रोतःसमापत्तिफलप्रकाशं सासाद्य तत्र क्षणलब्धबोधिः / विचिन्तयन्ती सुगतप्रभावं समभ्यधाद्विस्मयहर्षभूमिः // KAव्क्_७.७४ //
872 SK अहो महामोहतमोहरेण दूरस्थितेनामि तथागतेन / प्रसह्य ब्ःआस्वद्वपुषार्पितेयं विकासलक्ष्मीः कुशलाम्बुजस्य // KAव्क्_७.७५ //
873 SK तीर्णो बह्वः सत्प्रणिधानमाप्तं प्रसन्नमन्तःकरणं क्षणेन / अहो नु तृष्णापरितापशान्त्यै समुच्छलन्तीव समामृतौघाः // KAव्क्_७.७६ //
874 SK इत्युक्त्वा सा बह्गवते मुक्तारत्नान्युपायनम् / वितीर्य संघपूजायां विससर्ज वणिग्जनम् // KAव्क्_७.७७ //
875 SK ते महोदधिमुत्तीर्य प्राप्ता बह्गवतो ऽन्तिकम् / तन्मुक्तारत्ननिकरं प्रणम्यास्मै न्यवेदयन् // KAव्क्_७.७८ //
876 SK वणिग्भिः कथितां श्रुत्वा तत्कथां तत्र भिक्षुणा / आनन्दनाम्ना पृष्ठो ऽथ बभाषे भगवान् जिनः // KAव्क्_७.७९ //
877 SK यासौ पुरा रोहिताख्या दासी शाक्यगृहे ऽबह्वत् / सैव मुक्तालता जाता सत्कर्मप्रणिधानतः // KAव्क्_७.८० //
878 SK अभून्महाधनो नाम वाराणस्यां वणिक् पुरा / तस्य रत्नवती नाम पत्नी पुण्योचिताभवत् // KAव्क्_७.८१ //
879 SK सा पत्यौ पञ्चतां याते निःपुत्रा स्तूपशेखरे / पूजां कृत्वा महाहारां भक्तियुक्ता न्यवेदयत् // KAव्क्_७.८२ //
880 SK तेन पुण्यविपाकेन सिंहलाधिपतेः सुता / जाता मुक्तालता सैव प्राता च परिनिर्वृतिम् // KAव्क्_७.८३ //
881 SK सैव जन्मनि चान्यस्मिन्नैर्वर्यमदमोहिता / पूजाधिक्षेपदक्षाभूद्धासी तेनातिवत्सरम् // KAव्क्_७.८४ //
882 SK जन्मभूमौ जनेनात्पं यद्यत्कर्म शुभाशुभम् / तस्य तस्य स तद्रूपं भुङ्क्ते परिणतं फलम् // KAव्क्_७.८५ //
883 SK निखिलकुशलमूला कीर्तिपुष्पोज्ज्वलश्रीः शुभफलभरसूरिर्धर्मवल्ली नराणाम् / भवति च विषवल्ली किल्बिषक्लेशमूल- भ्रमनिपतनमोहानन्तसंतापहेतुः // KAव्क्_७.८६ //
884 SK संतप्ते ऽस्मिन् खरतरमरुष्फारसंसारमार्गे पापं पुन्यं त्यजत जनताः सक्ततीव्रानुतापम् / पुण्यं पुण्यं कुरुत सततं पुण्यपीयूषसिक्ताः पुण्यच्छायातरुतलभुवः शीतलाः पुण्यभाजाम् // KAव्क्_७.८७ //
885 SK इति सत्प्रणिधानस्य फलं कथयता स्वयम् / भिक्षूणामुपदेशो ऽयं भक्त्यै भगवता कृतः // KAव्क्_७.८८ //
886 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पतायां मुक्तालतावदानं नाम सप्तमः पल्लवः //
887 SK ८. श्रीगुप्तावदानम् /
888 SK कृतापकारे ऽपि कृपाकुलानि क्रूरे ऽप्यलं पल्लवकोमलानि / द्वेषोष्मतप्ते ऽप्यतिशीतलानि भवन्ति चित्तानि सदाशयानाम् // KAव्क्_८.१ //
889 SK पुरा सुरपुरोदारे पुरे राजगृहाभिधे / श्रीगुप्ताख्यो गॄहपतिर्बभूव धन्दोपमः // KAव्क्_८.२ //
890 SK दृप्तः सुजनविद्वेषी गुणेषु विरतादरः / सदा धनमदाध्मातः सा जहास मतिं सताम् // KAव्क्_८.३ //
891 SK कठिने ऽष्वतिवक्रेषु शून्येषु मुखरेषु च / शन्खेष्विव खलेष्वेव लक्ष्मीर्दाक्षिण्यमाश्रिता // KAव्क्_८.४ //
892 SK तं कदाचित् गुरुर्ज्ञातिपुत्रः क्षपणकः खलह् / मिथः स्वैरकथासक्तः पुण्यद्वेषादभाषत // KAव्क्_८.५ //
893 SK य एष गृध्रकूटाख्ये गिरौ भिक्षुशतैर्वृतः / सर्वज्ञकीर्तिः सुगतास्त्रिजगत्पूज्यतां गतः // KAव्क्_८.६ //
894 SK नैवास्य प्रतिभां कांचिद् भव्यामुपलब्ःआमहे / नीतः किं तून्नतिं मूर्खैर्बह्गवान् भगवानिति // KAव्क्_८.७ //
895 SK अविचायव सततं परोक्तमनुभाषते / गतानुगतिकः प्रायः प्रसिद्धसरणौ जनः // KAव्क्_८.८ //
896 SK व्रतादिनियमस्तस्य दम्भ एव विभाव्यते / अश्नाति मौनकृत् मत्स्यानेकपादव्रतो बकः // KAव्क्_८.९ //
897 SK तस्मआत् तस्योपहासाय क्रियताम् कापि वज्ण्चना / मायामोहितो धूर्तानाम् परो ऽपि परितुष्यति // KAव्क्_८.१० //
898 SK इति तेनोक्तमाकर्ण्य श्रीगुप्तः कर्क्ममोहितः / पतितुं पापश्वभ्रेषु युक्त्या तदुपदिष्टया // KAव्क्_८.११ //
899 SK प्रदीप्तखदिराङ्गारपूर्णां गूढां खदां गृहे / कृत्वा सविषमन्नं च ययौ भगवतो ऽन्तिकम् // KAव्क्_८.१२ //
900 SK तेन मिथ्याविहितया भक्त्या भोक्तुं निमन्त्रितः / विज्ञाय सर्वं सर्वज्ञस्तथेति प्राह सस्मितः // KAव्क्_८.१३ //
901 SK विषग्नियोगकुपिताम् पत्नीं सद्धर्मवादिनीम् / गृहे बबन्ध श्रीगुप्तः शङ्कितो मन्त्रविश्रवात् // KAव्क्_८.१४ //
902 SK अथ विज्ञातवृत्तो ऽपि भगवान् स्वयमाययौ / वन्द्यमानो जगद्वन्द्यैश्चतुर्मुखमुखैः सुरैः // KAव्क्_८.१५ //
903 SK श्रीगुप्तस्य तमारम्भं विवेदं नगरे जनः / दिक्षु धावति पापानां सुगुप्तमपि पातमक् // KAव्क्_८.१६ //
904 SK ततः कश्चित् समभ्येत्य भगवन्तमुपासकः / उवाच चरणालीनाश्चिन्तयन् दहनं विषम् // KAव्क्_८.१७ //
905 SK मिथ्यानम्रह् प्रियालापी गुढवह्निविषान्नदः / परिहार्यः प्रयत्नेन भगवन्नेष दुर्जनह् // KAव्क्_८.१८ //
906 SK कुर्यादनार्ये नाश्वासि कार्यं माधुर्यमाश्रिये / अन्त्रच्छेदी विगीर्णो हि मधुदिग्धमुखः क्षुरः // KAव्क्_८.१९ //
907 SK नान्यस्तुतिं गुणद्वेषी सहते गुणिनाम् खलः / सन्तस्तुष्यन्ति येनैव तेनकुप्यन्ति दुर्जनाः // KAव्क्_८.२० //
908 SK त्वयि लोकत्रये नेत्रशतपत्रविकाशिनि / अस्य राहोः पदं प्राप्ते नान्धीभवति किं जगत् // KAव्क्_८.२१ //
909 SK तच्छ्रुत्वा भगवानूचे किंचित् स्मितसितांशुभिः / तन्निकारोग्रतिमिरं दूरात् परिहरन्निव // KAव्क्_८.२२ //
910 SK न ममाङ्गं स्पृशत्यग्निः प्रबह्वत्यपि वा विषम् / परद्वेषदरिद्राणां दोषो ऽपि निरुपद्रवः // KAव्क्_८.२३ //
911 SK अरोषशीतलं चेतः सिक्तं यस्य शमामृतैः / किं करोत्यनलस्तस्य विषं वा विषयद्विषः // KAव्क्_८.२४ //
912 SK विषायते तु पीयूषं कुसुमं कुलिशायते / द्वेषदोषोत्तरस्यैव चन्दनं दहनायते // KAव्क्_८.२५ //
913 SK तिर्यग्योनिगतस्यापि बोधिसत्त्वपदास्थितेः / कारुण्यमैत्रीयुक्तस्य नाग्निर्दहति विग्रहम् // KAव्क्_८.२६ //
914 SK पुरा कलिङ्गनृपतिः खण्डद्वीपाभिधावनीम् / ददाह मृगसंघानाम् संक्षेपे स समुद्यतः // KAव्क्_८.२७ //
915 SK कानने ज्वलिते तस्मिन्नेकस्तित्तिरिशावकः / मैत्र्या बोधिं समालम्ब्य दहनप्रशमं व्यघात् // KAव्क्_८.२८ //
916 SK तस्मादद्रोहमनसां न भयं विद्यते क्कचित् / श्रूयतां सत्त्वसंपत्तेरिदमन्यच्च कौतुकम् // KAव्क्_८.२९ //
917 SK अवृष्टिविषमे काले मुनेः कस्यचिदाश्रमे / मनुष्यसदृशालापः शशकः सुचिरं स्थितः // KAव्क्_८.३० //
918 SK क्षुत्क्षामं मुनिमालोक्य फलमूलपरिक्षयात् / उवाचाचलसंकल्पस्तद्व्यथाव्यथिताशयः // KAव्क्_८.३१ //
919 SK भगवन् मम् मांसानां संप्रति प्राणवर्तनम् / क्रियतां रक्षणीयं तत् शरीरं धर्मसाधनम् // KAव्क्_८.३२ //
920 SK इत्युक्त्वा दावशेषाग्नौ विक्षेप शह्स्कस्तनुम् / वार्यमाणो ऽपि यत्नेन प्रणयान्मुनिना मुह्युः // KAव्क्_८.३३ //
921 SK तस्य सत्त्वप्रभावेण ज्वलज्ज्वालाकुलो ऽनलः / प्रययौ मज्ण्जुशिञ्जानभ्रमराम्भोजखण्डताम् // KAव्क्_८.३४ //
922 SK सो ऽपि दिव्यवपुस्तत्र कमले महति स्थितः / प्रणम्यमानो मुनिर्भिर्विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_८.३५ //
923 SK इति बोधिप्रवृत्तानां न वह्नेर्न विषाद्भयम् / भगवान् कथयित्वेति श्रीगुप्तभवनं ययौ // KAव्क्_८.३६ //
924 SK तत्र तेन प्रविश्यैव निक्षिप्ते दक्षिणे पदे / बभूवाग्निखदा मञ्जुगुञ्जद्भृङ्गसरोजिनी // KAव्क्_८.३७ //
925 SK दृष्ट्वोपविष्टं श्रीगुप्तस्तं सरोरिहविस्तरे / तद्दृष्टिनष्टकालुष्यः प्रोवाचः चरणानतः // KAव्क्_८.३८ //
926 SK भगवन् मम पापस्य क्षन्तव्यो ऽयं व्यतिक्रमः / मोहान्धपतिते रुच्यं कारुण्यमधिकं सताम् // KAव्क्_८.३९ //
927 SK ममाकल्याणमित्रेण यो ऽयं पापपथे कृतः / उपदेशः प्रमोहेण तत्र त्राणं भवत्स्मृतिः // KAव्क्_८.४० //
928 SK विषदिग्धरसं सर्वं भोज्यं ते कल्पितं मया / अहो ममैव संक्रान्तं पश्चात्तपमयं विषम् // KAव्क्_८.४१ //
929 SK इति ब्रुवाणं श्रीगुप्तं साश्रुनेत्रं कृपानिधिः / दृष्ट्वा बभाषे भगवान् भिक्षुसंघस्य शृण्यवतः // KAव्क्_८.४२ //
930 SK विषादं मा कृथाः साधो न वयं विमुखास्त्वयि / घोरवैरविषत्यागान्नैवास्मास्तपते विषम् // KAव्क्_८.४३ //
931 SK वाराणस्यां पुरा श्रीमान् ब्रह्मदत्तो ऽभवन्नृपः / अभूदनुपमा नां अतस्य प्राणसमाश्रया // KAव्क्_८.४४ //
932 SK सुवर्णभाससंज्ञस्य तत्पुरान्तवनस्थितेः / रवं मयूरराजस्य सा कदाचिदथाशृणोत् // KAव्क्_८.४५ //
933 SK सा तस्य शदमाकर्ण्य वेणुवीणास्वनोपमम् / किमेतदिति पप्रच्छ नरनाथं सकौतुका // KAव्क्_८.४६ //
934 SK राजोवाच वनान्ते ऽस्मिन्नस्ति रत्नच्छदः शिखी / मधुरंयोजनव्यापि यस्यैतत् कण्ठकूजितम् // KAव्क्_८.४७ //
935 SK इति ब्रुवाणो नृपतिस्तत्संदर्शनमर्थितः / प्रेमप्रयत्नैः प्रेयस्या प्रहसन् पुनरब्रवीत् // KAव्क्_८.४८ //
936 SK दर्शनं दुर्लभं मुग्धे तद्विधाद्भुतरूपिणः / तथापि यदि निर्बन्धः क्रियते तत्परिश्रमः // KAव्क्_८.४९ //
937 SK इत्युक्त्वा नृपतिस्तस्य ग्रहणे जालजीविनः / व्यसृजत् तस्य संर्पाप्त्यैः विधाय वधसंविदम् // KAव्क्_८.५० //
938 SK वशीकृतो न वेत्त्येव मोहादक्षिपरीक्षया / अनुरागाहतः स्त्रीभिरकर्माण्यपि कार्यते // KAव्क्_८.५१ //
939 SK प्राप्तानाम् प्रणयात् पत्न्याः प्रौढायाः पादपीठताम् / ईर्ष्ययैव विनश्यन्ति धीधृतिस्मृतिकीर्तयः // KAव्क्_८.५२ //
940 SK ततः शाकुनिकैर्न्यस्ताः पाशबन्धाः पदे पदे / प्रभावाद्बर्हिराजस्य् व्यशीर्यन्तैव संततम् // KAव्क्_८.५३ //
941 SK दुःखितान् यत्नवैफल्याद्भीतान् नृपतिशासनात् / मयूरराजस्तान् दृष्ट्वा करुणाकुलतां ययौ // KAव्क्_८.५४ //
942 SK सो ऽचिन्तयदहो भीताः क्ष्मापतेः श्रूरशासनात् / मद्बन्धने विसंवादाद्वराका जालजीविनह् // KAव्क्_८.५५ //
943 SK संचिन्त्य कृपया स्पष्टग्भिर्विसृज्य तान् / नृपमानाय्य तद्वेश्म तेनैव सहितो ययौ // KAव्क्_८.५६ //
944 SK स तत्रान्तःपुरे नित्यं सभार्येण महीभुजा / पूज्यमानः परिचयादुवास विहितादरः // KAव्क्_८.५७ //
945 SK स्निग्धश्यामाम्बुदत्विषा सुनीलमणिवेश्मसु / चित्रपत्ररुचा चक्रे संसक्तेन्द्रायुधभमम् // KAव्क्_८.५८ //
946 SK अथ दिग्जययात्रायाम् कदाचिद्वसुधाधिपः / ययौ तदुपचाराय देवीमादिश्य सादरः // KAव्क्_८.५९ //
947 SK ततश्चानुपमा देवी पत्यौ याते प्रमादिनी / रूपयौवनदर्पान्धा नालुलोके कुलस्थितिम् // KAव्क्_८.६० //
948 SK तरुणं प्रेक्ष्य रागिण्यास्तस्याः कन्दर्पविप्लवे / भूयः प्रलम्भभीतेव लज्जा दूरतरं ययौ // KAव्क्_८.६१ //
949 SK मलिनः कुटिलस्तीक्ष्णः कर्णसंस्पर्शनोचितः / चपलश्चपलाक्षीणां सुदृशां सदृशः क्रमः // KAव्क्_८.६२ //
950 SK विविधोन्मादकारिण्यः संसारमकराकरे / चरन्ति प्राणहारिण्यः कालकूटच्छदाः स्त्रियः // KAव्क्_८.६३ //
951 SK कुसुमात् सुकुमारस्य क्रूरस्य क्रकचादपि / को जानाति परिच्छेदं स्त्रीणां चित्रस्य चेतसः // KAव्क्_८.६४ //
952 SK प्रचरन्तीं प्रियां कण्ठे कृत्वा ये यान्ति निर्वृतिम् / शीतलां विमलां स्निग्धां खङ्गधारां पिबन्ति ते // KAव्क्_८.६५ //
953 SK साचिन्तयत् स्थितः शल्यमयमन्तःपुरे मम / मयूरराजः शीलज्ञः पुरुषालापवेष्टितः // KAव्क्_८.६६ //
954 SK कथयिष्यत्यवश्यं मे वृत्तमेष महीपतेः / निन्द्यं कर्म कृतं तावदधुना किं करोम्यहम् // KAव्क्_८.६७ //
955 SK आस्तां परिज्ञाततत्त्वो मर्मज्ञो ऽसौ विदग्धधीः / जाता मे कृतपापायाः शङ्का निश्चेतनेष्वपि // KAव्क्_८.६८ //
956 SK इति संचिन्त्य सा त् अस्य सविषं भोजनं ददौ / रागमत्ताः खलायत्ताः किं किं कुर्वन्ति न स्त्रियः // KAव्क्_८.६९ //
957 SK तयोपाचर्यमाणस्य सविषैः पानभोजनैः / विवृद्धा बर्हिराजस्य रुरुचे रुचिरा रुचिः // KAव्क्_८.७० //
958 SK स्वस्थमालोक्य तं देवी रहस्योद्भेदशङ्किता / शनैः शोकामयग्रस्या त्रस्या तत्याज जीवितम् // KAव्क्_८.७१ //
959 SK एवं तस्य विषेणापि नैव ग्लानिरजायत / महतां चित्तवैमल्यं निर्विषं कुरुते विषम् // KAव्क्_८.७२ //
960 SK रागो विषं विषं मोहो द्वेषश्च विषमं विषम् / बुद्धो धर्मस्तथा संघः सत्यं च परमामृतम् // KAव्क्_८.७३ //
961 SK घोरं विषं सृजति मोहमहाम्बुराशिः घोरं विषं सृजति रागमहोरगश्च / घोरं विषं सृजति वैरवनावनिश्च जन्मक्रमो ऽस्ति विषमस्य विषस्य नान्यः // KAव्क्_८.७४ //
962 SK अधर्मकामः कृतवानेवमेवान्यजन्मनि / श्रीगुप्तो ऽग्निखदां सापि तस्याभूत्सहधर्मिणी // KAव्क्_८.७५ //
963 SK इत्युक्त्वा भगवान् सम्यक्करुणालोकनाम्बुभिः / चकार वीतरजसं श्रीगुप्तं शासनोन्मुखम् // KAव्क्_८.७६ //
964 SK कलितकुशलः श्रीगुप्तो ऽथ प्रकाशपदाप्तये शरणगमनान्येव त्रीणि स्मरन् विमलस्मृतिः / जिनपरिचयात् पुण्यं लेभे सताम् हि विलोकनं भवति महते कल्याणाय प्रमोदसुखाय च // KAव्क्_८.७७ //
965 SK श्रीगुप्तस्य निकारकिल्बिषजुषो ऽप्यज्ञानमोहापहः कृत्वावश्यमनुग्रहेण भगवान् कारुण्यपुण्योद्यतः / भिक्षूणां भवसंक्षयाय विदधे निर्वैरताशासनं येनैते न भवन्ति बन्धभवने भूयो भवग्रन्थये // KAव्क्_८.७८ //
966 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां श्रीगुप्तावदानं नाम अष्टमः पल्लवः //
967 SK ९. ज्योतिष्कावदानम् /
968 SK धन्यानामशिवं बिभर्ति शुभतां भव्यस्वभावोद्भवं मूर्खाणां कुशलं प्रयात्यहिततामित्येष लक्ष्यः क्रमः / निशीथतिमिरान्ध्यमौषधिवनस्यात्यन्तकान्तिप्रदं एतच्चौलुककूलदृष्टहतये सर्वत्र मैत्रं महः // KAव्क्_९.१ //
969 SK पुरा राजगृहाभिख्ये बिम्बिसारस्य भूपतेः / अभूत् पौरः सुभद्राख्यः परिपूर्णगृहस्थितेः // KAव्क्_९.२ //
970 SK मौर्ख्यान्मोहप्रपन्नस्य सर्वदर्शनविद्विषः / तस्य क्षपणकेष्वेव बभूवाभ्यधिकादरः // KAव्क्_९.३ //
971 SK तस्य सत्यवती नाम जायाभिजनशालिनी / गर्भमाधत्त पूर्णेन्दुबिम्बं पौरदरीव दिक् // KAव्क्_९.४ //
972 SK कलन्दकनिवासाख्यो वेणुकाननसंश्रयः / कदाचित् भगवात् बुद्धः प्राप्तः पिण्डाय तर्गृहम् // KAव्क्_९.५ //
973 SK पूजां सभार्यः कृत्वात्मै तं स पप्रच्छ सादरः / गर्भस्थितमपत्यं यत् किंरूपं तद्भविष्यति // KAव्क्_९.६ //
974 SK सो ऽवदत् संपदं भुक्त्वा पुत्रस्ते दिव्यमानुषीम् / प्रव्रज्यया शासने मे संयुक्तो मुक्तिमेष्यति // KAव्क्_९.७ //
975 SK याते भगवति स्पष्टमित्यादिश्य निजाश्रयम् / अभ्याययौ गृहपतेर्भूरिकः क्षपणो गृहम् // KAव्क्_९.८ //
976 SK भगवद्भाषितं तत्तु सुभद्रेण निवेदितम् / श्रुत्वा क्षपणकह् क्षिप्रमभूद्देषविषाकुलः // KAव्क्_९.९ //
977 SK गणयित्वा स सुचिरं ग्रहज्ञानकृतश्रमः / यदेवोक्तं भगवता प्रश्ने ऽपश्यत्तथाविधम् // KAव्क्_९.१० //
978 SK सो ऽचिन्तयदयो सत्यमुक्तं तेन न संशयः / तत्प्रभावोपमादाय किं स्वसत्यं वदाम्यहम् // KAव्क्_९.११ //
979 SK तस्य सर्वज्ञतां वेत्ति सुभद्रो यदि मद्गिरा / तदेष क्षपणश्रद्धां त्यक्ष्यति श्रमणादरात् // KAव्क्_९.१२ //
980 SK इति संचिन्त्य सामर्षः स सुभद्रमभाषत / असत्येमेतत् कथितं तेन सर्वज्ञमानिना // KAव्क्_९.१३ //
981 SK मनुष्यः कथमाप्नोति देवार्हां दिव्यसंपदम् / प्रव्रज्या किं तु सत्येव कथं तेनास्य चिन्तिता // KAव्क्_९.१४ //
982 SK क्षीणः क्षुदुपसंतप्तो यस्य नास्त्यन्यतो गतिः / तस्य तस्य सुभिक्षार्हं शरणं श्रमणव्रतम् // KAव्क्_९.१५ //
983 SK पश्याम्यहं गृहपते प्रमाणं यदि मद्वचः / प्रत्युतायं शिशुर्जातः कुलं संतापयिष्यति // KAव्क्_९.१६ //
984 SK इत्युदीर्य क्षपणके याते गृहपतिश्चिरम् / विचार्य विदधे तां ताम् युक्तिं गर्भनिपातने // KAव्क्_९.१७ //
985 SK यदा द्रव्यप्रयोगे ऽपि नैव गर्भह् परिच्युतः / तदास्य पत्नीमवधीदेकान्ते हठमर्दनैः // KAव्क्_९.१८ //
986 SK ततः शीतवनं तस्यां श्मशानं तेन पापिना / प्रापितायाम् क्षपणकास्तद्वार्तानन्दिता जगुः // KAव्क्_९.१९ //
987 SK अहो बताहो सर्वज्ञः शिशोः सत्यं तदुक्तवान् / सेयं सूनावजाते ऽस्य जननी पञ्चतां गता // KAव्क्_९.२० //
988 SK इयं सा श्रीः शिशोर्दिव्या सोक्ता दिव्यमनुष्यता / इयं च सास्य प्रव्रज्या यत् कुक्षौ निधनं गतः // KAव्क्_९.२१ //
989 SK इति तेषां प्रवादेन सोपहासेन सर्वतः / श्मशानदर्शनायैव बभूव जनसंगमः // KAव्क्_९.२२ //
990 SK अत्रान्तरे दिव्यदृशा भगवान् भूतभावनः / सर्वं विज्ञाय तद्बुद्धः प्रदध्यौ सस्मितः क्षणम् // KAव्क्_९.२३ //
991 SK अहो मोहानुबन्धेन दूरस्थैरपि देहिनाम् / आलोकश्छाद्यते मूर्खैर्मेघैरिव विकारिभिः // KAव्क्_९.२४ //
992 SK शुभं क्षपयता तेन क्षपणेन स मुग्धधीः / अहो गृहपतिः पापादकार्यमपि कारितः // KAव्क्_९.२५ //
993 SK इति संचिन्त्य बह्गवान् स्वयं भिक्षुगणैर्वृतः / ययौ शीतवनं क्षिप्रं श्मशानं करुणाकुलः // KAव्क्_९.२६ //
994 SK श्मशानचारिकां ज्ञात्वा राजा भगवतः स्वयम् / बिम्बिसारः सहामात्यैस्तामेव भिवमाययौ // KAव्क्_९.२७ //
995 SK ततः सुभद्रजायायां प्रक्षिप्तायां चितानले / कुक्षिं भित्त्वाम्बुजासीनः शिशुः सूर्य इवोद्ययौ // KAव्क्_९.२८ //
996 SK ज्वालिताणलमध्यस्थं तं कश्चिन्नाग्रहीद्यदा / तदा जनसमूहस्य हाहाकारो महानभूत् // KAव्क्_९.२९ //
997 SK ततस्तं संभ्रमावृद्धगतिः सुगतशासनात् / कुमारभृत्यो जग्राह जीवकाख्यः कुमारकम् // KAव्क्_९.३० //
998 SK जिनावलोकनेनैव बालकग्रहणक्षणे / अभूच्चितानलस्तस्य हरिचन्दनशीतलः // KAव्क्_९.३१ //
999 SK जीवन्तं ज्वलनान्मुक्तं रुचिरम् वीक्ष्य दारकम् / वैलक्ष्येण क्षपणकाः क्षणं तस्थुर्मृता इव // KAव्क्_९.३२ //
1000 SK ततः सुभद्रं भगवान् सर्वभूतहिते रतः / बभाषे विस्मयोद्भान्तं पुत्रो ऽयं गृह्यतामिति // KAव्क्_९.३३ //
1001 SK स तु दोलाकुलमतिः किं करोमीति संशयात् / क्षपनानां मुखान्येव शिक्षायै क्षणमैक्षत // KAव्क्_९.३४ //
1002 SK ते तमूचुर्न बालो ऽयं ग्राह्यः श्माशानवह्निजः / यत्रायं तिष्ठति व्यक्तं न भवत्येव तद्गृहम् // KAव्क्_९.३५ //
1003 SK इति तेषां गिरा मूर्खः स जग्राह न तं यदा / तदा क्षितिपतिर्बालमाददे जिनशासनात् // KAव्क्_९.३६ //
1004 SK ज्योतिर्मध्यादवाप्तस्य ज्योतिष्कसदृशत्विषः / ज्योतिष्क इति नामास्य चकार भगवान् स्वयम् // KAव्क्_९.३७ //
1005 SK तस्य प्रवर्धमानस्य भूपालबह्वने शिशोः / देशान्तरगतः काले मातुलः समुपाययौ // KAव्क्_९.३८ //
1006 SK स विदित्वा स्वसुर्वृत्तं निधनं पुत्रजन्मनि / कोपात् सुभद्रमभ्येत्य कम्पमानः समभ्यघात् // KAव्क्_९.३९ //
1007 SK मूर्ख क्षपणभक्तेन तद्गिरा हतयोषिता / त्वया त्यक्तस्वपुत्रेण किं नाम सुकृता कृतम् // KAव्क्_९.४० //
1008 SK निश्चेतनाः स्वभावेन परमन्त्रसमुत्थिताः / सहन्तो ऽपि विनिघ्नन्ति वेताला इव दुर्जनाः // KAव्क्_९.४१ //
1009 SK अधुनैव न गृह्णासि यदि राजगॄहात् सुतम् / तत्ते स्त्रीवधमुद्धुष्य कारयाम्यर्थनिग्रहम् // KAव्क्_९.४२ //
1010 SK इत्युक्तस्तेन तद्भीत्या स भूपतिगृहात् सुतम् / आनिनाय चिरान्मुक्तमकामेन महीभुजा // KAव्क्_९.४३ //
1011 SK ततः सुभद्रे कालेन कालस्य वशमागते / अभून्निर्दिर्विभूतीनां ज्योतिष्को ऽर्क इव त्विषाम् // KAव्क्_९.४४ //
1012 SK अर्थिकल्पद्रुमः प्राय संपदं दिव्यमानुषीम् / स बुद्धधर्मसंघेषु शरण्येष्वकरोन्मतिम् // KAव्क्_९.४५ //
1013 SK तद्भक्त्युपनतं दिव्यरत्नसंचयमद्भुतम् / प्रददौ भिक्षुसंघेभ्यः पुण्यरत्नार्जनोद्यतः // KAव्क्_९.४६ //
1014 SK तस्य देवनिकायेभ्यः साश्चर्या विविधर्द्धयः / स्वयमेवाययुर्वेश्म महोदधिमिवापगाः // KAव्क्_९.४७ //
1015 SK तृणे रत्ने च समधीर्भवगानपि तद्गृहे / चक्रे तदनुरोधेन रत्नपात्रपरिग्रहम् // KAव्क्_९.४८ //
1016 SK स दिव्यवस्त्रयुगलं यशसामुपमाक्षमम् / प्राप पुण्यपणक्रीतं निजं गृहमिवामलम् // KAव्क्_९.४९ //
1017 SK कदाचिदथ तद्वस्त्रंस्नानार्द्रं न्यस्तमातपे / समीरणेनापहृतं न्यपतन्मूर्धि भूपतेः // KAव्क्_९.५० //
1018 SK विलोक्यापूर्वरुचिरम् ज्योतिष्कस्य तदंशुकम् / विद्यश्रीविस्मितो राजा तृणं मेने निजश्रियम् // KAव्क्_९.५१ //
1019 SK भोक्तुं निमन्त्रितः प्राप्य तस्य रत्नमयं गृहम् / नृपतिः स्वर्गमज्ञासीत् ज्योतिष्कभवनस्थितः // KAव्क्_९.५२ //
1020 SK अथ कालेन भूपालः पुत्रेणाजातशत्रुणा / छद्मना राज्यलुब्धेन धर्मशीलो निपातितः // KAव्क्_९.५३ //
1021 SK अतीते सद्गुणे राज्ञि तस्मिन् कृतयुगोपमे / अधर्म इव स प्राप राज्यं राजवरात्मजः // KAव्क्_९.५४ //
1022 SK स भूभृद्दुर्लभां दृष्ट्वा ज्योतिष्कस्य गृहे श्रियम् / तमुवाच समभ्येत्य मत्पित्रा त्वं विवर्धितः // KAव्क्_९.५५ //
1023 SK भ्राता तवाहं धर्मेण विभवार्धं प्रयच्छ मे / न चेद्भागधन्द्रोहात् कलिरेव प्रजायते // KAव्क्_९.५६ //
1024 SK इत्युक्तस्तेन कौटिल्यात् ज्योतिष्कः क्रूरकारिणा / रत्नपूर्णं गृहं तस्मै दत्वा प्रायात् परं गृहम् // KAव्क्_९.५७ //
1025 SK सा दिव्यरत्नरुचिरस्फीता लोकोपकारिणी / ह्योतिष्कमेवानुययौ श्रीः प्रभेव दिवाकरम् // KAव्क्_९.५८ //
1026 SK पुनस्त्यक्तापि सा संपत् सप्तकृत्वः प्रभावती / ज्योतिष्कमस्पृष्टनृपा साध्वी परिमिवाययौ // KAव्क्_९.५९ //
1027 SK सर्वस्वाहरणोद्युक्तं दस्युचौरादियुक्तिभिः / ज्योतिष्कः कुपितं ज्ञात्वा निर्विण्णः समचिन्तयत् // KAव्क्_९.६० //
1028 SK अपुण्यपरिपाकेण प्रजानां जनकोपमः / संयातः स्मृतिशेषत्वं राजा वात्सल्यपेशलः // KAव्क्_९.६१ //
1029 SK को ऽन्यस्तत्सदृशो यस्मिन् निर्व्याजसरले प्रजाः / पितरीव कृताश्वासाः सुखं रात्रिषु शेरते // KAव्क्_९.६२ //
1030 SK धनिनस्तृणवत्प्राप्याः प्राप्यन्ते रत्नवद्बुधाः / अमृतादपि दुष्प्राप्यः सौजन्यसरलो जनह् // KAव्क्_९.६३ //
1031 SK निर्व्याजवैदग्ध्यजुषाममुग्धसरलात्मनाम् / अनुद्धतोन्नतानां च विरलं जन्म तादृशाम् // KAव्क्_९.६४ //
1032 SK अधुना द्वेषदुर्वृत्तः प्रवृत्तनिकृतिर्नृपः / पापपाकेन लोकानामकाले कलिरागतः // KAव्क्_९.६५ //
1033 SK मित्रे जगति याते ऽस्तं तस्मिन् भास्वति भूपतौ / दोषोदयः प्रवृद्धो ऽयमन्धकाराय तत्सुतः // KAव्क्_९.६६ //
1034 SK नूनं सतामतीतानां निष्कारणसुहृत् खलः / यद्वृत्तपरभागेण यशस्तेषां प्रकाशते // KAव्क्_९.६७ //
1035 SK तस्मादियं परित्याज्या नृपत्यधिष्ठिता मही / काले क् अलौ क्षितीशे च जनानां जीवितं कुतः // KAव्क्_९.६८ //
1036 SK वरपरिचयोदारा दाराह् सतां गुणिनाम् गुणाः कुलमविकलं भव्या भूतिर्यशः शशिसंनिभम् / स्थितिसमुचितं वृत्तं वित्तमनिमित्तमनापदं गुणवति नृपे सर्वं भवत्यपांशुलं प्रजाकुलम् // KAव्क्_९.६९ //
1037 SK धर्मद्रुमस्य धनमूलसमुद्गतस्य निर्दोषकामकुसुमप्रवरोज्ज्वलस्य / लोकः सुखानि किल पुण्यफलानि भुङ्क्ते हतो न चेत् कुनृपतेर्विनिपातवातैः // KAव्क्_९.७० //
1038 SK कलिः कालः पतिर्बालस्तत्प्रतापश्चितानलह् / अकालविप्लवोत्तालखलवेतालसंकुलः // KAव्क्_९.७१ //
1039 SK प्रीतिर्विषण्णा खिन्ना धीः सुखश्रीर्गतयौवना / अधुना विभवाभोगे भोगयोगे न मे रुचिः // KAव्क्_९.७२ //
1040 SK धनं भूमिर्गृहः दाराः सुता भृत्याः परिच्छदाः / अहो निरवधिः पुंसामाधिव्याधिपरिग्रहः // KAव्क्_९.७३ //
1041 SK यथा यथा विवर्धन्ते ग्रीष्मोष्मविषमाः श्रियः / तथा तथा ज्वलत्येव तृष्णातापः शरीरिणाम् // KAव्क्_९.७४ //
1042 SK प्रवृद्धैरपि वित्तौघे राजन्योपार्जितैर्नृणाम् / लवणाब्धेरिव जलैर्वितृष्णा नैव जायते // KAव्क्_९.७५ //
1043 SK नास्ति नास्तीत्यसंतोषाद् य एव धनिनां जपः / पुबर्भवे भवेत् को वा स एव प्रशमो यदि // KAव्क्_९.७६ //
1044 SK किं वित्तैर्दुर्निमित्तैः कलिकलहमोहलोभानुवृत्तैः किं भोगैर्विप्रयोगैर्व्यसनशतपतनाभ्याससंसक्तरोगैः / किं वा मिथ्याभिमानैर्नरपतिसदनप्रातसेवावमानैः अस्मिन् वैराग्यमेव क्षयसमयभये भोग्यमारोग्ययोग्यम् // KAव्क्_९.७७ //
1045 SK अतिक्रान्ते काले स्वजनसुहृदालोकविमले समापन्ने मोहप्रबल (तर) कालुष्यमलिने / सुखाश्वासह् पुंसां प्रशमसलिलस्नातमनसां परित्यक्तायासे विजनवनवासे परिवयः // KAव्क्_९.७८ //
1046 SK इति संचिन्त्य स चिरं परं वैराग्यमाययौ / दुःखं मोहाय मूर्खाणां विवेकाय च धीमताम् // KAव्क्_९.७९ //
1047 SK स दत्वा सर्वमर्थिभ्यः प्रययौः सुगताश्रमम् / श्रीशृङ्खलाकृष्टमतिर्न हि सत्यसुखोन्मुखः // KAव्क्_९.८० //
1048 SK यदैव राझंसेन स्मर्यते शुचि मानसम् / तदैवास्मै वसुमती सरसीव न रोचते // KAव्क्_९.८१ //
1049 SK याते दुःसहमोहधूममलिने भोगानुरागानले संतोषामृतनिर्झरेण मनसि प्राते शनैः शीतताम् / नैताः पानमदोत्तरङ्गविचलद्वाराङ्गराङ्गनाभङ्गुर- भ्रूभङ्गक्षणसंगमाः शमवतां कुर्वन्ति विघ्नं श्रियः // KAव्क्_९.८२ //
1050 SK सर्वज्ञशासनविनष्टभवाध्वकष्टः प्रव्रज्यया विमलमेव पदं प्रविष्टः / संप्राप्य सर्वसमतामसमप्रकाशः निर्लक्ष्यमोक्षगमनाय मुनिर्बभूव // KAव्क्_९.८३ //
1051 SK ताम् बोधिसिद्धिमालोक्य ज्योतिष्कस्य सविस्मयैः / भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टः प्राग्वृत्तान्तमभाषतः // KAव्क्_९.८४ //
1052 SK जन्मक्षेत्रशतोप्तानां बीजानामिव कर्मणाम् / भुज्यते फलसंपत्तिरविसंवादिनी जनैः // KAव्क्_९.८५ //
1053 SK राज्ञो बन्धुमतः पुर्यां बन्धुमत्याम् महायशाः / अभूदनङ्गनो नाम श्रीमान् गृहपतिः पुरा // KAव्क्_९.८६ //
1054 SK शास्ताथ सम्यक्संब्य्द्धो विअश्वी नाम ता पुरीम् / जनचारिकया प्रातः कदाचित् सुकृतैः सताम् // KAव्क्_९.८७ //
1055 SK द्वाषष्टिभिः स भिक्षूणां सहसैः परिवारितः / श्रद्धयानङ्गनेनैत्य प्रणम्योपनिमन्त्रितः // KAव्क्_९.८८ //
1056 SK सर्वोपकरणैस्तेन त्रैमासं परिचारितः / यथा तथैव राज्ञापि प्रणिपत्य निमन्त्रितः // KAव्क्_९.८९ //
1057 SK भोगैः स्पर्धानुबन्धेन स ताभ्यामधिवासितः / अनङ्गनेन पौरार्हैर्भूपालार्हैश्च भूभुजा // KAव्क्_९.९० //
1058 SK गजध्वजमणिच्छत्रचामरोदारया श्रिया / तं दृष्ट्वा पूजितं राज्ञ चिन्तार्तो ऽभूदनङ्गनः // KAव्क्_९.९१ //
1059 SK तस्य सत्त्वावदातस्य पक्षपाती शतक्रतुः / चकार दिव्यया लक्ष्म्या साहाय्यां जिनपूजने // KAव्क्_९.९२ //
1060 SK स तया दिव्यया भूत्या भगवन्तमपूजयत् / यदग्रे चक्रवर्तिध्रीर्लज्जाभाजनताम् ययौ // KAव्क्_९.९३ //
1061 SK रत्नैर्न्यक्षतचन्द्रसूर्यभानराकंकीरणैरावणभैर् (?) अम्लानाम्बरगन्धमाल्यशबलैः कम्पद्रुमाणां फलैः / भक्तिप्रह्वश्चीविलासचनाहेलोच्छसच्चामरं तेनाभ्यर्चितमाकलय्य सुगतं लज्जानतो ऽभून्नृपः // KAव्क्_९.९४ //
1062 SK इति बहुतरं भक्त्या शास्तुः फलं तदनङ्गनः शुभपरिणतेः पुण्योदारः पुरा समवाप्तवान् / विमलमनसस्तस्यैवासौ क्षणप्रणिधानतः पर इव रविज्योतिष्को ऽभूत् स एव पदाश्रितः // KAव्क्_९.९५ //
1063 SK इत्याह विमलज्ञानप्रकाशितगत्र्त्रयः / प्रणीधानोपदेशाय भिक्षूणां भगवान् जिनः // KAव्क्_९.९६ //
1064 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां ज्योतिष्कावदानं नाम नवमः पल्लवः //
1065 SK १०. सुन्दरीनन्दावदानम् /
1066 SK ते के ऽपि सत्त्वहितसंनिहितानुकम्पा भव्या बह्वन्ति भुवने बह्वभीतिभाजाम् / वात्सल्यपेशलधियः कुशलाय पुंसां कुर्वन्ति ये वरमनुग्रहमाग्रहेण // KAव्क्_१०.१ //
1067 SK न्यग्रोधारामनिरतं द्रुष्टुं कपिलवस्तुनि / भगवन्तं ययौ नन्दः शाक्यराजसुतः पुरा // KAव्क्_१०.२ //
1068 SK नैष्कम्यदेशनामन्त्रकथान्तेस पुरःस्थितम् / उवाच भगवान् प्रीत्या प्रव्रज्या गृह्यतामिति // KAव्क्_१०.३ //
1069 SK प्रसाद्याभिनिवेद्यास्य तं नन्दः प्रत्यभाषतः / भगवन् पुण्यलाभापि प्रव्रज्याभिमता न मे // KAव्क्_१०.४ //
1070 SK सर्वोपस्थायको भूत्वा भिक्षुसंघं यथेप्सितैः / सर्वोपकरणैस्तावत् भिक्ष्यं परिचराम्यहम् // KAव्क्_१०.५ //
1071 SK इत्युक्त्वा रत्नमुकुटैः स्पृष्टतत्पादपङ्कजः / राजपुत्रः स्वभवनं ययौ जायासमुत्सुकः // KAव्क्_१०.६ //
1072 SK स सुन्दरी समासाद्य दयिताम् रतिसुन्दरीम् / विजहार वरोद्यानं मुहूर्तविरहासहः // KAव्क्_१०.७ //
1073 SK ततः कदाचिद् भगवान् प्रकृत्यैव गुणिप्रियः / स्वयं नन्दस्य भवनं भिक्षुसंघैः सहाययौ // KAव्क्_१०.८ //
1074 SK सानन्दवदनः कृत्वा नन्दस्तत्पादवन्दनां / तं महाहर्सनासीनं पूजयित्वा व्यजिज्ञपत् // KAव्क्_१०.९ //
1075 SK केषां पुण्यप्ररोहाणां परिपाको ऽयमीदृशः / कृतो ऽयं यद्भगवता दर्शनानुग्रहः स्वयम् // KAव्क्_१०.१० //
1076 SK स्मरणं श्रवणं वापि दर्शनं वा महात्मनाम् / सेयं कुशलवल्लीनां महती फलसंततिः // KAव्क्_१०.११ //
1077 SK अस्य मैत्रस्य महतस्तदालोकस्य दर्शनात् / हृदयस्य विकासश्रीः कस्य नाम न जायते // KAव्क्_१०.१२ //
1078 SK दानादपि प्रियतरं पुण्यादपि महाफलम् / सदाचारादपि श्र्लाघ्यं महतां किलं दर्शनम् // KAव्क्_१०.१३ //
1079 SK इति तस्य ब्रुवाणस्य भक्तिप्रणयपेशलम् / अभिनन्द्य पुरः पूजां भगवान् गन्तुमुद्ययौ // KAव्क्_१०.१४ //
1080 SK अनुवव्राज तं नन्दः स्वच्छे कनकभाजने / वरोपचारमादाय मधुरं स्वमिवाशयम् // KAव्क्_१०.१५ //
1081 SK पह्चाद्व्रजन्तमालोक्य भक्त्या भगवतः पथि / निरैक्षत कटाक्षेण सुन्दरी विरहासहा // KAव्क्_१०.१६ //
1082 SK गुरूणामग्रे सा सरलतरलां लोचनगतिं विहायैव त्रासाञ्चितमुकुतिताक्षी प्रियतमा / निरीक्ष्यालक्ष्यं यत् क्षणमवनताभूत्तदधिकं न गन्तव्यं नाथेत्यवददिवं मओनादवचनम् // KAव्क्_१०.१७ //
1083 SK नन्दः प्रणयिणीं दृष्ट्वा सोच्छ्वासं चलिताननाम् / अयमागत एवाहमचिरादित्यभाषत // KAव्क्_१०.१८ //
1084 SK ततः स्वमाश्रमं प्राप्तं भगवन्तं कृताञ्जलिः / व्रजामि स्वगृहं तावदित्याह विरहासहः // KAव्क्_१०.१९ //
1085 SK ततस्तमासनासीनः प्रणतं भगवान् पुरः / उवाच सस्मितं केयं गमने संप्रति त्वरा // KAव्क्_१०.२० //
1086 SK विषयास्वादसौहार्दसंमोहार्दितवेतसाम् / अहो गृहसुखेष्वेव निर्वेदविमुखा मतिः // KAव्क्_१०.२१ //
1087 SK गुणाभरणमेवायुर्विवेकाभरणो गुणः / प्रशमाबह्रणश्चासौ वैराग्याभरणः शमः // KAव्क्_१०.२२ //
1088 SK तज्जाड्यं तदसह्यशल्यशलकं न्यस्तं सुहृच्चेतसि प्राज्ञिस्तद्गणितं विराचसमयैर्वैफल्यमेवायुषः / यद्वैराग्यविवेकशून्यमनसामेते पशूनां यथा यान्त्यायान्ति च चक्रनेमिचलनैर्निर्लक्षणानां क्षणाः // KAव्क्_१०.२३ //
1089 SK पुण्यं सत्त्ववताम् श्रुतं मतिमताम् शीलं च विद्यावताम् सर्वं भाग्यवताम् सुखं शमवतां नैव क्कचित् दुर्लभम् / दुष्प्रापस्तु समस्तवस्तुवसतेः स्वल्पांशको ऽप्यायुषः तद्यस्य क्षयमेति निष्फलतया शोच्याय तस्मै नमः // KAव्क्_१०.२४ //
1090 SK वामावर्ते विषयजलधौ पूर्णलावण्यसारे दर्पोत्सर्पद्विषममकराङ्कोद्भवक्षोभ्यमाणे / नित्यासन्नप्रबलविरजप्रज्ज्वलद्वाडवाग्नौ पुंसां सेतुस्तरणशरणे तीव्रवैराग्यमेव // KAव्क्_१०.२५ //
1091 SK तस्माद्गृहाण प्रव्रज्यां राजपुत्र जितेन्द्रियः / एताः स्त्रिय इव क्षिप्रं समगमसुखाः श्रियः // KAव्क्_१०.२६ //
1092 SK क्रियताम् कुशलायैव ब्रह्मचर्यपरिग्रहः / त्यज्यतामेष निःसारगृहसंसारदुर्ग्रहः // KAव्क्_१०.२७ //
1093 SK इति श्रुत्वा भगवतः करुणाबह्रणं वचः / प्रत्यभाषत तं नन्दः पूर्वप्रणययन्त्रितः // KAव्क्_१०.२८ //
1094 SK सदा भवदुपायैव प्रव्रज्या भगवन् मम / भिक्षुसंघोपकारार्थे गृह एवादरः परम् // KAव्क्_१०.२९ //
1095 SK इत्युक्त्वा भगवद्वाक्यमतिक्रान्तुमनीश्वरः / कृष्यमाणः प्रियाप्रेम्णा सो ऽभूद्दोलाकुलाशयः // KAव्क्_१०.३० //
1096 SK पुनः पुनश्चकारास्य भगवान् व्रतदेशनाम् / उपकारोद्यताः सन्तश्चिन्तयन्ति न योग्यताम् // KAव्क्_१०.३१ //
1097 SK यदा नेच्छति नन्दस्ताम् प्रव्रज्यामजितेन्द्रियः / तदास्य बह्गवद्वाक्यमपतद्वपुषि स्वयम् // KAव्क्_१०.३२ //
1098 SK नन्दः काषायावरणः पात्रपाणिः स तत्क्षणम् / बभौ चाभीकररुचिर्महापुरुषलक्षणैः // KAव्क्_१०.३३ //
1099 SK स शासनाज्जिनस्याभूदारण्यपिण्डपात्रिकह् / आकारादनगारताम् प्रयातः पांशुकूलिकः // KAव्क्_१०.३४ //
1100 SK प्रियामुवाह सततं श्यामां प्रव्रजितो ऽपि सः / शशाङ्क इव संव्यक्तां हृदये लाञ्छनच्छविम् // KAव्क्_१०.३५ //
1101 SK मनसः स्फटिकस्येव न विद्मः केन वर्त्मना / रागः को ऽपि विशत्यन्तर्नापैति क्षालितो ऽपि यः // KAव्क्_१०.३६ //
1102 SK विरहापाण्डुररुचिः संसक्तारुणचीवरः / स संध्याभ्रकलङ्कस्य जहार शशिनः श्रियम् // KAव्क्_१०.३७ //
1103 SK विचरन् विरहाक्षमः स विस्मॄतधृतिर्वने / जन्मविद्यामनङ्गस्य न विसस्मार सुन्दरीम् // KAव्क्_१०.३८ //
1104 SK संपूर्णचन्द्रवदनावदनध्याननिश्चलः / अचिन्त्यच्चिरं तत्तदुपविष्य शिलातले // KAव्क्_१०.३९ //
1105 SK अहो भगवताप्येष कृतो यत्नादनुग्रहः / नायाति मम वैमल्यं रागाधिष्ठितचेतसः // KAव्क्_१०.४० //
1106 SK श्रुतं संसारचरितं निःसङ्गव्रतमास्थितम् / तथापि मृगसावाक्षीं न विस्मरति मे मनः // KAव्क्_१०.४१ //
1107 SK कान्ताकुङ्कुमलग्नरागसुभगे गात्रे कृतं चीवरं तत्पीनस्तनमण्डलप्रणयिना पात्रं धृतं पाणिना / रागो ऽयं मम वर्धते ऽस्य यदि वान्यस्येव वृद्धिः परं यद्बोधिव्यवधानभूतमनिशं ध्यानं तदालम्बनम् // KAव्क्_१०.४२ //
1108 SK क्षणेन मां प्राप्तमवेहि मुग्धे तामेवमुक्त्वा गमने पुरस्तात् / अहो मया दर्शनविघ्नभूतं पश्चात् कृतघ्नव्रतमेतदात्तम् // KAव्क्_१०.४३ //
1109 SK नो गन्तव्यमिति प्रकम्पतरला वाक्यं यदूचे न सा संत्यज्य व्यजनं स्थिते गुरुजने जग्राह पाण्यञ्चलम् / यत्पादेन लिखन्त्यपि क्षितितलं मामौक्षतालक्षिता तेनात्यन्तनिषेधमुग्धविधिना बद्धं तया मे मनः // KAव्क्_१०.४४ //
1110 SK मद्वियुक्ता न सा नूनं शेते शोकप्रलापिनी / पुलिने चक्रवाकीव हर्म्ये हरिण्यलोचना // KAव्क्_१०.४५ //
1111 SK हा प्रिये तक्तसक्तेन कितवेनेव केवलम् / श्रितं तच्चित्तचौरेण मिथ्याव्रतमिदं मया // KAव्क्_१०.४६ //
1112 SK त्यक्त्वा व्रतमिदं तावद् गच्छाम् इदयितान्तिकम् / अनुरागाग्नितप्तानां तपस्तापो हि दुःसहः // KAव्क्_१०.४७ //
1113 SK राजपुत्री चिरायातं नृशंसमवलोक्य माम् / मन्युना नवलग्नेन न जाने किं करिष्यति // KAव्क्_१०.४८ //
1114 SK न सर्वत्र विकाराय निकारः प्रेमदुःसहः / दुर्निवारो भवत्येव स्नेहलीनो रजःकणः // KAव्क्_१०.४९ //
1115 SK यस्मिन् क्षणे भगवता पश्यामि रहितं वनम् / मया तदैव गन्तव्यं गॄहमित्येष निश्चयः // KAव्क्_१०.५० //
1116 SK अस्मिन्नेव शिलापट्टे रुचिरैर्गिरिधातुभिः / लिखामि ताम् शशिमुखीं संर्पाप्यालम्बनं धृतेः // KAव्क्_१०.५१ //
1117 SK अथवा कथमालेख्यविषयं याति सा प्रिया / सौन्दर्यबिद्नको यस्याः सुधाकुवलयेन्दवः // KAव्क्_१०.५२ //
1118 SK दृष्टिर्मुग्धकुरन्गसंचलदलिव्याप्तोत्पलोद्वातनी लावण्योदधिकूलविद्रुमवनं बिम्बाधराग्रत्विषः / निर्दोषामृतरश्मिसार्थसरणिः सा कापि वक्त्रद्युतिः सौन्दर्यं कथमेति चित्रपदवीश्चर्यसारं वपुः // KAव्क्_१०.५३ //
1119 SK इति संचिन्त्य स शनैरालिलेख शिलातले / सुन्दरीं मुखमुक्ताश्रुस्नातकम्पाकुलाङ्गुलिः // KAव्क्_१०.५४ //
1120 SK स संकल्पसमुद्गीर्णं प्रतिबिम्बमिवाश्रिताम् / कृत्वा पुरः प्रियतमामूचे ऽदर्बाष्पगद्गदः // KAव्क्_१०.५५ //
1121 SK प्रियामालिख्याहं निखिलसुखवृष्टिं नयनयोर् न पश्याम्युद्बाष्पः क्षणमपि शरच्चन्द्रवदनाम् / अयं नूनं तन्वीविरहनिरपेक्षव्रतवतः स्फुरत्तापः शापः किमपि मम पापादुपनतः // KAव्क्_१०.५६ //
1122 SK फुल्लाम्भोजवनत्विषा स्पृहावशासक्ताश्रुतोयं वपुस् तत्कालोपगतान्तरायजनितः कोपः समुत्सृज्यताम् / हंहो सुन्दरि देहि मे प्रतिवचः किं मौनमालम्बसे सत्यं त्वन्मयरागवीचरमिदं चित्तव्रतं मे व्रतम् // KAव्क्_१०.५७ //
1123 SK इति ब्रुवाणं तं दृष्ट्वा दूरादालिखितं च तत् / सासूया भिक्षवो ऽभ्येत्य भगवन्तं बभाषिरे // KAव्क्_१०.५८ //
1124 SK भगवन् दुर्विनीतस्य वात्सल्यादेव केवलम् / शुनः कुसुममालेव प्रव्रज्येयं त्वयार्पिता // KAव्क्_१०.५९ //
1125 SK आखिल्य सुन्दरीमुखं नन्दः स्वैरं शिलातले / तत्प्रलापजपासक्तो ध्यानालम्बनतां गतः // KAव्क्_१०.६० //
1126 SK एतदाकर्ण्य भगवान् नन्दमाह्वाय्य कननात् / किमेतदिति पप्रच्छ प्रियाविरहमोहितम् // KAव्क्_१०.६१ //
1127 SK सो ऽब्रवीद् भगवन् सत्यं कान्तासक्तस्य मे परम् / भिक्षूणां संमते ऽप्यस्मिन् वने न रमते मतिः // KAव्क्_१०.६२ //
1128 SK इति दन्दवचः श्रुत्वा तमूचे भगवान् जिनह् / मीलयन्नेव वक्त्रेन्दुकान्त्या रागसरोरुहम् // KAव्क्_१०.६३ //
1129 SK साधो तावन्न युक्ता ते संरागानुगता मतिः / विघ्नैर्नाकृष्यते चेतः कल्याणाभिनिवेशिनाम् // KAव्क्_१०.६४ //
1130 SK क्वायं योगस्तनुतृणतुलात्यक्तभोगाभियोगः क्कायं निन्द्यः क्षणसुखलवास्वादसंवाद एषः / जात्यैवायं हरति कुशलं दुस्तरो मारमार्गः प्रेमान्धानाम् भवति सहसा दुःसहो योक्त्रजातः // KAव्क्_१०.६५ //
1131 SK इत्यस्य भगवान् कृत्वा चिरं वैराग्यदेशनाम् / संस्थातव्यमिहेत्युक्त्वा स्वकृत्याय स्वयं ययौ // KAव्क्_१०.६६ //
1132 SK तमेवावसरं नन्दः संचिन्त्य गमनोचितम् / प्रतस्थे स्वगृहं हृष्टः सुन्दरीदर्शनोत्सुकः // KAव्क्_१०.६७ //
1133 SK व्रजन् द्वारि पिधानाप्तैर्विहारैर्बहुभिश्चिरात् / नगराभिमुखं मार्गं स कथंचिदवाप्तवान् // KAव्क्_१०.६८ //
1134 SK अथ विज्ञाय सर्वज्ञस्तं रागाद् गन्तुमुद्यतम् / उवाचाभ्येत्य भगवान् नन्द तूर्णं क्क गम्यते // KAव्क्_१०.६९ //
1135 SK स जगाद वने तावत् भगवन् नास्ति मे रतिः / न ह्यविश्रान्तचित्तानां क्रिया काचित् प्रसीदति // KAव्क्_१०.७० //
1136 SK सा श्रीश्चामरहासिनी मणिमयी सा रम्यहर्म्यावली सा बालानिललोलचारुलतिका कान्ता नवोद्यानभूः / सा तन्वी कुसुमेषुकार्मुकलता क्षामोदरी सुन्दरी नो जन्मान्तरवासना इव मनः सक्तं विमुञ्चन्ति मे // KAव्क्_१०.७१ //
1137 SK सरागेणैव मनसा ब्रहचर्यं चराम्यहम् / व्रतपञ्जरबन्धेन विहङ्ग इव यन्त्रितः // KAव्क्_१०.७२ //
1138 SK त्यक्त्वा व्रजामि प्रव्रज्यामस्तु मे नरको ऽक्षयः / न वीतरागतामेति मञ्जिष्ठारक्तमंशुकम् // KAव्क्_१०.७३ //
1139 SK इति ब्रुवाणमसकृत् स्वपदं गन्तुमुद्यतम् / निवार्यानुग्रहधिया तमूचे भगवान् जिनः // KAव्क्_१०.७४ //
1140 SK मा कृथा विप्लवं नन्द निन्दितं हि श्रुताश्रुतम् / विद्वज्जनोपदिष्टेन यथा याति पृथग्जनः // KAव्क्_१०.७५ //
1141 SK विवेकव्यस्तदोषाणां विदुषां शीलशालिनाम् / निःसारसुखलाभेन नाकार्ये धीः प्रवर्तते // KAव्क्_१०.७६ //
1142 SK गाढरागगृहीतस्य जुगुप्सायतने परम् / जधन्यकर्मण्यासक्तिः किं लज्जाजनने न ते // KAव्क्_१०.७७ //
1143 SK योनिजयोनिसंसक्ताः स्तनपस्तनमर्दिनः / अहो बत न लज्जन्ते जन्मन्येव लयं गताः // KAव्क्_१०.७६ //
1144 SK सदासज्जनवर्जिता जननीजघनासक्तिः / संमोहाहतचित्तानां पशूनामेव दृश्यते // KAव्क्_१०.७९ //
1145 SK रामारमणमानो ऽयं विरम्य त्यज्यतां त्वया / भोगैः सह भुजङ्गानां दृष्टो भवबिले क्षयः // KAव्क्_१०.८० //
1146 SK जघन्या जनयत्येव न कस्य विरतिं रतिः / यस्यां भवति पर्यन्तेष्वपि नैव पराङ्मुखः // KAव्क्_१०.८१ //
1147 SK गृहजालविमुक्तस्त्वं किं तत्रैवाभिधावसि / न हि निर्गस्य सारङ्गः पुनर्विशति वागुरां // KAव्क्_१०.८२ //
1148 SK इति वाक्याद् भगवतः शासनेन नियन्त्रितः / चिन्तयन् सुन्दरीं नन्दः प्रविवेशाश्रमं पुनः // KAव्क्_१०.८३ //
1149 SK ततः कदाचिदादिश्य नन्द माश्रममार्जने / आसनानुग्रहव्यग्रः प्रययौ भगवान् पुनह् // KAव्क्_१०.८४ //
1150 SK तच्छासनात् प्रवृत्तस्य नन्दस्याश्रमशोधने / नो भूतलादपययौ रजो राग इवाशयत् // KAव्क्_१०.८५ //
1151 SK तस्याहर्तुं गतस्याथ सलिलंपारभागिकम् / मुहुः पूर्णसमुत्क्षिप्तह् शून्य एवाभवद्धटः // KAव्क्_१०.८६ //
1152 SK तेन विघ्नेन गमने सुतराम् खिन्नमानसः / त्यक्त्वा तुप्रययौ नन्दः सुन्दरीदर्शनोत्सुकः // KAव्क्_१०.८७ //
1153 SK अथ विज्ञाय सर्वज्ञस्तं यान्तं दिव्यचक्षुषा / बभाषे सहसाभ्येत्य स्तम्भमानमनोरथह् // KAव्क्_१०.८८ //
1154 SK पात्रयोगेन तप्तस्य श्यामरक्तरुचेः परम् / अहो स्नेहकलङ्कस्ते दीपस्येव न शाम्यति // KAव्क्_१०.८९ //
1155 SK अलं वामाभिलाषेण नीलीराग इवैष ते / संसक्तः को ऽपि हृदये यन्नाद्यापि विरज्यसे // KAव्क्_१०.९० //
1156 SK अन्धीकरोति प्रारम्भे रतिस्तत्कालकातरम् / आलिङ्गति जुगुप्सेव वृत्ते मुख्याङ्गसंगमे // KAव्क्_१०.९१ //
1157 SK विषयाख्वादसङ्गेन पापमित्रैरिवेन्द्रियैः / दुःसहव्यसनावर्ते पात्यते नरके नरह् // KAव्क्_१०.९२ //
1158 SK अधिवासयति स्पर्शलेखेनापि कुसंगमः / प्रक्लिन्नमत्स्यकुणपात् पूतिगन्ध इवोद्गतः // KAव्क्_१०.९३ //
1159 SK कल्याणमित्रसंपर्कः सर्वथा कुशलावहः / शुभामेद इव व्याप्तो यः करोति महार्हताम् // KAव्क्_१०.९४ //
1160 SK इत्युक्ते तस्य भगवान् साक्षात्स् अदसतोः पथि / घ्राणस्पर्शेन संदर्श्य चक्रे तत्सङ्गदेशनाम् // KAव्क्_१०.९५ //
1161 SK अथ नन्दं समादाय भगवान् गन्धमादने / ययौ विरिञ्चिरमरीबालव्यजनवीजितः // KAव्क्_१०.९६ //
1162 SK तत्र दावानलप्लिष्टामनिष्टक्लिष्टविग्रहाम् / काणां कर्मटीकामस्मै दर्शयित्वावदज्जिनः // KAव्क्_१०.९७ //
1163 SK इमां पश्यसि किं नन्द मान्द्यनिन्द्यतराकृतिम् / कस्मैचिदुचिता चेयं रोचते प्रियदर्शना // KAव्क्_१०.९८ //
1164 SK सत्ता सदसतोर्नास्ति रागः पश्यति रम्यताम् / स तस्य ललितो लोके यो यस्य दयितो जनः // KAव्क्_१०.९९ //
1165 SK पक्षपातं समृत्सृज्य सत्यं नन्द त्वयोच्यताम् / अस्यास्तस्याश्च सुन्दर्या लावण्यस्य किमन्तरम् // KAव्क्_१०.१०० //
1166 SK अनर्थित्वाद्वयं नैव सौन्दर्यान्तरवेदिनः / अर्थिप्रियत्वमायाति प्रार्थितं तच्च चारुताम् // KAव्क्_१०.१०१ //
1167 SK पश्याम्यहं विशेषं तु तस्या नास्याश्च कंचन / रम्यत्वं मांसवर्मास्थियन्त्रे समयमात्रकम् // KAव्क्_१०.१०२ //
1168 SK इति पृष्टो बह्गवता नन्दस्तं प्रत्यभासत / अत्यन्तानुचितः प्रश्नः को ऽपि गौरवयन्त्रितः // KAव्क्_१०.१०३ //
1169 SK किमेतद् भगवान् वक्ति केयं शोके बिडम्बना / क्कापि वा विश्वगुरवो विनेयाः प्रभविष्णवह् // KAव्क्_१०.१०४ //
1170 SK रतिः साधिकसुन्दर्याः परभागेण रज्यते / यां दृष्ट्वा जगतां जेता न रतिं स्मरति स्मरः // KAव्क्_१०.१०५ //
1171 SK ज्योत्स्नयेव न तत्कान्त्या नोदते कुमुदाकरः / गुणान्तरं न जानाति प्रसिद्धिशरणो जनः // KAव्क्_१०.१०६ //
1172 SK बद्धं तया वदनसौरभसारहारमालोक्य पुष्यनिचयं पृथुकेशपाशे / मन्ये विलासगतिलोवनकान्तिचौरैः भीत्येव हंसहरिणैर्वनमिव यातम् // KAव्क्_१०.१०७ //
1173 SK अनल्पैः संकल्पैर्बहुविधविकल्पैरनुपमा न सा सारङ्गाक्षीलिखितुमपि शक्या परिचितैः / तुलारोहे य्स्या वदनपरभागे लघुतरः स नूनं ताराणां गगनमधिरूढः परिवृढः // KAव्क्_१०.१०८ //
1174 SK पुण्यप्रह्वं ललितललितभ्रूलतालास्यलीला रम्यं तस्या यदि न वदनं नन्दनं लभ्यते तत् / प्रव्रज्येयं सुकृतमधिकं किंकरी किंकरी मे कस्मादेतं व्रतपरिकरं भारभूतं वहामि // KAव्क्_१०.१०९ //
1175 SK इति नन्दवचः श्रुत्वा भगवान् रागनिर्भरम् / उपक्षिप्य प्रभावेत त निनाय सुरालयम् // KAव्क्_१०.११० //
1176 SK अदर्शयच्च तत्रास्य लीलोद्याने शतक्रतोः / सुधामन्थसमुद्भूताः कान्तास्त्रिदशयोषितः // KAव्क्_१०.१११ //
1177 SK अरुणैः कान्तिसंतानैः पादपद्मवनोदितैः / अनुयाता इवाम्भोधिकूलविद्रुमकाननैः // KAव्क्_१०.११२ //
1178 SK विशाललास्यसचिवैः पाणिभिर्विजिताम्बुजैः / संसक्तैः सहजस्येव पारिजातस्य पल्लवैः // KAव्क्_१०.११३ //
1179 SK कान्तिमाधुर्यललितैर्मदनानन्दबाण्धवैः / हेलानिमीलिताम्भोजवदनैश्चन्द्रसुन्दरैः // KAव्क्_१०.११४ //
1180 SK संमोहनैर्जीवनैश्च कृष्णसारैर्विलोकनैः / कालकूटच्छदस्पृष्टैरमृतोघैरिवावृताः // KAव्क्_१०.११५ //
1181 SK पूर्णयौवनलावण्याः सहसैव विलोक्य ताः / नन्दः सानन्दवदनः स्वेदस्नात इवाभवत् // KAव्क्_१०.११६ //
1182 SK पद्माननासु विपुलोत्पललोचनासु कुन्दस्तिमातु निबिडस्तबकस्तनीषु / नन्दस्य तासु हृदयं युगपन्निपत्य दोलाविलासतरलालितुमवाप // KAव्क्_१०.११७ //
1183 SK ततः प्रोवाच बह्गवान् नन्दं तद्गतमानसम् / आसां संदर्शने नन्द प्रीत्या ते रमते मतिः // KAव्क्_१०.११८ //
1184 SK आसां तस्याश्च सुन्दर्या लावण्ये कियदन्तरम् / उत्कर्षः परभागेण स्फुटमेवाभिभाव्यते // KAव्क्_१०.११९ //
1185 SK निरस्तसुन्दरीरूपं रूपमप्सरसाम् यदि / तदेता एव कालेन करिष्यामि त्वदाश्रयाः // KAव्क्_१०.१२० //
1186 SK आरोगेणैव मनसा ब्रह्मचर्यं प्रसन्नधीः / चर तावत्ततस्ते ऽहं दास्याम्यप्सरसाम् गणम् // KAव्क्_१०.१२१ //
1187 SK एवं भगवतो वाक्यान्नन्दः संजातनिश्चयः / तथेत्युक्त्वा व्रते चेतश्चक्रे स्वर्गाङ्गनाशया // KAव्क्_१०.१२२ //
1188 SK मन्दादरः स्वदारेषु सो ऽभूत् तत्संगमेच्छया / गुणप्ण्यतुलावृत्तेर्नास्ति स्नेहस्य सत्यता // KAव्क्_१०.१२३ //
1189 SK अहो चिस्मृतसंवासप्रवासपरिशोषिता / पुंसामाभ्यासिकी प्रीतिः सहसान्यत्र धावति // KAव्क्_१०.१२४ //
1190 SK क्षणयौवनरम्याणि प्रेमाणि प्रणयव्ययैः / न सत्यानि न नित्यानि न सुखानि शरीरिणाम् // KAव्क्_१०.१२५ //
1191 SK ततो भगवता नन्दः क्षणानीतः स्वमाश्रमम् / तन्निश्चयाद् ब्रह्मचर्यं चचार नियतव्रतः // KAव्क्_१०.१२६ //
1192 SK स चिसस्मार सुन्दर्याः कान्तिसंपदमन्यधीः / क्षणप्रमुषिता प्रीतिर्मलं याति गुणेष्वपि // KAव्क्_१०.१२७ //
1193 SK ततः कदाचिद्विचरन् नन्दः क्कापि व्यलोकयत् / करालनरकासक्तां धीमान् कुम्भीभृतां भुवम् // KAव्क्_१०.१२८ //
1194 SK ताम् विलोक्यैव साकम्पः किमेतदिति दुःखितः / स पप्रच्छ तदासक्तान् घोरनरककारणम् // KAव्क्_१०.१२९ //
1195 SK ते तमूचुरियं भूमिस्तप्तकुम्भीशताचिता / कल्पिता राजपुत्रस्य नन्दस्यानन्दरागिणः // KAव्क्_१०.१३० //
1196 SK मिथ्याव्रतः स नाद्यापि भजते वीतरागताम् / ब्रहम्चर्यं चरत्येव स्वर्गस्त्रूईसंगमाशया // KAव्क्_१०.१३१ //
1197 SK मिथ्याव्रतानाम् लुब्धानां रागद्वेषकषायिणाम् / एतासु नित्यतप्तासु कुम्भीष्वेवाक्षयः क्षयः // KAव्क्_१०.१३२ //
1198 SK इति नन्द समाकर्ण्य जातरोमाञ्चकञ्चुकह् / तत्र च्युतामिव तनूं पश्चात्तापादमन्यतः // KAव्क्_१०.१३३ //
1199 SK समम्येत्य त्यक्तरागसंवासवासनह् स्वयम् / बभूवानुत्तरब्रह्मचर्यपर्याप्तांयमः // KAव्क्_१०.१३४ //
1200 SK घनमोहक्षयात्तस्य विमुक्ते संशये ततः / महः प्रसादमापेदे शरदीवेदधेः पयः // KAव्क्_१०.१३५ //
1201 SK निष्कामः प्रशमं प्राप्तः परां निष्ठामुपागतः / शुद्धधीः स समभ्येत्य भगवन्तमभाषत // KAव्क्_१०.१३६ //
1202 SK नाप्सरोभिर्न सुन्दर्या भगवन् कृत्यमस्ति मे / एताः पर्यन्तविच्छायाः सपाता विषयश्रियः // KAव्क्_१०.१३७ //
1203 SK यथा यथेयं भावानां भाव्यते निःस्वभावता / तथा तथा प्र्qसीदन्ति निरावरणवृत्तयः // KAव्क्_१०.१३८ //
1204 SK इति दन्दस्य वदतः प्राप्तस्यार्तपदं शनैः / भगवान् निर्वाणशुद्धामस्य सिद्धिममन्यत // KAव्क्_१०.१३९ //
1205 SK केषां कुशलमूलानां नन्देनासादितं फलम् / इति भिक्षुभिरभ्येत्य पृष्ठस्तानवदज्जिनः // KAव्क्_१०.१४० //
1206 SK जन्मान्तरार्जितैः पुण्यैः सुकृताभ्यासकारिणा / प्राप्ताः कुशलमूलानां नन्देन फलसंपदः // KAव्क्_१०.१४१ //
1207 SK विपुलविमल वंशे जन्म स्मरप्रतिमा तनुः सुरजनसखी लक्षी वृत्तिः प्रियाः सततं सताम् / प्रशमसलिलस्नातं चेतः स्वभावगतिर्गतिः कुशलकुसुमस्येयं पुंसां विशालफलोद्गतिः // KAव्क्_१०.१४२ //
1208 SK स्तूपे विपश्यिनः सम्यक्संबुद्धस्यादरः पुरा / नगर्यामरुणावत्यामरुणेन महीभूहा // KAव्क्_१०.१४३ //
1209 SK क्रियमाणो मणिमये मैत्रो नाम द्विजन्मजः / महतः पुण्यभोगस्य भागी कारकताम् ययौ // KAव्क्_१०.१४४ //
1210 SK तत्पुण्यप्रणिधानेन जातो गॄहपतेः कुले / स एव भिक्षुसंघस्य जन्तुकास्नानसत्रकृत् // KAव्क्_१०.१४५ //
1211 SK स पुण्यशीलः प्रत्येकबुद्धोपस्थायकह् पुरा / स्तूपं चक्रे शोभमानं मालभिवरणोज्ज्वलम् // KAव्क्_१०.१४६ //
1212 SK तत्पुण्यप्रणिधानेन कृकेः काशीपतेः सुतः / सो ऽभ्वद्द्युतिमान् नाम दिव्यलक्षणलक्षितः // KAव्क्_१०.१४७ //
1213 SK काश्यपस्यार्हतः सम्यक्संबुद्दस्यान्तनिर्वृतौ / सप्तरत्नमये स्तूपे कृते काशीमहीभुजा // KAव्क्_१०.१४८ //
1214 SK तत्सूनुर्ध्युतिमान् हौमच्छत्रमारोप्य भास्वरम् / जातस्तत्प्रणिधानेन नन्दः शाक्यमुके ऽधुना // KAव्क्_१०.१४९ //
1215 SK इति सुकृतसमुत्थैः पूर्वजन्वक्रमाप्तैः किमपि विपुलपुण्यैरेव नन्दः प्रपेदे / कुलममलमुदारं रूममग्र्यं च भोगं शमपरिचितमन्ते सत्पदं सौगतं च // KAव्क्_१०.१५० //
1216 SK कथयोत्वेति भगवान् नन्दकल्याणकारणम् / चकार भिक्षुसंघस्य तां तां सुकृतदेशनाम् // KAव्क्_१०.१५१ //
1217 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां सुन्दरीनन्दावदानं नाम दशमः पल्लवः //
1218 SK ११. विरूढकावदानम् /
1219 SK आरोहति पदमुन्नतममलमतिर्विमलकुशलसोपानैः / नरककुहरेषु निपतति मलिनमतिर्घोरतिमिरेषु // KAव्क्_११.१ //
1220 SK शाक्यानां नगरे पूर्वं स्फीते कपिलवास्तुनि / महतः शाक्यमुख्यस्य सुमुखी दासकन्याका // KAव्क्_११.२ //
1221 SK शास्त्रे कृतश्रमा सर्वकलाकौशलशालिनी / मालिका नाम कामस्य मालिकेव गुणोचिता // KAव्क्_११.३ //
1222 SK प्रभोर्गिरा वरोद्याने कुसुमावचयोद्यता / भ्रमन्तं तं समायान्तं ददर्श सुगतं पुरः // KAव्क्_११.४ //
1223 SK तस्यान्ते ऽस्यास्तमालोक्य प्रसन्नमभवन्मनः / शरत्काल इव स्वच्छः प्रसादयति मानसम् // KAव्क्_११.५ //
1224 SK साचिन्तयत्तदा लोकप्रीत्या दृढीकृतास्पदा / सुकृतैः पिण्डपातं मे गृह्णीयाद्भगवानपि // KAव्क्_११.६ //
1225 SK विज्ञाय तस्याह् सर्वज्ञः संकल्पं करुणाकुलः / प्रसार्य पात्रं भगवान् भद्रे देहीत्युवाच ताम् // KAव्क्_११.७ //
1226 SK दत्वा प्रणम्य सा तस्मै परिपूर्णमनोरथा / प्रणिधानं प्रविदधे दास्यदुःखनिवृत्तये // KAव्क्_११.८ //
1227 SK ततः कदाचिदायातः पितुअस्तस्याः सखा द्विजः / नौमित्तिकस्तं प्रदेशं दृष्ट्वा ताम् विस्मितो ऽव दत् // KAव्क्_११.९ //
1228 SK अहो गृहपतेस्तस्य पुत्री त्वं श्रीमतह् सुता / बन्धुहीना गता दास्यं धनभोगविवर्जिता // KAव्क्_११.१० //
1229 SK अहो मोहघनारम्भक्षणोद्द्योतनविद्युतः / संसारसर्परसनाविलासचपलाः श्रियः // KAव्क्_११.११ //
1230 SK गम्यानां मा कृथाश्चिन्तां जाने ऽहं हस्तलक्षणैः / अचिरेणैव भूभर्तुर्वल्लभा त्वं भविष्यसि // KAव्क्_११.१२ //
1231 SK इदं पश्यामि ते पाणौ लक्ष्मीकमलकोमले / मालाचक्राङ्कुशाकारमित्युक्त्वा प्रययौ द्विजः // KAव्क्_११.१३ //
1232 SK अथ मन्मथसंभोगसुहृन्मधुपबान्धवः / लतालिङ्गनसौभाग्यभव्यो ऽदृश्यत माधवः // KAव्क्_११.१४ //
1233 SK मधोः केसरिणस्तस्य कान्तामानद्विपद्विषः / विबभौ जिह्ममानस्य जिह्वेवाशोकमञ्जरी // KAव्क्_११.१५ //
1234 SK बालाकपोललावण्यचौरश्चम्पकसंचयः / सुदृशां केशपाशेषु ययौ बन्धनयोग्यताम् // KAव्क्_११.१६ //
1235 SK सहकारैर्विरहिणीनिधनं विदधे मधु / निरपेक्षापरवधे विधुराः प्रभविष्णवः // KAव्क्_११.१७ //
1236 SK ययुर्मधुलिहां चूतलता निर्भरभोग्यताम् / सहसौव विद्गधानामिव मुग्धविभूतयः // KAव्क्_११.१८ //
1237 SK रूतायुधश्चूतलताचापन्यस्तशिलीमुखः / जयतीति जगौ बन्दी कन्दर्पस्येव कोकिलः // KAव्क्_११.१९ //
1238 SK अस्मिन्नवसरे श्रीमान् कोसलेन्द्रः प्रसेनजित् / मृगयानिर्गतो ऽश्वेन हृतस्तं देशमाययौ // KAव्क्_११.२० //
1239 SK धन्वीमनोभवाकारः सो ऽवतीर्य तुरंगमात् / ददर्शानन्यलावण्याम् कन्यां रतिमिवापराम् // KAव्क्_११.२१ //
1240 SK तद्विलोकनविस्तीर्णं मनस्तस्य महात्मनः / विस्मयाद्दृष्टिमार्गेण प्रविवेश मनोभवः // KAव्क्_११.२२ //
1241 SK तां लज्जावनतां दृष्ट्वा सहसोद्भूईतसाध्वसाम् / अचिन्तयन्नरपतिः कान्तिकल्लिलिनीहृतः // KAव्क्_११.२३ //
1242 SK केयं नवा शशिमुखी श्यामा तरलतारका / यत्कान्तिरनिशं नेत्रशतपत्रविकाशिनी // KAव्क्_११.२४ //
1243 SK बकुलामोदविभ्रान्तभ्रमरे पाटलाधरे / कान्तं वसन्तं पश्यामि मुखे ऽस्याः कुमुदायुधम् // KAव्क्_११.२५ //
1244 SK अहो लावण्यमम्लानं तारुण्याभरणं तनोः / धीरस्यापि धृतिर्येन शङ्खे संगलितेव मे // KAव्क्_११.२६ //
1245 SK अहो नु मधुमञ्जर्याः प्रारम्भे ऽप्यद्भुतो गुणः / येन गन्तुं न शक्नोति षट्पदो ऽपि पदात्पदम् // KAव्क्_११.२७ //
1246 SK इति संचिन्त्य भीपालस्तां मत्वा वनदेवताम् / पृष्ट्वा विवेद तद्वृत्तं क्रमेण कथितं तया // KAव्क्_११.२८ //
1247 SK ततस्तत्र कृतातिथ्यस्तया पल्लववीजनैः / शुचिशीतैश्च सलिलैः प्राप्तवान् निर्वृतिं नृपः // KAव्क्_११.२९ //
1248 SK श्रान्तः संवाहने तस्य तया चरणपद्मयोः / कृते कराप्तसंस्पर्शे स निद्राम् सहसा ययौ // KAव्क्_११.३० //
1249 SK क्षणेन प्रतिब्य्द्धो ऽथ विश्रान्तमृगयाश्रमः / दिव्यस्पर्शेन ताम् मेने रतिं रूपान्तरागताम् // KAव्क्_११.३१ //
1250 SK महानपि ततः शाक्यः संप्राप्तं कोसलेश्वरम् / श्रुत्वा तं देशमभ्येत्य पूजार्हं तमपूजयत् // KAव्क्_११.३२ //
1251 SK सादरेणार्थितां तेन स्वसुतामिव मालिकाम् / रत्नार्हाय ददौ तस्मै स्मरमङ्गलमालिकाम् // KAव्क्_११.३३ //
1252 SK तामादाय मनोजन्मवैजयन्तीं सितस्मिताम् / निजं जगाम नगरं गजमारुह्य भूपतिः // KAव्क्_११.३४ //
1253 SK तस्मिन्नागनगोत्सङ्गे सा लोलालकषट्पदा / बभौ राजवसन्तेन संगता नवमालिका // KAव्क्_११.३५ //
1254 SK राजधानीं समासाद्य सुन्दर्या सहितस्तया / रत्नहर्म्यकरोदारमन्दिरे विजहार सः // KAव्क्_११.३६ //
1255 SK वर्षाकाराभिधा देवी राज्ञः प्रथमवल्लभा / अभिन्नवृत्तिं ताम् मेने राजलक्ष्मीमिव क्षितिः // KAव्क्_११.३७ //
1256 SK दिव्यस्पर्शेन सा तस्याः सा चास्या रूपसंपदा / परस्परगुणोत्कर्षात्परं विस्मयमापतुः // KAव्क्_११.३८ //
1257 SK दिव्यरूपवती ज्येष्ठा दिव्यस्पर्शवती पर् आ / इति प्रवादः साश्चर्यस्तयुओर्लोकेषु पप्रथे // KAव्क्_११.३९ //
1258 SK अत्रान्तरे तयोर्दिव्यरूपसंस्पर्शकारणम् / आश्रमे भिक्षुभिः पृष्टः प्रोवाच भगवान् जिनः // KAव्क्_११.४० //
1259 SK पुरा श्रुतवराख्यस्य द्विजस्य गृहमेधिनः / कान्ता शिरीषिका चेति प्रिये भार्ये बभूवतुः // KAव्क्_११.४१ //
1260 SK स कदाचिदथो कान्ताभ्राता प्रव्रज्यया शनैः / प्रत्येकबुद्धतां यातः स्वसुर्भवनमाययौ // KAव्क्_११.४२ //
1261 SK त्रैमासिकोपचारेण स तया पत्युराज्ञया / भक्त्या निमन्त्रितस्तस्थौ तत्सप्त्न्यावपूजितः // KAव्क्_११.४३ //
1262 SK ते चारुमृदुभिर्भोगैस्तमभ्यर्च्यान्यजन्मनि / जाते ऽधुना चारुरूपदिव्यसंस्पर्शसंयुते // KAव्क्_११.४४ //
1263 SK कृष्टेषु प्रथमं प्रयुक्तविनयामादाय गोसंपदं सत्क्षेत्रेषु तपः प्रतत्प्तनुषु प्राप्तिष्वतिस्वादुताम् / यत्काले शुभबीजमुप्तमुचितं सत्कर्मशक्तेः परं भुज्यन्ते फलसंपदः सुमतिभिस्तस्यैव पाकोज्ज्वलाः // KAव्क्_११.४५ //
1264 SK इति सर्वज्ञवचनम् तथ्यमाकर्ण्य भिक्षवः / तत्तथेति विनिश्चित्य बभूवुः शान्तिसंश्रयाः // KAव्क्_११.४६ //
1265 SK अथ कालेन भूभर्तुर्मालिकायामभूत्सुतः / विरूढकेतिमुख्याख्यो विद्यासु च कृतश्रमह् // KAव्क्_११.४७ //
1266 SK प्रियस्तुल्यवयास्तस्य पुरोहितसुतो ऽभवत् / मातुर्दुःखेन जातत्वाद्विश्रुतो दुःखमातृकः // KAव्क्_११.४८ //
1267 SK कदाचित् सहितस्तेन हयारूढो विरूढकह् / प्राप शाक्यवरोद्यानं मॄगयायाम् विनिर्गतः // KAव्क्_११.४९ //
1268 SK न्यक्कारं चक्रिरे तत्र शाक्यास्तस्योद्यतायुधाः / अयं दासीसुतो ऽस्माकमिति दर्पप्रवादिनह् // KAव्क्_११.५० //
1269 SK गत्वासौ स्वपुरं तेषां वैरं दर्प्यमचिन्तयत् / कुलदर्पापवादो हि शल्यतोदः शरीरिणाम् // KAव्क्_११.५१ //
1270 SK तस्य निर्दह्यमानस्य तत्प्रतीकारचिन्तया / राज्याय जाता जनके जीवत्यपि परा स्पृहा // KAव्क्_११.५२ //
1271 SK स चारायणमुख्यानां मन्त्रिणां शतपञ्चकम् / स्ववशं पितुराकृष्य विदधे भेदयुक्तिभिः // KAव्क्_११.५३ //
1272 SK ततः कदाचित्संजातविवेकः पृथिवीपतिः / धर्मोपदेशश्रवणे वर्धमानादरः परम् // KAव्क्_११.५४ //
1273 SK चारात्यणगृहीताश्वं रथमारुह्य संयतः / द्रष्टुं जगाम सर्वज्ञं भगवन्तम् प्रसेनजित् // KAव्क्_११.५५ //
1274 SK प्रायाश्रमं भगवतः कृत्वा पादाभिवन्दनम् / धर्मान्वयम् स शुश्राव तत्प्रसादप्रसन्नधीः // KAव्क्_११.५६ //
1275 SK चारायणो ऽप्याशु गत्वा रथेन नगरं जवात् / अकरोदन्तरे तस्मिन् राजपुत्राभिषेचनम् // KAव्क्_११.५७ //
1276 SK भगवन्तमथामन्त्र्य नृपतिर्गन्तुमुद्यतः / ददर्श नानुगानग्रे न रथं न च मन्त्रिणम् // KAव्क्_११.५८ //
1277 SK स पद्भ्यामेव शनकैः प्रस्थिताम् पृथिवीपतिः / दूरादपश्यदायान्तीं वर्षाकारां समालिकाम् // KAव्क्_११.५९ //
1278 SK ते पृष्ट्वा तद्गिरा ज्ञात्वा सो ऽभिषिक्तं विरूढकम् / विससर्ज सुतैश्वर्यपरिभोगाय मालोकाम् // KAव्क्_११.६० //
1279 SK वर्षाकारां समादाय स मित्रस्य महीपतेः / अजातशत्रोर्नगरं प्रात राजगृहाभिधम् // KAव्क्_११.६१ //
1280 SK स तत्प्तश्छत्रविरहात् क्षुप्तिपासाश्रमान्वितः / ययौ वमन्निव श्वासं दीर्घेश्वारममारुतैः // KAव्क्_११.६२ //
1281 SK सुखमस्खलितं केन प्राप्तं कस्यायुरायतम् / न कस्यानुपदं दृष्टः क्षयः सपदि संपदः // KAव्क्_११.६३ //
1282 SK स जीर्णमूलकं भुक्त्वा कर्ममूलमिवायतम् / क्षणं पीत्वा च पानीयं पपाताप्तविषूचिकः // KAव्क्_११.६४ //
1283 SK अनित्यतामविज्ञाय मोहाय पतते जनह् / स चापायनिकायस्य कायस्योपायतृष्णया // KAव्क्_११.६५ //
1284 SK अजातशत्रुः श्रुत्वैव कोसलेश्वरमागतम् / अभ्येत्य पांशुपूर्णास्यं विगतासुं ददर्श तम् // KAव्क्_११.६६ //
1285 SK तस्य जायानुयातस्य स कृत्वा देहसत्क्रियाम् / भगवन्तं ययौ द्रुष्टुं सुगतं दुःखशान्तये // KAव्क्_११.६७ //
1286 SK स तं प्रणम्य प्रोवाच भगवन् कोसलेश्वरः / पुरं मे सुहॄदः प्राय निर्धनो निधनं गतः // KAव्क्_११.६८ //
1287 SK धिङ्भामसंपदं पापं मिहादयशसः पदम् / विभवो येन नैवायं मित्रोपकरणीकृतः // KAव्क्_११.६९ //
1288 SK हृदये विनिवेश्याशां प्राप्तः सुहॄदमापदि / सुहृन्नैष्फल्यमायाति यस्य किं तेन जीवता // KAव्क्_११.७० //
1289 SK मित्रोपकरणं लक्ष्मीर्दीनोपकरणम् धनम् / भीतोपकरणं प्राणा येषां तेषां सुजीवितम् // KAव्क्_११.७१ //
1290 SK कुकर्म किं कृतं तेन भगवन् ऊर्वजन्मनि / यस्य पाकेन पर्यन्ते प्रपेदे सो ऽतिदुर्दशाम् // KAव्क्_११.७२ //
1291 SK इति पृष्टः क्षितीशेन भगवान् साश्रुचक्षुषा / तमूचे तापशमनीं दिशन् दशनचन्द्रिकाम् // KAव्क्_११.७३ //
1292 SK मा शुचः पृथिवीपाल स्वभावो ऽयं भवस्थितः / एवंविधैव भावानामसत्यानामनित्यता // KAव्क्_११.७४ //
1293 SK विसारिसंसारवनान्तरे ऽस्मिन् निसर्गलोलः किल कामभृङ्गः / स्वच्छन्दजातजनपुष्करजीवपुञ्जकिञ्जल्कपुञ्जमनिशं कवलीकरोति // KAव्क्_११.७५ //
1294 SK तरङ्गन्तो भोगाश्चकितहरिणीलोचनचलाः क्षणे ऽलक्ष्या लक्ष्मीर्जनजलदविद्योतनतडित् / शरीराब्जे बालातपचपलरागं नववयः क्षयं याति क्षिप्रं भवमरूतटे जीवितकणः // KAव्क्_११.७६ //
1295 SK मनो मैत्रीपात्रं परहितरतिर्धर्मधनता मदोद्भेदच्छेदक्षमशमविचारे परिचयः / अयं तत्वान्वेषो विषयसुखवैमुख्यसुखिनाम् असारे संसारे परिहृतविकारः परिभवः // KAव्क्_११.७७ //
1296 SK जनह् शोचति दुःखेषु क्षिप्रं हत इवाश्मना / न करोति पुनस्तीव्रतदापातप्रतिक्रियाम् // KAव्क्_११.७८ //
1297 SK पश्यतो ऽपिभवायासं निर्विवेकस्य सर्वथा / क्रियते किं जनस्यास्य मोहादकुशलस्पृशः // KAव्क्_११.७९ //
1298 SK पुरा विप्रः सुशर्माख्यः कुतश्चित्प्राप्य मूलकम् / निधाय जननीहस्ते ययौ स्नातुं नदीतटम् // KAव्क्_११.८० //
1299 SK सापि प्रत्येकबुद्धाय ताम् पाप्ताय तदन्तरे / प्रणता पात्रहस्ताय तदेवाभिमूखी ददौ // KAव्क्_११.८१ //
1300 SK अथ स्नात्वा समायातस्तत्सुतस्त्वरितं क्षुधा / जननीं भोजनारम्भे ययाचे निजमूलकम् // KAव्क्_११.८२ //
1301 SK पुण्यं पुत्रानुमोदस्व तन्मयातिथये ऽर्पितम् / इति मातुर्वचः श्रुत्वासो ऽभूद्विद्ध इवेषुणा // KAव्क्_११.८३ //
1302 SK सद्यो विषूचिकार्तस्य मन्मूलकमनल्पकम् / कुक्षिं भित्त्वा विनिर्यातु प्राणैः सह त वातिथेः // KAव्क्_११.८४ //
1303 SK इति तस्याप्तपापस्य वाक्यारुष्येण भूयसा / विसूचिकैव पर्यन्ते बभूवपरजन्मनि // KAव्क्_११.८५ //
1304 SK प्राक्पुण्यान्तरपाकेन स एवाद्य प्रसेनजित् / विपुलं राज्यमासाद्य तयैवान्ते क्षयं गतः // KAव्क्_११.८६ //
1305 SK संसारपथपान्थानामेवं कर्म शुभाशुभम् / पाथेयमिव हस्तस्थम् भोगायैवोपपद्यते // KAव्क्_११.८७ //
1306 SK इति श्रुत्वा भगवतस्तथ्यं पथ्यं च तद्वचः / एवमेतदिति ध्यात्वा तं प्रणम्य ययौ नृपः // KAव्क्_११.८८ //
1307 SK अत्रान्तरे प्राप्तराज्यः शाक्यवैरं विरूढकः / पुरोहितसुतेनैत्य स्मारितस्तत्क्षयोद्यतः // KAव्क्_११.८९ //
1308 SK प्रययौ शाक्यनगरं गजाश्वरथरेणुना / मोहेनेव दिशां कुर्वन् निर्विवेकं धियामिव // KAव्क्_११.९० //
1309 SK सर्वज्ञो भगवान् ज्ञात्वा तस्य तद्दुष्टचेष्टितम् / गत्वा शाक्यपुरोपान्ते तस्थौ शुष्कतरोरधह् // KAव्क्_११.९१ //
1310 SK दूरात्तत्र स्थितं दृष्ट्वा तमागच्छन् विरूढकः / अवतीर्य रथादग्रमभ्येत्य प्रणतो ऽवदत् // KAव्क्_११.९२ //
1311 SK सत्सु स्निग्धपलाशेषु घनच्छायेषु शाखिषु / भगवन्नत्र विश्रान्तिः किमु शुष्कतरोरधः // KAव्क्_११.९३ //
1312 SK इत्युक्तः क्षितिपालेन तं प्राह भगवान् जिनः / ज्ञातिच्छाया नरपतेः चन्दनादपि शीतला // KAव्क्_११.९४ //
1313 SK नास्ति ज्ञातिसमं वित्तं नास्ति ज्ञातिसमा धृतिः / नास्ति ज्ञातिसमा छाया नास्ति ज्ञातिसमह् प्रियः // KAव्क्_११.९५ //
1314 SK ममैते भूपते शाक्या ज्ञातयस्यत्पुरान्तिके / जातः प्रियो ऽयं तत्प्रीत्या शुष्कशाखो ऽपि पादपः // KAव्क्_११.९६ //
1315 SK श्रुत्वैतद्विरतामर्षः शाक्यानां पक्षपातिनम् / भगवन्तं विदित्वैव न्यवर्ततः विरूढकः // KAव्क्_११.९७ //
1316 SK भगवानपि शाक्यानां ज्ञात्वागामि भयं ततः / श्रेयसे शुद्धसत्त्वानाम् विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_११.९८ //
1317 SK श्रोतापत्तिफलं कैश्चित् सकृदागामि चापरैः / अनागामिफलं चान्यैः संप्राप्तं तस्य शासनात् // KAव्क्_११.९९ //
1318 SK शेषास्तु मूढमतयः शाक्याः प्रापुर्न तत्पदम् / सन्ति के ऽपि खगा येषाम् वासरे तिमिरो ऽद्भवः // KAव्क्_११.१०० //
1319 SK निवृत्तस्याथ नृपतेः पुरोहितसुतस्ततः / वैरसर्पस्य सुप्तस्य विदधे प्रतिबोधनम् // KAव्क्_११.१०१ //
1320 SK स तेन प्रेरितश्चक्रे मतिं शाक्यकुलक्षये / वैरानलं प्रचलनं करोति पिशुनानिलः // KAव्क्_११.१०२ //
1321 SK घोरदुर्जनमन्त्रेण सहसोत्थापिताः खलाः / वेताला क्षितिपालाश्च न कस्य प्राणहारिणह् // KAव्क्_११.१०३ //
1322 SK सैन्ये गजरथोदग्रे ततस्तस्मिन् प्रसर्पति / बभूव पुरसंक्षोभः शाक्यानां रूद्धवर्त्मनाम् // KAव्क्_११.१०४ //
1323 SK तस्मिन् भगवान् रक्षार्थं शाक्यानां पक्षपातिनम् / समुद्यतं तत्र महामौद्गल्यायनमब्रवीत् // KAव्क्_११.१०५ //
1324 SK शाक्यानां कर्मदोषो ऽयं सर्वथा समुपस्थितः / तत्र रक्षविधानं ते गगने सेतुबन्धनम् // KAव्क्_११.१०६ //
1325 SK पुंसमविन्त्यविभवानि शुभाशुभानि आयान्ति यान्ति च मुहुर्निरवग्रहाणि / कर्माक्षराणि निजजन्मपदस्वहस्तन्यस्तानि नाम न भवन्ति निरर्थकानि // KAव्क्_११.१०७ //
1326 SK इति वाक्याद्भगवतस्तस्मिन् याते प्रणम्य तम् / चक्रिरे संविदं शाक्याह् प्रत्यासन्ने विरूढके // KAव्क्_११.१०८ //
1327 SK हिंसास्माभिर्न कर्तव्या प्राणिमात्रस्य कस्यचित् / शराः शरीरमस्माकं विशन्त्वरिसमीरिताः // KAव्क्_११.१०९ //
1328 SK इति संविदमाधाय ते वियष्टिकपाणयः / धीर्ः परोद्यमे तस्थुरवारयितकार्मुकाः // KAव्क्_११.११० //
1329 SK अत्रान्तरे कर्मयोगान्निजदेशानवस्थितः / अज्ञात्वा संविदं शाक्यः शंपाकह् समुपाययौ // KAव्क्_११.१११ //
1330 SK स दृष्ट्वा नगरे बद्धसंनाहं वसुधाधिपम् / कोपादेकश्चकारास्य रणे सुभटसंक्षयम् // KAव्क्_११.११२ //
1331 SK युद्धे पुरुषसिंहेन हतास्ते वीरकुञ्जराः / प्रययुः स्पृहणीयत्वं यशोभिर्मक्तिकैरिव // KAव्क्_११.११३ //
1332 SK स को ऽपि तस्य जज्वाल कोपितस्य परैरसिः / स ययौ यत्प्रतापेन विपुलां रिपुवाहिनीम् // KAव्क्_११.११४ //
1333 SK प्रवेशं न ददुः शाक्याः शंपाकस्य द्विषां वधात् / स्वजनो ऽपि परित्यक्तः स तैर्निस्त्रिंशकर्मणा // KAव्क्_११.११५ //
1334 SK निजे ऽपि विमुखाः क्रूरे साधवे दह्रम्बन्धवः / धानादपि वदान्यत्वं सुकृतं स्वजनादपि // KAव्क्_११.११६ //
1335 SK * * * * * * * * / शतमौचित्यनित्यानामायुषो ऽपि यशः प्रियम् // KAव्क्_११.११७ //
1336 SK निर्वासितः स तैः प्राप्तः शनैर्भगवतो ऽन्तिकम् / ययाचे ऽभ्युदयायाइव तं किंचिन्निजलाञ्छनम् // KAव्क्_११.११८ //
1337 SK ऋद्धं भगवता दत्तं निजकेशनखांशकम् / स जगाम समादाय वाकुडं नाम मण्डलम् // KAव्क्_११.११९ //
1338 SK तत्र प्रज्ञाप्रभावेण शौर्योत्साहगुणेन च / स प्राप राज्यं धीराणां सर्वत्र सुलभाः श्रियः // KAव्क्_११.१२० //
1339 SK दक्षाणां लक्षणं लक्ष्मीः सहजं विदुषां यशः / व्यवसायसहायानाम् कलत्रं सर्वसिद्धयः // KAव्क्_११.१२१ //
1340 SK तत्र स्थितो भगवतः सो ऽथ केशनखांशके / स्तूपप्रतिष्ठामकरोद्वर्रत्नविराजिताम् // KAव्क्_११.१२२ //
1341 SK विरूढको ऽपि शाक्यानां वैरपारतितीर्षया / पुनर्युक्त्या पुरद्व्हारभेदेन सहसाविशत् // KAव्क्_११.१२३ //
1342 SK हत्वा तत्र सहस्राणि शाक्यानां सप्तसप्तति / बद्ध्वा कन्याकुमाराणां स सहस्रमथाहरत् // KAव्क्_११.१२४ //
1343 SK शतानि पञ्च शाक्यानाम् गजैर्लोहैश्च मर्दनैः / संप्रमृज्य पुरीं चक्रे कृतान्तनगरीमिव // KAव्क्_११.१२५ //
1344 SK भगवानपि शाक्यानाम् शत्रूणा भेदनं कृतम् / कर्मानुबद्धं विज्ञायं बभूव विमनाः क्षणम् // KAव्क्_११.१२६ //
1345 SK पप्रच्छुस्तं समभ्येत्य भिक्षवः करुणाकुलाः / किं कर्म विहितं शाक्यैर्घोरं यस्येदृशं फलम् // KAव्क्_११.१२७ //
1346 SK भगवाननिति तैः पृष्टः सर्वज्ञस्तानभाषत / निजकर्मविपाकेन शाक्यानामेष संक्षयः // KAव्क्_११.१२८ //
1347 SK कृष्टौ पुरा महामत्स्यौ धीवरैः सरितो ऽन्तरात् / तदा निकृत्तौ शल्येन भूयो ऽप्यव्यथयन् धृतौ // KAव्क्_११.१२९ //
1348 SK कालेन चारुताम् यातैस्तैरेव परजन्मनि / हतौ गॄहपती दग्ध्वा तावेव धनहारिभिः // KAव्क्_११.१३० //
1349 SK तौ मत्स्यौ तौ गृहस्थौ च विरूढकपुरोहितौ / दासानां तस्कराणाम् च शाक्यानाम् मृत्युताम् गतौ // KAव्क्_११.१३१ //
1350 SK इति श्रुत्वा भगवतः कर्मणां फलसंततिम् / अविसंवादिनीमेव मेनिरे सर्वभिक्षवः // KAव्क्_११.१३२ //
1351 SK विरूढको ऽथ स्वपुरं प्राप्य विजयदुर्मदः / जेतानाम्ना सुतेनोक्तः प्रणयाद्बाललीलया // KAव्क्_११.१३३ //
1352 SK देव किं निहताः शाक्यान् न ते ऽस्माकं कृतागसः / इति ब्रुवाणमवधीन्निजसूनुं विरूढकः // KAव्क्_११.१३४ //
1353 SK निपातमतिमृद्गति निहन्ति न करोति किम् / मदलब्धनधायासो मातंग इव दर्जनः // KAव्क्_११.१३५ //
1354 SK स जगाद सभासीनः स्वभूजाववलोकयन् / अहो नु मम तापाग्नौ द्विसद्भिः शलभायितम् // KAव्क्_११.१३६ //
1355 SK कृतान्ततोरणस्तम्भौ प्राज्यौ मम भुजाविमौ / निष्ःशेषवधदीक्षायां शाक्यानां गुरुतां गतौ // KAव्क्_११.१३७ //
1356 SK तं तस्य विक्रमं श्लाघ्यं हृतास्ताः शाक्यकन्यकाः / श्रुत्वा बभाषिरे तीव्रमुद्वेगनमिताननाः // KAव्क्_११.१३८ //
1357 SK कर्मपाशनिबद्धानां खगानामिव देहिनाम् / निधनोल्लङ्घने शक्तिर्नास्ति पक्षवतामपि // KAव्क्_११.१३९ //
1358 SK येनाग्निः शममेति तत्किल जलं प्राप्नोत्यलं वाडवः तिग्मांशुग्रहणं करोति समये हेलावलेह्यं तमह् / पर्यालोचनवर्त्मनामविषयं साश्चर्यचर्यास्पदं सर्वं कार्मिकतन्त्रयन्तिमिदं कः कस्य कर्तुं क्षमः // KAव्क्_११.१४० //
1359 SK एतदाकर्ण्य नृपतिः पदान्तर इवेरगः / करच्छेदं दिदेशासां घोरामर्षविषोत्कटः // KAव्क्_११.१४१ //
1360 SK तीरे यस्याः कृतं तासां पाणिच्छेदनवैशसम् / साद्यापि हस्तगभति ख्याता पुष्करिणी भुवि // KAव्क्_११.१४२ //
1361 SK लतास्वपि ह्कुकूलाग्निं क्रकचं नलीनीष्वपि / मालास्वपि शिलावर्षं पातयन्त्येव निर्घृणाः // KAव्क्_११.१४३ //
1362 SK ताश्छिन्नपाणिकमलास्तत्र तीव्रव्यथातुराः / भगवन्तं धिया ध्यात्वा शरणं शरणं ययुः // KAव्क्_११.१४४ //
1363 SK तासां विज्ञाय सर्वज्ञस्तीव्राम् मर्माहतिव्यथाम् / शचीमचिन्तयद्देवीं तत्समाश्वासनोचिताम् // KAव्क्_११.१४५ //
1364 SK तत्स्पर्शजातहस्ताब्जास्ता दिव्यवसनावृताः / ययुश्चित्तप्रसादेन ताह् स्वर्गं त्यक्तविग्रहा // KAव्क्_११.१४६ //
1365 SK देवकल्पास्तमासाद्य दिव्यपद्मोत्पलाङ्किताः / धर्मदेशनया शास्तुस्ताह् प्रापुर्विपुलं पदम् // KAव्क्_११.१४७ //
1366 SK भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टस्तत्कर्मफलमभ्यधात् / पाणिचापल्यमेताभिः कृतं भिक्षुविडम्बने // KAव्क्_११.१४८ //
1367 SK कर्मणस्तस्य पाकेन विशसे पतिताह् परम् / मयि चित्तप्रसादेन प्राप्ताश्चैताह् शुभां गतिम् // KAव्क्_११.१४९ //
1368 SK इत्युक्त्वा भगवान् कर्मफलपाकविचित्रताम् / भुक्षीणां तत्प्रसङ्गेन विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_११.१५० //
1369 SK अत्रान्तरे गूढचारी राज्ञा प्रणिहितश्चरः / भगवच्चरितं ज्ञात्वा विरूढकमुपाययौ // KAव्क्_११.१५१ //
1370 SK सो ऽवदद्देव भिक्षूणां तेनेदं कथितं पुरः / स्वकर्मफलमासन्नं तस्य पश्यामि भूपतेह् // KAव्क्_११.१५२ //
1371 SK सप्ताहेनाग्निना दग्धः स पापात्मा पुरोहितः / अवीचिनाम्नि नरके दुःसहे निपतिष्यति // KAव्क्_११.१५३ //
1372 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा नृपतिः सपुरोहितः / यत्नादुवास सप्ताहं जलान्वितगृहान्तरे // KAव्क्_११.१५४ //
1373 SK क्षणावशेषे सप्ताहे तस्मिन्नन्तःपुरं गते / सूर्यकान्तार्कसंतापयोगाज्जज्वाल पावकः // KAव्क्_११.१५५ //
1374 SK उद्भूतेन प्रलयसवनावर्तिनेवाशु वेगान् निर्दग्धो ऽसौ धगिति शिखिना नारकं प्राप वह्निम् / अस्मिंल्लिके ज्वलनजटिलाः पापिनां प्रेत्य रागाः सर्वत्रैव स्थिरसुखभुवः शीतलाः पुण्यभाजाम् // KAव्क्_११.१५६ //
1375 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां विरूढकावदानं नाम एकादशः पल्लवः //
1376 SK १२. हारीतिकादमनावदानम् /
1377 SK दुःखं नुदन्ति सुखसंपदमादिशन्ति संजीवयन्ति जनताम् तिमिरं हरन्ति / सन्मानसस्य कलयन्ति विकासहासं सन्तः सुधार्द्रवदनाः शशिन कराश्च // KAव्क्_१२.१ //
1378 SK बिम्बिसारः क्षितेः सारे पुरे राजगृहाभिधे / सारः समस्तभूपानामभूद्भूमिपुरंदरः // KAव्क्_१२.२ //
1379 SK क्षमाधारे भुजे यस्य क्षमाधारे च चेतसि / बाह्यः समस्तचित्तानामशु न्यस्तकरो जनः // KAव्क्_१२.३ //
1380 SK कुर्वतस्त्यागशौर्याभ्यामाशायाः परिपूरणम् / पाणौ विमुक्तरत्नौघे सुबद्धो ऽभूदसिग्रहः // KAव्क्_१२.४ //
1381 SK कदाचिदभवत्तस्य विप्लवो नगरे गुरुः / नवाभ्युदयसंजातदर्पकाल इवाकुलः // KAव्क्_१२.५ //
1382 SK तमास्थानसमासीनं जनचिन्ताकृतक्षणम् / व्यजिज्ञिपत सौराजं प्रजानां जनकोपमम् // KAव्क्_१२.६ //
1383 SK देव दिव्यप्रभावस्य नियतः शासनेन ते / जनह् सदा समुद्रो ऽयं मर्यादां नातिवर्तते // KAव्क्_१२.७ //
1384 SK येनास्य कृतवृत्तस्य सन्मार्गेण प्रसर्पतः / उपसर्गोद्गमः कस्मादकस्मादयमागतः // KAव्क्_१२.८ //
1385 SK स्वधर्मसंवृत्तेन हि कर्मणा शर्मणा नृणाम् / सुनृपे न च गुह्यानामापतन्ति विपत्तयः // KAव्क्_१२.९ //
1386 SK ह्रियन्ते नः प्रसूतीनां गृहिणीनांगृहे कया / अपत्यानि फलानीव सत्क्रियाणामसंयमात् // KAव्क्_१२.१० //
1387 SK किंतु भूतान्न विद्मस्तान् मायाम् चापि महीपते / यत्प्रभावेण नीयन्ते कुलानि निरपत्यताम् // KAव्क्_१२.११ //
1388 SK इति तेषां गिरा भूभृदभूत्संक्रान्ततद्व्यथः / परं दुःखं विशत्यन्तः सतां केदारवारिवत् // KAव्क्_१२.१२ //
1389 SK सर्वाङ्गव्यापिना तेन जनदुःखेन भूयसा / विषेणेवावृतः सो ऽभूदुद्भ्रान्तहृदयः क्षणम् // KAव्क्_१२.१३ //
1390 SK सो ऽब्रवीत् किं करोम्यत्राभुजाधीने विपौरूषे / कथं नाम प्रवर्तन्ते दुर्लक्ष्येषु प्रतिक्रियाः // KAव्क्_१२.१४ //
1391 SK दिनमेकं व्रजन्त्वद्य भवन्तो निजमास्पदम् / सव्रतश्चिन्तयाम्येव रक्षां वः प्रस्वक्षये // KAव्क्_१२.१५ //
1392 SK इति राजवचः श्रुत्वा हृष्टाः पौरमहत्तमाः / जगदुस्तं समावर्ज्य पूजाव्यञ्जनमज्ण्जलिम् // KAव्क्_१२.१६ //
1393 SK देव त्वदवधानेन प्रणयाकर्णनेन च / त्वयि विन्यस्तचिन्तानां नास्माकमधुना श्रमः // KAव्क्_१२.१७ //
1394 SK अनुद्धतमुदारं च् अत्वत्प्रसादावलोकनम् / इदमेव जनस्यास्य जीवितानीव वर्षति // KAव्क्_१२.१८ //
1395 SK किं पुनः प्रियमेतत्ते पीयूषसदृशं वचः / तापापहं मृहु स्वादु किं किं न विदधाति नः // KAव्क्_१२.१९ //
1396 SK कृती कृतज्ञः कारुण्यनिधिः सुलभदर्शनः / लभ्यते भाग्यभोग्येन सौजन्यसरलः प्रभु // KAव्क्_१२.२० //
1397 SK पीयूषादतिपेशलः परिचयः श्राव्यं वचः पञ्चमम् आचारः शरदिन्दुवृन्दमहसो ऽस्यानन्दसंदोहदः / सच्चित्ते वसतां सताम् किमपरं पुष्पान्मनह् कोमलं सौजन्यं हरिचन्दनादपि परं संतापनिर्वापणम् // KAव्क्_१२.२१ //
1398 SK इत्युक्त्वा प्रययुः पौरास्तं प्रणम्य प्रसादिनम् / किरन्तस्तद्गुणोदारामाशाकुसुममालिकाम् // KAव्क्_१२.२२ //
1399 SK राजापि नगरे कृत्वा भूतपूजाविधिक्रमम् / शान्तिस्वस्तिकसंभारं चकार नियतव्रतः // KAव्क्_१२.२३ //
1400 SK यक्षी हारीतिका नाम बालकान् पुरवासिनी / हरतीति स शुश्राव पुरदेवतयोदितम् // KAव्क्_१२.२४ //
1401 SK ततः पौरजनैः सार्धं सामात्यः पृथीवीपतिः / कलन्दकनिवासाख्ये स्थितं वेणुवनाश्रमे // KAव्क्_१२.२५ //
1402 SK भगवन्तं ययौ द्रष्टुं सुगतं दोषशान्तये / सर्वदुःखज्वरायासजुषामकटुकौषधम् // KAव्क्_१२.२६ //
1403 SK तं दृष्ट्वा नृपतिर्दूरात्प्रणम्य प्रियदर्शनम् / उपविश्याग्रतस्तस्मै पौरदुःखं न्यवेदयत् // KAव्क्_१२.२७ //
1404 SK भगवानपि विज्ञाय पौराणां संततिक्षयम् / चिन्तानिश्चञ्चलः क्षिप्रमुवाच करुणानिधिः // KAव्क्_१२.२८ //
1405 SK स विसृज्य जगद्बन्धुः सनृपं पौरमण्डलम् / पात्रचीवरमादाय ययौ यक्षीनिकेतनम् // KAव्क्_१२.२९ //
1406 SK तया विरहितं प्राप्य तद्गृहं भगवान् जिनः / प्रियंकराख्यं तत्पुत्रं निनायैकमदर्शनम् // KAव्क्_१२.३० //
1407 SK याते भगवति क्षिप्रं यक्षी स्वगृहमागता / प्रभूतपुत्रा नापश्यत् प्रियं पुत्रं प्रियंकरम् // KAव्क्_१२.३१ //
1408 SK तमीक्षमाणां विवशा हृतवत्सेव धेनुका / बभ्राम संभ्रमोद्भ्रान्ता सा जनेषु चा // KAव्क्_१२.३२ //
1409 SK हा प्रियंकर हा पुत्र क्क नु पश्यामि ते मुखम् / इति प्रलापिनी तारं निःशेषाः सा ययौ दिशः // KAव्क्_१२.३३ //
1410 SK सा विचित्याशु सर्वाशा निराशा पुत्रदर्शने / क्रोशन्ती पर्वतद्वीपं समुद्रवलयम् ययौ // KAव्क्_१२.३४ //
1411 SK मर्त्यभूमिमतिक्रम्य घोरेषु नगरेषु सा / स्वर्गोद्देशेष्व शेषेषु विमानोद्यानशालिषु // KAव्क्_१२.३५ //
1412 SK श्रान्ता क्कचिन्न विश्रान्ता यक्षिणी प्रणिघातिनी / पुत्रमन्विष्य नापश्यल्लोकपालपुरेषु च // KAव्क्_१२.३६ //
1413 SK कुबेरस्याथ वचसा गत्वा च सुगताश्रमम् / भगवन्तं वियोगार्ता शरण्यं शरणं ययौ // KAव्क्_१२.३७ //
1414 SK तया तद्दुःखवृत्तान्तं सम् निशम्य निवेदितम् / तामवोचत शोचन्तीं किंचित् स्मितसिताधरः // KAव्क्_१२.३८ //
1415 SK हारीति तव पुत्राणां सन्ति पञ्चशतान्यहो / इति तेनोक्तमाकर्ण्य यक्षी दुःखक्षतावदत् // KAव्क्_१२.३९ //
1416 SK पुत्रलक्षे ऽपि भगवन् सह्या नैकसुतक्षतिः / पुत्रात् प्रियतरं नान्यत्किं दुःखं तत्क्षयात्परम् // KAव्क्_१२.४० //
1417 SK पुत्रवानेव जानाति पुत्रस्नेहविषव्यथाम् / सहजैव सुतप्रीतिरकारणनिबन्धना // KAव्क्_१२.४१ //
1418 SK * * * * * * * * / मलिनो विकलः क्षीणः कस्य नेन्दुसमः सुतः // KAव्क्_१२.४२ //
1419 SK इति यक्षवधूवाक्यं श्रुत्वा वात्सल्यविह्वलम् / भूतानुकम्पी भगवान् सस्मितस्तामभाषत // KAव्क्_१२.४३ //
1420 SK शोको ऽयं बह्य्पुत्राया यद्येकविरहे तव / हृते त्वयैकवत्सानां पुत्रैके कीदृशी व्यथा // KAव्क्_१२.४४ //
1421 SK त्वं प्रविश्य सदा गेहं स्त्रीणां पुत्रमलक्षितां / अश्नासि पुत्रमातापि व्याघ्रीव मृगशावकान् // KAव्क्_१२.४५ //
1422 SK येन येन स्वदेहस्य दुःखं यात्युपभोगताम् / न तत्परस्य कुर्वीत समानो ऽनुभवः शुचाम् // KAव्क्_१२.४६ //
1423 SK त्वं बुद्धधर्मसंघानां त्रीणि शिक्षापदानि चेत् / गृह्णासि हिंसाविमुखी तत्प्राप्नोषि प्रियं सुतम् // KAव्क्_१२.४७ //
1424 SK इत्युक्ता सा भगवता प्राप्तशिक्षापदा ततः / हिंसाविरामात् तं गत्वा पुत्रं प्राप प्रियंकरम् // KAव्क्_१२.४८ //
1425 SK तस्याः प्राग्जन्मवृत्तान्तं तस्याः कर्मफलान्वयम् / भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टस्तद्वृत्तान्तमभाषतः // KAव्क्_१२.४९ //
1426 SK पुरास्मिन्नेव नगरे पौराह् के ऽप्युपभोगिनः / पर्वतोद्यानमालायां विजह्रुर्नर्तनादिना // KAव्क्_१२.५० //
1427 SK अथ तेन पथा कापि गोपकान्ता घनस्तनी / मथितं पण्यमादाय हरिणाक्षी समाययौ // KAव्क्_१२.५१ //
1428 SK गर्भभारालसगतिः प्रत्युप्ता गजगामिनी / सा शनैरुपसर्पन्ती सस्पृहं तान् व्यलोकयत् // KAव्क्_१२.५२ //
1429 SK तस्या वनमृगीमुग्धैरवदग्धा विलोकनैः / असंवृत्ता विलासार्द्रैस्ते ऽपि सोत्कण्ठतां ययुः // KAव्क्_१२.५३ //
1430 SK सा तैर्निमन्त्रिता तत्र मदनक्षीबताम् गता / हारितं सहसा शीलं न विवेद प्रमादिनी // KAव्क्_१२.५४ //
1431 SK ततस्तेषू प्रयातेषु तदा तस्या रतिश्रमात् / पपात सह धैर्येण गर्भऊ कोपादिवारुणः // KAव्क्_१२.५५ //
1432 SK अत्रान्तरे समायातं तत्पुण्यैस्तेन वर्तमना / प्रत्येकबुद्धं साद्राक्षीत्कायचित्तप्रसादनम् // KAव्क्_१२.५६ //
1433 SK सास्मै मथितमूल्याप्तमाम्राणां शतपञ्चकम् / दूरात्प्रणामविनता मनसैव न्यवेदत् // KAव्क्_१२.५७ //
1434 SK ततः पुण्यर्द्धिमत्यस्मिन् जाता यक्षकुले ऽधुना / जातमाम्रार्पणेनास्याः पुत्राणां शतपञ्चकम् // KAव्क्_१२.५८ //
1435 SK हिंसावती पापत्यागात् शीलविस्मरणात्परम् / प्रत्येकबुद्धप्रणतेः प्राप्तशिक्षापदाद्य सा // KAव्क्_१२.५९ //
1436 SK इति विविधविपाकं कर्मतन्त्रं विचित्रं किमपिस कथयित्वा तत्र यक्षाङ्गनायाः / कलितकुशलसेतुः संभवाब्धौ जनानामकृत सुकृतचित्तं सर्वलोकस्य शास्ता // KAव्क्_१२.६० //
1437 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां हारीतिकादमनावदानं नाम द्वादशः पल्लवः //
1438 SK १३. प्रतिहार्यावदानम् //
1439 SK यः संकल्पपथा सदैव चरति प्रोज्जृम्भमाणाद्भुतं स्वप्नैर्यस्य न संगतिः परिचयो यस्मिन्नपूर्वक्रमः / वाणी मौनवती च यत्र हि नृणां यः श्रोत्रनेत्रातिथिस् तं निर्व्याजजनप्रभावविभवं मनौरमेयं नुमः // KAव्क्_१३.१ //
1440 SK पुरे राजगृहाभिख्ये बिम्बिरासेण भूभुजा / पूज्यमानं जिन दृष्ट्वा स्थितं वेणुवनाश्रमे // KAव्क्_१३.२ //
1441 SK मात्सर्यविषसंतप्ता मूर्खाः सर्व्ज्ञमानिनः / न सेहिरे तदुत्कर्षं प्रकाशमिव कौशिकाः // KAव्क्_१३.३ //
1442 SK मलिनैः स्वविनाशाय परभागोदितैः सदा / क्रियते वासरस्पर्धा शार्वरैस्तिमिरोत्करैः // KAव्क्_१३.४ //
1443 SK मस्करी संजयी वैरैरजितः ककुदस्तथा / पूरणज्ञातिपुत्राद्या मूर्खाः क्षपणकाः परे // KAव्क्_१३.५ //
1444 SK ऊचुर्नृपतिमभ्येत्य मारमायाविमोहिताः / संघर्षद्वेषदोषेण धूमेनेवान्धकारिताः // KAव्क्_१३.६ //
1445 SK एष सर्वज्ञतामानी वने यः श्रमणः स्थितः / ऋद्धिप्रभावो भवता तस्यास्माकं च दृश्यताम् // KAव्क्_१३.७ //
1446 SK ऋद्धिप्रभावाद्यत्किंचित् जनव्यावर्जनोर्जितम् / द्र्श्यते महदाश्चर्यं प्रातिहार्यं तदुच्यते // KAव्क्_१३.८ //
1447 SK शक्तिः संसदि यस्यास्ति प्रतिहार्यस्य दर्शने / अस्माकं तस्य वा राजन् पूजाः सन्तु जगत्र्त्रये // KAव्क्_१३.९ //
1448 SK इति तेषाम् वचः श्रुत्वा तद्दर्पविमुखो नृपः / उवाच वाञ्छा केयं वः पङ्गूनां गिरिलङ्घने // KAव्क्_१३.१० //
1449 SK असमञ्जसमेवैतत् का स्पर्धाग्नेः पतङ्गकैः / नैतद्वाच्यं पुनर्वादी मया निष्कास्यते पुरात् // KAव्क्_१३.११ //
1450 SK इति राज्ञा गुणज्ञेन प्रत्याख्यातोद्यमाः खलाः / प्रययुस्ते निरालम्बे लम्बमाना इवाम्बरे // KAव्क्_१३.१२ //
1451 SK बिम्बिसारो नरपतिर्मूर्खतापक्षपातवान् / अन्यं व्रजामो भूपालमिति ते समचिन्तयन् // KAव्क्_१३.१३ //
1452 SK अत्राण्तरे भगवति श्रावस्तीमभितः पुरीम् / प्राप्ते तेजवनारामं दिगन्तानेव ते ययुः // KAव्क्_१३.१४ //
1453 SK ते प्रसेनजितं तत्र प्राप्य कोसलभूपतिम् / प्रातिहार्यकृतस्पर्धां तामेवास्मै न्यवेदयन् // KAव्क्_१३.१५ //
1454 SK गुणान्तरज्ञो नृपतिस्तेषाम् दर्पक्षयेच्छया / ऋद्धिसंदर्शनोत्साहाद्ययौ भगवतो ऽन्तिकम् // KAव्क्_१३.१६ //
1455 SK स समभ्येत्य विनयात् प्रणिपत्य तमब्रवीत् / भगवन् दर्पबलनं तीर्थ्यानां कर्तुमर्हसि // KAव्क्_१३.१७ //
1456 SK ऋद्धिस्पर्धानुबन्धेन त्वत्प्रभावदिदृक्षया / स्वगुणश्लाघयास्माकं तैः कर्णौ बधिरीकृतौ // KAव्क्_१३.१८ //
1457 SK प्रकाशय निजं तेजः सज्जनावर्जनम् विभो / तीर्थ्याभिधानामखिलं प्रयातु प्रलयं तमः // KAव्क्_१३.१९ //
1458 SK इति राजवचः श्रुत्वा निर्विकारो महाशयः / भगवान् विरतामर्षः सहर्षस्तमभाषतः // KAव्क्_१३.२० //
1459 SK राजन्नान्योपमर्दाय विवादाय मदाय वा / विवेकाभरणार्हो ऽयं क्रियते गुणसंग्रहः // KAव्क्_१३.२१ //
1460 SK मात्सर्यमलिनैः किं तैर्विचारविगुणैर्गुणैः / ये हरन्ति परोत्कर्षं स्पर्धाबन्धप्रसारिताः // KAव्क्_१३.२२ //
1461 SK गुणाच्छादनमन्यस्य स्वगुणेन करोति यः / धर्मस्तेनाप्रशस्तेन स्वयमेव निघातितः // KAव्क्_१३.२३ //
1462 SK सद्गुणानां परिक्षैव परवैलक्ष्यकारिणी / उचिता न हि शुद्धानां तुलारोहविडम्बना // KAव्क्_१३.२४ //
1463 SK गुणवानपि नायाति यः परेषु प्रसन्नताम् / स दीपहस्तस्तत्पात्रच्छायया मलिनीकृतः // KAव्क्_१३.२५ //
1464 SK लोक त एव सर्वज्ञा विद्मः किमधिकं वयम् / पराभिमानाभिभवप्रागल्भ्यं स्वपराभवः // KAव्क्_१३.२६ //
1465 SK इति श्रुत्वा भगवतः प्रशमाभिमतं वचः / भृशमभ्यर्थनां राजा चकाराश्चर्यदर्शने // KAव्क्_१३.२७ //
1466 SK ततः दृच्छ्राद्भगवता कृताभ्युपगमो नृपः / राजधानीं ययौ हृष्टः सप्ताहावधिसंविदा // KAव्क्_१३.२८ //
1467 SK अस्मिन्नवसरे भ्राता भूमिभर्तुरसोदरः / चचारान्तःपुरोपान्ते प्रासादतलवर्त्मना // KAव्क्_१३.२९ //
1468 SK सलीलं व्रजतस्तस्य कर्मवातैरिवेरिता / कुसुमस्रक् पपातांसे राजपत्नीकराच्च्युता // KAव्क्_१३.३० //
1469 SK तस्य विज्ञातदोषस्य दोषं संभाव्य साक्षिभिः / पिशुनाः किंवदन्तीं ताम् चक्रिरे राजगामिनीम् // KAव्क्_१३.३१ //
1470 SK छिद्रमल्पमपि प्राप्य क्षुद्राः सर्वापकारिणः / द्विजिह्वाः प्रविशन्त्याशु प्रभूनां शून्यमाशयम् // KAव्क्_१३.३२ //
1471 SK पिशुनप्रेतिरो राजा भ्रातुरीर्ष्याविषोल्बणः / छेदमस्यादिदेशाशु पाणिपादस्य मूर्च्छितः // KAव्क्_१३.३३ //
1472 SK निकृत्तपाणिचरणः कुमारः कर्मविप्लवात् / स वध्यवसुधाशायी विवेश विषमापदम् // KAव्क्_१३.३४ //
1473 SK तीव्रव्यथापरिवृतं शोचद्भिर्मातृबन्धुभिः / ददृशुस्तं क्षपणकाः क्षणं नयनचालने // KAव्क्_१३.३५ //
1474 SK तान् समभ्येत्य शोकार्तास्ते राजसुतबान्धवाः / जगदुस्तत्परित्राणसंलिप्ताः सर्वप्राणिनह् // KAव्क्_१३.३६ //
1475 SK दोषं निगृहीतो ऽयं कालनामा नृपात्मजम् / सर्वज्ञवादिनो यूयं प्रसादो ऽस्य विधीयताम् // KAव्क्_१३.३७ //
1476 SK इति तै प्रसरद्बाष्पैरर्थ्यमानाह् प्रलापिभिः / ते मौनिनो निष्प्रतिभा वैलक्ष्यादन्यतो ययुः // KAव्क्_१३.३८ //
1477 SK अथ तेन यथायातो भिक्षुः सुगतशासनात् / आनन्दो विदधे ऽङ्गानि तस्य सत्योपयाचनात् // KAव्क्_१३.३९ //
1478 SK राजपुत्रस्तु संजातपाणिपादः प्रसन्नधीः / जिनं शरणमभ्येत्य तदुपस्थायको ऽभवत् // KAव्क्_१३.४० //
1479 SK सप्तरत्रे व्यतीते ऽथ श्रान्तिहार्यं गृहं महत् / ऋद्धिं भगवतो द्रष्टुं महीपतिरकारयत् // KAव्क्_१३.४१ //
1480 SK उपविष्टे नृपे तत्र सह क्षपणकादिभिः / कल्पवृक्षीकृता भूमिरभवत् सुगतेच्छया // KAव्क्_१३.४२ //
1481 SK ततः प्राप्तेषु देवेषु द्रष्टुं भगवतः प्रभाम् / रत्नप्रदीपं भगवान् भेजे सिंहासनम् महत् // KAव्क्_१३.४३ //
1482 SK तेजोधातुं प्रपन्नस्य तस्य गण्डसमुद्गतैः / व्याप्तं पावकसंघातैरभूद्भुवनमण्डलम् // KAव्क्_१३.४४ //
1483 SK शान्ते शनैः कमलकाननसंनिकाशे वह्नौ समस्तभुवनस्थितिभङ्गभीत्या / देहात्ततो भगवतः करुणाम्बुराशेः पूर्णामृतोर्मिविमला रुचयः प्रसस्रुः // KAव्क्_१३.४५ //
1484 SK लावण्यसारमतिचन्द्रसहस्रकान्तिं तेजः प्रतानविफलीकृतसूर्यचक्रम् / तं नागनायकनिकायविलोचनानि प्रीत्या पपुः सुकृतलब्धमपूर्वहर्षम् // KAव्क्_१३.४६ //
1485 SK वैदूर्यनालविपुलारुणरत्नपात्रकान्तोल्लसत्कनककेसरकर्णिकानि / अभ्युद्ययुः क्षितितलादथ तत्समीपे पद्मानि सौरभभराहृतषट्पदानि // KAव्क्_१३.४७ //
1486 SK तेषूपविष्टमथ काञ्चनचारुकान्तिं स्निग्धेक्षस्णं सुगतचक्रमदृश्यतारात् / पीयूषपेशलशशिद्युतिशीतलेन यस्योदयेन सहसा सुखमाप लोकः // KAव्क्_१३.४८ //
1487 SK तेषां प्रभावविभवं बह्गवान् बभार मध्ये ऽधिकं कनकशैल इवाचलानाम् / सुस्कन्धबन्धुरघनद्युतिसंनिवेशः प्रांशुः सुरक्षितिरुहामिव पारिजातः // KAव्क्_१३.४९ //
1488 SK स्वर्गाङ्गनाकरकुशेशयकीर्यमाणैरम्लानमाल्यवलयैः कलितोत्तमाङ्गाः / तस्याननाम्बुजविलोकननिर्निमेषे मर्त्या अपि क्षणमवापुरमर्त्यभावम् // KAव्क्_१३.५० //
1489 SK व्योमाङ्गणेषु सुरदुन्दुभिशङ्खतूर्यघोषावृतः कुसुमवर्षमहाट्टहासः / गन्धर्वकिन्नरमुनीश्वरचारणानां स्फीटश्चचार भगवत्स्तुतिवादनादः // KAव्क्_१३.५१ //
1490 SK तत्रारुणाधरदलाद्दशनांशुशुभ्राद् व्याकीर्णकेशरकुलाद्दशनारविन्दात् / सत्सौरभं भगवतः स्वरसंनिवृत्तं धन्याः पपुर्मधुरवाङ्भधु पुण्यसूतम् // KAव्क्_१३.५२ //
1491 SK पापं विमुञ्चत निषिञ्चत पुण्यबीजं वैरं परित्यजत साम्यसुखं भजध्वम् / ज्ञानामृतं पिबतं मृत्युविषापहारि नेयं तनुः कुशलकर्मसखी चिराय // KAव्क्_१३.५३ //
1492 SK लक्ष्मीश्चला तरुणता च जरानुयाता कायो ऽप्यपायनिचयस्य निवास एव / प्राणाः शरीरककुटिषु मुहूर्तपान्था नित्योदये कुरुत धर्ममये प्रयत्नम् // KAव्क्_१३.५४ //
1493 SK इत्यादिभिर्भगवतः प्रविभक्तदीप्तज्ञानैर्विवेकविमलैः कुशलोपदेशैः / वज्रैरिवाशु दलनं प्रययौ जनानां सत्कायदृष्टिसमविंशतिशृङ्गशैलः // KAव्क्_१३.५५ //
1494 SK ऋद्धिप्रभां भगवतः प्रविभाव्य तीर्थ्या मन्त्रहता विषधरा इव भग्नदर्पाः / दीपा इवार्ककिरणप्रतिभाभिभूताश्चित्रार्पिता इव ययुश्चिरनिश्चलत्वम् // KAव्क्_१३.५६ //
1495 SK अत्रान्तरे भगवतः सततं विपक्षः सर्वात्मना क्षपणको नवधर्मयक्षः / क्षिप्तश्रवान् स वृतवर्षवरैश्चकार विद्रव्य रन्ध्रशरणान् भुवि वज्रपाणिः // KAव्क्_१३.५७ //
1496 SK अद्दिश्य तानथ कृपार्द्रभयाशरण्यः सर्वोपदेशविषयान् भगवान् बभाषे / भूभृद्वनाबनिमणिर्विवरादि सर्वं तेने भयेषु शरणं किल कातराणाम् // KAव्क्_१३.५८ //
1497 SK बुद्धिं प्रबोध मम धाम्बि निधाय बुद्धिं धर्मं ससंघमपि ये शरणं प्रपन्नाः / तेषा जगत्क्षयभयेष्वपि निर्भयाणां नैवान्यतः शरणदैन्यपरिग्रहो ऽस्ति // KAव्क्_१३.५९ //
1498 SK दुर्वारे परलोकतीव्रतिमिरे धर्मः प्रवृद्धो ऽशुमान् दानं दुःसहपापतापविपदामभ्युद्गमे वारिदः / प्रज्ञा मोहमहाप्रपातविषमश्वभ्रे करालम्बनं दैन्याक्रान्तमहीनमेव शरणं सर्वत्र पुण्यं नृणाम् // KAव्क्_१३.६० //
1499 SK इति तिमिरवृताक्ष्णां चक्षुरुन्मीलनार्हं दशनमणिमरीचिव्यज्यमानप्रकाशम् / सदसि सुगतचन्द्रः शुद्धधर्मोपदेशं स्थिरपदमिव कृत्वा काननं स्वं जगाम // KAव्क्_१३.६१ //
1500 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां प्रातिहार्यावदानं नाम त्रयोदशः पल्लवः //
1501 SK १४. देवावतारवदानम् /
1502 SK जयति महतां प्रभावः पश्चादग्रे च वर्तमानो यः / जनकुशलकर्मसरणिः प्रकाशरत्नदीपो वः // KAव्क्_१४.१ //
1503 SK पुरा सुरपुरे पाण्डुकम्बलाख्ये शिलातले / समीपे पारिजातस्य कोविदारस्य सुप्रभे // KAव्क्_१४.२ //
1504 SK कृत्वा त्रिदशसंघानां भगवान् धर्मदेशनाम् / अनुग्रहाय मर्त्यानां जम्बूद्वीपमवातरत् // KAव्क्_१४.३ //
1505 SK अमरैरनुयातस्य तस्यावतरतो भुवम् / विमानकाननाकीर्णं बभूव भुवनाङ्गणम् // KAव्क्_१४.४ //
1506 SK तस्य दन्तांशुसंतानैरुपदेशमिवाचितम् / जग्राह चन्द्ररुचिरम् चामरं चतुराननः // KAव्क्_१४.५ //
1507 SK छत्रं शतशलाकाङ्कमनङ्कं रङ्कुपाण्डुरम् / प्रसादमिव साकारमाददे ऽस्य पुरंदरः // KAव्क्_१४.६ //
1508 SK संकाश्यनगरोपान्ते काननोदुम्बरान्तिके / अवतीर्णं सुकृतिनः सानन्दास्तं ववन्दिरे // KAव्क्_१४.७ //
1509 SK तस्मिन्नुत्पलवर्णाख्या भिक्षुकी जनसंगमे / अलब्धावसरा द्रष्टुं नृपरूपमुपाददे // KAव्क्_१४.८ //
1510 SK प्रदीप्तरत्नमुकुटं गण्डताण्डविकुण्डलम् / दृष्ट्वैवास्य नवं रूपं जहासोष्णीषपल्लवः // KAव्क्_१४.९ //
1511 SK सा चिन्तयन्ती को वायं जनैर्निर्विवरः पुरः / अन्तरं नृपरूपं मे दृष्ट्वा दास्यति सादरः // KAव्क्_१४.१० //
1512 SK अत्प् ऽन्यथा तु भगवत्प्रणतिर्मम दुर्लभा / न गुणं गौरवस्थानमैश्वर्यप्रणयी जनः // KAव्क्_१४.११ //
1513 SK अहो तृणतृलालोलैर्निःसारविरसैर्धनैः / ह्रियते वासनाभ्यासान्निर्विचारतया जनः // KAव्क्_१४.१२ //
1514 SK दत्तान्तरा सा सहसा जनेन नृपगौरवात् / लोलहारं भगवतः प्रणाममकारोत् पुरः // KAव्क्_१४.१३ //
1515 SK अस्मिन्नवसरे भिक्षुरुदयी नाम संसदि / तां विलोक्य तथारूपामवदत् सस्मिताननः // KAव्क्_१४.१४ //
1516 SK इयमुत्पलवर्णाख्या भिक्षुकी नृपरूपिणी / ऋद्ध्या भगवतः पादौ वन्दते जनवन्दिता // KAव्क्_१४.१५ //
1517 SK उत्पलामोदवर्णाभुआं विज्ञातेयं मया पुरा / इत्युक्त्वा विरते तस्मिन् भगवानप्यभाषत // KAव्क्_१४.१६ //
1518 SK अयुक्तमेव भिक्षुक्या दर्पदृद्धिप्रकाशनम् / करोति प्रशमग्लानिमभिमानेन च ज्वरः // KAव्क्_१४.१७ //
1519 SK इत्युक्त्वा भगवान् कृत्वा तां तां शुभ्रोपदेशनाम् / विसृज्य देवान् प्रययौ स्वपदं सह भिक्षुभिः // KAव्क्_१४.१८ //
1520 SK तत्रोपविष्टः पृष्टस्तैः प्रणतैर्भिक्षुकीकथाम् / प्राग्जन्मकर्मसंबद्धां सर्वज्ञस्तानभाषत // KAव्क्_१४.१९ //
1521 SK वाराणस्यामभूत्पूर्वंसार्थवाहो महाधनः / पत्नी धनवती नाम तस्य प्राणसमाभवत् // KAव्क्_१४.२० //
1522 SK पाणिपल्लविनी तन्वीयओवनोद्यानमञ्जरी / फलपुष्पवती काले सा तस्माद्गर्भमादधे // KAव्क्_१४.२१ //
1523 SK अत्रान्तरे जलनिधिद्वीपानुगमनोद्यतम् / प्रत्यासन्नवियोगार्ता सा वल्लभमभाषत // KAव्क्_१४.२२ //
1524 SK कियती धनसंपत्तिर्वृद्धिमद्यापि नीयते / यत्कृते घ्प्रगम्भीरस्तीर्यते मकराकरः // KAव्क्_१४.२३ //
1525 SK बह्वपायं धनादानं निरपाया गुणार्जनम् / स्वदेशात् परदेशं हि गच्छन्ति द्रविणार्थिनह् // KAव्क्_१४.२४ //
1526 SK केचिद्दुःखान्निवर्तन्ते दूरं गत्वापि निष्फलाः / निश्चला धनिनश्चान्ये कर्मणामेष निश्चयः // KAव्क्_१४.२५ //
1527 SK इति प्रियावचः श्रुत्वा सार्थवाहस्ततो ऽभ्यधात् / मुग्धे संभावनापात्रो भवत्येवं धनोद्यतः // KAव्क्_१४.२६ //
1528 SK धनार्जनविहीनानां पुङ्गुवन्मूलभक्षणात् / अद्य श्वो वा सुखस्थानां भोगैः सह परिक्षयः // KAव्क्_१४.२७ //
1529 SK स्वगृहे ऽपि दरिद्राणां जनह् क्रकचनिष्ठुरः / धनिनां परलोको ऽपि प्रेमस्निग्धजनं भुवः // KAव्क्_१४.२८ //
1530 SK क्षीणमप्युद्यतं वृद्ध्यै न वेणुं बन्धते जनः / न तु स पूर्णतां याति प्रत्यासन्नपरिक्षयः // KAव्क्_१४.२९ //
1531 SK मूर्खो ऽपि विदुषां वन्द्यः स्त्रीणां वृद्धो ऽपि वल्लभः / क्लिबो ऽपि सेव्यः शूराणामासन्नाभ्युदयो जनः // KAव्क्_१४.३० //
1532 SK केनान्यकरणं भुक्त्वा पीत्वा काव्यामृतानि वा / क्षणं विचक्षणेनापि क्षुप्तिपासे विवर्जिते // KAव्क्_१४.३१ //
1533 SK यस्यार्थः स गुणोन्नतैः कृतनुतिः कं वा न धत्ते गुणं दारिद्य्रोदयदोषदूषितरुचां निर्माल्यतुल्या गुणाः / वित्तेनैव गुणा गुणी न तु धनी धन्यो धनी नो गुणी कायाद्दुष्कृतसंनिपातशमनादायुर्गुणानां धनम् // KAव्क्_१४.३२ //
1534 SK इति प्राणाधिकार्थस्य पत्युराकर्ण्य सा वचः / साञ्जनाश्रुकणोत्कीर्णा लतेवाभृतषट्पदा // KAव्क्_१४.३३ //
1535 SK अथ प्रवहणं भेजे सार्थनाथस्तया सह / तीव्रतृष्णागृहीतानां हस्तपात्रं महोदधिः // KAव्क्_१४.३४ //
1536 SK तस्य जायासखस्यासौ कर्मवातानुवर्तिनः / अभज्यत प्रवहणं समनोरथजीवितम् // KAव्क्_१४.३५ //
1537 SK ततः फलकमासाद्य भागशेषाच्च कर्मणः / कशेरुद्वीपमासाद्य तत्पतिर्विपदं गतः // KAव्क्_१४.३६ //
1538 SK अनाथाम् तत्र शोचन्तीं विहङ्गः पुरुषाकृतिः / तामाप पाददीर्णाशां सुवर्णकुलसंभवः // KAव्क्_१४.३७ //
1539 SK स कान्तां सुमुखो नाम तामुवाच रुचाकृतः / समाश्वसिहि लोलाक्षि निर्भयो ऽयं तवाश्रयः // KAव्क्_१४.३८ //
1540 SK दिव्येयं सुभगा भूमिर्वयं त्वत्प्रणयैषणः / पुण्यायातासि कल्याणि घोरो ऽयं मकराकरः // KAव्क्_१४.३९ //
1541 SK इत्युक्त्वा तेन शनकैर्नीता रत्नालयं गृहम् / संपूर्णगर्भा तनयं चारुरूपमसूत सा // KAव्क्_१४.४० //
1542 SK वर्धमाने शिशौ तस्मिन् सा शनैः प्रियवादिना / मुग्धा तेन विदग्धेन संभोगाभिमुखीकृता // KAव्क्_१४.४१ //
1543 SK सरलत्वान्मृदुत्वाच्च समीपप्रणयी जनः / स्वयमालिङ्ग्यते स्त्रीभिर्लताभिरिव पादपः // KAव्क्_१४.४२ //
1544 SK दिव्योद्यानेषु सा तेन रममाणां घनस्तनी / कुमारं रुचिराकारं सुषुवे सदृशं पितुः // KAव्क्_१४.४३ //
1545 SK तस्मिन् पद्ममुखाभिख्ये यौवनालंकृताकृतौ / सुमुखः पक्षिणां राजा काले लोकान्तरं ययौ // KAव्क्_१४.४४ //
1546 SK ततः पद्ममुखः श्रीमानाससाद पदं पितुः / गुणिनामविवादेन स्वाधीनाः कुलसंपदः // KAव्क्_१४.४५ //
1547 SK प्राप्तैश्वर्यं तमवदद्विजने जननी सुतम् / तत्प्रभावस्य संभाव्य सर्वत्र प्रभविष्णुताम् // KAव्क्_१४.४६ //
1548 SK पुत्र प्राप्ता त्वया लक्ष्मीरियं निजकुलोचिता / अयं तु सार्थवाहान्मे जातः पुत्रो निरंशकः // KAव्क्_१४.४७ //
1549 SK वाराणस्यामयं राजा शशक्त्या क्रियतां त्वया / प्रीतीसंवादसास्वादः स्वदेशे सेव संपदः // KAव्क्_१४.४८ //
1550 SK इति मातुर्गिरा पक्षी पक्षपातेन भूयसा / स्कन्धे भ्रातरमारोप्य व्योम्ना वाराणसीं ययौ // KAव्क्_१४.४९ //
1551 SK तत्र सिंहासनासीनं ब्रह्मदत्तं महीपतिम् / संजघानैकदैनं स वज्रग्रनखरैः खरैः // KAव्क्_१४.५० //
1552 SK अभिषिच्याग्रजं पूर्णं तस्मिन्नेव नृपासने / अमात्यान् सो ऽवदद्भीतान् समग्रानग्रविक्रमः // KAव्क्_१४.५१ //
1553 SK यस्य राज्ञो ऽभिषिक्तस्य मया यः प्रचलीकरः (?) / सो ऽप्यतीतः प्रभो भक्त्या तमेवानुगमिष्यति // KAव्क्_१४.५२ //
1554 SK इत्युक्त्वा प्रवरामात्यान् स्वैरं विहगपुण्गवः / ययौ भ्रातरमामन्त्र्य पुनर्देशनसंविदा // KAव्क्_१४.५३ //
1555 SK स एव ब्रह्मदत्तो ऽयमिति मन्त्रित मन्त्रिणाम् (?) / स नृपः ख्यातिमायातः स्वजनेषु परेषु च // KAव्क्_१४.५४ //
1556 SK अत्रान्तरे समानीता सगर्भा हस्तिनी वनात् / न मुमोचार्धनिर्यातगर्भं रुद्धमिवान्तरे // KAव्क्_१४.५५ //
1557 SK साध्वीकराग्रसंस्पर्शादियं गर्भं विमुञ्चति / इति मौहूर्तिकादिष्टं राज्ञे मन्त्री न्यवेदयत् // KAव्क्_१४.५६ //
1558 SK शासनादथ भूभर्तुः स्पृष्ट्वा हस्तेन हस्तिनीम् / अन्तः पुराङ्गनाश्चक्रुस्तत्र सत्योपयावनम् // KAव्क्_१४.५७ //
1559 SK तासां सत्यगिरा गर्भं नात्यजत् करिणी यदा / तदा विलक्ष्यः सर्वो ऽभूत् भूपस्यान्तःपुरे जनः // KAव्क्_१४.५८ //
1560 SK अथ गोपाङ्गनाभ्येत्य शीलसत्योपयाचनम् / कृत्वा पस्पर्श करिणीं येनासौ गर्भमत्यजत् // KAव्क्_१४.५९ //
1561 SK कृत्वा निजजायानां ज्ञात्वा शीलदरिद्रताम् / मेने गोपां मनःस्वेव तां जगत्र्त्रितये सतीम् // KAव्क्_१४.६० //
1562 SK स सतीजातिलोभेन सोशुम्बां नाम तत्सुताम् / परिणीयानिनायाग्रे देवीशब्दस्य पात्रताम् // KAव्क्_१४.६१ //
1563 SK तस्याः संचिन्त्य लावण्यं चपलत्वं च योषिताम् / स सर्वगामीनीं निद्रामपि तत्याज शङ्कितः // KAव्क्_१४.६२ //
1564 SK अस्मिन्नवसरे द्रुष्टुं भ्रातरं विहगाधियः / ययौ पद्ममुखस्तत्र स्नेहादतिशयोत्सुखः // KAव्क्_१४.६३ //
1565 SK भूपालो ऽपि तमालिङ्ग्य प्रीत्या विहितसत्कृतिः / विजने स्वकथामस्मै निवेद्य पुनरब्रवीत् // KAव्क्_१४.६४ //
1566 SK शीलसत्यतुलारोहात् दृष्टदोषेण योषिताम् / ममान्तःपुरवैमुख्यात् विवाहो ऽभिनवः कृतः // KAव्क्_१४.६५ //
1567 SK रूपयौवनगामिन्म्याम् तस्यामपि न मे धृतिः / एकत्र दृष्टदोषाणां सर्वत्राशङ्कते मनः // KAव्क्_१४.६६ //
1568 SK तस्मात्तव पुरे भ्रातर्विमानुष्ये निधीयताम् / शीलशन्कां परित्यज्य भवामि विगतज्वरः // KAव्क्_१४.६७ //
1569 SK तस्मात् प्रतिनिशं पक्षी शासनात् तव मद्गृहम् / प्रापयिष्यति तां स्वैरमित्ययं मे मनोरथः // KAव्क्_१४.६८ //
1570 SK इति भ्रातुर्वचः श्रुत्वा तमुवाच विहङ्गमः / ईर्ष्याशङ्काकलङ्केन राजन् मिथ्यैव मा कृथाः // KAव्क्_१४.६९ //
1571 SK न नाम रमते रम्ये नास्वादं वेत्ति भोजने / न पश्यति न निद्राति नित्यमीर्ष्यावशातुरः // KAव्क्_१४.७० //
1572 SK क्लीबः कामी सुखी विद्वान् धनी नम्रः प्रभुः क्षमी / अर्थी मान्यः खलः स्निग्धः स्त्री सतीति कथैव का // KAव्क्_१४.७१ //
1573 SK सरलत्वे ऽपि कुटिलाः स्थायिन्यो ऽप्यतिचञ्चलाः / कुलीना अपुइ पार्श्वस्थमालिङ्गन्त्यबला लताः // KAव्क्_१४.७२ //
1574 SK दृष्टिर्लोलाधरो रागी भ्रूर्वाक्रा कठिनौ स्तनौ / दृश्यते नैव निर्दोषः स्त्रीणामवयवेष्वपि // KAव्क्_१४.७३ //
1575 SK भुज्यन्ते कुशलैः श्यामा भ्रमद्भ्रमरविभ्रमैः / मूलान्वेषी सरोजिन्याः पङ्केनैवावलिप्यत // KAव्क्_१४.७४ //
1576 SK नैकस्मिन् विस्मयभुवां सस्मितानां नियन्त्रिते / शुचिशीलविरामाणां रामाणां रमणे मतिः // KAव्क्_१४.७५ //
1577 SK तथापि मत्पुरोद्याने निर्जने सा निधीयताम् // KAव्क्_१४.७६ //
1578 SK इत्युक्तः पक्षिणा भ्राता नृपतिर्विससर्ज ताम् / कान्तां कशेरुकद्वीपे तं च सत्कृत्य सादरः // KAव्क्_१४.७७ //
1579 SK सापि प्रतिनिशं व्योम्नः खगारूढा समाययौ / दिव्यगन्धमयीं मालामादाय द्वीपसंभवाम् // KAव्क्_१४.७८ //
1580 SK पारिजातान्वयतरोस्तानि पुष्पाण्यवाप सा / ख्यातानि तिमिराणीव भ्रमद्भृङ्गान्धकारतः // KAव्क्_१४.७९ //
1581 SK अथ वाराणसीवासी कदाचिन्मानवाभुधः / प्रययौ समिधाहारी द्विजन्मा काननं युवा // KAव्क्_१४.८० //
1582 SK तत्र किन्नरकामिन्या स दृष्टः स्पष्टमन्मथः / यस्य संदर्शनेनैव साभवद्विस्मृतस्मृतिः // KAव्क्_१४.८१ //
1583 SK असौ नवाभिलाषेण जनकेनेव सार्पिता / कान्ता कान्तिमयी नाम विजहार गुहागृहे // KAव्क्_१४.८२ //
1584 SK तत्राभरणरत्नाशुः प्रतीततिमिरोत्करे / रममाणा चिरं तेन काले पुत्रमवाप सा // KAव्क्_१४.८३ //
1585 SK बलवान् मरुदुद्भवः स बाल्ये ऽपि यदा शिशुः / तदा माता तस्य संज्ञां शीघ्रग इत्यसाधयत् // KAव्क्_१४.८४ //
1586 SK सापि निवाघ्नसंभोगा सुखातृप्ता गुहान्तरे / प्रियं धॄत्वा सदा याति पिधाय शिलया गृहम् // KAव्क्_१४.८५ //
1587 SK कदाचिदथ वृत्तान्तं निजपित्रा निवेदितम् / आकर्ण्य शीघ्रगश्चिन्ताविस्मयाकुलितो ऽवदत् // KAव्क्_१४.८६ //
1588 SK शिलानिबद्धद्वारे ऽस्मिन्नन्धस्यैव गॄहान्तरे / अहो स्नेहो ऽप्ययं तात तव बन्धनतां गतः // KAव्क्_१४.८७ //
1589 SK एहि वाराणसीमेव गच्छावस्ते निजास्पदम् / विओउलामप्ययत्नेन शिलामुत्सारयाम्यहम् // KAव्क्_१४.८८ //
1590 SK स्वदेशविरहक्लेशं द्य्ःशं सहसे कथम् / त्यक्तुं न शक्यते कौश्चिद्देशो देह इव स्वकः // KAव्क्_१४.८९ //
1591 SK भारं द्रविणसंभारं वेत्ति ग्रन्थिगुणागुणः / भोगं निरुपभोगं च स्वदेशविरही जनः // KAव्क्_१४.९० //
1592 SK इत्युक्त्वा स गुहागोहादुत्पाट्य विपुलां शिलाम् / कृताभ्युपगमेनाशु जनकेन ययौ सह // KAव्क्_१४.९१ //
1593 SK प्रयातयोस्ततस्तूर्णं समभ्येत्याथ किन्नरी / शून्यं दृष्ट्वा गुहागेहं निर्वेदादित्यविन्तयत् // KAव्क्_१४.९२ //
1594 SK अहो मे विस्मृतस्नेहः स गतः क्कापि दुर्जनः / द्विजिह्वानां भुजंगानां कौटिल्यं वा किमद्भुतम् // KAव्क्_१४.९३ //
1595 SK न रमन्ते पलायन्ते पर्यन्ते सुखरागिणः / चिरस्था अपि निःस्नेहाः शुका इव द्विजातयः // KAव्क्_१४.९४ //
1596 SK इति संचिन्त्य सा पत्युर्निकारात्प्रीतिमत्यजत् / पुष्पोपमानि प्रेमाणि न सहन्ते कदर्थनाम् // KAव्क्_१४.९५ //
1597 SK विद्यागुणेन केनासौ पुत्रो मे भुवि जाईवति / इति ध्यात्वा सखीहस्ते तस्मै वीणां दिदेश सा // KAव्क्_१४.९६ //
1598 SK संभोगसुखपण्यैव प्रीतिः पतिषु योषिताम् / अपर्युषितवात्सल्या पुत्रप्रीतिस्तु निश्चला // KAव्क्_१४.९७ //
1599 SK जवेन व्रजतोस्तूर्णं तयोर्दौर्जन्यलज्जया / शीग्रगाय ददौ वीणां तत्सखी वेगगामिनी // KAव्क्_१४.९८ //
1600 SK आद्या तन्त्रिरियं नास्याः स्प्रष्टव्या विघ्नकारिणी / इत्याभाष्य तया दत्तां वीणां प्राप्य जगाम सः // KAव्क्_१४.९९ //
1601 SK ततः स्वदेशे जनकं स्वगृहे विनिवेश्य सः / वीणाप्रवीणः सर्वत्र लाभपूजामवाप्तवान् // KAव्क्_१४.१०० //
1602 SK ततः कदाविद्वाणिजा अम्बुधिद्वीपगामिना / आरोपितः प्रवहणं दिव्यवीणानुरागिणा // KAव्क्_१४.१०१ //
1603 SK वीणामूर्च्छनया तस्य श्रोत्रपीयूषधारया / क्षणे क्षणे समुद्रो ऽपि निस्तरङ्ग इवाभवत् // KAव्क्_१४.१०२ //
1604 SK अथाद्यतन्त्रिसंस्पर्शादुत्पन्नोपप्लवोप्लुते / भग्ने प्रवहणे सर्ववणिजामभवत् क्षयः // KAव्क्_१४.१०३ //
1605 SK ततो बलाहकावाप्त्या पवनप्रेतितः क्षणात् / कशेरुद्वीपमासेदे कर्मशेषेण शीघ्रगः // KAव्क्_१४.१०४ //
1606 SK तत्राब्धिकूलसंलीनं दिव्योद्यानं प्रविश्य सः / श्यामां ददर्श सोशुम्बां मूर्धन्यस्तबकस्तनाम् // KAव्क्_१४.१०५ //
1607 SK ग्रन्धन्तीं तिमिराख्यानां पुष्पाणामुज्ज्वलस्रजम् / निबन्धनं तनुगुणैः कुर्वाणामप्यचेतसाम् // KAव्क्_१४.१०६ //
1608 SK सापि तं रुचिराकारं दृष्ट्वा विस्मयमाययौ / धीरं शैशवतारुण्यसंधिमध्यस्थतां गतम् // KAव्क्_१४.१०७ //
1609 SK मारमारुतसंचालसकम्पकरपल्लवा / सा शीर्णशीलकुसुमा लतेव प्रणनाम तम् // KAव्क्_१४.१०८ //
1610 SK चिरारूढेव सहसा प्रीतिः प्रौढा तयोरभूत् / प्राग्जन्मस्नेहसंलीनं न मुञ्चति मनो मनः // KAव्क्_१४.१०९ //
1611 SK रममाणां दिवा तेन निशायां च महीभुजा / मेने वामाचरिततां ताम् प्रियो गूढकामुकः // KAव्क्_१४.११० //
1612 SK तेन वाराणसीं गन्तुं ज्ञात्वा वृत्तं समर्थिता / तन्निनाय खगारूढा तद्गिरा मीलितेक्षणम् // KAव्क्_१४.१११ //
1613 SK वारितो ऽपि तदा व्योम्नि नयनोन्मीलने तया / सो ऽबह्वत्सहसैवान्धश्चापलाद्विवृतेक्षणः // KAव्क्_१४.११२ //
1614 SK सा तमन्तःपुरोद्याने निधाय भयकातरा / विवेश शोकसंतप्ता शय्यावेश्म महीपतेः // KAव्क्_१४.११३ //
1615 SK दूयमानेन मनसा रजनीमतिवाह्य ताम् / प्रातर्न गन्तुं न स्थातुं चिन्ताक्रान्ता शशाक सा // KAव्क्_१४.११४ //
1616 SK अत्रान्तरे समुद्भूतश्च्युतसौरभनिर्भरः / मधुमासो विलासानां यौवनं पुष्पधन्वनः // KAव्क्_१४.११५ //
1617 SK कोकिलालिकुलैः कालः कालः कालो वियोगिनाम् / शीर्णशोकनवाशोकदुःसहः प्रतिदृष्यते // KAव्क्_१४.११६ //
1618 SK राजाप्यविरतौत्सुक्यादुद्यानं गन्तुमुद्यतः / दिनमेकं न तत्याज सोशुम्बां काममोहितः // KAव्क्_१४.११७ //
1619 SK स तयासह रागस्य मदस्य मदनस्य च / संसारमिव विश्रान्तिपदपुष्पवनं ययौ // KAव्क्_१४.११८ //
1620 SK तत्र बालानिलालोललतावैलक्ष्यकारिणीम् / पश्यन् प्रमोदमासेदे यदितामेव भूपतिः // KAव्क्_१४.११९ //
1621 SK अन्यरागविषाक्रान्ता साप्यभून्मलिनस्मृतिः / सुखमप्यसुखं वेत्ति चिन्ताशल्याकुलं मनः // KAव्क्_१४.१२० //
1622 SK अन्तर्गतभुजंगाभिः स्त्रीभिरत्यन्तरागिणः / कण्ठे कृताभिर्नृत्यन्ति मालाभिरिव मोहिताः // KAव्क्_१४.१२१ //
1623 SK तत्रैकान्तलताकुञ्जनिकुञ्जनिहितस्थितिः / अन्धः सौरभमाघ्राय सोशुम्बातिमिरस्रजः // KAव्क्_१४.१२२ //
1624 SK सहसैव विकारेण रागाद्विस्मृतसंवृतिः / अगायन्मदनक्षीबा गणयन्ति बह्यं कुतः // KAव्क्_१४.१२३ //
1625 SK तनुपवनविलासैः कीर्यमाणः प्रियायाः समदबदनपद्मामोदसंभारसारः / तिमिरकुसुमगन्धः सो ऽयमायाति दूरात् भ्रमरसरणिवीणाविभ्रमारावरम्यः // KAव्क्_१४.१२४ //
1626 SK श्रुत्वा हृदयसंवादगीतं तत्तस्य भूपतिः / उद्यानविचयं कृत्वा तं ददर्श लतान्तरे // KAव्क्_१४.१२५ //
1627 SK गाढरोचमदक्षीबं स तं पप्रच्छ शङ्कितः / अपि जानसि सोशुम्बां तस्य वा लक्षणं तनोः // KAव्क्_१४.१२६ //
1628 SK सो ऽब्रवीत् किं न जानामि सोशुम्बां बिम्बपाटलाम् / उपविष्टो ऽधरे यस्या रागराज्ये मनोभवः // KAव्क्_१४.१२७ //
1629 SK न्यस्तं स्मरेणेव तदूरूमूले लेखामयं स्वस्तिकमस्ति कान्तम् / आवर्तशोभा स्तनमण्डले वा लावण्यकल्लोलनिभास्ति तस्याः // KAव्क्_१४.१२८ //
1630 SK एतदाकर्ण्य नृपतिः सद्यः संतापशोषितम् / मुमोच रागकुसुमं निर्माल्यमिन्व चेतसः // KAव्क्_१४.१२९ //
1631 SK सो ऽब्रवीन्नास्ति नारीणां शीलरक्षा शतैरति / खपुष्पमालेव सती सर्वथा नैव जायते // KAव्क्_१४.१३० //
1632 SK इत्युक्त्वान्धेन तां राजा सह श्मशानकाननम् / गर्दभारोपितां तूर्णं तत्याज नगराद्बहिः // KAव्क्_१४.१३१ //
1633 SK सा तेन सह निर्लज्जा व्रजन्ती दिनसंक्षये / अटव्यां चौरपतिना प्राप्तैव सह संपदा // KAव्क्_१४.१३२ //
1634 SK जनैरभिद्रुते तस्मिन् सहसा चौरमण्डले / निरपराश एवान्धश्चौरभ्रान्त्या निपातितः // KAव्क्_१४.१३३ //
1635 SK चौरो ऽपि निशां भुक्त्वा सोशुम्बां क्षस्णसंगतः / गृहीत्वाभरणान्यस्या जगामोत्तीर्य निम्नगाम् // KAव्क्_१४.१३४ //
1636 SK कारण्डवायाह् सरितस्तस्यास्तीरे निरम्बरा / शुशोव साञ्जनैरश्रुजालैः सा मलिनस्तनी // KAव्क्_१४.१३५ //
1637 SK तस्मिन् क्षणे मुखासक्तं मांसमुत्सृज्य जम्बुके / याते जलोत्प्लुतं मत्स्यं तज्जहारं विहङ्गमः // KAव्क्_१४.१३६ //
1638 SK मत्स्ये निमग्ने सहसा खगेन पिशिते हृते / स बभूवोभयभ्रंशाच्चिन्तानिश्चललोचनः // KAव्क्_१४.१३७ //
1639 SK तस्यास्तं वीक्ष्यं दुःखे ऽपि मुखे स्मितमदॄश्यत / हासः परस्य स्खलिते दुःस्थस्याप्युपजायते // KAव्क्_१४.१३८ //
1640 SK स तां वैलक्ष्यकुपितः प्रोवाचानुचितस्मिताम् / अहो हससि मां लोके हास्यायतनताम् गताम् // KAव्क्_१४.१३९ //
1641 SK नृपं त्यक्त्वागता ह्यन्धम्त्यक्तवान्धं चौरमाश्रिता / तवाहमुभयभ्रष्टः त्रिभ्रष्टायाः स्मितास्पदम् // KAव्क्_१४.१४० //
1642 SK आस्ताम् वः परिहासो ऽयं तं युक्त्याहं करोमि ते / खलास्ते विषमस्थानाम् ये बिडम्बनपण्डिताः // KAव्क्_१४.१४१ //
1643 SK इत्युक्त्वा नगरीं गत्वा स नृपाय न्यवेदयत् / सोशुम्बा ते नदीतीरे तपोयुक्तेति मन्मतिः // KAव्क्_१४.१४२ //
1644 SK अथ निनाय ताम् राजा वितीर्याभरणाम्बरम् / दोषमाच्छादयत्येव रागद्वेषः शरीरिणाम् // KAव्क्_१४.१४३ //
1645 SK सैवाद्योत्पलवर्णेयमुदायी शीघ्रगो ऽप्यसौ / प्राग्जन्मान्तरपुण्येन भिक्ष्ःउव्रतमुपागतौ // KAव्क्_१४.१४४ //
1646 SK अभवदतिरसार्द्रं मानास्ं रागयोगे यदु मदनविधेयं रागयुक्तं यदस्याः / विरतशमविरारा तेन तस्मिन् मुहूत्रे कृतनरपतिरूपानन्दिनं माम् ववन्दे // KAव्क्_१४.१४५ //
1647 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां देवावतारावदानं नाम चतुर्दशः पल्लवः //
1648 SK १५. शिलानिक्षेपावदानम् /
1649 SK बलभतुलधैर्यवीर्यं साश्चर्यं भवति सप्रभावाणाम् / महदाश्रययोगाद्यस्मै सर्वं महिमत्वमायाति // KAव्क्_१५.१ //
1650 SK पुरा कुशीपुरीं रम्यां मल्लानां बलशालिनाम् / स्वेच्छाविहारी भगावान् प्रतस्थे सुगतः स्वयम् // KAव्क्_१५.२ //
1651 SK ते तदागमनं श्रुत्वा कल्याणं कुशलैषिणः / वर्त्मसंशोधनं चक्रुरुपचारपदोद्यताः // KAव्क्_१५.३ //
1652 SK देशं भूषयतां तेषां संसिक्तं चन्दनोदकैः / तृणकण्टकपाषाणसर्करारेणुवर्जितम् // KAव्क्_१५.४ //
1653 SK मध्ये समाययौ भूमिनिमग्ना महती शिला / अवसन्ना विसन्ना च वधूर्विन्ध्यगिरेरिव // KAव्क्_१५.५ //
1654 SK तामुत्पाटयतां तेषां कुद्दालभुजरज्जुभिः / मासो जगाम न त्वस्याः सहस्रांशे ऽप्यभूत क्षतिः // KAव्क्_१५.६ //
1655 SK अथ सम्सारसंतापप्रशमामृतदीधितिः / आययौ भगवान् सर्वमानसोल्लासबान्धवः // KAव्क्_१५.७ //
1656 SK घनान्धकारविरतिव्यक्तसत्फलदर्शनः / प्रसादसंविभक्ताशः प्रकाश इव शारदः // KAव्क्_१५.८ //
1657 SK स तान् दृष्ट्वा परिश्रान्तान् विफलक्लेशपिडाईतान् / श्रुत्वा च तद्व्यवसितं तानूचे प्रणताननान् // KAव्क्_१५.९ //
1658 SK अहो क्लेशफलारम्भः प्रयासव्यवसायिनाम् / संसारकर्मणीवास्मिन् व्यापारे वः समुद्यमः // KAव्क्_१५.१० //
1659 SK प्रारम्भे विषमक्लेशं क्रियमाणं ससंशयम् / सिद्धमप्यनुपादेयं न प्राज्ञाः कर्म कुर्वते // KAव्क्_१५.११ //
1660 SK इत्युक्त्वा चरणाङ्गुष्ठघट्टिताम् वामपाणिना / विन्यस्य दक्षिणे पाणौ भगवान् विपुलां शिलाम् // KAव्क्_१५.१२ //
1661 SK विसृज्य ब्रहम्लोकान्तमपर्यन्तपराक्रमः / चचाराश्चर्यचर्यायां दूतमिव जगत्त्रये // KAव्क्_१५.१३ //
1662 SK क्षिप्तायां सहसा तस्याम् तेनात्यद्भुतकारिणा / उदभूद्गनोद्भूत इव व्याप्तजनः स्वनः // KAव्क्_१५.१४ //
1663 SK अनित्यः सर्वसंस्कार इत्यभ्रान्तविधायिनः / सर्वधर्मा निरात्मानः शान्तनिर्वाणमेव तत् // KAव्क्_१५.१५ //
1664 SK इति स्फुटोदिते शब्दे शिला भगवतः करे / गिरीन्द्रशीर्षकाकारा स्थिता पुनरदृश्यत // KAव्क्_१५.१६ //
1665 SK क्षणेन सा भगवता क्षिप्ता वदनमारुतैः / कृता विसारिणी दिक्षु परमाणुपरंपरा // KAव्क्_१५.१७ //
1666 SK पुनरेकीकृतामेव भगवान् परमाणुभिः / शिलामन्यत्र निदधे विस्मयं च जगत्त्रये // KAव्क्_१५.१८ //
1667 SK आश्चर्यनिश्चलदृशस्ततो मल्ला बलिर्जितम् / वीर्यं भगवतो वीक्ष्य प्रणतास्तं बभाषिरे // KAव्क्_१५.१९ //
1668 SK अहो महाप्रभावो ऽयं बलवीर्योदयस्तव / निश्चयाधिगमे यस्य न प्रगल्भाः सुरा अपि // KAव्क्_१५.२० //
1669 SK अनुग्रहप्रवृत्तेन बलेन गुरुणा तव / अधोगतिनिमग्नेयं जनतेव धृता शिला // KAव्क्_१५.२१ //
1670 SK वीर्यप्रज्ञाबलादीनाम् प्रमाणावधिनिश्चयम् / अपि जानाति ते कश्चिदाश्चर्यतरकारिणः // KAव्क्_१५.२२ //
1671 SK इति ब्रुवाणानाश्चर्यनिश्चलानवलोक्य तान् / तस्यां शिलायामासीनः प्रोवाच भगवान् जिनः // KAव्क्_१५.२३ //
1672 SK एकीभूतबलं यद्धि भूतानाम् भुवनत्रये / सुगतस्य तदेकस्य लोके नैव समं बलम् // KAव्क्_१५.२४ //
1673 SK अम्भांसि कुम्भैरम्भोधेर्जगन्ति परमाणुभिः / शक्यान्यलं लङ्घयितुं प्रभावो न तु सौगतः // KAव्क्_१५.२५ //
1674 SK संख्यां सुमेरोर्यो वेत्ति तुलामानेन तत्त्वतः / सुगतानाम् न जानाति सो ऽपि सुद्गुणगौरवम् // KAव्क्_१५.२६ //
1675 SK कथयित्वेति भगवान् संप्राप्ते सुरमण्डले / सशक्रपद्मनिलये चक्रे कुशलदेशनम् // KAव्क्_१५.२७ //
1676 SK मल्लास्तदुपदेशेन तत्तद्बोधिसमाश्रयात् / सश्रावकाख्यां प्रत्येकसम्यक्संबुद्धतां ययुः // KAव्क्_१५.२८ //
1677 SK स्रोतःप्राप्तिफलं कौश्चित्सकृदागामि चापरैः / अनागामिफलं चाण्यैः प्राप्तमर्हत्पदं परैः // KAव्क्_१५.२९ //
1678 SK इत्याश्ययानुशयधातुगतिं निरीक्ष्य ज्ञात्वा तथाप्रकृतिमप्रतिमोपदेशम् / तेषां चकार भगवांश्चतुरार्यसत्यसम्यक्प्रकाशविशदं कुशलोदयाय // KAव्क्_१५.३० //
1679 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां शिलानिक्षेपावदानंपञ्चदशः पल्लवः //
1680 SK १६. मैत्रेयव्याकरणावदानम् /
1681 SK असंगमो नाम विशुद्धिधामो श्रेयांसि सूते कुशलाभिकामः / संसारवामः सुकृताभिरामो मनोमलैर्वैररजोविरामः // KAव्क्_१६.१ //
1682 SK पुरा गङ्गां समुत्तीर्य नागानां फणसेतुना / भगवान् सुगतः पारंप्राप्य भिक्षूनभाषत // KAव्क्_१६.२ //
1683 SK इह रत्नमयः पूर्वं यूपो ऽभूदद्भुतद्युतिः / दर्शयांइ तमत्रैव द्रष्टुं वः कौतुकं यदि // KAव्क्_१६.३ //
1684 SK इत्युक्त्वा भगवान् भूमौ पाणिना दिव्यलक्ष्मणा / स्पृष्ट्वा नागगणोत्क्षिप्तं रत्नयूपदर्शयत् // KAव्क्_१६.४ //
1685 SK तं दृष्ट्वा भिक्षवः सर्वे निर्निमेषेक्षणाश्चिरम् / बभूवुश्चित्रलिखिताम् इव निश्चलविग्रहाः // KAव्क्_१६.५ //
1686 SK तत्कथामथ तैः पृष्टः प्रोवाच भगवान् पुनः / अतीतानागतज्ञानं दन्तालोकैः किरन्निवः // KAव्क्_१६.६ //
1687 SK देवपुत्रः पुरा कश्चित् काले स्वर्गपरिच्युतः / महाप्रणादनामाभून्नृपतिः शक्रशासनात् // KAव्क्_१६.७ //
1688 SK धर्मवृत्तानुसरणस्मरणाय महीतले / उचितं लक्षणं किंचित् स ययाचे शतक्रतुम् // KAव्क्_१६.८ //
1689 SK ततः सुरपतेर्वाक्याद्विश्वकर्मा तदालये / भास्वरं विदधे रत्नयूपं पुण्यमिवोन्नतम् // KAव्क्_१६.९ //
1690 SK ततस्तद्दर्शनासक्ते जने कौतुकनिश्चले / कृष्यादिकर्मण्युच्छिन्ने राज्ञः कोषक्षयो ऽभवत् // KAव्क्_१६.१० //
1691 SK ततस्तेन क्षितिभुजा क्षिप्तो ऽयं जाह्नवीजले / तिष्ठत्यद्यापि पाताले रत्नैः सूर्यैरिवाचितः // KAव्क्_१६.११ //
1692 SK भविष्यत्यस्य कालेन परिच्छिन्नः परिक्षयः / न तज्जगति नामास्ते परिणामे यदक्षयम् // KAव्क्_१६.१२ //
1693 SK आगामिसमये पुंसां वर्षाशीतिसहस्रके / शङ्खशुभ्रयशाः शङ्खो नाम राजा भविष्यति // KAव्क्_१६.१३ //
1694 SK पुण्यलब्धमिमं यूपं नृपः कल्पद्रुमोपमः / स पुरोहितपुत्राय मैत्रेयाय प्रदास्यति // KAव्क्_१६.१४ //
1695 SK मैत्रेयो ऽप्यन्मुमादाय कृत्वा सपदि खण्डशः / अर्थिचिन्तामणिर्लोकमदरिद्रं करिष्यति // KAव्क्_१६.१५ //
1696 SK यूपं दत्वाथ मैत्रेयः सम्यक्संबुद्धताम् गतः / अनुत्तरज्ञाननिधिर्भविष्यति सुरार्चितः // KAव्क्_१६.१६ //
1697 SK शङ्को राजा सहस्राणामशीत्या परिवारितः / सान्तःपुरामात्यगणो राजापि प्रव्रजिष्यति // KAव्क्_१६.१७ //
1698 SK प्राग्जन्मप्रणिधानेन शङ्खस्य कुशलोदयः / कृतस्यावश्यभोग्यत्वात्परिणामे फलिष्यति // KAव्क्_१६.१८ //
1699 SK मध्यदेशे पुरा राजा वासवो वासवोपमः / धनसंमतनामा च नृपो ऽभूदुत्तरापथे // KAव्क्_१६.१९ //
1700 SK तयोर्विभवसंघर्षो भूतो वैराग्नितप्तयोः / अभूद् युद्धसमारम्भसंभाररभसं मनह् // KAव्क्_१६.२० //
1701 SK नगरं च प्रविश्याथ समेत्य धनसंमतः / चक्रे गरजथानीकैर्गङ्गातीरं नीरन्तरम् // KAव्क्_१६.२१ //
1702 SK तत्र रत्नशीखी नांअ सम्यक्संबुद्धताम् गतः / दृष्टस्तेनार्च्यामानाङ्घ्रिर्ब्रह्मशक्रादिभिः सुरैः // KAव्क्_१६.२२ //
1703 SK सो ऽचिन्तयदहो राजा वासवः पृथिपुण्यवान् / विषयान्ते वसत्येष् अयो हि त्रिदशवन्दितः // KAव्क्_१६.२३ //
1704 SK ततस्तस्यानुभावेन तत्र भूपालयोस्तयोः / ययौ वैररजः शान्त्या मिथ्यामोहपरिक्षयम् // KAव्क्_१६.२४ //
1705 SK कॄतसंघिः परेणाथ वासवः पृथिवीपतिः / भगवन्तं समभ्येत्य सर्वभोगौरपूजयत् // KAव्क्_१६.२५ //
1706 SK प्रणिधानं च विदधे पूजान्ते प्रणमामि तम् / अहं कुशलमूलेन स्यामेतेन महानिति // KAव्क्_१६.२६ //
1707 SK अस्मिन्नवसरे घोरे शन्खशब्दे समुद्गते / प्रोवाच तं रत्नशिखी प्रणतं पुरतः स्थितम् // KAव्क्_१६.२७ //
1708 SK शन्खो नाम महीपालश्चक्रवर्ती भविष्यसि / पर्यन्ते बोधियुक्तश्च कुशलं समावाप्स्यसि // KAव्क्_१६.२८ //
1709 SK एवं सत्प्रणिधानतह् क्षितिपतिः पुण्योदयाद्वासवः शङ्खो नाम नृप स रत्नशिखिनादिष्टः श्रियं प्राप्स्यति / मैत्रेयः प्रणयात्करिष्यति तथा बोधौ विशुद्धां धियं कल्याणाभिनिवेशपुण्यतरणिराड्य हि सत्संगमः // KAव्क्_१६.२९ //
1710 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां मैत्रेयव्याकरणावदानं नाम षोडशः पल्लवः //
1711 SK १७. आदर्शमुखावदानम् /
1712 SK चित्तप्रसादविमलप्रणयोज्ज्वलस्य स्वल्पस्य दानकुसुमस्य फलांशकेन / हेमाद्रिरोहणनगेन्द्रसुधाब्धिदानसंपत्फलं न हि तुलाकलनामुपैति // KAव्क्_१७.१ //
1713 SK पुरा मनोज्ञे सर्वज्ञः श्रावस्त्यां जेतकानने / अनाथपिण्डदारामे विजहार महाशयः // KAव्क्_१७.२ //
1714 SK आर्यो महाकाश्यपाख्यस्तच्छिष्यः करुणानिधिः / नगरोपवनस्यान्तं जनचारिकया ययौ // KAव्क्_१७.३ //
1715 SK तत्र सुद्रुगतिर्योषिन्नगराश्रवलम्बिका / अपश्यत् कुष्ठरोगार्ता काश्यपं तं यदृच्छया // KAव्क्_१७.४ //
1716 SK सा तं दृष्ट्वा प्रसादिन्या श्रद्धया समचिन्तयत् / पात्रे ऽस्य पिण्डपातार्हा किं न जातास्मि पुण्यतः // KAव्क्_१७.५ //
1717 SK विज्ञाय तस्या आश्चर्यश्रद्धायुक्तं मनोरथम् / प्रसार्य पात्रं जग्राह पिण्डं तं करुणाकुलः // KAव्क्_१७.६ //
1718 SK तीव्रचित्तप्रसादेन भक्तसारसमरणे / कुष्ठिन्या निपपातास्याः पात्रे शीर्णकराङ्गुलिः // KAव्क्_१७.७ //
1719 SK ततः सा पातकमिव त्यक्त्वानित्यकलेवरम् / देवानां तुषिताख्यानां निलये समजायत // KAव्क्_१७.८ //
1720 SK शक्रस्तदद्भुतं ज्ञात्वा दानपुण्य्प्दितादरः / यत्नात्काश्यपसत्पात्रं सुधया समपूरयत् // KAव्क्_१७.९ //
1721 SK सुधार्पणे ऽप्यसौ भिक्षुर्निस्पृहस्तृणलीलया / प्रशमामृतसंपूर्णश्चक्रे पात्रमधोमुखम् // KAव्क्_१७.१० //
1722 SK भजन्ते प्रणयप्रीतिं कृपणेषु कृपाकुलाः / सन्तः संपत्समाध्मातवदने मीलितादराः // KAव्क्_१७.११ //
1723 SK श्रुत्वा तां तुषिते देवनिकाये निरताम् नृपः / प्रसेनजित् भगवतश्चक्रे भोज्याधिवासनाम् // KAव्क्_१७.१२ //
1724 SK राज्ञस्तस्य गृहे दृष्ट्वा लक्ष्मीमाश्चर्यकारिणः / आर्यानन्देन भगवान् पृष्टस्तत्पुण्यमभ्यधात् // KAव्क्_१७.१३ //
1725 SK पुरा गृहपतेः सूनुर्दारिद्य्राद्दासतां गतः / क्षेत्रकर्माणि संसक्तः क्षुत्क्षामः क्लान्तिमाययौ // KAव्क्_१७.१४ //
1726 SK स्वजनन्या समानीतां निःस्नेहलवणां चिरात् / कुल्माषपिण्डिमासाद्य भोक्तुं सादरमाययौ // KAव्क्_१७.१५ //
1727 SK धौतहस्तः क्षणे तस्मिन् संप्राप्ताय यदृच्छया / ददौ प्रत्येकबुद्धाय ताम् प्रसन्नेन चेतसा // KAव्क्_१७.१६ //
1728 SK जातः स एव कालेन भूपालो ऽयं प्रसेनजित् / तस्य दानकणस्यैवं विभूतिः प्रथमं फलम् // KAव्क्_१७.१७ //
1729 SK श्रुत्वेति भगवद्वाक्यं भिक्षूर्विस्मयमाययौ / राजापि विपुलां पूजां चक्रे भगवतः पुरः // KAव्क्_१७.१८ //
1730 SK राजार्हैरखिलैर्भोगैः कृत्वा भक्तिनिवेदनम् / स कोटीस्तैलकुम्भानां दीपमालामकल्पयत् // KAव्क्_१७.१९ //
1731 SK दीपमेकं ददौ तत्र स्वल्पकं दुर्गताङ्गना / स्नेहक्षयात्प्रयातेषु सर्वेषु न जगाम यः // KAव्क्_१७.२० //
1732 SK विचिन्त्य प्रणिधानेन तया विमलचेतसा / भाविनीम् शाक्यमुनितां सर्वज्ञो ऽस्याह् समभ्यधात् // KAव्क्_१७.२१ //
1733 SK रत्नदीपावलिं दत्वा राजा भगवतः पुरह् / उपविश्य प्रणम्याग्रे प्रणयात्तं वजिज्ञपत् // KAव्क्_१७.२२ //
1734 SK भगवत्प्रणिधानेन तत्तत्पुण्यानुभावतः / न कस्यानुत्तरा सम्यक्संबोधिर्भवदर्पिता // KAव्क्_१७.२३ //
1735 SK भवत्प्रसादप्रणयात् प्राप्तुमिच्छामि तामहम् / निर्विकल्पफलावाप्त्यै सेव्यन्ते कल्पपादपाः // KAव्क्_१७.२४ //
1736 SK इति राजवचः श्रुत्वा भगवान् समभाषत / दुर्लभानुत्तरा सम्यक्संबोधिः पृथिवीपते // KAव्क्_१७.२५ //
1737 SK सूक्ष्मा मृणालतन्तुभ्यो गिरिभ्यो ऽपि गरीयसी / समुद्रेभ्यो ऽपि गम्भीरा सा सुखेन न लभ्यते // KAव्क्_१७.२६ //
1738 SK न दानैर्बहुभिर्लब्धं मयैवान्येषु जन्मसु / चित्तप्रसादविशदं ज्ञानं तत्कारणं जगुः // KAव्क्_१७.२७ //
1739 SK चतुर्द्वीपाधिपत्येन मया मान्धातृजन्मनि / चिरं दानफलं भुक्तं बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.२८ //
1740 SK दानेन चक्रवर्तीश्रीः सा सुदर्शनजन्मनि / भुक्ता मयामहीयसी बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.२९ //
1741 SK पुरा दत्वा गजानष्टौ वेलामद्विजजन्मानि / मया प्राप्तं महत्पुण्यं बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.३० //
1742 SK कुरूपः कुशलात्माहं राजपुत्रः पुराभवम् / यः पिशाचो ऽयमित्युक्त्वा निजलत्न्या विवर्जितः // KAव्क्_१७.३१ //
1743 SK श्रियै श्रीस्कन्धो भूत्यागे प्रीतिर्यस्य सदा स्थिता / स दुःखी रूपवैकल्यात् क्क वा सर्वगुणोदयः // KAव्क्_१७.३२ //
1744 SK तं रूपविरहे देहत्यागारूढं शचीपतिः / दिव्यचूडामणिं दत्वा चक्रे पञ्चशरोपमम् // KAव्क्_१७.३३ //
1745 SK षष्टिः पुरसहस्राणि तस्य यज्ञेषु यज्वनः / हेमयूपाभिरूपाणि प्रापुर्मेरुबलश्रियम् // KAव्क्_१७.३४ //
1746 SK तस्मिन् मयातिदानाद्रिकृते कुशलजन्मनि / तानि पुण्यान्यवाप्तानि बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.३५ //
1747 SK मया सत्यप्रभावेण त्रिशङ्कुनृपजन्मनि / कृता वृष्टिः सुदुर्भिक्षा बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.३६ //
1748 SK मिथिलायां महादेवनृपजन्मनि यज्वना / मयाप्ता पुण्यसंपत्तिर्बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.३७ //
1749 SK मिथिलायां पुरा पुण्यं निमिभूपालजन्मनि / प्राप्तं दानतपोयज्ञैर्बोधिर्नाधिगता तु सा // KAव्क्_१७.३८ //
1750 SK पुरा नन्दस्य नृपतेश्चत्वारः पिशुनाः सुताः / बभूवुरादर्शमुखः पञ्चमश्च गुणाधिकः // KAव्क्_१७.३९ //
1751 SK कालेनापन्नपर्यन्तः स भूपतिरचिन्तयत् / एते मदन्ते चत्वारो राज्यं नार्हन्ति कर्कशाः // KAव्क्_१७.४० //
1752 SK पुत्रे ममादर्शमुखे राज्यश्री प्रतिबिम्बिता / सुवृत्ते लभते शोभां प्रज्ञावैमल्यशालिनि // KAव्क्_१७.४१ //
1753 SK ध्यात्वेत्यमात्यान् सो ऽवादीत् स भवद्भिर्नरेश्वरः / कृतो ऽन्तःपुरवर्गेण यो ऽभ्युत्थानेन पूज्यते // KAव्क्_१७.४२ //
1754 SK मौलिर्न कम्पते यस्य समेव मणिपादुकैः / द्वारद्रुमाद्रिवापीषु निधिषट्कं स पश्यति // KAव्क्_१७.४३ //
1755 SK इत्युक्त्वा त्रिदिवं याते नृपतौ मन्त्रिणः क्रमात् / तदुक्त्रैर्लक्षणैश्चक्रुरादर्शमुखमीश्वरम् // KAव्क्_१७.४४ //
1756 SK धर्मनिर्णयकार्येषु यं वादिप्रतिवादिनह् / विलोक्यैव स्वयं तस्थुर्न्यायैर्जयपराजये // KAव्क्_१७.४५ //
1757 SK पुरा निरभिअस्ंघेन प्रातवैशसकिल्बिषम् / ब्राह्मणं दण्डिनं नाम दयालुः प्रययौ पुरः // KAव्क्_१७.४६ //
1758 SK गुयुगार्थे गृहस्थेन मृतेन वडवाहतेः / कुठारपाततः पत्न्या तक्षवासी विवादितः // KAव्क्_१७.४७ //
1759 SK शौण्डिकेनात्मजवधाद्दीक्षितं तुल्यनिग्रहम् / तद्विपक्षभयेनोक्त्वा तत्संत्यक्तं व्यमोक्षयत् // KAव्क्_१७.४८ //
1760 SK अमानुषाणां सत्त्वानामध्याशयविशेषतः / चकार चित्तशोधनं तत्तत्संदेहनिर्णयम् // KAव्क्_१७.४९ //
1761 SK अवृष्टिमृष्टे दुर्भिक्षे येन द्वादशवर्सके / विहितं सर्वसत्त्वानामशनप्राणवर्तनम् // KAव्क्_१७.५० //
1762 SK इत्यमून्मम पुण्याप्तिरादर्शमुखज्न्मनि / न तु सा सम्यक्संबोधिर्विबोधिता महोदया // KAव्क्_१७.५१ //
1763 SK बहुजन्मशताभ्यासप्रसासेन महीयसा / अद्य तु ज्ञानवैमल्यं मयाप्तं लुत्पसंवृति // KAव्क्_१७.५२ //
1764 SK ज्ञानप्रज्ञाधिगम्या किमपि परतरानुत्तरा सत्यासंवित् सम्यक्संबोधिरेषा न च खलु नृपते लभ्यते दानपुण्यैः / मोहश्यामाविरामे गतघनगगनव्यक्तवैमल्यभाजां निर्व्याजानन्दभूमिर्भवति भवतमश्छेदिनी सा दिनश्रीः // KAव्क्_१७.५३ //
1765 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां आदर्शमुखावदानं नाम सप्तदशः पल्लवः //
1766 SK १८. शारिपुत्रप्रव्रज्यावदानम् /
1767 SK नेदं बन्धुन्ॐ सुहृत् सोदरो वा नेदं माता न पिता वा करोति / यत्संसाराम्भोधेसेतुं विधत्ते ज्ञानाचार्यः को ऽपि कल्याणहेतुः // KAव्क्_१८.१ //
1768 SK कलन्दकनिवासाख्ये रम्ये वेणुवनाश्रमे / भगवान् विहरन् बुद्धः पुरे राजगृहे पुरा // KAव्क्_१८.२ //
1769 SK किलितं चोपयिष्यं च द्वौ परिव्राजकौ पुरा / प्रपन्नौ भिक्षुभावेन चकार शमसंवृतौ // KAव्क्_१८.३ //
1770 SK ततश्च शारिपुत्रस्य भिक्षोः संदेशनां व्यघात् / यया साक्षात्कृतार्हत्त्वो सो ऽभून्मोक्षगतिक्षमः // KAव्क्_१८.४ //
1771 SK तस्य तदद्भुतं दृष्ट्वा धनार्हं सर्वभिक्षुभिः / पप्रच्छुः पूर्ववृत्तान्तं स च तेभ्यो व्यभाषत // KAव्क्_१८.५ //
1772 SK ब्राह्मणस्याग्निमित्रस्य भार्या गुणवराभवत् / शूर्पिकेति कृतं पित्रा क्रीडानाम च बिभ्रती // KAव्क्_१८.६ //
1773 SK भ्राता प्रथमशीलाख्यः तस्य शूर्पसमाभिधः / प्रत्येकबुद्धतां यातः कदाचिद् गृहमाययौ // KAव्क्_१८.७ //
1774 SK स तया भर्तुरादेशाद् गृहीभक्त्याधिवासितः / प्रणतिप्रणयाचारैस्तोषितः परिचर्यया // KAव्क्_१८.८ //
1775 SK कदाचिच्चीवरे तस्य कुर्वाणस्य विपात्रणम् (?) / सूचीकर्मवहाद् दृष्ट्वा प्रणिधानं समादधे // KAव्क्_१८.९ //
1776 SK यथेयं कर्तरीं तीक्ष्णा यथा गम्भीरगामिणी / सूची तथापरा प्रज्ञा मम स्यादिति सादरा // KAव्क्_१८.१० //
1777 SK प्रत्येकबुद्धविनयात् प्रणिधानेन तेन च / गतास्मिन् जन्मनि सैव सप्रज्ञशारिपुत्रताम् // KAव्क्_१८.११ //
1778 SK स एष शारिपुत्रो ऽद्य भिक्षुष्तीक्ष्णतराग्रधीः / कल्याणपात्रताम् यातः कल्पवल्ली हि सन्मतेः // KAव्क्_१८.१२ //
1779 SK वाक्यं भगवतः श्रुत्वा पप्रच्छुर्भिक्षवः पुनह् / कस्मान्नाट्यकुले जातः शारिपुत्रो नराधमे // KAव्क्_१८.१३ //
1780 SK ततस्तान् भगवानूचे पूर्वस्मिन्नेष जन्मनि / अभून्महामतिर्नाम राजपुत्रः सतां मतः // KAव्क्_१८.१४ //
1781 SK श्रीमतो ऽपि मतिस्तस्य प्रव्रज्यायामजायत / परिपाकप्रसन्नानां कालुष्याय न संपदः // KAव्क्_१८.१५ //
1782 SK प्रव्रज्या राजपुत्राणां यूनां नैव कुलोचिता / इत्युक्त्वा जनकः प्रीत्या तं यत्नेन न्यवारयत् // KAव्क्_१८.१६ //
1783 SK कदाचित् कुञ्जरारूढः स व्रजन् जनवर्त्मनि / दृष्ट्वा दरिद्रं स्थविरं कारुण्यादिदमब्रवीत् // KAव्क्_१८.१७ //
1784 SK अधन्या धनीनो लोके बन्धुबन्धनयन्त्रिताः / प्रव्रज्यां नाप्नुवन्त्येव त्वं तु केन निवारितः // KAव्क्_१८.१८ //
1785 SK स न्यवेदयन्मे दरिद्रस्य न पात्रं न च चीवरम् / धनोपकरणान्येव शमोपकरणान्यपि // KAव्क्_१८.१९ //
1786 SK राजसूनुरिति श्रुत्वा गत्वा मुनितपोवनम् / प्रव्रज्यां कारयित्वास्य प्रददौ पात्रचीवरम् // KAव्क्_१८.२० //
1787 SK सो ऽचिरेणैव कालेन यातः प्रत्येकबुद्धताम् / राजपुत्रं समभ्येत्य दिव्यामृद्धिमदर्शयत् // KAव्क्_१८.२१ //
1788 SK तस्य प्रभावमालोक्य स प्रदध्यौ नृपात्मजः / अहो महोदयत्वान्मे प्रव्रज्या दुर्लभाभवत् // KAव्क्_१८.२२ //
1789 SK दारिद्य्रादविवेकाच्च् नीचानामपि दुर्लभा / जायेयमधमे कुले तस्मदस्मि विवेकवान् // KAव्क्_१८.२३ //
1790 SK स एव शारिपुत्रो ऽयं ज्ञातस्तत्प्रणिधानतः / प्रव्रजितो भगवता काश्यपेनान्यजन्मनि // KAव्क्_१८.२४ //
1791 SK तेनायं नियमप्रणयविनयी सम्यक्प्रसादोदयाद् आदिष्टः कुशलाय सत्यनिधिना प्रज्ञावतामग्रणीः / काले शाक्यमुनेर्भविष्यति मतः शिष्यत्वयोगाद्वरं मौद्गल्यायन एष चात्र कथितः संविन्मयानां वदः // KAव्क्_१८.२५ //
1792 SK अन्यजन्मनि दरिद्रः कार्मिकः केनचिदपि दयया महर्षिणा / दत्तपात्रचीवरो ऽभवद्दर्शितर्द्धिरासीदतुलप्रभाववान् // KAव्क्_१८.२६ //
1793 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां शारिपुत्रप्रजज्यावदानम् नामाष्टादशः पल्लवः //
1794 SK १९. श्रोणकोटिकर्णावदानम् /
1795 SK स को ऽपि पुण्यातिशयोदयस्य वरः प्रभावः परमाक्षयो यः / प्रत्यक्षलक्ष्यः शुभपक्षसाक्षी जन्मान्तरे लक्षणतामुपैति // KAव्क्_१९.१ //
1796 SK रम्ये पुरा भगवति श्रावस्त्यां जेतकानने / अनाथपिण्डदारामे विहारिणि तथागते // KAव्क्_१९.२ //
1797 SK बभूव वासवग्रामे बलसेनाभिधो गृही / पूरिताशः फलभरैश्छायातरुरिवार्थिनाम् // KAव्क्_१९.३ //
1798 SK जायायां जयसेनायां काले कमललोचनः / अजायत सुतस्तस्य पुण्यैर्मीर्त इवोत्सवः // KAव्क्_१९.४ //
1799 SK सजहा रत्नदीपार्चिरभूत्कर्णस्य कर्णिका / नाभून्मूल्यतुला यस्य हेमकोटिशतैरपि // KAव्क्_१९.५ //
1800 SK श्रवणानक्षत्रजातो ऽसौ रत्नकोट्यर्हकर्णिकाः / स श्रोणकोटिकर्णाख्यः कुमारो ऽभूद्गुणोचितः // KAव्क्_१९.६ //
1801 SK स निर्मलरुचिः कान्तः कलाभिं परिपूरितः / अमन्दानन्दनिष्यन्दी न कस्येन्दुरिवाभवत् // KAव्क्_१९.७ //
1802 SK स युवा वार्यमाणो ऽपि पित्रा धनदसंपदा / जननी साश्रुनयना परं पुरुषया गिरा // KAव्क्_१९.८ //
1803 SK प्रियंवदो ऽपि निर्भर्त्स्यो विषवर्षीव चन्द्रमाः / महासार्थेन रत्नार्थी दूरद्वीपान्तरं ययौ // KAव्क्_१९.९ //
1804 SK मकराकरमुत्तीर्य व्रजतस्यस्य निर्जने / कर्मोर्मिविप्लवेनाभूत् स्वसार्थविरहः पथि // KAव्क्_१९.१० //
1805 SK सार्थो ऽपि तमनासाद्य विनिवृत्तं शुचा शनैः / स्वदेशमर्जितक्लेशः प्रविवेश विशृङ्खलाः // KAव्क्_१९.११ //
1806 SK सो ऽपि तप्तमरुश्रेणीलक्षणां दक्षिणां दिशम् / श्रान्तः प्रशान्तविश्रान्तिर्वापिगाहं व्यगाहत // KAव्क्_१९.१२ //
1807 SK सो ऽचिन्तयदहो वित्ते प्रतिनित्तार्जनोद्यमः / ममायमनयेनैव जातक्लेशः फलोदयः // KAव्क्_१९.१३ //
1808 SK अहो धनार्जनावेशः संतोषविरहान्नृणाम् / सर्वापवादसंवादो निन्द्यानाम् विपदां पदम् // KAव्क्_१९.१४ //
1809 SK हेमाचले ऽपि संप्राप्ते न पर्याप्तिर्हनार्जने / संसारे वासनाभ्यासद्वेषमोहः शरीरिणाम् // KAव्क्_१९.१५ //
1810 SK पृथुप्रयासविरसा दीपिता श्रीरिवायता / तृष्णां तनोति नितरामियंमरुमहीतले // KAव्क्_१९.१६ //
1811 SK अहो बत कुरङ्गाणां तृष्णान्धानां पदे पदे / ममापि जनयन्त्येव मोहं मरुमरीचिकाः // KAव्क्_१९.१७ //
1812 SK इयं तृष्णा श्रमश्चायमिमा निरुदका भुवः / किं करोमि क्क गच्छामि पश्यामि ज्वलिता दिशः // KAव्क्_१९.१८ //
1813 SK इति संचिन्त्य स शनैः प्रसर्पन् सलिलाशया / आयासमिव साकारं ददर्श पुरमायसम् // KAव्क्_१९.१९ //
1814 SK घोरं द्वारि स्थितं तत्र संत्रासस्येव सोदरम् / ददर्श पुरुषं कालकरालं रक्तलोचनम् // KAव्क्_१९.२० //
1815 SK स तेन पृष्टः पानीयं यदा नोवाच किंचन / तदा स्वयं प्रविष्टेन प्रेतलोको विलोकितह् // KAव्क्_१९.२१ //
1816 SK दग्धकष्ठोपमान् धूलिमललिप्तान्निरम्बरान् / शुष्कास्थिन्सायुशेषाङ्गान् प्रेतान् दृष्ट्वा स विव्यथे // KAव्क्_१९.२२ //
1817 SK तैर्याचितह् स पानीयं पानीयविरहार्दितः / परित्यज्य निजामार्तिमभूत्तद्दुःखदुःखितः // KAव्क्_१९.२३ //
1818 SK तीव्रतृष्णातुरानूचे स तानार्तप्रलापिनह् / ममास्मिन् मरुकान्तारे निष्कृपस्य कुतः पयः // KAव्क्_१९.२४ //
1819 SK कृच्छ्रे ऽस्मिन् दुःसहे न्यस्ताः के यूयं केन कर्मणा / युष्मदप्रक्रियबन्धश्चातः कृच्छ्रश्चराम्यहम् // KAव्क्_१९.२५ //
1820 SK निद्रा निःशल्यकल्पस्य सुखसिक्तेव तस्य या / नार्तान्नपश्यति दृष्ट्वा तेषां क्लेशक्षये क्षमा // KAव्क्_१९.२६ //
1821 SK ते तमूचुर्विरुद्धेन कर्मणा मोहसंचयात् / अनिवर्त्य वयं मर्त्याः क्षिप्ता व्यसनसंकटे // KAव्क्_१९.२७ //
1822 SK अधिक्षेपात् क्षेपक्षतिपतरधैर्यैर्मदभराद् अनार्यैर्मानव्यसनेर्ष्याभिरवार्यव्यतिकरैः / कृतास्माभिर्नित्यं सुहनहृदये निर्दयतया वचोभिर्नाराचैर्विषपरिचितैः शल्यकलना // KAव्क्_१९.२८ //
1823 SK दानं नदत्तं हृतमेव वित्तं हिंसानिमित्तीकृतमेव चित्तम् / अस्मार्भिरङ्गैर्विहिता विकाराः परस्य दारापहृतिप्रकाराः // KAव्क्_१९.२९ //
1824 SK ते वयं कुहकासक्ता दक्षाः क्षुद्रेषु कर्मसु / प्रयाताः प्रेतनगरे घोरे ऽस्मिन् क्लेशपात्रताम् // KAव्क्_१९.३० //
1825 SK इति तेषां वचः श्रुत्वा सो ऽन्यत्र च तथाविधान् / प्रेतान् दृष्ट्वानभिप्रेतान् करुणकुलितो ऽभवत् // KAव्क्_१९.३१ //
1826 SK निर्गम्य दुर्गमात् तस्मात् पुरात्पुण्यबलेन सः / विमलं शीतलच्छायमाससाद वनान्तरम् // KAव्क्_१९.३२ //
1827 SK अथ दूरध्वसंतप्तः परिश्रान्तः शनैः शनैः / निपपाताचलादन्धस्तृष्टार्त इव भाष्करः // KAव्क्_१९.३३ //
1828 SK दिने पुण्य इव क्षीणे निःशेषाशाप्रकाशके / संमोहमलिनं लोके तमः पापमिवोद्ययौ // KAव्क्_१९.३४ //
1829 SK क्षीणभृङ्गविहङ्गानां नलिनीनां प्रसङ्गिनी / विकासास्ंपसा मुद्रा निद्रेव समजायत // KAव्क्_१९.३५ //
1830 SK कारुण्यादिव शीतांशुर्ज्योत्स्नामृतशलाकया / स्फारतारं जगन्नित्रं चक्रे वितिमितं ततः // KAव्क्_१९.३६ //
1831 SK क्षयोदयपरावृत्तिर्द्र्शितानेकविभ्रमः / संसारदिनयामिन्योर्जहासेव सुधाकरः // KAव्क्_१९.३७ //
1832 SK नेत्रानन्दसुधावर्षे सुखस्पर्शे निशाकरे / दिग्वधूवदनादर्शे हर्षे मूर्त इवोतिते // KAव्क्_१९.३८ //
1833 SK श्रोणकोटिर्ददर्शाग्रे विमानमाननद्युतिम् / कौतुकादन्यरूपेण स्वर्गाद्भुवमिवागतम् // KAव्क्_१९.३९ //
1834 SK तस्मिन्नपश्यत्समदाश्चतस्रस्त्रिदशाङ्गनाः / दिशश्चन्द्रोदयानन्दविहारायेव संगताः // KAव्क्_१९.४० //
1835 SK तासां मध्ये वराकारं रममाणं व्यलोकयत् / तरुणप्रेमसंभारमिव साकारताम् गतः // KAव्क्_१९.४१ //
1836 SK रत्नमण्डलेयूरकिरीटिकचिराम्शुभिः / आलिखन्तमिवाश्चर्यममर्यादं दिशां मुखे // KAव्क्_१९.४२ //
1837 SK तस्य तामद्भुताम् दृष्ट्वा संभोगसुखसंपदम् / मेने स सुकृताख्यस्य तरोः स्फीतां फलश्रियम् // KAव्क्_१९.४३ //
1838 SK प्रीत्या तेन कृतातिथ्यः स्वादुपानाशनादिभिः / तां श्रोणकोटिकर्णो ऽथ निनाय रजनीं सुखम् // KAव्क्_१९.४४ //
1839 SK ताराकुसुमवातालिप्रभा प्राभातिकी ततः / अनित्यतेव शशिनश्चक्रे लक्ष्मीपरिक्षयम् // KAव्क्_१९.४५ //
1840 SK क्षयं क्षपायां यातायाम् भानौ भुवनचक्षुषि / उदिते सर्वभूतानाम् सुखदुःखैकसाक्षिणि // KAव्क्_१९.४६ //
1841 SK विमानं सुरनार्यश्च क्षस्णाददृश्यतांययुः / विनष्टवदनच्छायः पुरुषश्चापतत्क्षितौ // KAव्क्_१९.४७ //
1842 SK ततस्तस्यापतत् पृष्ठे शुनां संघो ऽतिभीषणः / त्रैलोक्यशापपापोत्थः क्लेशराशिरिवाखिलः // KAव्क्_१९.४८ //
1843 SK स तैग्रीवामुखारब्धमांसग्रासाग्रकर्षणैः / आक्रन्दिरुधिरक्षीरैर्भक्ष्यमाणः क्षयं ययौ // KAव्क्_१९.४९ //
1844 SK दिनान्ते पुनरायान्तं तद्विमानमपश्यत / चतस्रो ऽप्सरासस्ताश्च पुरुषः स च कान्तिमान् // KAव्क्_१९.५० //
1845 SK तं श्रोणकोटिकर्णो ऽथ पप्रच्छात्यन्तविस्मितः / सखे किमेतदाश्चर्यं दृश्यते कथ्यतामिति // KAव्क्_१९.५१ //
1846 SK स तेन पृष्टः प्रोवाच वयस्य श्रूयतामिदम् / त्वां श्रोणकोटिकर्णाख्यं जानामि सुकृतोचितम् // KAव्क्_१९.५२ //
1847 SK अभवं वासवग्रामे दुष्कृती पशुपालकः / पशूनां मांसमुत्कृत्य विक्रीतं सतत मया // KAव्क्_१९.५३ //
1848 SK पिण्डपाताय संप्राप्तो मामार्यः करुणानिधिः / कात्यायनाख्यः प्रोवाचः विरमास्मात् कुकर्मणः // KAव्क्_१९.५४ //
1849 SK हिंसामयो ह्ययं क्लेशो दुःसहः साहसैषिणाम् / स्वशरीरे पतत्येव छिन्नमूल इव द्रुमः // KAव्क्_१९.५५ //
1850 SK इत्यहं वार्यमाणो ऽपि तेनानार्यः कृपात्मना / यदा न विरतः पापात् तदा स प्राह मां पुनः // KAव्क्_१९.५६ //
1851 SK दिवा त्वं कुरुषे हिंसां सर्वथा यदि निर्दयः / रात्रौ शीलसमादानं गृहाण समयान्मम // KAव्क्_१९.५७ //
1852 SK इत्युक्त्वा तेन यत्नेन सर्वसत्त्वहितैषिणा / दत्ता शीलसमादानमयी पुण्यमतिर्मम // KAव्क्_१९.५८ //
1853 SK कालेन कालवशगः प्राप्तः सो ऽहमिमां दशाम् / तप्ताङ्गारसुधावर्षैरिव कीर्णो दिवानिशम् // KAव्क्_१९.५९ //
1854 SK रात्रौ शीलसमादानफलं हिंसाफलं दिने / चर्या मत्पुण्यपापाभ्याम् पतितः सुखदुःखयोः // KAव्क्_१९.६० //
1855 SK तस्य मे कुरु कारुण्यं सखे कलुसकारिणः / गत्वा स्वदेशंमत्पुत्रं ब्रूहि मद्वचसा रहः // KAव्क्_१९.६१ //
1856 SK अस्ति मे गृहकोटान्ते निखातं हेमभाजनम् / तदुद्धृत्य परित्यक्तपापवृत्ति विधीयताम् // KAव्क्_१९.६२ //
1857 SK आर्यकात्यायनो नित्यं पिण्डपातेन पूज्यताम् / इत्युक्तस्तेन विनयात् तथेत्युक्त्वा जगाम सः // KAव्क्_१९.६३ //
1858 SK स ददर्श व्रजन् दिव्यविमानमपरं पुनः / रत्नपद्मलताकान्तं द्वितीयमिव नन्दनम् // KAव्क्_१९.६४ //
1859 SK तस्मिन् साङ्गमिवानङ्गं संगतं दिव्ययोषिता / अपश्यद्वासरारम्भे पुरुषं रत्नभूषितम् // KAव्क्_१९.६५ //
1860 SK तेन प्रीत्युपचारेण कृतातिथ्यस्तथैव सः / दिनं निनाय दीर्घं च क्लेशमध्ये सुधामयम् // KAव्क्_१९.६६ //
1861 SK अथ व्योमविमानाग्रात् पतिते पद्मिनीपतौ / अपूर्यत जगद् घोरैर्दुःखैरिव तमोभरैः // KAव्क्_१९.६७ //
1862 SK ततः क्षपापतिर्ज्योत्स्नां वमन्नेव क्षपाजडः / शनकैः पाण्डुरोगीव गौरद्युतिरदृश्यत // KAव्क्_१९.६८ //
1863 SK सुकुमारे दिनालोके रात्रौ राक्षसयोषिता / भक्षिते ऽलक्ष्यत शशी कपालबलसंनिभः // KAव्क्_१९.६९ //
1864 SK व्याप्ते चन्द्रिकया लोके कालचन्द्रनचर्चया / विमानमगमत् क्कापिसा च स्वर्गमृगेक्षणा // KAव्क्_१९.७० //
1865 SK विमानपतितः सो ऽपि पुरुषः सर्वरूपया / शनैः सप्तभिरावर्तैः शतपद्या विवेष्टितः // KAव्क्_१९.७१ //
1866 SK सा तस्य मूर्ध्नि विवरं कृत्वा मस्तिष्कशोणितम् / आस्वादयन्ती शनकैश्चकार शुषिरं शिरः // KAव्क्_१९.७२ //
1867 SK अथारुणकरच्छन्ने सोच्छ्वासवदाने दिने / बीभत्सदर्शनक्लेशादिव मीलिततारके // KAव्क्_१९.७३ //
1868 SK प्रादुरासन् पुनर्दिव्यविमानं सा च कामिनी / युवा स चाद्भुततनुर्दिव्याभरणभूषितः // KAव्क्_१९.७४ //
1869 SK पृष्टो ऽतिविस्मयात् तेन स्ववृत्तान्तं जगाद् सः / द्विजो ऽहं वासवग्रामनिवासी मनसाभिधः // KAव्क्_१९.७५ //
1870 SK तरुणी प्रातिवेश्यस्य पत्नी मलयमञ्जरी / अभून्मम भुजङ्गस्य स्वैरिणी वल्लभा भृशम् // KAव्क्_१९.७६ //
1871 SK परदाररतेर्ग्रामे व्यग्रा मे क्षमते मतिः / मिनग्ना विषयग्रामे समग्रा मे क्षयं गता // KAव्क्_१९.७७ //
1872 SK आर्यकात्यायनः पापं ज्ञात्वा माम् चौर्यकामुकम् / दयाविधेयः कारुण्यात् प्रोवाच विजने शनैः // KAव्क्_१९.७८ //
1873 SK पराङ्गनाङ्गसंसर्गप्रीत्या रूपरतेः क्षैबम् (?) / अनङ्गाग्नौ पतन्नाशं पतङ्गं इव मा गमः // KAव्क्_१९.७९ //
1874 SK अहो आसक्तरक्तानां संपतनप्रमादिनाम् / कामिनाम् हिंसकानां च परदारादरः परम् // KAव्क्_१९.८० //
1875 SK पृथु प्रवेपथु (?) स्वापश्रमविह्वलानाम् गृध्राङ्गनामुखनिखातनखक्षतानाम् / संमोहने परवधूविहितस्पृहाणां रोमाञ्चकारिणि परं नरके च कामः // KAव्क्_१९.८१ //
1876 SK तस्मादस्मान्निवर्तस्व वत्स कुत्सितकर्मणः / जायते पातकं स्पर्शे शुनामेवाशुचौ रतिः // KAव्क्_१९.८२ //
1877 SK इत्यहं कृपया तेन निषिद्धो ऽप्यविशुद्धधीः / अनिरुद्धेन रागेण बद्धस्तामेव नात्यजम् // KAव्क्_१९.८३ //
1878 SK विज्ञाय मामविरतं ततः कात्यायनो ददौ / मह्यं शीलसमादानं दिनचर्याहितोद्यतः // KAव्क्_१९.८४ //
1879 SK दिनशीलसमादानात् परस्त्रीगमनान्निशि / इयं मे पुण्यपापोत्था सुखदुःखमयी स्थितीः // KAव्क्_१९.८५ //
1880 SK गतेन वासवग्रामं वाच्यः पुत्रो मम त्वया / सुवर्णमग्निशालायामस्ति गूढं धृतं मया // KAव्क्_१९.८६ //
1881 SK वृत्तिः कार्या तदुद्भृत्य पूज्यः कात्यायनश्च सः / प्रणयादिति तेनोक्तः श्रोणकोटिर्ययौ ततः // KAव्क्_१९.८७ //
1882 SK सो ऽपश्यद्दिव्यललनामग्रे मणिविमानगाम् / लक्ष्मीं लावण्यदुग्धाब्धेरनायासोद्गतामिव // KAव्क्_१९.८८ //
1883 SK तस्य विमानपादेषि चतुर्षु स्नायुसंयुतम् / स ददर्शातिदुर्दशं बद्धं प्रेतचतुष्टयम् // KAव्क्_१९.८९ //
1884 SK सापि तं प्रत्यभिज्ञाय संभाष्य स्निग्धया गिरा / सुरोचितं ददौ तस्मै रसवत् पानभोजनम् // KAव्क्_१९.९० //
1885 SK भुञ्जानसंज्ञयां दूरात् प्रेतैर्दैन्येन याचितः / स ददौ कृपया तेभ्यः काकेभ्य इव पिण्डिकाः // KAव्क्_१९.९१ //
1886 SK पिण्डो बुसत्वमेकस्य प्रयातो ऽन्यस्य लोहताम् / स्वमांसत्वं तृतीयस्य चतुर्थस्य प्रपूयताम् // KAव्क्_१९.९२ //
1887 SK विलोक्य तत्कृपाविष्टः स तेषां कष्टचेष्टया / पप्रच्छ तन्मुखच्छायाम् विच्छायीकृतपङ्कजाम् // KAव्क्_१९.९३ //
1888 SK पृष्टा तदद्भुतं तेन उवाच सा मृगेक्षणा / न श्रोणकोटिर्णैषां दत्तं भवति तृप्तये // KAव्क्_१९.९४ //
1889 SK ब्राह्मणस्यास्य भार्याहं पूर्वपादाबलम्बिनः / नन्दनाम्नः सुनन्दाख्या वासवग्रामवासिनः // KAव्क्_१९.९५ //
1890 SK द्वितीयपादसंसक्तः पुत्रो मे निष्ठुराभिधः / पश्चात्पादावलम्बिन्यौ दासी चेयं स्नुषा च मे // KAव्क्_१९.९६ //
1891 SK नक्षत्रयोगपूजायाम् पुरा सज्जीकृअते मया / भैक्ष्योपहारे मे गेहमार्यकात्यायनो ऽविशत् // KAव्क्_१९.९७ //
1892 SK मया चित्तप्रसादिन्या पिण्डपातेन सो ऽर्चितः / कुर्वन्नेव ययौ कान्त्या वैमल्यानुग्रहं दिशाम् // KAव्क्_१९.९८ //
1893 SK ततः स्नात्वा समायातस्तूर्णं पतिरयं मम / पत्पिण्डपातमाकर्ण्य प्रमिदाय मयोदितम् // KAव्क्_१९.९९ //
1894 SK कोपादुवाच मां कस्माद् विशिखः श्रमणः शठः / अपूजितेषु पूज्येषु बुसार्हः पूजितस्त्वया // KAव्क्_१९.१०० //
1895 SK इति मोहादनेनोक्ते पुत्रो ऽप्येष जगाद् माम् / पाके पूर्वाशनायोग्यः स किं नाश्नात्ययोगुडान् // KAव्क्_१९.१०१ //
1896 SK इयं स्नुषा मे सततं पूर्वभक्ष्यावभोगिना / मयोक्ते शपथं चक्रे स्वमांसादनवादिनी // KAव्क्_१९.१०२ //
1897 SK इयं दासी च भैक्ष्याणा चैर्यात्तद्व्ययकारिणी / आक्षिप्ता चाकरोत् सत्यं पूयशोणितवादिनी // KAव्क्_१९.१०३ //
1898 SK तत्र ते प्रेतताम् याताः स्ववाक्यसदृशाशनाः / अहं त्वार्यप्रसादेन दिव्यभोगोपभोगिनी // KAव्क्_१९.१०४ //
1899 SK त्वया त्वार्यशमाप्तेन वक्तव्या दुहिता मम / सन्ति हेमनिधानानि गृहे चत्वारि ते पितुः // KAव्क्_१९.१०५ //
1900 SK तान्युद्धृत्य यथायोगं भजस्व् अस्वजनिस्थितिम् / पूजनीयः पितुर्भ्राता नाम्ना कात्यायन सदा // KAव्क्_१९.१०६ //
1901 SK स ः श्रोणकोटिकर्णस्त्वं गच्छ देशं त्यज श्रमम् / वर्षा द्वादश संपूर्णाः स्वगृहान्निर्गतस्य ते // KAव्क्_१९.१०७ //
1902 SK इत्युक्त्वा तं समादिशय तस्य प्रेतचतुष्टयम् / सुप्तस्यैव मुहूर्तेन स्वदेशाप्तिमकारयत् // KAव्क्_१९.१०८ //
1903 SK उत्थितः सो ऽपि सहसा स्वदेशोद्यानकाननात् / वियोगशोकात्पितरौ शुश्रावान्ध्यमुपागतौ // KAव्क्_१९.१०९ //
1904 SK भिक्षुद्विजातिथिगणे पूज्यमाने सुरालये / स्वकं पितृगृहं दृष्ट्वा परं विस्मयमाययौ // KAव्क्_१९.११० //
1905 SK निश्चित्य सर्वं भावानां क्षणिकत्वादनित्यताम् / स्नेहरागं समुत्सृज्य तत्रस्थः समचिन्तयत् // KAव्क्_१९.१११ //
1906 SK अहो संमोहनिद्रेयं निरन्ततो दिवानिशम् / स्वप्नमायाविलसितैः करोत्यद्भुतविभ्रमम् // KAव्क्_१९.११२ //
1907 SK जन्मवर्त्मप्रदा माता पिता बीजवपत्खगः / पान्थपूजासनं कायः को ऽयं नियमसंगमः // KAव्क्_१९.११३ //
1908 SK श्रियः संसाराभ्रभ्रमपरिचिताः काञ्चनरुचा आशा दिग् (?) निर्बन्धास्तडित इव निर्लेपचपलाः / वपुः सर्वापायैः क्षयभयनिकायैः परिगतं जरारोगोद्वेगैस्तदपि न विरागस्तनुभृताम् // KAव्क्_१९.११४ //
1909 SK श्रिये स्वस्तिसमाप्तये स्वजनस्यायमञ्जलिः / दाक्षिण्यैः क्षमतं श्रीषु प्रव्रज्यैव प्रिया मम // KAव्क्_१९.११५ //
1910 SK इति ध्यात्वा स पितरौ समाश्वास्याप्तलोचनौ / बुद्धौ धर्मपथे शुद्धे शमधाम्नि न्यवेशयत् // KAव्क्_१९.११६ //
1911 SK सार्थभ्रष्टश्चिरायात् कृशो ऽपि स्वजनस्य च / अलुप्तसत्त्वविभवान्नकृपास्पदतां ययौ // KAव्क्_१९.११७ //
1912 SK अनुकम्पस्व यद्येतं संसारक्लेशविह्वलम् / सतः कस्यानुकम्प्यास्ते संपत्संपर्कनित्स्पृहाः // KAव्क्_१९.११८ //
1913 SK पशुपालकविप्रस्त्रीसंदेशादि यथोदितम् / निगद्य तेभ्यः कनकप्राप्तिप्रत्ययलक्षणम् // KAव्क्_१९.११९ //
1914 SK शान्तः कात्यायनं प्राप्य प्रव्रज्यां स समाददे / मुग्धानाम् यद्विषादाय तत्प्रसादाय धीमताम् // KAव्क्_१९.१२० //
1915 SK स समासाद्य विशदं स्रितःप्राप्तिफलं ततः / सकृदागाम्यनागामिफलमर्हत्फलं तथा // KAव्क्_१९.१२१ //
1916 SK त्रैधातुको वीतरागः समलोष्टाश्मकाञ्चनः / आकाशपाणितुल्यो ऽभूदसिचन्दनयोः समह् // KAव्क्_१९.१२२ //
1917 SK श्रावस्त्याम् वेणुगहने जिनं जेतवने स्थितम् / भगवन्तं ययौ द्रष्टुं सो ऽथ कात्यायनाज्ञया // KAव्क्_१९.१२३ //
1918 SK प्रणितातकृतातिथ्यः प्रीत्या भगवता स्वयम् / स श्रोणकोटीकर्णो ऽथ बभाषे हर्षनिर्भरः // KAव्क्_१९.१२४ //
1919 SK भगवान् धर्मकायेन दृष्टो ऽयं श्रोत्रवर्त्मनि / अधुना रूपकायेन पुण्यैरालोकितो मया // KAव्क्_१९.१२५ //
1920 SK अनल्पसुकृतप्राप्यमिदं तद्दर्शनामृतम् / पीत्वा न तृप्तिमायान्ति वञ्चिता एव ते परम् // KAव्क्_१९.१२६ //
1921 SK अस्पृहस्यापि ते मूर्तिः कुरुते कस्य न स्पृहाम् / निर्लोपस्यापि ते दृष्टिरहो हर्षेण लिम्पति // KAव्क्_१९.१२७ //
1922 SK त्वत्कथा त्वदनुध्यानं त्वत्प्राप्तिस्त्वन्निषेवणम् / एताः कुशलमूलानां स्फीताः फलसमृद्धयः // KAव्क्_१९.१२८ //
1923 SK इति श्रुत्वा भगवता प्रसादेनाब्न्हिनन्दितः / तदादिष्टं शमारामं स विहारमवाप्तवान् // KAव्क्_१९.१२९ //
1924 SK तस्यास्पदं समभ्येत्य प्रणयाद्भगवानपु / श्रुत्वास्य मधुरं धर्मं स्वाध्यायं प्रशशंस सः // KAव्क्_१९.१३० //
1925 SK तां श्रोणिकोटिकर्णस्य दृष्ट्वा प्रशमसंपदम् / भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टः पूर्ववृत्तमभाषत // KAव्क्_१९.१३१ //
1926 SK वाराणस्यां पुरा सम्यक्संबुद्धे काश्यपाभिधे / निर्वाणधातौ निःशेषकार्यत्वात् परिनिर्वृते // KAव्क्_१९.१३२ //
1927 SK कृकिनामनृपश्चैत्यं तस्य रत्नैरकारयत् / स्वयं तत्पुण्यसंभरं स्वर्गं वक्तुमिवोद्गतम् // KAव्क्_१९.१३३ //
1928 SK शीर्णस्थापितसंस्कारे तस्मिन् संज्ञाधृतं धनम् / तत्पुत्रः प्राप्तराज्यो ऽथ न ददौ लोभमोहितः // KAव्क्_१९.१३४ //
1929 SK अथोत्तरापथायातः सर्थवाहो ऽर्थदाभिधः / प्रददौ पृथिवीमूल्यं तत्कृते कर्णभूषणम् // KAव्क्_१९.१३५ //
1930 SK कालान्तरोपगतो ऽपि दत्वा चान्यद्धनं महत् / प्रणिधानं स कृतवान् भूयासं पुण्यवानिति // KAव्क्_१९.१३६ //
1931 SK स श्रोणकोटिकर्णो ऽयं पुण्यैः प्रातपदं महत् / तद्विधेनैव संयातः कर्णभूषणलक्षणः // KAव्क्_१९.१३७ //
1932 SK प्रस्थानसमये माता श्राविता परुषं वचः / यस्मादनेन तेनास्य बभूवास्य श्रमो महान् // KAव्क्_१९.१३८ //
1933 SK मध्येषु महतः शुक्लगुणसत्कर्मवाससः / कृष्णकर्मलवांशो ऽपि स्फुट एवावधार्यते // KAव्क्_१९.१३९ //
1934 SK सुकृतसचिवः सत्त्वेत्साहः प्रवाससखी धृतिः विषमतरणे वीर्यं सेतुर्विपद्यधिका कृपा / शमपरिचिता पर्यन्ते च प्रसादमयी मतिः परिणतिरियं पुण्यप्राप्तेः स्फुरत्फलशालिनी // KAव्क्_१९.१४० //
1935 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां श्रोणकोटिकर्णावदानं नामोनविंशतितमः पल्लवः //
1936 SK २०. आम्रपाल्यवदानम् /
1937 SK द्विजिह्वसङ्गे कथमस्ति वृत्तिरनेकमुख्ये कथमस्ति सौख्यम् / कर्मान्तबन्धे ऽस्ति कथं स्वशक्तिः प्रज्ञाप्रकर्षे कथमस्त्यपायः // KAव्क्_२०.१ //
1938 SK मिथिलायां विदेहेषु जलसत्त्वाभिधो नृपः / अभूद् भुजभुजङ्गस्य विश्रान्तपृथिवीभरः // KAव्क्_२०.२ //
1939 SK खण्डो नाम महामात्यस्तस्याखण्डलसंपदः / बभूवाशेषषाङ्गुण्यपरिज्ञानबृहस्पतिः // KAव्क्_२०.३ //
1940 SK नीतिज्ञगौरवात्तस्य नृपे व्यक्तं नलोकिनि / सदाभवन्मुखप्रेक्षी सर्वः कार्यवशाज्जनः // KAव्क्_२०.४ //
1941 SK गतानुगतिकत्वेन प्रवाहप्रणयी भरः / वर्धते वार्यमाणस्य स्वजनस्य जलस्य च // KAव्क्_२०.५ //
1942 SK सर्वं तन्मयमालोक्य जनं मात्सर्यमूर्च्छिताः / मन्त्रिणः संहतास्तस्य विनिपातमचिन्तयन् // KAव्क्_२०.६ //
1943 SK ते प्रविश्याश्रमम् राज्ञस्तां तस्य प्रबह्विष्णूताम् / मुहुः शङ्कास्पदं कृत्वा शशंसुर्भेदकोविदाः // KAव्क्_२०.७ //
1944 SK तद्गिरा शङ्कितो राजा तस्य वैमुख्यमाययौ / अबलाबालभूपाला वर्णप्रत्ययाः परम् // KAव्क्_२०.८ //
1945 SK अशङ्क्यादपि शङ्कन्ते शङ्कादोषे ऽप्यशङ्किताः / अविशेषज्ञचपला भूपालाः काकशङ्किनः // KAव्क्_२०.९ //
1946 SK प्रभोर्विरक्तिलिङ्गानि विलोक्यामात्यपुंगवः / स्वसुतौ गोपसिंहाख्यौ सशङ्कः स्वैरमब्रवीत् // KAव्क्_२०.१० //
1947 SK धूर्तैर्मे वीतविश्वासः पिशुनैर्नृपतिः कृतः / प्रत्ययं नैति हृदये विदार्यापि प्रदर्शिते // KAव्क्_२०.११ //
1948 SK विरक्तः स्थगितालापदर्शनश्रवणः प्रभुः / शेफ इव वृद्धस्य यातः शिथिलतां मम // KAव्क्_२०.१२ //
1949 SK पिशुनोद्भूतभेदस्य प्रेम्णः संधिर्न विद्यते / न मणिः श्लिष्याति पुनः पाषाणशकलीकृतः // KAव्क्_२०.१३ //
1950 SK द्विजिह्णकुटिलक्रान्तः प्रभुश्चन्दनपादपः / न यात्यर्थक्रियाकारी गुणवानपि सेव्यताम् // KAव्क्_२०.१४ //
1951 SK कथं नृपनिधानार्थी कुशलं भजते नरः / घोरद्वेषविषाविष्टद्विजिह्वाघातविह्वलः // KAव्क्_२०.१५ //
1952 SK तस्माद्व्रजामः संत्यज्य द्वेषदोषेण भूपतेः / शङ्काशल्यमये वृत्ते मे ऽस्मिन् देशे स्थितेन किम् // KAव्क्_२०.१६ //
1953 SK दक्षा रक्षाक्षमाः शूराः प्रभुतार्थाः सुसंहताः / सन्तः सन्ति विशालायां वासस्तत्र ममेप्सितः // KAव्क्_२०.१७ //
1954 SK इति ब्रुवाणः पुत्राभ्यां तथेत्युक्तः स सानुगः / उद्यानगतिमानेन प्रययौ सपरिच्छदः // KAव्क्_२०.१८ //
1955 SK प्रयाणं नृपतिर्ज्ञात्वा निवर्तनसमुद्यतः / यत्नेनापि न तं प्राप नोत्सृष्टं लभ्यते पुनः // KAव्क्_२०.१९ //
1956 SK मूर्खाः सत्सु कृतावज्ञा विमुह्यन्ते क्षणेन तैः / याति तेषां तु सर्वत्र को ऽपि नार्थी कृतार्थताम् // KAव्क्_२०.२० //
1957 SK धीमानमात्यः प्राप्तो ऽथ कृष्टो वैशालिकैर्गुणैः / पूजितः प्रणयाचारैः संघमुख्ये पदे स्थितः // KAव्क्_२०.२१ //
1958 SK तद्बुद्धिविभवाप्तश्रीः सो ऽथ तत्प्रमुखो गणः / कदाचिदनयाल्लेखे न पराबह्वपात्रताम् // KAव्क्_२०.२२ //
1959 SK अथ कालेन सिंहस्य मन्त्रिसूनोः कनीयसः / अजायत सुता कान्ता चैला नाम गुणोचिता // KAव्क्_२०.२३ //
1960 SK द्वितीया चोपचैलाख्या सुता जातास्य सुन्दरी / नन्मन्येव तयोः प्राह निमित्तज्ञो विचक्षणः // KAव्क्_२०.२४ //
1961 SK चैलायास्तनयो भावी पितृहन्ता महीपतिः / गुणवानुपचैलायाः पूर्णलक्षह्णवानिति // KAव्क्_२०.२५ / ज्येष्ठो मन्त्रिसुतः शौर्याद्गोपः प्रौढमदोद्धतः / उद्यानमर्दनक्षेपैर्गणानां द्वेष्यताम् ययौ // KAव्क्_२०.२६ //
1962 SK तत्पितुर्गौरवात्तस्मै सानुजाय विमन्यवः / विशालशालतामन्ते जीर्णोद्यानद्वयं ददुः // KAव्क्_२०.२७ //
1963 SK सुगतप्रतिमां चक्रे तत्रैकः सुकृतोचिताम् / विहारं वैभवोदारं भुवनाभरणं परः // KAव्क्_२०.२८ //
1964 SK अथ पित्रा बलोत्सिक्तः सुतः प्रत्यन्तमण्डले / गणकोपभयाद्गोपः कर्मान्तोपार्जने धृतः // KAव्क्_२०.२९ //
1965 SK कालेन त्रिदिवं याते तस्मिन् मन्त्रिवरे गणैः / कनीयसस्तु साधुत्वात् सिंहस्तस्य पदे धृतः // KAव्क्_२०.३० //
1966 SK गोपः पितुरसंप्राप्य पदं गणविमानितः / तद्देशवासविरसः परिहारमचिन्तयत् // KAव्क्_२०.३१ //
1967 SK वास्तव्य कण्टकाकीर्णे व्याघ्राघ्राते वरं वने / अनेकस्वामिसंभिन्नजने न तु विशृङ्खले // KAव्क्_२०.३२ //
1968 SK नानामतक्रियालापः कथमाराध्यते गणः / समीहितं यदेकस्य दतन्यस्मै न रोचते // KAव्क्_२०.३३ //
1969 SK इत्मानी स संचिन्त्य गत्वा राजगृहं पुरम् / बिम्बिसारं नरपतिं गुणश्रियमशिश्रियत् // KAव्क्_२०.३४ //
1970 SK स तेन मानितः प्रीत्या तस्य विश्रम्भभूरभूत् / चिररुच्येव तत्कालमाभाति गुणसंगतिः // KAव्क्_२०.३५ //
1971 SK राज्ञो ऽथ बिम्बिसारस्य वल्लभा पञ्चतां ययौ / तद्वियोगाग्निसंतप्तं तं विचिन्त्य स बुद्धिमान् // KAव्क्_२०.३६ //
1972 SK उपचैलां सुतां भ्रातुस्तद्विवाहोचिता वधूम् / गूढचारी तदादेशात् वैशालकपुरीं यय // KAव्क्_२०.३७ //
1973 SK कन्या गणोपभोग्यौव न कस्मैचित्प्रदीयते / इति वैशालिकैः पूर्वं स्वदेशे नियमः कृतः // KAव्क्_२०.३८ //
1974 SK तत्पुरे द्वाररक्षायै यक्षस्थानावलम्बिनी / परप्रवेशे कुरुते शब्दं घण्टी पटीयसी // KAव्क्_२०.३९ //
1975 SK स प्रविश्य ततो भ्रातुर्गूढमुद्यानचारिणीम् / उपचैलां समाहतुं गतश्चैलामवाप्तवान् // KAव्क्_२०.४० //
1976 SK यातस्तं रथमारुह्य घण्टाशब्दादभिद्र्युतम् / स हत्वा वीरपुरुषानवाप नृपतेः पुरम् // KAव्क्_२०.४१ //
1977 SK तमूचे देवकन्येयं प्राता विमनसात्मना / पितृहन्ता सुतो ह्यास्या निमित्तज्ञेन सूचितः // KAव्क्_२०.४२ //
1978 SK तस्मादेषा नरपतेर्महिषी न तवोचिता / त्वयि जीवति जीवन्ति प्रजानां सर्वसंपदः // KAव्क्_२०.४३ //
1979 SK इत्युक्तस्तेन तां दृष्ट्वा त्युक्तं नैव शशाक सः / निरुद्धः कर्मणा ह्येव तन्मुखालेख्यलेखया // KAव्क्_२०.४४ //
1980 SK सो ऽवदत् क्क कदा दृष्ट पुत्रेण निहतः पिता / स्वयं मयाभिषेक्तव्यः सुतो यद्य् भविष्यति // KAव्क्_२०.४५ //
1981 SK इत्युक्त्वा नृपतिः कन्यां परिणीयाभवत्सुखी / कृतकर्मोर्मिनिर्माणे प्रभवन्ति न बुद्धयः // KAव्क्_२०.४६ //
1982 SK भोगिनस्तस्य कालेन तस्याम् सूनुरजायत / ज्योतिष्कचरिते यस्य वृत्तमुक्तं पितृद्रुहः // KAव्क्_२०.४७ //
1983 SK तपोवनमृगाधानमृगयाव्यसने वने / एवंविधो ह्यभूत्तस्य मुनिशापः सुताकृतिः // KAव्क्_२०.४८ //
1984 SK अत्रान्तरे महान्नाम वैशालिकगणाग्रणीः / कन्यामाम्रवनात्प्राप कदलीस्कन्धनिर्गताम् // KAव्क्_२०.४९ //
1985 SK सा तस्य भवने कान्ता वर्धमाना शनैः शनैः / विदधे विपुलां प्रीतिं दानचिन्तां अच् चेतसि // KAव्क्_२०.५० //
1986 SK प्रणयादाम्रपालीति बन्धुभिः सा कृताभिधाः / सूनुहीनमिन त्यक्त्वा बाल्यं यौवनमाददे // KAव्क्_२०.५१ //
1987 SK तद्विवाहोद्यतस्याथ न सेहे तत्पितुर्गणः / गणोपभोग्या कन्येति समयस्य व्यतिक्रमम् // KAव्क्_२०.५२ //
1988 SK पितरं दुःखसंतप्तं समेत्याथ जगाद् सा / भवामि गणभोग्यैव किं त्वेष समयो यदि // KAव्क्_२०.५३ //
1989 SK एकस्योपरि नान्यस्य प्रवेशः स्वपदे स्थितिः / पणः कार्षापणशतैः पञ्चभिः प्रत्यहं मम // KAव्क्_२०.५४ //
1990 SK सप्ताहेनैव विचयः कर्यो वेश्मनि नान्यदा / इत्यस्मिन् समये व ध्यः सर्वश्चैव व्यतिक्रमी // KAव्क्_२०.५५ //
1991 SK इति तत्समयं ज्ञात्वा तत्पितुर्वचसा गणः / अकारोद् बाढमित्युक्त्वा दृढनिश्चयमादरात् // KAव्क्_२०.५६ //
1992 SK ततः सरत्नभवने वराभरणभूषिते / हेमहर्म्यसमारूढा दिदेश दिनचन्द्रिकाम् // KAव्क्_२०.५७ //
1993 SK ततः पणीकृतः कामी यो यस्तां समुपाययौ / तस्य तस्याभवत् तस्याः प्रभावेणौजसः क्षयः // KAव्क्_२०.५८ //
1994 SK द्रष्टुमेव न शेकुस्ते किं पुनः स्प्रष्टुमाकुलाः / भुजङ्गभोगसंरुद्धां तां चन्दनलतामिव // KAव्क्_२०.५९ //
1995 SK ततः सा सुन्दरी भेजे यौवनस्यापि यौवनम् / गुरुणा स्तनभारेण मध्यभङ्गभयप्रदम् // KAव्क्_२०.६० //
1996 SK स्मरसंभोगरहितं तत्तस्या रूपमद्भुतम् / श्वभ्रहेमलतापुष्पमिव निष्फलतां ययौ // KAव्क्_२०.६१ //
1997 SK कौतुकाशाविनोदाय नानादेशान्तरागतैः / अकारि चित्रकारैर्भूपालप्रतिकृतिर्गृहे // KAव्क्_२०.६२ //
1998 SK विधाय चित्रलिखितान् सा क्रमेण नरेश्वरान् / ददर्श बिम्बिरासय रूपं रतिपतेचिव // KAव्क्_२०.६३ //
1999 SK तमालोक्यैव सहसा समुद्भूतमनोभवा / स येन लिखितस्तत्र तं पप्रच्छ कुतूहलात् // KAव्क्_२०.६४ //
2000 SK को ऽयं सखे प्रीतिलतामाधवो वसुधापतिः / प्रीणाति लोचने यस्य सुधापरिचिता रुचिः // KAव्क्_२०.६५ //
2001 SK धन्या का नाम भूभर्तुरस्य प्रणयभागिणी / लक्ष्यं सौभग्यजं गर्वमुर्वश्याः संहृतं यया // KAव्क्_२०.६६ //
2002 SK इति पृष्टतया स्वैरं तामूचे चित्रकोविदः / भूपतिर्बिम्बसारो ऽयं सारं सुकृतसंपदाम् // KAव्क्_२०.६७ //
2003 SK शुअर्यरूपतुलारोहे देवाः के नाकनायकाः / शङ्के करोति नैवास्य मन्मथो वा मनोरथम् // KAव्क्_२०.६८ //
2004 SK इत्युक्ते तेन सा तस्थौ भूपालन्यस्तलोचना / सहसैवाभिलाषेण नवीनाभिमुखीकृता // KAव्क्_२०.६९ //
2005 SK अत्रान्तरे बिम्बिसारः स्वैरवेश्मनि निजने / कथान्ते गोपमवदत् किंचित्स्मितसिताधरः // KAव्क्_२०.७० //
2006 SK श्रूयतां यन्मम सखे किंचिन्मनसि वर्तते / निर्यन्त्रमित्रस्वच्छन्दवादः को ऽपि सुधारसः // KAव्क्_२०.७१ //
2007 SK वैशालिकौर्वरारोहा गणैः साधारणिकृता / रम्भोरूः श्रूयते कान्ता रम्भागर्भसमुद्भवा // KAव्क्_२०.७२ // KAव्क्_२०.तत्प्रभावविनष्टाशैस्तेजस्विप्रणयोचिता / सा तैर्न दूषिताद्यापि मातङ्गैरिव पद्मिनी // KAव्क्_२०.७३ //
2008 SK श्रवणादेव सानन्दमपर्युषितकौतुकम् / न करोति मनः कस्य तत्स्त्रीरत्नमयोनिजम् // KAव्क्_२०.७४ //
2009 SK अभिलाषि मनस्तस्यां श्रोताय जातंमे सह चक्षुषा / तद्गुणश्रुतिधन्याय श्रोत्राय स्पृहयाम्यहम् // KAव्क्_२०.७५ //
2010 SK इत्युक्ते भूमिपतिना गोपस्तं प्रयभाषत / भुजङ्गगणसंरुद्धः स राजन् मान्मथो निधिः // KAव्क्_२०.७६ //
2011 SK अत्यल्पस्खलितं प्राप्य दुःसहापातदुर्गमः / एष ते विषमः पन्था दर्शितो विषमेषुणा // KAव्क्_२०.७७ //
2012 SK लभते सा न निर्गन्तुं न युक्तं गमनं च ते / किमस्मिन् विरतोपाये वदाम्युभयसंशये // KAव्क्_२०.७८ //
2013 SK इत्युक्तस्तेन नृपतिर्नोत्कण्ठाग्राहमत्यजत् / विद्वांसो ऽप्युचिताम् नीतिं न स्मरन्ति स्मरातुराः // KAव्क्_२०.७९ //
2014 SK वैशालिकपुरीं यातो गोपेन सहितो ऽथ सः / प्रविवेशान्यवेशेन मन्दिरं हरिणीदृशः // KAव्क्_२०.८० //
2015 SK सा चित्रदर्शनेनैव दृष्ट्वा परिचितं दृशोः / नरनाथं सवैलक्ष्यलक्षणं क्षितिमैक्षत // KAव्क्_२०.८१ //
2016 SK लज्जानिरुत्तरे तस्याः कम्पव्यतिकरे परम् / रणन्ती रसना चक्रे स्वागतं नृपतेरिवः // KAव्क्_२०.८२ //
2017 SK विलोक्य धन्यतामानी तत्र चित्रे निजं वपुः / तां लावण्यनदीं राजा नयनाञ्जलिना पपौ // KAव्क्_२०.८३ //
2018 SK लज्जावेशेन सुन्दर्यामाभिजात्येन भूपतौ / आबद्धमैनयोः क्षिप्रं गोपस्तां सस्मितो ऽवदत् // KAव्क्_२०.८४ //
2019 SK अयं ते चित्रलिखिताकारध्यानावधानतः / व्यक्तं भक्षिविशेषेन देवः प्रत्यक्षतां गतः // KAव्क्_२०.८५ //
2020 SK त्वयायं लिखितश्चित्रे त्वमनेन तु चेतसि / न जाने युवयोः को नु प्रयातः प्रेमदूतताम् // KAव्क्_२०.८६ //
2021 SK इत्यादिभिः कथाबन्धैः परीपूर्णप्रमोदयोः / यद्यदेव स्मरादिष्टम् तत्तदास्वादताम् गतम् // KAव्क्_२०.८७ //
2022 SK घण्टारवाकुले लोके राजा प्रच्छन्नकामुकह् / सप्तरात्रमनालोक्ये तस्थौ तद्भवने रहः // KAव्क्_२०.८८ //
2023 SK लतेव पुष्पिता काले तस्माद्गर्भमवाप्य सा / चक्रे विदितवृत्तान्तं तं लज्जावनता शनैः // KAव्क्_२०.८९ //
2024 SK आसन्ने विश्मविचये दत्वास्मै नृपतिर्ययौ / भाविपुत्रपरिज्ञानप्रत्ययादङ्गुलीयकम् // KAव्क्_२०.९० //
2025 SK याते भास्वद्वपिषु नृपतौ संमते लोचनानां सद्यः प्रोद्यद्विरहतिमिराक्रान्तिमीराक्रान्तिमीलन्मुखाब्जा / साभूत्सायंतनतनुतरापारवाताभिभूता शोकोच्छ्वासव्यतिकरवती हासहीना निशेव // KAव्क्_२०.९१ //
2026 SK कपोलं पाणिपद्मेन संकल्पेन महीपतिम् / नवं तानवमङ्गेन वहन्ती निमिमील सा // KAव्क्_२०.९२ //
2027 SK ततः कालेन कल्याणी प्रतिबिम्बोपमं पितुः / अजीजनत्सा नतयं विनयं साधुधीरिव // KAव्क्_२०.९३ //
2028 SK वर्धमाने शनैस्तस्मिन् काले बिम्ब इवैन्दवे / बिम्बिसारस्य पुत्रो ऽयमिति लोकेषु पप्रथे // KAव्क्_२०.९४ //
2029 SK अपवादपरैस्तैस्तैस्तं प्रत्यनुचित्तैर्यदा / बाधन्ते शिशवः क्रीडाप्रसङ्गे ऽमर्षसंयताः // KAव्क्_२०.९५ //
2030 SK ततः सा प्रेषयामास पुत्रं विद्यार्जनोचितम् / वणिक्सार्थेन महता साङ्गुलीयं पितुः पदम् // KAव्क्_२०.९६ //
2031 SK बिम्बिसारो ऽपि संप्राप्य सदृशाकारमात्मजम् / हर्षदृप्तः परिष्वज्य चक्रे तस्य परिग्रहम् // KAव्क्_२०.९७ //
2032 SK वृत्ताण्ते विश्रुते तस्मिन्नाम्रपाल्याह् सकौतुकैः / भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टस्तत्कथामवदज्जिनः // KAव्क्_२०.९८ //
2033 SK पुरे राजगृहे राजवल्लभोद्यानकानने / बभूव मालती नाम पूर्वमुद्यानपालिका // KAव्क्_२०.९९ //
2034 SK सा कदाचित् प्रसादार्द्रं पुरः प्राप्तं यदृच्छया / प्रत्येकबुद्धं राजषिं चूतपुण्पैपूजयत् // KAव्क्_२०.१०० //
2035 SK अयोनिजा नृपस्याहं पत्नी स्यामिति तत्र सा / प्रणिधानं पुरश्चक्रे तस्य चित्तप्रसादिनी // KAव्क्_२०.१०१ //
2036 SK पुण्यपुष्पफलभोगशालिनी सैव दिव्यतनुराम्रपालिका / इत्युदारचरिता निशम्य ते भिक्षवः सपदि विस्मयं ययुः // KAव्क्_२०.१०२ //
2037 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां आम्रपाल्यवदानं नाम विंशतितमः पल्लवः //
2038 SK २१. जेतवनप्रतिग्रहावदानम् /
2039 SK दृष्टं मुष्टिनिविष्टपारदकणाकारं नराणां धनं धन्यो ऽसौ यशसा सहाक्षयपदं यद्यस्य विद्योतते / दीनानाथगणार्पणोपकरणीभूतप्रभूतश्रियः पुण्यारामविहारचैत्यभगवद्बिम्बप्रतिष्ठादिभिः // KAव्क्_२१.१ //
2040 SK श्रीमान् बभूव श्रावस्त्यां दत्तो नाम गृहाभिपः / सुतस्तस्य सुदत्तो ऽभूदाकरः पुण्यसंपदाम् // KAव्क्_२१.२ //
2041 SK स बाल्य एवालंकारं याचकेभ्यः सदा ददौ / प्राग्जन्मवासनाभ्यासः कस्य केन निर्वायते // KAव्क्_२१.३ //
2042 SK नित्यमाभरणत्यागात्परं पित्रा निवारितः / नदीसमुद्धृतान्यस्मै सदैवान्यान्यदर्शयत् // KAव्क्_२१.४ //
2043 SK निधिदर्शी स सर्वत्र पितरि त्रिदिवं गते / दीनानाथप्रदानेन बभूवानाथपिण्डदः // KAव्क्_२१.५ //
2044 SK कृतदानह् स कालेन पुत्रवान् पुत्रव्त्सलः / अभूत् पुत्रविवाहार्थी कन्यान्वेषणयत्नवान् // KAव्क्_२१.६ //
2045 SK कन्यकां याचितुं कांचित् पुरं राजगृहं ततः / मधुस्कन्धाभिधं दक्षं ब्राह्मणं विसर्सर्ज सः // KAव्क्_२१.७ //
2046 SK आसाद्य मगधान् राजगृहं नगरमेत्य सः / महाधनं गॄहपतिं ययाचे कन्यकाम् द्विजः // KAव्क्_२१.८ //
2047 SK अनाथपिण्डदो नाम श्रावस्त्यामस्ति विश्रुतः / तत्पुत्राय सुजाताय कन्यायाम् देहीत्युवाच सः // KAव्क्_२१.९ //
2048 SK सो ऽब्रवीदेश संबन्धः परमो ऽस्मत्कुलोचितः / वंशे ऽस्माकं तु कन्यानाम् शुक्लमादीयते महत् // KAव्क्_२१.१० //
2049 SK शतं शतं रथाग्र्याणां गजाश्वाश्वतरस्य च / दाशीनिचयनिष्कानां दीयतां यदि शक्यते // KAव्क्_२१.११ //
2050 SK इत्युक्ते तेन तं विप्रं सस्मितः प्रत्यभाषत / अनाथपिण्डदगृहे दास्ये शुल्कं तदल्पकम् // KAव्क्_२१.१२ //
2051 SK ब्राह्मणेनाखिले तस्मिन् कन्याशुल्के प्रतिश्रुते / तमादराद्गृहपतिर्भोजनाय न्यमन्त्रयत् // KAव्क्_२१.१३ //
2052 SK स भुक्त्वा विविधं तत्र भक्ष्यभोज्यमयन्त्रितः / रात्रौ विसूचिकाक्रान्तश्चुक्रोश विपुलव्यथः // KAव्क्_२१.१४ //
2053 SK ये ऽन्नमश्नन्ति लौल्येन निशि निद्रासुखापहम् / जन्मकर्म कथं कुर्युः परलोकसुखाय ते // KAव्क्_२१.१५ //
2054 SK तत्याजाशुचिभीत्या तं गृहात्परिजनो बहिः / आस्पदं नैरपेक्ष्यस्य जात्या दासजनः शठः // KAव्क्_२१.१६ //
2055 SK शुभेन कर्मणा तस्य संप्राप्तस्तेन वर्त्मना / समौद्गल्यायनः शारिपुत्रः कारुण्यपेशलः // KAव्क्_२१.१७ //
2056 SK तं वंशस्य दलाग्रेण निर्लिख्यापि तथा मृदा / प्रक्षाल्य धर्ममादिश्य तौ तस्य ययतुः शनैः // KAव्क्_२१.१८ //
2057 SK सो ऽपि चित्तं तयोरग्रे प्रसाद्य त्यक्तविग्रहः / चतुर्महाराजिकेषु देवेषु समाजायत // KAव्क्_२१.१९ //
2058 SK तत्र विश्रवणादेशान्मर्त्यलोके निकेतने / स चक्रे शिबिरद्वारे पूजाधिष्ष्ठानसंनिधिम् // KAव्क्_२१.२० //
2059 SK लेखविज्ञातसंबन्धविश्चयो ऽथ यथोदितम् / अनाथपिण्डदः शुल्कमादाय स्वयमाययौ // KAव्क्_२१.२१ //
2060 SK स संबन्धिगृहं प्राप्य ददर्शाश्चर्यकारिणीम् / शिखराकारराजार्हभक्ष्यसंभारसंपदम् // KAव्क्_२१.२२ //
2061 SK स विस्मयाद्गृहपतिं पप्रच्छ स्वच्छमानसः / भूरिभक्ष्य्प्त्सवः को ऽयमपि राजा निमन्त्रितः // KAव्क्_२१.२३ //
2062 SK स तं बभाषे भगवान् बुद्धः संघपरिग्रहः / मया निमन्त्रितः संघे सो ऽयम् मम महोत्सवः // KAव्क्_२१.२४ //
2063 SK इति बुद्धाभिधानेन जातरोमाzन्चकण्टकः / इन्दुस्यन्दिरिवाल्किन्नः सहसैव बभूव सः // KAव्क्_२१.२५ //
2064 SK अविदितपरमार्थे कस्यचिन्नाममात्रे स्फुरति सहजभावः को ऽपि जन्मानुबन्धः / अभिनवघननादे व्यक्तहर्षभिलाषः स्पृशति ललितनृत्योद्वृत्तवृत्तिं मयूरः // KAव्क्_२१.२६ //
2065 SK सो ऽवदद्वदनाम्भोजसंजाताभिनवद्युतिः / क एष भगवान् बुद्धः कश्च संघो ऽभिधीयते // KAव्क्_२१.२७ //
2066 SK इति पृष्टो गृहपतिस्तेन प्रोवाच सस्मितः / अहो बत न जानीषे शास्तारं भुवनत्रये // KAव्क्_२१.२८ //
2067 SK संसारपाशभीतानां शरण्यं शरणैषिणाम् / जिन यस्तं न जानाति स लोके वञ्चितः परम् // KAव्क्_२१.२९ //
2068 SK किं तेन मोहलीनेन विफलीकृतजन्मना / अज्ञानतरणोपायं वयो येन व्ययीकृतम् // KAव्क्_२१.३० //
2069 SK गोतमो भगवान् बुद्धः शाक्यराजकुलद्भिवः / संबुध्यानुत्तरं सम्यक्संबोधिमनगारिकः // KAव्क्_२१.३१ //
2070 SK पश्चात् प्रव्रजितानाम् च तस्यैवानुग्रहात्परम् / भिक्षूणां गतरागाणाम् समूहः संघ उच्यते // KAव्क्_२१.३२ //
2071 SK स एष बुद्धप्रमुखः संघः स्वकुशलैषिणाः / मया पुण्यपणं प्राप्यं प्रणयेन निमन्त्रितः // KAव्क्_२१.३३ //
2072 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा तत्स्मृत्वानाथपिण्डदः / बुद्धालम्बनभावेन निशि निद्रां समाययौ // KAव्क्_२१.३४ //
2073 SK रजन्यां यामशेषायां समाकृष्ट इवेत्सुकः / प्रभातमिति स ज्ञात्वा पुरद्वारेण निर्ययौ // KAव्क्_२१.३५ //
2074 SK शिबिकाद्वारमासाद्य संप्राप्त इव देवताम् / मधुस्कन्धेन निर्दिष्टं श्रेयःपन्थानमाप्तवान् // KAव्क्_२१.३६ //
2075 SK भगवांस्तं ततः प्राप्य स तृष्णार्त इवामृतम् / बभूवानुपमास्वादं प्रमोदामोदनिर्वृतः // KAव्क्_२१.३७ //
2076 SK तं दृष्ट्वा सादरं दूरात् छायातरुमिवाध्वगः / अवाप गतसंतापः श्रान्तिं विश्रान्तिशीतलाम् // KAव्क्_२१.३८ //
2077 SK तस्य तद्दर्शनेव विमलाभिगतः मनः / शरत्समागमेनेव घनध्वान्तोज्झितं नभः // KAव्क्_२१.३९ //
2078 SK स को ऽपि पुण्यशीलानामनुभावः प्रसादिनाम् / भवन्ति यत्प्रसादेन निर्विघ्नाश्चित्तवृत्तयः // KAव्क्_२१.४० //
2079 SK सो ऽचिन्तयदहो मोहविहीनस्य हि मे तथा / अनुच्छेदविकारो ऽयं जातः प्रशमसंपदः // KAव्क्_२१.४१ //
2080 SK वञ्चितो ऽस्मि न यत्पूर्वं दृष्तो ऽयं भगवान् मया / नाधन्यानामियं याति मूर्तिर्लोचनगोचरम् // KAव्क्_२१.४२ //
2081 SK अमृतमधिरोदारा दृष्टिर्द्युतिः शशिपेशला तरुणकरुणायत्ता वृत्तिः प्रसादमयी मतिः / अयमतिशयं प्रत्यासन्नः करोति विरागतां विगतरजसां निःसंसारः प्रियो ऽपि परिग्रहः // KAव्क्_२१.४३ //
2082 SK इति चित्तप्रसादेन चिन्तयन्नुपसृत्य सः / विदधे तस्य सानन्दः पादपद्माभिवन्दनम् // KAव्क्_२१.४४ //
2083 SK भगवानपि तत्प्राप्तिप्रसादानन्दलक्षणम् / उवाह वदनच्छायं पूर्णकारुण्यपूरितम् // KAव्क्_२१.४५ //
2084 SK दृष्टिमाश्वासजननीं कामंकामपि तस्य सः / विससर्जोज्ज्वलां जन्मरजःशुद्ध्यै सुधानदीम् // KAव्क्_२१.४६ //
2085 SK अथास्य भगवान् भ्रद्रां विदधे धर्मदेशनाम् / चतुर्णामार्यसत्यानां प्रतिभावविधायिनीम् // KAव्क्_२१.४७ //
2086 SK स शासनाद्धि संव्यस्तसमस्तक्लेशसंततिः / निजं जन्म निवेद्यास्मै प्रणतस्तमभाषतः // KAव्क्_२१.४८ //
2087 SK अतिक्रान्तो ऽस्मि भगवन् भवन्तं शरणं गतः / विपन्नवासनाभ्यासः संसारे न रमे परम् // KAव्क्_२१.४९ //
2088 SK करोत्यकुशलं दूरे शुभमाशु प्रयच्छति / सूचयत्युचिताचारं महतमवलोकनम् // KAव्क्_२१.५० //
2089 SK सुखार्हं त्वद्विहाराय विहारं परमादरात् / रत्नसारपुरोदारं स्वपुरं कारयाम्यहम् // KAव्क्_२१.५१ //
2090 SK करोतु तत्र भगवान् सततं स्थित्यनुग्रहम् / धनैरासेवितो ऽस्माभिः सपर्यापरिचर्यया // KAव्क्_२१.५२ //
2091 SK इत्यर्थनां तथेत्यस्य भगवान् प्रत्यपद्यत / प्रणयुप्रार्थनाभङ्गप्रगल्भा न हि साधवः // KAव्क्_२१.५३ //
2092 SK भगवन्तमथामन्त्र्य श्रावस्तीं स पुरीं ययौ / तदादिष्टेन सहितः शारिपुत्रेण भिक्षुणा // KAव्क्_२१.५४ //
2093 SK तत्र जेतकुमारेण हिरण्यार्घोण भूयसा / दत्तं काञ्चनमादाय विहारं तमसूत्रयत् // KAव्क्_२१.५५ //
2094 SK भक्त्युत्साहादथारम्भकृतसाहाय्यकह् सुरैः / विहारं त्रिदिवाकारं चकारानाथपिण्डदः // KAव्क्_२१.५६ //
2095 SK तत्र जेतकुमारो ऽपि भक्त्या भगवतः परम् / यशःपुण्यप्रतिष्ठायै विदधे द्वारकोष्ठकम् // KAव्क्_२१.५७ //
2096 SK अथ् अतीर्थ्यास्तमालोक्य विहारारम्भमद्भुतम् / सापवादविवादेन चक्रुर्द्वेषाकुलाः कलिम् // KAव्क्_२१.५८ //
2097 SK रक्ताक्षप्रमुखस्तेषाम् मात्सर्यात्क्षुद्रप्रण्डितः / सपक्ष इव कृष्णाहिश्चकितः पुरतः सदा // KAव्क्_२१.५९ //
2098 SK रुद्धे विहारसंभारे तेन वादजयावधि / अनाथपिण्डदगिरा शारिपुत्रः समाययौ // KAव्क्_२१.६० //
2099 SK रक्ताक्षो ऽथ तमाहूय प्रभावोत्कर्षदर्शने / इन्द्रजालबलोत्फुल्लं सहकारमदर्शयत् // KAव्क्_२१.६१ //
2100 SK शारिपुत्रप्रभावोत्थैर्विपुलैस्तन्मुखानिलैः / उन्मूलितः शकलतां तीर्थ्योत्साह इवाप सः // KAव्क्_२१.६२ //
2101 SK रक्ताक्षविहितां फुल्लकमलां पद्मिनीं ततः / पङ्कशेषां द्विपश्चक्रे शारिपुत्रविनिर्मितः // KAव्क्_२१.६३ //
2102 SK रत्काक्षवक्षोनिक्षिप्तः सप्तशीर्षमहोरगः / शारिपुत्रेण निक्षिप्तस्तार्क्ष्यपक्षाग्रमारुतैः // KAव्क्_२१.६४ //
2103 SK तदाहूतो ऽथ वेतालः शारिपुत्रेण कीलितः / प्रेरितो मन्त्रविर्त्येण रक्ताक्षं हन्तुमुद्ययौ // KAव्क्_२१.६५ //
2104 SK वेतालाभिहतस्त्रासान्नश्यन्मानमदज्वरः / शरणं पादपतितः शारिपुत्रं जगाम सः // KAव्क्_२१.६६ //
2105 SK रक्ताक्षस्तेन भङ्गेन शरण्यं शरणं गतः / प्रव्रज्यायाम् वीतरागः शुद्धां बोधिस्मवाप्तवान् // KAव्क्_२१.६७ //
2106 SK तीर्थ्यास्त्वन्ये परिद्वेषक्रोधपारमितांशवः / तत्र कर्मकरव्याजात्तस्थुर्भिक्षवधोद्यताः // KAव्क्_२१.६८ //
2107 SK ते ऽथ धर्मद्रुहः काले शारिपुत्रेण लक्षिताः / तद्दृष्टिपातमात्रेण बभूवुर्मैत्रमानसाः // KAव्क्_२१.६९ //
2108 SK आशयानुशयं धातुं प्रकृतिं च विचार्य सः / धर्मदेशनया तेषां दिदेशानुत्तरां दशाम् // KAव्क्_२१.७० //
2109 SK अथ तस्य विहारस्य निर्विघ्नारम्भकर्मणि / अनाथपिण्डदं प्राह शारिपुत्रः स्मिताननः // KAव्क्_२१.७१ //
2110 SK विहारसूत्रपातस्य तुल्य एव क्षणे महान् / हौमो विहारः संवृत्तस्तुषिते देवसद्मनि // KAव्क्_२१.७२ //
2111 SK एतदाकर्ण्य संजातप्रसादद्विगुणान्तरः / हेमरत्नवरागारं विहारं समकारयत् // KAव्क्_२१.७३ //
2112 SK विभवैरथ राजार्हैः पथि तेनोपकल्पितैः / विज्ञप्तिस्त्रिदिवैः सार्धमाययौ भगवान् जिनह् // KAव्क्_२१.७४ //
2113 SK तदागमनहर्षेण प्रसन्ने भवनत्रये / अनाथपिण्डदस्तस्मै वारिधारामपातयत् // KAव्क्_२१.७५ //
2114 SK तस्मिन् यदा न प्रदेशे वारिधारा पपात सा / तदा भगवतो वाक्यात् त्वरितं पतितान्यतः // KAव्क्_२१.७६ //
2115 SK तं दृष्ट्वा कौतुकात् पृष्टो भिक्षुभिर्भगवान् पुनः / उवाच श्रूयतामेतद् वारिस्तम्भस्य कारणम् // KAव्क्_२१.७७ //
2116 SK अनेन पूर्वबुद्धेभ्ये अस्मिन्नेवेदमास्पदम् / प्रतिपादितमित्येषा वारिधारान्यतश्च्युता // KAव्क्_२१.७८ //
2117 SK अनेनैव पुरा सम्यक्संबुद्धाय विपश्यिने / अयमेव वरारामप्रदेशः प्रतिपादितः // KAव्क्_२१.७९ //
2118 SK बुद्धाय शिखिने प्रादात् पुष्यजन्मन्ययं पुनः / ततो ददौ विश्वभुवे जिनाय रघिजन्मनि // KAव्क्_२१.८० //
2119 SK भवदत्ताभिधो भूत्वा ककुच्छन्दाय दत्तवान् / ददौ बृहस्पतिर्भूट्वा कनकाख्याय तायिने // KAव्क्_२१.८१ //
2120 SK काश्यपाय पुनश्चायं प्रादादाषाढजन्मनिः / अनेनैवाधुना मह्यं देशो ऽयं प्रतिपादितः // KAव्क्_२१.८२ //
2121 SK कालेन सुधनाख्यो ऽयं मैत्रेयाय प्रदास्यति / सत्त्ववान् क्षान्तिशीलत्वान्निधानान्येष पश्यति // KAव्क्_२१.८३ //
2122 SK पुनश्चायं गॄहपतिर्भूत्वा हेमप्रदाभिधः / चक्रे प्रत्येकबुद्धस्य संस्कारं परिनिर्वृतौ // KAव्क्_२१.८४ //
2123 SK रत्नकुम्भे तदस्थीनि धृत्वा तत्प्रणिधानतः / अधुना रत्नकोशार्हः संजातो ऽयं सुवर्णभास् // KAव्क्_२१.८५ //
2124 SK श्रुत्वेति शास्तुर्वचनाभिधानं ते भिक्षवः सारमिवामृतस्य / कर्तुः प्रतिष्ठार्जितपूर्णपुण्यपुष्पाधिवासेन भृशं ननन्दुः // KAव्क्_२१.८६ //
2125 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां जेतवनप्रतिग्रहावदानं नाम एकविंशं पल्लवः //
2126 SK २२. पितापुत्रसमादानम् /
2127 SK अहो महार्हं मणिवन्महत्त्वं भव्या भजन्ते गुणगौरवेण / विना गुणं यद्वपुषाम् गुरुत्वं स्थूलोपलानामिव निष्फलं तत् // KAव्क्_२२.१ //
2128 SK श्रीमान् पुरा शाक्यपुरे नरेन्द्रः शुद्धोदनः शुद्धिसुधानिधानम् / वैराग्ययोगात्सुगतत्वमाप्तं स्मृत्वा सुतं सुत्सुकतामवापं // KAव्क्_२२.२ //
2129 SK सो ऽचिन्तयत्पुण्यगुणाधिवासं सरस्वतीवाससरोरुहश्रि / मनः प्रसादस्य विलाससौधं द्रक्षामि सूनोर्वदनं कदाहम् // KAव्क्_२२.३ //
2130 SK एहीति तद्दर्शनलालसेन ये ये मया जेतवनं विसृष्टाः / ते ते तदालोकननिर्निमेषं तत्रैव तिष्ठन्त्यमृतं पिबन्तः // KAव्क्_२२.४ //
2131 SK संप्रेषितस्तस्य मया स नाययौ यो ऽप्यात्मतुल्यं प्रणयादुदायी / स लेखहस्तस्त्रिदिवाभिरामे तत्रैव लेखत्वमिराभियातः // KAव्क्_२२.५ //
2132 SK संदेशवाक्यं प्रहितं मया यत् तद्विस्मृतं तस्य मुखेन नूनम् / सर्वो हि नाम स्वहिताभिलाषी धत्ते परार्थे किल शीतलत्वम् // KAव्क्_२२.६ //
2133 SK विलोकनेनैत्य निषिञ्च तूर्णं पीयूषपूरेण ममाङ्गसङ्गम् / निःसङ्गतो विश्रमतां मुहूर्तं दयाविधेयः कुरु बन्धुकार्यम् // KAव्क्_२२.७ //
2134 SK इत्येतदाकर्ण्य कथाम् स कुर्यात् क्षणं विलम्बं मम दर्शने ऽपि / तच्चेतसः पल्लवपेशलस्य न हि स्वभावः प्रणयावभङ्गः // KAव्क्_२२.८ //
2135 SK मनोरथेनेति पुरः प्रयाते तद्दर्शनायेव धराधिनाथे / प्रव्रज्या व्यञ्जिततत्प्रसादः समाययौ हर्षरसादुदायी // KAव्क्_२२.९ //
2136 SK दृष्ट्वा तमानन्दविपूर्णमानसं प्रव्रज्यया तत्सदृशानुभावम् / उत्कण्ठितः कुण्ठितधैर्यवृत्तिः संमोहमूर्च्छां नृपतिः प्रपेदे // KAव्क्_२२.१० //
2137 SK स लब्धसंज्ञः शिशिरैः पयोभिः पप्रच्छ तं किं नु समेष्यतीति / सो ऽप्यब्रवीद्देव दिनैर्भवन्तमसंभृतैः सादरमेष्यतीति // KAव्क्_२२.११ //
2138 SK ततः प्रयातेषु दिनेषु केषु व्योम्ना शनैर्भिक्षुगणानुयातः / सहाययौ नाकसदाम् निकायैः सर्वार्थसिद्धैर्भगवान् कुमारः // KAव्क्_२२.१२ //
2139 SK द्युसुन्दरीपाणिसरोजमुक्तमन्दारमालाकलितश्चकाशे / स्वर्गीयगङ्गास्फुटफेनकूटविलासहासाङ्ग इवामराद्रिः // KAव्क्_२२.१३ //
2140 SK संघट्टभिन्नाभ्रसखैः स्खलिद्भिः सशब्दजाम्बूनदकिङ्किणीकैः / बभुर्विमानैः ककुभां मुखानि भक्त्येव शास्तुर्विहितस्तवानि // KAव्क्_२२.१४ //
2141 SK निरन्तरैरन्तरिवार्कतारैः सुरैः सविद्याधरसिद्धसंघैः / पर्याप्तसंसक्तसितातपत्रैर्व्याप्तः समाप्तिं गगनं जगाम // KAव्क्_२२.१५ //
2142 SK तं सर्वलोकोपकृतिप्रपन्नं सर्वाकृतिं सर्वमयावभासम् / समापतन्तं नभसो ऽथ दिग्भ्यः क्षितेश्च सर्वे ददृशुः क्षणेन // KAव्क्_२२.१६ //
2143 SK प्रहर्षराशिं जनलोचनानां पुण्यप्रमाणं सुकृतोत्सवानाम् / लोकस्तमालोकनिधिं विलोक्य समुल्ललन्नुच्छलिताद्भुतोर्मिः // KAव्क्_२२.१७ //
2144 SK आश्चर्यभूतं रुचिरप्रभावमुदायिना सूचितमाकलय्य / जगद्गुरुं भूमिपतिः कुमारं कृताञ्जलिस्तं प्रणनाम दूरात् // KAव्क्_२२.१८ //
2145 SK अथावतीर्यार्यजनानुयातः संपूज्यमानः प्रणयेन राज्ञा / स्फीटप्रभाभासितदिग्विभागां न्यग्रोधिनीं रत्नभुवम् विवेश // KAव्क्_२२.१९ //
2146 SK हेमासनं शासनसंनिविष्टलोकत्रयः संगतपादपीठम् / स तत्र रत्नाङ्कुरचित्रपत्रं भास्वद्वपुर्मेरुन् // KAव्क्_२२.२० //
2147 SK तन्मानसेन्दोर्नयनामॄतौघं मनोरथप्रार्थनयोपयातम् / विलोकयन्निर्वृतिनिर्निमेषः क्षणं क्षितीशस्त्रिदशत्वमाप // KAव्क्_२२.२१ //
2148 SK स तं जगादाश्रुनिरुद्धकण्ठः सोत्कर्षहर्षाकुलितं कुमारम् / हाराग्ररत्नप्रतिबिम्बसक्तं प्रवेशयन् प्रीतिरसादिवान्तः // KAव्क्_२२.२२ //
2149 SK संतोषशीताचलवत् स्वभावात् सर्वे रमन्ते कुशलस्थलीषु / कृतस्त्वयास्माकमयं तु कस्मात् सत्सूपकारी विरहोपदेशः // KAव्क्_२२.२३ //
2150 SK स्नेहात्प्रमोदाद्गुणगौरवाच्च धीर्धावतीयं त्वयि मे प्रसह्य / आलिङ्गनाय स्थिरसंगमाय पादप्रणामाय च तुल्यमेव // KAव्क्_२२.२४ //
2151 SK यद्वस्तु किंचिद्गदितं मया तत् श्रोतव्यमेव प्रणयोपरोधात् / गुणोज्झितं वा विरसक्रमं वा न स्नेहमोहस्य भवत्यवाच्यम् // KAव्क्_२२.२५ //
2152 SK प्रत्यर्णरत्नप्रतिबिम्बितार्कप्रौढप्रभाप्रावरणान्यमूनि / त्वं हेमहर्म्याणि विहाय कस्मात् विगाहसे शून्यवनान्तराणि // KAव्क्_२२.२६ //
2153 SK कान्ताकरावर्जितहेमकुम्भसत्सौरभाम्भःप्रवराभिषिक्तः / एकः कथं स्नासि विकासिपांशुसंतप्ततोयासु मरुस्थलीषु // KAव्क्_२२.२७ //
2154 SK गण्डस्थलात् कुण्डलरत्नकान्ति किं लम्बितं मण्डनमेव वेत्सि / कस्मादकस्मात्तव निःसुखस्य न चन्दनं नन्दनमिन्दुशुभ्रम् // KAव्क्_२२.२८ //
2155 SK महाविताने शयने नृपार्हे शेषे न किं शेषविशेषशुभ्रे / लक्ष्मीनवालिङ्गनभोगयोग्या कथं तनुस्ते सहते कुशय्याम् // KAव्क्_२२.२९ //
2156 SK कान्तास्मितोर्मिप्रतिमांशुकार्हं किं चीवरस्योचितमेतदङ्गम् / पाणौ च लीलाकमलास्पदे ऽस्मिन् पात्रं कथं ते प्रियमद्य जातम् // KAव्क्_२२.३० //
2157 SK अयं विहारस्तव कण्ठपीठः सोत्कण्ठकान्ताभुजबन्धनार्हः / संभोगलक्ष्मीक्षपितप्रमोदः करोत्यकस्मात् प्रणयावभङ्गम् // KAव्क्_२२.३१ //
2158 SK रूपं विलक्षीकृतपुष्पचापं मत्तेभकुम्भोच्चकुचा विभूतिः / रतेर्विलास्प्पवनं वयश्च केनासमस्ते कलितो विरागः // KAव्क्_२२.३२ //
2159 SK श्रत्वेति तं शीलनिधिर्बधाषे शशाङ्कलेखाललितस्मितेन / संक्रान्तनानानृपरत्नरागां कुर्वन्नलक्षामिव राजलक्ष्मीम् // KAव्क्_२२.३३ //
2160 SK राजन् जरारोगहतेव न स्यात्तरङ्गलोला यदि जीववृत्तिः / तत्कस्य न स्यादनिशं प्रहर्षपीयूषवर्षी विषयाभिलाषः // KAव्क्_२२.३४ //
2161 SK शमामृतास्वादनसुस्थिराणामपातनं शून्यवनान्तभूमेः / विभूतिलीलामदविह्वलानां हर्म्याणि पर्यन्तनिपातनानि // KAव्क्_२२.३५ //
2162 SK सकुङ्कुमैः स्नान्तिः नृपाः पयोभिः सरागतां यैः सततं प्रयान्ति / संतोषशीलस्तु मनः प्रसादशुद्धाम्बुधौता विमलीभवन्ति // KAव्क्_२२.३६ //
2163 SK श्रोत्रं श्रुतेनैवन कुण्डलेन दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन / विभाति कायः करुणाकुलानां परोपकारेण न चन्दनेन // KAव्क्_२२.३७ //
2164 SK एतानि मोहाहतवल्लभानि संसक्तमुक्तांशुसितस्मितानि / सतां न भोग्यानि भवन्ति भूभृदुच्छिष्टशिष्टानि विभूषणानि // KAव्क्_२२.३८ //
2165 SK रागातुराणां रितुपापितानां निद्रा धनध्यानवतां न नाम / शय्यासु सुस्पर्शवतीषु राज्ञा सर्वत्र शान्तः सुखमेव शेते // KAव्क्_२२.३९ //
2166 SK निर्मोककान्तेन वराम्शुकेन भुजङ्गवृत्तिर्न तु चीवरेण / पात्रं पवित्राणि समाप्लितानि पीयूषमैत्राण्यशनानि सूते // KAव्क्_२२.४० //
2167 SK छत्राणि वक्र्क्रं भृशमप्रकाशं मनिविलोलं व्यजनानिलौघाः / संसक्तजाङ्यं हृदयं नृपाणां कुर्वन्ति हारा हरिचन्दनार्द्राः // KAव्क्_२२.४१ //
2168 SK वियोगरोगानुगता विभूतिः कान्ताह् क्षणान्ता विरसो विलासः / यस्मिन्नपायः सततानुशायी स कस्य भोगः सुभगोपयोगः // KAव्क्_२२.४२ //
2169 SK जाड्यं सजृम्भं जनयत्यजस्रं तनोति तृष्णाभ्रममोहमूर्च्छाः करोत्यसह्यं सरसत्वमेव भोगोपभोगः प्रसभप्रयोगः // KAव्क्_२२.४३ //
2170 SK यदा सुखश्रीर्नवचन्द्रलेखा प्रभातपुष्पाण्यपि यैवनाणि / कर्मोर्मिमालाग्रहणं शरीतं तदा ममायं गमितो ऽनुरागः // KAव्क्_२२.४४ //
2171 SK सचामराह् सध्वजपुञ्जपट्टाः सवाजिवाला द्विपकर्णतालाः / स्वभावलोलाः किल राजलक्ष्म्यः सर्वे विलासाह् क्षणभङ्गसङ्गाः // KAव्क्_२२.४५ //
2172 SK उक्त्वेति तत्तत्कुशलाय राज्ञश्चित्तप्रसादं परमं विधाय / स शान्तिकल्लोलसुधाप्रवाहं किरन् दृशा पार्षदमालुलोके // KAव्क्_२२.४६ //
2173 SK मनीषिणां शाक्यकुलोद्गतानां सप्तायुतानि प्रतिपाद्य धर्मम् / चक्रे सहस्राणि च सप्त तत्र संप्राप्तपर्याप्तविशेषभाञ्जि // KAव्क्_२२.४७ //
2174 SK शक्लोदनाद्यैः कुशलोपपन्नैः गणे ऽथ तत्तुल्यसहस्रसंख्यैः / द्रोणोदनाद्यैरमृत्प्दनाद्यैश्चित्तप्रसादः सुमहानवाप्तः // KAव्क्_२२.४८ //
2175 SK केचिद्ययुः श्रावकबोधियुक्तप्रत्येकबोधौ निरताश्च केचित् / सम्यक् तथानुत्तरबोधिसक्ताः परे बभूवुर्गगनप्रसन्नाः // KAव्क्_२२.४९ //
2176 SK स्रोतः परिप्राप्तफलं ततो ऽन्ये सकृत्तथागामिफलं तथान्ये / अन्ये ऽप्यनागांइफलं तदापुरर्हत्फलं क्लेशविमुक्तिमन्ये // KAव्क्_२२.५० //
2177 SK एकस्तु तत्रार्जितपापशापस्तमःसमूहोपहितप्रमोहः / मायेयमित्याह हसन् जनानां सत्यस्थितिं संसदि देवदत्तः // KAव्क्_२२.५१ //
2178 SK नृपं तु वात्सल्यनिलीनमेव पुत्रोदयात्प्रत्युपजातदर्पम् / मौद्गल्यभिक्षुर्जिनशासनेन महर्द्धिभिर्वीतमदं चकारम् // KAव्क्_२२.५२ //
2179 SK दृष्ट्वापि राजा भगवत्प्रभावं नात्यद्भुतम् पौरुषमेव मेने / अभ्यासलीनानि जनस्य नूनं सोत्कर्षकृत्यानि न विस्मयाय // KAव्क्_२२.५३ //
2180 SK अथापरेद्युर्भगवान् सुरेन्द्रसंपादिते हेममहाविमाने / सुमेरुशीर्र्ष्णीव समानकान्तौ सिंहासने रत्नमये न्यषीदत् // KAव्क्_२२.५४ //
2181 SK ब्रह्मेन्द्रमुख्येषु ततः सुरेषु तत्रोपविष्टेषु पृथुप्रभेषु / बभुस्तदुष्णीषशिखाविलासैश्चन्द्रांशुमालाजटीला इवाशाः // KAव्क्_२२.५५ //
2182 SK अन्योन्यसंघट्टविलोलहारैर्धनावहारैस्त्रिदशैर्विशद्भिः / निरन्तराम् ताम् भवमेत्य राजा द्वारेषु मार्गान्न चतुर्षु लेभे // KAव्क्_२२.५६ //
2183 SK सभ्रूभ्रमैस्तत्र कुवेरमुख्यैर्निवार्यमाणाभिमतप्रवेशह् / विच्छायवक्रः स्खलिताभिधायी भूभृत्परं निष्प्रतिभो बभूव // KAव्क्_२२.५७ //
2184 SK प्रवेशितस्तैर्जिनशासनेन कदाचिदासाद्य तदग्रभूमिम् / शुद्धोदनस्त् अप्रणिपत्य मूर्ध्ना चित्तप्रसादेन पुरो ऽस्य तस्थौ // KAव्क्_२२.५८ //
2185 SK शास्ता तु तस्मै चतुरार्यसत्यप्रबोधिकां धर्मकथाम् दिदेश / ज्ञानेन या विंशतिशृङ्गमस्य सत्कायदृग्भूधरमप्यब्ःआङ्क्षीत् // KAव्क्_२२.५९ //
2186 SK ततः स गत्वा कृतकृत्यजन्मा शुक्लोदनं प्राप्त भजस्व राज्यम् / स्वस्याव्रतीत्तं भगवत्प्रदिष्टं तच्छासनं मोदयितुं न राज्यम् // KAव्क्_२२.६० //
2187 SK द्रोणोदने राज्यपराङ्भुखे ऽपि वैराग्ययोगादमृतोदने च / जग्राह शुद्धोदनसंप्रदिष्टां तां राजलक्ष्मीमथ भद्रकाख्यः // KAव्क्_२२.६१ //
2188 SK राजार्हभोगैरथ पूजयित्वा जिनः जनेशः शुचिसंप्रणितैः / न्यग्रोधधाम प्रतिपाद्य चास्मै शुद्धोदनं शुद्धमनोरथो ऽभूत् // KAव्क्_२२.६२ //
2189 SK द्रोणोदनस्यापि सुतौ युवानौ राजाज्ञया प्रेरणया च मातुः / एकस्तु यः प्रव्रजितो ऽनिरुद्धः परो महान्नाम गृही बभूव // KAव्क्_२२.६३ //
2190 SK अथाभवच्चेतसि भद्रक्स्य राज्ञो विरक्तस्य वनाभिलाषः / विवेकभाजां प्रशमप्रवृत्तं नवापि लक्ष्मीर्न मनो रुणद्धि // KAव्क्_२२.६४ //
2191 SK ततः समाहूय स देवदत्तं राज्याभिषेकप्रतिपन्नचित्तम् / उवाच मे प्रव्रजनस्य कालः समागतः किं भवताभिधेयम् // KAव्क्_२२.६५ //
2192 SK तं प्रत्युवाचात्तविवेकदम्भः सुसंवृतं संसदि देवदत्तः / राजन्न राज्ये ऽस्ति ममाभिलाषः प्रव्रज्यया त्वत्सदृशो भवामि // KAव्क्_२२.६६ //
2193 SK श्रुत्वेति राजा कुटिलस्य तस्य मिथ्याविनीतस्य कदर्थवाक्यम् / उदीरितं शाक्यगणस्तवायं संकल्पसाक्षीति हसन्नुवाच // KAव्क्_२२.६७ //
2194 SK अथार्थतापोपहतः प्रदध्यौ भोगानुरागादिति देवदत्तः / मया किमेतदविपातमुक्तं भजेत वा प्रव्रजितो ऽपि राज्यम् // KAव्क्_२२.६८ //
2195 SK राज्यं समुत्सृज्य निजं व्रजन्तः शाक्यं कुमाराः सह भद्रकाद्याः / शुद्धोदनं निर्ययुरायवृत्तप्रीतिं पुरस्कृत्य रथैर्द्विपैश्च // KAव्क्_२२.६९ //
2196 SK व्रजत्सु सर्वेष्वथ देवदत्तः किरीटसक्तं पृथिपद्मरागम् / जहार रक्ताक्तमिवामिषार्थी श्येनः प्रभापल्लविताम्बरार्कम् // KAव्क्_२२.७० //
2197 SK नैमित्तिकैरुक्तमथास्य लक्ष्मदृष्ट्वा तदुग्रं नरकप्रयाणम् / चित्तं सदोषं किल दुर्निमित्तं निमित्तमन्यत् पुनरुक्तमेव // KAव्क्_२२.७१ //
2198 SK कोकालिखण्डोत्कटमोरकाणां तिथ्यादिनाम्नाम् मददुर्मदानां / संसूचितान्यत्यधिकानि तत्र तथाविधानैर्बहुलक्षणानि // KAव्क्_२२.७२ //
2199 SK भूपप्रमोदादथ भद्रको ऽपि तैर्देवदतप्रमुखैः सहैव / प्रव्रज्यया चीवरपात्रयोगात् चकार वैराग्यमयीमिव क्ष्माम् // KAव्क्_२२.७३ //
2200 SK राज्ञस्तथा राजकुमारकाणामुत्सृष्टहाराङ्गदकुण्डलानाम् / सास्रो विरागादवतार्य तेषां केशानुपाली किल कल्पको ऽभूत् // KAव्क्_२२.७४ //
2201 SK मूर्खः स नीचो ऽपि जिनाज्ञयैव प्रव्रज्यया पूज्यतरो बभूव / चित्तप्रसादस्य परस्य मन्ये न कारणं पण्डितता नजातिः // KAव्क्_२२.७५ //
2202 SK सामीचिकायामथ भद्रको ऽपि ज्ञात्वा नृपः पार्षदिकं तमेनम् / नीचस्य पादौ कथमस्य वन्दे महीपति सन्निति निश्चलो ऽभूत् // KAव्क्_२२.७६ //
2203 SK तमब्रवीदस्खलिताभिमानं विकल्पभिन्नं भगवान् विहस्य / प्रव्रज्यया मोहमहानुवन्धी संत्यज्यते जातिमयो ऽभिमानः // KAव्क्_२२.७७ //
2204 SK श्रुत्वेति राज्ञा सह राजपुत्रैः कृते प्रणामे पृथिवी चकम्पे / न देवदत्तः परुषाभिधायी पदौ ववन्दे भगवद्गिरास्य // KAव्क्_२२.७८ //
2205 SK कम्पात् क्षितेर्विस्मितमानसेन पृष्टस्ततो भिक्षुगणेन शास्ता / उवच राजा किल कल्पस्य जन्मान्तरे ऽप्यस्य कृतः प्रणामः // KAव्क्_२२.७९ //
2206 SK पुरा युवा काशिपुरे विलोक्य भद्राभिधानाम् गणीकां दरिद्रः / सेवाम् व्यघात् सुन्दरकस्तदास्यै रागो हि सर्वव्य्सनोपदेष्टा // KAव्क्_२२.८० //
2207 SK तया विसृष्टः कुसुमोच्चयाय पुनह्पुनर्भृङ्ग इवाधिकार्थी / तत्सङ्गमानङ्गमनोरथेन श्रान्तः स बभ्राम वनान्तरेषु // KAव्क्_२२.८१ //
2208 SK अत्रान्तर श्रान्ततरः क्षितीशः प्राप्तो वनान्तं मॄगयारसेन / तं ब्रह्मदत्तः प्रसमीक्ष्य गीतं तस्याशृणोच्छन्नतनुर्लताभिः // KAव्क्_२२.८२ //
2209 SK नवनवकुसुमाशया किमेवं मधुकरं तापहतो ऽसि गच्छ तूर्णम् / विकसितकमलाननाब्जिनी सा भवति हि संकुचिता दिनावसाने // KAव्क्_२२.८३ //
2210 SK तस्या हि गीतं नॄपतिर्निशम्य स्मितप्रभाघट्टितहारकान्तिः / उवाच तं तीव्रकरार्कतापः को ऽयं सखे गीतरसाभिओयोगह् // KAव्क्_२२.८४ //
2211 SK सो ऽप्यब्रवीद्भूमिपते न नाम तप्तो रविस्तप्ततरस्तु कामः / स्वकर्मदुःखानि विहन्ति लोके न ग्रीष्मदग्धानि मरुस्थलानि // KAव्क्_२२.८५ //
2212 SK इत्यर्थवद्वाक्यगुणार्पणेन स भूपतेर्वल्लभतामवाप / संवादसंस्पर्शसुभाषितं हि केषाम् च् असत्कारपदं न याति // KAव्क्_२२.८६ //
2213 SK तेनाथ राजा विजने श्रमातुरः शीतोपचारैरपनीततापः / प्रीत्या तमादाय ततः सहैव स्वराजधानीमगमत् कृतज्ञह् // KAव्क्_२२.८७ //
2214 SK तत्रास्य जीवप्रद इत्युदन्तसंतोष संपूरितचित्तवृत्तिः / राज्यार्धदानाभिमुखः स तस्थौ चित्तानुवृत्तस्य किमस्य देयम् // KAव्क्_२२.८८ //
2215 SK राज्यार्धदानप्रसृते ऽथ तस्मिन् नाचिन्तयत् सुन्दरकः कृपायाम् भद्रां विना राज्यसुखेन किं मे धन्यो हि तत्प्रीतिसुधाभिषिक्तः // KAव्क्_२२.८९ //
2216 SK मह्मं न राज्याद्यपि रोचते ऽर्धमखण्डिताल्पापि हि शोभते श्रीः / एकार्थयोगे हि सदा विवादः द्वयोर्हि भोगैः कलिरेव मूर्तः // KAव्क्_२२.९० //
2217 SK तस्मान्नृपं कुण्ठमहं निपात्य समस्तराज्येन भवामि पूर्णः / क्षणं विचिन्त्येत्यनुतापतप्तः तीव्रं मनः स्वस्य पुनः प्रदध्यौ // KAव्क्_२२.९१ //
2218 SK किं चिन्तितं निन्द्यपरं मयैतत् को ऽयं प्रकारः खलु तीक्ष्णतायाः / कृतघ्नसंकल्पकलङ्कलेपादहो नु लज्जा निजचेतसो ऽपि // KAव्क्_२२.९२ //
2219 SK स्वस्त्यस्तु राज्याय नमः सुखेभ्यः संमोहमाता क्षमतां च लक्ष्मीः / येषामनास्वादितचिन्तितानामेवंविधा धीः प्रथमः स्वभावः // KAव्क्_२२.९३ //
2220 SK भ्रमं विधत्ते विदधाति मूर्च्छां निपातयत्येव तमस्तनोति / आघ्रातमात्रैव करोति पुंसामहो विनाशं विषवल्लरी श्रीः // KAव्क्_२२.९४ //
2221 SK चिरं विचिन्त्येति स जातचित्तः प्रत्येकबोधिर्विमलः प्रभाते / अभ्यर्थमानो ऽपि नरेश्वरेण राज्यं न् अजग्राह निवृत्ततृष्णः // KAव्क्_२२.९५ //
2222 SK प्रत्येकबुद्धत्वमवाप्तमेनं कालेन दृष्ट्वा नृपतिर्महर्द्धिः / तत्पादपद्मच्युतमौलिमाल्यश्चित्तप्रसादोचितमित्यवेचत् // KAव्क्_२२.९६ //
2223 SK स को ऽपि सत्कर्मविपाकजन्मा वन्द्यो विवेकः प्रशमाभिषेकः / यस्य प्रभावाद्विरतस्पृहाणां त्याज्येव रत्नाकरमेखला भूः // KAव्क्_२२.९७ //
2224 SK श्रुत्वेति राज्ञा कथितं तदर्थजातं तदभ्यर्थनया विधाय / तत्कल्पकः शान्तिपदं प्रपेदे सेवान्तरङ्गः किल गङ्गपालः // KAव्क्_२२.९८ //
2225 SK प्राप्तं तमयुत्तमकर्मयोगात् प्रव्रज्यया सज्जनपूज्यभावम् / राजा ववन्दे प्रणतः पृथिव्याः कम्पस्तदाभूदपि षड्विकारः // KAव्क्_२२.९९ //
2226 SK सो ऽयं राजा विहितविनतिर्भद्रको ब्रह्मदत्तो पश्योपाली स किल कुशली कल्पको गङ्गपालः / इत्याश्चर्यं भगवदुदितं भिक्षवस्ते निशम्य स्वच्छं चित्तं सुकॄतशरणे मेनिरे हेतुमेव // KAव्क्_२२.१०० //
2227 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां पितापुत्रसमादानम् नाम द्वाविंशतितमः पल्लवः //
2228 SK २३. विश्वंतरावदानम् /
2229 SK चिन्तारन्तादध्करुचयः सर्वलोकेष्वनिन्द्या वन्द्यास्ते ऽन्यैः पुरुषमणयः के ऽप्यपूर्वप्रभावाः / येषां नैव प्रियमपि परं पुत्रदारादि दत्वा सत्त्वार्थानाम् भवति वदनम्लानता दैन्यदूती // KAव्क्_२३.१ //
2230 SK भगवान् भिक्षुभिः पृष्टः पुरा शाक्यपुरे जिनः / जगाद पूर्ववृत्तान्तं देवदत्तकथान्तरे // KAव्क्_२३.२ //
2231 SK पुरी बभूव विश्वाख्या विश्वासवसतिः श्रियः / विश्वोपकारसक्तस्यसुकॄतस्येव जन्मभूः // KAव्क्_२३.३ //
2232 SK संजयाख्यो ऽभवत् तस्याममित्रतिमिरांशुमान् / नेत्रानन्दसुधासूतिर्विचित्रचरितो नृपः // KAव्क्_२३.४ //
2233 SK तस्य विश्वंतरो नाम वदान्यस्तनयो ऽभवत् / अपूर्वत्यागिना येन हृतं कल्पतयोर्यशः // KAव्क्_२३.५ //
2234 SK ईर्ष्याविरहितास्तुल्यं विदग्धेन प्र्साधिताः / सत्येन भारती येन दानेन श्रीः श्रुतेन धीः // KAव्क्_२३.६ //
2235 SK अद्यापि यस्य दिक्कान्ताकर्णाभरणताम् गतम् / विभाति केतकीगर्भपलाशविशदं यशह् // KAव्क्_२३.७ //
2236 SK स कदाचिद्ददौ दिव्यरत्नालकारमर्थिने / अथं विजयसाम्राज्यमनोरथहरं त्विषा // KAव्क्_२३.८ //
2237 SK दत्ते रथवरे तस्मिन् विस्मयेनाखिलो जनः / बभूवाक्राण्तहृदयश्चिन्तया च नरेश्वरः // KAव्क्_२३.९ //
2238 SK महामात्यानथाहूय हर्षहीनो महीपतिः / उवाचोपचितोद्वेगचिन्ताक्रान्तमनोरथह् // KAव्क्_२३.१० //
2239 SK दत्तो रथः कुमारेण स जैत्रः शत्रुमर्दनः / यत्प्रभावार्जिता सेयं महारथवरूथिनी // KAव्क्_२३.११ //
2240 SK लक्ष्मी सुखनिषण्णा मे याता निश्चलताम् तया / रथे सौर्यपथे तस्मिन् जयकुzन्जे च कुञ्जरे // KAव्क्_२३.१२ //
2241 SK इति राजवचः श्रुत्वा तमभाषन्त मन्त्रिणः / राजन् दोषस्तवैवायं वात्सल्येन प्रमाद्यतः // KAव्क्_२३.१३ //
2242 SK धर्मः कस्य न हर्षाय दानं कस्य न संमतम् / किं तु मूलहताद्वृक्षान्निवर्तन्ते पलार्थिनः // KAव्क्_२३.१४ //
2243 SK विक्रीतः परदेशे च रथस्तेन द्विजन्मना / इत्युक्त्वा मन्त्रिणः सर्वे शल्यविद्धा इवाभवन् // KAव्क्_२३.१५ //
2244 SK अथ कालेन संप्राप्ते वसन्ते मदनोत्सवे / विपाके सुकृतस्येव हृदयानन्ददायिनि // KAव्क्_२३.१६ //
2245 SK स्वयंग्रहोपजीव्यस्य मधोर्मधुकरार्थिनः / लोकः पुष्पवनैर्यातो यशोभिरिव शुभ्रताम् // KAव्क्_२३.१७ //
2246 SK अशोकं लोकसच्छायमुपकारोद्यतं द्रुमम् / मधु विधूतं संनद्धे कलिकालं कृतं जगत् // KAव्क्_२३.१८ //
2247 SK राजपुत्रः समारुह्य कुञ्जरं राजवर्धनम् / ययौ फुल्लान् वने द्रुष्टुमर्थिकल्पतरुस्तरून् // KAव्क्_२३.१९ //
2248 SK व्रजन्तं प्रति सामन्तप्रयुक्तातं द्विजाः पथिः / बभाषिरे समभ्येत्य स्वस्तिवादपुरःसराः // KAव्क्_२३.२० //
2249 SK चिन्तामणिर्गीयसे त्वं श्लाघ्यो जगति जङ्गमः / यस्य संदर्शनेनार्थी गाढमालिङ्ग्यते श्रिया // KAव्क्_२३.२१ //
2250 SK द्वावेव विश्रुतोत्कर्षविदेषौ भद्रजन्मनि / दानार्द्रहस्तस्त्वं लोके गजश्चायं स्थिरोन्नतिः // KAव्क्_२३.२२ //
2251 SK अस्मभ्यं सुकृत्प्दार कुञ्जरो ऽयं प्रदीयताम् / त्वदन्येन वदान्येन दातुमेष न शक्यते // KAव्क्_२३.२३ //
2252 SK इत्यर्थितस्तैः सोत्साहः स तेभ्यस्तु ददौ द्विपम् / सजीवमिव साम्राज्यं सशङ्खध्वजचामरम् // KAव्क्_२३.२४ //
2253 SK दत्वा बोधिप्रधानेन प्रणिधानेन शुद्धधीः / रथरत्नं द्विपेन्द्रं च सो ऽभूदानन्दनिर्भरः // KAव्क्_२३.२५ //
2254 SK श्रुत्वैव नृपतिर्दत्तं विश्रुतं जयकुzन्जरम् / रक्षाप्रकाररहितां राजलक्ष्मीममन्यत // KAव्क्_२३.२६ //
2255 SK स राज्यभ्रंशभीतेन कुपितेन महीभुजा / निष्कासितः कुमारो ऽथ प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् // KAव्क्_२३.२७ //
2256 SK माद्रीदयितया सार्धं जालिनं नाम दारकम् / कृष्णाभिधां तथा कन्यामादाय स ययौ वनम् // KAव्क्_२३.२८ //
2257 SK वने ऽपि शेष ं स ददौ वाहनादिकमर्थिने / समं हि महतां सत्त्वं संपत्सु च विपत्सु च // KAव्क्_२३.२९ //
2258 SK माद्य्रां कदाचिद्यातायां पुष्पमूलफलाप्तये / ब्राह्मणःकश्चिदभ्येत्य राजपुत्रमभाषत // KAव्क्_२३.३० //
2259 SK परिचारकाहीनाय चतुरौ बालकाविमौ / देहि मह्यं महासत्त्वं सर्वदो ह्यसि विश्रुतः // KAव्क्_२३.३१ //
2260 SK श्रुत्वैतदविचार्यैव दारकौ दयितौ परम् / दत्वा स तस्मै सहसा सेहे तद्विरहव्यथाम् // KAव्क्_२३.३२ //
2261 SK धनपुत्रकलत्रादि लोके कस्य नवल्लभम् / दानादन्यद्वदान्यानां न दयावताम् // KAव्क्_२३.३३ //
2262 SK अथ माद्री समभ्येत्य बालकौ बालवत्सला / अपश्यन्ती पुरः पत्युः पतितापन्नमूर्च्छिता // KAव्क्_२३.३४ //
2263 SK सा लब्धसंज्ञा दीप्तेन व्याप्ता शोककृशानुना / शिशुप्रदानवृत्तान्तं श्रुत्वैवाभूत्पलापिनी // KAव्क्_२३.३५ //
2264 SK तस्याश्चेतसि दुःखाग्निरपत्यस्नेहदुःसहः / प्रियप्रेमानुसृत्यैव प्रययौ पुटपाकताम् // KAव्क्_२३.३६ //
2265 SK अत्राण्तरे समभ्येत्य विप्ररूपः सुरेश्वरः / भृत्यार्थी दयिताम् पत्नीं राजपुत्रमयाचत // KAव्क्_२३.३७ //
2266 SK याचितस्तेन सहसा शुचं जायावियोगजाम् / धिया संस्तभ्य सत्त्वाब्धिः स तस्मै विततार ताम् // KAव्क्_२३.३८ //
2267 SK सद्यः प्रदानतरलां संत्रस्तां हरिणीमिव / सो ऽवदद्दयितामन्तः कलयन् बोधिवासनाम् // KAव्क्_२३.३९ //
2268 SK समाश्वासिहि कल्याणि न शोकं कर्तुकर्हसि / स्वप्नप्रणयकल्पो ऽयमसत्यः प्रियसंगमः // KAव्क्_२३.४० //
2269 SK शुश्रूषया द्विजस्यास्य धर्मे ते रमताम् मतिः / विलोललोकयात्रायां धर्मः स्थिरसुहृत् सताम् // KAव्क्_२३.४१ //
2270 SK दृष्ट्वा सर्वे स्वजनसुजना बान्धवाश्चानुभूताः न्यस्ता कण्ठे क्षणपरिमलम्लायिनी मित्राला / दारे पुत्रे क्षपितमनिशं यौवनं जीवितं च प्राप्तो नाप्तश्तिरपरिचयः को ऽपि धर्मादृते ऽन्यः // KAव्क्_२३.४२ //
2271 SK इत्युक्त्वा वल्लभां लोभपरित्यागादुवाह सः / द्युतिं वदनपद्मेन धैर्यवृत्तिं च चेतसा // KAव्क्_२३.४३ //
2272 SK वियोगशोकविकलां माद्रीं दृष्ट्वा कृपाकुलः / निजरूपं समाधाय शचीपतिरुवाच् अताम् // KAव्क्_२३.४४ //
2273 SK विषादं मा कृथाह् पुत्रि देवो ऽहं त्रिदशेश्वरः / अर्थिभ्यस्त्वा ददात्येष तस्मादसि मयर्थिता // KAव्क्_२३.४५ //
2274 SK अधुना सैव पत्युस्त्वं न्यासीभूता मयार्पिता / तं ददात्येष नान्यस्मौ दीयते कथम् // KAव्क्_२३.४६ //
2275 SK करिष्यामि तवावश्यं दारकाभ्यां समागमम् / इत्युदीर्य सहस्राक्षः सहसाण्तरधीयतः // KAव्क्_२३.४७ //
2276 SK अथ तौ दारकौ विप्रः समादायार्थलिप्सया / विश्वामित्रपुरं गत्वा लोभाद्वोक्रेतुमुद्यतह् // KAव्क्_२३.४८ //
2277 SK विश्यामित्रः परिज्ञाय राजपुत्रस्य दारकौ / जग्राह महतार्थेन बाष्पसंरुद्धलोचनः // KAव्क्_२३.४९ //
2278 SK कालेन त्रिदिवं याते विश्वामित्रमहीपतौ / भेजे विश्वंतरो राज्यं पौरामात्यगणार्थितः // KAव्क्_२३.५० //
2279 SK राज्ये विरक्तस्य तस्य दानव्यसनिनः परम् / सत्त्वेन वर्धमानर्द्धिर्न कश्चिद् याचको ऽभवत् // KAव्क्_२३.५१ //
2280 SK तद्वित्तपूर्णविभवो ब्राह्मणः सो ऽपि जम्बुकह् / कृतघ्नः स्वप्रभावान्मे संपदित्यभ्यधाज्जनम् // KAव्क्_२३.५२ //
2281 SK विश्वंतरः स एवाहम् देवदत्तः स च द्विजः / उक्त्वेति चक्रे भगवान् भिक्षूणां दानदेशनाम् // KAव्क्_२३.५३ //
2282 SK आलम्बनं श्वभ्रशतावपाते घोरान्धकारे सुचिरप्रकाशः / आश्वासनं दुःसहदुःखकाले दानम् नराणां परलोकबन्धुः // KAव्क्_२३.५४ //
2283 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां विश्वंतरावदानम् नाम् अत्रयोविंशः पल्लवः //
2284 SK २४. अभिनिष्क्रमणावदानम् /
2285 SK हसति सकललोलालोकसर्गाय भानुः परमममृतवृष्टयै पूर्णतामेति चन्द्रः / इयति जगति पूज्यं जन्म गृह्णाति कश्चित् विपुलकुशलसेतुः सत्त्वसंतारणाय // KAव्क्_२४.१ //
2286 SK पुरा शुद्धोदनः श्रीमान् राजा शाक्यपुरे ऽभवत् / यशःशशाङ्कजनकः सुधासिन्धुरिवापरः // KAव्क्_२४.२ //
2287 SK खलासक्ता स्वभावेन लक्ष्मीर्गुणिगणार्पिता / आश्चर्यकारिणा येन कृता सत्पक्षपातिनी // KAव्क्_२४.३ //
2288 SK अद्याप्यखिलदिक्तीर्यवनासक्तैर्विवेकिभिः / यशोभिः शुचिभिर्यस्य मुनिव्रतमिवोह्यते // KAव्क्_२४.४ //
2289 SK स्यामहं शुद्धमातेति पुरा प्रणिधितः किल / विश्वकर्मसुतो मर्त्यमाजगामामलद्युतिः // KAव्क्_२४.५ //
2290 SK कीर्तिः सत्पुरुषस्येव तस्याभूद्वल्लभा परम् / महामायाभिधा देवी चन्द्रस्येव कुमुद्वती // KAव्क्_२४.६ //
2291 SK सापश्यद्दन्तिनं श्वेतं स्वप्ने कुक्षौ विहायसा / गतमारोहणं शैले प्रणतिं च महाजनात् // KAव्क्_२४.७ //
2292 SK अत्रान्तरे बोधिसत्त्वस्तुषितात् त्रिदशालयात् / गर्भं तस्याः समापेदे स्वयं लोकानुकल्पया // KAव्क्_२४.८ //
2293 SK वहन्ती बोधिसत्त्वं सा गर्भे भुवननन्दनम् / इन्दुं दुग्धाब्धिवेलेव बभूव पाण्डुरद्युतिः // KAव्क्_२४.९ //
2294 SK इक्ष्वाकुराजवंश्येन तेन गर्भस्थितेन सा / भूर्निधानवतीवाभूद् भव्यलक्षणलक्षिता // KAव्क्_२४.१० //
2295 SK बभूव दोहदस्तस्या दानपुण्यमयोदयः / अङ्कुरे ऽप्यविसंवादि सहकारस्य सौरभम् // KAव्क्_२४.११ //
2296 SK अत्घ कालेन संपूर्णं सा लुम्बिनीवने स्थिता / असूत तनयं देवी दिवाकरमिवादितिः // KAव्क्_२४.१२ //
2297 SK मातुर्गर्भमलास्पृष्टं कुक्षिं भित्त्वा स निर्गतः / तां चक्रे ऽथ स्वभावेन स्वस्थाङ्गी विगतव्यथाम् // KAव्क्_२४.१३ //
2298 SK निर्गच्छन्नेव रुद्धो ऽसौ बलजिज्ञासया क्षणम् / शक्रेण वज्रसाराङ्गस्तस्याशक्यत्वमाययौ // KAव्क्_२४.१४ //
2299 SK जातमातः शुइशुर्गत्वा स्वयं सप्त पदानि सः / दिशो विलोकयन्नूचे सुव्यक्ताक्षरया गिरा // KAव्क्_२४.१५ //
2300 SK इयं निर्वृतिः पूर्वा च गतिर्लोकेषु दक्षिणा / पश्चिमा जातिरप्येषा संसारादियमुत्तरा // KAव्क्_२४.१६ //
2301 SK इति तस्य ब्रुवाणस्य पृथिवी समकम्पत / तमक्षयबलं धर्तुमशक्तेव जगद्गुरुम् // KAव्क्_२४.१७ //
2302 SK छत्रं तस्य यशः शुभ्रं सत्त्वस्मेरं सचामरम् / व्योमाम्बुधाराधौतस्य जगृहुस्तस्य देवता // KAव्क्_२४.१८ //
2303 SK अस्मिन्नवसरे पृष्टः स् वस्त्रीयेणासिताभिधः / नारदेन प्रभां दृष्ट्वा किष्किन्धाद्रिस्थितो मुनिः // KAव्क्_२४.१९ //
2304 SK कस्मादर्कशतालोक इवालोकः प्रदृश्यते / तमोदरिद्रां येनेति गिरयः सगुहागृहाः // KAव्क्_२४.२० //
2305 SK विस्मयादिति तेनोक्तः सो ऽवदद्दिव्यलोचनः / जातः पुण्यप्रभासो ऽयं बोधिसत्त्वस्य जन्मनि // KAव्क्_२४.२१ //
2306 SK अचिरेणैव तं वत्स द्रक्षावः कुशलाप्तये / इत्युक्त्वा मुनिरानन्दाद् विश्रान्तिसुखितो ऽभवत् // KAव्क्_२४.२२ //
2307 SK पुत्रजन्मनि सर्वार्थसिद्धिं शुद्धोदनः परम् / दृष्ट्वा सर्वार्थसिद्धो ऽयमिति नामास्य निर्ममे // KAव्क्_२४.२३ //
2308 SK शाक्यवर्धननामाभूद् यक्षः शाक्यपुराश्रयः / यत्प्रणामेण शाक्यानां शिशवो निरुपद्रवाः // KAव्क्_२४.२४ //
2309 SK तत्स्थित्या प्रेषितः पित्रा प्रणामाय सगुह्यकः / तं बोधिसत्त्वमालोक्य निपपातास्य पादयोः // KAव्क्_२४.२५ //
2310 SK अथोत्सङ्गे समादाय हृष्टस्तं पृथिवीपतिः / लक्षणानि निमित्तज्ञैस्तस्य देहे व्यलोकयत् // KAव्क्_२४.२६ //
2311 SK लक्षणज्ञास्ततः सर्वे नृपमूचुः सविस्मयाः / देव दिव्यकुमारो ऽयं लक्षणैरुपलक्ष्यते // KAव्क्_२४.२७ //
2312 SK जायते लक्षणैरेतैर्विश्वविश्रान्तशासनः / शक्राधिपश्चक्रवर्ती भगवान् स तथागतः // KAव्क्_२४.२८ //
2313 SK दीर्घाङ्गुलिदलौ चक्रलाञ्छनौ सुप्रतिष्ठितौ / अरुणौ चरणावस्य कान्तौ कमलकोमलौ // KAव्क्_२४.२९ //
2314 SK राजहंस इव प्रांशुः सजालाङ्गुलिपल्लवः / एष जानुयुगः श्रीमानाजानुभुजभूषितः // KAव्क्_२४.३० //
2315 SK सकोशबस्तिगुह्यश्च न्यग्रोधपरिमण्डलः / दक्षिणावर्तरोमाङ्कः परिणाहसमोन्नतिः // KAव्क्_२४.३१ //
2316 SK रजोमललवास्पृष्टस्तजाम्बूनदद्युतिः / हस्तपादांसकण्ठाग्रस्पष्टसप्तच्छदाकृतिः // KAव्क्_२४.३२ //
2317 SK सिंहपूर्वार्धकायश्च बृहत्स्पष्टाङ्गविग्रहः / चत्वारिंशत्समाप्रोतशुक्लदन्तः सुनासिकः // KAव्क्_२४.३३ //
2318 SK दीर्घप्रतनुजिह्वश्च मेघदुन्दुभिनिश्वनः / अभिनीलाक्षगोक्ष्मः सहजोष्णीषमस्तकः // KAव्क्_२४.३४ //
2319 SK सितोर्णाङ्को भ्रुवोर्भागः स्वस्तिकोरःस्थलोज्ज्वलः / लेखाशृङ्गाब्जहस्तो ऽयं छत्राकारशिराः शिशुः // KAव्क्_२४.३५ //
2320 SK राजन्नयम् ते तनयश्चक्रवर्ती भविष्यति / सम्यक्संबोधिसंबुद्धः सर्वज्ञो वा भविष्यति // KAव्क्_२४.३६ //
2321 SK इत्युक्त्वा तेषु जातेषु लेभे हर्षं महीपतिः / सप्तभिदिवसैः शास्तुर्जननी त्रिदिवं ययौ // KAव्क्_२४.३७ //
2322 SK तस्य जन्मनि शाक्यानां मुनीनामिव शान्तता / दृष्ट्वा यदा शाक्यमुनिर्नामाभूत्स तदा शिशुः // KAव्क्_२४.३८ //
2323 SK देवानामपि देवो ऽयमिति निश्चित्य तेजसा / देवातिदेव इत्यस्य नाम चक्रे महीपतिः // KAव्क्_२४.३९ //
2324 SK नारदेनाथ सहितस्तत्त्वदर्शी तपोवनात् / तं समभ्याययौ द्रष्टुमादरादसितो मुनिः // KAव्क्_२४.४० //
2325 SK स बोधिसत्त्वं बालार्कमिव कल्पप्रकाशनम् / दृष्ट्वा विकासिवक्र्क्रश्रीर्लेभे कमलतुल्यताम् // KAव्क्_२४.४१ //
2326 SK सो ऽब्रावीद्विहितातिथ्यं नृपतिं प्रणतं मुनिः / राजन् गुणगणेनेव स्पृहणीयो ऽसि सूनुना // KAव्क्_२४.४२ //
2327 SK एतानि लक्षणान्यस्य मोक्षलक्ष्मीसमागमम् / वदन्ति चक्रवर्तिश्रीःफलं नैषां विनश्वरम् // KAव्क्_२४.४३ //
2328 SK अस्य बोधिप्रभावेण संबुद्धस्य् मुखाम्बुजम् / धन्य पद्माकरस्येव नेत्रपात्रं करिष्यति // KAव्क्_२४.४४ //
2329 SK विबुधाः शुद्धसत्त्वस्य बोधिदुग्धमहोदधेः / धन्या वागमृतैरस्य भविष्यन्त्युपजीविनः // KAव्क्_२४.४५ //
2330 SK पुण्यभाजि जगत्यस्मिन्नेक एवास्मि वञ्चितः / एतत्संदर्शनं यस्य पूर्णकालस्य दुर्लभम् // KAव्क्_२४.४६ //
2331 SK इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य गत्वा व्योम्ना तपोवनम् / सुप्रसन्नं मनः कृत्वा देहत्यागमचिन्तयत् // KAव्क्_२४.४७ //
2332 SK स पर्यन्तोपदेशाय नारदेनाभिचोदितः / तमुवाचामृतं वत्सं कुमारः कथयिष्यति // KAव्क्_२४.४८ //
2333 SK अधिगम्यामृतं तस्मान्नृपसूनोरनामयम् / तरिष्यसि भवाम्बोधिमित्युक्त्वा तनुमत्यजत् // KAव्क्_२४.४९ //
2334 SK श्रीरसत्क्रियां तस्य कृत्वा सपदि नारदः / ययौ वाराणसीं सिद्ध्यै लेभे कात्यायनाभिधाम् // KAव्क्_२४.५० //
2335 SK वर्धमानः कुमारो ऽथ सर्वविद्यासु पारगः / लिपिप्रवीणो ऽभिनवाम् लिपिं ब्राह्मीं विनिर्ममे // KAव्क्_२४.५१ //
2336 SK नागायुतसमप्राणे तस्मिन् जगति विश्रुते / वैशालिकैः प्रियायास्मै प्रेषितो मत्तकुञ्जरः // KAव्क्_२४.५२ //
2337 SK भविष्यति चक्रवर्तीत्यस्य प्रातमुपायनम् / देवदत्तः परिद्वेषात् तं जघान महागजम् // KAव्क्_२४.५३ //
2338 SK च्युतं चकर्षं द्विदतं नन्दः सप्त पदानि तम् / कुमारस्तु तदुत्क्षिप्य प्राकाराद् बहिरक्षिपत् // KAव्क्_२४.५४ //
2339 SK एकनारावनिर्भिन्नसप्ततालमहीतलः / छेद्यभेद्यास्त्रशस्त्रेषु स एवातिशयं ययौ // KAव्क्_२४.५५ //
2340 SK तततुल्यगुणां पत्नीं राजसूनुर्यशोधराम् / अवाप विश्रुतां लोके शुद्धशील इवोन्नतिम् // KAव्क्_२४.५६ //
2341 SK अत्रान्तरे महावातविच्युतः सप्तयोजनः / सरित्प्रवाहसंरोधं विदधे विपुलद्रुमः // KAव्क्_२४.५७ //
2342 SK सां स्फारतरुसंरुद्धा रोहिका नाम निम्नगा / शीलभ्रष्टेव वनिता प्रययौ प्रतिलोमताम् // KAव्क्_२४.५८ //
2343 SK राजपुत्रस्तमुत्क्षिप्य भङ्क्त्वा विक्षुप्य तं द्रुमम् / न्यवारयत् प्रजामत्स्यजलकल्लोलविप्लवम् // KAव्क्_२४.५९ //
2344 SK ततः कदाचिदुद्याने हंसं निशितयन्त्रिणा / देवदत्तेन निहतं कुमारः समजीवयत् // KAव्क्_२४.६० //
2345 SK संतापं तद्विवादेन देवदत्तो ऽधिकं ययौ / न सहन्ते हि कुटिलास्तुल्यकुलगोणोन्नतिम् // KAव्क्_२४.६१ //
2346 SK कदाचिद् गोपिका नाम कुमारं राजकन्यका / कन्दर्परूपमालोक्य किमप्यौत्सुक्यमाययौ // KAव्क्_२४.६२ //
2347 SK शुद्धोदनः सुतस्थैतां ज्ञात्वा चित्तोचितां वधूम् / अपूरयद्विवाहेन मन्मथस्य मनोरथम् // KAव्क्_२४.६३ //
2348 SK नैमित्तिकास्ततो ऽभ्येत्य नृपमूचुः सुनिश्चयाः / पुत्रस्ते चक्रवर्ती वा मुनिर्वा सप्तमे ऽहनि // KAव्क्_२४.६४ //
2349 SK तच्छ्रुत्वा नृपतिः सूनोश्चक्राव्र्तिपदाप्तये / प्रव्रज्याचकितश्चिन्तां दिनसंख्यामयीं ययौ // KAव्क्_२४.६५ //
2350 SK लोलां सर्वः स्र्हियं वेत्ति शान्तस्थिरसुखामपि / अत्थापि भोगरक्तानां संपत्स्वेवादरः परम् // KAव्क्_२४.६६ //
2351 SK ततः कदाचिदुद्यानविहाराय नृपात्मजः / प्रययौ रथमारुह्य वल्गुतुङ्गतुरङ्गमम् // KAव्क्_२४.६७ //
2352 SK स विवर्णं जराजीर्णम् कीर्णशीर्णशिरोरुहम् / सुशुष्कपरुषाकारं ददर्श पुरुषं पथि // KAव्क्_२४.६८ //
2353 SK स तं दृष्ट्वा निजं कायमालोक्याचिन्तयच्चिरम् / अहो पर्याप्तपाको ऽयं कायस्यास्य जुगुप्सितः // KAव्क्_२४.६९ //
2354 SK वयः पर्याप्तमाप्तो ऽपि पर्याप्तं नाश्रयत्ययम् / अतीव पलितव्याजाज्जरा वृद्धं हसत्यसौ // KAव्क्_२४.७० //
2355 SK शरीरे संततस्नायुपाशप्रोतास्थिपञ्जरे / वृद्धः पुष्णाति मन्ये ऽहमहो मोहविहङ्गमम् // KAव्क्_२४.७१ //
2356 SK सारथे किं करोत्येष किं न याति तपोवनम् / अस्ंकोचमेति वृद्धस्य देहेन सह सा मतिः // KAव्क्_२४.७२ //
2357 SK वृद्धो ऽवलम्बते यष्टिं न तु धर्ममयीं धियम् / जराकुटिलकायस्य स्वभावो निर्विवेकता // KAव्क्_२४.७३ //
2358 SK जुगुप्सां जनयत्येष वृद्धः प्रस्खलिताक्षरैः / वचोभिश्च्युतदन्ताभैर्गलल्लालालवाकुलैः // KAव्क्_२४.७४ //
2359 SK नष्टा दृष्टिः कृशः कायः शक्तिर्लुप्ता हता श्रुतिः / तथापि मोहाद् दृष्टैव वृद्धस्य तरुणीप्रिया // KAव्क्_२४.७५ //
2360 SK धत्ते धवलतां वृद्धः किमेतामतिगर्हिताम् / लोला परं विरक्तापि यद्यस्यातिप्रिया तनुः // KAव्क्_२४.७६ //
2361 SK इति चिन्तयतस्तस्य निर्वेदः समजायत / मन्यमानस्य सापायं कायं निचयमापदाम् // KAव्क्_२४.७७ //
2362 SK पुनश्च समये ऽन्यस्मिन्नपश्यद् व्याधितं नरम् / विपक्ककूणपप्रायं सपूयमिव पाण्डरम् // KAव्क्_२४.७८ //
2363 SK स प्रदध्यौ तमालोक्य समुद्दिश्य निजां तनुम् / अहो नु सहजैवास्मिन् काये रोगगणोद्गतिः // KAव्क्_२४.७९ //
2364 SK इदमेव महच्चित्रमियं मांसमयी तनुः / न याति क्लेदवैक्लव्यं क्षणं पर्युषीते ऽपि यत् // KAव्क्_२४.८० //
2365 SK इति ध्यात्वा स सोद्वेगः शरीरविचिकित्सया / बभूव राज्यसंभोप्गरागे विगतितादरः // KAव्क्_२४.८१ //
2366 SK अथान्यस्मिन् क्षणे माल्यवस्त्राच्छादितविग्रहम् / ददर्श देहसत्कारव्यग्रबन्धुजनं शवम् // KAव्क्_२४.८२ //
2367 SK तं दृष्ट्वा सहसोद्वेगदयादुःखघृणाकुलः / चिरं निःसारसंसारपरिहारमचिन्तयत् // KAव्क्_२४.८३ //
2368 SK एष प्रेतवनं याति संसक्तां हृदये वहन् // KAव्क्_२४.८४ //
2369 SK अहो नु विषयाभ्यासविलासाध्यवसायिनाम् / नृणामन्त्यक्षणे कष्टा काष्ठपाषाणतुल्यता // KAव्क्_२४.८५ //
2370 SK उद्वेगवारिभवसागरबुद्बुदे ऽस्मिन् कालानिलाकुलितकर्मलताग्रपुष्पे / मायावधूनयनविभ्रमसंविभागे पुंसां क एष वपुषि स्थिरताभिमानः // KAव्क्_२४.८६ //
2371 SK नोक्तं किंचित् परहितयुतं न श्रुतं धर्मयुक्तं नैव घ्रातं कुशलकुसुमं सत्यरूपं न दृष्टम् / नैव स्पृष्टं शमपदमिति व्यक्तमासक्तचिन्ता- विश्रान्तो ऽयं वहति सहसा निश्चलत्वं गतायुः // KAव्क्_२४.८७ //
2372 SK राजसूनुर्विचिन्त्येति शरीरं विपदाप्लुतम् / अशेषविषयासङ्गे पराम् नः स्नेहताम् ययौ // KAव्क्_२४.८८ //
2373 SK अथाग्रे निर्मितं देवैः स शुद्धावासकायिकैः / व्यलोकयत् प्रव्रजितं पात्रकाषायधारिणम् // KAव्क्_२४.८९ //
2374 SK तं दृष्ट्वैव बभूवास्य प्रव्रज्याभिमुखी मतिः / ईप्सितालोकनप्रीत्या स्वभावो हि विभाव्यते // KAव्क्_२४.९० //
2375 SK विराग्यकारणम् तत्र नृपसूनोः पदे पदे / विलोक्य सारथिः सर्वं क्षितिपाय व्यनेदयत् // KAव्क्_२४.९१ //
2376 SK कुमारो ऽथ पितुर्वाक्यात् ग्रामालोकनकौतुकी / व्रजन् पथि निधानानि विवृतानि व्यलोकयत् // KAव्क्_२४.९२ //
2377 SK तत्पूर्वपुरुषन्यस्तैः स्त्रीकरैरुत्थितान्यपि / यदा स नाग्रहीत्तानि तदा विविशुरम्बुधिम् // KAव्क्_२४.९३ //
2378 SK ततः स कर्षकान् पांशुव्याप्तपाण्डुशिरोरुहान् / विदीर्णपाणिचरणान् क्षुत्पिपासाश्रमातुरान् // KAव्क्_२४.९४ //
2379 SK हलकद्दालविषमोल्लेखपक्षव्रणादितान् / विलोक्य क्लेशविवशान् बभूव करुणाकुलः // KAव्क्_२४.९५ //
2380 SK विधाय दयया तेषां द्रविणौरदरिद्रताम् / स वृषाणां वृषरतः क्लेशमुक्तिमकारयत् // KAव्क्_२४.९६ //
2381 SK ततः प्रतिनिवृत्तो ऽथ सानुजः पार्थिवात्मजः / मध्याह्नपृथुसंतापे तरलस्तरणित्विषः // KAव्क्_२४.९७ //
2382 SK रथघोषोन्मुखशिखिश्यामीकृतदिगन्तरः / स्वेदवारिकणाकीर्णः प्रभास्निग्धवनस्थलीम् // KAव्क्_२४.९८ //
2383 SK सो ऽवरुह्य रथात्तत्र गण्डस्खलितकुण्डलह् / विश्राण्त्यै विश्रुतयशा जम्बुच्छायामशिश्रियत् // KAव्क्_२४.९९ //
2384 SK स बभारोरसि व्यक्तां स्वेदाम्बुकणसंततिम् / वपुराश्लेषललितां हारस्येव कुटुम्बिनीम् // KAव्क्_२४.१०० //
2385 SK छायासु परिवृत्तासु शनकैः सर्वशाखिनाम् / तस्य जम्बूतरुच्छाया न चचाल तनुस्तनोः // KAव्क्_२४.१०१ //
2386 SK सा तस्य शीतलच्छाया तापक्लान्तिमवारयत् / संसारविरतस्येव तीव्रवैराग्यवासना // KAव्क्_२४.१०२ //
2387 SK पुत्रदर्शनसोत्कण्ठस्तं देशमथ भूपतिः / आजगाम गजोत्सर्पत्रस्तभ्रमरचामरः // KAव्क्_२४.१०३ //
2388 SK छायां स निश्चलां दृष्ट्वा कुमारस्य प्रभावतः / गौरवाद्भुतसंप्राप्तः प्रणतं प्रणनाम तम् // KAव्क्_२४.१०४ //
2389 SK ततः स सहितः पित्रा नगरं गन्तुमुद्यतः / अपश्यत् पुरपर्यन्ते श्मशानं शवसंकुलम् // KAव्क्_२४.१०५ //
2390 SK स दृष्ट्वा कुणपाकीर्णमशिवं शिवकाननम् / सोद्वेगं सारथिं प्राह स्थगितस्यन्दनः क्षणम् // KAव्क्_२४.१०६ //
2391 SK सारथे पश्य जन्तूनां कायापायमतीं दशाम् / दृष्ट्वेदमपि रागार्द्रं मनो मोहप्रमादिनाम् // KAव्क्_२४.१०७ //
2392 SK परस्त्रीदर्शनात्तृप्तं नेत्रमास्वाद्य सादरम् / अस्यासत्यवती जिह्वा पश्य काकेन कृस्यते // KAव्क्_२४.१०८ //
2393 SK अस्याः स्तनमुखन्यस्तनखोल्लेखसुखस्थितिः / ख्ण्डयत्यधरं गॄध्रः कामीव मदनिर्भरह् // KAव्क्_२४.१०९ //
2394 SK एते दृष्टनिषक्टवायसशकृन्निष्ठिविनः पादपा मूर्च्छन्तीव विपाकपूयकुणपाघ्राणेन निष्कूणिताः / दृष्ट्वा गृध्रविदार्यमाणमसकृत् कीर्णार्द्रतन्त्र शवं भूयो वातविलोलपल्लवकरैराच्छादयन्तीव च // KAव्क्_२४.११० //
2395 SK क्षीबस्येवाचलस्य द्रुतहृतहृदया जम्बुकी कण्ठसक्ता रक्ताभिव्यक्तकामा कमपि नखमुखोल्लेखमासुत्रयन्ती / आस्वाद्यास्वाद्य यूनः क्षणमधरदलं दत्तदन्तव्रणाङ्कं लग्नानङ्गक्रियायामियमतिरभसोत्कर्षमाविष्करोति // KAव्क्_२४.१११ //
2396 SK इत्युक्त्वा जातविरतिर्भवबीभत्सकुत्सया / कलयन् क्लेशनिर्वाणं प्रविवेश पुरान्तरम् // KAव्क्_२४.११२ //
2397 SK तत्र हर्म्यगतापश्यत् तं कन्याभिजनोज्ज्वला / मृगजा नाम मृगजानोदिनी मृगलोचना // KAव्क्_२४.११३ //
2398 SK सरागतरला दृष्ट्ः श्रोत्रसंचारिणी परम् / अभूत्तद्दर्शने तस्याः सहसैव विरेकिणी // KAव्क्_२४.११४ //
2399 SK सा तदालोकनेनैव बाला लज्जासहिष्णूना / स्मरेणेव समाकृष्टा सखीं प्राह पुरःस्थिताम् // KAव्क्_२४.११५ //
2400 SK का धन्या ललना लोके स्पर्शेनास्य शशित्विषः / यस्या मदनसंतप्ता तनुर्निर्वाणमेष्यति // KAव्क्_२४.११६ //
2401 SK निर्वाणशब्दं श्रुत्वैव राजपुत्रः समीहितम् / तां ददर्शोन्मुखः पद्मवनानीव दिशन् दृशा // KAव्क्_२४.११७ //
2402 SK स तस्यास्तेन वचसा वपुषा व प्रसादितः / हारं सुवृत्तं चित्तं च विक्षेपास्यै गुणोज्ज्चलम् // KAव्क्_२४.११८ //
2403 SK आलोकनानुकूल्येन भावं विज्ञाय भूपतिः / पुत्रस्यान्तःपुरपदे तामादाय न्यवेशयत् // KAव्क्_२४.११९ //
2404 SK षण्णां काण्तासहस्राणां वृतमन्तःपुरं ततः / विवेश राजतनयः प्रियां शान्तिं विचिन्तयन् // KAव्क्_२४.१२० //
2405 SK अत्राण्तरे नरपतिं प्राहुर्नैमित्तिकाः स्फुटम् / मुनिर्वा चक्रवर्ती वा प्रातस्ते बह्विता सुतः // KAव्क्_२४.१२१ //
2406 SK ततः संचिन्त्य नृपतिः प्रव्रज्याम् चकितः परम् / अकारयत् पुरद्वारगुप्तिं रुद्धगमागमाम् // KAव्क्_२४.१२२ //
2407 SK द्रोणोदनमुखान् भ्रातॄन् द्वारेषु विनिवेश्य सः / नगरस्य स्वयं मख्ये तथा सामात्यसैनिकः // KAव्क्_२४.१२३ //
2408 SK राजपुत्रादथ प्राप्तगर्भा देवी यशोधरा / वभाषे शारदीव द्यौः प्रत्यासन्नेन्दुपाण्डुरा // KAव्क्_२४.१२४ //
2409 SK एकरात्रावशेषे ऽथ नगरद्वाररक्षणे / शमप्रवृत्तार्कमभूत् प्रव्रज्याभिमुखं दिनम् // KAव्क्_२४.१२५ //
2410 SK चिरं विचर्य संसारं शान्तिं याते दिवस्पतौ / काषायाम्बरमालम्ब्य ययौ संध्यावदृश्यताम् // KAव्क्_२४.१२६ //
2411 SK अशेषाशातमोमोहविरामविमलां शनैः / इन्दुर्गामुदितश्चक्रे पूर्णालोकविलोकिनीम् // KAव्क्_२४.१२७ //
2412 SK सरागतापे वभसश्चेतसीव गते रवौ / शुद्धेन्दुहृदयस्याभूत् प्रसादः को ऽप्यविप्लवः // KAव्क्_२४.१२८ //
2413 SK अथास्मिन्नन्तरे कान्तासंततान्तःपुरोदरे / रत्नहर्म्यप्रविष्टेन्दुद्युतिसंदोहहासिनि // KAव्क्_२४.१२९ //
2414 SK निःसारविरसं सर्वं राजसूनुर्विलोकयन् / जगाअ गगनस्वच्छस्वच्छन्दोच्छलितस्मृतिः // KAव्क्_२४.१३० //
2415 SK गणो ऽयं नारीणां मदनदहनोल्कापरिकरः परित्याज्यस्तीव्रव्यसनशतसंतापसचिवः / इदानीं युक्ता मे तरुतललताशीतलरे परित्यक्तागारप्रशमसुखसारे परिणतिः // KAव्क्_२४.१३१ //
2416 SK एताश्चन्द्रद्युतिमदमया यामि नार्यो वने ऽस्मिन् निद्रामुद्रानियमितदृशः संस्तरस्रस्तवत्राः / स्वप्नोत्पन्नानुचितवचनाः केशसंछादितांसाः क्षिप्रं मन्दानिलविचलितान् लज्जयन्तीव दीपान् // KAव्क्_२४.१३२ //
2417 SK सरलस्रस्तगात्राणां निर्लज्जानां विवाससाम् / सुप्तानां च मृतानां च भेदः को नाम देहिनाम् // KAव्क्_२४.१३३ //
2418 SK इति तस्य ब्रुवाणस्य संजाते गमनोद्यमे / मिथः कथा समभवन्नगरद्वाररक्षिणाम् // KAव्क्_२४.१३४ //
2419 SK भो भोः कः को ऽत्र जागर्ति जाग्रतो नास्ति विप्लवः / प्रभुचित्तग्रहव्यग्राः समग्रा एव जाग्रति // KAव्क्_२४.१३५ //
2420 SK जागर्ति संसारगृहे मनीषी मोहाण्धकारे स्वपिति प्रमत्तः / ज्जीवितमेव लोके मृतस्य सुप्तस्य च को विशेषः // KAव्क्_२४.१३६ //
2421 SK इति मर्ह्यस्थितः श्रुत्वा रात्रौ राजसुतः कथाः / प्रस्थितं सत्पथेनेव निजं मेने मनोरथम् // KAव्क्_२४.१३७ //
2422 SK निवॄत्तेर्लक्षणं दृष्ट्वा स स्वप्नं क्षणनिद्रया // KAव्क्_२४.१३८ //
2423 SK ततः प्रबुद्धा सहसा त्रस्ता देवी यशोधरा / तत्कालोपनतं स्वप्नं दयिताय न्यवेदयत् // KAव्क्_२४.१३९ //
2424 SK पर्यङ्काभरणान्गानि स्वप्ने भग्नानि मे विभो / श्रीर्व्रजन्ती मया दृष्ट्वा चन्द्रार्कौ च तोरिहितौ // KAव्क्_२४.१४० //
2425 SK इत्याकर्ण्य स तामूचे मुग्धे सत्यविवर्जितः / संसार एव स्वप्नो ऽयं स्वप्ने स्वप्नो ऽपि कीदृशः // KAव्क्_२४.१४१ //
2426 SK स्वप्ने ऽद्य नाभिसंजाता लता व्याप्ता विहारसा / मेरूपधानशिरसा पूर्वपश्चिमवारिधौ // KAव्क्_२४.१४२ //
2427 SK भुजाभ्यां चरणाभ्याम् च दक्षिणाब्धिर्मया धृतः / भद्रे स्वप्नः शुभो ऽयं ते स्त्रीणां भर्तुशुभं शुभम् // KAव्क्_२४.१४३ //
2428 SK इत्युक्ते बोधिसत्त्वेन नोचे किंचिद् यशोधरा / पुनश्च निद्राभिमुखी बभूव मीलितेक्षणा // KAव्क्_२४.१४४ //
2429 SK शक्रब्रह्ममुखाः सर्वे समेत्याथ सुधाभुजः / चक्रिरे बोधिसत्त्वस्य सत्त्वोत्साहप्रपूरणम् // KAव्क्_२४.१४५ //
2430 SK तैर्देवपुत्राश्चत्वारः समादिष्टा महाजवाः / सहाया गमने तस्य भूशैलाब्धिधृतिक्षमाः // KAव्क्_२४.१४६ //
2431 SK शक्रादिष्टेन यक्षेण पाञ्चिकाख्येन निर्मितैः / सहर्म्यासक्तसोपानैरवतीर्य विनिर्ययौ // KAव्क्_२४.१४७ //
2432 SK सुप्तं सारथिमादाय छन्दकाख्यं प्रबोध्य सः / उत्सादमिव जग्राह कण्ठकाख्यं तुरङ्गमम् // KAव्क्_२४.१४८ //
2433 SK तं तीक्ष्णरुचिरं लक्ष्मीकटाक्षतरलं हरिम् / स चक्रे संयमालीनं मूर्धि संस्पृश्य पाणिना // KAव्क्_२४.१४९ //
2434 SK शमोद्यमे सुमनसा स् अको ऽप्यन्तर्बहिः समह् / शिशवो ऽपि विमुञ्चन्ति यत्प्रभावेण चापलम् // KAव्क्_२४.१५० //
2435 SK बलजिज्ञासया न्यस्तं तेनाथ चरणं क्षितौ / न ते कम्पयितुं शेकुर्देवपुत्राः सविस्मयाः // KAव्क्_२४.१५१ //
2436 SK छन्दकेन सहारुह्य निस्तरङ्गं तुरङ्गमम् / स जगाहे महद्व्योम विमलं स्वमिवाशयम् // KAव्क्_२४.१५२ //
2437 SK प्रययौ तरलावर्तिनर्तितोष्णीषपल्लवः / संसर्पिपवनोल्लसैः शोकोच्छ्वास इव श्रियः // KAव्क्_२४.१५३ //
2438 SK तस्याभरणरत्नांशुलेखाभिः शबलं नभः / जग्राह सूत्रपत्रालीविचित्रम्जिव चीवरम् // KAव्क्_२४.१५४ //
2439 SK कीर्णाश्रुबिन्दुकलिता विलोलनयनोत्पलाः / व्रजन्तं ददृशुर्दृश्यास्तमन्तःपुरदेवताः // KAव्क्_२४.१५५ //
2440 SK संसारमिव विस्तीर्णं पुरं सनृपबान्धवम् / दूरात् प्रदक्षिणीकृत्य क्षम्यतामित्यभाषत // KAव्क्_२४.१५६ //
2441 SK क्षपायां क्षणशेषायाम् जने निद्राभिमुद्रिते / तं ददर्श महान्नाम प्रबुद्धो राजबान्धवः // KAव्क्_२४.१५७ //
2442 SK दिवि दृष्ट्वा व्रजन्तं तं शशाङ्कशङ्कया हृतः / ऊचे चिरं विचार्योच्चैर्बाष्याzन्चितविलोचनह् // KAव्क्_२४.१५८ //
2443 SK चित्रमेतद् विरक्तव्तं बन्धुजीवोपमस्य ते / कुमार रुचिराकार न युक्तं युक्तकारणम् // KAव्क्_२४.१५९ //
2444 SK वंशोत्कर्षविशेषार्थू निबद्धाशः पिता त्वयि / कस्मान्निराश क्रियते सर्वाशाभरण त्वया // KAव्क्_२४.१६० //
2445 SK इति शाक्यस्य महतः श्रुत्वा वाक्यं नृपात्मजः / तमूचे बान्धवप्रीतिर्बन्धो वन्धनशृङ्खला // KAव्क्_२४.१६१ //
2446 SK अयं कायः क्षयं याति मिथ्यागृहसुखप्रियः / विषयोग्रविष्र्तानाममृतायतनं वनम् // KAव्क्_२४.१६२ //
2447 SK हस्ताकृष्टस्त्रिफणिफणभृन्मस्तकन्यस्तमृत्यु कण्ठाबद्धित्कटविषलतापल्लवालोलमालः / दीप्ताङ्गारप्र्करगहनं गाहते दुर्गमार्गं संसारे ऽस्मिन् विषयनिचये सप्रमोदः प्रमादी // KAव्क्_२४.१६३ //
2448 SK इत्युदीर्य व्रजन् व्योम्ना विलङ्घ्य नगरं क्षणात् / बहिर्भूतलमभ्येत्य स ययौ वाजिना जवात् // KAव्क्_२४.१६४ //
2449 SK महता शाक्यमुख्येन बोधितस्याथ भूपतेः / अन्तःपुरे च कान्तानामुद्भूतः करुणः स्वरः // KAव्क्_२४.१६५ //
2450 SK अथ ब्रह्मेन्द्रधनदप्रमुखस्त्रिदशैर्वृतः / राजसूनुर्वनं प्राप गत्वा द्वादशयोजनम् // KAव्क्_२४.१६६ //
2451 SK अवरुह्याथ तुरगात्ग् विमुच्याभरणानि सः / उवाच सूचितानन्दश्छन्दकं वदनत्विषा // KAव्क्_२४.१६७ //
2452 SK गृहीत्वाबह्रणानि त्वं हयं च व्रज मन्दिरम् / मेदानीमस्ति मे कृत्यमेतैर्मायानिबन्धनैः // KAव्क्_२४.१६८ //
2453 SK वने ऽस्मिन्नहमेकाकी शमसंतोषबान्धवः / एकः संजायते जन्तुरेक एव विपद्यते // KAव्क्_२४.१६९ //
2454 SK विषमविषययोगं भोगमुत्सृज्य रे कः सरसरति विशेषक्लेशशोषप्रवृत्तः / परिभवभुवने ऽस्मिन्नेष नः संनिवेशः शमितमदनकान्तिः शान्तिमेव श्रयामि // KAव्क्_२४.१७० //
2455 SK इत्युक्त्वाभरणान्यस्य दीप्तान्यङ्के मुमोच सः / त्यक्तशोकान्वितानीव मुक्तापक्कणसंचये // KAव्क्_२४.१७१ //
2456 SK चूडां निस्कृष्य खङ्गेन स चिक्षेप नभःस्थले / शक्रश्च तम् समादाय निनाय दिवमादरात् // KAव्क्_२४.१७२ //
2457 SK केशः क्लेश इवोत्कृत्तो यत्र तेन महात्मना / केशप्रतिग्रहं चैत्यं सद्भिस्तत्र निवेशितम् // KAव्क्_२४.१७३ //
2458 SK छन्दको ऽप्यश्वमादायं प्रयातः सप्तभिर्दिनैः / शनैः प्राप पुरोपान्तं शोकार्तः समचिन्तयत् // KAव्क्_२४.१७४ //
2459 SK शून्यं तुरगमादाय परित्यज्य नृपात्मजम् / द्रष्टुं शक्नोमि नृपतिं कथं पुत्रप्रलापिनम् // KAव्क्_२४.१७५ //
2460 SK विचिन्त्येति हयं त्यक्त्वा स तत्रैव व्यलम्बत / शून्यासनः परं वाजी मूर्तः शोक इवाविशत् // KAव्क्_२४.१७६ //
2461 SK तं दृष्ट्वान्तः पुरजनः सामात्यश्च महीपतिः / प्रतिप्रलापमुखराश्चक्रिरे निखिला दिशः // KAव्क्_२४.१७७ //
2462 SK उद्भूतार्तस्वरैः कण्ठैः सोत्कण्ठैः स विषादवान् / सर्वैर्गृहीतकीर्णाश्रुर्वाजी जीवितमत्यजत् // KAव्क्_२४.१७८ //
2463 SK स बोधिसत्त्वसंस्पर्शपुण्यप्राप्तिपवित्रितः / जग्राह ब्राह्मणकुले जन्म संसारमुक्तये // KAव्क्_२४.१७९ //
2464 SK शक्रदत्तं कुमारस्तु यत्र काषायमग्रहीत् / काषायग्रहणम् तत्र चैत्यं चक्रे महाजनः // KAव्क्_२४.१८० //
2465 SK विभवमभववृत्त्यै जन्म जन्मप्रमुक्त्यै विजनमपि जनानां मोहगर्तान्निवृत्त्यै / इति स कुशलकामः काममुत्सृज्य भेजे गुणकृतजनरागः श्लाघ्यतां त्यक्तरागः // KAव्क्_२४.१८१ //
2466 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायामभिनिष्क्रमणावदानं चतुर्विशः पल्लवः //
2467 SK २५. मारविद्रावणावदानम् /
2468 SK जयन्ति ते जन्मभयप्रमुक्ता भवप्रभावाभिभवाभियुक्ताः / यैः सुन्दरीलोचनचक्रवर्ती मारः कृतः शासनदेशवर्ती // KAव्क्_२५.१ //
2469 SK ततस्तपोवने चास्मिन् बोधिसत्त्वे तपोजुषि / तदुपस्थापकाः पञ्च वाराणस्यां प्रवव्रजुः // KAव्क्_२५.२ //
2470 SK स्पृहणीयो मुनीन्द्राणामथ शाक्यमुनिः शनैः / स्वयं सेनायनीग्रामं जनचारिकया ययौ // KAव्क्_२५.३ //
2471 SK तत्र सेनाभिधानस्य कन्ये गृहपतेः सुते / नन्दा नन्दबलाख्या च चारुवृत्ते बभूवतुः // KAव्क्_२५.४ //
2472 SK शुद्धोदनस्य भूभर्तुस्ते श्रुत्वा विश्रुतं सुतम् / चक्राते तद्विवाहार्थं व्रतं द्वादशवार्षिकम् // KAव्क्_२५.५ //
2473 SK आमोदिनीनां हृदये सदा सूत्रवदास्थितः / मालानामिव बालानामभिलाषः स्वभावजः // KAव्क्_२५.६ //
2474 SK धेनूनां पीतदुग्धानां दुग्धं ताभ्यां पुनः पुनः / गृहीट्वा स्फटिकस्थाल्या व्रतान्ते पायसं शुभम् // KAव्क्_२५.७ //
2475 SK विधिवत्पायसे सिद्धे विप्ररूपः सुरेश्वरः / तं समभ्याययौ देशं देवश्च कमलासनः // KAव्क्_२५.८ //
2476 SK हर्षादतिथिभागे ऽथ कन्यकाभ्याम् समुद्धृते / शक्रो ऽवदत्सर्वगुणोदयायाग्रे प्रदीयताम् // KAव्क्_२५.९ //
2477 SK मत्तो ऽयमधिकस्तावद्ब्रह्मणः प्रथमो ऽपि च / इत्युक्ते सुरराजेन प्रोवाच चतुराननः // KAव्क्_२५.१० //
2478 SK मत्तो ऽधिको देव आस्ते शुद्धावासनिकायिकः / इत्युक्ते ब्रह्मणा ते ऽपि जगदुर्गगनस्थिताः // KAव्क्_२५.११ //
2479 SK सर्वप्रतिविशिष्टो ऽसौ बोधिसत्त्वस्तपःकृशः / नद्यां निराजनाख्यायां विगाह्य सलिले स्थितः // KAव्क्_२५.१२ //
2480 SK एतदाकर्ण्य कन्याभ्यामाहूय मणिभाजने / अवतीर्यार्पितं भक्त्या तदस्मै मधुपायसम् // KAव्क्_२५.१३ //
2481 SK बोधिसत्त्वस्तदादाय रत्नपात्रीं ददौ तयोः / दत्तेयं न पुनर्ग्राह्येत्युक्त्वा जगृहतुर्न ते // KAव्क्_२५.१४ //
2482 SK सा तेन नद्यां निक्षिप्ता नागैर्नीता प्रभावती / विक्षोभ्याप्याहृता तेभ्यस्तार्क्ष्यरूपेण वज्रिणा // KAव्क्_२५.१५ //
2483 SK प्रसादी बोधिसत्त्वो ऽथ कन्यायुगलमभ्यधात् / दानस्य प्रणिधानेन भवत्योः किं समीहितम् // KAव्क्_२५.१६ //
2484 SK ते तमूचतुरानन्दनिधिः शुद्धोदनात्मजः / सर्वार्थसिद्धो ऽभिमतः कुमारः पतिरावयोः // KAव्क्_२५.१७ //
2485 SK उद्यमं मारलीलायाः सरसं तद्वचस्तयोः / न लिलिम्प मनस्तस्य पाद्मं दलमिवोदके // KAव्क्_२५.१८ //
2486 SK स जगाद कुमारो ऽसौ न किं प्रव्रजितः श्रुतः / न तस्य लोलनयनाः प्रियाह् श्रिय इव स्त्रियः // KAव्क्_२५.१९ //
2487 SK इत्यनीप्सितमाकर्ण्य दीर्घं निश्वस्य कन्यके / ऊचतुर्दानधर्मो ऽयं सिद्धौ तस्यैव जायताम् // KAव्क्_२५.२० //
2488 SK अदृष्टस्नेहसंश्लिष्टः प्रविष्टो ऽन्तः पराङ्भुखः / न नाम सुचिराभ्यस्तः पक्षपातो निवर्तते // KAव्क्_२५.२१ //
2489 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा बोधिसत्त्वः प्रसन्नधीः / प्रयातस्ते समामन्त्र्य विश्रान्त्यै काननान्तरम् // KAव्क्_२५.२२ //
2490 SK पायसामृतभागेन लब्धदिव्यबलोदयः / प्रच्छायतरुसुच्छायमारुरोह महीधरम् // KAव्क्_२५.२३ //
2491 SK पर्यङ्कबन्धमाधाय तत्र तस्मिन् सुखं स्थिते / अहंकार इवात्युच्चशिराह् सो ऽद्रिर्व्यगीर्यत // KAव्क्_२५.२४ //
2492 SK विशीर्णभूधरे तस्मिन् स प्रदध्यौ विषण्णधीः / सपक्षालानि कर्माणि मया कानि कृतान्यहो // KAव्क्_२५.२५ //
2493 SK इति चिन्ताशतोच्छ्वासं तमूचुर्व्योमदेवताः / न त्वया विहितं साधो कर्म किंचिदसांप्रतम् // KAव्क्_२५.२६ //
2494 SK अच्छिन्नोत्तप्तकुशलं धर्तुं न क्षमते क्षितिः / स त्वमुत्तप्तकुशलः प्रोच्चशैलशताग्द्गुरुः // KAव्क्_२५.२७ //
2495 SK निरञ्जनीं समुत्तीर्य सरितं व्रज निश्चलम् / सिद्धिदं बोधिसत्त्वानाम् देशं वज्राअस्नाभिधम् // KAव्क्_२५.२८ //
2496 SK देवतादिष्टमार्गेण प्रस्थितस्यास्य भूतले / पादन्यासैरभूत्तस्य हेमपद्मपरंपरा // KAव्क्_२५.२९ //
2497 SK पृथिवी व्रजतस्तस्य प्रोल्लसत्सलिलाकुला / रणन्ती कांस्यपात्रीव प्रोन्ननाम ननाम च // KAव्क्_२५.३० //
2498 SK तानि तानि निमित्तानि प्रवृत्तानि ददर्श सः / येषामनुत्तरज्ञाननिधानसाधनं फलम् // KAव्क्_२५.३१ //
2499 SK निरञ्जनाय भुवने नागो ऽन्धः कालिकाभिधः / बुद्धोत्पादितदृरभूमेः शब्दमाकर्ण्य निर्ययौ // KAव्क्_२५.३२ //
2500 SK सर्वलक्षणसंपन्नं दीप्तजाम्बूनदद्युतिम् / स बोधिसत्त्वमालोक्य प्रोवाच रचिताzन्जलिः // KAव्क्_२५.३३ //
2501 SK नलिननयन कान्तस्त्वं वने यौवने ऽस्मिन् विहरसि विरहार्तिं संपदामर्पयित्वा / अशमशमविशेषोन्मेषसंतोषहेतुर् भवसि भवसमुद्रे देहिनां सत्यसेतुः // KAव्क्_२५.३४ //
2502 SK अथामुञ्चन्त्येते भयतरलतामत्र हरिणाः यथा लीलाचक्रं विहरति समीपे खगगणः / ससत्त्वासत्त्वाना किमपि हृदयाश्वाससदनं तथा मन्ये बौद्धं वपुरिदमनायाससुखदम् // KAव्क्_२५.३५ //
2503 SK करिकलभकह् पद्मप्रीत्या करोति हरेः करं सुखयति शिखी स्निग्धालापं कलापशिखानिलै / भवति हरिणी लोलापाङ्गा पुरः प्रणयोन्मुखी प्रशमसमयस्येयं पुण्यप्रसादमयी स्थितिः // KAव्क्_२५.३६ //
2504 SK अद्यैव बुद्धत्वमवाप्य शुद्धं त्वं बोधिमेष्यत्य(?)खिलां त्रिलोकीम् / सद्यःप्रसादप्रमदावदातां कुमुद्वती पूर्ण इवामृतांशुः // KAव्क्_२५.३७ //
2505 SK अन्योन्यं दिननाथदीप्तमहसः सद्यस्तवालोकनाल् लोकानां कनलप्रबोधकलया दिव्यप्रकाशस्पृशाम् / निर्याती हॄदयान्निबद्धमधुपश्रेणिव संबन्धन- त्रस्तान्तर्न पुनः करिष्यति पदं मोहान्दकारावलिः // KAव्क्_२५.३८ //
2506 SK इति ब्रुवाणां विनयान्नागराजः प्रसन्नधीः / बोधिसत्त्वं समाभास्य समुत्तीर्य नदीं ययौ // KAव्क्_२५.३९ //
2507 SK वज्रासनपदं प्राप्य बोधिमूलमनाकुलम् / दक्षिणाग्रैः कुशैश्चक्रे शक्तदत्तैः स संस्तरम् // KAव्क्_२५.४० //
2508 SK तत्रोपविश्य पर्यङ्कबद्धो निश्चलनिश्चयः / मन्थावसानविश्रान्तः स दुग्धाब्धिरिवाबभौ // KAव्क्_२५.४१ //
2509 SK असाधारः क्षमाधारः स धीरसरलाकृतिः / रुरुचे काञ्चनरुचिः परो मेरुरिवाचलः // KAव्क्_२५.४२ //
2510 SK असावक्षयपर्यन्तः पर्यङ्को ऽयं मम स्थिरः / बबन्धेति स संकल्पं कृत्वा प्रतिमुखीं स्मृतिम् // KAव्क्_२५.४३ //
2511 SK अत्राण्तरे समभ्येत्य मारः संयममत्सरः / लेखहारस्तत्र तूर्णं बोधिसत्त्वमभाषतः // KAव्क्_२५.४४ //
2512 SK अकामकामता केयं लोके बन्धनदा मता / अकालकलिकाकारा मतिस्ते कास्य कामना // KAव्क्_२५.४५ //
2513 SK गृहीतं हतशङ्केन देवदत्तेन ते पुरम् / निरुद्धन्तःपुरश्रेणीर्बद्धः शुद्धोदनो नृपः // KAव्क्_२५.४६ //
2514 SK इति श्रुत्वैव वचनं शोकामर्षविषोज्झितः / अशिक्षितविकारेण चेतसा स व्यचिन्तयत् // KAव्क्_२५.४७ //
2515 SK अहो बतान्तरायं मे मारः कर्तुं समुद्यतः / नर्तयत्येष दुर्वृत्तः शिस्वण्डिक्रीडयाजगत् // KAव्क्_२५.४८ //
2516 SK मार मार विरामस्ते दौर्जन्यस्य न जायते / एकेन हिंसायज्ञेन प्राप्तेयं कम्रता त्वया // KAव्क्_२५.४९ //
2517 SK यज्ञदाणतपःश्लाघां नात्मनः कर्तुमुत्सहे / स्वगुणोदीरणम्लानं पुण्यपुष्पं हि शीर्यति // KAव्क्_२५.५० //
2518 SK इति निर्भत्सितस्तेन चित्तस्तेनः शरीरिणाम् / सामर्षः प्रययौ मारः समारम्भाद् हतोद्यमः // KAव्क्_२५.५१ //
2519 SK अथादृश्यन्त ललिता लालित्याञ्चितलोचनाः / भ्रमद्भृङ्गरङ्गिण्यः कान्ताश्चूतलता इव // KAव्क्_२५.५२ //
2520 SK चारुतच्चरितातृप्तास्तिस्रस्ताः कामकन्यकाः / सरागं पादनलिनीन्यासैश्चक्रुस्तपोवनम् // KAव्क्_२५.५३ //
2521 SK विलोचनेन हरिणी करिणी गतिविभ्रमैः / तत्र ताभिर्मुखाम्भोजैर्नलिनी मलिनीकृता // KAव्क्_२५.५४ //
2522 SK यौवनाभरणैरङ्गौरनुरागाविलेपनैः / लावण्यवसनैस्तासां कामो ऽभूदप्यचेतसाम् // KAव्क्_२५.५५ //
2523 SK वज्रासनसमाधानध्याननिश्चललोचनम् / तं विलोक्याभवत् तासां विस्मयध्यानधारणा // KAव्क्_२५.५६ //
2524 SK ता बोधिसत्त्वसंकल्पान् मदरागमयं वयः / परित्यज्यैव सहसा सलज्जा भेजिरे जराम् // KAव्क्_२५.५७ //
2525 SK प्रतीपगमनात्तासामथ भग्नमनोरथः / मन्मथः प्रथितारम्भः सैन्यसंब्ःआरमाददे // KAव्क्_२५.५८ //
2526 SK सर्वप्रहरणैर्व्याप्तं नानाप्राणिमुखैर्भयैः / षट्त्रिंशत्कोटीविपुलं बलं तस्य समुद्ययौ // KAव्क्_२५.५९ //
2527 SK स्वयमाकर्णनिष्कृष्टकोपक्रूरशरासनः / मारः स्फारविकारेण बोधिसत्त्वं समाद्रवत् // KAव्क्_२५.६० //
2528 SK शस्त्रवृष्टिस्तदुत्सृष्टा सह पांशुविषाश्मभिः / प्रययौ बोधिसत्त्वस्य मन्दाराम्बुजतुल्यताम् // KAव्क्_२५.६१ //
2529 SK पुनर्मारबलोत्सृष्टा शस्त्रवृष्टिर्घृतक्षमे / चक्रिरे देवतास्तस्य वज्रप्रतिसमाश्रयम् // KAव्क्_२५.६२ //
2530 SK स्मरो ऽपि नष्टसंकल्पः समाधेः श्रोत्रकण्टकम् / घण्टापटुरटत्पत्रं निर्ममे स्फटीकद्रुमम् // KAव्क्_२५.६३ //
2531 SK तं तारमुखरं वृक्षं मारं च सबलायुधम् / चक्रवाटे समुत्क्षिप्य चिक्षिपुर्व्योमदेवताः // KAव्क्_२५.६४ //
2532 SK भगवानथ संप्राप्तप्रसन्नज्ञाननिर्मलः / सर्ववित्सर्वगः सरव्जातिस्मृतिपरो ऽभवत् // KAव्क्_२५.६५ //
2533 SK स तत्रानुत्तरज्ञानसम्यक्संबोधिमापितः / ददर्श सर्वभुताणि गतिं कर्मोर्मिनिर्मिताम् // KAव्क्_२५.६६ //
2534 SK अथ शाक्यपुरे मारः प्रवादमसृजद्दिवः / बोधिसत्त्वः प्रयातो ऽस्तं तपःक्लेशवशादिति // KAव्क्_२५.६७ //
2535 SK तत्र शुद्धोदनो राजा पुत्रस्नेहविषातुरः / निपपात तमाकर्ण्य वज्राहत इव क्षितौ // KAव्क्_२५.६८ //
2536 SK अन्तःपुरे सहनृपे प्राणत्यागकृतक्षणे / सुवृत्तपक्षपातिन्यस्तमूचुर्व्योमदेवताः // KAव्क्_२५.६९ //
2537 SK पुत्रस्तवामृतं पीत्वा सम्यक्संबुद्धताम् गतः / तेनावलोकितस्यापि नास्ते भृत्युभयं कुतः // KAव्क्_२५.७० //
2538 SK इति सान्तःपुरामात्यः श्रुत्वा नरपतिर्वचः / अभूत्प्रत्यागतप्राणः सुधासिक्त इव क्षणात् // KAव्क्_२५.७१ //
2539 SK तस्मिन् महोत्सवानन्दे बोधिसत्त्ववधूः सुतम् / कान्तं यशोधआसूत राहुग्रस्ते निशाकरे // KAव्क्_२५.७२ //
2540 SK राहुलाख्यः स बालो ऽपि नृपतेर्जन्मशङ्किनः / जनन्या सशिलः शुद्ध्यै निक्षिप्तो ऽम्भसि पुप्लुवे // KAव्क्_२५.७३ //
2541 SK भगवानपि सप्ताहं स्थितो निश्चलविग्रहः / वज्रपर्यङ्कबन्धेन देवानाम् विस्मयं व्यधात् // KAव्क्_२५.७४ //
2542 SK स ब्रह्मकायिकाख्याभ्याम् देवताभ्यां विरोधितः / अवदत्परमानन्दसुधासंदोहसुन्दरः // KAव्क्_२५.७५ //
2543 SK अहो तव मया ज्ञाता पूर्वमेषा सुखस्थितिः / यया सुरासुरैश्वर्यसुखं दुःखगणायते // KAव्क्_२५.७६ //
2544 SK लावण्याम्भःप्लाविताङ्गास्तरुण्यः पीयूषार्द्रः स्वर्गसंभोगवर्गः / अस्याशेषत्यागहेलासुखस्य स्पर्धाबन्धे पांशुनिःसार एव // KAव्क्_२५.७७ //
2545 SK संतप्तो ऽहं विषयविषमक्लेशसंसारपान्थः क्लान्तः शान्त्याश्रितिमुपगतश्चन्दनच्छाययेव / संजातेयं सकलकरणव्यापिनी निर्वृतिमे विश्रान्तानाम् शमहिमवने किं सुखस्योपमानम् // KAव्क्_२५.७८ //
2546 SK अस्मिन्नवसरे पुण्यपरिपाकेण तद्वनम् / वणिजौ पृथुसार्थेन प्राप्तौ त्रपुसभल्लिकौ // KAव्क्_२५.७९ //
2547 SK देवताप्रेतितौ भक्त्या भगवन्तमुपेत्य तौ / प्रणतौ पिण्डपातो ऽयं गृह्यतामित्यभाषताम् // KAव्क्_२५.८० //
2548 SK दयाविधेयः सर्वज्ञस्तदाकर्ण्य व्यचिन्तयत् / पूर्वैः पात्रे गृहीतो ऽयं न पाणी पात्रवर्जिते // KAव्क्_२५.८१ //
2549 SK इति चिन्तयतस्तस्य महाराजाभिधाः सुराः / दत्वा स्फटिकपात्राणि चत्वारि त्रिदिवं ययुः // KAव्क्_२५.८२ //
2550 SK कृत्वाथ भगवान् पात्रे पिण्डपातप्रतिग्रहम् / अनुग्रहं तयोश्चक्रे शरण्यत्रयशासनात् // KAव्क्_२५.८३ //
2551 SK विततसुकृतसाक्षी पुण्यनिक्षेपदक्षः क्षयितविपदशेषः प्रार्थनाकल्पवृक्षः / भवति कुशलमूलैः कस्यचिद्भाग्यभाजः शुभपरिणतिदीक्षादक्षिणः साधुसङ्गः // KAव्क्_२५.८४ //
2552 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां मारचिद्रावणावदानम् नाम पञ्चविंशः पल्लवः //
2553 SK २६. शाक्योत्पत्तिः /
2554 SK वंशः स को ऽपि विपुलः कुशलानुबन्धी यश्चारुवृत्तमुचितं गुणसंग्रहस्य / रत्नं विशुद्धरुचिसूचितसत्प्रकाशं मुक्तामयं जगदलंकरणं प्रसूते // KAव्क्_२६.१ //
2555 SK न्यग्रोधारामनिरतं पुरा कपुलवास्तुनि / शाक्याः स्ववंशं पप्रच्छुर्भगवन्तं तथागतम् // KAव्क्_२६.२ //
2556 SK तैः पृष्टः स्वकुलोत्पत्तिं स मौद्गल्यायनं पुरः / वक्तुं न्ययुङ्क्त कृत्वास्य विमलज्ञानदर्शनम् // KAव्क्_२६.३ //
2557 SK स विलोक्य यथातत्त्वमतीतं ज्ञानचक्षुषा / तानवोचत संस्मृत्य श्रूयतां शाक्यसंभवः // KAव्क्_२६.४ //
2558 SK अशेषे ऽस्मिन् जलमये जगत्येकार्णवे पुरा / स्थिते पवनसंस्पर्शात्पयः पय इवाभवत् // KAव्क्_२६.५ //
2559 SK जले तस्मिन् घनतया याते कठिनताम् शनैः / अभूद्वर्णरसस्पर्शशब्दगन्धमयी मही // KAव्क्_२६.६ //
2560 SK तस्यामाभास्वरा देवाश्च्युताः कर्मपरिक्षयात् / तत्तुल्यवर्णसंभूताः सत्त्वाः सत्त्वबलाधिकाः // KAव्क्_२६.७ //
2561 SK अङ्गुल्या रसमास्वाद्य तत्तृष्णातीव्रमोहिताः / आहारदोषात्संप्रापोउर्गुरुरूक्षविवर्णताम् // KAव्क्_२६.८ //
2562 SK अन्नप्रसविनी तेषां क्रमेणाभूद्वसुंधरा / तमोभिश्च विलुप्तानाम् क्षेत्राग // KAव्क्_२६.९ //
2563 SK ततस्तेषां क्षतत्राणात् क्षत्रियः क्षितिपालने / महासंमतनामाभूज्जनस्य महतो मतः // KAव्क्_२६.१० //
2564 SK तस्यान्वये महत्यासीनृपः श्रीमानुपोषधः / अम्लानकीर्तिकुसुमः पारिजात इवोदधौ // KAव्क्_२६.११ //
2565 SK चक्रवर्ती सुतस्तस्य मान्धाताभूदयोनिजः / जगत्येकातपत्रस्य यस्य वंशो महानभूत् // KAव्क्_२६.१२ //
2566 SK वंशे सहस्रवंशस्य कृकिस्तस्याभवन्नृपः / चित्तप्रसादमकरोद् भगवान् यस्य काश्यपः // KAव्क्_२६.१३ //
2567 SK इक्ष्वाकुरन्वये तस्य तस्य चाभूद् विरूढकः / प्रीत्या कनीयसः सूनोर्ज्येष्ठास्तेन विवासिताः // KAव्क्_२६.१४ //
2568 SK एकीभूय ततः सर्वे स्वदेशविगतस्पृहाः / कुमाराः कपिलाख्यास्य महर्षेराश्रमं ययुः // KAव्क्_२६.१५ //
2569 SK ध्यानकालाण्तरायाणां बाल्यादुच्चैः प्रलापिनाम् / सो ऽन्यत्र निर्ममे तेषां पुरं कपुलवास्त्विति // KAव्क्_२६.१६ //
2570 SK कालेन पुत्रवात्सल्यादनुतापेन भूपतिः / आनीयन्तां कुमारास्ते सचिवानित्यभाषत // KAव्क्_२६.१७ //
2571 SK तमूर्चुर्मन्त्रिणः सर्वे राजन् प्राप्तपुरोत्तमाः / प्रत्यानेतुमशक्यास्ते जातापत्यपृथुश्रियः // KAव्क्_२६.१८ //
2572 SK इति तेषां पितुस्तत्र शक्याशक्यविचिन्तने / बभूवुः शाक्यसंज्ञास्ते नॄपुरस्तेषु वंशकृत् // KAव्क्_२६.१९ //
2573 SK तद्वंशेषु पञ्चपञ्चसहस्रेषु महीभुजाम् / अतीतेषु क्षितिपतिः श्रीमान् दशरथो ऽबह्वत् // KAव्क्_२६.२० //
2574 SK तस्यान्वये सिंहहनुर्बभूव पृथिवीपतिः / न रणे सिंहमिव यं सेहिरे राजकुञ्जराः // KAव्क्_२६.२१ //
2575 SK ज्येष्ठः शुद्धोदनस्तस्य सुतः शुक्लोदनः परः / द्रोणोदनस्तदनुजः कनीयानमृतोदनः // KAव्क्_२६.२२ //
2576 SK कन्याश्चतस्रः शुद्धाख्या शुक्ला द्रोणामृता तथा / शुद्धोदनस्य भगवान् सूनुर्नन्दस्तथापरः // KAव्क्_२६.२३ //
2577 SK शुक्लोदनस्य तनयौ द्वौ तिष्याख्यो ऽथ भद्रिकः / द्रोणोदनस्य द्वौ पुत्रावनिरुद्धो महांस्तथा // KAव्क्_२६.२४ //
2578 SK आनन्ददेवदत्ताख्यावमृतोदनसंबह्वौ / शुद्धासुतः सुप्रशुद्धः शुक्लासूनुश्व मालिकः // KAव्क्_२६.२५ //
2579 SK द्रोणापुत्रश्च भद्राणिर्वैशाल्यख्यो ऽमृतासुतः / राहुलो भगवत्सूनुर्यस्मिन् वंशः प्रतिष्ठितः // KAव्क्_२६.२६ //
2580 SK इत्युज्ज्वलज्ञानमयेन तेन वंशं यथावत्कथितं निशम्य / शाक्या बभूवर्भगवत्प्रभावैः संभावितोत्कर्षविशेषशुद्धाः // KAव्क्_२६.२७ //
2581 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां शाक्योत्पत्तीर्नाम षड्विंशः पल्लवः //
2582 SK २७. श्रोणाकोटीविंशावदानम् / स को ऽपि सत्त्वस्य विवेकबन्धोः पुण्योपसन्नस्य महान् प्रभावः / नापैति यः कायशतेषु पुंसः कस्तूरिकामोद इवांशुकस्य // KAव्क्_२७.१ //
2583 SK जिने सर्वजगज्जन्तुसंतापकरुणाह्रदे / पुरे राजगृहे वेणुवनान्तरविहारिणि // KAव्क्_२७.२ //
2584 SK श्रीमानभूद्भूमिपतिश्चम्पायां पोतलाभिधः / जहार धनदर्पान्ध्यं धनेन धनदस्य यः // KAव्क्_२७.३ //
2585 SK अजायत सुतस्तस्य मनोरथशतान्वितः / धनानामीप्सितावाप्त्य सुखसख्यो विभूतयः // KAव्क्_२७.४ //
2586 SK श्रवणर्क्षेण जातस्य स सूनोस्तस्य जन्मनि / प्रीत्या ददौ दरिद्रस्य कोटीनां विंशतिं तदा // KAव्क्_२७.५ //
2587 SK स श्रोणकोटिविंशाख्यः शिशुः ख्यातस्तदाभवत् / विभवः सुकृतेनैव येन वंशो विभूषितः // KAव्क्_२७.६ //
2588 SK प्राप्तविद्यः स सर्वार्थैः सह वृद्धिमुपागतः / चकार सुखविश्रान्तिं व्यवहारधरः पितुः // KAव्क्_२७.७ //
2589 SK स कदाचित्प्रभापुञ्जमिअव् सूर्यस्य मण्डलात् / अवतीर्णं पुरप्रातं मौद्गल्यायनमब्रवीत् // KAव्क्_२७.८ //
2590 SK को भवानर्कसंकाशः प्रकाशितदिगन्तरः / त्रिदशेशः शशाङ्को वा देवो वा द्रविणेश्वरः // KAव्क्_२७.९ //
2591 SK स तं बभाषे न सुरः शिष्यो भगवतस्त्वहम् / बुद्धस्य विबुधाधीशवन्द्यमानगुणश्रियः // KAव्क्_२७.१० //
2592 SK स्वच्छं तस्य प्रयच्छन्तं पिण्डपातं महामुनेः / सत्त्वशुद्धोदयावाप्तं भोग्यं भगवतः प्रियम् // KAव्क्_२७.११ //
2593 SK इति श्रोणस्य भगवन्नाम्ना श्रवणगामिना / रविभक्रस्य जात्यापि रोमाञ्चः समजायतः // KAव्क्_२७.१२ //
2594 SK प्राग्जन्मवासनायुक्तः स्वभावो यस्य यः स्थितः / स तस्योदीरणेनापि स्फुट एव विभाव्यते // KAव्क्_२७.१३ //
2595 SK स तस्मै विंशतिस्थालीभागं नाकजनोचितम् / प्रहिणोद्भक्तिसंसक्तश्रद्धायुक्तेन चेतसा // KAव्क्_२७.१४ //
2596 SK ततस्तं प्रेषितं तेन भगवान् भक्तिसंसदा / अनुग्रहाग्रहव्यग्रः समग्रं स्वयमग्रहीत् // KAव्क्_२७.१५ //
2597 SK अस्मिन्नवसरे भक्त्या स्थालीभागं नृपोचितम् / समादाय स्वयं राजा बिम्बिसारः समाययौ // KAव्क्_२७.१६ //
2598 SK श्रोणप्रहीतभोगानामामोदं तत्र पार्थिवः / आघ्राय शक्रप्रहितं सर्वं दिव्यममन्यत // KAव्क्_२७.१७ //
2599 SK पात्रशेषं भगवता दत्तमास्वाद्य भूपतिः / श्रोणेन प्रेषितं श्रुत्वा तदनु विस्मयं ययौ // KAव्क्_२७.१८ //
2600 SK भगवन्तं प्रणम्याथ राजधानीं नरेश्वरः / प्रविश्याचिन्तयत्स्फीतां दिव्यां श्रोणस्य संपदम् // KAव्क्_२७.१९ //
2601 SK गच्छामि तं स्वयं गत्वा द्रष्टव्यो ऽसौ अम्हायशाः / इति निश्चित्य सचिवैः स यात्रारम्भमादिशत् // KAव्क्_२७.२० //
2602 SK पोतलः क्षितिपं ज्ञात्वा स्वयमागमनोद्यतम् / नीतिज्ञं पुत्रमेकाण्ते श्रोणकोटिमभाषत // KAव्क्_२७.२१ //
2603 SK पुत्र त्वाम् द्रष्टुमायाति वर्णाश्रमगुरुर्नृपः / इत्येष भृशमुत्कर्षः सदोषः प्रतिभाति मे // KAव्क्_२७.२२ //
2604 SK क्षितीशा लक्षतां यातंपक्षपातोद्यता इव / अविलम्बितमाघ्नन्ति शरा इव गुणच्युताः // KAव्क्_२७.२३ //
2605 SK भृत्यानामपि विद्वेष्यो भवत्यतिशयोन्नतिः / अभिमानैकसाराणां किं पुनः पृथिवीभूजाम् // KAव्क्_२७.२४ //
2606 SK रूपे वयसि सौभाग्ये प्रभावे विभवे श्रुते / स्वसुतस्यापि संघर्षान्नोत्कर्षं सहते जनः // KAव्क्_२७.२५ //
2607 SK जने द्वेषमये पुत्र गुणमाच्छाद्य जीव्यते / आच्छादितगुणः पद्मः प्रियस्तीक्ष्णरुचेरपि // KAव्क्_२७.२६ //
2608 SK उद्धतः कस्य न द्वेष्यः प्रणतः कस्य न प्रियः / द्रुमं पातयति स्तब्धं नम्त्रं रक्षति मारुतः // KAव्क्_२७.२७ //
2609 SK स चाभिगम्यो भूपालस्त्वां यदि स्वयमेष्यति / तदेषं दर्पमोहस्ते श्रेयसे न बह्विष्यति // KAव्क्_२७.२८ //
2610 SK तस्मादितः स्वयं गत्वा प्रणम्यं प्रणम प्रभुम् / नक्षत्रराशिसदृशं दत्वा हारमुपायनम् // KAव्क्_२७.२९ //
2611 SK पितुः श्रुत्वेति वचनं श्रोणकोटिर्हहीपतिम् / प्रययौ नावमारुह्य द्रष्टुं रत्नविभूषितः // KAव्क्_२७.३० //
2612 SK स राजधानीमासाद्य प्राप्य दृष्ट्वा च भूपतिम् / ददौ हारं पर्णम्यास्मै हर्षहासमिव श्रियः // KAव्क्_२७.३१ //
2613 SK तं दृष्ट्वा स्वयमायातं नृपतिः स्निग्धया दृशा / हेमरोमाङ्कचरणं विस्मयादित्यभाषत // KAव्क्_२७.३२ //
2614 SK अहो पुण्यमहेशाख्यः को ऽपि त्वं सत्त्वबाम्धवः / यस्य संदर्शनेनैव मनोवृत्तिः प्रसीदति // KAव्क्_२७.३३ //
2615 SK गुणेभ्यः परमैश्वर्यमैश्वर्यात्सुखमुत्तमम् / सुखेभ्यः परमारोग्यमारोग्यात्साधुसंगमः // KAव्क्_२७.३४ //
2616 SK अपि दृष्टस्त्वया साधो भगवान् वेणुकानने / तत्पादपद्मयुगलं द्रष्टुमर्हसि मे मतः // KAव्क्_२७.३५ //
2617 SK इत्युक्ते क्षितिनाथेन सौजन्यात्पक्षपातिना / तं श्रोणकोटीविंशो ऽपि प्रणयात्प्रत्यभाषत // KAव्क्_२७.३६ //
2618 SK अस्मादतुल्यकल्याणात्प्रसादाद्देवदेव ते / अधुना योग्यतायाता भगवद्दर्शने मम // KAव्क्_२७.३७ //
2619 SK इत्युक्ते तेन सहितः प्रतस्थौ स्थितिकोविदः / भक्त्या तथागतं द्रष्टुं पद्भ्यामेव महीपतिः // KAव्क्_२७.३८ //
2620 SK अस्पृष्टपादस्य भुवा श्रुणस्याजन्मवासरात् / महार्हवस्त्रैः प्रस्थाने भृत्यैराच्छादिता मही // KAव्क्_२७.३९ //
2621 SK भगवद्भक्तिविनयाद्गौरवाच्च स भूपतेः / वस्त्राण्यवारयद्भृत्यैरवाच्च इव क्षितौ // KAव्क्_२७.४० //
2622 SK वारितेष्वथ वस्त्रेषु दिव्यवस्त्रैर्वृता मही / अप्रयत्नोपकरणाः संपदः पुण्यशालिनाम् // KAव्क्_२७.४१ //
2623 SK निवार्य दिन्यवस्त्राणि भूमौ तेनार्पिते पदे / विचचालाचला पृथ्वी सशैलवनसागरा // KAव्क्_२७.४२ //
2624 SK ततः स भूमिपतिना सह प्राप्य जिनाश्रमम् / भगवन्तं विलोक्यास्य विदधे पादवन्दनम् // KAव्क्_२७.४३ //
2625 SK उपविष्टस्य तस्याग्रे हृष्टस्यालोकनामृतैः / चक्रे शमविवेकस्य भगवानभिषेचनम् // KAव्क्_२७.४४ //
2626 SK आशयानुशयं धातुं प्रकृतिं च विचार्य सः / सत्यसंदर्शनायास्य विदशे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_२७.४५ //
2627 SK सत्कायदृष्टिशैलो ऽस्य तया विंशतिशृङ्गवान् / ज्ञानवज्रेण निर्भिन्नः स्रोतःप्राप्तिपदस्पृशः // KAव्क्_२७.४६ //
2628 SK प्रव्रज्यायां ततस्तस्य जातायां सहसा स्वयम् / भगवन्तं प्रणम्याथ विस्मितः प्रययौ नृपः // KAव्क्_२७.४७ //
2629 SK तीव्रव्रते ऽपि श्रोणस्य कदाचित्समजायत / वासनाशेषसंस्काराद्बन्धभोगसुखस्मृतिः // KAव्क्_२७.४८ //
2630 SK स तमाहूय भगवान् विलक्षं प्राह सस्मितः / को ऽयं परिवितर्कस्ते प्रतिसंलीनचेतसः // KAव्क्_२७.४९ //
2631 SK विश्लिष्टात्यन्तकृष्टा वा तन्त्री बह्वति विस्वरा / समा माधुर्यमायाति तस्मात्साम्यं समाश्रयेत् // KAव्क्_२७.५० //
2632 SK इत्यादेशाद्भगवतः सर्वसाम्यमुपागतः / स प्राप विमलज्ञानं पश्चात्तापविवर्जितः // KAव्क्_२७.५१ //
2633 SK तस्य तामद्भुतां सिद्धिं विलोक्य पृथुविस्मयाः / पप्रच्छुर्भिक्षवः सर्वे भगवन्तंस चाभ्यधात् // KAव्क्_२७.५२ //
2634 SK श्रोणस्य श्रूयताम् श्रेयःकर्म जन्मान्तरार्हितम् / न ह्यपुण्यानुभावानां भवन्त्यद्भुतसंपदः // KAव्क्_२७.५३ //
2635 SK विपश्वी भगवान् सम्यक्संबुद्धः सुगतः पुरा / पुरीं बन्धुमतीं नाम जनचारिकया ययौ // KAव्क्_२७.५४ //
2636 SK तत्र भक्त्या सुकृतिभिर्भक्तायोपनिमन्त्रितः / वारेण प्रत्यहं गेहं ययौ तेषां सहानुगः // KAव्क्_२७.५५ //
2637 SK ततो दरिद्रःसंप्राप्तवारो ब्राह्मणदारकः / इन्द्रसोमाभिधश्चक्रे यत्नात् यद्योग्यभोजनम् // KAव्क्_२७.५६ //
2638 SK स प्रयत्नेन महता भोज्यं भक्तिपवित्रितम् / आछाद्य वस्त्रैर्वसुधां प्रह्वस्तस्मै न्यवेदयत् // KAव्क्_२७.५७ //
2639 SK तद्भोगप्रणिधानेन जातः सो ऽयं महाधनः / सौवर्णरोमचरणः श्रोणकोटी सुरोपमः // KAव्क्_२७.५८ //
2640 SK न वस्त्ररहिता भूमिः स्पृष्टानेन कदाचन / कम्पस्तच्चरणस्पर्शादत एवाभवद्भुवः // KAव्क्_२७.५९ //
2641 SK इति सुगतवचः सुधावदातं दशनमयूखमिवोन्मिषत्स्वभावम् / प्रणिहितहृदयः परं निपीय स्थिरकुशलाय बभूव भिक्षुसंघः // KAव्क्_२७.६० //
2642 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां श्रोणकोटीविंशावदानं सप्तविंशः पल्लवः //
2644 SK दौर्जन्यदुःसहविशालखलापकारैर्नैवाशये विकृतिरस्ति महाशयानाम् / व्यालोल्वणक्षितिभृदाकुलितो ऽपि सिन्धुर्नैवोत्ससर्ज हृदयादमृतस्वभावम् // KAव्क्_२८.१ //
2645 SK पुरे पुरा राजगृहे बह्गवान् वेणुकानने / कलन्दकनिवासाख्ये विजहार मनोहरे // KAव्क्_२८.२ //
2646 SK तत्र वित्रासितानेकशत्रिनिस्त्रिंशबान्धवः / अजातशत्रुनामाभूद् बिम्बिसारसुतो नृपः // KAव्क्_२८.३ //
2647 SK शाक्यवंश्यः सुहृत्तस्य देवदत्ताभिधो ऽभवत् / क्षुद्रमन्त्रेण यस्यासीत् स वेताल इवोत्कटः // KAव्क्_२८.४ //
2648 SK स कदाचित्सुखासीनं रहः प्राह महीपतिम् / न राजन् फलितो ऽद्यापि ममापि त्वत्समाश्रयः // KAव्क्_२८.५ //
2649 SK निथोपचाररहितः सुखनिर्यन्त्रतन्त्रयोः / मिथो मनोरथत्राणान्मित्रशब्दः प्रवर्तते // KAव्क्_२८.६ //
2650 SK य एष शाक्यश्रमणः सुखे वेणुवने स्थितः / तं हत्वा प्राप्तुमिच्छामि तत्पदं देववन्दितम् // KAव्क्_२८.७ //
2651 SK क्षीयते न यया शत्रुर्लभ्यते न यया यशः / वर्धते न यया मानः किं तया मित्रसंपदा // KAव्क्_२८.८ //
2652 SK महाधनाभिधानेन तत्पौरेण निमन्त्रितः / स पुरं प्रातरागन्ता दाम्भिकः सह भिक्षुभिः // KAव्क्_२८.९ //
2653 SK राजमार्गं प्रविशतः स तस्य व्यालकुञ्जरः / उत्सृज्यतामभिमुखः क्रोधान्धो धनपालकः // KAव्क्_२८.१० //
2654 SK इत्युक्ते देवदत्तेन नृपतिर्मित्रवत्सलः / बुद्धप्रभावं संचिन्त्य नाह किंचिदवाङ्भुखः // KAव्क्_२८.११ //
2655 SK देवदत्तो ऽपि निर्गत्य राजसौहार्ददुर्मदः / प्राह हस्तिमहामात्रं हारं दत्वास्य तोषणम् // KAव्क्_२८.१२ //
2656 SK श्रमणः प्रातरागन्ता पुरं भिक्षुशतैर्वृतः / प्रेरणीयस्त्वया तस्मै गज इत्याह भूपतिः // KAव्क्_२८.१३ //
2657 SK देवदत्तवचः श्रुत्वा तथेत्युचे द्विपाधिपः / श्रेणी हि मेषमूर्खाणामेकयातानुपातिनी // KAव्क्_२८.१४ //
2658 SK ज्ञात्वापि तमभिप्रायं सर्वज्ञः पापचेतसाम् / प्रातः समाययौ सार्धं भिक्षूणां पञ्चभि शतैः // KAव्क्_२८.१५ //
2659 SK अथ हस्तिपकोत्सृष्टः कृष्टप्रासादपादपः / तमभ्यधावदाविद्धः क्रोधान्धः क्रूरकुञ्जरः // KAव्क्_२८.१६ //
2660 SK अनायत्तः परिचयादङ्कुशस्य गुरोरपि / खलविद्धानिव द्वेषी मदेन मलिनीकृतः // KAव्क्_२८.१७ //
2661 SK सेवव्यसनसक्तानामसकृत्कर्णचापलात् / प्राणापहारी भृङ्गाणां भृत्यानामिव दुष्पतिः // KAव्क्_२८.१८ //
2662 SK मन्दरोपद्रवे तस्मिन् द्रुमद्रोहिण्यभिद्रुते / विद्रुते सहसा लोके हाहाकारो महानभूत् // KAव्क्_२८.१९ //
2663 SK तस्याञ्चत्कर्णतालानिलतुलितसरत्सान्द्रसिन्दूरपूरैः संपूर्णे राजमार्गे च्युतचकितवधूरक्तवस्त्रासमानैः / उद्दण्डोच्चण्डशुण्डभ्रमणरवलसत्साध्वसायासिताशा व्यालोलालकाभभ्रमरमिलद्विभ्रमः संभ्रमो ऽभूत् // KAव्क्_२८.२० //
2664 SK पुरप्रमाथव्यथिते जने कोलाहलाकुले / आरुरोह महाहर्म्यं देवदत्तः प्रमत्तधीः // KAव्क्_२८.२१ //
2665 SK भगवद्ग्रहणं द्रष्टुं सो ऽभवद्भृशमुत्सुकः / उन्मूलनेन गुणिनां मातङ्गः परितुष्यति // KAव्क्_२८.२२ //
2666 SK विद्रुतेषु गजत्रासात् तेषु सर्वेषु भिक्षुषु / आनन्द एक एवाभूद् भिक्षुर्भगवतो ऽन्तिके // KAव्क्_२८.२३ //
2667 SK तत्र पञ्चाननाह् पञ्च निर्ययुर्भगवत्करात् / करालकेसरसटास्तन्नखांशुचिता इव // KAव्क्_२८.२४ //
2668 SK द्विपस्तद्गन्धमाग्राय पर्दापस्मारवारणम् / अभूत् स्रुतशकृन्मूत्रः सहसैव पराङ्मुखः // KAव्क्_२८.२५ //
2669 SK जवेन विद्रुतस्तत्र दन्ती दर्पदरिद्रताम् / प्राप्तः प्रदीपदहनाः स ददर्श दिशो दश // KAव्क्_२८.२६ //
2670 SK स विलोक्य जालवह्निज्वलज्ज्वालाकुलं जगत् / पादपद्मान्तिकं शास्तुः शीतलं समुपाययौ // KAव्क्_२८.२७ //
2671 SK संकोचाभिरुचेः सचिन्तमनसः प्रध्वस्तवक्त्रद्युतेर् दैन्यापन्नविहीनदानमधुपप्रारब्धकोलाहलः / लोभान्धस्य महाव्ययोत्सव इव क्लेशोष्मनिश्वासिनस् तस्याभूत्परितापनिश्लथगतेर्भारायमाणः करः // KAव्क्_२८.२८ //
2672 SK तं पादमूलमायान्तं भीतं कारुण्यसागरः / शास्ता करेण पस्पर्श चक्रस्वस्तिकलक्ष्मणा // KAव्क्_२८.२९ //
2673 SK कुम्भविन्यस्तहस्तस्तं प्रोवाच भगवान् जिनः / पुत्र स्वकर्मणैनेमां प्राप्तो ऽसि त्वमिमां दशाम् // KAव्क्_२८.३० //
2674 SK विवेकालोकहलदः कायो ऽयं मांसभूधरः / भारस्ते मोहसंभारः पापादुपनतः परः // KAव्क्_२८.३१ //
2675 SK इत्युक्ते करुणर्द्रेण भितो भगवता गजः / स लब्धश्चासमालानलीनो निश्चलताम् ययौ // KAव्क्_२८.३२ //
2676 SK देवदत्तस्य संकल्पे कुञ्जरे च महोत्कटे / भग्ने निर्विघ्नहर्षो ऽभूत्समुद्गताद्भुतो जनः // KAव्क्_२८.३३ //
2677 SK ततः कृत्वा गृहपतेर्गृहे भोज्यप्रतिग्रहम् / भगवान् भिक्षुभिः सार्धं काननं गन्तुमुद्ययौ // KAव्क्_२८.३४ //
2678 SK अभिसृत्य गजेन्द्रो ऽपि जिनस्य चरणाब्जयोः / कृत्वा करेण संस्पर्शं वपुस्तत्याज कौञ्जरम् // KAव्क्_२८.३५ //
2679 SK चातुर्महाराजिकेषु देवेषु विशदद्युतिः / उपपन्नः स सहसा सुगतं द्रष्टुमाययौ // KAव्क्_२८.३६ //
2680 SK स्वमाश्रमपदं प्राप्तं भगवन्तमुपेत्य सः / प्रणनामार्कसंकाशं प्रदीप्तमणिकुण्डलः // KAव्क्_२८.३७ //
2681 SK तस्य केयूरमुकुटप्रभापल्लवपूरिताः / शक्रचापैरिव व्याप्ता विरेजुर्घनराजयः // KAव्क्_२८.३८ //
2682 SK विनयादुपविश्याग्रे स शास्तुः स्रस्तकल्मषः / तं दिव्यपुष्पैराकीर्य सत्त्व शुभ्रैरभाषतः // KAव्क्_२८.३९ //
2683 SK भगवन् भवतः पादपद्मसंस्पर्शनेन मे / दुर्दशादुःखसंतापः शान्तः संतोषशालिनः // KAव्क्_२८.४० //
2684 SK शमश्लाघ्या कापि व्यसनविषदोषोष्मशमनी सुधावृष्टिर्दृष्टिर्बत भगवतः स्निग्धमधुरा / यया स्पृष्टस्पृष्टं खरतरविकारव्यतिकरं विमुत्यान्तःशान्तिं श्रयति हतमोह पशुरपि // KAव्क्_२८.४१ //
2685 SK इति तस्य ब्रुवाणस्य भगवान् भवशान्तये / सत्यदर्शनसंशुद्धां विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_२८.४२ //
2686 SK मौलिमुक्तांशुशुभ्रेण शिरसा चरणद्वयम् / स शास्तुः प्रययौ नत्वा हसन्निव भवभ्रमम् // KAव्क्_२८.४३ //
2687 SK गते तस्मिन् मुखशशिप्रकाशितनभस्तले / भगवान् भिक्षुभिः पृष्टस्तद्वृत्तान्तमभाषत // KAव्क्_२८.४४ //
2688 SK पूर्वकल्पान्तरे शास्तुः काश्यपाख्यस्य शासने / अभूत्प्रव्रजितो ऽप्येष शिक्षापदनिरादरः // KAव्क्_२८.४५ //
2689 SK अनादरात्कुञ्जरताभोगः संघोपसेवनात् / सत्यदृष्टिबलेनान्ते संप्राप्तः शासनग्रहः // KAव्क्_२८.४६ //
2690 SK प्राग्जन्मविहितं कर्म कस्यचिन्न निवर्तते / कर्मोपदिष्टसंबन्धभक्तिभोगैः सचेतसः // KAव्क्_२८.४७ //
2691 SK तस्मिन् व्यतिकरे घोरे सर्वैस्त्यक्रो ऽस्मि भिक्षिभिः / न त्वानन्देन तत्रापि श्रूयताम् पूर्वसंगतिः // KAव्क्_२८.४८ //
2692 SK शशाङ्कशीतसरसि भ्रातरौ रुचिरौ पुरा / पूर्णमुखः शुखश्चेति राजहंसौ बभूवतुः // KAव्क्_२८.४९ //
2693 SK कदाचिद्ब्रह्मदत्तस्य वाराणस्यां महीपतेः / ब्रहममतीं पुष्करिणीं रम्यां पूर्णमुखो ययौ // KAव्क्_२८.५० //
2694 SK स तस्यां लोलकमलकिञ्जल्कपरिपिञ्जरः / विजहार सरोजिन्यां हंसानां पञ्चभिः शतैः // KAव्क्_२८.५१ //
2695 SK पूर्वपुण्यानुभावेन तं रूपातिशयोज्ज्वलम् / ददर्शं कार्याण्युत्सृज्य जनो निश्चललोचनह् // KAव्क्_२८.५२ //
2696 SK तं श्रुत्वा भूपतिस्तत्र स्थितं तद्दर्शनोत्सुकः / कुशलान् ग्रहणे तस्य व्यसृजज्जालजीविनः // KAव्क्_२८.५३ //
2697 SK तस्मिन् गृहीते नलीनीलीलास्मितसितत्विषि / शतानि पञ्च हंसानां त्यक्त्वा तं प्रययुर्जवात् // KAव्क्_२८.५४ //
2698 SK एकस्तु तस्य सौजन्यादबद्धो ऽपि सुबद्धवत् / तदर्थं व्यथितस्तस्थौ प्रेमपाशवशीकृतः // KAव्क्_२८.५५ //
2699 SK ततस्तैः प्रापितं राजा राजहंसं विलोक्य तम् / स्नेहबद्धं द्वितीयं च विस्मितस्ताववलोकयत् // KAव्क्_२८.५६ //
2700 SK हंसः पूर्णमुखः सो ऽहमानन्दस्तस्य चानुगः / गतास्तदद्य च त्यक्त्वा मां गंसा एव भिक्षवः // KAव्क्_२८.५७ //
2701 SK पूर्वस्मिन्नबह्वत्काले वाराणस्यां महीपतिः / तुत्तुर्नाम मनःपट्टे लिखितं यद्यशः परैः // KAव्क्_२८.५८ //
2702 SK सहस्रयोधस्तस्याभूद् दाक्षिणात्यो निरत्ययः / करदण्डीति विख्यातः संग्रामाग्रेसरः प्रियः // KAव्क्_२८.५९ //
2703 SK कदाचिद् घोरसमरे पञ्चामात्यशतानि तम् / नृपं त्यक्त्वा ययुर्भीत्या करदण्डी तु नात्यजत् // KAव्क्_२८.६० //
2704 SK अहमेव स भूपालः सचिवास्ते च भिक्षवः / करदण्डी स एवायमानन्दो न जहाति माम् // KAव्क्_२८.६१ //
2705 SK जन्मान्तरे ऽपि सिंहो ऽहं मासं कूपे निपातितः / उपेक्षितः क्षणाद्भृत्यैः शृगालैर्ये ऽद्य भिक्षवः // KAव्क्_२८.६२ //
2706 SK एकेन च नखैः खातं दीर्घं कृत्वास्मि मोक्षितः / जम्बुकेन स एवायमानन्दो ऽद्य ममानुगः // KAव्क्_२८.६३ //
2707 SK कूटपाशनिबद्धस्य मृगयूथपतेः पुरा / लुब्धकागमने एव जग्मुस्तदनुगा मृगाः // KAव्क्_२८.६४ //
2708 SK अनुरक्ता न तत्याज तं मृगी साश्रुलोचना / प्रीतिशृङ्खलया बद्धा याता निस्पन्दतामिव // KAव्क्_२८.६५ //
2709 SK अथ लुब्धकमायान्तं दृष्ट्वा मृगवधोद्यतम् / सावदन्मम बाणेन प्रथमं हर जीवितम् // KAव्क्_२८.६६ //
2710 SK इति स्पष्टगिरा तस्याः स्नेहेन च स विस्मितः / मुमोच लुब्धकः प्रीत्या हरिणं हरिणीसखम् // KAव्क्_२८.६७ //
2711 SK मॄगयूथपतिः सो ऽहमानन्दः सा कुरङ्गिका / इत्येष प्रीतिसंबन्धः प्राग्वृत्तमनुवर्तते // KAव्क्_२८.६८ //
2712 SK श्रुत्वेति वाक्यं सुगतस्य सर्वे लज्जानिलीना इव भिक्षवस्ते / सानन्दमानन्दमुखारविन्दं प्रभाभिरामं ददृशुः स्पृहार्द्राः // KAव्क्_२८.६९ //
2713 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां धनपालावदानं अष्टविंशः पल्लवः //
2714 SK २९. काशीसुन्दरावदानम् /
2715 SK जयति स सत्त्वविशेषः सत्त्ववताम् सर्वसत्त्वसुखहेतुः / देहदलने ऽपि शमयति कोपाग्निं शान्तिमुच्चैर्यः // KAव्क्_२९.१ //
2716 SK धर्मोपदेशे भगवान् कौण्डिन्यस्याग्रवर्तिनः / भिक्षोः कथाप्रसङ्गेन पृष्ट्प् भिक्षुभिरभ्यधात् // KAव्क्_२९.२ //
2717 SK ब्रह्मदत्तस्य तनयो वाराणस्यां महीपतेः / काशिसुन्दरनामा व कालभूश्च बभुवतुः // KAव्क्_२९.३ //
2718 SK यौवराज्यभरैकर्हः कुमारः काशिसुन्दरः / धर्माधर्ममयं राज्यं विचार्याचिन्तयच्चिरम् // KAव्क्_२९.४ //
2719 SK क्षणक्षयिणि तारुण्ये जीविते वीचिचञ्चले / राज्ये स्वप्नविवाहे ऽस्मिन् मोहमूले न मे मतिः // KAव्क्_२९.५ //
2720 SK रागप्रलापबहुले मायाम्फमहे मुहुः / वेश्यारोदननिःसारे संसारे नास्ति सत्यता // KAव्क्_२९.६ //
2721 SK प्रव्रज्यामनघस्तस्मादगारादनगारिकम् / निस्त्रिंशवृत्तिसंसक्ताभिरागः किं विभूतिभिः // KAव्क्_२९.७ //
2722 SK राजसूनुर्विचिन्त्येति विवेकविमलाशयः / उवाचाभ्येत्य भूपालमरण्यगमनोत्सुकः // KAव्क्_२९.८ //
2723 SK मम संभोगवर्गो ऽयं राजन्नैवोपयुज्यते / यौवराज्याभिषेकार्हः समारम्भो निवार्यताम् // KAव्क्_२९.९ //
2724 SK क्रोधाग्नितप्ताः सुतरामेतास्तात न मे मताः / बद्धबन्धभयायासजनन्यो राजसंपदः // KAव्क्_२९.१० //
2725 SK व्याप्ताः क्रूरतराचारैर्ज्वलिताः पार्थिवश्रियः / कुर्वन्ति कस्य नोद्वेगं श्मशानाग्निशिखा इव // KAव्क्_२९.११ //
2726 SK छत्रसंछादिता लोकाश्चामरानिललोलिताः / पतन्ति पातकश्वभ्रे मदक्षीबाः क्षितीश्वराः // KAव्क्_२९.१२ //
2727 SK मृदुभोगांशुकाभ्याससुकुमारे महीभुजाम् / काये पतति पर्यन्ते क्लेशः कुलिशदारुणः // KAव्क्_२९.१३ //
2728 SK चिन्तासंततसंतापतीव्रतृष्णाप्रलापिनाम् / राज्यज्वरजुषां नैषां मोहमूर्च्छा निवर्तते // KAव्क्_२९.१४ //
2729 SK वक्राणां रत्नदीप्तानां द्विजिहानां पदे पदे / छिद्रसंदर्शिनां राज्ञां व्यापारः परमारणम् // KAव्क्_२९.१५ //
2730 SK नृपवंशशतोच्छिष्टां मन्यते मामनन्यगाम् / इतीव श्रीः क्षीतीशानां हारचामरहासिनी // KAव्क्_२९.१६ //
2731 SK व्यञ्जितव्यजनोच्छ्वसा लक्ष्मीर्मुक्ताश्रुसंततिः / राज्ञां मोहाभृतातीतभूपतिस्मरणादिव // KAव्क्_२९.१७ //
2732 SK तस्माद्व्रजामि प्रव्रज्याविवर्जितजनस्थितिः / संतोषशीतलच्छायं संतापशमनं वनम् // KAव्क्_२९.१८ //
2733 SK अविश्रान्तस्य संसारपथपान्थस्य दुर्वहः / कायो ऽस्य यत्सदापायः किं पुनः पृथिवीभरः // KAव्क्_२९.१९ //
2734 SK इति पुत्रवचः श्रुत्वा भूप्तिर्भृशमप्रियम् / प्रव्रज्याशब्दचकितः सोद्वेगस्तमभाषतः // KAव्क्_२९.२० //
2735 SK अस्य वंशस्य महतः साम्राज्यस्य वृद्धये / आशानिबद्धवृद्धेन त्वयि पुत्र मया परम् // KAव्क्_२९.२१ //
2736 SK वत्स संकल्पभन्गं मे न काले क्र्तुमर्हसि / इदं तव महच्छायं यौवनं न वनोचितम् // KAव्क्_२९.२२ //
2737 SK समन्त्राभ्यासयुक्तानाम् शक्तानां साधुदर्शने / जितेन्द्रियाणां सरव्त्र नृपाणामवनं तपः // KAव्क्_२९.२३ //
2738 SK स्वपदे ऽपि सरोजस्य निःसङ्गसलिलस्थितिः / दृष्ट्वा वने ऽप्यशोकस्य ललनाचरणाहतिः // KAव्क्_२९.२४ //
2739 SK स्वगेहसुलभैर्भोगैर्यावद्दृष्टिविसूचिका / तावदेते परित्युक्तं शक्यन्ते विषयाः क्षणम् // KAव्क्_२९.२५ //
2740 SK सुखमन्तः परित्यज्य स्वजनं गृहनिर्गतः / अभ्यस्तभोगचिरहक्लेशं न सहते जनः // KAव्क्_२९.२६ //
2741 SK श्रूयते स्मर्यते धर्मः क्रियते च सुखाद् गृहे / वने शुष्यन्ति शुष्काणां श्रवणास्मरणक्रियाः // KAव्क्_२९.२७ //
2742 SK क्षरत्क्षतजपादस्य दर्भसंदर्भसूचिभिः / ततः किं दुःखमपरं परलोले भविष्यति // KAव्क्_२९.२८ //
2743 SK भुञ्जानं जनमीक्षन्ते याताश्चर्मास्थिशेषताम् / परदतं सदाश्नन्ति प्रेता इव तपस्विनः // KAव्क्_२९.२९ //
2744 SK वने निवसनं पुत्र पांशुप्रावरणं समम् / पालनं ब्रह्मचर्यस्य मकराकरशोषणम् // KAव्क्_२९.३० //
2745 SK दावाग्निधूमविकटभ्रुकुटिमुखेषु गोनासवासघनघूकगुहागृहेषु / सिंहाहतद्विरदलोहितलोहितेषु त्यक्त्वा गृहं भवति कस्य धृतिर्वनेषु // KAव्क्_२९.३१ //
2746 SK कामी संयममिच्छति स्मरति च श्यामारतेः संयमी तृप्तस्तीव्रतरव्रतेषु रमते भक्ष्यं क्षुधा काङ्क्ष्ःअति / एकाकी जनमीहते जनवनोद्वेगी वनं वाञ्छति त्यक्त्वान्वेषणतत्पराः पुनरपि प्राप्यावमानं जनाः // KAव्क्_२९.३२ //
2747 SK न मां पुत्र परित्यज्य गहनं गन्तुमर्हसि / भवन्तु तव शत्रूणां वनवासमनोरथाः // KAव्क्_२९.३३ //
2748 SK व्यक्तमौक्तिकहासिन्यः करवाललता इव / त्यक्ता न पुनरायान्ति मानिन्यो नृपसंपदः // KAव्क्_२९.३४ //
2749 SK इत्युक्रो ऽप्यसकृत् पित्रा निश्चयान्न चचाल सः / वज्ररत्नशिखाकल्पः संकल्पो हि महात्मनाम् // KAव्क्_२९.३५ //
2750 SK जननीभिरमात्यैश्च बन्धुपौरमहत्तमैः / स प्रार्थितो ऽप्यभून्मौनी निराहारो दिनत्रयम् // KAव्क्_२९.३६ //
2751 SK राजभोगी तपस्वी वा जीवत्वेष निजेच्छया / कामानुवर्ती लोलो ऽयमित्यूचिः सचिवा नृपम् // KAव्क्_२९.३७ //
2752 SK स कथंचिदनुज्ञातः साश्रुनेत्रेण भूभुजा / ययौ पौरजनाक्रन्दमौनी मुनितपोवनम् // KAव्क्_२९.३८ //
2753 SK वैराग्यपरिपाकेण तत्र मैत्रीपवित्रिताम् / भेजे स सर्वसत्त्वेषु विवेकदयितां दयाम् // KAव्क्_२९.३९ //
2754 SK बभूवुस्तत्प्रभावेण तत्र सर्ववनौकसां / जातिवैराजलत्यागशीतलाश्चित्तवृत्तयः // KAव्क्_२९.४० //
2755 SK त्यक्ते प्राणवधे प्रसक्तहरिणीवृन्दैः पुलिन्दैः परं सिंहैर्वारणदारणन्युपरमे सर्वाङ्गसङ्गीकृते / मायूरावरणैर्दरिद्रजघना मुक्ताकलापोज्झितास् तत्रोच्छ्वासविरागशुष्यदधरा जाताः किराताङ्गनाः // KAव्क्_२९.४१ //
2756 SK क्षमां त्यक्त्वाब्धिवसनां सरव्भूतक्षमाश्रितः / सो ऽभवत् क्षान्तिवादीति विशुतः काशिसुन्दरः // KAव्क्_२९.४२ //
2757 SK अत्रान्तरे महीहर्षे ब्रह्मदत्ते दिवं गते / उद्वेग इव भूतानां भूपालः कलिभूरभूत् // KAव्क्_२९.४३ //
2758 SK अथदभ्रभ्रमद्भृङ्गभ्रूभङ्गमलिनाननः / मुनिसंयमविद्वेषी वसन्तः प्रत्यदृश्यत // KAव्क्_२९.४४ //
2759 SK मदनोन्मादभुतस्य प्रोद्भूतस्य मृगीदृशाम् / मानविध्वंसदूतस्य चुतस्य रुरुचे रुचिः // KAव्क्_२९.४५ //
2760 SK रक्ताशोकस्य पार्श्वस्थलतालिङ्गनशङ्कितः / ईर्ष्यालुरिव पुष्पाणि जहार मलयानिलः // KAव्क्_२९.४६ //
2761 SK उद्यानयौवने तस्मिन् काले कोकिलसंकुले / सान्तःपुरो नृपः प्रायाद् वनालोकनकौतुकी // KAव्क्_२९.४७ //
2762 SK नानावर्णपतत्पुष्पप्रकारप्रचितानि सः / पश्यन् वनानि रम्याणि शनैः प्राप तपोवनम् // KAव्क्_२९.४८ //
2763 SK वनस्थलीषु कान्तासु तत्र कन्यासखश्चिरम् / विहृत्य रतिविश्रान्तः क्षस्णं निद्रामवाप्तवान् // KAव्क्_२९.४९ //
2764 SK अपूर्वकुसुमस्मेराश्चिन्वानास्तत्र मञ्जरी / अन्तःपुराङ्गनाश्चेरुः संचारिण्यो लता इव // KAव्क्_२९.५० //
2765 SK अत्रान्तरे क्षान्तिवादी विविक्तोद्देशनिर्वृतः / एकान्ते निश्चलस्तस्थौ शान्तिमन्तर्विचिन्तयन् // KAव्क्_२९.५१ //
2766 SK अमन्दानन्दचिष्यन्दी वन्दनीयो मनीषिणाम् / कृशो ऽप्यकृशसौन्दर्यः शशीव प्रथमोदितः // KAव्क्_२९.५२ //
2767 SK परिणाममनोज्ञेन रेखासंस्थानशोभिना / पुराणचित्ररूपेण नैव शून्या तदाकृतिः // KAव्क्_२९.५३ //
2768 SK तं दृष्ट्वा राजललनाश्चित्तदर्पणमार्जनम् / तत्रैव निश्चलास्तस्थुस्ताश्चित्रलिखिता इव // KAव्क्_२९.५४ //
2769 SK प्रबुद्धो ऽथ नृपः क्षिप्रं नापश्यद्दयिताः पुरः / ददर्श वनमन्विष्य परिवार्य स्थिता मुनिम् // KAव्क्_२९.५५ //
2770 SK भुजङ्गस्ता विलोक्यैव श्वसन्नीर्ष्याविषाकुलः / विससर्ज वरोचूपहलाहलमिवोत्कटम् // KAव्क्_२९.५६ //
2771 SK कस्त्वं मुनिव्यञ्जनया चित्रकृत्रिममात्रया / मुष्णासि मुग्धगृदया नूनं नारीप्रतारकः // KAव्क्_२९.५७ //
2772 SK परस्त्रीहरणे ध्यान जपस्तद्विघ्नवारणे / धूर्तानां परमोपायः सरलाश्वासनं तपः // KAव्क्_२९.५८ //
2773 SK मुखमाधुर्यधूर्तस्य वृत्तिर्वल्कलिनस्तव / अहो नु मोहजननी वने विषतरोरिव // KAव्क्_२९.५९ //
2774 SK मुनिकल्पसमाकल्पश्चरितं पुनरीदृशम् / सिद्धिं संभावितां वापि वेत्ति कस्तत्त्वमान्तरम् // KAव्क्_२९.६० //
2775 SK इत्युक्ते भूभुजा क्रोधादक्रोधमधुराशयः / निर्विकारेण मनसा क्षान्तिवादी जगाद् तम् // KAव्क्_२९.६१ //
2776 SK क्षान्तिवादी मुनिरहं न मां शन्कितुमर्हसि / एतासु निर्विशेषो मे कान्तासु च तलासु च // KAव्क्_२९.६२ //
2777 SK इति तेनोक्तमाकर्ण्य क्षान्तं पश्यामि ते ऽधुना / इति ब्रुवाणश्चिच्छेद हस्तौ तस्यासिना नृपः // KAव्क्_२९.६३ //
2778 SK विशसे ऽपि क्षमाशीलं निविकारं विलोक्य तम् / चकर्त चरणौ तस्य प्रशमाय समत्सरः // KAव्क्_२९.६४ //
2779 SK प्रदिशन्त्यशिवं मार्गे जिह्वया दूषयन्ति च / लुम्पन्त्यङ्गानि पर्यन्ते खलाः कौलेयका इव // KAव्क्_२९.६५ //
2780 SK ताडने ऽपि क्षमासक्ताः स्कन्धच्छेदे ऽपि मौनिनः / शीतलास्तीव्रतापे ऽपि सरलाः सरला इव // KAव्क्_२९.६६ //
2781 SK निकृत्तपाणिचरणः स संस्तभ्य पृथुव्यथाम् / रक्षन् मन्युमनःक्षोभं क्षमया समचिन्तयत् // KAव्क्_२९.६७ //
2782 SK त्यक्तान्यकर्मणानेन च्छिन्नान्यङ्गाणि मे यथा / संसारविषमक्लेशच्छेदं कुर्यामहं तथा // KAव्क्_२९.६८ //
2783 SK कोपमोहादवज्ञाय नृपतौ भ्रातरं मुनिम् / पुरीं प्रयाते रजसा शोकम्लानेव भूरभूत् // KAव्क्_२९.६९ //
2784 SK ततस्तद्दुःखकुपिता राज्ञे तत्क्षान्तिदेवता / चक्रे नगर्यां दुर्भोक्षमरकावृष्टिविप्लवम् // KAव्क्_२९.७० //
2785 SK नैमित्तिकेभ्यो विज्ञाय राजामुनिपराभवात् / देवताकोअपजं दोषं तं प्रसादयितुं ययौ // KAव्क्_२९.७१ //
2786 SK निपत्य पादयोस्तस्य क्षमस्वेत्यभिधाय सः / पश्चात्तापविषादेन निश्चेतन इवाभवत् // KAव्क्_२९.७२ //
2787 SK तमब्रवीत्क्षान्तिवादी राजन् मन्युर्न मे ऽण्वपि / कर्मरेखापरिच्छेदादीदृशी भवितव्यता // KAव्क्_२९.७३ //
2788 SK सर्वाणि न गणयति स्वच्छन्दा भवितव्यता / न धैर्यं न गुणं नार्थं न तपो नापि गौरवम् // KAव्क्_२९.७४ //
2789 SK अन्त्रस्थितप्रसवबीजपरंपराणि भिन्नानि कालपरिपाकविचित्रितानि / जन्मस्थले विपुलमूलबलस्य जन्तुर्भुङ्क्ते फलानि निजकर्ममहीरुहस्य // KAव्क्_२९.७५ //
2790 SK त्वयि तस्मान्न मे कश्चिद् विकारो ऽस्ति महीपते / सत्येनानेनमे पश्य रुधिरं क्षीरतां गतम् // KAव्क्_२९.७६ //
2791 SK अङ्गच्छेदे ऽप्यकलुषि बभूव यदि मे मनः / सत्येनैतेन श्चिष्टानि तान्येवाङ्गानि सन्तु मे // KAव्क्_२९.७७ //
2792 SK इति शुद्धधियस्तस्य तीब्रसयोपयाचनात् / श्लिष्टान्यङ्गानि तान्येव सहसा स्व् आस्थ्यमाययुः // KAव्क्_२९.७८ //
2793 SK मुकुटस्पृष्टचरणस्तमुवाच नृपस्ततः / मुने महाप्रभावो ऽसि तपसा तत्किमिच्छसि // KAव्क्_२९.७९ //
2794 SK पुण्यहस्तावलम्बेन म्फान्धं करुणानिधे / पापावसाने पतितं मां त्वमुद्धर्तुमर्हसि // KAव्क्_२९.८० //
2795 SK इत्यर्थितः क्षितीशेन प्रत्यभाषत तं मुनिः / संतारणाय मग्नानां बद्धानामपि मुक्तये // KAव्क्_२९.८१ //
2796 SK आश्वाशनाय भीतानां निर्वाणाय विमुह्यताम् // KAव्क्_२९.८२ //
2797 SK यदा तु सम्यक्संबोधिं तामवाप्नोष्यनुत्तराम् / मोहच्छेदं करिष्यामि तदा ज्ञानासिना तव // KAव्क्_२९.८३ //
2798 SK प्रययौ मुनिरित्युक्त्वा तमामन्त्र्य स्वमाश्रमम् / तमेव मनसा ध्यायन् राजधानीं नृपो ऽप्यगात् // KAव्क्_२९.८४ //
2799 SK क्षान्तिवादी स एवाहं कौण्डिन्यः कालभूरयम् / आसाद्य सम्यक्संबोधिमृद्धृतो ऽयं मयाधुना // KAव्क्_२९.८५ //
2800 SK इति सुगतमुखारविन्दनिर्मितमधुरमधुप्रतिमं वचः प्रसन्नम् / भ्रमरभव इवोदितप्रमोदः किमपि बभूव निपीय भिक्षुसंघः // KAव्क्_२९.८६ //
2801 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां काशीसुन्दरावदानं नाम ऊनत्रिंशः पल्लवः //
2802 SK ३०. सुवर्णपार्श्वावदानम् /
2803 SK श्लाष्यः को ऽपि स सत्त्वसारसरलः सौजन्यपुण्यस्थितिर् निन्द्य को ऽपि स धर्ममार्गगमने विघ्नः कृतघ्नः परम् / चित्रं यच्चरितं विचार्य सुचिरं रोमाञ्चचर्चाचितस् तुल्यं याति जनः सबाष्पनयनस्तद्वर्पने मूकताम् // KAव्क्_३०.१ //
2804 SK देवदत्तप्रसङ्गेन भिक्षुभिर्भगवान् पुरा / पृष्टः कथामकथयत् पूर्ववृत्तान्तसंश्रयाम् // KAव्क्_३०.२ //
2805 SK महेन्द्रसेननामाभूद् वाराणस्यां नरेश्वरः / ययुः क्षितीश्वराः सर्वे यस्य लक्ष्म्या विलक्षताम् // KAव्क्_३०.३ //
2806 SK चन्द्रप्रभाभवत्तस्य दिव्यकीर्तिरिव प्रिया / यस्याः पत्युः प्रभावेण स्वप्नाः सत्यत्वमाययुः // KAव्क्_३०.४ //
2807 SK बभूव समये तस्मिन् मृतयूथपतिर्वने / सुवर्णपार्श्व इत्याप्तनामा हेममयच्छविः // KAव्क्_३०.५ //
2808 SK नीलरत्नोदरास्फरमुक्ताहारनिभप्रभा / अभूद्दृष्टिच्छटा यस्य भूषणं काननश्रियः // KAव्क्_३०.६ //
2809 SK प्रवालवल्लिशृङ्गस्य चित्ररत्नचितत्वचः / तस्याश्चर्यसुधाम्भोधिलहरी रुरुचे रुचिः // KAव्क्_३०.७ //
2810 SK बोधिसत्त्वावतारस्य तस्य कान्तमभूद्वपुः / पूर्वं सुकृतचित्रस्य लक्षणं हि सुरूपता // KAव्क्_३०.८ //
2811 SK दीर्घदृष्टिर्बभूवास्य वयस्यो वृद्धवायसः / लब्धकान्वेषणत्रासे दिग्विलोकनतत्परः // KAव्क्_३०.९ //
2812 SK तौ कथाभिर्मिथः प्रीत्या विविक्तेषु विजस्रतुः / प्राक्पुण्यैर्जायते वाणी तिरश्चामपि माणुषी // KAव्क्_३०.१० //
2813 SK स कदाचिज्जलान्वेषी यथूनाथः सहानुगैः / तटिन्या वेणुमालिन्याः पुलिनं समुपाययौ // KAव्क्_३०.११ //
2814 SK तस्य तारतरं श्रुत्वा दीर्घमाक्रन्दनिश्वनम् / हरिणा दुद्रुवुः सर्वे ग्रीवावलनविभ्रमैः // KAव्क्_३०.१२ //
2815 SK सुवर्णपार्श्वस्तु तदा कृपापाशवशीकृतः / तत्रैव निश्चलस्तस्थौ मर्मविद्ध इवेषुणा // KAव्क्_३०.१३ //
2816 SK तदुद्धरणसंनद्धं दीर्घदृष्टिं विलोक्य तम् / काकः प्रोवाच न सखे युक्तो ऽतं ते समुद्यमः // KAव्क्_३०.१४ //
2817 SK पुष्पोपमा विपत्काले कृतार्थाः कुलिशोपमाः / कृतमेते न मन्यन्ते स्वकायसुहृदः खलाः // KAव्क्_३०.१५ //
2818 SK इत्यसौ वार्यमाणो ऽपि काकेन करुणाकुलः / अवतीर्याशु सरितं सरलस्तमतारत(?) // KAव्क्_३०.१६ //
2819 SK विमुच्य बन्धनान्यस्य स शृङ्गाभ्यामशङ्कितः / तं पादपतितं दीनमवदद्गन्तुमुद्यतम् // KAव्क्_३०.१७ //
2820 SK न त्वया कथनीयो ऽहमत्रस्थः कस्यचित्सखे / प्रार्थयन्ते सुवर्णं मां चर्मलुब्धा हि लुब्धकाः // KAव्क्_३०.१८ //
2821 SK इत्युक्तस्तेन विनयात् तत्तथेत्यभिधाय सः / ययौ कुटिलकाख्यस्तं प्रणम्य प्रस्तुतस्तुतिः // KAव्क्_३०.१९ //
2822 SK अत्रान्तरे नरपतेः पत्नी चन्द्रप्रभा निशि / स्वप्ने ददर्शासनस्थं मृगं सद्धर्मवादिनम् // KAव्क्_३०.२० //
2823 SK सत्य्स्वप्नाथ सा देवी प्रबुद्धा नृपमब्रवीत् / सुवर्णहरिणः स्वप्ने देव दृष्टो मयाद्भुतः // KAव्क्_३०.२१ //
2824 SK तमहं द्रष्टुमिच्छामि साक्षादुपगतं मृगम् / अङ्कादिव मृगाङ्कस्य निर्गतं राहुशङ्कया // KAव्क्_३०.२२ //
2825 SK इत्युक्तः प्रणयात्प्रीतो देव्या च पृथिवीपतिः / मृगग्रहाय व्यसृजत् लुब्धकान् द्रविणप्रदः // KAव्क्_३०.२३ //
2826 SK ततः प्रतिनिवृत्तास्ते वनमन्विष्य लुब्धकाः / निष्फलागमनक्रुद्धं सकम्पा जगदुर्नृपम् // KAव्क्_३०.२४ //
2827 SK इयतीं जगती देव विचिता निचिताचलैः / भ्रान्ता वयमविश्रान्ता न लभ्यस्तद्विधो मृगः // KAव्क्_३०.२५ //
2828 SK आश्चर्यरचनाकृष्टलोचनश् चारुलोचनः / स्वप्नसंपन्नरूपो ऽसौ हिरण्यहरिणः कुतः // KAव्क्_३०.२६ //
2829 SK मनो विनोदने तस्मिन् यदि देव प्रसीदति / कुर्वन्तु काञ्चनमृगं कुशलाः के ऽपि शिल्पिनः // KAव्क्_३०.२७ //
2830 SK इति श्रुत्वा स नृपतिर्ददद्बहुतरं धनम् / मृगान्वेषणसंकल्पे बभूवाभिनिवेशवान् // KAव्क्_३०.२८ //
2831 SK ततः कुटिलको ऽभ्येत्य नृपं श्रुत्वा बहुप्रदम् / उवाच द्रविणादाने लुब्धकेभ्यो ऽपि लुब्धधीः // KAव्क्_३०.२९ //
2832 SK प्रसादः क्रियतां देव मृगं संदर्शयाम्यमह् / दृष्टः कनकसाराङ्ग सारङ्गः समया वने // KAव्क्_३०.३० //
2833 SK इत्याकर्ण्य क्षितिपतिः प्रहर्षित्फुल्ललोचनः / भद्र संदर्शय क्कासौ क्कासावित्यवदन्मुहुः // KAव्क्_३०.३१ //
2834 SK तमेवाग्रेसरं कृत्वा मृगमार्गप्रदर्शकम् / ससैन्यः स ययौ स्वच्छच्छत्रचन्द्रोदयाचलः // KAव्क्_३०.३२ //
2835 SK दीर्घदृष्टिर्ददर्शाथ काकस्तरुशिरःस्थितः / गजवाजिव्रजोदीर्णरेणुप्रवारणं वनम् // KAव्क्_३०.३३ //
2836 SK सुवर्णपार्श्वमभ्येत्य जगाद मृययूथपम् / हितमुक्तं मया पूर्वं न श्रुतं न कृतं त्वया // KAव्क्_३०.३४ //
2837 SK स एष पुरुषः प्राप्तः संनद्धैः सह धन्विभिः / मया निवारितेनापि संहारेण न तृप्यते // KAव्क्_३०.३५ //
2838 SK अधुना क्क नु गन्तव्यं किं कर्तव्यं भयोद्भवे / हितं किमनुवर्तव्यं तुल्यं मर्तव्यमेव वा // KAव्क्_३०.३६ //
2839 SK कृतघ्नः क्रूरचरितः क्षुद्रो ऽयं संघपातकह् / त्वयैवात्मविनाशाय रक्षितो विषपादपः // KAव्क्_३०.३७ //
2840 SK स्वशरीरप्रदस्यापि संहारेण न तृप्यते / ससत्त्वसागरग्रासी कृतघ्नो वाडवानलः // KAव्क्_३०.३८ //
2841 SK उपकारः कृतघ्नेषु विश्वासः कुटुलात्मसु / उपदेशश्च मूर्खेषु कर्तुर्दोषाय केवलम् // KAव्क्_३०.३९ //
2842 SK इति काकेन कथिते प्रत्यासन्ने च पार्थिवे / अचिन्तयत् प्राप्तकालं हितं यूथस्य यूथपह् // KAव्क्_३०.४० //
2843 SK सुभटानामियं सेना विगाहेद्गहनं महत् / करोति मत्प्रसङ्गेन मुहूर्तेनैव निर्मृगम् // KAव्क्_३०.४१ //
2844 SK तस्मात्सैन्यप्रधानस्य गच्छामि स्वयमन्तिकम् / एकस्यैव वधो मे ऽस्तु सर्वे जीवन्त्वमी मृगाः // KAव्क्_३०.४२ //
2845 SK इति निश्चित्य स ययौ समीपं भूपतेर्मृगः / परप्राणपरित्राणे तृणं प्राणां महात्मनाम् // KAव्क्_३०.४३ //
2846 SK तमायान्तं द्रुतं दृष्ट्वा हृष्टः कुटुलकह् पुरः / सो ऽयमित्याशु पाणिभ्याम् राज्ञे दूरे व्यदर्शयत् // KAव्क्_३०.४४ //
2847 SK तत्क्षणे द्रोणशापेन वज्रेणेव निपातिना / करु परिच्युतौ तस्य पापपादपपल्लवौ // KAव्क्_३०.४५ //
2848 SK तद्वृत्तं विस्मितः श्रुत्वा मृगेण कथितं नृपः / अभूत्कृतघ्नचरिते धिक्कारमुखराननः // KAव्क्_३०.४६ //
2849 SK ततः क्षितिपतिः प्रीत्या परया मृगम् / तम् निनाय स्वनगरीं गौरवेण गरीयसा // KAव्क्_३०.४७ //
2850 SK राजधानीमथासाद्य तस्मै रत्नासनं नृपः / दत्वा सान्तःपुरामात्यस्तस्याग्रे समुपाविशत् // KAव्क्_३०.४८ //
2851 SK स बोधिसत्त्वो हरिणस्तस्यां पर्षदि दिव्यधीः / धर्मं दिदेश येनाभूज्जनः शिक्षापदान्वितः // KAव्क्_३०.४९ //
2852 SK सुवर्णपार्श्वः सारङ्गः सो ऽयमेवाभवं पुरा / यो ऽभवत् कुटिलः क्रूरो देवदत्तः स चाधुना // KAव्क्_३०.५० //
2853 SK इति सुकृतचितं भगवता भवभीतिभिदा कथितमुदारसत्त्वरुचिरस्य ततश्चरितम् / प्रशममयं निशम्य कुशलाय स भिक्षुगणः किमपि बभूव पुण्यपरिपाकविवेकरुचिरः // KAव्क्_३०.५१ //
2854 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां सुवर्णपार्श्वावदानं त्रिंशः पल्लवः //
2855 SK ३१. कल्याणकार्यवदानम् /
2856 SK प्रत्यक्षलक्षणपरीक्षित एष लोके संलक्ष्यते सुजनदुर्जनयोर्विशेषः / अर्कः प्रकाशविशदं विदधाति विश्वमन्धीकरोति निखिलं जगदन्धकारः // KAव्क्_३१.१ //
2857 SK सर्वज्ञः पूर्ववृत्तान्तमशेषमवलोकयन् / अस्मिन्नेव कथारम्भे भगवान् पुनरब्रवीत् // KAव्क्_३१.२ //
2858 SK नृपः पातलिपुत्राख्ये पुरे भूमिपुरंदरः / अभूत्पुरंदरो नाम मन्दिरं पुण्यसंपदः // KAव्क्_३१.३ //
2859 SK कल्याणकारी तस्याभूत् सूनुर्गुणगणोन्नतः / अकल्याणाभिधानश्चद्वितीयो निर्गुणः सुतः // KAव्क्_३१.४ //
2860 SK कल्याणकारी सर्वार्थिकरुणाकल्पपादपः / छत्रावशेषामकरोद् दाणशीलः श्रियं पितुः // KAव्क्_३१.५ //
2861 SK तस्मै मनोरमां नाम पुण्यसेनो महीपतिः / दूतं विसृज्य लेखेन स्वसुताम् व् अचसा ददौ // KAव्क्_३१.६ //
2862 SK प्रत्यासन्नविवाहो ऽथ नृपं राजसुतो ऽभ्यधात् / प्राप्तः परिणयस्तात संप्रत्येष न मे मतः // KAव्क्_३१.७ //
2863 SK वात्सल्यपेशलतया मदात्ताः प्रकृतिश्रियः / मया दानव्यसनिना कोषस्ते शुषिरीकृतः // KAव्क्_३१.८ //
2864 SK तस्मात्प्रवहणेनाहं समुत्तीर्य महोदधिम् / रत्नद्वीपं व्रहाम्येव दिव्यरत्नार्जनोद्यतः // KAव्क्_३१.९ //
2865 SK दिव्यसंपदमासाद्य करिष्ये दारसंग्रहम् / कलत्रमकृतार्थस्य त्रासनं सुखसंपदाम् // KAव्क्_३१.१० //
2866 SK इयुक्त्वा स पितुः प्राप्य शासनं चरणानतः / जगाहे जलधिं लोलकल्लोलालिङ्गिताम्बरम् // KAव्क्_३१.११ //
2867 SK भ्राता तमनुवज्राज सौजन्यव्यञ्जनो ऽनुजः / निर्गुणः सगुणद्वेषद्रोहमन्तर्विचिन्तयन् // KAव्क्_३१.१२ //
2868 SK ज्येष्ठस्तमब्रवीद्वत्स समुद्रे कर्मविप्लवात् / अहं ग्राह्यस्त्वया स्कन्धे जाते प्रवहणक्षये // KAव्क्_३१.१३ //
2869 SK इति भ्रात्रा कृताश्वासस्तथेत्यूवे स तं शठः / दोषोद्यतः प्रणयितां खलः समवलम्बते // KAव्क्_३१.१४ //
2870 SK ततः प्रवाहणारूढः पवनैरनुकूलताम् / यातैः पुण्यैरिव प्राप्य रत्नद्वीपं नृपात्मजः // KAव्क्_३१.१५ //
2871 SK दोव्यरत्नानि संप्राप्य प्रत्यावृत्ते ततः शनैः / राजपुत्रे प्रवहणं द्रागभञ्जत् प्रभञ्जनः // KAव्क्_३१.१६ //
2872 SK भग्ने प्रवहणे तस्मिन् भ्रातरं पूर्वसंविदा / स जग्राह शठः कण्ठे तं भुजङ्ग इवानुजः // KAव्क्_३१.१७ //
2873 SK कर्मवातेरितस्तूर्णं कूलं प्राप्य नृपात्मजः / अवाप सहसा निद्रामान्ध्यप्रथमदूतिकाम् // KAव्क्_३१.१८ //
2874 SK तस्य सुप्तस्य रत्नानि दृष्ट्वा बद्धान्यथानुजः / प्रहर्तुं व्यसनच्छिद्रे क्रूरः समुपचक्रमे // KAव्क्_३१.१९ //
2875 SK उत्पाट्य गाढबद्धस्य स तस्य नयनाम्बुजम् / तं तारकं भयाम्भोधौ चकार गततारकम् // KAव्क्_३१.२० //
2876 SK आत्तरत्ने गते तस्मिन् वाजसूनुर्गतद्युतिः / मातङ्गोन्मूलिताम्भोज इवाभूत्कमलाकरः // KAव्क्_३१.२१ //
2877 SK स बभूव निरालोकः शोकतीव्रतमोवृतः / कृष्णपक्षक्षपारम्भ इव सूर्येन्दुवर्जितः // KAव्क्_३१.२२ //
2878 SK अत्रान्तरे समायातस्तं देशं गोकुशाधिपः / राजपुत्रं विलोक्यान्धमभूत् संक्रान्ततद्व्यथह् // KAव्क्_३१.२३ //
2879 SK स तं नीत्वा स्वनिलयं परिचर्यापरः पार्ः / तस्यासीद्गुणसौजन्यस्नेहावेशवशीकृतः // KAव्क्_३१.२४ //
2880 SK तत्र शोकसुजां शान्त्यै सदा चेतोविनोदिनीम् / वीणां स्वरप्रवीणो ऽसौ पूर्वाभ्यस्तमवादयत् // KAव्क्_३१.२५ //
2881 SK सत्संगमः पृथुविवेककथाभोयोगः काव्यासवः प्रियसुहृत्प्रणयो विहारः / वीणास्वनह् कुसुमकान्तवनान्तवासः शोकाग्नितप्तमनसाममृतावगाहः // KAव्क्_३१.२६ //
2882 SK तस्य गोपपतेः पत्नी तीगवीणाविचक्षणा / पश्यन्ती राजतनयं प्रययौ साभिलाषताम् // KAव्क्_३१.२७ //
2883 SK कृतोपदेशा सततं कुटिला वीणयेव सा / मूर्च्छन्ती नवरागेण सोत्कण्ठा समचिन्तयत् // KAव्क्_३१.२८ //
2884 SK सुभगो ऽयं ममातीव दृशि चित्ते च चर्तते / निवर्तते न मे तापः प्रेम्णि चेन्न प्रवर्तते // KAव्क्_३१.२९ //
2885 SK धन्येयं नखसंपातैः क्कणन्ती रागिणीमुहुः / यातास्य वल्लकी पुण्यैरङ्कारोहणयोग्यताम् // KAव्क्_३१.३० //
2886 SK इति संचिन्त्य सा स्वैरं तमुवाच सविभमम् / स्पृशन्ती तत्कराम्भोजं सकम्पकरपल्लवा // KAव्क्_३१.३१ //
2887 SK ललनासुलभां लज्जां ममेदं त्वद्गतं मनः / अकृतज्ञ इव प्रीतिं न संस्मरति मानद // KAव्क्_३१.३२ //
2888 SK न शीलं न कुलाचारं नाभिमानं न संशयम् / अपेक्षन्ते स्मरक्षिप्ता वैलक्ष्यरहिताः स्त्रियः // KAव्क्_३१.३३ //
2889 SK प्रणयान्मम सङ्कल्पं सफलं कर्तुमर्हसि / भवन्ति मानिताः प्रीत्यै देवता इव योषितः // KAव्क्_३१.३४ //
2890 SK इति तस्य वचः श्रुत्वा भिन्नस्वरविशृङ्खलम् / चपलां राजपुत्रस्तां त्रस्तान्तःकर्णो ऽवदत् // KAव्क्_३१.३५ //
2891 SK नेयं मातः समुचिता सतः शीलपरिच्युतिः / धिक्किल्बिषविषस्पृष्टः नष्टशीलस्य जीवितम् // KAव्क्_३१.३६ //
2892 SK पराङ्गनापरिष्वङ्गमङ्गैरङ्गीकरोति यः / आलिङ्गति पतङ्गो ऽयं नरकाग्निशिखां पुनह् // KAव्क्_३१.३७ //
2893 SK परोपकारनिरताह् परदारनिरादराः / ये ऽप्यहिंसाव्यसनिनस्ते जीवन्ति मृताः परे // KAव्क्_३१.३८ //
2894 SK इति तेनोक्तमाकर्ण्य साभूद्भग्नमनोरथा / निधनाभ्यधिकः प्रीतिप्रतिषेधो हि योषिताम् // KAव्क्_३१.३९ //
2895 SK ततः स्वपतिमभ्येत्य भुजङ्गी भङ्गमागते / मनोरथे मन्युविषं वमन्तीव जगाद सा // KAव्क्_३१.४० //
2896 SK परवत्सलता साधो दोषाय सरलस्य ते / को ह्यविज्ञातशीलानां स्वाधीनीकुरुते गृहम् // KAव्क्_३१.४१ //
2897 SK परेषु भृशमाश्वासं स्पृशतस्ते न शोभनम् / गुप्तं चित्तं च वित्तं च जनो जानाति कस्य कः // KAव्क्_३१.४२ //
2898 SK परदारसहस्राक्षस्त्वयान्धः स गृहे धृतः / दीनान्धजनवात्सल्यात् पश्य तस्योचितं फलम् // KAव्क्_३१.४३ //
2899 SK अद्याहं तेन विजने संगमे भृशमर्थिता / यद्यस्य नयने स्यातां स्यात् कथं मे पलायनम् // KAव्क्_३१.४४ //
2900 SK इत्युक्तः स तया कोपात्तप्तो गोपपतिर्भृशम् / द्वरे निष्कास्य तं चक्रे गेहं चित्तं च शीतलम् // KAव्क्_३१.४५ //
2901 SK पिता त्यजति यत्पुत्रं सुहृन्मित्रं निहन्ति यत् / बन्धुच्छेदासिधाराणां तद्दाराणां विजृम्भितम् // KAव्क्_३१.४६ //
2902 SK भ्रुवोर्दृशोर्यत्कौटिल्यं यत्तैक्ष्ण्यं यच्च चापलम् / कुचयोर्यच्च काठिन्यं तत्सर्वं हृदि योषिताम् // KAव्क्_३१.४७ //
2903 SK कल्याणकारिसार्थेन पथः संतारितं शनैः / पितरि त्रिदिवं याते शुश्राव भ्रातरं नृपम् // KAव्क्_३१.४८ //
2904 SK स पुरं पुण्यसेनस्य श्वशुरस्य महीपतेः / कालेन प्राप्प दूराध्वक्लेशप्रशमबान्धवम् // KAव्क्_३१.४९ //
2905 SK अत्रान्तरे सुता तत्र महीभर्तुर्मनोरमा / वाचा दत्ता पुरा यस्मै तस्मिन्नब्धिच्युते श्रुते // KAव्क्_३१.५० //
2906 SK आहूतेषु नरेन्द्रेषु निविष्टेषु यथाक्रमम् / आरुह्य रत्नशिबिकां स्वयंवरभुवं ययौ // KAव्क्_३१.५१ //
2907 SK विलोकयन्ती भूपालान् सा शनैश्चललोचना / यदृच्छयागतं तत्र राजपुत्रं ददर्श तम् // KAव्क्_३१.५२ //
2908 SK अन्धो ऽपि तस्याः सहस् आस ययौ प्रियतां दृशोः / ग्रहमध्ये कुमुद्वत्या मेघान्धो ऽपि प्रियः शशी // KAव्क्_३१.५३ //
2909 SK नृपेषु प्रतियातेषु विलक्षेष्वफलागमात् / महीपतिसुतान्तस्तं वव्रे गुणविनिर्गतम् // KAव्क्_३१.५४ //
2910 SK सापु हारं परिक्षिप्य कण्ठे तस्यायतेक्षणा / शनकौर्मधुरालापा त्वद्वशास्मीत्युवाच तम् // KAव्क्_३१.५५ //
2911 SK स्त्रीवृत्तचकितः सो ऽपि विजने तामभाषत / प्रज्ञादरिद्रया नेदं स्त्रिया युक्तं कृतं त्वया // KAव्क्_३१.५६ //
2912 SK स्मरसौहार्दमित्रेषु पद्मनेत्रेषु राजसु / स्थितेषु वन्ध्यजन्मान्धः कस्मादस्मि वृतस्त्वया // KAव्क्_३१.५७ //
2913 SK अन्यवक्र्क्रावलोकिन्यो जायाश्चक्षुष्मतामपि / वधूः किं पुनरन्धस्य दिने ऽप्यन्याभिसारिका // KAव्क्_३१.५८ //
2914 SK ललनाभिर्न मे कृत्यं प्रत्ययस्तासु नास्ति मे / कुलकूलनिपातिन्यो निम्नगाः कुटिलाः स्तियः // KAव्क्_३१.५९ //
2915 SK इत्युक्ता तेन परुषं लज्जालोला नृपात्मजा / तमूचे नाथ सर् वत्र न शङ्कां कर्तुमर्हसि // KAव्क्_३१.६० //
2916 SK दृष्टदोषः क्कचिन्नार्याम् यदि त्वमतिशङ्कितः / अदुष्टापि त्वया नाम तद्व्याप्ता क्रियते कथम् // KAव्क्_३१.६१ //
2917 SK त्वय्येव यदि मे प्रीतिरनन्यशरणम् मनः / तेन सत्येन ते नेत्रमेकं भवतु निर्मलम् // KAव्क्_३१.६२ //
2918 SK इत्युक्तमात्रे सुदृशा दक्षिणं तस्य लेचनम् / सत्यानुभावेनाभूत्तत्प्रफुल्लकमलोपमम् // KAव्क्_३१.६३ //
2919 SK राजपुत्रः प्रहृष्टो ऽथ ताम् प्रसाद्य सिलोचनाम् / उवाच तन्मुखाम्भोजलावण्यगुणचिस्मित्ः // KAव्क्_३१.६४ //
2920 SK कल्याणकारी सुभगः स एवाहं नृपात्मजः / यस्मौ पुरा त्वं गुरुणा वचसा प्रतिपादिता // KAव्क्_३१.६५ //
2921 SK स एवाहं यदि परं निर्वैरः पाटने दृशः / तेन सत्येन नयनं स्वस्थं भवतु मे ऽपरम् // KAव्क्_३१.६६ //
2922 SK सत्योपयाचनेनेति सहसैवास्य लोचनम् / द्वितीयमपि वैमल्यमवाप सह चेतसा // KAव्क्_३१.६७ //
2923 SK ततो विदितवृत्तेन पुण्यसेनेन भूभुजा / कृतसाहाय्यकः प्राप स्वराज्य स प्रियासखः // KAव्क्_३१.६८ //
2924 SK कल्याण्कारी यः सो ऽहं देवदत्तः स चानुजः / तेन पूर्वानुभावेन तद्विधो ऽद्यापि वर्तते // KAव्क्_३१.६९ //
2925 SK इत्युदारमुपकारनिर्मलं बोधिसत्त्वचरितं निशम्य ते / भिक्षवः खल्विचेष्टितं च तत्तुल्यमप्रतिमविस्मयं ययुः // KAव्क्_३१.७० //
2926 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां कल्याणाकार्यवदानमेकत्रिंशः पल्लवः //
2928 SK वामाः सज्जनवामाः प्रायेण भवन्ति नीरोगिण्यः / तिमिरोन्मुखी सरागा क्षिपति रविं भूधरात्संध्या // KAव्क्_३२.१ //
2929 SK देवदत्तस्य चरिते बहुजन्मान्तराश्रये / कथिते ऽपि पुनः प्राह भगवान् ज्ञानसागरः // KAव्क्_३२.२ //
2930 SK पुरा कलिङ्गविषये नृपतिः शत्रुभङ्गकृत् / श्रीमानभूदशोकाख्यः प्रख्यातासंख्यविक्रमः // KAव्क्_३२.३ //
2931 SK तस्य शाखः प्रशाखश्च चत्वारः सदृशाः सुताः / अनुशाखो विशाखश्चेत्यभवन् भुवि विश्रुताः // KAव्क्_३२.४ //
2932 SK तारुण्यमत्तास्ते पित्रा सपत्नीकाः प्रवासिताह् / सविकारनिकारेण पुत्रस्नेहो ऽपि नश्यति // KAव्क्_३२.५ //
2933 SK ते शनैः क्षीणपाथेया दुर्दशामिव दुःसहाम् / विकटामटवीं प्राप्यं क्षुत्क्षामाः समचिन्तयन् // KAव्क्_३२.६ //
2934 SK एताः स्त्रियो विपत्काले गुल्फबन्धनशृङ्खलाः / कृच्छ्रलब्धे च भागिन्यः स्थिताः पर्णाशने ऽपि नः // KAव्क्_३२.७ //
2935 SK इति चिन्तयतामासीत् तेषां स्त्रीबधनिश्चयह् / दुर्दशादग्धभाग्यानां घोरा संजायते मतिः // KAव्क्_३२.८ //
2936 SK तेषां मध्याद्विशाखस्तु पापसंकल्पशङ्कितः / भार्यामादाय कृपया पलाय्य प्रययौ पृथक् // KAव्क्_३२.९ //
2937 SK सा कलङ्कवती नाम भृशं वैक्लव्यमागता / दूराध्वधावनश्रान्ता मूर्च्छिता न्यपतद्भुवि // KAव्क्_३२.१० //
2938 SK ततः सा करुणार्द्रेण भर्त्रा प्राणक्षयक्षणे / शरावेधसमुद्भूतं पायिता निजशोणितम् // KAव्क्_३२.११ //
2939 SK ताम् रक्तपानसंप्राप्तजीविताम् सत्त्वसागरः / स्वाङ्गं निष्कृत्य मांसेन प्राणवृत्तिमकारयत् // KAव्क्_३२.१२ //
2940 SK निर्जलं घोरकान्तारं समुत्तीर्य क्रमेण तौ / प्रच्छायपादपश्यामं प्राप्तौ गिरिनदीतटम् // KAव्क्_३२.१३ //
2941 SK विश्रान्तयोस्तयोस्तत्र कृत्तपादकरो नरः / तीव्राक्रन्दी नदीवेगेनोह्यमानः समाययौ // KAव्क्_३२.१४ //
2942 SK दृष्ट्वैव करुणाश्लिष्टः कष्टां विपदमाश्रितः / विगाह्य सरितं दोर्भ्यां विशाखस्तमतारयत् // KAव्क्_३२.१५ //
2943 SK ततः प्रत्यागतप्राणां तोयमूलफलादिभिः / स तं चक्रे दिनैरेव संरूढच्छेदनिर्व्यथम् // KAव्क्_३२.१६ //
2944 SK स्वस्थो ऽपि गतिवैकल्यान्नैव गन्तुं क्कचित् क्षमः / स तस्थौइ तत्र तत्पत्न्या काले कलितभोजनह् // KAव्क्_३२.१७ //
2945 SK राजपुत्रस्तु जायायामभूद्विरलसंगमः / सिंहाल्परतयः शूराः प्रायेण विजिगीषवः // KAव्क्_३२.१८ //
2946 SK दिव्यौषधिरसाहारपरिपूर्णतनुः शनैः / तत्पत्नी विकलायास्मौ चकार सुरतस्पृहाम् // KAव्क्_३२.१९ //
2947 SK स्नेहेन नोपलिप्यन्ते न बध्यन्ते गुणेन च / गुरवे न च सज्जन्ति स्वेच्छस्पर्शसुखाः स्त्रियः // KAव्क्_३२.२० //
2948 SK सा तेन निशि निःशब्दं रममाणा घनस्तनी / निःशङ्कसुरतातृप्ता पतिं विघ्नममन्यत // KAव्क्_३२.२१ //
2949 SK सा पत्युः स्वैरिणी तेन विदधे वधसंविदम् / पापेषु शिक्षाकुशलाः कलुषाः किल योषितः // KAव्क्_३२.२२ //
2950 SK सा शिरःशूलमतुलं वदन्ती स्वस्य छद्मना / चक्रे लिखितपापास्या ललाटे पट्टबन्धनम् // KAव्क्_३२.२३ //
2951 SK तस्याः शिरोरुजां तीव्रां व्यतीतः पार्थिवात्मजः / कारुण्यात्तत्प्रतीकारे तां तां युक्तिमचिन्तयत् // KAव्क्_३२.२४ //
2952 SK विषादचिन्तास्तिमितं श्वसन्तं सा जगाद् तम् / शीतार्तकूजद्भ्रमरा हिमम्लानेव पद्मिनी // KAव्क्_३२.२५ //
2953 SK एवंविधं मे कन्यायाह् शिरःशूलं पुराभवत् / पाषाणभेदलेपेन भिषग्भिश्च निवारितम् // KAव्क्_३२.२६ //
2954 SK पाषाणभेदव्याप्तो ऽयं प्राग्भागो ऽस्य् महीभृतः / राज्ज्वावतीर्य भवता गृह्यतां यदि शक्यते // KAव्क्_३२.२७ //
2955 SK धारयिष्यामि पाणिभ्यामहमालम्बनं तव / इत्युक्तः प्रणयात्पत्नया तथेत्याह नृपात्मजः // KAव्क्_३२.२८ //
2956 SK तत्पाणिधृतरज्ज्वाथ विहितालम्बनः शनैः / सो ऽवतीर्णः शिलास्फालगर्जद्गिरिनदीतटम् // KAव्क्_३२.२९ //
2957 SK भेषजादानसंसक्तः संत्यक्तालम्बनस्तया / स पपात महाश्वभ्रे स्त्रीचित्तचपलाम्भसि // KAव्क्_३२.३० //
2958 SK शुभस्य कर्मणः शेषादभग्नतनुरेव सः / उह्यमानः प्रवाहेण धीरश्चितमचिन्तयत् // KAव्क्_३२.३१ //
2959 SK नारीचित्ताभमावर्तं दर्शयन्त्या निजाशयम् / मम स्त्रीनियमे नूनमुपदेशः कृतो ऽनया // KAव्क्_३२.३२ //
2960 SK दुर्विज्ञेयाः प्रततमतिभिः स्वप्नसंकल्पकल्पा रागद्वेषव्यसनविषमायासविन्याससक्ताः / कामात्कामी सकलजनतामोहने संप्रवृत्ताः पातायैव क्षस्णपरिचितस्यापि मायाः स्त्रियश्च // KAव्क्_३२.३३ //
2961 SK इति संचिन्तयन्नेव नदीवेगेन भूयसा / प्रापितः सुकृतेनेव स पुरीं पुष्करावतीम् // KAव्क्_३२.३४ //
2962 SK तस्मिन्नवसरे तत्र निष्पुत्रे नृपतौ मृते / निमित्तज्ञैर्महामात्यैर्गृहीतः स सुलक्षणः // KAव्क्_३२.३५ //
2963 SK अभिषिक्तः स तैस्तत्र विधिवन्मङ्गलोदकैः / अभूद्विवाहविद्वेषी दृष्टस्त्रीचरिताद्भुतः // KAव्क्_३२.३६ //
2964 SK कलङ्कवत्यपि गिरौ बोधिसत्त्वविवर्जिते / मन्द्वीर्यौषधिः काले वृत्तिच्छेदाकुलाभवत् // KAव्क्_३२.३७ //
2965 SK स्कन्धे भग्नाङ्गमारोप्य सा ग्रामपुरवर्त्मसु / जनं पतिव्रतास्मीति गिरा भिक्षामयाचत // KAव्क्_३२.३८ //
2966 SK परिव्रतागौरवेण सर्वस्तस्यौ ददौ बहु / मिथ्याशीलप्रवादो ऽपि सूते विपदि संपदम् // KAव्क्_३२.३९ //
2967 SK अटन्ती सा शनैः प्राप्ता नगरीं पुष्करावतीम् / सतीति वन्दिता सर्वैर्वृपद्वारान्तिके ययौ // KAव्क्_३२.४० //
2968 SK राजा स्त्रीवृत्तविद्वेषी वन्दते तु पतिव्रताम् / इति संचिन्त्य तद्भक्त्या नृपं प्राह पुहोहितः // KAव्क्_३२.४१ //
2969 SK दूरेदेशान्तराद्देव प्राप्ता कापि पतिव्रता / ययेयं चरणन्यासैर्भूतधात्री पवित्रिता // KAव्क्_३२.४२ //
2970 SK हे देव पश्य तां शाध्वीं स्कन्धारोपितभर्तृकाम् / पतिव्रताप्रणामेन पुंसामायुर्विवर्धते // KAव्क्_३२.४३ //
2971 SK नृपः पुरोहितेनेति तत्संदर्शनमर्थितः / तमुवाच न जानीषे ब्राह्मणः सरले भवान् // KAव्क्_३२.४४ //
2972 SK स्निग्धा स्त्रीति प्रवादो ऽयं निर्व्याजेति मतिभ्रमः / सतीति व्योमपुष्पाप्तिः पापा स्त्रीति न संशयः // KAव्क्_३२.४५ //
2973 SK निष्फलाश्चग्नुरोहिण्यः सरला जनसंगमे / नार्यो वेतसवल्लर्य इव निर्मूलबन्धनाः // KAव्क्_३२.४६ //
2974 SK भेदद्रोहैकशीलाभ्यो दुःशीलाभ्यः स्वभावतः / नमः स्त्रीभ्यो नमः स्त्रीभ्यो नमः स्त्रीभ्यो नमो नमह् // KAव्क्_३२.४७ //
2975 SK दृष्टस्त्रीवृत्तदोषाय तच्चिन्ताव्यथितान्मने / अप्येषा पृथिवी मह्यं रत्नपूर्णा न रोचते // KAव्क्_३२.४८ //
2976 SK नगमृगवधूमुग्धास्तीक्ष्णाः परं परवञ्चने तनुवितरणे सक्ताः पुंसां हरन्ति च जीवितम् / दधति च भयं पुष्पायाते पिबन्ति च पावकं सरलकुटिला नैव ज्ञाता विचारशतैः स्त्रियः // KAव्क्_३२.४९ //
2977 SK तथापि यदि निर्बन्धस्तव पश्यामि तां स्त्रियम् / इत्युक्त्वा हर्म्यमारुह्य ताम् ददर्श नरेश्वरः // KAव्क्_३२.५० //
2978 SK तामेव स परिज्ञाय पापां कृत्ताङ्गसङ्गिनीम् / सचिवेभ्यः क्षितिपतिस्तद्वृत्तान्तं न्यवेदयत् // KAव्क्_३२.५१ //
2979 SK नृपं सापि परिज्ञाय पापा क्षणमधोमुखी / निरस्ता प्रययौ तूर्णं पिहितश्रवणैर्जनैः // KAव्क्_३२.५२ //
2980 SK विशाखनामा नरनाथसूनुः सो ऽहं वधूः सास्य च देवदत्तः / श्रुत्वेतिवृत्तं कथितं जिनेन भिक्षुव्रजस्तच्चरितं निनिन्द // KAव्क्_३२.५३ //
2981 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां विशाखावदानं द्वात्रिंशः पल्लवः //
2982 SK ३३. नन्दीपनन्दावदानम् /
2983 SK स को ऽपि पुण्यप्रशमानुभावः शुद्धात्मनामस्त्यमृतस्वभावः / यस्य प्रभावेण भवन्ति सद्यः क्रूरा अपि क्रोधविषप्रमुक्ताः // KAव्क्_३३.१ //
2984 SK पुरा तथागते जेतवनारामविहारिणि / तदाज्ञया भिक्षुगणे गिरिकाननचारिणि // KAव्क्_३३.२ //
2985 SK सुमेरुपरिषण्डायां स्थित्वा ध्यानपरायणाः / आययुर्भिक्षवः पाण्डुविच्छायवदनाः कृशाः // KAव्क्_३३.३ //
2986 SK ते ऽथ कृत्वा भगवतः पादपद्माभिवन्दनाम् / ऊचिरे भिक्षुभिः पृष्टा देहदौर्बल्यकारणम् // KAव्क्_३३.४ //
2987 SK सुमेरुं त्रिगुणावृत्त्या वेष्टयित्वा व्यवस्थितौ / अदृष्टौ वैनतेयस्य नागौ नन्दोपनन्दकौ // KAव्क्_३३.५ //
2988 SK तौ सदा त्रिविधोच्छ्वासं सृजतः कीर्णपावकम् / भवन्ति भस्म स्पर्शेन सहसैव शिला अपि // KAव्क्_३३.६ //
2989 SK वयं तद्विषनिश्वासैर्निदग्धा ध्यानयोगिनः / विवर्णवदनच्छायाह् केवलं कृशतां गताः // KAव्क्_३३.७ //
2990 SK इति तैः कथिते शास्ता भिक्षुसंघार्थितः पुरः / नागयोर्दमने योग्यं मौद्गल्यायनमादिशत् // KAव्क्_३३.८ //
2991 SK स सुमेरुं समासाद्य शृङ्गैरालिङ्गिताम्बरम् / सुप्तौ ददर्श नागेन्द्रौ योगेनान्तर्हिताकृतिः // KAव्क्_३३.९ //
2992 SK योध्यमानौ शनैस्तेन बुबुधाते यदा न तौ / तदा महानागवपुर्भूत्वा स समवेष्टयत् // KAव्क्_३३.१० //
2993 SK प्रबुद्धौ पीडितौ तेन दृष्ट्वा तं भीषणाकृतिम् / विंद्रुतौ नररूपेण तस्थतुर्भयविह्वलौ // KAव्क्_३३.११ //
2994 SK नागरूपं परित्यज्य कृत्वा रूपं स्वकं ततः / पलायमानावन्योन्यं त् औ मौद्गल्यायनो ऽवदत् // KAव्क्_३३.१२ //
2995 SK नागौ क्क गम्यते तूर्ण भयं संत्यज्यतामिदम् / न स नागः स्थितस्तत्र येन विद्रावितौ युवाम् // KAव्क्_३३.१३ //
2996 SK सर्वथा यदि नस्त्येअ तद्भयाद् यिवयोर्धृतिः / क्रियते किं शरण्यस्य न बुद्धस्याभिवन्दनम् // KAव्क्_३३.१४ //
2997 SK इति तेनोक्तमाकर्ण्य विनयात्तौ तमूचतुः / प्रसादः क्रियतामार्य भगवद्दर्शनेन नौ // KAव्क्_३३.१५ //
2998 SK इति ब्रवाणौ नागेन्द्रौ नीत्वा भगवतो ऽन्तिकम् / स त द्वृत्तान्तमावेद्य प्रणम्य समुपाविशत् // KAव्क्_३३.१६ //
2999 SK भगवानथ नागेन्द्रौ बभाषे शरणागतौ / प्रणामं चक्रतू रत्नप्रभाभूषीतभूतलौ // KAव्क्_३३.१७ //
3000 SK शिक्षापदानि संप्राप्य सर्वभूताभयप्रदौ / शरणप्राप्तिसमयादधुना निर्भयौ युवाम् // KAव्क्_३३.१८ //
3001 SK इत्यालोकनमात्रेण दोषद्वेषविवर्जितौ / कृतौ भगवता सम्यक् जग्मतुस्तं प्रणम्य तौ // KAव्क्_३३.१९ //
3002 SK संदर्शनेनैव महाशयानां प्रभापदेशेन शरीरलग्नैः / सींस्रा अपि द्वेषविषोष्मतप्ताः शमामृतैः शीतलतां व्रजन्ति // KAव्क्_३३.२० //
3003 SK तत्पूर्वजन्मवृत्ताण्तं भिक्षुभिर्भगवान् जिनः / प्रभावविस्मयात्पृष्टः सर्वदर्शी जगादा तान् // KAव्क्_३३.२१ //
3004 SK कृकिर्नाम पुरा श्रीमान् वाराणस्यां नरेश्वरः / काश्यपाख्याद् भगवतः प्राप्तवान् धर्मशासनम् // KAव्क्_३३.२२ //
3005 SK अमात्ययोः स विन्यस्य राज्यं नन्दोपनन्दयोः / बभूव बोधिसंसक्तः सत्यदर्शननिर्वृतः // KAव्क्_३३.२३ //
3006 SK धर्मदह्र्ममयं राज्यं कृत्वा तौ तस्य मन्त्रिणौ / सर्वोपकरणैर्युक्तं विहारं काश्यपाय च // KAव्क्_३३.२४ //
3007 SK कालेन जातौ नागेन्द्रावेतौ नन्दोपनन्दकौ / विहारार्पणपुण्येन पदं मेरुरभूत्तयोः // KAव्क्_३३.२५ //
3008 SK इति जिननिगदितफणिवरचरितं परतनुपरिणतिपरिचितसुकृतम् / श्रुतवति शमनयमुनिपरिनिवहे विषधरनियमनगुणनुतिरुदभूत् // KAव्क्_३३.२६ //
3009 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां नन्दोपनन्दावदानं त्रयस्त्रिंशः पल्लवः //
3010 SK ३४. गृहपतिसुदत्तावदानम् /
3011 SK दत्तः परहितभावनया यदु तनुधनकणशेषः / अपरिक्षयगुणकल्पनया भवति सुपुण्यविशेषः // KAव्क्_३४.१ //
3012 SK अथ व्यतीते कस्मिंश्चित् काले भगवतो ऽन्तिके / नन्दोपनन्दयोर्धर्मदेशनां श्रोतुमाययौ // KAव्क्_३४.२ //
3013 SK राजा प्रसेनजिद्द्रष्टुं भगवन्तमुपागतः / ताभ्यामकृतसत्कारप्रणामः कोमपाययौ // KAव्क्_३४.३ //
3014 SK स प्रणम्य जिनं गत्वा प्रदध्यौ निग्रहं तयोः / शस्त्रवृष्टिं संसृजन्तौ तौ च व्योम्ना समागतौ // KAव्क्_३४.४ //
3015 SK सर्वज्ञप्रेषितस्तूरणं मौद्गल्यायन एत्य ताम् / शस्त्रवृष्टिं नरपतेश्चक्रे पद्मोत्पलावलिम् // KAव्क्_३४.५ //
3016 SK पुनर्गत्वा भगवतः समीपं पृथिवीपतिः / संप्राप्तौ क्षमयामास तस्यादेशात् फणीश्वरौ // KAव्क्_३४.६ //
3017 SK अथार्थितः पार्थिवेन भगवान् राजमन्दिरम् / भक्तिपूतं ययौ भोक्तुं भक्तं भिक्षुगणैः सह // KAव्क्_३४.७ //
3018 SK भक्ष्येषु पच्यमानेषु रात्रौ तत्राग्निविल्पवः / जातो जिनप्रभावेण सहसा शान्तिमाययौ // KAव्क्_३४.८ //
3019 SK भुक्त्वा गते भगवति क्षितिपः स्वपुरे ऽभ्यधात् / ज्वलनज्वालनं रात्रौ वारयन् दण्डसंविदा // KAव्क्_३४.९ //
3020 SK अत्राण्तरे गृहपतिः सुदत्तस्यात्मजि युवा / मिथ्यादोषदृद्धिबलो नाम राज्ञाभिघातितः // KAव्क्_३४.१० //
3021 SK पूर्वं भगवतः शास्तुः शासनानुग्रहेण सः / लब्धज्ञानधृतिः पुत्रदुःखे ऽप्यासीददुःखितः // KAव्क्_३४.११ //
3022 SK अपुत्रः स्वधनं भूरि दीनेभ्यः प्रतिपाद्य सः / चकारातिरसादेकपणशेषं शनैः श्रियः // KAव्क्_३४.१२ //
3023 SK पणलाभकृताशेषधर्मः स्वल्पप्रदो ऽथ सः / अभूद् गृही सुदत्ताख्यो गृहं हि स्वप्लमुच्यते // KAव्क्_३४.१३ //
3024 SK कदाचिद्दर्शनायातं भगवान् पुरतः स्थितम् / तं स्वल्पदाननाम्नैव लज्जितं दययावदत् // KAव्क्_३४.१४ //
3025 SK अल्पदानं गृहपतेर्न लज्जां कर्तुमर्हसि / याति श्रद्धार्पितो दानकणः कनकशैलताम् // KAव्क्_३४.१५ //
3026 SK पुरा बहुतरं दत्तं वेलमेन द्विजन्मना / श्रद्धाविरहसामान्यान्न तथा वृद्धिमाययौ // KAव्क्_३४.१६ //
3027 SK यः सर्वं भोजयेद्भक्त्या जम्बुद्वीपगतं जनम् / यश्चैकं बोधिसंयुक्तं तस्य पुण्यं ततो ऽधिकम् // KAव्क्_३४.१७ //
3028 SK इति वाक्यं भगवतस्तथ्यं श्रुत्वाभिनन्द्य च / निजगेहं गृहपतिः प्रययौ प्रणिपत्य तम् // KAव्क्_३४.१८ //
3029 SK दीपं दत्वा पठन् रात्रौ ततर् बुद्धानुशासनम् / दण्डाय राजपुरुषैः स नीतो ऽग्निप्रवर्तनात् // KAव्क्_३४.१९ //
3030 SK दण्डस्य संभवाद्बद्धं बन्धनागारवर्तिनम् / तं द्रष्टुमाययुर्देवा रात्रौ शक्रब्रह्मादयः // KAव्क्_३४.२० //
3031 SK स तैर्धनं गॄहाणेति प्रार्थितो नाग्रहीद्यदा / तदा धर्मोपदेशो ऽयं प्रवृत्तस्त्स्य मन्दिरे // KAव्क्_३४.२१ //
3032 SK राजापि तत्प्रभावेण दृष्ट्वा प्रज्वालितं पुरम् / मुक्त्वा तं बन्धनागारान्न ददर्श जलं क्कचित् // KAव्क्_३४.२२ //
3033 SK स गतः सुगतं द्रष्टुं कदाचित्तत्पुरः स्थितः / नृपं जिनप्रणामाय प्राप्तं पश्चाद् व्यलोकयत् // KAव्क्_३४.२३ //
3034 SK अग्रे भगवतश्चक्रे प्रणयं न स भूपतेः / जगत्पूज्यस्य पुरतः पूजामर्हति नापरः // KAव्क्_३४.२४ //
3035 SK जिनमामन्त्र्य नृपतिः प्रणतः स्वपुरं गतः / विवासनं गृहपतेरादिदेश निजात् पुरात् // KAव्क्_३४.२५ //
3036 SK प्रसादिनी सुदत्तस्य देवता नृपतिं ततः / क्षुद्रजन्तुभिरुत्सृष्टैश्चक्रे दंशविषाकुलम् // KAव्क्_३४.२६ //
3037 SK स त्रस्तस्तैर्नृपः प्राप्तः सामात्यान्तः पुरानुगः / गत्वा प्रसादयामास सुदत्तम् जिनशासनात् // KAव्क्_३४.२७ //
3038 SK इति स सततप्रत्यासत्त्या परामृतनिर्भरं भगवदुदितं शान्तिं भेजे सुदत्तगृहाधिपः / स्वमिव लभते विघ्नयासप्रवासविवर्जितं विमलमनसामन्तेवासी विवेकमहानिधिम् // KAव्क्_३४.२८ //
3039 SK इति क्षेमेन्द्रविचरितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां गृहपतिसुदत्तावदानं चतुर्स्त्रिशः पल्लवः //
3041 SK फलं समानं लभते स दातुर्याति क्षणं दानसहायतां यः / परोपकारप्रणयोद्यतानां नापुण्यकर्मा सचिवत्वमेति // KAव्क्_३५.१ //
3042 SK रम्ये पुरा भगवति श्रावस्त्यां जेतकानने / अनाथपिण्डदारामविहाराधिरते जिने // KAव्क्_३५.२ //
3043 SK कौशाम्ब्यां वत्सनृपतिर्बभूवोदयनाभिधः / गायत्यद्याषि यत्कीर्तिर्विद्याधरवधूजनः // KAव्क्_३५.३ //
3044 SK अभवद्विषये तस्य कर्मान्ताकरजीवनः / गृहस्थः सुधनो नाम धनाधानविचक्षणः // KAव्क्_३५.४ //
3045 SK नृपः कदाचिंदास्थाने तं कार्यार्थिनमागतम् / वचसैव परिज्ञाय जगाद् विहितादरः // KAव्क्_३५.५ //
3046 SK जानाम्यहं गृहपते हिरण्योपचितस्वरम् / विपुलः संचयज्ञस्य सुवर्णनिधिरस्ति ते // KAव्क्_३५.६ //
3047 SK इत्युक्तः सस्मितं राज्ञा स तमूचे कृताञ्जलिः / सत्यमस्त्येव मे राजन् गृहे काञ्चनसंचयः // KAव्क्_३५.७ //
3048 SK सद्वृत्तचिन्तानिरते देवे वात्सल्यपेशले / किं वा नास्ति जनास्यास्य पितरि त्वयि गोप्तरि // KAव्क्_३५.८ //
3049 SK धनिनो यान्त्यधनतां निधनं यान्ति चाधनाः / व्याघ्रताम् याति देद्भूभृदामिषाघ्राणनिर्घृणः // KAव्क्_३५.९ //
3050 SK निःसङ्कैरर्ज्यते वित्तमर्जितं च विभज्यते / विभक्तं भुज्यते स्पष्टं जनैर्धर्मधने नृपे // KAव्क्_३५.१० //
3051 SK उपपन्नं वचः श्रुत्वा धीमतस्तस्य भूपतिः / तमूचे दशनोद्योतैः प्रसादं दर्शयन्निव // KAव्क्_३५.११ //
3052 SK मतिमान् कार्यसचिवस्त्वं मे भवितुमर्हसि / धीधूर्यैस्त्वद्विधैरेव धार्यते धरणीभरः // KAव्क्_३५.१२ //
3053 SK इति राजवचः श्रुत्वा शुधनस्तमभाषत / न् अवयं राजसेवासु सभामण्डलपण्डिताः // KAव्क्_३५.१३ //
3054 SK स्वाच्छन्द्योद्यानविच्छेदः सुनिद्रासुखविक्रयः / सेवा हि पुंसां संसारदुःखदैन्यभयंकरः // KAव्क्_३५.१४ //
3055 SK ईश्वरैर्मस्तकन्यस्तचरणः कृतकृत्यताम् / पादपीठ इवायाति सेवको ऽहं स्थितः सदा // KAव्क्_३५.१५ //
3056 SK सेवायासप्रयासेन प्राप्तानामपि संपदाम् / संभोगः पिशुनासङ्गी प्रभुभ्रूभन्गभङ्गुरः // KAव्क्_३५.१६ //
3057 SK एताश्च नावतिष्ठन्ते प्रयत्नेन धृता अपि / दर्पोग्रदुर्ग्रहग्राहदुर्ग्रहा नृपसंपदः // KAव्क्_३५.१७ //
3058 SK क्षणं नवनवाश्लिषविशेषप्रणयोद्यताः / अवाचवाररमणीरमणीया विभूतयः // KAव्क्_३५.१८ //
3059 SK इत्युक्तप्रतिषेधो ऽपि स राज्ञा सचिवः कृतः / अतिक्रामति को नाम प्रभविष्णोः समीहितम् // KAव्क्_३५.१९ //
3060 SK प्राप्तप्रौढपदं राज्ञा नीतं सर्वाधिकारिताम् / विद्वेषदूषिताः सर्वे मन्त्रिणस्तं न सेहिरे // KAव्क्_३५.२० //
3061 SK धर्मजिज्ञासया राज्ञा पिशुनप्रेरितेन सः / नैवाकरोदसत्कार्यं नियुक्तो ऽपि पुन पुनः // KAव्क्_३५.२१ //
3062 SK आघातं प्रेक्षितः सो ऽथ मिथ्याकोपेन भूभुजा / तथाप्यधर्मसंयुक्तं न शासनमतन्यत // KAव्क्_३५.२२ //
3063 SK एकजन्मसुखायैव बहुजन्मशतार्दितम् / न साधुनिन्दितं कर्म करोमीति जगाद सः // KAव्क्_३५.२३ //
3064 SK भयधर्मोपधाशुद्धः प्रतिमुक्तः स भूभुजा / दानसत्रमविच्छिन्नमकरोदखिलार्थिनाम् // KAव्क्_३५.२४ //
3065 SK सर्वत्र विश्रुते तस्य दानसत्रे यशस्विनह् / कल्पवृक्षादरः पुंसां परं प्रतनुतां ययौ // KAव्क्_३५.२५ //
3066 SK अत्रान्तरे मुनिगणास्तीर्थार्था दक्षिणापथात् / आगता कृच्छ्रकान्तारमविशन् निर्जनं वनम् // KAव्क्_३५.२६ //
3067 SK तत्र तृष्णातुराः सर्वे मूर्च्छिताः शयनाश्रिताः / अयाचन्त जलं मोहादुच्चैर्निश्चेतनानपि // KAव्क्_३५.२७ //
3068 SK देवगन्धर्वनागेभ्यः कश्चिद्यो ऽत्र दयाम्बुधिः / स्थितः प्रयच्छतु जलं सो ऽस्माकमिति ते ऽब्रुवन् // KAव्क्_३५.२८ //
3069 SK ततः स रत्नकेयूरक्कनत्कङ्कणसद्ध्वनिः / भुजस्थमेमभृङ्गारस्तरुमध्याद्विनिर्ययौ // KAव्क्_३५.२९ //
3070 SK ते तस्मादमृतास्वादं पाणिपद्मावनामितात् / आकण्ठं सलिलं पीत्वा जहृषुर्लब्धजीविताः // KAव्क्_३५.३० //
3071 SK प्रार्थितः पुनरभ्येत्य पप्रच्छुस्ते सविस्मयाः / अदृश्यवृक्षनिलयादुद्भूतं को भवानिति // KAव्क्_३५.३१ //
3072 SK सो ऽब्रवीद्विश्रुतयशाः श्रावस्त्यामाशयः श्रियः / अनाथपिण्डदो नाम सर्वदो ऽस्ति गृहाधिपः // KAव्क्_३५.३२ //
3073 SK सौचिकेन मया पूर्वं तद्गृहान्तिकवासिना / भुजमुद्यभ्य तद्वेश्म दर्शितं नित्यमर्थिनाम् // KAव्क्_३५.३३ //
3074 SK तेन पुण्येन देवत्वं प्राप्तो ऽत्र विहराम्यहम् / बाहुर्मम् विभात्येष दक्षिणः सो ऽर्थिदक्षिणः // KAव्क्_३५.३४ //
3075 SK ते तमामन्त्र्य मुनयः पुनः संप्रस्थिता वने / क्षुधिताः स्निग्धसच्छायं ददृशुः पादपं परम् // KAव्क्_३५.३५ //
3076 SK तमप्युच्चैरयाचन्त भोजनं तद्वदेव ते / उच्चचार च गम्भीरा वाणी विस्मयकारिणी // KAव्क्_३५.३६ //
3077 SK अत्र पुष्करिणीतीरे द्रोण्यां दिव्यान्नभोजनम् / संपूर्णमस्ति तद्गत्वा भुज्यतां यदभीप्सितम् // KAव्क्_३५.३७ //
3078 SK इति तेन समादिष्टं भुक्त्वा ते दिव्यभोजनम् / को भवनिति पप्रच्छुस्तं दिव्यतरुसंश्रयम् // KAव्क्_३५.३८ //
3079 SK सो ऽप्याचचक्षे श्रावस्त्यां गृहस्थो ऽनाथपिण्डदः / अस्ति तस्याहमभवं ब्राह्मणः संघहोजने // KAव्क्_३५.३९ //
3080 SK चतुरः परिचर्यायां दधिकुम्भप्रचारकः / तद्भोजनान्ते संप्राप्ते स्वल्पशेषान्नभोजनः // KAव्क्_३५.४० //
3081 SK भिक्षुणां गौरवेच्चारं दृष्ट्वाहं राजभोजनम् / आत्मनश्चान्नमक्षारमभवं खिन्नमानसः // KAव्क्_३५.४१ //
3082 SK अनाथपिण्डदगिरा भोजने गौरवाशया / ततो मयाष्टाङ्गयुक्तं गृहीतं पोषधं व्रतम् // KAव्क्_३५.४२ //
3083 SK असमाप्तव्रतेनाथ भुक्तं लौल्यान्मया निशि / तेनाहमभवं लोके विज्ञातः खण्डपोषधः // KAव्क्_३५.४३ //
3084 SK खण्डेनापि व्रतेनाहं देवपुत्रत्वमागतः / इति ते तद्वचः श्रुत्वा मुनयो विस्मिता ययुः // KAव्क्_३५.४४ //
3085 SK अचिन्तयन् व्रजन्तस्ते तीव्रेण तपसा वयम् / सुचिरं केवलं क्लिष्टां नाद्यापि कुशलस्पृशः // KAव्क्_३५.४५ //
3086 SK अधुना पोषधं प्राप्तुं व्रतमेव यतामहे / निरपायसुखोपाये स्वहिते कस्य नादरः // KAव्क्_३५.४६ //
3087 SK इति संचिन्तयन्तस्ते कौशाम्बीमभितो गताः / सुधनस्य गृहं प्रापुर्विश्रुतं गृहमेधिनः // KAव्क्_३५.४७ //
3088 SK तत्र तेन कृतातिथ्या निवेद्यास्मै तदद्भुतम् / अनाथपिण्डदं द्रष्टुं तेनैव सहिता ययुः // KAव्क्_३५.४८ //
3089 SK श्रावस्त्याम् ते समासाद्य पूजितास्तेन सादरम् / अस्मै न्यवेदयन् सर्वं यथादृष्टं यथाश्रुतम् // KAव्क्_३५.४९ //
3090 SK स तान् व्रतार्थिन सर्वान् सुहृदं सुधनं च तम् / निनाय धर्मसचिवः प्रीतो भगवतो ऽन्तिकम् // KAव्क्_३५.५० //
3091 SK भगवानपि तद्वाक्याच्चक्रे तेषामनुग्रहम् / सत्यदर्शनसंबुद्धा येन ते सुगतिं ययुः // KAव्क्_३५.५१ //
3092 SK तेषु यातेषु सुधनं पक्षपाताद्रया दृशा / विलोक्य भगवान् सम्यग् विदधे ज्ञानभाजनम् // KAव्क्_३५.५२ //
3093 SK सत्यसंदर्शनावाप्तविशेषकुशलोदयः / गत्वा जिनाय कौशाम्ब्याम् स विहारमकारयत् // KAव्क्_३५.५३ //
3094 SK यस्माद्भगवतादिष्टस्तस्मिन् यातः सहायताम् / भिक्षुश्चुन्दाभिधस्तस्मात् सो ऽभूच्चुन्दविहारभूः // KAव्क्_३५.५४ //
3095 SK राधाभिधा तदा दासी विहारपरिचारिका / दयया भगवानस्याः शीर्णवस्त्रं समग्रहीत् // KAव्क्_३५.५५ //
3096 SK अदासी स्यामिति श्रद्धाप्रणिधानार्पितस्तया / स चीवरो भगवतः प्रययावेकवर्णताम् // KAव्क्_३५.५६ //
3097 SK सुधनस्योज्ज्वलं दृष्ट्वांपुण्यसंभारमद्भुतम् / भिक्षुभिर्भगवान् पृष्टस्तत्पूर्वोदयमभ्यधात् // KAव्क्_३५.५७ //
3098 SK सुन्धानाख्यो गृहपतिर्वाराणस्यामभूत्पुरा / नोदारकुzन्जरस्याभूद् यस्य दानपरिक्षयः // KAव्क्_३५.५८ //
3099 SK अनावृष्टिहते काले तस्य द्वादशवार्षिके / अवारितमभूच्छत्रमविच्छिन्नान्नमर्थिनाम् // KAव्क्_३५.५९ //
3100 SK तस्य पद्माकरो नाम कोषागारपतिर्गृहे / दानसाहाय्यकं चक्रे सहस्था हि समृद्धयः // KAव्क्_३५.६० //
3101 SK प्रत्येकबुद्धसंघस्य भक्तकालनिवेदकह् / धर्मदूताभिधस्तस्य मन्त्री धीमानपस्थितः // KAव्क्_३५.६१ //
3102 SK कर्मव्याक्षेपतस्तस्य जाते कालव्यतिक्रमे / कदाचित् कुकुरस्तेषां कालसंज्ञां व्यधात्पुरः // KAव्क्_३५.६२ //
3103 SK सुन्धानो ऽद्य स एवाहं कोष्ठिको ऽनाथपिण्डदः / संघस्य धर्मदूतो यः स एवोदयनो नृपः // KAव्क्_३५.६३ //
3104 SK संज्ञानिदेशको यश्च कुकुरः सुधनो ऽपि सः / राज्ञा घोषेण विज्ञातो घोषिलापरनामभृत् // KAव्क्_३५.६४ //
3105 SK चरितमित्युचितं भवभेदिना भगवता कथितं किल भिक्षवः / सुकृतसौरभसारसुधारसं सुमनसा श्रवणाञ्जलिभिः पपुः // KAव्क्_३५.६५ //
3106 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां घोषिलावदानं पञ्चत्रिंशः पल्लवः //
3108 SK विबुधसरसिः पद्मैः शोभिते पङ्कजिन्या शुचिपरिसरजातं स्पृश्यते न स्थले ऽब्जम् (?) / सहजपरिचितानां नित्यमन्तर्गतानाम् भवति सितगुणानाम् कारणं नैव जातिः // KAव्क्_३६.१ //
3109 SK श्रावस्त्यां सर्वसत्त्वानां स्वस्तिध्यानपरायणे / जिनकल्पद्रुमे जेतवनारामस्थिते पुरा // KAव्क्_३६.२ //
3110 SK शूर्पारकाख्ये नगरे रत्नसंचयसागरः / भवो नामाभवत्सार्थपरिर्मतिमतां वरः // KAव्क्_३६.३ //
3111 SK भविलो भवभद्रश्च भवनन्दी च विश्रुताः / केतक्यां तस्य जायायां बभूवुस्तनयास्त्रयः // KAव्क्_३६.४ //
3112 SK रोगयोगादुपगरः स कदाचिन्मुमूर्षुताम् / पारुष्याद् भृशमुद्विग्नैः पत्नीपुत्रैरुपेक्षितः // KAव्क्_३६.५ //
3113 SK भक्त्या दासी तु तस्यैका परिचर्यापरा परम् / मल्लिकाख्याभवत्तस्याः सेवया स्वास्थ्यमाययौ // KAव्क्_३६.६ //
3114 SK स्नेहोपकारप्रणतः कृतज्ञः स तयान्वितः / ऋतौ संगममभ्येत्य तस्याः पुत्रमजीजनत् // KAव्क्_३६.७ //
3115 SK यदा तज्जन्मनि पितुः सर्वार्थाः पूर्णताम् ययुः / स तदा पूर्णनामाभूद्बालः पूर्णेन्दुसुन्दरः // KAव्क्_३६.८ //
3116 SK ज्येष्ठास्त्रयः कृतिद्वाहा ययुरब्धिं धनार्थिनः / पूर्णस्तु भाण्डशालायां पितुश्चक्रे धनार्जनम् // KAव्क्_३६.९ //
3117 SK ततः प्रतिनिवृत्तास्ते प्राप्तार्थः सागरात्पुनः / गणनां हेमलक्षाणां कृत्वा स्वमुदिरे पुरम् // KAव्क्_३६.१० //
3118 SK समुद्रगमने तेषाम् यावानासीद्धनागमः / पूर्णस्य स्वगृहे पण्यौर्बभूवाभ्यधिकस्ततः // KAव्क्_३६.११ //
3119 SK तद्दृष्ट्वा जनकस्तेषां वृद्धः पर्यन्तवासरे / तमूचेहितमायत्यां तृष्णा नैकक्षयोदयः // KAव्क्_३६.१२ //
3120 SK दृष्टं भवद्भिः सामुद्रलाभे कृतपरिश्रमैः / पूर्णेनोआर्जितं वित्तमक्लेशेन महीयसा // KAव्क्_३६.१३ //
3121 SK शुभकर्मविपाकेन भवन्त्यर्था धनार्थिनाम् / हस्तात् पलायते ऽन्यस्य प्राप्नोति पतितं परः // KAव्क्_३६.१४ //
3122 SK सन्मार्गस्यापरित्यागाद् युक्तायुक्तविवेचनात् / देशकालपरिज्ञानात्सतां सर्वत्र संपदः // KAव्क्_३६.१५ //
3123 SK भवन्ति स्वगृहे शन्याः सुधियो धर्मभागिनः / गत्वा रत्नाकरं चान्ये लभन्ते प्राणसंशयम् // KAव्क्_३६.१६ //
3124 SK यत्नेन बोद्धव्या सद्भिः धनस्योपनिष्त्परा / अद्रोहशुद्धबुद्धीनां स्वाधीनानां धनाच्छ्रियः // KAव्क्_३६.१७ //
3125 SK रक्षणीयो भवद्भिश्च भेदः सततसंहतेः / भिन्नात् स्खलति कल्याणं कुलात् कुम्भादिवोदकम् // KAव्क्_३६.१८ //
3126 SK अथाभिन्नेन्धनस्याग्नेर्नश्यन्ते सदृशास्त्विषः / तथा विपुलवंशस्य भिन्नज्ञातेर्विभूतयाः // KAव्क्_३६.१९ //
3127 SK भ्रातॄणां संततो भेदः कथं नाम निवर्तते / अध्यापितानां पत्नीभिर्द्वेषविद्यां सदा निशि // KAव्क्_३६.२० //
3128 SK उन्नतानां स्ववशानां द्वैधं तावन्न जायते / यावत्कुठारधारेव योषिद्विशति नान्तरम् // KAव्क्_३६.२१ //
3129 SK भ्रातुरर्थानुवादेन गुरुं पारुष्यकुत्सया / मित्रमेकाभिलाषेण नयन्ति द्वैधतां स्त्रियः // KAव्क्_३६.२२ //
3130 SK तद्वदन्ति हसन्त्यो ऽपि भ्रूविलासेन योषितः / यत्प्रयाति सुहृत्स्नेहमूलोन्मूलनहेतुताम् // KAव्क्_३६.२३ //
3131 SK हितमुक्त्वेति पुत्राणां भूतये ऽभिमतं भवः / अनित्यतापरियुक्तः काले निधनमाययौ // KAव्क्_३६.२४ //
3132 SK अविभक्ते धने शक्ता देशान्तरधनार्जने / ज्येष्ठा बभूवुः पूर्णस्तु गृहे वित्तमचिन्तयत् // KAव्क्_३६.२५ //
3133 SK कालेन गृहमाप्तानाम् वस्त्राशनविवादिनाम् / स्त्रीमन्त्रदत्तकर्णानां भेदस्तेषामजायत // KAव्क्_३६.२६ //
3134 SK वित्ते विभज्यमाने ऽथ् अतैर्विद्वेषवशीकृतेः / दासीसुतो ऽयम्त्युक्त्वा नीतः पूर्णो निरंशताम् // KAव्क्_३६.२७ //
3135 SK सो ऽपि पूर्णशनः काले शीतसंकुचितं पथि / ददर्श ग्रीष्मताप्र् ऽपि विवशं दारुभारकम् // KAव्क्_३६.२८ //
3136 SK आदाय दारुमूल्येन स तस्माद्दारुभारकम् / दिव्यचन्दनमद्राक्षीद्दहनस्यापि शीतदम् // KAव्क्_३६.२९ //
3137 SK सुकृतेनैव महता तेन लब्धमहाधनः / स सेव्यः सार्थवाहानां पूज्यो ऽभूत्पृथिवीपतेः // KAव्क्_३६.३० //
3138 SK रत्नाकरं स षट्कृत्वः प्रयातः सर्वदो ऽर्थिनाम् / चकार सर्ववणीजां तरशुल्काद्यनुग्रहम् // KAव्क्_३६.३१ //
3139 SK स्र्हावस्तीवासिभिः सार्थवणिग्भिः पुनरर्थितः / ययौ प्रवहणारूढः समुद्रद्वीपमाशु सः // KAव्क्_३६.३२ //
3140 SK प्रत्यावृत्ते प्रवहणे सो ऽथ शुश्राव गायताम् / वणिजां स्थाविराः शैलगाथाः सुगतसंश्रयाः // KAव्क्_३६.३३ //
3141 SK कस्यैता इति ते तेन पृष्टाः सर्वे बभाषिरे / एता भगवता गीता गाथा बुद्धेन धीमता // KAव्क्_३६.३४ //
3142 SK इति बुद्धाभिधामेव श्रुत्वा हर्षमवाप सः / पुंसां स्ववासनारूढं व्यक्तिमायात्युदीरितम् // KAव्क्_३६.३५ //
3143 SK तैर्विस्तरेण कथितामाकर्ण्य भगवत्कथाम् / सो ऽभवत्तद्गतमनास्तद्दर्शनसमुत्सुकः // KAव्क्_३६.३६ //
3144 SK स शनैर्गृहमागत्य त्यक्त्वा सर्वपरिच्छदम् / अनाथपिण्डदं द्रष्टुं श्रावस्त्यां सुहृदं ययौ // KAव्क्_३६.३७ //
3145 SK अभिलाषं निवेद्यास्मै प्रव्रज्यायां जितेन्द्रियः / जगाम सहितस्तेन भक्त्या भगवतो ऽन्तिकम् // KAव्क्_३६.३८ //
3146 SK दृष्ट्वैव तत्र सर्वज्ञं मोहध्वान्तदिवाकरम् / तत्पाददर्शनेनैव मेने स कृतकृत्यताम् // KAव्क्_३६.३९ //
3147 SK विज्ञाय तस्य भगवान् संकल्पं तमभाषत / दशनज्योत्स्नया कुर्वन् विवेकविमला दिशः // KAव्क्_३६.४० //
3148 SK एहि भिक्षि निराशङ्के निर्विपक्षे क्षयोज्झिते / आख्याते धर्मविनये ब्रह्मचर्यां चरेप्सितम् // KAव्क्_३६.४१ //
3149 SK इति प्रसादशीलेन जिनेनोदीरिते पुरह् / प्रव्रज्या सहसैवास्य पपातालक्षिता तनौ // KAव्क्_३६.४२ //
3150 SK ततः स शत्रौ मित्रे च प्रशमात् समतां श्रितः / शास्तुः शासनमादाय प्रणिपत्य जगाम तम् // KAव्क्_३६.४३ //
3151 SK श्रोणापरान्तकं नाम देशं श्रूरजनाश्रयम् / स्वयं परीक्षितुं क्षान्तिं जनेन स समाययौ // KAव्क्_३६.४४ //
3152 SK ततो दृष्ट्वा तमायान्तं मृगयायाममङ्गलम् / लुब्धकश्चापमाकृष्य हन्तुं क्रिधात् समाद्रवत् // KAव्क्_३६.४५ //
3153 SK निर्विकारं निरुद्वेगं स तं विगतसाध्वसम् / प्रहरेति ब्रुवाणं च दृष्ट्वैव शममाप्तवान् // KAव्क्_३६.४६ //
3154 SK शाम्यतस्तस्य सहसा प्रसादी लुब्धकस्य सः / धर्मं दिदेश येनासौ बोधिं प्राप सहानुगैः // KAव्क्_३६.४७ //
3155 SK स तत्र सुगतार्हाणां सर्वोपस्करसंपदाम् / शतानि पzन्च रम्याणां विहाराणामकारयत् // KAव्क्_३६.४८ //
3156 SK पूर्णो ऽपि ज्ञानसंपूर्णः प्राप्तिस्त्रिदशपूज्यताम् / वैराग्यलक्ष्म्या युक्तो ऽभून्मुनीनां स्पृहणीयया // KAव्क्_३६.४९ //
3157 SK अथ तस्याग्रजो भ्राता भविलः क्षीणवित्तताम् / कालेनोपगतः प्रायात् सम्दुरं द्रविणाशया // KAव्क्_३६.५० //
3158 SK ततः प्रवहणारूढः सो ऽनुकूलैः समीरणैः / गोशीर्षचन्दनवनं प्रापितः स्वल्पवासरैः // KAव्क्_३६.५१ //
3159 SK कुठारिकशतैस्तस्मिन् पञ्चभिश्छेत्तुमुद्यते / तच्चन्दनवनं दिव्यं भुजङ्गगणासंकुलम् // KAव्क्_३६.५२ //
3160 SK तत्स्वामी यक्षसेनानां महेश्वरं इति श्रुतः / कोपादुदसृजद् घोरं कालिकाख्यं महानिलम् // KAव्क्_३६.५३ //
3161 SK मरुता महता तेन प्रापिताः प्राणसंशयम् / चक्रन्दुर्वणिजः सर्वे शर्वशक्रमुखान् सुरान् // KAव्क्_३६.५४ //
3162 SK तानार्तरावमुखरान् भविलः सार्थनायकः / उवाच संचिन्त्य चिरं पश्चात्तापसमाकुलः // KAव्क्_३६.५५ //
3163 SK पूर्णः कनीयान् भ्राता स हितैषी मां पुरावदत् / बहुक्लेशो ह्यल्पसुखः क्क गन्तव्यस्त्वयाम्बुधिः // KAव्क्_३६.५६ //
3164 SK अकृत्वा धीमतस्तस्य वचनं सत्यदर्शिनः / च्युतो ऽहं धनलोभेन घोरे ऽस्मिन् व्यसनार्णवे // KAव्क्_३६.५७ //
3165 SK श्रुत्वैतद्वणिजः सर्वे प्रभावं लोकविश्रुतम् / पूर्णस्य मनसा ध्यात्वा तमेव शरणं ययुः // KAव्क्_३६.५८ //
3166 SK नमस्तुभ्यं जगत्क्लेशविषधोषापहारिणे / पूर्णयोदीर्णकरुणासुधासंपूर्णचेतसे // KAव्क्_३६.५९ //
3167 SK इत्येकस्वररावेण तेषां संपूरिते ऽम्बरे / क्षणेन गत्वा तद्वृत्तं पूर्णः प्राह स्वदेवताः // KAव्क्_३६.६० //
3168 SK श्रोणापरान्तकगतः श्रुत्वा तेषां स विप्लवम् / व्योम्ना समाधिसंनद्धः प्राप प्रवहणं क्षणात् // KAव्क्_३६.६१ //
3169 SK तस्मिन् पर्यङ्कबन्धनेन स्थितो मेरुरिवाचलह् / प्रलयोत्तालवेगस्य गतिं वाहोर्जहार सह् // KAव्क्_३६.६२ //
3170 SK पूर्णेन पवनं रुद्धं ज्ञात्वा यक्षगणाग्रणीः / तं प्रसाद्य ययौ त्यक्त्वा तेभ्यश्चन्दनकाननम् // KAव्क्_३६.६३ //
3171 SK पूर्णप्रसादादादाय भविलश्चन्दनद्रुमान् / हृष्टस्तेनैव सहितः शूर्पारं स्वपुरं ययौ // KAव्क्_३६.६४ //
3172 SK पूर्णो ऽथ् संमते भ्रातुस्तत्र गोशीर्षचन्दनैः / चक्रे चन्दनमालाख्यं प्रासादं सुगतो ऽचितम् // KAव्क्_३६.६५ //
3173 SK तत्र पूर्णेन भगवान् ध्यातस्तूर्णं विहाय्सा / समाययौ जेतवनादुल्लङ्घ्य शतयोजनीम् // KAव्क्_३६.६६ //
3174 SK आगच्छतो भगवतः पुरःप्रसृतया जगत् / देहकान्त्या कपिशितं सर्वं हिममिवाभवत् // KAव्क्_३६.६७ //
3175 SK पुरोपान्तनिवासिन्यस्तं विलोक्य गृहाङ्गनाः / तीव्रचित्तप्रसादेन प्रशमोन्मुखतां ययुः // KAव्क्_३६.६८ //
3176 SK कुशलोपचितां तासां भगवान् सत्यदेशनाम् / चक्रे भवादृतां कान्तास्ताह् प्रापुः कुशलं ययुः // KAव्क्_३६.६९ //
3177 SK ऋद्ध्या भगवतस्तत्र चैत्यं पौराङ्गनाभिधम् / ताभिर्विहितमद्यापि वन्दन्ते चैत्यवन्दकाः // KAव्क्_३६.७० //
3178 SK मुनीनां भगवान् कृत्वा तथा वल्कलिनो मुनेः / प्रव्रज्यानुग्रहं शुद्धां विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_३६.७१ //
3179 SK ततश्चन्दनमालाख्यं प्रासादं भगवान् जिनः / प्रविश्य स्फाटिकं चक्रे जनसंघभरक्षमम् // KAव्क्_३६.७२ //
3180 SK अथ रत्नासनासीनः स तत्र करुणानिधिः / विदधे सर्वसत्त्वानां शान्त्यै निर्वाणदेशनाम् // KAव्क्_३६.७३ //
3181 SK अत्रान्तरे सानुचरौ मुनीन्द्रौ कृष्णागौतमौ / अभ्येत्य धर्मश्रवणेशास्तुः शासनमापतुः // KAव्क्_३६.७४ //
3182 SK तत्र कृत्वाथ भगवान् प्रासादस्य प्रतिग्रहम् / पुनर्जेतवनं गच्छन्नुद्ययौ सह भिक्षुभिः // KAव्क्_३६.७५ //
3183 SK व्रहन् मारीचिलोकस्थाम् मौद्गल्यायनमातरम् / सग्दिरा चार्यसत्ये तां धर्ममार्गे न्यवेशयत् // KAव्क्_३६.७६ //
3184 SK अथ जेतवनं प्राप्तं भगवन्तं सविस्मयाः / पूर्णस्य पुण्यं पप्रच्छुर्भिक्षवः सो ऽप्यभाषत // KAव्क्_३६.७७ //
3185 SK काश्यपस्य पुरा सम्यक्संबुद्धस्यान्यजन्मनि / विहाराधिकृतः पूर्णः संघोपस्थायको ऽभवत् // KAव्क्_३६.७८ //
3186 SK स कदाचिदसंमृष्टां दृष्ट्वा वैहारिकीं भुवम् / प्राह प्रव्रजितं तीव्रं क्रोधादुपधिवारिकम् // KAव्क्_३६.७९ //
3187 SK दृप्तस्योपधिवारो ऽद्य विहारो ऽस्मिन्नमार्जितः / कस्य दासीसुतस्येति ब्रुवाणस्तमभर्त्सयत् // KAव्क्_३६.८० //
3188 SK तेन पारुष्यपापेन भुक्त्वा नरकदुर्गतिम् / दासीसुतो ऽभवत् पूर्णः पञ्च जन्मशतानि सः // KAव्क्_३६.८१ //
3189 SK संघोपासनमेवास्य पुण्यायाभून्महीयसा / अर्हत्त्वं येन निःशेषभवक्लेशोज्झितः श्रितः // KAव्क्_३६.८२ //
3190 SK इति प्रभावं कथितं जिनेन पूर्णस्य पुण्योपचयप्रणितम् / श्रुत्वाद्भुतं संसदि भिक्षुसंघः पुण्यप्रसंशाभिरतो बभूव // KAव्क्_३६.८३ //
3191 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायाम् पूर्णावदानं षट्त्रिंशः पल्लवः //
3192 SK ३७. मूकपङ्ग्ववदानम् /
3193 SK आकिंचन्यसुखाय निःस्पृहतया वैराग्यलक्ष्मीजुषः सर्वं यान्ति विहाय कायसचिवाः सन्तः प्रशान्त्यै वनम् / तत्रापि व्रतडम्बरे परिकरारम्भाय चेत् संचयस् तत्कः कोशपरिच्छदोपकरणैर्गेहे ऽपराधः कृतः // KAव्क्_३७.१ //
3194 SK जिने जेतवनारामविहाराभिरते पुरा / शाक्यराजकुमाराणां प्रव्रज्यासंजुषां पुरः // KAव्क्_३७.२ //
3195 SK चित्रचीवरसत्पात्रयोगपट्टादिसंचयम् / प्रभूततरमालोक्य भगवान् समचिन्तयत् // KAव्क्_३७.३ //
3196 SK अहो बतैषां नाद्यापि बन्धहेतुर्निवर्तते / अभिमानमयः काये प्रियः परिकरग्रहः // KAव्क्_३७.४ //
3197 SK काये कायपरिष्कारस्तस्योपकरणावली / तस्याः परिकरादानमहो नु बन्धशृन्खला // KAव्क्_३७.५ //
3198 SK इति संचिन्त्य भगवान् नैकान्तविहितस्थितिः / कारुण्यादुपसन्नानां कुशलाय समुद्यतः // KAव्क्_३७.६ //
3199 SK मासत्रयमुपस्थानं कर्तव्यं येन केनचित् / अदर्शनाय भिक्षूणामकरोदिति संविदम् // KAव्क्_३७.७ //
3200 SK प्रवृत्ते नियमे तस्मिन् भिक्षुरारण्यकव्रतः / आययावुपसेनाख्यः कार्यार्थं तनुचीवरः // KAव्क्_३७.८ //
3201 SK प्रवारितः स संप्राप्य धन्यः सुगतदर्शनम् / कृतकृत्यः क्षस्णं स्थित्वा प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् // KAव्क्_३७.९ //
3202 SK व्रजन्तमेत्य पप्रच्छुर्भिक्षवः परिवार्य तम् / तवार्य दर्शनमहो दत्तं भगवता कथम् // KAव्क्_३७.१० //
3203 SK मासत्रयं दर्शने ऽस्य नियमः शासनेन यः / स कथं भवता भग्नः संघस्योन्मार्गगामिना // KAव्क्_३७.११ //
3204 SK श्रुत्वा तद्वचनं तेषामुपसेनः स्मितोत्तरम् / तानुचे न् अमया कश्चित् कृतः समयविप्लवः // KAव्क्_३७.१२ //
3205 SK अहमुक्तो भगवता दर्शनावसरे स्वयम् / आरण्यकस्य मे भिक्षोर्निषेधो नास्ति दर्शने // KAव्क्_३७.१३ //
3206 SK परिच्छदोपकरणत्यागनिर्मुक्तबन्धनाः / अवार्यदर्शना वृक्षमूलिकाः पांशुकूलिकाः // KAव्क्_३७.१४ //
3207 SK इदमद्य परं प्रातरिति ये संचये रताः / पात्रवीचरवर्गेषु तेषां नास्तीह दर्शनम् // KAव्क्_३७.१५ //
3208 SK पाथोभिः प्रसरत्तुषारशिशिरैस्तृष्णातुरास्ते परं ते नित्यं च निधानधाम्नि विवृते ऽप्यन्यादलं दुर्गताः / तेषां चन्दनपादपादुपनतः संतापकः पावको यैरेष प्रशमव्रतोपकरणे बद्धो ऽभिमानग्रहः // KAव्क्_३७.१६ //
3209 SK इत्युक्तमुपसेनेन श्रुत्वा ते शाक्यभिक्षवः / वैलक्ष्यक्षयितोत्साहाः सहसैव व्यचिन्तयन् // KAव्क्_३७.१७ //
3210 SK एतद्भगवतादिष्टमस्मानुद्धिश्य नापरान् / विचित्रचीवरचयप्रावारा वयमेव यत् // KAव्क्_३७.१८ //
3211 SK विरतेच्छाः प्रियाह् शास्तुर्महेच्छा वयमप्रियाः / तस्मादिच्छां परित्यज्य भवामस्तस्य संमताः // KAव्क्_३७.१९ //
3212 SK इति संचिन्त्य ते सर्वे चारुचीवरसंचयम् / प्रावृत्याभ्यधिकं त्यक्त्वा ययुर्भगवतो ऽन्तिकम् // KAव्क्_३७.२० //
3213 SK इच्छाविरामे भगवान् व्यधात्तेषामनुग्रहम् / ज्ञानवज्रेण सत्कायदृष्टिशैलं बिभेद यः // KAव्क्_३७.२१ //
3214 SK शाक्यराजकुमाराणां श्रोतःप्राप्तिफलस्पृशाम् / भिक्षुभिः पूर्ववृत्तान्तं पृष्टः प्राह तथागतः // KAव्क्_३७.२२ //
3215 SK वाराणस्यामभूत्पूर्वं ब्रह्मदत्तो महीपतिः / दानार्द्रहस्तो यद्बाहुः क्ष्मामधाद्दिग्द्विपोपमः // KAव्क्_३७.२३ //
3216 SK तस्य ब्रह्मावती मुक्तालतेव गुणशालिनी / कीर्तिः सत्पुरुषस्येव विश्रुता वनिताभवत् // KAव्क्_३७.२४ //
3217 SK प्रतिबिम्बोपमं पत्युः सा सुतं विमलाशया / जलक्रीडागता काले सुषुवे दिव्यलक्षणम् // KAव्क्_३७.२५ //
3218 SK उदकाख्यः स बालो ऽभूत् संजातः सलिलान्तरे / वर्धमानः पितुस्तुल्यं यौवराज्यानोरथैः // KAव्क्_३७.२६ //
3219 SK शतानि पञ्चामात्यानां तस्य जन्मदिनं समम् / अवापुस्तुल्यरूपाणां पुत्राणाम् शतपञ्चकम् // KAव्क्_३७.२७ //
3220 SK निजं जातिस्मरः स्मृत्वा प्राग्वृत्तं स शिशुः शनैः / अचिन्तयत् प्राप्तकालं हितं सुकृतमात्मनः // KAव्क्_३७.२८ //
3221 SK षष्टिवर्षाणि कृत्वा तु यौवराज्यमहं पुरा / अभवं कृच्छ्रसंतप्तश्चिरं नरकसंकटे // KAव्क्_३७.२९ //
3222 SK जन्मन्यस्मिन्नपि पुनर्यौवराज्यमुपस्थितम् / सर्वथा प्रार्थ्यमानो ऽपि न करिष्यामि पातकम् // KAव्क्_३७.३० //
3223 SK इति संचिन्त्य स चिरं राजभोगपराङ्मुखः / पितुरुद्वेगजननीमग्रहीत् पङ्गुमूकताम् // KAव्क्_३७.३१ //
3224 SK सर्वलक्षणयुक्तो ऽपि राजवृत्तेरभाजनम् / स मूकपङ्गुर्नामाभूद् बन्धूनां दुःखवर्धनः // KAव्क्_३७.३२ //
3225 SK प्राप्तेषु मन्त्रिपुत्रेषु शस्त्रशास्त्रबलोदयम् / राजपुत्रः प्रवृद्धो ऽपि नोदतिष्ठन्न चावदत् // KAव्क्_३७.३३ //
3226 SK पृष्टस्ततः क्षितीशेन वैद्यास्तद्दोषभेषजम् / अवदन् वैकल्यं राजन् राजसूनोर्न दृश्यते // KAव्क्_३७.३४ //
3227 SK अभ्यासाद्यदि जातो ऽस्य दोषो ऽपि सुखसेविनः / तदेष भयसंवेगादुत्तिष्ठति च वक्ति च // KAव्क्_३७.३५ //
3228 SK इति वैद्यैरभिहितं तथेत्युक्त्वा क्षितीश्वरः / मिथ्यैव वध्यवसुधां भयाय व्यसृजत्सुतम् // KAव्क्_३७.३६ //
3229 SK स भर्त्स्यमानह् पुरुषैस्तमुवाच रथस्थितम् / अपि कश्चिद्वसत्यस्यां वाराणस्यां न वा जनः // KAव्क्_३७.३७ //
3230 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा तैर्नीतः स नृपान्तिकम् / तत्र पित्रार्थ्यमानो ऽपि मूक एवाभवत् पुनः // KAव्क्_३७.३८ //
3231 SK पुनर्वध्यभुवं नीतः शवं दृष्ट्वा जगाद् सः / अस्त्येष जीवति शवः किं वा सर्वात्मना मृतः // KAव्क्_३७.३९ //
3232 SK श्रुत्वैतत् तैः पितुः पार्श्वे न्यस्तो मौनं व्यधात्पुनः / पुनर्वधभयाच्चैव नीतः प्रोवाच तान् पथि // KAव्क्_३७.४० //
3233 SK राशिर्य एष धान्यस्य स हि भुक्तो ऽनुभुज्यते / इत्युक्तवाक्यो ऽपि पुनर्नोचे किंचित् पितु परः // KAव्क्_३७.४१ //
3234 SK ततः ख्यातप्रतिक्षेपे तस्यादिष्टे महीभुजा / सो ऽवदद्वरदानेन वच्मि प्रद्भ्यां व्रजामि च // KAव्क्_३७.४२ //
3235 SK अथास्य राज्ञा हृष्टेन वरदाने प्रतिश्रुते / स पद्भ्यां स्वयमभ्येत्य स्पष्टं पितरमब्रवीत् // KAव्क्_३७.४३ //
3236 SK नाहं पङ्गुर्न मूको ऽहं नैव चाहं जडाशयः / किंतु जन्मान्तरक्लेशं स्मृत्वा वैह्वल्यमाश्रितः // KAव्क्_३७.४४ //
3237 SK यौवराज्यसुखं भुक्त्वा षष्टिवर्षाण्यहं पुरा / षष्टिवर्षसहस्राणि न्यवसं नरकोदरे // KAव्क्_३७.४५ //
3238 SK राजभीत्या मया तस्मात् कृतेयं मूकपङ्गुता / प्रव्रज्यया ब्रह्मचर्यं चराम्येष वरो मम // KAव्क्_३७.४६ //
3239 SK इति तेनोक्तमाकर्ण्य तमुवाच महीपतिः / अमूक इत्याप्तधृतिर्विरक्त इति दुःखितः // KAव्क्_३७.४७ //
3240 SK धर्ममूलमिदं राज्यं पुत्र न त्यक्तुमर्हसि / यज्ञदानप्रजात्राणैः पुण्यपूर्णा नॄपश्रियः // KAव्क्_३७.४८ //
3241 SK एकपुत्रस्त्वया पुत्र परित्यागरसादहम् / निद्रादरिद्रताम् नीतः शोकशय्यासमाश्रयः // KAव्क्_३७.४९ //
3242 SK संपूर्णचन्द्ररुचिरां व्यक्तमौक्तिकहासिनीम् / कथं संपदमुत्सृज्य प्रव्रज्याभिमता तव // KAव्क्_३७.५० //
3243 SK कथं शय्याः परित्यज्य प्राज्यराज्यसुखोचिताः / वनान्तवासव्यसनी सेवसे पांशुलाः स्थलीः // KAव्क्_३७.५१ //
3244 SK कान्तालीलामुकुरमणिमन्मन्दिरीं राजधानीम् एतां त्यक्त्वाननु वनभुवः संपतद्व्याघ्रघोराः / सर्वप्रीत्यै जरदजगराश्वासविप्लुष्टपत्राः क्लिष्टच्छायाह् प्रविरललतास्ताः कथं ते भवन्ति // KAव्क्_३७.५२ //
3245 SK पितुः श्रुत्वेति वचनं राजपुत्रस्तमब्रवीत् / दन्तकान्ताधररुचिं वैराग्यं ग्राहयन्निव // KAव्क्_३७.५३ //
3246 SK शीतला निर्मलजलाह् संतोषशशिशीतलाः / वने वैराग्यसुभगा भुवः कस्य न वल्लभाः // KAव्क्_३७.५४ //
3247 SK परदारा इव क्षिप्रसुखावर्जितदुर्जनाः / नरकप्रत्ययायामे सापाया न प्रियाः प्रियाः // KAव्क्_३७.५५ //
3248 SK ध्यानं मन्त्रः परिज्ञानमिन्द्रियाणां चनिर्जयः / राज्ञां हिंसाप्रयत्नेन योगो ऽयं नरकप्रदः // KAव्क्_३७.५६ //
3249 SK हसन्त्यः संसारं कुसुमकलिलाः काननभुवः स्वभावेन प्रीतिं विदधति बुधानां शममयीम् / दृढं चिन्ताश्राण्ता व्यजनपवनोच्छ्वासबहुला विभूतिर्भूपानां शिरःसक्तामनित्यताम् // KAव्क्_३७.५७ //
3250 SK अनुजानीहि मां तात व्रजाम्येष तपोवनम् / जानीहि सर्वभावानां शिरःसक्तामनित्यताम् // KAव्क्_३७.५८ //
3251 SK इति पुत्रवचः श्रुत्वा तत्तथेति विचिन्तयन् / उवाचोपचिताश्चर्यस्तं मनीषी महीपतिः // KAव्क्_३७.५९ //
3252 SK विवेकविमलं पुत्र त्वमिच्छासि स चेद्वनम् / हित्वामे संशयं तावत् पश्चाद्युक्तिं करिष्यसि // KAव्क्_३७.६० //
3253 SK व्रजता बध्यवशुधां तिर्यगुक्तं त्वया वचः / प्रचुरं तदभिप्रायं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः // KAव्क्_३७.६१ //
3254 SK इति क्षितिभुजा पृष्टः सो ऽब्रवीत्तन्मयोदितम् / वसत्यत्र न कश्चित् त्वा मद्वधाद्यो निवर्तयेत् // KAव्क्_३७.६२ //
3255 SK सुकृती जीवति शवः स पापस्तु मृतो ऽमृतः / प्राक् पुण्यं भक्ष्यते मूलात् सधनैर्धान्यराशिवत् // KAव्क्_३७.६३ //
3256 SK इत्याशयान्मया तात तदुक्तं वचनं प्रियम् / * * * * * * * * // KAव्क्_३७.६४ //
3257 SK इति श्रुत्वा क्षितिपतिस्तं परिष्वज्य सादरः / उचितं क्रियताम् पुत्र कुशलायेत्यभाषतः // KAव्क्_३७.६५ //
3258 SK ततः स पित्रानुज्ञातः साश्रुनेत्रेण काननम् / प्रययौ मन्त्रिपुत्राणां सहितः पञ्चभिः शतैः // KAव्क्_३७.६६ //
3259 SK महर्षेरन्तिके तत्र प्रव्रज्यां प्राप्य सानुगह् / तेषां कालेन सो ऽपश्यत् कुण्डवल्कलसंचयम् // KAव्क्_३७.६७ //
3260 SK ततःस संचयद्वेषी तददर्शनसंविदा / एकाकी विजने तस्थौ कंचित् कालंमहामतिः // KAव्क्_३७.६८ //
3261 SK दर्शनाभाषणे बद्धनियमो ऽपि यदृच्छया / प्राप्तं स्वागतमित्युक्त्वा पप्रच्छ कुशलं मृगम् // KAव्क्_३७.६९ //
3262 SK पुनश्च पूजितं दृष्ट्वा मुनिं तेन मृगव्रतम् / अमात्यतनयाः सर्वे विलक्षाः समचिन्तयन् // KAव्क्_३७.७० //
3263 SK मृगो मृगव्रतश्चायं पूजितौ निष्परिग्रहौ / एतावनजिनौ दण्डसंब्ःआराडम्बरोज्झितौ // KAव्क्_३७.७१ //
3264 SK एतदर्थमनेनास्मद्दर्शने नियमः कृतः / व्रतोपकरणव्यग्रान्नूनमस्यापि वारयेत् // KAव्क्_३७.७२ //
3265 SK इति संचिन्त्य सर्वं ते व्रतोपचारसंचयम् / नद्यां प्रक्षिप्य वारायां ययुः शुद्धास्तदन्तिकम् // KAव्क्_३७.७३ //
3266 SK त्यक्त्वा गृहभूवं तेषामाशयानुशयोचिताम् / स धातुं प्रकृतिं ज्ञात्वा विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_३७.७४ //
3267 SK राजपुत्रः स एवाहं शाक्यास्ते मन्त्रिसूनवः / पुनस्त्यागोपदेशो ऽयमद्याप्येषां मया कृतः // KAव्क्_३७.७५ //
3268 SK इति शाक्यकुमारवृत्तमेतत् कथितं भिक्षुगणः स्वयं जिनेन / अवधार्य परामपूजयत् तां करुणामाश्रितवत्सलस्य तस्य // KAव्क्_३७.७६ //
3269 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां मूकपङ्ग्ववदानं नाम सप्तत्रिंशः पल्लवः //
3270 SK ३८. क्षान्यवदानम् /
3271 SK ते जयन्ति धृतिशीलिनः परं निर्विकाररुचिसूचिताद्भुताः / शेषवत् पृथुलभारनिर्व्यथाः ये वहन्ति सुकृतक्षमाः क्षमाम् // KAव्क्_३८.१ //
3272 SK पुरा पुरा पुण्यविपर्ययेण रिपुः प्रजानां जनितप्रकम्पः / उदुन्बनामा निबिडोपतापैर्यक्ष क्षयायैव कृतक्षणो ऽभूत् // KAव्क्_३८.२ //
3273 SK अकालकालं तमनाथबन्धुर्लोकानुकम्पी भगवान् प्रसह्य / शिक्षोपदेशं शरणं प्रपन्नं शमाभिधायी विनये न्ययुङ्क्त // KAव्क्_३८.३ //
3274 SK तस्मिन् प्रशान्ते भुवनोपतापे द्रष्टुं प्रहृष्टः सुगतं समेत्य / संचारिणं नाकपतिः प्रणम्य तत्कालजातस्मितमित्युवाच // KAव्क्_३८.४ //
3275 SK कस्मादकस्मात् स्मितचन्द्रलेखा मुखाम्बुजे भाति तवाद्भुतेयम् / अकारणं सत्त्वसुधासमुद्रा न लोकसामान्यतयाम् हसन्ति // KAव्क्_३८.५ //
3276 SK श्रुत्वेति वाक्यं त्रिदशेश्वरस्य तत् तं सर्वदर्शी भगवान् बभाषे / अस्मिन् प्रदेशे निजपूर्ववृत्तं स्मृत्वा स्म्तं जातमिदं ममेन्द्रं // KAव्क्_३८.६ //
3277 SK पुरा मुनिः क्षानिरतिर्वने ऽस्मिन्नुवास निर्वासितरोषदोषः / यो ऽभूद्भुवो रागरजःस्वभावे विद्वेषवानिन्दुरिवारविन्दे // KAव्क्_३८.७ //
3278 SK अथोत्तराशाधिपतिर्वसन्ते वनान्तरालोकनकौतुकेन / सान्तःपुरः केलिसुखाय कामी तदाश्रमोपान्तमहीमवाप // KAव्क्_३८.८ //
3279 SK रागी कलिर्नाम स भूमिपालः पादप्रहारैर्वदनासवैश्च / लेभे विलासेषु नितम्बिनीनामशोकशोभां बकुलश्रियं च // KAव्क्_३८.९ //
3280 SK दिशस्तपोलोपपृथुप्रकोपभ्रूभङ्गवृन्दैरिव तापसानाम् / तत्र भ्रमद्भिर्भ्रमरैर्बभूवुः कामाग्निधूमैरिव सान्धकाराह् // KAव्क्_३८.१० //
3281 SK लीलाविलोलाः पवनाकुलालीस्तनावनम्राः स्तबका लतानाम् / रक्ताधराः पाटलपल्लवानाम् प्रापुर्विलासं ललना लतानाम् // KAव्क्_३८.११ //
3282 SK राजाङ्गनाः कौतुकविभ्रमेण वने चरन्त्यस्तमृषिं विलोक्य / अचञ्चलध्यानसमाधिसक्तं विमुक्तरागं परिवार्य तस्थुः // KAव्क्_३८.१२ //
3283 SK तद्देशमभ्येत्य नरेश्वरो ऽथ दृष्ट्वा वभूभिः परिवारितं तम् / ईर्ष्याप्रकोपानलदुर्निरीक्ष्यः चिच्छेद तस्याशु स पाणिपादम् // KAव्क्_३८.१३ //
3284 SK छिन्नाङ्गवर्गो ऽपि स निर्विकारश्चुकोप भूपाय न नाम धीरः / न्यवारयत् क्रूरतरं च तस्मै गन्धर्वयक्षोरगदेवसंघम् // KAव्क्_३८.१४ //
3285 SK ततः प्रयाते नृपतौ पुरं स्वां समेत्य सर्वे मुनयो वनेभ्यः / तं तत्र कृतावयवं विलोक्य क्षान्ता अपि क्रोधधुता बभूवुः // KAव्क्_३८.१५ //
3286 SK शापप्रदानाभिमुखान् निवार्य क्षन्तव्यमित्येव स तानुवाच / क्षामासमालिङ्गितमानसानाम् कोपक्रियाभिः क्रियते न सङ्गः // KAव्क्_३८.१६ //
3287 SK विकारवेगो ऽपि न पाणिपादच्छेदे ममाभूद् यदि वीतमन्योः / सत्येन तेनाक्षतदेह एव स्यामित्यवादीत् स पुनः प्रसादी // KAव्क्_३८.१७ //
3288 SK ततः क्षणात् संगतपाणिपादं रूढव्रणं प्रेत्य सदोदयेन / अपूजयत् क्षान्तिगुणं स्तवेन तं देवता सत्त्वसितैश्च पुष्पैः // KAव्क्_३८.१८ //
3289 SK राजापि तत्किल्बिषकालकूटविस्फोटसंघट्टविनष्टचेष्टः / पूरोत्कटावर्तविवर्तमानः संवर्तपाकं नरकं जगाम // KAव्क्_३८.१९ //
3290 SK यो ऽभूत्पुरा क्षान्तिरतिर्महर्षिः सो ऽहं कलिर्यश्च स देवदत्तः / अतीतवृत्तस्मरणेन शक्र नाकारणं जातमिदं स्मितं मे // KAव्क्_३८.२० //
3291 SK इति भगवतः श्रुत्वा वाक्यं स विस्मयमानसः प्रमदविकचव्यक्तोत्साहा वहन्नयनावलीः / तरणिकिरणस्पर्शेनेव स्फुटः कमलाकरस् त्रिदशवसतिं प्रीतः प्रायात् पतिस्त्रिदिवैकसाम् // KAव्क्_३८.२१ //
3292 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां क्षान्त्यवदानमष्टत्रिंशः पल्लवः //
3294 SK अत्यन्तमुन्नतिमतां महतां विनाशदोषस्य दुर्जनसमागम एव हेतुः / कूलद्रुमाः किल फलप्रसवैः सहैव सद्यः पतन्ति जलसंगतिभिन्नमूलाः // KAव्क्_३९.१ //
3295 SK रुचिरागारशालिन्याम् वैशाल्यां भगवान् पुरा / वल्गुमत्यास्तटे नद्या विचचार तथागतः // KAव्क्_३९.२ //
3296 SK तस्याः कैवर्तसर्थेन गम्भीरे ऽम्भसि दुस्तरे / कदाचिद् घोरमकरः क्षिप्त्वा जालं समुद्धृतः // KAव्क्_३९.३ //
3297 SK अष्टादशशिराः सिःसद्विरप्रखराननः / नृणां सहस्रैराकृष्टः पर्वताकारविग्रहः // KAव्क्_३९.४ //
3298 SK तं दृष्ट्वा तत्र वित्रस्ताह् स्रस्ताकर्षणरज्जवः / आश्चर्यनिश्चलदृशो न तस्थुर्न ययुः क्षणम् // KAव्क्_३९.५ //
3299 SK गणनां गहनाश्चर्यविशेषशतशालिनाम् / संसारे कर्मवैचित्र्ये विकाराणां करोति कः // KAव्क्_३९.६ //
3300 SK अत्रान्तरे तमुद्देशं भगवान् भूतभावनः / जिनह् समाययौ सर्वजनत्राणकृतक्षणह् // KAव्क्_३९.७ //
3301 SK सवृद्धबालललनं जनं कौतुकसंगतम् / दृष्ट्वा तत्राकरोत्तीरे भगवानासनग्रहम् // KAव्क्_३९.८ //
3302 SK भिक्षुसंघैः परिवृतं दृष्ट्वा तत्र तथागतम् / जनो ऽभूदुन्मुखः सर्वः प्रत्यावृत्तः इवोदधिः // KAव्क्_३९.९ //
3303 SK तं विलोक्यैव विनताः कैवर्ताः प्राणिबन्धनम् / विशालजालं सहसा संसारमिव तत्यजुः // KAव्क्_३९.१० //
3304 SK मत्स्यकुम्भीनक्रादिसंसारं तद्गिराम्भसि / त्यक्त्वा ते विरताटोपा बभूवुः किल्बिषद्विषः // KAव्क्_३९.११ //
3305 SK तैर्न्यस्तं भगवान् दृष्ट्वा महाकमरमग्रतः / तं जगाद सृजन् दन्तकान्त्यैव करुणानदीम् // KAव्क्_३९.१२ //
3306 SK अपि त्वं कपिलः पुत्र किं न् अस्मरसि दुष्कृतम् / वचोदुश्चरितस्यायं परिपाको ऽनुभूयते // KAव्क्_३९.१३ //
3307 SK साप्यकल्याणमित्रं ते जननी क्काद्य वर्तते / सर्वज्ञेनेत्यभिहितः स्मृत्वा जातिमुवाच सः // KAव्क्_३९.१४ //
3308 SK विभो भवामि कपिलः स्मरामि निजदुष्कृतम् / वचोदुश्चरितस्यायं परिपाको ऽनुभूयते // KAव्क्_३९.१५ //
3309 SK याता मे नरकं माता नरकादेशिनी पुरा / इत्युक्त्वा मकरस्तत्र रुरोद परुषस्वरम् // KAव्क्_३९.१६ //
3310 SK तं शोकसागरे मग्नं बभाषे भगवान् पुनः / अकाले किं करोम्यद्य तिर्यग्योनिगतस्य ते // KAव्क्_३९.१७ //
3311 SK अपुण्यप्रारम्भे रभसहसितोल्लासविहिते प्रमत्तानां याते नरकपरिपाकप्रणयिताम् / अशान्तेः संतापं रुदितशरणानि प्रतिनिशं भृशं क्लेशावेशैर्दिशति विषतुल्यैरनुशयः // KAव्क्_३९.१८ //
3312 SK क्षणं दुःखक्षयायैव मयि चित्तं प्रसादय / प्रसन्नमानसः काले यास्यसि त्रिदशालयम् // KAव्क्_३९.१९ //
3313 SK शृणु वत्स हितं चेदं विचार्य कुरु चेतसि / अनित्याः सर्वसंस्काराः शान्तिनिर्वाणमक्षयम् // KAव्क्_३९.२० //
3314 SK इत्याज्ञयाः भगवतस्तस्मिन् याते प्रसन्नताम् / जनसंघः स सुचिरं बभूवाश्चर्यनिश्चलः // KAव्क्_३९.२१ //
3315 SK आर्यानन्दः प्रणयिना जनेनाभ्यर्थितस्ततः / तत्पूर्ववृत्तं पप्रच्छ भगवन्तं कृताञ्जलिः // KAव्क्_३९.२२ //
3316 SK स तेन पृष्टः प्रोवाच विमपज्ञानलोचनः / अस्याकुशलशीलस्य वृत्तान्तः श्रूयतामयम् // KAव्क्_३९.२३ //
3317 SK भद्रकाख्ये पुरा कल्पे वर्षायुतयुगायुषि / जने बभूव भगवान् काश्यपाख्यस्तथागतः// KAव्क्_३९.२४ //
3318 SK कृकिर्नाम महीपालः कल्पशाल इवार्थिनाम् / अभवत् समये तस्मिन् वाराणस्यां बहुप्रदः // KAव्क्_३९.२५ //
3319 SK कदाचिद्विबुधास्थाने सहस्राक्षमिवापरम् / आसीनं वादिसिंहाख्यस्तं विद्वानाययौ द्विजः // KAव्क्_३९.२६ //
3320 SK अविलम्बितसंप्राप्तदर्शनासनसत्कृतिः / स दत्ताशीर्नरपतिं शिष्यश्रेणिवृतो ऽभ्यधात् // KAव्क्_३९.२७ //
3321 SK स्वस्ति स्वस्तिमते बुधाधिपसभासीनाय तुभ्यं विभो लुब्धाः सच्चरितामृते तव परं संदर्शने रागिणः / सद्वेषाः परभूपनाम्नि मुखरास्ते सुद्गुणोदीरणे कस्मात्सर्वगुणाश्रयेण भवता दुषैर्वयं योजिताः // KAव्क्_३९.२८ //
3322 SK यद्याचका अपि निरन्तररत्नवर्षे नानार्थिसार्थपरिपूरकताम् प्रयान्ति / सर्वं भवानुपमपुण्यनिधे वदान्य निर्दैन्यदानविभवस्य विजृम्भितं ते // KAव्क्_३९.२९ //
3323 SK राजन् किंचित्परिचितगुणैः सेवया सद्गुरुभ्यः प्राप्तो ऽस्माभिर्विबुधविजयी को ऽपि विद्यांशलेशः / अस्यां विद्वत्कमलभरसौम्यप्रभायां सभायां तस्योत्कर्षं कतिपयपदं प्रत्ययं दर्शयामः // KAव्क्_३९.३० //
3324 SK निजगुणगणने धीर्लज्जते सज्जनानां मुखरयति तथापि प्रौढवादाभिलाषः / इयति जगति राजन् क्षिप्रमान्विष्यताम् मे प्रतिवचनरुचिशेदस्ति कश्चिद्विपश्चित् // KAव्क्_३९.३१ //
3325 SK संदर्भगर्भगम्भीरमिति तस्योत्कटं वचः / श्रुत्वा क्षितिपतिः क्षिप्रं विलक्षः समचिन्तयत् // KAव्क्_३९.३२ //
3326 SK अप्राप्तप्रतिमल्लो ऽयं यदि यायान्मदोद्धतः / तदेष मम् अदेशस्य यशःखण्डनदिण्डिमः // KAव्क्_३९.३३ //
3327 SK गुणापमानकृद् यत्र मूर्खो भवति भूपतिः / न करोति जनस्तत्र विद्यार्जनपरिश्रमम् // KAव्क्_३९.३४ //
3328 SK विवेकविमलालोके धर्मारामे महीपतौ / लोके विद्याः प्रवर्तन्ते सदाचारक्रिया इव // KAव्क्_३९.३५ //
3329 SK तस्मादस्य प्रयत्नेन कर्तव्यो मदनिग्रह / विद्यादरिद्रता देशे दोष एव विशांपतेः // KAव्क्_३९.३६ //
3330 SK इति संचिन्त्य नृपतिर्विप्रं कर्वटवासिनम् / आनिनाय महामत्यैरन्विषय विदुषां गुरुम् // KAव्क्_३९.३७ //
3331 SK अभूभृत्सभामुपाध्याय प्रेत्य तं तर्ककर्कशम् / चकार वादिसिंहस्य दर्पकेसरकर्तनम् // KAव्क्_३९.३८ //
3332 SK तस्य तेन जितस्याशु विजिताशेषवादिनः / मौनसूत्रं समापेदे लज्जितेव सरस्वती // KAव्क्_३९.३९ //
3333 SK आरूढाः शुभ्रमहसं नक्षत्राणामिवोदयाः / उपर्युपरि दृश्यन्ते गुणोत्कर्षा मनीषिणाम् // KAव्क्_३९.४० //
3334 SK वादिसिंहं विसृज्याथ दत्वा भूरि धनं नृपः / ददौ द्विजाय जयिने कर्वटं नगरोपमम् // KAव्क्_३९.४१ //
3335 SK लब्धराजगजाश्वो ऽथ चरुकेयूरकङ्कणः / उपाध्यायः स्वभवनं प्रविवेश सह श्रिया // KAव्क्_३९.४२ //
3336 SK भुजैर्जिता भूमिभुजां वणिजां सागरार्जिताः / विद्यावतां विराजन्ते गुणोत्कर्षर्जिताः श्रियः // KAव्क्_३९.४३ //
3337 SK कालेन श्रीमतस्तस्य पुत्रजन्मोत्सवो ऽभवत् / सुखे ऽपि सुखसंपत्तिर्लक्षणं पुण्यकर्मणाम् // KAव्क्_३९.४४ //
3338 SK कपिलो नाम स शिशुस्तेजःपिङ्गशिरोरुहः / वर्धमानमतिर्विद्वान् पितुरभ्यधिको ऽभवत् // KAव्क्_३९.४५ //
3339 SK कुले महति वैदुष्यं विभवोद्भवः / विभवे सत्सुतोत्कर्षः फलं सुकृतशाखिनः // KAव्क्_३९.४६ //
3340 SK कदाचिद्व्याधिसंयोगात्प्रत्यासन्नतनुक्षयः / विजने पुत्रमाहूय सो ऽवदत् पुत्रवत्सलः // KAव्क्_३९.४७ //
3341 SK बाल्ये गुणार्जनं पुत्र परलोकसुखार्जनम् // KAव्क्_३९.४८ //
3342 SK उत्तमर्ण इव प्राप्ते काले सुगणितावधौ / अधुना विवशः क्काहं क्क सा विद्या क्क तद्धनम् // KAव्क्_३९.४९ //
3343 SK गुणपुष्पे सुखफले बद्धमूले धनैर्जने / वने वज्र इवाकालकालः पततिः दुःसहः // KAव्क्_३९.५० //
3344 SK क्षपयति सकलाभिर्जन्म विद्याकलाभिः क्षणिकसुखनिमित्तं संनिधत्ते च वित्तम् / पशुशिशुषु मनुष्यः प्रीयते मोहशिष्यः तनुविरहमूर्हूर्ते सर्वमन्यत् स चान्यः // KAव्क्_३९.५१ //
3345 SK इदं तु ते हितं वच्मि स्नेहमोहवशीकृतः / संसारसारशरणं वत्स वेत्सि बहुश्रुतः // KAव्क्_३९.५२ //
3346 SK सन्तः प्रणम्याः परुषण् न वाच्यं कार्यः प्रयत्नेन परोपकारः / पापावपाते सततं हि पुंसामेतानि पुण्यान्यवलम्बनानि // KAव्क्_३९.५३ //
3347 SK अलोभशोभाभरणा विभूतिरद्वेषसक्तिः स्वसुखेष्वमोहः / मूलत्रये ऽस्मिन् कुशलद्रुमस्य वसत्यशेषाखिलसत्फतश्रीः // KAव्क्_३९.५४ //
3348 SK यावत्तपति तीक्ष्णांशुरस्मिन् भुवनमण्डले / तावत्त्वत्सदृशः पुत्र विद्वान् वादी न विद्यते // KAव्क्_३९.५५ //
3349 SK भिक्षुभिस्तु न कर्तव्यस्त्वया वादः कदाचनह् / गम्भीरज्ञानदुर्बोधप्रबुद्धा बौद्धबुद्धयः // KAव्क्_३९.५६ //
3350 SK पुरा भिक्षुर्मया पृष्टः पदस्यार्थं जहास माम् / प्रश्नं कर्तुं न जानीषे विद्वानिति जगाद च // KAव्क्_३९.५७ //
3351 SK तस्माद् भिक्षुविवादस्ते परं पाण्डित्यपीडनम् / बलप्रभावकामो हि गिरिं मूर्ध्नां न ताडयेत् // KAव्क्_३९.५८ //
3352 SK इत्युक्त्वा तनयं विप्रः परलोकभुवं ययौ / कायावसथपान्थानां देहिनाम् न चिरस्थितिः // KAव्क्_३९.५९ //
3353 SK वाग्मी कालेन कपिलः खण्डिताखिलपण्डितः / नृपाद्बहुग्र्णं प्राप धनमानमहोदयम् // KAव्क्_३९.६० //
3354 SK ततः कदाचिदेकान्ते कपिलं काचराभिधा / संप्राप्तं वादिसाम्राज्यं जगाद जननी शनैः // KAव्क्_३९.६१ //
3355 SK वादिदर्पच्छिदा पुत्र दिग्द्वीपजयिना त्वया / दुर्जनाः श्रमणाः कस्माद्दर्पान्धाः परिवर्जिताः // KAव्क्_३९.६२ //
3356 SK परोत्कर्षाधिरूढस्य प्रतिपक्षे क्षमारतेः / अक्षमो ऽयमिति व्यक्तं क्षणेन क्षीयते यशः // KAव्क्_३९.६३ //
3357 SK इति मातुर्वचः श्रुत्वा सो ऽवदद् बिदुषो वचः / न वादः श्रमणैः कार्यः पित्राहमिति वारितः // KAव्क्_३९.६४ //
3358 SK इयं दुर्जीविकास्माकम् पत्रालम्बनवादिनाम् / क्रियते गुणमान्यानां मानम्लानिर्मुखे यया // KAव्क्_३९.६५ //
3359 SK धिगेतच्चण्डपाण्डित्यं गुरुविद्वेषदुःसहम् / महतां सुखभङ्गाय सदा तस्मिन् समुद्यमः // KAव्क्_३९.६६ //
3360 SK यस्यां न मया सा बुद्धिः सा श्रीर्लोभं निहन्ति या / दर्पो न यस्य विद्या सा शक्तिर्या च क्षमावती // KAव्क्_३९.६७ //
3361 SK एवमेव न कर्तव्यः परैर्विद्वेषविग्रहः / किं मातर्जगताम् पूज्यभिक्षुभिः ख्यातलक्ष्मभिः // KAव्क्_३९.६८ //
3362 SK विजेतुं न च ते शक्याः प्रंआनपरिनिष्ठिताः / प्रतिपक्षैरविक्षिप्तं येषां नैरात्म्यशासनम् // KAव्क्_३९.६९ //
3363 SK इति पुत्रवचः श्रुत्वा कुपिता तमुवाच सा / अभूत्तव पिता नूनं पापश्रमणचेतकः // KAव्क्_३९.७० //
3364 SK महति ब्राह्मणकुले जातः प्राज्ञो बहुश्रुतः / भिक्षपक्षे निपतितः कथं त्वमपि तादृशः // KAव्क्_३९.७१ //
3365 SK पृथुप्रमाणखङ्गेन कुरु श्रमणनिग्रहम् / अविदार्याभ्रसंघातं तीर्क्ष्णांशुर्न विराजते // KAव्क्_३९.७२ //
3366 SK इत् स प्रेरितो मातुर्गिरा तद्भक्तियन्त्रितः / भिक्षूणामाश्रमपदं शनैर्गन्तुं समुद्ययौ // KAव्क्_३९.७३ //
3367 SK व्रजन् स संमुखायातं भिक्षुं जिज्ञासया पथि / ग्रन्थसारं प्रमाणं च पप्रच्छ समयोचितम् // KAव्क्_३९.७४ //
3368 SK स तेन पृष्टः प्रोवाच गाढशब्दार्थनिर्णयम् / लक्षत्रयप्रमाणं न शस्त्रं तीर्थिकदुर्लभम् // KAव्क्_३९.७५ //
3369 SK कुतः पारे ऽतिवर्तन्ते क्क च वर्त्मातिवर्तते / सुखदुःखे च लोकस्य क्कचित् समभिबन्धतः // KAव्क्_३९.७६ //
3370 SK इति गम्भीरशब्दार्थं शास्तुर्भगवतो वचः / अनुपासितसर्वज्ञैर्ज्ञायते न यथा तथा // KAव्क्_३९.७७ //
3371 SK एतदाकर्ण्य कपिलः श्लोकगाम्भीर्यविस्मितः / ययौ भगवतः पुण्यं काश्यपस्य तपोवनम् // KAव्क्_३९.७८ //
3372 SK तथा भिक्षुगणं दृष्ट्वा प्रसन्नहृदयाननः / अचिन्तयत् तदश्रद्धां विहाय गतमत्सरः // KAव्क्_३९.७९ //
3373 SK एतेषां द्वेषकालुष्यात् क्रौर्यं कः कर्तुमर्हति / येषां संदर्शनेनैव वैमल्यं लभते मनः // KAव्क्_३९.८० //
3374 SK इति संचिन्त्य स चिरं तद्विवादपराङ्मुखः / दूराध्वखिन्नः स्वगृहं गत्वा प्रोवाच मातरम् // KAव्क्_३९.८१ //
3375 SK मिथ्यैवाहं त्वया मातः प्रेरितः कलिकर्मणि / अजयाः श्रमणा लोके गूढार्थग्रन्थवादिनः // KAव्क्_३९.८२ //
3376 SK श्लोकमात्रं मया श्रुत्वा भिक्षोरेकस्य वर्त्मनि / अज्ञातार्थेन वैलक्ष्यात् सुचिरं वीक्षितां क्षितिः // KAव्क्_३९.८३ //
3377 SK तद्ग्रन्थेष्वकॄताभ्यासस्तान् वक्तुं कह् प्रगल्भते / कथयन्ति स्वशस्त्रं ते न हि प्रव्रजितादृते // KAव्क्_३९.८४ //
3378 SK इति तेनोदितं श्रुत्वा जननी तमभाषत / आयासिताहं भवता गर्भभारेण केवलम् // KAव्क्_३९.८५ //
3379 SK संघर्षमर्षशून्येन दैन्यात् सर्वप्रणामिना / धर्षणानिर्विमर्षेण क्रियते पुरुषेण किम् // KAव्क्_३९.८६ //
3380 SK लोके सकलरत्नानां तेजसैव महार्घता / को ह्यर्थः पुरुषप्राणैस्तेजोजीवनवर्जितैः // KAव्क्_३९.८७ //
3381 SK मिथ्या तद्ग्रन्थलाब्ःआय प्रव्रज्या गृह्यते न किम् / मूर्ध्नि कृत्तेषु जायन्ते किं केशेषु कुशः पुनः // KAव्क्_३९.८८ //
3382 SK इति मातुर्गिरा तस्य मनः कलुषतां ययौ / सहसा कालवातालीरजोरुद्धमिवाम्बरम् // KAव्क्_३९.८९ //
3383 SK ततः स कूटप्रशमप्रणयी भिक्षुकाननम् / गत्वा गृहीत्वा प्रव्रज्यां शास्त्रं सौगतमाप्तवान् // KAव्क्_३९.९० //
3384 SK कालेन धर्मकथकः स विद्वान् गुणगौरवात् / सिंहासनं समारुह्य विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_३९.९१ //
3385 SK जनन्या प्रेरितस्तस्यां देशनायां क्रमेण सः / भिक्षुधर्मविरुद्धार्थं अव्क्तुं समुपचक्रमे // KAव्क्_३९.९२ //
3386 SK धर्मप्रहारव्यथितैर्भिक्षुभिः स पदे पदे / निवार्यमाणस्तानूचे कृत्वा विकृतमाननम् // KAव्क्_३९.९३ //
3387 SK अज्ञात्वा दर्पमुखरैरयथा बहुवादिभिः / भवद्भिः स्थूलदन्तोष्ठैर्व्याख्या मम विसूदिता // KAव्क्_३९.९४ //
3388 SK यूयं गर्दभमर्कटोष्ट्रवदना द्वीप्यास्यपश्वानना मार्जारैणवराहकुक्कुरमुखा दुर्दर्शवक्र्क्रः परम् / सह्या मौनजुषो ऽपि नैव विकटाटोपं रटन्तः किमु भ्रूभङ्गैरिति भिक्षुसंघमसकृन्निर्भर्त्सयन् सो ऽभ्यधात् // KAव्क्_३९.९५ //
3389 SK तस्य वाक्यशरैस्तीक्ष्णैर्विकृत्ता इव भिक्षवः / अनुक्त्वैव प्रतिवचस्त्यक्त्वा तं ययुरन्यतः // KAव्क्_३९.९६ //
3390 SK तेन वाक्पातकेनाथ पश्चात्तापमुपागतः / तत्याज जननीमेव प्रव्रज्याम् न तु तां द्विजः // KAव्क्_३९.९७ //
3391 SK श्रमणैर्मे हृतः पुत्र इति सा विप्रलापिनी / उन्मादिनी तनुं त्यक्त्वा प्रपेदे नरकस्थितिम् // KAव्क्_३९.९८ //
3392 SK ततः कालेन कपिलः स्वयं कलितकिल्बिषः / देहान्ते वाक्यपारुष्यादिमां मकरतां गतः // KAव्क्_३९.९९ //
3393 SK तान्येतानि मुखान्यस्य यान्यूचे भिक्षुभर्त्सने / फलं सदृशरूपं हि कर्मबीजात् प्रजायते // KAव्क्_३९.१०० //
3394 SK इत्युक्त्वा तत्र भगवान् धर्ममादिश्य शाश्वतम् / जनस्यानुग्रहं चक्रे नानाबोधिविधायकम् // KAव्क्_३९.१०१ //
3395 SK ततः प्रयाते स्वपदं जिने तन्मयमानसः / कमरः प्रोज्झिताहारस्त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ // KAव्क्_३९.१०२ //
3396 SK चातुर्महाराजिकेषु देवेषु विशदद्युतिः / श्रीमान् स जातः सुगते क्षणं चित्तप्रसादनात् // KAव्क्_३९.१०३ //
3397 SK ततः पूर्णेन्दुवदनः स्रग्वी रुचिरकुण्डलह् / स साकार इवानन्दः सुगतं द्रष्टुमाययौ // KAव्क्_३९.१०४ //
3398 SK प्रकीर्णदिव्यकुसुमः किरीटस्पृष्टभूतलः / प्रभापूरितदिक्चक्रस्तं भक्त्या प्रणनाम सः // KAव्क्_३९.१०५ //
3399 SK चक्रे तस्योपविष्टस्य भगवान् धर्मदेशनाम् / यया स्रोतःफलं प्राप्य सत्यदर्शी जगाम सः // KAव्क्_३९.१०६ //
3400 SK तृणमिव गुरुकायो ऽप्युद्धृतः पापपङ्काद् इति स जननिकायः सो ऽपि दुःखाज्जिनेन / व्यसननिपतितानां लीलया पुण्यशीला निखिलमतुलमूलं क्लेशमुन्मूलयन्ति // KAव्क्_३९.१०७ //
3401 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां कपिलवदानं नाम एकोनचत्वारिंशः पल्लवः //
3402 SK ४०. उद्रायणावदानम् /
3403 SK तुल्यमेव पुरुषेण भुज्यते कायभाजनगतं शुभाशुभम् / देहिनां विविधकर्मजं फलं न ह्यभुक्तमुपयाति संक्षयम् // KAव्क्_४०.१ //
3404 SK भगवान् सुगतः पूर्वं पुरे राजगृहाभिधे / कलन्दकनिवासाख्ये विजहार वनान्तरे // KAव्क्_४०.२ //
3405 SK बिम्बिसारः क्षितिपतिस्तत्राभूद्विश्रुतः श्रिया / आकरः सरव्रत्नानां रत्नाकरम् इवापरः // KAव्क्_४०.३ //
3406 SK बभूव समये तस्मिन् रौरुकाख्ये पुरे नृपः / श्रीमानुद्रायणो नाम यशश्चन्द्रमहोदधिः // KAव्क्_४०.४ //
3407 SK तस्य चन्द्रप्रभा नाम पत्नी चन्द्राननाभवत् / शिखण्डी युवराजश्च सूनुर्विक्रमकर्कशः // KAव्क्_४०.५ //
3408 SK हिरुको भिरुकश्चेति तस्यामात्यौ बभूवतुः / गणनीयौ न विनये ययुः शुक्रबृहस्पती // KAव्क्_४०.६ //
3409 SK जाता भूमिभुजः प्रीतिर्लेखखत्विषस्तयोः / रवेर्दूरस्थितस्यापि कमलाकरयोरिव // KAव्क्_४०.७ //
3410 SK अपूर्वरत्ननिचयप्रेषणैर्बहुशस्तयोः / परिपूर्णं परं प्राप सख्यं प्रेम विधानतः // KAव्क्_४०.८ //
3411 SK दूरस्थापि परं प्रीतिः सतां कीर्तिरिवाक्षया / संसक्तापि खलप्रीतिस्तृणज्वालेव न स्थिरा // KAव्क्_४०.९ //
3412 SK कदाचिद्दिव्यरत्नाङ्कं कवचं काञ्चनोज्ज्वलम् / प्राहिणोद् बिम्बिसाराय सारमुद्रायणो नृपः // KAव्क्_४०.१० //
3413 SK विषह्सस्त्राग्निरक्षार्हं विचित्ररत्नकं च तत् / सुहृत्प्रेषितमादाय प्रोवाच सचिअवान् नृपः // KAव्क्_४०.११ //
3414 SK इदं मे प्रहितं तेन सौजन्यमिव भूभुजा / सर्व रक्षाक्षमं वर्म गाढप्रेमनिवेदकम् // KAव्क्_४०.१२ //
3415 SK न पश्याम्यस्य सदृशं प्रतिदेयं तथाधिकम् / अल्पप्रतिक्रिया शल्यमुपकारापकारयोः // KAव्क्_४०.१३ //
3416 SK उचितं चिन्त्यतां किंचित् प्रेषणीयमतो ऽधिकम् / सर्वैर्भद्भिरित्युक्त्वा नॄपश्चिन्ताकुलो ऽभवत् // KAव्क्_४०.१४ //
3417 SK अथ धीमान् महामात्यश्चिरं ध्यात्वा तमब्रवीत् / वर्षकाराभिधो विप्रः सर्वविद्यासु पारगः // KAव्क्_४०.१५ //
3418 SK अतो बहुगुणं रागन्नेकमेवास्त्युपायनम् / तस्य संप्रेषने यत्नः क्रियतां यदि शक्यते // KAव्क्_४०.१६ //
3419 SK य एष भगवान् बुद्धः स्थितस्त्वद्विषयान्तिके / देवानामादरस्थानं पटस्तत्प्रतिमान्वितः // KAव्क्_४०.१७ //
3420 SK अशेषलोककल्याणकलिकाकल्पपादपः / चित्रे स्वप्ने ऽथ संकल्पे पृथुपुण्यैः स दृश्यते // KAव्क्_४०.१८ //
3421 SK इति मन्त्रिवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा महीपतिः / गत्वा भगवते नम्रस्तमेवार्थं न्यवेदयत् // KAव्क्_४०.१९ //
3422 SK अनुज्ञातस्ततस्तेन नृपश्चित्रकरान् वरान् / आदिदेशाशु भगवत्प्रतिमोल्लेखकर्मणि // KAव्क्_४०.२० //
3423 SK जिनस्यालोकयन्तस्ते मूर्ति रूपव्शीकृताः / ययुः प्रमाणग्रहणे प्रगल्भा अप्यशक्तताम् // KAव्क्_४०.२१ //
3424 SK संक्रान्तां निमलपटे छायां भगवतस्ततः / सुवर्णभावनाभिख्यां ते शनैः समपूरयन् // KAव्क्_४०.२२ //
3425 SK प्राःइणोदथ भूपालस्तं बुद्धप्रतिमापटम् / जगन्नयनपुण्यानां मूर्तानामिव संचयम् // KAव्क्_४०.२३ //
3426 SK बिम्बिसारस्य हस्ताङ्कलेखामुद्रायणो नृपः / पटस्य पुरतः प्राप्ताम् हृष्टः स्वयमवाचयत् // KAव्क्_४०.२४ //
3427 SK सुगतचरणपद्मन्यासपुण्योपकण्ठात् त्रिदशपुरविशेषान्मागधोदाररदेशात् / कुशलकलितमूर्तिर्भूपतिर्बिम्बिसारः क्षितितलतिलकं त्वां धर्मबन्धुर्ब्रवीति // KAव्क्_४०.२५ //
3428 SK एतत्ते प्रहितं हितं भवमहामोहामये भेषजं राजद्वेषविषापहं भगवतो बिम्बं शशाङ्कत्विषः / तृष्णापच्छमनं प्रसन्नमधुरं त्वन्नेत्रपात्रार्पितं धन्यः पुण्यरसायनं पिब हठादाकण्ठमुत्कण्ठितः // KAव्क्_४०.२६ //
3429 SK सन्मार्गे विनियोजनं स्गुणगणाधाने सदाध्यापनं दुर्व्यापारनिवारणम् थिरसुखप्राप्तौ परिप्रेरणम् / निर्व्याजोपकृतौ निरन्तरतया सर्वात्मना वर्तनं कर्तव्यं किमतः परं प्रियहितं कल्याणमित्रैः सताम् // KAव्क्_४०.२७ //
3430 SK इति लेखार्थमास्वाद्य सुहृत्प्रेमामृतोचितम् / राजा गजाधिरूढस्य पटस्य प्रययौ पुरः // KAव्क्_४०.२८ //
3431 SK अभिनन्द्य तमानन्दात् सामात्यः सपुरोहितः / हेमसिंहासनोत्सङ्गे स प्रसार्य न्यवेशयत् // KAव्क्_४०.२९ //
3432 SK लावण्यपुण्यनिलयं दृष्ट्वा तत्सौगतं वपुः / नमो नमह् प्रबुद्धायेत्यवदजगतीजनः // KAव्क्_४०.३० //
3433 SK बुद्धाभिधानं श्रुत्वैव पुलकालंकृताकृतिः / पुष्पवर्षे सुरैर्मुक्ते विस्मितो ऽभून्महीपति // KAव्क्_४०.३१ //
3434 SK पुण्यं भगवतः श्रुत्वा स तत्र चरितामृतम् / पयोदानादसोत्कण्ठनीलकण्ठतुलां ययौ // KAव्क्_४०.३२ //
3435 SK द्वादशाङ्गं पटस्याध सानुलोमविपर्ययम् / प्रतीत्यसमुत्पादं च दृष्ट्वा मोहं मुमोच सः // KAव्क्_४०.३३ //
3436 SK स्रोतःप्राप्तिफलेनैवं दृष्टसत्यो ऽथ भूपतिः / दिदेश प्रतिसंदेशं सख्युर्भिक्षुर्विसर्जनैः // KAव्क्_४०.३४ //
3437 SK बिम्बिसारस्ततस्तस्मै कृत्वा भगवतो ऽर्थनाम् / कात्यायनं च व्यसृजत् शैलाख्याम् चापि भिक्षुणीम् // KAव्क्_४०.३५ //
3438 SK उद्रायणस्य नॄपतेरार्यः कात्यायनो ऽथ सः / पूजाविधायिनस्तत्र विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_४०.३६ //
3439 SK धर्मदेशनया तस्य संगतः सुमहान् जनः / स्रोतःसकृदनागामिफलार्हत्पदमाप्तवान् // KAव्क्_४०.३७ //
3440 SK तस्मिन् गृहपती ख्यातौ तिष्यपुष्याभिधौ पुरे / शान्त्यै प्रव्रज्य तस्याग्रे परिनिर्वृतिमापतुः // KAव्क्_४०.३८ //
3441 SK कालेन विहितै स्तूपौ देहान्ते ज्ञातिभिस्तयोः / तन्नामचिह्नावद्यापि वन्दन्ते चैत्यवन्दकाः // KAव्क्_४०.३९ //
3442 SK देव्याश्चन्द्रप्रभायाश्च शओलाख्या सापि भिक्षुणी / क्रमेणान्तःपुरे चक्रे सततं धर्मदेशनाम् // KAव्क्_४०.४० //
3443 SK कदाचिदथ भूपालह् क्रीडगारगतां प्रियाम् / तामज्ञासीन्निमित्तज्ञः सप्ताहावधिजीविताम् // KAव्क्_४०.४१ / ज्ञातसंसारचरितस्ततस्तां वशुधाधिपः / अनुजज्ञे शुभपदं प्रातुं प्रव्रज्यया पुरः // KAव्क्_४०.४२ //
3444 SK स्वाख्याते धर्मविन्मये भिक्षुक्या नृपतेर्गिरा / देवी प्रव्रजिता देहं दिने तत्याज सप्तमे // KAव्क्_४०.४३ //
3445 SK चातुर्महाराजिकेषु देवेषु सहसैव सा / प्रयाता देवकन्यात्वं जगाम जिनकाननम् // KAव्क्_४०.४४ //
3446 SK तत्र पूर्णेन्दुवदना दिव्याभरणभूषिता / दृष्ट्वा शाक्यमुनिं हृष्टा सा पपातास्य पादयोः // KAव्क्_४०.४५ //
3447 SK प्रकीर्णदिव्यपुष्पायास्तस्याश्चक्रे तथागतः / धर्मोपपादनं येन दृष्टसत्या जगाम सा // KAव्क्_४०.४६ //
3448 SK सा गत्वा नगरं पत्युर्व्योम्ना मूर्तिरिवैन्दवी / विबोध्य निशि सुप्तस्य चक्रे बोधिप्रकाशनम् // KAव्क्_४०.४७ //
3449 SK यातायां स्वपदं तस्यां प्रभाते वसुधाधिपः / प्रव्रज्याभिमुखः पुत्रमभिषिच्य शिखण्डिनम् // KAव्क्_४०.४८ //
3450 SK प्रजात्राणाय निक्षिप्य तं महामात्ययोस्ततः / नृपतेर्बिम्बिसारस्य सुहृदः स ययौ पुरम् // KAव्क्_४०.४९ //
3451 SK बिम्बिसारस्तमायातं विगतच्छत्रचामरम् / नृपोपचारैः प्रणतः प्रीतिपूतैरपूजयत् // KAव्क्_४०.५० //
3452 SK विश्रान्तमासनासीनं स तमूचे सविस्मयः / हृष्ठः संदर्शनेनास्य श्रीवियोगेन दुःखितः // KAव्क्_४०.५१ //
3453 SK राजन्ननन्तसामन्तमौलिविश्रान्तशासनः / पाकशासनतुल्यस्त्वं कथमेवमुपागतः // KAव्क्_४०.५२ //
3454 SK अभिन्नवक्र्क्रप्रकृतेर्गुप्तमन्त्रस्य धीमतः / परेण राज्यहरणं वीर संभाव्यते न ते // KAव्क्_४०.५३ //
3455 SK इति पृष्टः स सुहृदा सस्मितस्तमभाषत / राजन् वृद्धिविभूतिर्मे न प्रिया सर्वगामिनी // KAव्क्_४०.५४ //
3456 SK विषयास्वादवैमुख्याद् वितृष्णेन मया स्वयम् / उत्सृष्टमिव संत्यक्तमैश्वर्यं भोगभाजनम् // KAव्क्_४०.५५ //
3457 SK त्वया कल्याणमित्रेण सुगतप्रतिमापटः / यो ऽसौ हिताय प्रहितः स् अवैराग्यगुरुर्ममः // KAव्क्_४०.५६ //
3458 SK अधुना त्वत्प्रसादेन गत्वा भगवतो ऽन्तिके / इच्छाम्यवाप्तुं प्रव्रज्यामगारादनगारिकः // KAव्क्_४०.५७ //
3459 SK इति सख्युर्वचः श्रुत्वा तत्तथेति विचिन्त्य च / सादरस्तद्विवेकेन बिम्बिसारस्तमब्रवीत् // KAव्क्_४०.५८ //
3460 SK धन्यो बहुमतश्चासि सतां त्वं पृथिवीपते / कथं संसारविमुखी जाता ते मतिरीदृशी // KAव्क्_४०.५९ //
3461 SK संतोषविभवो भोगसुभगः शोभसे परम् / लक्षणं शुद्धसत्त्वानां वैराज्याभरणं मनह् // KAव्क्_४०.६० //
3462 SK किं साम्राज्यमहौजसा सरजसा दुःसाधनैः साधनैः किं भोगैः क्षणभोजनैः कुलषदैः किं सत्त्वदुःखैः सुखैः / संसारोपरमाय चेतसि सतां जन्मान्तरोपार्जितं वैराग्यं कुरुते पदं यदि महामोहप्ररोहापहम् // KAव्क्_४०.६१ //
3463 SK येन प्राणमनःप्रिया वसुमती संत्यज्यते लीलया त्रैलोक्याभिमते ऽपि यः स्मरसुखे वैमुख्यदीक्षागुरुः / संमोहव्य्सनातुरं जगदिदं येनानुकम्पास्पदं पुण्यैः को ऽपि स जायते मतिमतां संसारवामः शमह् // KAव्क्_४०.६२ //
3464 SK इत्युक्त्वा बिम्बिसारस्तं नीत्वा वेणुवनाश्रमम् / सप्रणामं भगवते तद्वृत्तान्तं न्यवेदयत् // KAव्क्_४०.६३ //
3465 SK उद्रायणो ऽपि सुगताकारं सुचिरचिन्तितम् / विलोक्य हर्षादात्मानं कृतकृत्यममन्यत // KAव्क्_४०.६४ //
3466 SK पर्णामव्यग्रशिरसा संसारच्छेदिनि तनौ / पपात भगवद्दृष्टिस्तस्य प्रव्रज्यया सह // KAव्क्_४०.६५ //
3467 SK भिक्षुभावमथासाद्य पात्रपाणिः स चीवरी / नगरे पिण्डपातार्थी चकार जनविस्मयम् // KAव्क्_४०.६६ //
3468 SK प्रजाः शिखण्डी धर्मेण पालयित्वा प्रसन्नधीः / यातः कालेन कालुष्यमधर्माभिरतो ऽबह्वत् // KAव्क्_४०.६७ //
3469 SK कलुषं काञ्चनरुचिव्यक्तविद्युद्विलासिनी / न कस्य कुरुते लक्ष्मीर्मेघमालेव मानसम् // KAव्क्_४०.६८ //
3470 SK अनायत्तं महामात्यौ हिरुको भिरुकश्च तम् / अधर्मकर्मनिरतं क्रुद्धौ तत्यजतुः प्रभुम् // KAव्क्_४०.६९ //
3471 SK तत्पदे विहितौ राज्ञा सचिवौ दण्डमुग्दरौ / चित्तानुवृत्तिकुशलौ स्वैरं सक्तं तमूचतुः // KAव्क्_४०.७० //
3472 SK प्रजारञ्जनसंसक्ता राजदौर्जन्यवादिनः / स्वयशःख्यापनायैव जायन्ते धूर्तमन्त्रिणः // KAव्क्_४०.७१ //
3473 SK न धर्मं न सुखं नार्थं न कीर्ति न च जीवितम् / गणयन्ति प्रभोरर्थे ते भृत्या भव्यभक्तयः // KAव्क्_४०.७२ //
3474 SK नाखण्डिता नाक्षयिता नातप्ता नाप्यपीडिताः / कुर्वन्त्यर्थक्रिया राज्ञस्तिलतुल्याः किल प्रजाः // KAव्क्_४०.७३ //
3475 SK इति ब्रुवाणौ तौ राज्ञा नियुक्तौ राज्यचिन्तने / लोभात् प्रवृत्तौ दुर्नीतौ हन्तुं निःशरणाः प्रजाः // KAव्क्_४०.७४ //
3476 SK निर्विचारे दुराचारे कुमतौ पृथिवीपतौ / लुप्तसत्ये महामात्ये प्रजानां जीवितं कुतः // KAव्क्_४०.७५ //
3477 SK उद्रायणो ऽथाचिरेण कदाचिद् वणिजंपथि / निजदेशागतं वार्तां पप्रच्छ नृपराष्ट्रयोः // KAव्क्_४०.७६ //
3478 SK सो ऽवदद्देव कुशली सुतस्तव महीपतिः / किं तु सन्मन्त्रिरहितः कुमन्त्रिवशमागतः // KAव्क्_४०.७७ //
3479 SK तत्र प्रजानां विततोपतापः को ऽपि प्रवृत्तः प्रभुशासनेन / येनाद्य तत्कुत्सितदेशजन्म दिवानिशं शोचति पौरलोकः // KAव्क्_४०.७८ //
3480 SK यत्र ध्वान्तं सृजति तरणिर्यत्र चन्द्रो ऽग्निवर्षी यत्रोदेति प्रकटममृतादुत्कटः कालकूटः / यत्र त्राता हरति नृपतिर्जीववृत्तिं प्रजानां तत्राक्रन्दं प्रसॄतविपुलोपप्लवं कः शृणोति // KAव्क्_४०.७९ //
3481 SK इत्यासक्तनृपायासखिन्नस्यार्तिमयं वचः / दुःसहं वणिजः श्रुत्वा स तमूचे कृपानिधिः // KAव्क्_४०.८० //
3482 SK दद्गिरा त्वमितो गत्वा तूर्णमाश्वासय प्रजाः / स्थापयिष्याम्यहं धर्मे स्वयमेत्य शिखण्डिनम् // KAव्क्_४०.८१ //
3483 SK इत्युक्तस्तेन सानन्दः स्वदेशं शनकैर्वणिक् / गत्वा प्रजानां विदधे स्वैरमाश्वासनं पुरः // KAव्क्_४०.८२ //
3484 SK प्रवादे प्रसृते तस्मिन्नमात्यौ दण्डमुद्गरौ / अतीतभूपागमनत्रस्तौ भूपतिमूचतुः // KAव्क्_४०.८३ //
3485 SK सर्वत्र श्रूयते देव प्रवादः साधुनिन्दितः / वृद्धः प्रव्रजितो राजा राज्यार्थी यत्नवानिति // KAव्क्_४०.८४ //
3486 SK तीव्रव्रतपरिक्लिष्टः संभोगाभिमुखादरः / लज्जां प्रव्रज्यया सार्धं त्यक्त्वा स पुनरेष्यति // KAव्क्_४०.८५ //
3487 SK राजन्नपक्कवैराग्यास्त्यजन्ति सहसैव यत् / तत् पूर्वाभ्यधिकं तेषां प्रयाति प्रियतां पुनः // KAव्क्_४०.८६ //
3488 SK लोकस्थितिविरुद्धेषु विषयेषु विशेषतः / स्पृहा संजायते जन्तोरपथ्येष्विव रोगिणः // KAव्क्_४०.८७ //
3489 SK सुखोत्सेकात्परित्यक्तं प्रहस्तमुपागतम् / प्रायः सर्वं भवत्येव जडस्याम्रमिव प्रियम् // KAव्क्_४०.८८ //
3490 SK तस्माद्भवन्तमुत्सार्य प्रतापनिधिमासनात् / क्षीणः शशीव स्थविरः स राज्यं भोक्तुमिच्छति // KAव्क्_४०.८९ //
3491 SK चीवरोद्विग्नगात्रस्य वरवस्त्राभिलाषिणः / जातास्य मुण्डिते मूर्ध्नि रत्नाङ्कमुकुटस्पृहा // KAव्क्_४०.९० //
3492 SK रत्नहर्म्येषु नवतासंभोगविभवोद्भवम् / त्यक्त्वा विलासमायासं वनवासं सहेत कः // KAव्क्_४०.९१ //
3493 SK मृदुशयनसुखार्हा ये कथं शेरते ते हरिणखरखुरोद्यत्कत्कण्टकासु स्थलीषु / मधु विधुकरशीतं यैर्निपीतं कथं ते वनजगजमदोष्णं तिक्तमम्भः पिबन्ति // KAव्क्_४०.९२ //
3494 SK अधुनैव तवासन्नप्रवेशविषमस्थितेः / आद्यंमतं न्यायविदां राजपुत्र निपातनम् // KAव्क्_४०.९३ //
3495 SK तस्मादनागतो राजा पूर्वं वध्यस्तव प्रभो / दीपं हन्ति पतङ्गो हि न दग्धश्चेत्समापतन् // KAव्क्_४०.९४ //
3496 SK तयोरिति गिरा क्षिप्रमभूद् भूपतिराकूलः / खलमेघैः कलुषतां नीतं कस्य न मानसम् // KAव्क्_४०.९५ //
3497 SK स तौ बभाषे साशङ्कः क्रकचक्रूरतां गतः / बाधः साधारणश्चायं युवयोर्मम चाग्रतः // KAव्क्_४०.९६ //
3498 SK भवद्भ्यामेव विनयोपायविश्रान्तया धिया / विचार्य कार्यतात्पर्यं यद् युक्तं तद्विधीयताम् // KAव्क्_४०.९७ //
3499 SK इति राज्ञा कृतोत्साहौ तौ विसृज्याशु घातकान् / उद्रायणस्याग्रपथं वधायैव बबन्धतुः // KAव्क्_४०.९८ //
3500 SK सो ऽपिप्रज्ञापरित्राणे नियोक्तुं पुत्रमुद्यतः / भगवन्तं समभ्येत्य व्रजामीति व्यजिज्ञपत् // KAव्क्_४०.९९ //
3501 SK सर्वज्ञेनाभ्यनुज्ञातः स्वकृतं भुज्यतामिति / कर्मपाशसमाकृष्टः स ययौ रोरुकं पुरम् // KAव्क्_४०.१०० //
3502 SK तस्माद्व्रजन्तं निर्व्याजमाचारमिव दुर्जनाः / दुष्टामात्यप्रयुक्तास्ते जग्नुर्वर्त्मनि घातकाः // KAव्क्_४०.१०१ //
3503 SK तस्य चाईवरपात्रादीन् गृहीत्वा निहतस्य ते / व्यदेवयन् कृतं प्रीत्यौ राजाकार्यममात्ययोः // KAव्क्_४०.१०२ //
3504 SK ततः पापप्रहृष्टाभ्यां नृपस्ताभ्यां प्रदर्शितम् / दृष्ट्वा मुमोह सहसा रक्ताक्तं चीवरं पितुः // KAव्क्_४०.१०३ //
3505 SK स लब्धसंज्ञः शनकैः शुशोच न तथा गुरुम् / यथा पतितमात्मानं घोरे नरकगह्वरे // KAव्क्_४०.१०४ //
3506 SK सो ऽवदद्वत्स संप्राप्तं फलं खलजनान्मया / ऐश्वर्यमधुलुब्धेन पापपातमपश्यता // KAव्क्_४०.१०५ //
3507 SK अहो बत निरालम्बे घोरे नरकसंकटे / उन्नतारोहिणां सद्यः पातकं खलसंगतम् // KAव्क्_४०.१०६ //
3508 SK कृतमेतन्महत्पापं दुष्टामात्यधिया मया / पतितस्य ममेदानीं पावको ऽपि न पावकह् // KAव्क्_४०.१०७ //
3509 SK तुल्यं पितुश्चार्हतस्य वधे का मम निष्कृतिः / पीतं यत्र मयैकस्मिन् पात्रे सदहनंविषम् // KAव्क्_४०.१०८ //
3510 SK वृद्धे पितरि निःसङ्के शमं प्रव्रज्ययाश्रिते / स्वचित्त निशितं शस्त्रं लोभाद्व्यापारितं मया // KAव्क्_४०.१०९ //
3511 SK यत्संचिन्तितमेव कम्पजनकं श्रोतुं नयत् शक्यते दृष्टं यच्च करोति शोककलनां निश्चेतनानामपि / यत्र क्रैर्यमपि प्रयाति मृदुतां तीव्रानुतापाग्निना तत्रापि प्रसरन्ति निर्घृणधियाम् निस्त्रिंशतीक्ष्णाः क्रियाः // KAव्क्_४०.११० //
3512 SK इत्युक्त्वा दुःकह्संतप्तः प्रलापमुखराननः / न्यवारयत्तयोः कोपात्प्रवेशं दुष्टमन्त्रिणोः // KAव्क्_४०.१११ //
3513 SK गुणान्तरं परिज्ञाय भिरुकं हिरुकं च सः / आनिनाय प्रसाद्याशु पुराणौ सचिवौ पितुः // KAव्क्_४०.११२ //
3514 SK ततश्चिन्ताकृशे राज्ञि शोकात् पाण्डुरताम् गते / स्वैरं तज्जननीमेत्य दुष्टामात्याववोचताम् // KAव्क्_४०.११३ //
3515 SK देवि त्वतनयः श्रीमान् स्वभावसरलाशयः / राज्यरक्षां न जानाति स्वजनोच्छेदकर्कशाम् // KAव्क्_४०.११४ //
3516 SK पिता प्रव्रजितो ऽप्यस्य राज्यं हर्तुमुपागतः / आवाभ्यां प्रशमं नीतस्तत्र का नाम वाच्यता // KAव्क्_४०.११५ //
3517 SK नीचतन्त्रोपपन्नश्चेत् क्रमो ऽयमशुभक्रमः / राज्याभिलाषिणो भिक्षोस्तस्यापि स कथं क्रमः // KAव्क्_४०.११६ //
3518 SK आवां पितृवधक्रिधाद् वारितौ भूभुजा पदात् / स्वयमद्यापि शोकेन किं मिथ्या परिशुष्यते // KAव्क्_४०.११७ //
3519 SK सुकृतं कृतमावाभ्याम् प्रभोर्दुःखकृशाङ्गता / भवन्ति सर्वभावेषु भृज्या एवापराधिनः // KAव्क्_४०.११८ //
3520 SK गतं शोचति किं राजा यत्कृतं कृतमेव तत् / उपेक्ष्यते त्वया देवि कस्माच्चिन्ताकृशः सुतः // KAव्क्_४०.११९ //
3521 SK ताभ्यामित्युदितं श्रुत्वा सा राजजननी शनैः / ऊचे तरलिका नाम तद्वाक्यविहितादरा // KAव्क्_४०.१२० //
3522 SK आनन्तर्यमिदं कर्म द्वयोर्नरकपातकम् / युष्मन्मतादुपनतं राज्ञः पूर्वकृतेन वा // KAव्क्_४०.१२१ //
3523 SK अहं तु वारयाम्यस्य शोकं पितृवधोद्भवम् / अर्हद्वधोद्भवं दुःखं भवद्भ्यामपि वार्यतां // KAव्क्_४०.१२२ //
3524 SK इति तौ स्वैरमादिश्य सा गत्वा पार्थिवान्तिकम् / तमुवाच शुचाक्रान्तं परिक्षीणमिवोडुपम् // KAव्क्_४०.१२३ //
3525 SK धर्माधर्ममयं पुत्र राज्यं राज्ञां बहुच्छलम् / पापानां शङ्कया तस्मिन् किं शुचा परिशुष्यसि // KAव्क्_४०.१२४ //
3526 SK पितुर्वधात् प्रतप्तो ऽसि यदि नाम गुरुप्रियः / तत्रोच्यते समुत्सृज्य लज्जां त्वद्दुःखसंकटे // KAव्क्_४०.१२५ //
3527 SK स्वैरं जातस्त्वमन्येन न स तद्धर्मतः पिता / स्वेच्छाहारसुखाः पुत्र स्त्रियो हि निरपत्र्पाः // KAव्क्_४०.१२६ //
3528 SK इत्यप्रियमपि श्रुत्वा राजा तद्वचनं रहः / पितृवैशसपापोग्रदुःखसंतापमत्यजत् // KAव्क्_४०.१२७ //
3529 SK प्रकुर्वन्त्यस्ताद्रेरुदयगिरिणा क्लेशकलनां क्षणात् क्षोणीक्ष्माभृद्विघटनवोनोदं विदधति / सृजन्त्येता वह्निं सपदि सलिलात्तच्च दहनाद् अशाध्यं नारीणां न हि भवति किंचित्र्त्रिभुवने // KAव्क्_४०.१२८ //
3530 SK अथ सो ऽर्हद्वधेनैव शल्यतुल्येन पीडितः / नृपः पप्रच्छ धर्मज्ञान्निष्कृतिं तस्य कर्मणः // KAव्क्_४०.१२९ //
3531 SK ततस्तौ दुष्टसचिवौ तिष्यपुष्याख्यचैत्ययोः / मार्जारपोतौ धृत्वान्तःसक्तावामिषशिक्षया // KAव्क्_४०.१३० //
3532 SK निषिद्धावपि धाष्टर्येन प्रविश्य नृपतेः सभाम् / तमूचतुस्तीव्रतापसंतापप्रशमार्थिनम् // KAव्क्_४०.१३१ //
3533 SK देव मिथ्यैव भवता चित्तमायास्यते भृशम् / सर्वकल्याणा लोके ऽस्मिन् नार्हन्तः सन्ति ते मताः // KAव्क्_४०.१३२ //
3534 SK यदि सत्यं भवेयुस्ते नभसो राजहंसवत् / ऋद्धिमन्तः कथं तेषामन्येन वधसंभवः // KAव्क्_४०.१३३ //
3535 SK न सन्ति तस्मादर्हन्तः कुतस्तद्वधपातकम् / सीमाविवादः कस्तत्र् यत्र ग्रामो न विद्यते // KAव्क्_४०.१३४ //
3536 SK तिष्यपुष्यौ गृहपती यावर्हत्पदमापतुः / मार्जारावन्तरे जातौ तावेवाद्य् अस्वचैत्ययोः // KAव्क्_४०.१३५ //
3537 SK प्रकटौ तौ च दृश्येते प्रत्यक्षं कस्य संशयः / प्रत्ययो यदि नास्त्येव स्वयं किं न निरीक्ष्यते // KAव्क्_४०.१३६ //
3538 SK इत्युक्त्वा भूपतेः कृत्वा खलौ दोलाकुलं मनः / जग्मतुः सहितौ तेन चैत्यसंदर्शनाय तौ // KAव्क्_४०.१३७ //
3539 SK अपूर्वकौतुकावेशात् तत्र संघटिते जने / विलोकनोद्यते राज्ञो सामात्ये दुष्टमन्त्रिणौ // KAव्क्_४०.१३८ //
3540 SK आमिषाभ्याससंबद्धतिष्यपुष्याभिधानयोः / धूर्तौ चक्रतुराह्वानं शनैर्बालबिडालयोः // KAव्क्_४०.१३९ //
3541 SK तौ तिष्यपुष्यावर्हन्तौ मार्जारौ स्थो युवां यदि / प्रदक्षीणं वा क्रियतां तेन सत्येन चैत्ययोः // KAव्क्_४०.१४० //
3542 SK मांसदानक्षणे ताभ्यामिति वाचमुदीरितौ / तूर्णं निर्गत्य मार्जारौ चक्रतुस्तौ प्रदक्षिणम् // KAव्क्_४०.१४१ //
3543 SK तद्दृष्ट्वा सहसावाप्तप्रत्यये सानुगे नृपे / याते दुर्जनमायैव जगज्जयमहीं ययौ // KAव्क्_४०.१४२ //
3544 SK मुष्टौ वायुं दृषदि कमलं चित्रमाकाशदेशे जिह्वाग्रे च प्रचुररचनासृष्टिसंहारलीलाः / किं वा नान्यत् पशुशिशुधियां मोहनायेन्द्रजालं मूर्तं धुर्ताः क्षणपरिचितप्रत्ययं दर्शयन्ति // KAव्क्_४०.१४३ //
3545 SK निष्प्रत्ययपरो राजा ततः सौगतदर्शने / आर्यकात्यायनस्याग्रे श्रद्धापूजामवारयत् // KAव्क्_४०.१४४ //
3546 SK राजधान्यां निषिद्धो ऽथ बहिरेव ससानुगः / विनेयकृपया तत्र तस्थौ शैला च भिक्षुणी // KAव्क्_४०.१४५ //
3547 SK ततः कदाचिदायान्तं दृष्ट्वा कात्यायनः पुरः / नृपतिं जनसंपातादवमानभयाद् ययौ // KAव्क्_४०.१४६ //
3548 SK प्रेषितं पूर्वमन्त्रिभ्यां व्रजन्तमवलोक्य तम् / दुष्टामात्यौ नरपतिं दीर्घवैराववोचताम् // KAव्क्_४०.१४७ //
3549 SK राजन्नमङ्गलनिधिर्मुण्डो ऽयं विशिरः पथि / दृष्टो ऽद्य भिक्षुरस्माभिर्न विद्मः किं भविष्यति // KAव्क्_४०.१४८ //
3550 SK न पश्यामि मुखं राज्ञः पापस्येति भणत्यसौ / तथा हि क्षणमेकान्ते गत्वा दूरमितः स्थितः // KAव्क्_४०.१४९ //
3551 SK श्रुत्वैतद्दुर्जनामर्षादुवाचानुचरान् नृपः / एष दूरस्थितः पांशुमुष्टिभिः पूर्यतामिति // KAव्क्_४०.१५० //
3552 SK पूर्यमाणः स तैः पांशुमुष्टिभिर्दुष्टचेटकैः / दिव्यां कुटीं प्रवेशेन परिहाराय निर्ममे // KAव्क्_४०.१५१ //
3553 SK अमर्षकोपिताः सर्पाः व्याघ्रा वा पीतलोहिताः / शान्तेरायान्ति मृदुतां नत् उ भूपतिचेटकाः // KAव्क्_४०.१५२ //
3554 SK ततः प्रयाते नृपतौ पांशुराशिशतावृतम् / दुःखादूचतुरभ्येत्य हिरुको भिरुकश्च तम् // KAव्क्_४०.१५३ //
3555 SK आर्य कृच्छ्रमवाप्तो ऽसि राज्ञा क्रूरेण दुष्कृतैः / लोचनानि धिगस्माकं यैरिदं दृश्यते पुरेः // KAव्क्_४०.१५४ //
3556 SK मोहान्धः पातकश्वभ्रे दुर्जनैः पातितो नृपः / कर्मणो वयमप्यस्य दर्शनात् पापभागिनः // KAव्क्_४०.१५५ //
3557 SK भूरियम् भूरिपापार्ता त्याज्या प्राज्यमतेस्तव / दुःसहः खलसंवासः त्यागः कस्य न संमतः // KAव्क्_४०.१५६ //
3558 SK प्रयाति न शमः शमं क्षयमुपैति नैव क्षमा भवन्ति न च बुद्धयः परुषरोषदोषस्पृशः / वसन्ति न विमानना मनसि शल्यतुल्याः सतां न दुष्टजनवर्जनादपरमास्ति लोके सुखम् // KAव्क्_४०.१५७ //
3559 SK ऐश्वर्यं गुणिनामधोनिपतनायासप्रयासप्रदं गाम्भीर्यं तिमिराकारं प्रविशतां प्राणापहं प्राणिनाम् / नष्टा सापि निकृष्ट्दुष्ट्कुटिलव्यालैरुपादेयता कूपस्येव खलस्य नास्ति तदहो दोषालियुक्तं यतः // KAव्क्_४०.१५८ //
3560 SK तयोरिति वचः श्रुत्वा महाकात्यायनो ऽवदत् / न निकारे ऽपि मे कोपः कर्मणो गतिरीदृशी // KAव्क्_४०.१५९ //
3561 SK एतावदेव मे दुःखं यन्मूढस्य महीपतेः / खलसंगमदोषेण भयं महदुपस्थितम् // KAव्क्_४०.१६० //
3562 SK प्रथमे हि महावायुः पुरेअस्य निपतिष्यति / द्वितीये पुष्पवृष्टिश्च वस्त्रवृष्टिस्ततः परे // KAव्क्_४०.१६१ //
3563 SK रूप्यवृष्टिश्चतुर्थे च हेमवृष्टिश्च पञ्चमे / रत्नवृष्टिस्ततः षष्ठे पांशुवृष्टिश्च सप्तमे // KAव्क्_४०.१६२ //
3564 SK तया सबन्धुराष्ट्रो ऽसय् न भविष्यति भूपतिः / तस्माद् भवद्भ्यां गन्तव्यं रत्नान्यादाय भूयसे // KAव्क्_४०.१६३ //
3565 SK इति तद्वचनं श्रुत्वा विनिश्चित्य तथेति तौ / हिरुकः श्यामकं पुत्रं तस्योपस्थापकं व्यधात् // KAव्क्_४०.१६४ //
3566 SK भिरुकश्च सुतां श्यामावतीमादाय पाणिना / अभ्येत्य भिक्षुकीं शैलां प्रणयादिदमब्रवीत् // KAव्क्_४०.१६५ //
3567 SK आर्ये भवत्या मे कन्या घोषिलस्य गृहप्रभोः / गृहे समर्पणीयेयमासन्नप्रतिपन्नया // KAव्क्_४०.१६६ //
3568 SK एवमुक्त्वार्पयित्वा तावमात्यौ जग्मतुर्गृहम् / शैलापि कन्यामादाय प्रययौ घोषिलालयम् // KAव्क्_४०.१६७ //
3569 SK ततः क्रमेण तदभूद्यथोक्तं भिक्षुणा पुरे / ज्ञानदीपवती प्रज्ञा यथातत्त्वं हि पश्यति // KAव्क्_४०.१६८ //
3570 SK षष्ठे ऽह्नि रत्नवर्षे ऽथ पतिते रत्नपूरिताम् / ययतुर्नावमादाय तावमात्यावलक्षितौ // KAव्क्_४०.१६९ //
3571 SK तौ दक्षिणां दिशं गत्वा चक्रतुर्नगरद्वयम् / हिरुको हिरुकाख्यानं भिरुकाख्यं तथापरः // KAव्क्_४०.१७० //
3572 SK परे ऽह्नि पांशुवर्षेणमहता पतता नृपः / सबन्धुराष्ट्रः प्रलय्ं प्रययौ नरकातिथिः // KAव्क्_४०.१७१ //
3573 SK सदण्डिमुद्गरे राज्ञि याते किल्बिषशेषताम् / तं मन्त्रिपुत्रमादाय व्योम्ना कात्यायनो ययौ // KAव्क्_४०.१७२ //
3574 SK तमेवानुगता प्रीत्या नभसा पुरदेवता / तदाज्ञया खवचनीकर्वटे विदधे स्थितिम् // KAव्क्_४०.१७३ //
3575 SK भिक्षुपुण्यानुभावेन भाग्यैर्मन्त्रिसुतस्य च / अधिष्ठानेन देव्याश्च श्रीमत्तदबह्वत् पुरम् // KAव्क्_४०.१७४ //
3576 SK तत्राथ देवता चक्रे चैत्यं कात्यायनस्य सा / सुरवत्यां यदद्यापि वन्दन्ते चैत्यवन्दकाः // KAव्क्_४०.१७५ //
3577 SK मन्त्रिसूनुमथादाय लग्नं चीवरकर्णिके / लम्बनं स ययौ व्योम्ना देशं कात्यायनः परम् // KAव्क्_४०.१७६ //
3578 SK लम्बते लम्बते को ऽयमित्युक्ते विस्मयाज्जनैः / बभूवुस्ते जनास्तत्र लम्बका इति विश्रुताः // KAव्क्_४०.१७७ //
3579 SK अत्रान्तरे दिवं याते तत्रापुत्रे महीपतौ / स कृतः श्यामको राजा लक्षणज्ञिस्तदाज्ञया // KAव्क्_४०.१७८ //
3580 SK गत्वा भोक्कानकं नाम दिशा कात्यायनस्ततः / जनन्यास्तत्र संशुद्धां विदस्धे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_४०.१७९ //
3581 SK सा दृष्टसत्या पुत्रस्य यष्टीमादाय सादरम् / वन्द्यमाद्यपि महती यष्टिचैत्यमकारयत् // KAव्क्_४०.१८० //
3582 SK श्रावस्तीमथ सोत्कण्ठः प्राप्य कात्यायनः शनैः / जिनं विलोक्य सानन्दश्चक्रे तत्पादवन्दनम् // KAव्क्_४०.१८१ //
3583 SK उद्रायणसुतकथाम् तत्र तेन निवेदिताम् / आकर्ण्य भिक्षुभिः पृष्टः सर्वज्ञस्तानभाषत // KAव्क्_४०.१८२ //
3584 SK लुब्धकह् कालपाशाख्यः कर्वटोपान्तकानने / सकूटां मृगबन्धाय निदधे वागुराम् पुरः // KAव्क्_४०.१८३ //
3585 SK यन्त्रं पाशावृतं दत्वा याते तस्मिन् यदृश्छया / प्रत्येकबुद्धस्तं देशं प्राप्य विश्रान्तिमाप्तवान् // KAव्क्_४०.१८४ //
3586 SK तस्य पुण्यानुभावेन बन्धं न विविशुर्मृगाः / न हि शुद्धात्मनामग्रे प्राप्नोत्यकुशलं जनह् // KAव्क्_४०.१८५ //
3587 SK लुब्धको ऽपि ततो ऽभ्येत्य पाशानालोक्य निर्मृगान् / प्रत्येकबुद्धं क्रोधान्धो विषदिग्धेषुणावधीट् // KAव्क्_४०.१८६ //
3588 SK तस्य सायकविद्धस्य ज्वलज्ज्वलनतेज्सः / प्रभावमद्भुतं दृष्ट्वा पादयोर्निपपात सः // KAव्क्_४०.१८७ //
3589 SK अकार्यकरणोद्वेगसंतापादथ लुब्धकः / निनिन्द शोचन्नात्मानं संत्यज्य शरवागुराः // KAव्क्_४०.१८८ //
3590 SK परिनिर्वाणमाप्तस्य तस्यास्थीनि निधाय सः / छत्रध्वजादिसंभारैः स्तूपं चक्रे सदार्चितम् // KAव्क्_४०.१८९ //
3591 SK लुब्धकस्तेन पुण्येन बभूवोद्रायणो नृपः / वधात् प्रत्येकबुद्धस्य बहुशो वधमाप्तवान् // KAव्क्_४०.१९० //
3592 SK नन्दनाम्नो गृहपतेर्मदलेखाभिधा सुता / बभूव धनधन्यादिस्फूतिः कर्वटवासिनः // KAव्क्_४०.१९१ //
3593 SK सा कदाचिन्मदोत्सिक्ताः गृहमार्जनरेणुभिः / प्रत्येकबुद्धमायान्तं पथि मोहादवाकिरत् // KAव्क्_४०.१९२ //
3594 SK तस्मिन्नेव दिने तस्याश्चिरचिन्ताभिरर्थितः / वरः स्तनभरार्ताया वरणार्थी समाययौ // KAव्क्_४०.१९३ //
3595 SK मूध्नि प्रत्येकबुद्धस्य पांशुमुष्टिउनिपातनात् / प्रत्यासन्नविवाहाहमिति भ्रातरमाह सा // KAव्क्_४०.१९४ //
3596 SK ततस्तस्याह् प्रवादेन चिक्षिपुर्वरणाप्तये / मूर्ध्नि प्रत्येकबुद्धस्य रजांसि प्रौढकन्यकाः // KAव्क्_४०.१९५ //
3597 SK गुणाकारप्रवृत्तेन प्रययेन विमोहिताः / निर्विचार्य प्रवर्तन्ते विरुद्धेष्वपि वस्तुषु // KAव्क्_४०.१९६ //
3598 SK प्रवृत्तपातकाचारे तस्मिन् बुद्धबुधाभिधौ / निवारणं गृहपती कर्मणस्तस्य चक्रतुः // KAव्क्_४०.१९७ //
3599 SK सैव कन्या नरपतिः शिखण्डी पापभागभूत् / प्रवादकर्ता तद्भ्राता भिक्षुः कत्यायनो ऽप्ययम् // KAव्क्_४०.१९८ //
3600 SK जातौ गृहपती रूढदुष्टाचारनिवारणात् / पुरिपतापान्निर्मुक्तौ हिरुको भिरुकश्च तौ // KAव्क्_४०.१९९ //
3601 SK इति भगवतः श्रुत्वा वाक्यं विचार्य च भिक्षवः फलपरिणतिं ज्ञात्वा चित्राम् शुभाशुभकर्मणाम् / खलजनवचस्तुल्यं शत्रुं विचारसमं गुरुं सुकृतसदृशं बन्धुं लोके न किंचन मेनिरे // KAव्क्_४०.२०० //
3602 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायामुद्रायणावदानं चत्वारिंशः पल्लवः //
3604 SK यद्भूपालविशालदानबिभवप्रोद्भूतपुण्याधिकं दानस्यातिकृशस्य सत्फलभरमप्नोत्यलं दुर्गतः / शुद्धस्यैव विवृद्धधर्मधवलश्रद्धासमृध्यान्वितं निःसंसारविजृम्भितं तदुचितं चित्तस्य वित्तस्य च // KAव्क्_४१.१ //
3605 SK जिने जेतवनारामविहारिणि महाधनह् / धीराभिधानः श्रावस्त्यामभूद् गृहपतिः पुराः // KAव्क्_४१.२ //
3606 SK तस्य पण्डितनामभूत् पुत्रः सुकृतपण्डितः / अखण्डितयशःपुण्यदानालंकारमण्डितः // KAव्क्_४१.३ //
3607 SK स बाल एव भिक्षूणाम् राजार्हैर्वस्त्रभोजनैः / शारिपुत्रप्रधानानां चकारातिथिसत्क्रियाम् // KAव्क्_४१.४ //
3608 SK ततः कदाचिदक्षीणादुर्भिक्षक्षयिते जने / याच्ययाचकतुल्यत्वे पिण्डिच्छेदो ऽथिनामभूत् // KAव्क्_४१.५ //
3609 SK भिक्षूणां संकटे तस्मिन् काले परमदारुणे / पण्डितः सुगताहूतः प्रतस्थे जेतकाननम् // KAव्क्_४१.६ //
3610 SK तं व्रजन्तं तुरङ्गेण काञ्चनादामशोभिनम् / ऊचुर्विटाः समभ्येत्य गुणोत्साहासहिष्णवः // KAव्क्_४१.७ //
3611 SK अर्थिसार्थार्थनाकल्पवृक्षस्त्वं दिक्षु विश्रुतः / शतानि पञ्च संप्राप्तास्त्वामुद्दिश्याशया वयम् // KAव्क्_४१.८ //
3612 SK अलंकारांशुकयुगं प्रत्येकं नः समीहितम् / अधुनैवाविलम्बेन दीयताम् यदि शक्यते // KAव्क्_४१.९ //
3613 SK इत्युक्तस्तैः सदाचारः सो ऽवतीर्य तुरङ्गमात् / साधु पूजां विधायैषां धीमान् क्षणमचिन्तयत् // KAव्क्_४१.१० //
3614 SK भगवन्तमदृष्ट्वैव गच्छामि स्वगृहं यदि / आसन्नामृतपानस्य तं विघ्नं कथमुतशे // KAव्क्_४१.११ //
3615 SK अदत्वा प्रियमर्थिभ्यो व्रजामि यदि निस्त्रपह् / कथं करोमि दानस्य तां स्वयं व्रतखण्डनाम् // KAव्क्_४१.१२ //
3616 SK इति चिन्तयतस्तस्य भित्त्वा भूमिं समुद्गतः / नागराजः स्वयं शेषः प्रादादर्थिसमीहितम् // KAव्क्_४१.१३ //
3617 SK दत्तानि नागराजेन वस्त्राण्याभरणानि च / स तेभ्यः प्रतिपाद्याशु ययौ निःशल्यतामिव // KAव्क्_४१.१४ //
3618 SK ते ऽपि दृष्ट्वा तदाश्चर्यं पुण्यां सुगतभावनाम् / सर्वार्थसंपत्सिद्धीनां जननीमेव मेनिरे // KAव्क्_४१.१५ //
3619 SK जातचित्तप्रसादास्ते तेनैव सहितास्ततः / भगवन्तं ययुर्द्रष्टुं विनष्टद्वेषकल्मषाः // KAव्क्_४१.१६ //
3620 SK भगवन्तमथालोक्य कुमारः प्रणताननः / तत्पादपद्मरजसा धन्यश्चक्रे ललाटिकाम् // KAव्क्_४१.१७ //
3621 SK हारं पुनश्चरणयोः शास्तुः शशिकरोज्ज्वलम् / विन्यस्य प्रणतानग्रे स तानस्मै न्यवेदयत् // KAव्क्_४१.१८ //
3622 SK धर्मदेशनया तेषां भगवान् ज्ञानवज्रभृत् / भित्त्वा सत्कायदृष्ट्यद्रिं स्रोतःप्राप्तिफलं व्यधात् // KAव्क्_४१.१९ //
3623 SK दृष्टसत्येषु यातेषु ततस्तेषु प्रणम्य तम् / कुमारंपण्डितं प्रीत्या भगवान् स्वयमभ्यधात् // KAव्क्_४१.२० //
3624 SK वत्स पुण्यैरवाप्तो ऽसि पर्याप्तिं सुकृतश्रियाम् / दुर्भिक्षेस्वपि भिक्षूणां कुरु भोज्याधिवासनाम् // KAव्क्_४१.२१ //
3625 SK परिग्रहो मे भिक्षूणां शतान्यर्हत्रयोदश / अन्ये चान्विष्य कृच्छ्रार्ताः संविभज्यास्त्वया पुरे // KAव्क्_४१.२२ //
3626 SK इति श्रुत्वा भगवतः पण्डितः प्रमदाकुलः / भक्त्या संघस्य विदधे यावज्जीवं निमन्त्रणम् // KAव्क्_४१.२३ //
3627 SK ततः स्वगृहमभ्येत्य राजार्हैभिक्षुसंमतैः / संबुद्धप्रमुखं संघं सदा भोज्यैरपूजयत् // KAव्क्_४१.२४ //
3628 SK दरिद्रानदरिद्रांश्च याच्यानपि च याचकान् / अनुकम्प्यान् स विदधे दानेनान्यानुकम्पिनह् // KAव्क्_४१.२५ //
3629 SK शेषान् कृपणसंघातान् सो ऽन्विष्य करुणाम्बुधिः / रत्नराशिं ददौ तेभ्यो दौर्गत्यतिमिरापहम् // KAव्क्_४१.२६ //
3630 SK स रत्ननिकरस्तेषां जगामाङ्गारराशिताम् / नृणां भाग्यानि रत्नानि मणयः प्रस्थजातयः // KAव्क्_४१.२७ //
3631 SK ते तमूचुः समभ्येत्य स्वप्नदृष्टधना इव / रत्ननाम्ना त्वयास्माकं स दत्तो ऽङ्गारसंचयः // KAव्क्_४१.२८ //
3632 SK धनलाभेन महता सद्यः प्राप्तोन्नतिर्जनह् / तत्संक्षयात् क्षणेनैव परिभ्रष्टो न जीवति // KAव्क्_४१.२९ //
3633 SK इति तेषां वचः श्रुत्वा पण्डितः करुणानिधिः / तानूचे पुण्यदीनानां रत्नान्यायान्त्यरत्नताम् // KAव्क्_४१.३० //
3634 SK युष्माभिर्न कृतः पूर्वं मोहात् सुकृतसंचयः / तेनायं रत्नराशिर्वः प्रयातो ऽङ्गारसारताम् // KAव्क्_४१.३१ //
3635 SK रत्नानि यत्ननिहितान्यपि यान्ति दूरं पुण्यक्षयादुपनयन्ति च भाग्ययोगात् / वित्तार्जनं पतितशोकनिमित्तमेव वित्तं हि चित्तमुचितं सुकृतप्रवृत्तम् // KAव्क्_४१.३२ //
3636 SK तस्माद् भवद्भिर्भोज्याय भिक्षुसंघो ऽधिवास्यताम् / भोगसंभारसंपत्तिमहं संपादयामि वः // KAव्क्_४१.३३ //
3637 SK इत्युक्तास्तेन तद्दत्तवित्तभोजनसंपदा / ते बुद्धप्रमुखं संघं दिनमेकमपूजयन् // KAव्क्_४१.३४ //
3638 SK संघं यथावदभ्यर्च्य प्रणीधानमकारि तैः / म् आकदाचन दारिद्य्रं स्यादस्माकमिति क्षणम् // KAव्क्_४१.३५ //
3639 SK ततस्ते पण्डितगिरा गत्वा ददॄशुरग्रतः / तमेवाङ्गारनिकरं प्रयातं रत्नराशिताम् // KAव्क्_४१.३६ //
3640 SK भवने पण्डितस्याथ कुमारस्य प्रभवतः / विवृतानां निधानानां निर्विघ्नं शतमुद्ययौ // KAव्क्_४१.३७ //
3641 SK स प्रसेनजिते राज्ञे धर्मज्ञः स्थितिरक्षणात् / ददौ निधानषड्भागं स चास्याङ्गारतामगात् // KAव्क्_४१.३८ //
3642 SK कुमारस्यैव सुकृतैर्भोग्यो ऽयं निधिसंचयः / इत्यन्तरीक्षाद्वचनं ततः शुश्राव भूपतिः // KAव्क्_४१.३९ //
3643 SK कुमारस्यैव वचसा तान्निधीन्निर्धितां पुनः / प्राप्तां विलोक्य साश्चर्यः प्रहिणोत्तद्गृहं नृपः // KAव्क्_४१.४० //
3644 SK ततस्तदखिलं वित्तं वितीर्य विपुलाशयः / कुमारः संपदां चक्रे स्थितिं दुर्गतवेश्मसु // KAव्क्_४१.४१ //
3645 SK अथ निःसारसंसारविचारविरतस्पृहः / अनित्यतां स संचिन्त्यः दीरः पितरब्रवीत् // KAव्क्_४१.४२ //
3646 SK अनुजानीहि मां तावत् गन्तुं तात पतोवनम् / इमा जन्मशतोच्छिष्टाः क्लिष्टा मम विभूतयः // KAव्क्_४१.४३ //
3647 SK त्रैलोक्यसंपत्संप्राप्तिर्यस्मिन् व्रजति भोग्यताम् / तदिदं सर्वभूतानामायुर्भाजनमल्पकम् // KAव्क्_४१.४४ //
3648 SK शीते यस्य करोमि संततमृदुस्पर्शांशुकौर्गूहनं संतापे रचयामि यस्य शिशिरश्रीखण्डचर्चार्चनम् / यस्यार्थे विषशस्त्रवह्निभुजगव्रातात्परं मे भयं प्राप्तः सो ऽप्यमपायतः परिहृते ऽप्यायाति कायः क्षयम् // KAव्क्_४१.४५ //
3649 SK भोगाद्विरक्तः प्रव्रज्यामादाय दयितां वने / विहरामि हरन् चिन्तां चिन्तातप्तस्य चेतसः // KAव्क्_४१.४६ //
3650 SK इत्युक्त्वा स परित्यज्य विषयस्नेहबन्धनम् / कृताभ्युओपगमः पित्रा शारिपुत्राशमं ययौ // KAव्क्_४१.४७ //
3651 SK तत्र प्रव्रजितस्तेन पात्रपाणिः सचीवरः / तस्यैवानुचरो भूत्वा विचचार यतव्fअतः // KAव्क्_४१.४८ //
3652 SK स दृष्ट्वा कर्षकैर्धारां क्षेत्रात् क्षेत्रप्रवर्तिताम् / निर्दिष्टेन पथा यान्तीं विस्मयादित्यचिन्तयत् // KAव्क्_४१.४९ //
3653 SK अहो विहितमार्गेण गच्छतामप्यचेतसाम् / जलानां कर्मसंसिद्धर्दृश्यते नतु देहिनाम् // KAव्क्_४१.५० //
3654 SK संचिन्त्येति व्रजन्नग्रे दृष्ट्वा यष्टीकृतं शरम् / प्रतप्तमिषुकारेण प्रदध्यौ धीमतां वरः // KAव्क्_४१.५१ //
3655 SK तापात् प्रगुणतामेते यान्ति निश्चेतनाः शराः / न तु संसारसंतप्ता अपि वक्राः शरीरिणः // KAव्क्_४१.५२ //
3656 SK इति ध्यायन् विलोक्याग्रे तक्ष्णा शकटचक्रताम् / नीतानि दृढरूपाणि पुनश्चिन्तां समाययौ // KAव्क्_४१.५३ //
3657 SK अहो नु घटनायोगाद् यान्ति कर्मण्यतां क्षणात् / निश्चेतनानिद् आरूणि न चित्तानि शरीरिणाम् // KAव्क्_४१.५४ //
3658 SK इत् चंचिन्त्य संयातः सुधर्मनियमादरः / वत्सलं पितरं पुत्र इवाचार्यमुवाच सः // KAव्क्_४१.५५ //
3659 SK आर्य एव प्रयात्वद्य पिण्डपाताय मत्कृते / अहं तु भवतादिष्टं चिन्तयामि निजव्रतम् // KAव्क्_४१.५६ //
3660 SK इत्युपाध्यायमभ्यर्थ्य भक्तकृत्याय पण्डितः / तस्मिन् याते तदादिष्टं विहारागारमाविशत् // KAव्क्_४१.५७ //
3661 SK तत्र यष्टीकृततनुः कृत्वा प्रतिमुखीं स्मृतिम् / स प्रदध्यौ निजं धर्मं बद्धपर्यङ्कनिश्चलः // KAव्क्_४१.५८ //
3662 SK तस्मिन् समाधिसंनद्धे वसुधा सधराधरा / विचचालाखिलाम्भोधिजललोलदुकूलिनी // KAव्क्_४१.५९ //
3663 SK शक्रस्तं ध्याननिरतं ज्ञात्वा निर्विघ्नसिद्धये / दिदेश दिक्षु रक्षायै दिक्पालान् सेन्दुभास्करान् // KAव्क्_४१.६० //
3664 SK भगवानथ सर्वज्ञस्तस्य सिद्धिमुपस्थिताम् / पाकात् कुशलमूलानां ज्ञात्वा क्षणमचिन्तयत् // KAव्क्_४१.६१ //
3665 SK आसन्नार्हत्पदस्यास्य शारिपुत्रः समेत्य चेत् / द्वारमुद्धाटयेन्मध्ये विघ्न एष न संशयः // KAव्क्_४१.६२ //
3666 SK तस्मादागच्छतस्तस्य गत्वा स्वयमहं पुरः / करोमि कालहाराय नानाप्रश्नाश्रयाः कथाः // KAव्क्_४१.६३ //
3667 SK इति संचिन्त्य भगवान् स्वयं तद्दिशमागतः / भिक्षोरागच्छतस्यस्य व्ज्लम्बं कथयाकरोत् // KAव्क्_४१.६४ //
3668 SK सुरप्रभावान्निःशब्दे नभोगतविहंगमे / लोके निर्वातदीपस्य तुल्यतां प्राप पण्डितः // KAव्क्_४१.६५ //
3669 SK स्रोतः प्राप्तिफलादूर्ध्वं सकृदागाम्यवाप्य सः / अनागामिफलं प्राप्य ततो ऽर्हत्फलमाप्तवान् // KAव्क्_४१.६६ //
3670 SK ततः कथान्ते सुगते प्रयाते निजमाश्रमम् / शारिपुत्रः प्रविश्यर्कमिव शिष्यं व्यलोकयत् // KAव्क्_४१.६७ //
3671 SK तं दृष्ट्वा सहसोत्तीर्णं विशीर्णभवबन्धनम् / सिद्धिं युगशतप्राप्यां तस्य ताम् प्रशशंस सः // KAव्क्_४१.६८ //
3672 SK तां तस्यार्हत्पदप्राप्तिं श्रुत्वा जगति विश्रुताम् / भिक्षुभिर्भगवाण् पृष्टस्तत्कथामब्रवीज्जिनह् // KAव्क्_४१.६९ //
3673 SK भगवान् काश्यपः पूर्वं वाराणस्यां तथागतः / सह भिक्षूसहस्राणां विंशत्या पुरवासिभिः // KAव्क्_४१.७० //
3674 SK श्रद्धाप्रणीतैः शुचिभिः सर्वभोग्यैर्मनोनुगैः / उवास पूजितह् कंचित् कालं सत्त्वहितोद्यतः // KAव्क्_४१.७१ //
3675 SK भिक्षुपूजापरे तत्र वर्तमाने गृहे गृहे / अचिन्त्ययद्विनिःश्वस्य दुर्गतो नाम दुर्गतः // KAव्क्_४१.७२ //
3676 SK धिङ् मामतीव दारिद्य्रात् नीचं निष्कुशलक्रियम् / नैको ऽपि मन्दभाग्येन येन भिक्षुर्निमन्त्रितः // KAव्क्_४१.७३ //
3677 SK त्याज्या जनस्य सकलव्यवहारबाह्याः वाक्यप्रमाणपदसंधिषु नैव योग्याः / नष्टक्रिया विगतकारकतर्कहीनाः शब्दा इवार्थरहिताः पुरुषा भवन्ति // KAव्क्_४१.७४ //
3678 SK इति चिन्तानलाक्रान्तं निन्दितं धनहीनतः / तं समाहूय को ऽप्येत्य सुकृतप्रेरको ऽभ्यधात् // KAव्क्_४१.७५ //
3679 SK क्षीणार्थेनापि भवता जन्मान्तरशुभाप्तये / यथाकथंचिदेको ऽपि भिक्षुः किं न निमन्त्रितः // KAव्क्_४१.७६ //
3680 SK इत्युक्तस्तेन संसक्तशल्यः पुनरिवाहतः / भिओक्षुभोजनवैकल्यात् स भृधं व्यथितो ऽभवत् // KAव्क्_४१.७७ //
3681 SK कथंचित्क्ष्ःउत्परिक्षामः स गत्वा श्रेष्ठिमन्दिरम् / यत्नेन प्राप मूल्यांशं दारुपाटनकर्मणा // KAव्क्_४१.७८ //
3682 SK कृत्वा तत्रैव तद्भार्या शुद्धतण्डुलखण्डनम् / तदंशभृतिमूल्याप्तं भक्त्या भर्त्रे न्यवेदयत् // KAव्क्_४१.७९ //
3683 SK समुद्यतस्य तस्याथ भिक्षुभोजनसिद्धये / शुद्धये शुद्धसत्त्वस्य शक्रो ऽभूदनुसाधकह् // KAव्क्_४१.८० //
3684 SK दिव्यवर्णरसामोदे भोज्ये शक्रेण साधिते / प्रीत्या प्रच्छन्नरूपेण भिक्षुं लेखे न दुर्गतः // KAव्क्_४१.८१ //
3685 SK विभूतिमोहितैर्गूढैः पूर्वं पुरनिवासिभिः / संघे निमन्त्रिते दुःखात् दुर्गतो मर्तुमुद्ययौ // KAव्क्_४१.८२ //
3686 SK कृपया तस्य भगवान् स्वयमभ्येत्य काश्यपः / शुद्धिसिद्धिं परिज्ञाय चक्रे भोज्यप्रतिग्रहम् // KAव्क्_४१.८३ //
3687 SK अहो ऽहं भवतो भोज्यं प्रयच्छामीति भूभुजा / प्रयत्नात् प्रार्तितो ऽप्यर्थं नैवामन्यत दुर्गतः // KAव्क्_४१.८४ //
3688 SK गुणद्रविणसंपूर्णः स्यां दरिद्रप्रसादनः / भगवन्तमथाभ्यर्च्य प्रणीधानं चकार सः // KAव्क्_४१.८५ //
3689 SK स्वाश्रमं काश्यपे याते सुरेन्द्रे च दिवं गते / दुर्गतस्य गृहं सर्वं दिव्यरत्नैपूरयत् // KAव्क्_४१.८६ //
3690 SK विश्वकर्मा ततस्तस्य विदधे शक्रशासनात् / भवनं रुचिरोद्यानं रत्नस्तम्भविभूषितम् // KAव्क्_४१.८७ //
3691 SK संप्राप्तविमलैश्वर्यः सहितं सर्वभिक्षुभिः / सप्ताहं विभवैर्भोगैः स काश्यपमपूजयत् // KAव्क्_४१.८८ //
3692 SK क्षुत्क्षामाङ्गनमर्थिभिः परिहृतद्वारं रुदद्दारकं गेहं निश्चलकज्जलान्यपि स्थलीकोणस्वनन्मक्षिकम् (?) / चुल्लीसुप्तबिडालबालमपरं यस्याभवद्रौरवं श्रीस्तस्यैव नृपस्पृहास्पदतयाश्चर्यं न कस्य स्वयम् // KAव्क्_४१.८९ //
3693 SK तेन दानप्रभावेण सुधाशुद्धेन दुर्गतः / जन्मान्तरे पण्डिततामवाप्यार्हत्त्वमागतः // KAव्क्_४१.९० //
3694 SK इति पण्डितपूर्वजन्मवृत्तं कथितं सर्वविदा गुणादरेण / अवधार्य विशुद्धदानपुण्यं कुशलार्हं प्रशशंस भिक्षुसंघः // KAव्क्_४१.९१ //
3695 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां कपिलावदानं नामैकचत्वारिंशः पल्लवः //
3696 SK ४२. कनकवर्णावदानम् /
3697 SK सत्त्वेन सूर्यरुचयस्तमसि स्फुरन्ति धर्मेण रत्ननिचया नभसः तपन्ति / धैर्येण सर्वविपदः प्रशमं व्रजन्ति दानेन भोगसुभगाः ककुभो भवन्ति // KAव्क्_४२.१ //
3698 SK भगवान् सुगतः पूर्वं श्रावस्त्यां जेतकानने / कुशलानां प्रपान्नानां विदधे धर्मदेशनाम् // KAव्क्_४२.२ //
3699 SK पूर्वकल्पान्तरजने वत्सराष्टायुतायुषि / श्रीमान् कनकवर्णाख्यो बभूव पृथिवीपतिः // KAव्क्_४२.३ //
3700 SK कनकाख्या पुरी तस्य शक्रस्येवामरावती / सर्वलोकेश्वरस्यापि वसतिर्वल्लभाभवत् // KAव्क्_४२.४ //
3701 SK नायकार्हं यशःशुभ्रं चारुवृत्तगुणोचितम् / हॄदये यः प्रजाकार्यं मुक्ताहारमिवावहत् // KAव्क्_४२.५ //
3702 SK प्रजाकर्मविपाकेन पुरे परमदारुणा / अवृष्टिरभवत् तत्र सर्वभूतभयप्रदा // KAव्क्_४२.६ //
3703 SK सा धैर्यहारिणी सर्वलोकसंतापकारिणी / अवृष्टिः प्रययौ भूभृन्मानसायासहेतुताम् // KAव्क्_४२.७ //
3704 SK कुण्ठसर्वप्रतीकारः स चिन्तास्तिमितं पुरः / उवाच सुचिरं ध्यात्वा प्रधानामात्यमण्डलम् // KAव्क्_४२.८ //
3705 SK अवर्षोपनिपातो ऽयं प्रजानां निष्प्रतिक्रियः / करोति मे यत्नकृतं निष्फलं परिपालनम् // KAव्क्_४२.९ //
3706 SK निवृत्तवर्षाः ककुभो भवन्त्यभ्राश्च स्वच्छकाः / प्रवृत्तबाष्पवर्षाश्च प्रजाः पापेन भूभुजाम् // KAव्क्_४२.१० //
3707 SK त्राणं महाभयाद्राजा प्रजानां न करोति यः / तस्य स्पष्टं नटस्येव किरीटमुकुटग्रहः // KAव्क्_४२.११ //
3708 SK तदा कॄतयुगं लोके यदा राजा प्रजाहितः // KAव्क्_४२.१२ //
3709 SK दुर्भिक्षक्षयिताः पृथुतरक्लेशावलीविह्वलाः / हाहाकारविशृङ्खलाः खलतरैरत्यर्दिता वल्लभैः शोचन्त्यः प्रलयं प्रयान्तशरणाः पापैर्नृपाणां प्रजाः // KAव्क्_४२.१३ //
3710 SK तस्मात्समस्तकोषेण रक्षणीया मया प्रजाः / राज्ञां प्रजापरित्राणपुण्यं रत्नमयो निधिः // KAव्क्_४२.१४ //
3711 SK इत्युक्त्वा सर्वलोकस्य संचिन्त्य कोष्ठकोषयोः / स निनाय निजं सर्वं सदा भोग्योपभोग्यताम् // KAव्क्_४२.१५ //
3712 SK ततः कालेन तस्योग्रदुर्भिक्षेणान्नसंचयः / ययौ महाव्ययादेकपुरुषाशनशेषताम् // KAव्क्_४२.१६ //
3713 SK तस्मिन्नवसरे व्योम्ना समभ्येत्य रविप्रभः / प्रत्येकबुद्धस्तस्याथ विदधे भोजनार्थनाम् // KAव्क्_४२.१७ //
3714 SK नियमे संशये तस्मिन्नात्मनः प्राणधारणे / निर्विकल्प्य स ततस्र्वं ददौ तस्मै प्रसन्नधीः // KAव्क्_४२.१८ //
3715 SK स्वप्राणवृत्तिं तेनासौ कृत्वातिथ्यप्रसादिना / प्रययौ नबह्सा तस्य प्रसंशन् सत्त्वशीअल्ताम् // KAव्क्_४२.१९ //
3716 SK अथोद्ययौ व्यओममहाद्विपस्य नीलालिमालेव सदम्बुलेखा / मेघावली पश्चिमदिक्प्रलम्बा कपोलकालागुरुमञ्जरीव // KAव्क्_४२.२० //
3717 SK ततः समस्तं गगनान्तरालमुत्फुल्लनीलोत्पलकाननाभम् / आच्छाद्यमानं सरसैर्बभासे भृङ्गप्रवन्धौरिव मेघसंघैः // KAव्क्_४२.२१ //
3718 SK ततः पपाताखिलभोज्यवृष्टिरिष्टा प्रजानां भुवि सप्त रात्रीः / धान्यादिवृष्टिस्तदनन्तरं च रत्नदिवृष्टिश्च ततः क्रमेण // KAव्क्_४२.२२ //
3719 SK इति स कनकवर्णः क्ष्मापतिर्भूपतीनां मुकुटमणिरिवोच्चैर्भ्राजमानः प्रजानाम् / अकृत सुकृतसंपत्प्रीणितह् प्राणरक्षां प्रभवति हि परार्थे सज्जनानां प्रभावः // KAव्क्_४२.२३ //
3720 SK भूपतिः कनकवर्ण एष यः सो ऽहमेव वपुषात्मनाधुना / इत्युदीर्य भगवान् जिनः सतां धीमतां व्यधित धर्मदेशनाम् // KAव्क्_४२.२४ //
3721 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां कनकवर्णावदानं नाम द्विचत्वारिंशः पल्लवः //
3722 SK ४३. हिरण्यपाण्यवदानम् /
3723 SK सर्वोपकारप्रणयी प्रभावः सर्वोपजीव्या महती विभूतिः / पुण्याङ्कुरार्हस्य फलं विशालपलार्हमेतत् प्रथमं हि पुष्पम् // KAव्क्_४३.१ //
3724 SK जिने जेतवनारामविहाराभिगते पुरा / श्रावस्त्यां देवसेनाख्यः श्रीमानासीद्गृहाधिपः // KAव्क्_४३.२ //
3725 SK हिरण्ंयपाणिस्तस्याभूत्पुत्रः सत्पुत्रमानिनः / यस्य हेममयं जातं पाणिद्वितयमद्भुतम् // KAव्क्_४३.३ //
3726 SK रूप्यलक्षद्वयं तस्य प्रातः प्रातः करद्वये / प्रादुरासीत्स तेनाभूदर्थिनां कल्पपादपः // KAव्क्_४३.४ //
3727 SK तस्य व्यक्तविवेकेन परिपाकेन भूयसा / काले कुशलमूलानां जिने भक्तिरजायत // KAव्क्_४३.५ //
3728 SK अथ जेतवन गत्वा बह्गवन्तं तथागतम् / स दृष्ट्वा विदधे तस्य सानन्दः पादवन्दनम् // KAव्क्_४३.६ //
3729 SK भगवानपि संषारतापप्रशमचन्दिकाम् / सुधासखीं दिदेशास्मै दृशं कुशलवृतिकाम् // KAव्क्_४३.७ //
3730 SK स शास्तुर्दर्शनेनैव संमोहतिमितोज्झित / बभासे सुर्यकिरणप्रबुद्धकमलोपमः // KAव्क्_४३.८ //
3731 SK भगवान् विदधे तस्य ततः सद्धर्मदेशनाम् / यया धर्ममयं चक्षुरक्षुण्णालोकमुद्ययौ // KAव्क्_४३.९ //
3732 SK प्राक्पुण्यपरिणामेन जातवैराग्यवासनः / प्रणम्य विमलप्रज्ञः स सर्वज्ञमभाषतः // KAव्क्_४३.१० //
3733 SK शरण्य शरणाप्तस्य भगवन् भवहारिणी / अशेषक्लेशनाशाय प्रव्रज्या मे विधीयताम् // KAव्क्_४३.११ //
3734 SK चपलं प्राणिनामायुष्ततो ऽपि नवयौवनम् / विद्युद्विलासचपलास्ततो ऽप्येता विभूतयः // KAव्क्_४३.१२ //
3735 SK इति तस्य ब्रुवाणस्य सुगतानुग्रहोदिता / पपात वितरजसः प्रव्रज्या वपुषि स्वयम् // KAव्क्_४३.१३ //
3736 SK रक्तचीवरसुव्यक्तां बिभ्राणः स विरक्तताम् / पात्रग्रहेण तत्याज पुनः संसारपात्रताम् // KAव्क्_४३.१४ //
3737 SK तस्य तामद्भुतां सिद्धिं प्रत्यक्षं वीक्ष्यं भिक्षवः / तत्पूर्ववृत्तं पप्रच्छुर्भगवन्तं स चाब्रवीत् // KAव्क्_४३.१५ //
3738 SK वाराणस्यां पुरा राजा कृकिर्नाम तथागते / काश्यपाख्ये भगवति प्रयाति परिनिर्वृतिम् // KAव्क्_४३.१६ //
3739 SK शरीरमस्य सम्कृत्य स्तूपं रत्नमयं व्यधात् / स्वर्गावगाहनप्रौढं मूर्तं पुण्यमिवोन्नतम् // KAव्क्_४३.१७ //
3740 SK तस्मिन्नारोप्यमाणायां यष्टयां पूजापरिग्रहे / कितवः कन्दलो नाम निदधे रूपकद्वयम् // KAव्क्_४३.१८ //
3741 SK चित्तप्रसादशुद्धेन तेन पुण्येन भूयसा / हिरण्यपाणिः प्राप्तो ऽद्य महतां स्पॄहणीयताम् // KAव्क्_४३.१९ //
3742 SK भवति विभवस्त्यागोदारः समग्रगुणो भुवि प्रसरतिः यशः शुक्लं लोके सुधांशुसहोदरम् / परिणतिपदे पुण्यं धत्ते यदल्पमनल्पतां विमलमनसः श्रद्धाशुद्धं तदेव विजृम्भितम् // KAव्क्_४३.२० //
3743 SK इति प्रभावं कथितं जिनेन पुण्यानुभावस्य हिरण्यपाणेः / श्रुत्वैव हर्षादरविस्मयानां स भिक्षुसंघः प्रणयी बभूव // KAव्क्_४३.२१ //
3744 SK इति क्षेमन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां हिरण्यपाण्यवदानं त्रिचत्वारिंशः पल्लवः //
3745 SK ४४. अजातशत्रुपितृद्रोहावदानम् /
3746 SK दुर्जनदुःसहविषधरभीषणतरतिमिरपतितानाम् / आलम्बनजननं भवभयहरणं जिनस्मरणम् // KAव्क्_४४.१ //
3747 SK पुरे राजगृहाभिख्ये भगवान् भूभृतः पुरा / कटके गृध्रकूटस्य विजहार तथागतः // KAव्क्_४४.२ //
3748 SK तस्मिन्नवसरे राजा बिम्बिसारः सुतप्रियः / अजातशत्रुणा तत्र पुत्रेण क्रूरकारिणा // KAव्क्_४४.३ //
3749 SK सुहृदः पावकस्येव देवदत्तस्य संमतम् / घोरान्धबन्धनागारं निःसंचारं प्रवेशितः // KAव्क्_४४.४ //
3750 SK पत्न्या प्रवेशितं तस्य बन्धने गूढभोजनम् / ज्ञात्वा स तत्क्षयाकाङ्क्षी क्षुत्क्षामस्य न्यवारयत् // KAव्क्_४४.५ //
3751 SK रूक्षः कृशो ऽतिमलिनः सो ऽभवत् पृथिवीपतिः / अकालकालमेघार्तः कृष्णपक्ष इवोडुपः // KAव्क्_४४.६ //
3752 SK संकीर्णवाससंतापात्प्रायः पेशलचेतसाम् / करोत्यालिङ्गनं प्रौढा गाढप्रणयिनी विपत् // KAव्क्_४४.७ //
3753 SK स समुद्धिश्य शोकार्तः सुगताध्युषितां दिशम् / कृताञ्जलिर्नतशिराः क्षामस्वरमभाषत // KAव्क्_४४.८ //
3754 SK नामस्तुभ्यं भगवते महार्हाय महार्हते / दीनोद्धरणसंनद्धसम्यक्संबोधिबोधिचेतसे // KAव्क्_४४.९ //
3755 SK नमस्ते घोरसंसारमकराकरसेतवे / जिनाय जनताजन्मक्लेशप्रशमहेतवे // KAव्क्_४४.१० //
3756 SK नमो नित्यप्रबुद्धाय सर्वसत्त्वैकबन्धवे / विशुद्धधान्मे बुद्धाय करुणामृतसिन्धवे // KAव्क्_४४.११ //
3757 SK इति भक्तिसुधां शिक्त्वा सुगतश्रवणोचिताम् / पुण्यपुष्पप्रसविनीं स चक्रे स्तुतिमञ्जरीम् // KAव्क्_४४.१२ //
3758 SK सर्वज्ञस्तस्य विज्ञाय कायक्लेशशमयीं दशाम् / बन्धनागारविवरालोकैराप्यायनम् व्यधात् // KAव्क्_४४.१३ //
3759 SK अजातशत्रुस्तद्वृत्तं ज्ञात्वा शङ्काकुलः पितुः / न्यवारयद्बन्धगृहे सुसूक्ष्मविवराण्यपि // KAव्क्_४४.१४ //
3760 SK ततस्तस्य तदादेशात् चक्रुर्बन्धनरक्षिणः / क्षुरेण गाढबद्धस्य पादयोस्तद्विकर्तनम् // KAव्क्_४४.१५ //
3761 SK स तीव्रवैशसक्लेशव्यथितह् पार्थिवः परम् / नमो बुद्धाय बुद्धायेत्यार्तसंक्रन्दनं व्यधात् // KAव्क्_४४.१६ //
3762 SK भगवानथ सर्वज्ञः पुरः प्रत्यक्षतां गतः / शक्रदत्तासनासीनः कारुण्यात्तमभाषतः // KAव्क्_४४.१७ //
3763 SK राजन् किं क्रियते क्रूरकर्मणां गतिरीदृशी / शुभाशुभसमुद्भूतं न भुक्तं क्षियते फलम् // KAव्क्_४४.१८ //
3764 SK रागद्वेषविषासक्ते नानाव्यसनदुःसहे / एवंविधैव निःसारे संसारे दुःखसारता // KAव्क्_४४.१९ //
3765 SK संक्लेशकलिले काले विपत्संपद्विसंकटे / धैर्यमेव परित्राणं वैराग्यं च निराकुलम् // KAव्क्_४४.२० //
3766 SK संसारघोरगहनान्तरवर्धमानैः दुःखानलव्यतिकरप्रसृतैरसिक्ताः / धूमोद्गमैरिव पुनः सुकृतोचितानां बाष्पाम्बुबिन्दुकलिला न दृशो भवन्ति // KAव्क्_४४.२१ //
3767 SK भजस्व धैर्यं दुःखे ऽस्मिन् भोगाशां त्यज भूपते / परिणामविरोधिन्यः सर्वाः संसारवृत्तयः // KAव्क्_४४.२२ //
3768 SK अधुनैव तवासन्ना देहात्ते कुशलस्थितिः / इत्युक्त्वा तं समाश्वस्य भगवान् स्वपदं ययौ // KAव्क्_४४.२३ //
3769 SK बिम्बिसारो ऽपि देहान्ते तस्मिन्नेव क्षणे दिवि / अभूज्जिनर्षभो नाम श्रीमान् वैश्रवणात्मजः // KAव्क्_४४.२४ //
3770 SK अजातशत्रुर्जनकं ज्ञात्वा विगतजीवितम् / शरीरमस्य सत्कृत्य निनिन्द निजदुष्कृतम् // KAव्क्_४४.२५ //
3771 SK तस्यातितीव्रपापार्तं चित्तं दुर्वृत्तदूषितम् / पश्चात्तापाग्निपतनं प्रायश्चित्तमिवाकरोत् // KAव्क्_४४.२६ //
3772 SK सो ऽवदद्बत संमोहादैश्वर्यमदलुब्धधीः / दुर्वृत्तपातकश्वभ्रे पतितो ऽहमधोमुखः // KAव्क्_४४.२७ //
3773 SK श्रुतप्रज्ञादरिद्राणां निजनिद्रासुखापहा / चिन्ता दहति गात्राणि खलमन्त्रानुवर्तिनाम् // KAव्क्_४४.२८ //
3774 SK पतितस्यावसन्नस्य पापपङ्के प्रमादिनह् / अनालम्बस्य संत्राणं जिनसंस्मरणं मम // KAव्क्_४४.२९ //
3775 SK इति संचिन्त्य सुचिरं स गत्वा सुगतान्तिकम् / जुगुप्समानः कुकृतात्परं संकोचमाययौ // KAव्क्_४४.३० //
3776 SK तत्रापवित्रमात्मानं मन्यमानः सपत्रपः / प्रणनाम जिनं दूरात् पापस्पर्शभयादिव // KAव्क्_४४.३१ //
3777 SK साश्रुनेत्रः परित्राणं स सर्वज्ञं व्यजिज्ञपत् / सकम्पः कायसंसक्तं विधुन्वन्निव दुष्कृतम् // KAव्क्_४४.३२ //
3778 SK भगवन् कृतपायो ऽहमासन्ननरकानलः / उत्तप्तः करुणासिन्धुं त्वामेव शरणं गतः // KAव्क्_४४.३३ //
3779 SK मामियं शोणपर्यन्ता दृष्टिस्ते पुष्करप्रभा // KAव्क्_४४.३४ //
3780 SK खलमन्त्रप्रवृत्तेन दुर्वृत्तेन प्रमादिना / मया विभवलुब्धेन पापेन निहतः पिता // KAव्क्_४४.३५ //
3781 SK इति प्रलापिनस्तस्य वचः श्रुत्वा तथागतः / ससर्ह तत्पापरजःशुद्ध्यै पुण्यसरस्वतीम् // KAव्क्_४४.३६ //
3782 SK राजन्न चिन्तितः पापः खलेनेव स्वकर्मणा / प्रेरितस्त्वं पितृवधे पतितः पापसंकटे // KAव्क्_४४.३७ //
3783 SK दुःखं तत्तेन भोक्तव्यं प्राप्तव्यं किल्बिषं त्वया / तव तस्य च भूपाल तुल्यैषा भवितव्यता // KAव्क्_४४.३८ //
3784 SK निजकण्ठसमुत्कीर्णां ललाटपटवर्तिनी / शिलाशकललेखेव निश्चला नियतिर्नृणाम् // KAव्क्_४४.३९ //
3785 SK कुर्वता कलुषं कर्म खलप्रेरणया त्वया / प्रत्यासन्नामृतश्रेयः स्वहस्तेन तिरस्कृतम् // KAव्क्_४४.४० //
3786 SK अद्यापि यदि ते पापं हन्तुं प्राप्तुं च संपदम् / वाञ्छास्ति तत्कुरु मतिं पुण्ये पापशमात्मनि // KAव्क्_४४.४१ //
3787 SK दीपवृत्त्या सुखं सूते जीवयत्युज्ज्वलं यशह् / अमृतस्य प्रकारो ऽयं सुवृत्तः सत्समागमः // KAव्क्_४४.४२ //
3788 SK पश्चात्तापाग्नुपातेन साधुना संगमेन च / संकीर्तनेन दानेन पापं नश्यति देहिनाम् // KAव्क्_४४.४३ //
3789 SK पात्रं पवित्रयति नैव गुणान् क्षिणोति स्नेहं न संहरति नैव मलं प्रसूते / दोषावसानरुचिरश्चलतां न धत्ते सत्संगमः सुकृतसद्मनि को ऽपि दीपः // KAव्क्_४४.४४ //
3790 SK गुणिगणविपद्दीक्षादक्षः क्षपाक्षणसंनिभः सकलनयनव्यापाराणां जनेषु निरोधकः / असमविषमायासावासः प्रकाशपरिक्षयात् सृजति हि महामोहाग्दाढं तमः खलसंगमः // KAव्क्_४४.४५ //
3791 SK प्रत्येकबुद्धस्त्वं राजन् कालेन क्षीणकिल्बिषः / भविष्यसि विवेकेन कृतालेकः शनैः शनैः // KAव्क्_४४.४६ //
3792 SK इति तस्य दयाश्वासं चकार बह्गवान् जिनह् / पतितेष्वधिकं सन्तः करुणास्निग्धलोचनाः // KAव्क्_४४.४७ //
3793 SK ततः प्रणम्य सुगतं प्रयातः स्वपदं नृपः / महतः पापभारस्य विवेद लघुतामिव // KAव्क्_४४.४८ //
3794 SK तस्मिन् प्रयाते सर्वज्ञः पृष्टस्तत्कर्म कौतुकात् / भिक्षुभिः क्षितिपालस्य पूर्ववृत्तमभाषत // KAव्क्_४४.४९ //
3795 SK वाराणस्यां निरायासविलासव्यवसायिनः / चत्वारः श्रेष्ठितनया बभूवुः श्रीविशृङ्खलाः // KAव्क्_४४.५० //
3796 SK ते कदाचित् सुखक्षीबा मिथः कलिकथास्थिताः / प्रत्येकबुद्धमायान्तं ददृशुर्यौवनोद्धताः // KAव्क्_४४.५१ //
3797 SK तं दृष्ट्वा जातविद्वेषाः शमसंयमनिन्दकाः / ज्येष्ठः सुन्दरको नाम भ्रातॄन् प्रोवाच सस्मितः // KAव्क्_४४.५२ //
3798 SK अयं चीवरपात्राङ्कः पानेन गतजीवितः / क्षिबो विधीयते भिक्षुरित्ययं मे मनोरथः // KAव्क्_४४.५३ //
3799 SK इत्युक्ते चापलात् तेन द्वितीयः कुन्दराभिधः / उवाच भिक्षुं क्षिप्त्वेमं हन्तुमिच्छाम्यहं जले // KAव्क्_४४.५४ //
3800 SK ततस्तृतीयो ऽप्यवदत् पापः सुन्दरकाभिधः (?) / एष भिक्षुर्वरं तस्यां वीथ्यां निक्षिप्यते जवात् // KAव्क्_४४.५५ //
3801 SK चतुर्थो ऽप्यवदत् क्रूरमतिः कन्दरकाभिधः / भिक्षोः क्षुरेण क्रियते निश्चर्म चरणद्वयम् // KAव्क्_४४.५६ //
3802 SK इति तेषां ब्रुवाणानां कलुषो ऽभून्मनोरथः / येन जन्मान्तरे प्रापुस्ते स्वेच्छासदृशं फलम् // KAव्क्_४४.५७ //
3803 SK धनं पश्यति लोभान्धः क्रिधान्धः शत्रुमेव च / कामान्धह् कामिनीमेव दर्पान्धस्तु न किंचन // KAव्क्_४४.५८ //
3804 SK धनिद्भूतविकाराणां प्रयात्यनियतात्मनाम् / मदमन्दविचाराणामानन्दः क्लेशबन्धताम् // KAव्क्_४४.५९ //
3805 SK क्रुध्यन्त्यकारणमकारणमुत्पतन्ति स्निह्यन्त्यकारणमकारणमामनन्ति / मोहाहताः खलु हिताहितनिर्विचाराः तृप्ताः परं नृपशवः समदा भवन्ति // KAव्क्_४४.६० //
3806 SK ज्येष्ठः श्रेष्ठिसुतः पापात्स एवापरजन्मनि / शारिर्यानाभिधः शाक्यः पीत्वा मद्यं व्यपद्यत // KAव्क्_४४.६१ //
3807 SK द्वितीयो ऽपि महान्नाम शाक्यस्तोये क्षयं गतः / तृतीयश्च स्वपुत्रेण व्यस्तो राजा प्रसेनजित् // KAव्क्_४४.६२ //
3808 SK बिम्बिसारश्चतुर्थो ऽसौ धृतः पुत्रेण बन्धने / प्रयुक्तं धनवत्कर्म भुज्यते हि सवृद्धिकम् // KAव्क्_४४.६३ //
3809 SK मोहाहतैरिह हि सद्भिरसद्भिरेषां निःशर्म कर्म सहसैव विडम्ब्यते यत् / बाष्पाम्बुपूर्णनयनैरनयोपनीतःमस्तोकशोकविवशैरनुभूयते ऽत्र // KAव्क्_४४.६४ // KAव्क्_४४.//
3810 SK सुगतकथितमेतत् पूर्वजन्मप्रवृत्तं विषविषमविपाकं बिम्बिसारस्य वृत्तम् / विबुधसदसि भिक्षुः स्पष्टमाकर्ण्य मेने व्यसनशतनिमित्तं दूषितं चित्तमेव // KAव्क्_४४.६५ //
3811 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायाम् बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायामजातशत्रुपितृद्रोदावदानं नाम चतुश्चत्वारिंशः पल्लवः //
3812 SK ४५. कृतज्ञावदानम् /
3813 SK अन्धीकृतो ऽपि स्वदृशा तमसा खलेन लक्ष्मीविहारविरहे विनिपातितो ऽपि / कष्टां दशामिव निशामतिवाह्य पद्मः स्वामेव संपदमुपैति पुनर्गुणाढ्यः // KAव्क्_४५.१ //
3814 SK श्रावस्त्यां सुगते जेतवनोद्यानविहारिणि / देवदत्तः परिद्वेषव्याधिव्याप्तो व्यचिन्तयत् // KAव्क्_४५.२ //
3815 SK तुल्यः समानो मे भ्राता मनुष्यः शाक्यवंशजः / प्राप्तः पुण्यप्रभावेण त्रिजगत्पूज्यतां जिनः // KAव्क्_४५.३ //
3816 SK जीवितोद्वृत्तये तस्मात् तय्स्य यत्नं करोम्यहम् / न ह्यनस्तंगते भानौ परतेजः प्रकाशते // KAव्क्_४५.४ //
3817 SK विज्ञानेनानुभावेन विद्यया तपसा श्रिया / परप्रकर्षं सहते न हि मानोन्नतं मनह् // KAव्क्_४५.५ //
3818 SK विषं निजनखाग्रेषु धृत्वा तस्य प्रणामकृत् / संचारयामि वपुषि नेदिष्ठः पादपीडणैः // KAव्क्_४५.६ //
3819 SK इति संचिन्त्य कलुषं विद्वेषविवशः खलह् / स तिष्यप्रमुखानेत्य बान्धवानिदमभ्यधात् // KAव्क्_४५.७ //
3820 SK क्रूरः कृतापकारो ऽहं सुगतस्याद्य पादयोः / सरलस्य प्रसादाय प्तामि गुरुपातकह् // KAव्क्_४५.८ //
3821 SK इति ब्रुवाणस्तैः सर्वैः सुदत्तानुमतैः सह / जिनं जेतवनासीनं द्रष्टुं दुष्टमतिर्ययौ // KAव्क्_४५.९ //
3822 SK भगवन्तं विलोक्याभूत्तत्र यावत्स सर्वशः / तावद्दग्धो ऽहमित्युच्चैरुत्क्षिप्तचरणो ऽवदत् // KAव्क्_४५.१० //
3823 SK हुइंसासंकल्पपापेन व्रज्रेणेव समाहतः / सशरीरं क्षणे तस्मिन् नरकाग्नौ पपात सः // KAव्क्_४५.११ //
3824 SK सर्वज्ञः सहसा दृष्ट्वा तं घोरनरके च्युतम् / उवाच श्रुततद्वृत्तविस्मितां भिक्षुसंसदम् // KAव्क्_४५.१२ //
3825 SK एष किल्बिषदोषेण पतितः क्लेशसंकटे / तीव्रम् हि तिमिर सूते सर्वथा मलिनं मनः // KAव्क्_४५.१३ //
3826 SK नगर्यामतिघोषायां रतिसोमस्य भूपतेः / कृतज्ञश्चाकृतज्ञश्च पुरा पुत्रौ बभूवतुः // KAव्क्_४५.१४ //
3827 SK कृतज्ञः कृपयार्थिभ्यः कल्पवृक्षः इवानिशम् / निजं विमुच्य प्रददौ रत्नाभरणसंचयम् // KAव्क्_४५.१५ //
3828 SK अविभक्तं पितुर्द्रव्यं सर्वं साधारणं तयोः / वदन्नित्यकृतज्ञ्पो ऽपि तेन् अदत्तः जहत् तत् // KAव्क्_४५.१६ //
3829 SK ततः श्लाध्याय वचसा मतिघोषाभोधो नृपः / जनकल्यानिकां नाम कृतज्ञाय सुतां ददौ // KAव्क्_४५.१७ //
3830 SK स्वयमेवार्जितं वित्तं दातुं जातमनोरथः / आरुरोहम् प्रवहणं कृतज्ञो ऽथ महोदधौ // KAव्क्_४५.१८ //
3831 SK रत्नार्जनोद्यतं यान्तं तं द्वेषस्पर्धितादरः / तमेवानुययौ लोभादकृतज्ञो ऽपि दुर्जनः // KAव्क्_४५.१९ //
3832 SK संपूर्णं वणिजां सार्थैः ततः प्रवहणं शनैः / आनुकूल्येन मतुतामवाप द्वीपमीप्सितम् // KAव्क्_४५.२० //
3833 SK तस्मिन् प्रतिनिवृत्ते ऽथ स्वदेशं गन्तुमुद्यते / रत्नराशिभिरापूर्णसंक्लपे स्वदेशं गन्तुमुद्यते // KAव्क्_४५.२१ //
3834 SK कृतज्ञः पृथिवीमूल्यं रत्नानां शतपःञ्चकम् / आदाय ग्रन्थिपट्टेन बबन्धांशुकपल्लवे // KAव्क्_४५.२२ //
3835 SK रत्नभारपरिश्रान्तं ततः प्रवहणं महत् / अभज्यत महावातैरैश्वर्यमिव दुर्नयैः // KAव्क्_४५.२३ //
3836 SK ततः फलकवाहस्तं कृतज्ञः प्राप्तजीवितः / अकृतज्ञं निमज्जन्तं पृष्ठेन समतारयत् // KAव्क्_४५.२४ //
3837 SK तारितः कृपया भ्रात्रा स घोरमकराकरात् / अपश्यदञ्चले तस्य रुचिरं रत्नसंचयम् // KAव्क्_४५.२५ //
3838 SK स तस्य रत्नलोभेन द्वेषेन च वशीकृतः / समुद्रतीरे श्रान्तस्य भ्रातुर्द्रोहमचिन्तयत् // KAव्क्_४५.२६ //
3839 SK तस्य निद्रानिलीनस्य शस्त्रेणोत्पाट्य लोचनम् / गृहीत्वा रत्ननिचयं कृतघ्नः स ययौ जवात् // KAव्क्_४५.२७ //
3840 SK क्रूरेणाङ्गीकृतस्तेन राहुणेव दिवाकर / लोकोपकारविहतो दुःखितः सो ऽप्यचिन्तयत् // KAव्क्_४५.२८ //
3841 SK अधुनार्थिप्रदाने ऽर्थे व्यर्थीभूते मनोरथे / किं ममान्धस्य वन्ध्येन जीवितेन प्रयोजनम् // KAव्क्_४५.२९ //
3842 SK अप्राप्तविषयाः प्राणा न प्रयान्ति यदि क्षयम् / तदसंगतयो योगाः क्लेशय्न्ति क्ष्यक्षमाः // KAव्क्_४५.३० //
3843 SK क्षणे धने जने द्वेषमानवैकल्यविह्वले / पूज्ये पुंसां समेनैव शेषस्य च यशोव्ययः // KAव्क्_४५.३१ //
3844 SK इति संचिन्त्य स शनैर्व्रजन्सार्थेन तारितः / अवाप नगरोपान्तं मतिघोषस्य भूपतेः // KAव्क्_४५.३२ //
3845 SK गोपालभवने तत्र स कंचित्कालमास्थितः / उद्यानयात्रागतया राजपुत्र्या विलोकितह् // KAव्क्_४५.३३ //
3846 SK तं दृष्ट्वान्धमपि व्यक्तराजलक्शणलक्षितम् / प्राग्जन्मप्रेमबन्धेन साभिलाषा बभूव सा // KAव्क्_४५.३४ //
3847 SK ततः स्वयंवरविधिं सा कृत्वा शासनात्पितुः / राज्ञां मध्ये च मान्यानां वव्रे विगतलोचनम् // KAव्क्_४५.३५ //
3848 SK भूमिपालान् परित्यज्य वृतो ऽन्धः पापया त्वया / उक्त्वेति पित्रा कोपेन निरस्ता शुशुभे न सा // KAव्क्_४५.३६ //
3849 SK उद्याने सा निधायान्धं यत्नेनाहृत्य भोजनम् / सदा तस्मै ददौ प्रेमप्रणयोपचितादरा // KAव्क्_४५.३७ //
3850 SK कदाचित्तां चिरायातामाहारावसरे गते / उवाच राजतनयः परं म्लानाननः क्षुधा // KAव्क्_४५.३८ //
3851 SK असमीक्षितकारिणा त्वया केवलचापलात् / वृतो ऽहमन्धः संत्यज्य नृपान् विपुललोचनान् // KAव्क्_४५.३९ //
3852 SK पश्चात्तापेन नूनं त्वं मयि पर्युषितादरा / अधुना ताण्डवं प्रेम्णह् प्रदर्शयितुमुद्यता // KAव्क्_४५.४० //
3853 SK अन्धसंदर्शनोद्विग्ना सुरूपालोकनोन्मुखी / आहारकाले ऽतिक्रान्ते चिरेणेह त्वमागता // KAव्क्_४५.४१ //
3854 SK इत्युक्त्वा परुषं तेन कम्पमाना लतेव सा / उवाच गुञ्जन्मधुपश्रेणीमधुरवादिनी // KAव्क्_४५.४२ //
3855 SK नाथ मिथ्यैव मे शन्कां न कोपात्कर्तुमर्हसि / वाग्बाणपातं सहते न चेतः प्रीतिपेशलं // KAव्क्_४५.४३ //
3856 SK त्वामेच देवतां जाने यद्यहं शुद्धमानस् आ / तेन सत्येन सालोकमेकं नयनमस्तु ते // KAव्क्_४५.४४ //
3857 SK इत्युक्ते सत्त्वशालिन्या तया तस्याशु लोचनम् / उत्फुल्लकमलाकारमेकं विमलताम् ययौ // KAव्क्_४५.४५ //
3858 SK तस्याह् सत्यप्रभावेण संजातपृथुविस्मयह् / सत्यप्रत्ययसोत्साहं कृतज्ञस्तामभाषत // KAव्क्_४५.४६ //
3859 SK भ्रात्रा तेनाकृतज्ञ्न पाटिते लोचनद्वये / तस्मिन् विकारो वैरं वा न निकारो ऽप्यभून्मम // KAव्क्_४५.४७ //
3860 SK स्वच्छं तेनास्तु सत्येन द्वितीयमपि लोचनम् / इत्युक्ते तक्षणेनास्य स्पष्टं चक्षुरलक्ष्यत // KAव्क्_४५.४८ //
3861 SK अतः कथितवृत्तान्तं कृतज्ञमुचितं पतिम् / प्रहृष्टा जनकल्याणी गत्वा पित्रे न्यवेदयत् // KAव्क्_४५.४९ //
3862 SK पूजितः श्वशुरेणाथ स रत्नगजवाजिभिः / श्रियेव कान्तया सार्धं जगाम नगरं पितुः // KAव्क्_४५.५० //
3863 SK स तत्र पित्रा हृष्टेन चरणालीनशेखरः / जनानुरागसुभगे यैवराज्ये पदे धृतः // KAव्क्_४५.५१ //
3864 SK अकृतज्ञो ऽपि निर्लज्जस्तं प्रसादयितुं शठः / विचिन्त्य पादपतने तस्य द्रोहं समाययौ // KAव्क्_४५.५२ //
3865 SK उन्मना हन्तुमायातः स तं कुटुलचेष्टितः / हाहा दग्धो ऽस्मि दग्धो ऽस्मीत्युक्त्वैव नरके ऽपतत् // KAव्क्_४५.५३ //
3866 SK स एव देवदत्तो ऽसौ कृतज्ञो ऽप्यहमेव च / जन्मान्तरानुबन्धेन द्वेषो ऽस्य न निवर्तते // KAव्क्_४५.५४ //
3867 SK सर्वज्ञभाषितमिति प्रचुरोपकारं तद्देवदत्तचरितं परितापकारि / जन्मान्तरोपचितपातकसंनिबद्धं श्रुत्वा बभूव विमना इव भिक्षुसंघः // KAव्क्_४५.५५ //
3868 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां कृतज्ञावदानं पञ्चचत्वारिंशः पल्लवः //
3869 SK ४६. शालिस्तम्बावदानम् /
3870 SK दानैकतानमनसां पृथुसत्त्वभाजामुत्साहमानगुणभोगविभूटिपूतः / प्राकुण्यसंचयमयः कुशलभिधानः काले फलत्यविकलः किल कल्पवृक्षः // KAव्क्_४६.१ //
3871 SK कोसलेन्द्रस्य भूभर्तुः श्रावस्त्याम् भगवान् पुरा / विजहार व रोद्याने सह भिक्षगणैर्जिनः // KAव्क्_४६.२ //
3872 SK आदिमध्याण्तकल्याणं बह्वाभिभवसाधकम् / संदिदेश स सद्धर्मं त्रैलोक्यकुशलोद्यतः // KAव्क्_४६.३ //
3873 SK अत्राण्तरे नागराजपुत्राः सागरवासिनह् / चत्वारः सुगतोदीर्णं सद्धर्मं परमामृतम् // KAव्क्_४६.४ //
3874 SK अभिरत्याख्यया स्वस्रा प्रेरिताः श्रोतुमागताः / ते बलातिबल-श्वास-महाश्वासाभिधाः समम् // KAव्क्_४६.५ //
3875 SK क्रकुच्छन्दस्य सुधियः काले भगवतः पुर / कनकाख्यस्य च मुनेः काश्यपस्य च यत्नतः // KAव्क्_४६.६ //
3876 SK आजग्मुः श्रीसुखासक्ताः श्रोतुमप्रार्थिता अपि / तत्पुण्यपरिणामेन प्राप्ताः शाक्यमुनेः पुरा // KAव्क्_४६.७ //
3877 SK तेषु प्रणम्य शास्तारं चरणालीनमौलिषु / विधाय मानुषं रूपमुपविष्टेषु पर्षदि // KAव्क्_४६.८ //
3878 SK सद्धर्ममाययौ श्रोतुं कोसलेन्द्रः प्रसेनजित् / लक्ष्मीमन्दस्मितच्छायं निवार्य च्छत्रचामरम् // KAव्क्_४६.९ //
3879 SK शास्तुः पादप्रणामाय विशतस्तस्य संसदि / अवकाशं नताश्चक्रुः सर्वे नृपतिगौरवात् // KAव्क्_४६.१० //
3880 SK तस्याभिनन्द्यमानस्य वर्षाश्रमगुरोर्नृभिः / नागराजसुताश्चक्रुर्नावकाशं न सत्कृतम् // KAव्क्_४६.११ //
3881 SK तस्याभिनन्द्यमानस्य वर्णाश्रमगुरोर्नृभिः / नागराजसुताश्चक्रुर्नावकाशं न सत्कृतम् // KAव्क्_४६.१२ //
3882 SK स संज्ञया समादिश्य निजं परिजनं पुरः / गमने निग्रहम् तेषां निर्विकार इवाभवत् // KAव्क्_४६.१३ //
3883 SK भगवानपि सर्वज्ञस्तस्य ज्ञात्वा च निश्चयम् / धर्मोपदेशपर्यन्ते प्रोवाच रचितस्मितः // KAव्क्_४६.१४ //
3884 SK न विद्वेषरजःपूर्णमनोमलिनदर्पणे / भाति धर्मोपदेशस्य प्रतिबिम्बप्रतिग्रहः // KAव्क्_४६.१५ //
3885 SK अविहितसमतानां कोपमोहाहतानां कृशमपि कुशलांशं नोपदेशः करोति / न हि वहुतरदोषे शुद्धिहीने शरीरे व्रजति हतमतीनाम् भेषजं भेषजत्वम // KAव्क्_४६.१६ //
3886 SK इति युक्तं भगवता हितमुक्तं महीपतिः / श्रुत्वापि न च तत्याज नागेषु विमनस्कताम् // KAव्क्_४६.१७ //
3887 SK भगवन्तं प्रणम्याथ प्रयाते स्वपदं नृपे / नागास्तत्सैनिकाबद्धमार्गे व्योमपथा ययुः // KAव्क्_४६.१८ //
3888 SK ते विचिन्त्य स्वभवने क्ष्मासंक्षयकृतक्षणाः / घोरनिर्घातमेघौघग्रस्तलोकाः समाययुः // KAव्क्_४६.१९ //
3889 SK तेषां व्यवसितं ज्ञात्वा सर्वज्ञः पक्षपातिनाम् / रक्ष्ःआक्षमं क्षितिपतेर्मौद्गल्यायनमादिशत् // KAव्क्_४६.२० //
3890 SK अथ नागगणोत्सृष्टा वज्रवृष्टिर्महीपतौ / भूभर्तुस्तत्प्रभावेण प्रययौ पुष्पवृष्टिताम् // KAव्क्_४६.२१ //
3891 SK शस्त्रास्त्रवृष्टिर्निबिडक्षिप्ता तैरथ दुःसहा / मौद्गल्यायनसंकल्पाद्ययौ राजार्हभोज्यताम् // KAव्क्_४६.२२ //
3892 SK तत्प्रभावात्प्रयातेषु भोग्नोत्साहेषु भोगिषु / गत्वा ववन्दे सुगतं नृपतिर्वीतविप्लवः // KAव्क्_४६.२३ //
3893 SK स मौद्गल्यायनस्यार्घ्यमुचितं भोगसंपदा / भक्तिसंस्कारसुभगं विदधे जिअन्शासनात् // KAव्क्_४६.२४ //
3894 SK ततः स्वर्गोचिताम् भिक्षुर्विभूतिं वीक्ष्य भूपतेः / पप्रच्छ कौतुकवशात् सर्वज्ञं चरिताञ्जलिः // KAव्क्_४६.२५ //
3895 SK भगवन् कस्य पुण्यस्य प्रभावेण प्रसेनजित् / सर्वैर्विराजितं भोगैः प्राज्यं राज्यमवाप्तवान् // KAव्क्_४६.२६ //
3896 SK इक्षुस्तम्बवदेतस्य शालिस्तम्बश्च जायते / दिव्यपानान्नसंपत्तिः फलं तत्कस्य कर्मणः // KAव्क्_४६.२७ //
3897 SK इति पृष्टः प्रणयिना भिक्षुणा भगवान् जिनः / उवाच श्रूयतां राज्ञः कारणं भोगसंपदाम् // KAव्क्_४६.२८ //
3898 SK कोसले ऽस्मिन् जनपदे खण्डाख्यगुडकर्षकः / ददौ प्रत्येकबुद्धाय पूर्वमिक्षुरसौदनम् // KAव्क्_४६.२९ //
3899 SK भुक्तेनेक्षुरसान्नेन तेन वातगदार्दितः / प्रत्येकबुद्धस्तत्पुण्यैः प्रसन्नः सुस्थतां ययौ // KAव्क्_४६.३० //
3900 SK राजा प्रसेनजित् सो ऽयं पुण्यवान् गुडकर्षकह् / तेन पुण्यप्रभावेण भोगभागी विराजते // KAव्क्_४६.३१ //
3901 SK उपकारः कृतज्ञानां निकारः क्रूरचेतसाम् / सुकृतांशश्च शाधूनामप्लो ऽप्यायात्यनल्पताम् // KAव्क्_४६.३२ //
3902 SK सर्वज्ञेनेति कथिते पूर्वपुण्ये महीपतेः / बभूव सुकृतोत्कर्षे भिक्षुराश्चर्यनिश्चलह् // KAव्क्_४६.३३ //
3903 SK अथ भक्त्या भगवतः कृत्वा राजाधिवासनाम् / उपनिन्ये स्वयं तां तां सुरार्हां भोगसंपदम् // KAव्क्_४६.३४ //
3904 SK परोपचारै रुचिरैरर्चिते काञ्चनासने / सुखोपविष्टं प्रोवाच नरनाथस्तथागतम् // KAव्क्_४६.३५ //
3905 SK भगवन् मे भवद्भक्तिविभक्तसुकृतश्रियः / चयह् कुशलमूलानामनिर्मुक्त्यै भविष्यति // KAव्क्_४६.३६ //
3906 SK विनयात्पार्थिवेनेति पूर्णपुण्याभिमानिना / पृष्टः स्मितसितालोकं जगाद सुगतः सृजन् // KAव्क्_४६.३७ //
3907 SK राजन् संसारमार्गो ऽयमनादिनिधनोद्भवः / हेलालङ्घ्यः कथं पुंसामप्राप्य क्लेशसंक्षयम् // KAव्क्_४६.३८ //
3908 SK चिरपरिचितैश्चक्रावर्तैरसक्तगतागतिः प्रकृतिगहनः संसारो ऽयं सुखेन न लङ्घ्यते / असति हि विना योगाभ्यासं क्षये किल कर्मणां स्फुटफलततिर्धर्मो ऽप्यस्मिन्निबन्धनताम् गतः // KAव्क्_४६.३९ //
3909 SK सर्वतो विनिवृत्तस्य दानाभ्यासेन भूयसा / ममापि धर्मसंसारो बभूव भूरिजन्मकृत् // KAव्क्_४६.४० //
3910 SK धनिको नाम धनवान् वाराणस्यामभूत्पुरा / तापापहः फलस्फीटश्छायावृक्ष इवार्थिनाम् // KAव्क्_४६.४१ //
3911 SK दुर्भिक्षक्षपिते लोके विषमक्लेशविह्वले / भोज्यं प्रत्येकबुद्धानां सो ऽर्थितः पञ्चभिः शतैः // KAव्क्_४६.४२ //
3912 SK स तेषां परभोगार्हं दुर्भिक्षावधि भोजनम् / अकल्पयदनल्पश्रीः कोष्ठागारी गतस्मयः // KAव्क्_४६.४३ //
3913 SK शतपञ्चकसंघातैर्भोक्तुं तस्य गृहं ततः / क्रमात्प्रत्येकबुद्धानाम् सहस्रद्वयमाययौ // KAव्क्_४६.४४ //
3914 SK तस्य तत्पुण्यवासेन जातो लब्धफलश्रिया / दुर्भिक्षदानजनितो रत्नकोशस्तदाक्षयः // KAव्क्_४६.४५ //
3915 SK सुखं सनातनं पुण्यभोग्यत्वं प्रणिधानतः / शास्तुस्ततः परेणायं सम्यक्संबोधिमापितः // KAव्क्_४६.४६ //
3916 SK पुण्येन पापेन च वेष्टितेयं संसारिणां कर्मफलप्रवृत्तिः / सितासिता बन्धनरज्जुरेषा तत्संक्षये मोक्षपथं वदन्ति // KAव्क्_४६.४७ //
3917 SK इति क्षितीशः कथितं जिनेन मोहव्यपायेन निशम्य मोक्षम् / क्लेशक्षयार्हं शममेव मत्वा पुण्याभिमानं शिथिलीवकार // KAव्क्_४६.४८ //
3918 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां शालिस्तम्बावदानं नाम षट्चत्वारिंशः पल्लवः //
3919 SK ४७. सर्वार्थसिद्धावदानम् /
3920 SK स्वार्थप्रवृत्तौ विगतस्पृहाणां परोपकारे सततोद्यतानाम् / क्लेशेष्वभीता व्यसनैरनीता विघ्नैरपीडाकरमेति सिद्धिः // KAव्क्_४७.१ //
3921 SK श्रावस्त्यां भगवान् पूर्वं जिनो जेतवनस्थितः / धर्माख्यानप्रसङ्गेन भिक्षुसंघमभाषत // KAव्क्_४७.२ //
3922 SK आसीदखिलभूपालमौलिलालितशासनह् / सिद्धार्थो नाम सुकृती सार्वभौमो महीपतिः // KAव्क्_४७.३ //
3923 SK सागराख्यस्य नागस्य सूनुर्जलधिवासिनह् / सर्वार्थसिद्धः पुत्रत्वं प्रययौ तस्य भूपतेः // KAव्क्_४७.४ //
3924 SK स भाद्रकल्पिको बोधिसत्त्वः सत्त्वोज्ज्वलप्रभः / जातमात्रः क्षितितलं चक्रे पूर्णं स्वऋद्धिभिः // KAव्क्_४७.५ //
3925 SK तस्य प्रवर्धमानस्य धर्मस्येव समुद्ययौ / समस्तभुवनव्यापि विबुधाभ्यर्चितं यशः // KAव्क्_४७.६ //
3926 SK स कदाचिद्वरोद्याने स्यन्दनेन युवा व्रजन् / ददर्श वृद्धपुरुषं देवतानिर्मितं पुरः // KAव्क्_४७.७ //
3927 SK तं विलोक्य जराजीर्णं जातवैराग्यवासनह् / संसारमिव निःसारं स शरीवममन्यत // KAव्क्_४७.८ //
3928 SK उद्यानयात्राविरतः शनैः प्रतिनिवृत्य सः / दारिद्य्रविद्रुतच्छायानद्राक्षीत् कृपणान् पथि // KAव्क्_४७.९ //
3929 SK दृष्ट्वा तानसुखक्लेष्टान् करुणाकृष्टमानसः / अचिन्तयदहो दुःखं सहन्ते भुवि दुर्गताः // KAव्क्_४७.१० //
3930 SK अदानप्रभवं दुःखं वदन्तीति विसंगताः / पृथिव्यां रत्नपूर्णायां परपिण्डोपजीविनः // KAव्क्_४७.११ //
3931 SK इदमेवाविसंवादि चिह्नं कलुषकर्मणाम् / दीनां यदेते याचन्ते पुरुषं पुरुषाः परम् // KAव्क्_४७.१२ //
3932 SK अहो दुष्कृतमेतेषामवधूताः पदे पदे / यदेते मार्गणोद्विग्ना भिक्षित्वापि बुभुक्षिताः // KAव्क्_४७.१३ //
3933 SK इति संचिन्त्य सुचिरं विश्चक्लेशक्षयोद्यतः / यदरिद्रं जगत्कर्तुं रत्नार्थी जलधिं ययौ // KAव्क्_४७.१४ //
3934 SK कथचिदिव संसक्तः स पित्रा दृढनिश्चयः / स्मारुह्य प्रवहणं रत्नद्वीपमवाप्तवान् // KAव्क्_४७.१५ //
3935 SK तत्र प्रवहणारूढान् वणिजः सहयायिनः / सो ऽब्रवीत्क्रियताम् कामं युष्माभिर्मणिसंग्रहं // KAव्क्_४७.१६ //
3936 SK एतैः सामान्यरत्नैस्तु मम नास्ति प्रयोजनम् / कोशे महान्ति भास्वन्ति सन्ति रत्नोत्तमानि नः // KAव्क्_४७.१७ //
3937 SK किं तु चिन्तामणिप्राप्त्यै विपुलो ऽयं ममोद्यमः / तेन विद्रुतदारिद्य्रां कर्तुमिच्छामि मोदेनीम् // KAव्क्_४७.१८ //
3938 SK श्रुतं मया नागराजः सागराख्यो महोदधौ / वसत्यस्ति गृहे तस्य चिन्तितार्थप्रदो मणिः // KAव्क्_४७.१९ //
3939 SK विलङ्घ्य विषमं मार्गं तमादातुं व्रजाम्यहम् / नास्ति धैर्यसहायानाम् दुर्गमं व्यवसायिनाम् // KAव्क्_४७.२० //
3940 SK न च मद्विरहे किंचिद् व्यसनं वो भविष्यति / सत्यमेव परार्थो ऽयं यदि मे सुकृतोद्यमः // KAव्क्_४७.२१ //
3941 SK इत्युक्त्वा तान् समामन्त्र्य प्रतस्थे स्थिरनिश्चयः / महतीं धृतिमालम्ब्य सत्त्ववान् पार्थिवात्मजः // KAव्क्_४७.२२ //
3942 SK गुल्फमात्रेण सप्ताहं गत्वा गङ्गमवर्त्मना / जानुदघ्नेन सप्ताहं सप्ताहं पौरुषेण च // KAव्क्_४७.२३ //
3943 SK चत्वारि सप्तरात्राणि ततः पुष्करिणीजलैः / गत्वा दृष्टिविषान् घोरान् ददर्श फणिनः पुरः // KAव्क्_४७.२४ //
3944 SK मैत्रीयुक्तेन मनसा कृत्वा तानथ निर्विषान् / क्रूरकोपैर्वृतं यक्षैर्यक्षद्वीपमवाप सः // KAव्क्_४७.२५ //
3945 SK तत्र मैत्रेण मनसा वीतक्रोधान् विधाय तान् / शुश्राव तैरभिहितं विपुलोत्साहविस्मितैः // KAव्क्_४७.२६ //
3946 SK कुमार स्फीटसत्त्वेन तथा वीर्येणचामुना / नागराजस्य भवनं समाहितमवाप्य तम् // KAव्क्_४७.२७ //
3947 SK कालेन सम्यक्संबुद्धः सर्वज्ञस्त्वं भविष्यसि / श्रावकाश्च भविष्यामो वयं त्वदनुयायिनः // KAव्क्_४७.२८ //
3948 SK प्रसन्नैरिति तैरुक्तमभिनन्द्य नृपात्मजः / रक्षेवरावृतं प्राप राक्षसद्वीपमुत्कटम् // KAव्क्_४७.२९ //
3949 SK तथैव विगतक्रूरविकारैस्तैः स पूजितः / भूजोत्क्षेपेण निक्षिप्तः क्षणान्नागेन्द्रसद्मानि // KAव्क्_४७.३० //
3950 SK स तत्र दीप्तविभवे दिव्योत्साससुखोचितः / अशृणोद्दीर्घदुःखार्तिसूचकं रोदनध्वनिम् // KAव्क्_४७.३१ //
3951 SK स तमाकर्ण्य सोद्वेगः प्रकृत्यैव दयार्द्रधीः / किमेतदिति पप्रच्छ दृष्ट्वाग्रे नागकन्यकाम् // KAव्क्_४७.३२ //
3952 SK सा तं बभाषे संसक्तशोकोष्मपिशुनैर्मुहुः / म्लानयन्तीं स्वनिश्वासौर्बिम्बाधरदलत्विषम् // KAव्क्_४७.३३ //
3953 SK गुणावान् नागराजस्य पुत्रः कमललोचनः / ज्योष्ठः सर्वार्थसिद्धाख्यः प्रियः पञ्चत्वमागतः // KAव्क्_४७.३४ //
3954 SK ततः प्रतिगतानन्दे विनिवृत्तसुखोत्सवे / धनेन रोदनेनास्मिन्न भवेद्भवने स्थितिः // KAव्क्_४७.३५ //
3955 SK इति तस्या वचः श्रुत्वा सो ऽन्तः परिचितां वहन् / स्वदेशदर्शनप्राप्तो नागराजान्तिकं ययौ // KAव्क्_४७.३६ //
3956 SK नागराजस्तमायान्तं परिज्ञाय प्रियासखः / एह्येहि पुत्रेति वदन् बभूवानन्दविह्वलः // KAव्क्_४७.३७ //
3957 SK मर्त्यजन्मकथाम् तेन स्वं चागमनकारणम् / श्रुत्वा निवेदितं नागः परिष्वज्य जगाद तम् // KAव्क्_४७.३८ //
3958 SK चिन्तामणिरयं पुत्र मम मौलिविभूषणम् / गृह्यताम् तव संकल्पं न वन्ध्यं कर्तुमुत्सहे // KAव्क्_४७.३९ //
3959 SK देयः कृतजगत्कृत्यो ममैवायं पुनस्त्वया / इत्युक्त्वास्मै ददौ दिव्यचूडं रत्न विमुच्य सः // KAव्क्_४७.४० //
3960 SK हृष्टः प्रणम्य नागेन्द्रं ययौ प्रवहणान्तिकम् // KAव्क्_४७.४१ //
3961 SK समुद्रदेवता तत्र तं दृष्ट्वा श्रुततत्कथा / उवाच कीदृशः साधो प्राप्तश्चिन्तामणीस्त्वया // KAव्क्_४७.४२ //
3962 SK * * * * / * * * * // KAव्क्_४७.४३ //
3963 SK * * * * / * * * * // KAव्क्_४७.४४ //
3964 SK समुद्रे पतितं दृष्ट्वा रत्नं कृच्छ्रतरार्जितम् / स जगाद दृढोद्योगवैफल्योद्वेगनिश्चलः // KAव्क्_४७.४५ //
3965 SK अहो गुणोचिताकारा प्रणयान्मृदुवादिनी / विद्वेषकलुषं कर्म कृत्वा त्वं न विलज्जसे // KAव्क्_४७.४६ //
3966 SK परोत्कर्षेषु संघर्षशोकक्लेशमुपैति यः / शीतला अपि तस्यैता ज्वालावलयिता दिशः // KAव्क्_४७.४७ //
3967 SK परित्साहः प्रियो यस्य तस्य सत्त्वमहोदधेः / कर्पूरधवलं धत्ते त्रिलोकीतिलकं यशः // KAव्क्_४७.४८ //
3968 SK देवि प्रयच्छ मे रत्नमस्माद्विरम पातकात् / अपवादलतां कर्म न साधोरधिरोह्हति // KAव्क्_४७.४९ //
3969 SK लोभात्प्रमादाद्द्वेषाद्वा रत्नं चेन्न प्रयच्छसि / शोषयाम्येष जलधिं तदिमं ते समाश्रयम् // KAव्क्_४७.५० //
3970 SK इत्युक्त्वा प्यसकृत्तेन सा रत्ने न ददौ यदा / स तदा स्वप्रभावेण शोषायाब्धेः समुद्ययौ // KAव्क्_४७.५१ //
3971 SK ध्यातमात्रं सहस्राक्षवचसा विश्वकर्मणा / निर्मितं सहसा तस्य पत्रमाविरभुत्करे // KAव्क्_४७.५२ //
3972 SK स तेनागस्त्यचुलुकाकारेणाम्भः पयोनिधेः / अन्तरीक्षे समुत्क्षिप्य चिक्षेप क्षमणोद्यतः // KAव्क्_४७.५३ //
3973 SK कृते भूभागशेषे ऽब्धौ तेनात्यद्भुतकारिणा / सुरनिर्भर्त्सिता भीता देवतास्मै मणीं ददौ // KAव्क्_४७.५४ //
3974 SK निर्व्याजं साहसं दीप्तिं रत्नानामिव तत्त्वतः / प्रभावं वेत्ति महतां मन्त्राणां तपसां च कः // KAव्क्_४७.५५ //
3975 SK स्फारस्तावदपारवारिविरसव्यापारहेलाबलात् कल्लोलावलियन्त्रिताम्बरतया रत्नाकरः श्रूयते / गम्भीरः पुनरप्रमेयमहिमा को ऽपि प्रभावः सतां यस्मिन् विस्मयधाम्नि चिन्तनविधावन्ते प्लवन्ते धियः // KAव्क्_४७.५६ //
3976 SK ततश्चिन्तामणिं बुद्ध्वा निजसार्थेन संगतः / राजसूनुः स्वनगरं प्राप पूर्णमनोरथः // KAव्क्_४७.५७ //
3977 SK कृतकृत्यः प्रहृष्टेनः स पित्रा तत्र पूजितः / ध्वजाग्रे रत्नमाधाय जगाद जनसंसदि // KAव्क्_४७.५८ //
3978 SK परार्थ एव यत्नो ऽयं नात्मार्थो यदि मे क्कचित् / तेन सत्येन लोको ऽय सर्वं यात्वदरिद्रताम् // KAव्क्_४७.५९ //
3979 SK इत्युक्ते सत्त्वनिधिना तेन दीनदयालुना / रत्नवृष्टिरपर्यन्ता निपपात महीतले // KAव्क्_४७.६० //
3980 SK तेन रत्नसमूहेन दिक्षु सर्वासु भास्वता / ययौ जनस्य दारिद्य्रमयं निःशेषतां तमः // KAव्क्_४७.६१ //
3981 SK आशापाशवतां बलाप्त्रविशतां बाह्याङ्गणं श्रीमतां द्वाःस्थाघातवताम् मुहुर्विचलतां द्वारोदरे सीदताम् / दीर्घैर्निःश्वसितैः शुचा निपतितां देहक्षयं काङ्क्षतां दीनानां मणिराशिरश्मिशबलः श्रीसंगमः को ऽप्यभूत् // KAव्क्_४७.६२ //
3982 SK तच्छासनादुरगनायकमेव याते चिन्तामणौ विगतदैन्यजने च लोके / सर्वत्र दानरसिकस्य जनस्य चेतः सर्वार्थिसार्थविरताकुलितं बभूव // KAव्क्_४७.६३ //
3983 SK सर्वार्थसिद्धः क्षितिपालसूनुः यो ऽभूत्स एवाहमिहान्यदेहः / श्रुत्वेतिवृत्तं कथितं जिनेन ते भिक्षवस्तन्मयतामवापुः // KAव्क्_४७.६४ //
3984 SK इति क्षेमेन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां सर्वार्थसिद्धावदानं सत्पचत्वारिंशः पल्लवः //
3986 SK मत्तेभकुम्भोच्चकुचाभिरामाः कर्पूरहारांशुविलासहासाः / प्रीतिप्रदाः पुण्यवतां भवन्ति प्रौढा युवत्यश्च विभूतयश्च // KAव्क्_४८.१ //
3987 SK तथागते भगवति श्रावस्त्यां वनचारिणि / अभवत्सुप्रबुद्धाख्यः श्रीमान् गृहपतिः पुरा // KAव्क्_४८.२ //
3988 SK बभूव हस्तको नाम तस्यातिदयितः सुतः / पूर्वार्जितानां पुण्यानां साकार इव संचयः // KAव्क्_४८.३ //
3989 SK तस्य जन्मदिने जातश्चामीकरमयो महान् / एकीभूत इवाश्चर्यव्रजः प्रवरकुञ्चरः // KAव्क्_४८.४ //
3990 SK स गजेन्द्रः कुमारश्च तत्पितुश्च मनोरथः / लोककौतुककोशाश्च पूर्णतां त्युल्यमाययुः // KAव्क्_४८.५ //
3991 SK स शशीव शिशुः काले कलानिलयतां गतः / रुरुचे रुचिमान् सर्वलोकलोचनबान्धवः // KAव्क्_४८.६ //
3992 SK स शनैः पूरिताभोगभुजस्तम्भविभूषणम् / लेभे मनोभवारम्भभवनं नवयौवनम् // KAव्क्_४८.७ //
3993 SK कदाचिदथ भूभर्तुः स प्रसेनजितः सुताम् / तनुचीवरचिह्नेन सहजेन विराजिताम् // KAव्क्_४८.८ //
3994 SK कन्यां चीवरकन्याख्यां लावण्यललिताननाम् / उद्यानदर्शनायातां ददर्शायतलोचनाम् // KAव्क्_४८.९ //
3995 SK अक्लिष्टरूपामालोक्य तामपर्युषितद्युतिम् / विस्मयस्मरयोस्तुल्यमाययौ सहसा वशम् // KAव्क्_४८.१० //
3996 SK सो ऽचिन्तयदहो कान्तमिदमत्यद्भुतं वपुः / यस्मिन् भाति मुखव्याजाददोषविशदः शशी // KAव्क्_४८.११ //
3997 SK लावण्यमप्रतिममेव बिभति तन्वी बन्धूकबन्धुरधरो मधुरस्वभावः / द्रोहोद्यतः सरसविद्रुमपल्लवानां बिम्बप्रभाप्रसभभ्रमवन्ध्यकारः // KAव्क्_४८.१२ //
3998 SK वक्र्क्रं न क्षमते मदं शशमृतः क्लेश्नाति कान्तिः सुधाम् उत्फुल्लोत्पलकाननस्य कुरुते दृष्टिः प्रभाभ्र्त्सनम् / मन्ये मन्मथसंगमोचिततनोः साप्त्न्यभीतिप्रदा लीलायास्याः सहसा विलासलहरीशोषं विधत्ते रतेः // KAव्क्_४८.१३ //
3999 SK उद्वृत्ते कठिने परोधरयुगे नश्यद्विवेके चिरं यस्या दोषमये ऽप्यहो गुणवता हारेण बद्धा स्थितिः / यच्चास्मिन्नवलम्बते ऽम्बुजधिया रोलम्बरेखा मुखे लोलाक्ष्याः किमपि प्रशान्तनयने लीनं मुनीनां मनः // KAव्क्_४८.१४ //
4000 SK इति चिन्तयतस्तस्य वपुः पुष्पशरोपमम् / विलोक्य भूपतिसुता बभूवाश्चर्यनिश्चला // KAव्क्_४८.१५ //
4001 SK हृते लज्जांशुके तस्याः स्मरेण स्मितकारिणा / प्रत्यग्रपुलकाकीर्णं वपुः स्पष्टमदृश्यत // KAव्क्_४८.१६ //
4002 SK रुद्धा नवाभिलाषेण वैलक्ष्येण निवर्तिता / मनस्तत्रैव निक्षिप्य सा शून्येव शनैर्ययौ // KAव्क्_४८.१७ //
4003 SK राजधानीं समासाद्य लज्जाविस्मयमन्मथैः / मीलितेव निलीनेव प्रोषितेव बभूव सा // KAव्क्_४८.१८ //
4004 SK कुमारो ऽपि स्वभवने समुद्भूतमनोभाव्ः / तामेवेन्दुमुखीमग्रे संकल्पैरलिखन्मुहुः // KAव्क्_४८.१९ //
4005 SK स तां मानससर्वस्वं स्मरविद्यामिव स्मरन् / प्रदध्यौ कुर्लभाम् मत्वा तनयाम् चक्रवर्तिनः // KAव्क्_४८.२० //
4006 SK जन्मान्तरे तनुर्यस्य तपःपरिचिता चिरम् / धन्यः स तामवाप्नोति लतां सुकृतशाखिनः // KAव्क्_४८.२१ //
4007 SK रम्यप्रदानपुण्येन तद्दर्शनमवाप्यते / न जाने तानि पुण्यानि येषां तत्संगमः फलम् // KAव्क्_४८.२२ //
4008 SK तद्वक्र्क्रशीतकिरणस्मरणोत्सवेन तस्याश्च दुर्लभतया विरहोष्मणा मे / नो वेद्मि किं धृतिरियं किमयं विमोहः किं जीवितं किमसुभिः सहः विप्रयोगः // KAव्क्_४८.२३ //
4009 SK तद्वक्र्क्रब्जजितः प्रसह्र भजते क्षैण्यं क्षपावल्लभः तद्भूविभ्रमलज्जितं च विनतिं धते धनुर्मान्मथम् / तस्याह् पल्लवपेशलद्युतिमुषा शोषाधरेणार्दितं नूनं प्राप्य पराजयं वनमहीं बिम्ब समालम्बते // KAव्क्_४८.२४ //
4010 SK इति पूर्णेन्दुवदनावदनध्याननिश्चलह् / निशां निनाय संत्यक्तः सेर्ष्ययेव सनिद्रया // KAव्क्_४८.२५ //
4011 SK कन्यादर्शनवृत्तान्तं ततस्तेन निवेदितम् / श्रुत्वा पितास्य संक्रन्तचिन्तापरिचितो ऽभवत् // KAव्क्_४८.२६ //
4012 SK स तमूचे वयं पुत्र राज्ञो ऽस्य पुरवासिनह् / स कथं ते दुहितरं चक्रवर्ती प्रदास्यति // KAव्क्_४८.२७ //
4013 SK अशक्यं नैव कुर्वन्ति समीहन्ते न दुर्लभम् / असंभाव्यं न भाषन्ते मानकामा मनीषिणः // KAव्क्_४८.२८ //
4014 SK चूतचम्पकवल्लीषु स्वाधीनासु निरादरः / चिन्तयन् पारिजातस्य लताम् शुष्यति षट्पदः // KAव्क्_४८.२९ //
4015 SK तव तस्याश्च संबन्धः प्राज्गन्मविहितो यदि / तदवश्यं भवत्येव निष्प्रयत्नफलोदयह् // KAव्क्_४८.३० //
4016 SK आशापाशैरनाकृष्टं विचारैरकदर्थितम् / प्रयत्नभारैरश्रान्तं विधत्ते भवितव्यता // KAव्क्_४८.३१ //
4017 SK इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं तत्तथेति विचिन्तयन् / न चेतः कन्यकानीतं समानेतुं शशाक सः // KAव्क्_४८.३२ //
4018 SK स गत्वा दन्तयुगलं ययाचे हेमकुञ्चरम् / नवसंदर्शने राज्ञः प्रीतियोग्यमुपायनम् // KAव्क्_४८.३३ //
4019 SK पुण्यबन्धेन करिणा दत्तं दन्तयुगं ततः / स हेममयमादाय द्रष्टुं भूमिपतिं ययौ // KAव्क्_४८.३४ //
4020 SK स रत्नरुचिरं प्राप्य भवनं पृथिवीपतेः / प्रविश्यः प्रणतः प्रीत्यै हेमदन्तद्वयं ददौ // KAव्क्_४८.३५ //
4021 SK भूभुजा विश्रुतगुणः प्रसादेनाभिनन्दितः / वरं गृहाणेत्युक्तश्च स न जग्राह किंचन // KAव्क्_४८.३६ //
4022 SK तस्यादीनद्युतेश्चक्रे मानमभ्यधिकं नृपः / औचित्यचारुचरितः प्रियः कस्य न निःस्पृहः // KAव्क्_४८.३७ //
4023 SK स सदा दर्शने राज्ञः काञ्चनाङ्गानि दन्तिनः / पुनर्जातनवाङ्गेन दत्ताणि प्रीयते ददौ // KAव्क्_४८.३८ //
4024 SK तमुवाच महीपालः सेवाप्रणययन्त्रितः / दूतीं मनःप्रसादय वदनद्युतिमुद्वहन् // KAव्क्_४८.३९ //
4025 SK प्रभूतहेमसंभारां गुर्वीं सोवामिमामहम् / न सहे प्रौरवार्गो हि भवणीयो महीभृताम् // KAव्क्_४८.४० //
4026 SK संविभज्य जनानीतैः का प्रीतिर्मम काञ्चनैः / तवानर्घगुणा मूर्तिरियमेव मम प्रिया // KAव्क्_४८.४१ //
4027 SK लोभः पुरुषरत्नेषु भूषणार्हेषु शोभते / राज्ञां कोशेषु सीदन्ति हेमरत्नाश्मसंचयाः // KAव्क्_४८.४२ //
4028 SK समीहिततमं तुभ्यं किं प्रयच्छामि कथ्यताम् / निःशेषकोशदानेन न नामानुशयो ऽस्तु मे // KAव्क्_४८.४३ //
4029 SK राज्ञ्ं दृक्पातपात्रेण प्राप्यन्ते यदि न श्रियः / तदनर्थं गतार्थिन्या को ऽथः पार्थिवसेवया // KAव्क्_४८.४४ //
4030 SK इत्युक्तः क्षितिपालेन कुमारः कलिताञ्जलिः / तमभाषत भूपाल दातुमर्हति को ऽपरः // KAव्क्_४८.४५ //
4031 SK अनर्थितेन रत्नानि विबुधेभ्यः प्रयच्छता / तदुन्निद्रं समुद्रस्य मुद्रितं भवता यशः // KAव्क्_४८.४६ //
4032 SK महतापि प्रयत्नेन पूर्यते न महाशयः / अल्पकानां तदैर्श्वर्यं दारिद्यं तन्महीयसाम् // KAव्क्_४८.४७ //
4033 SK किं तु त्वद्भुजगुप्तानां धर्ममार्गेण जीवतां / जनानां नास्ति दारिद्यं द्रविणं येन मृग्यते // KAव्क्_४८.४८ //
4034 SK धनार्थिनो न तु वयं न च सेवाधिकारिणः / धनं धनं धनधियां मान एव मनस्विनाम् // KAव्क्_४८.४९ //
4035 SK मीलद्गुणेन परमेश्वरसेवनेन नुर्मूलताम् सुमनसां सहसा गतानाम् / दैन्यात्पुनः कृपणपण्यपथे च्युतानां न स्पर्शमात्रमपि साधुजनः करोति // KAव्क्_४८.५० //
4036 SK अर्थित्वान्मरणम् वरं तनुभृताम् दैन्यावसन्नात्मनां अर्थी सर्वजनावमानवसतिः सत्कारयोग्यः शवः / कुम्भस्तावदधह् प्रयाति गुणवान् कूपावतारे परं यावन्मोहतमःप्रवेशविवशः प्राप्तो ऽर्थिता लम्बते // KAव्क्_४८.५१ //
4037 SK सामान्या धनसंपदः क्रयकृषिप्राप्या सदा धीमतां संतोषो यदि नास्ति तत्किमपरा भूमिर्निधानावृता / सन्त्येवातिशयप्रसादनिरतास्ता हेमरत्नक्रियाः कस्येष्टः प्रियसंगमाय वपुषां सेवामयो विक्रयः // KAव्क्_४८.५२ //
4038 SK इत्यपारधियस्तस्य वचः श्रुत्वा महीपतिः / गॄह्यतामपरं किंचिदित्यभाषत सादरः // KAव्क्_४८.५३ //
4039 SK औचित्यचतुरालापः कर्कशो ऽपि नृपां प्रियः / कृपणश्चाटुकारो ऽपि कर्णशूलाय केवलः // KAव्क्_४८.५४ //
4040 SK और्दार्यपरितुष्टेन स राज्ञभ्यर्थितः परम् / तमूचे यदु तुष्टो ऽसि सुता मह्यं प्रदीयताम् // KAव्क्_४८.५५ //
4041 SK इत्युक्ते तेन नृपतिः संदेहान्दोलिताशयः / प्रातर्वक्ताहमित्युक्त्वा क्षणं क्ष्मातलमैक्षत // KAव्क्_४८.५६ //
4042 SK स कुमारं विसृज्याथ प्रधानामात्यमब्रवीत् / प्रसादरभसेनैव कृतं वाक्चापलं मया // KAव्क्_४८.५७ //
4043 SK चक्रवर्तिकुलोत्पन्ना कन्या पुण्यपणोचिता / कथं सामान्यपौराय गुणमात्रेण दीयते // KAव्क्_४८.५८ //
4044 SK ददामीति प्रतिश्रुत्य पश्चादनुशयाकुलः / कथं सराधनो भूत्वा भविष्याम्यर्थिनिष्फलः // KAव्क्_४८.५९ //
4045 SK कथं प्राप्तस्य तस्याहं प्रातर्द्रष्ट् मुखं पुरः / प्रियो ऽप्यप्रियतां यातः स मे दुर्लभयेच्छया // KAव्क्_४८.६० //
4046 SK नूनं गुणोपपन्नो ऽपि प्रकृत्यैव शरीरिणाम् / वक्ति यावन्न देहीति तावद्गवति वल्लभह् // KAव्क्_४८.६१ //
4047 SK इति भूमिपतेः श्रुत्वाः वचो दोलावलम्बिनः / तमुवाच महामात्यः संचिन्त्यावसरोचितम् // KAव्क्_४८.६२ //
4048 SK अनालोचितपर्यन्ताः प्रत्यग्रसरसादराः / स्वभावरभसा एव भवन्ति प्रभुबुद्धयः // KAव्क्_४८.६३ //
4049 SK अशक्यार्थनया तेन लुब्धेनेव गुणोदयः / राजसेवाप्रवृत्तेन हेमहस्ती विनाशितः // KAव्क्_४८.६४ //
4050 SK वाच्यो ऽसौ भवता स्वैरं कन्यार्थी पुनरागतः / हेमहस्तिनमारुह्य प्राप्तः प्राप्स्यसि मे सुताम् // KAव्क्_४८.६५ //
4051 SK तेनोत्कृत्तः स्वहस्तेन कुतस्तस्य स कुञ्जरः / न चासौ तद्विरहितः पुनरायाति लज्जया // KAव्क्_४८.६६ //
4052 SK इत्यमात्यस्य वचसा नृपतिर्युक्तिमाश्रितः / प्राप्तं कुमारमन्येद्युस्तदेवाभिमुखो ऽवदत् // KAव्क्_४८.६७ //
4053 SK कुमारो ऽपि गॄहं गत्वा विवाहोचितमङ्गलैः / हौमद्विरदमारुह्य स्वजनेन सजाययौ // KAव्क्_४८.६८ //
4054 SK स्वर्णवारणसंरूढं तमायान्तं महीपतिः / विलोक्याश्चर्यविभवं मेने पुण्यवतां वरम् // KAव्क्_४८.६९ //
4055 SK कौतुकादथ भूपालस्तं गजं हेमविग्रहम् / आरुरोह महोत्साहः सुमेरुमिव वज्रभृत् // KAव्क्_४८.७० //
4056 SK आरूढे पृथिवीपाले न चचाल स कुञ्जरः / प्रसर्सर्प कुमारेण पुनश्चालंकृतासनः // KAव्क्_४८.७१ //
4057 SK तं ज्ञात्वा नृपतिर्देवं तत्प्रभावेण विस्मितः / धन्यो ऽस्मीति वदन् कन्यां ददौ तस्मै स्मरश्रियम् // KAव्क्_४८.७२ //
4058 SK अभ्यर्च्य कन्यारत्नेन नृपतिः पुरुषोत्तमम् / हर्षोत्सवसमुद्धूतः सुधासिन्धुरिवाबभौ // KAव्क्_४८.७३ //
4059 SK ततः कुमारे दयितामादाय स्वगृहं गते / सफलो ऽभूदनङ्गस्य कार्मुकाकर्षणश्रमः // KAव्क्_४८.७४ //
4060 SK नवे वयसि भोगार्हे नवकान्तासमागमे / तस्याभूद्विभवोदारः सदा नवनवोत्सवः // KAव्क्_४८.७५ //
4061 SK ततः कदाचिद्भूपालः कृतकृत्यः प्रसेनजित् / पुण्यप्रभावं जामातुः कलयन् समचिन्तयत् // KAव्क्_४८.७६ //
4062 SK अहो दिव्यः प्रभावो ऽसौ कुमारस्य प्रदृश्यते / न हि सामान्यपुण्यानां पाको भवति तद्विधः // KAव्क्_४८.७७ //
4063 SK कुलं लक्ष्मीहर्म्यं हृतशशिमदा रूपलहरी वयः संभोगार्हं गुणपरिचयो भूषणचयः / यशः पुण्योद्यानप्रसृतकुसुमोल्लासरुचिरं न विद्मः कस्यायं कुशलपरिणामस्य विभवः // KAव्क्_४८.७८ //
4064 SK इति संचिन्त्य सुचिरं स संजातकुतूहलः / सर्वज्ञदर्शनावद्धमारुरोह मनोरथम् // KAव्क्_४८.७९ //
4065 SK स जातातरमाहूय सुतां च सचिवैः सह / भगवन्तं ययौ द्रष्टुं मनसा प्रथमं गतः // KAव्क्_४८.८० //
4066 SK याते दृष्टिपथं जेतवने संत्यज्य वाहनम् / उपसृत्यः नृपः पद्भ्यां भगवन्तं व्यलोकयत् // KAव्क्_४८.८१ //
4067 SK स तं प्रणम्य तत्पादपद्मभूतिशिखामणिः / सुतां जामातरं चास्मै नम्रो नाम्ना न्यवेदयत् // KAव्क्_४८.८२ //
4068 SK उपविष्टेषु सर्वेषु प्रणामानतमौलिषु / पप्रच्छ राजा सर्वज्ञं भगवन्तं कृताञ्जलिः // KAव्क्_४८.८३ //
4069 SK अयं गुणगओपेतः कुमारः श्रीमतां वरः / हैमेव दन्तिनायातो भगवन् केन कर्मणा // KAव्क्_४८.८४ //
4070 SK इयं चीवरकन्या च मत्सुतास्य नवा वधूः / केन पुण्यप्रभावेण जीवितादधिवल्लभा // KAव्क्_४८.८५ //
4071 SK इति पृष्टः क्षितीशेन सर्वविद्भगवान् जिनः / तमूचे भूपते पुंसां पुण्योद्भूता विभूतयः // KAव्क्_४८.८६ //
4072 SK यदुदारो यदुचितो यद् भ्राजिंष्णु यदद्भुतम् / स्पृहणीयं च यल्लोके तत्तत्पुण्यसमुद्बह्वम् // KAव्क्_४८.८७ //
4073 SK विपश्वी भगवान् पूर्वं सुगतः सह भिक्षुभिः / चचार लोककृपया राज्ञो बन्धुमतः पुरे // KAव्क्_४८.८८ //
4074 SK तस्मिन्नवसरे तत्र कुमार्या सह दारकः / विक्रीडावर्त्मनि पुरः कृत्वा दारुमयं गजम् // KAव्क्_४८.८९ //
4075 SK तौ विलोक्य समायान्तं ध्मातजम्बूनदद्युतिम् / फुल्लपद्मदलाकारकरुणास्निग्धलोचनम् // KAव्क्_४८.९० //
4076 SK भगवन्तं समुद्भूततद्भक्तिसरसोन्मुखौ / क्रीडागजं निवेद्यास्मै प्रणतौ तस्थतुः पुरः // KAव्क्_४८.९१ //
4077 SK भगवानपि सर्वज्ञस्तयोर्ज्ञात्वा मनोरथम् / दयया चरणस्पर्शं विदधे दारुदन्तिनः // KAव्क्_४८.९२ //
4078 SK सम्यक् चित्तप्रसादेन दृष्टौ भगवताथ तौ / प्रणीधानं विवाहाय चक्रतुर्दारकौ मिथः // KAव्क्_४८.९३ //
4079 SK कुलप्रभावविभवैर्भूयाज्जन्म ममोचितम् / वाहनं हेमदन्ती च कुमारस्येत्यभून्मतिः // KAव्क्_४८.९४ //
4080 SK दृष्ट्वा भगवतः कन्या संसक्त्रे चारुचीवरे / जन्मचीवरयुक्तां स्यामहमेतचिन्तयत् // KAव्क्_४८.९५ //
4081 SK स एष प्रणिधानेन जातस्तेनेह हस्तकः / इयं चीवरकन्या च तनुचीवरलक्षण // KAव्क्_४८.९६ //
4082 SK इति क्ष्रुत्वा क्षितिपतिस्तद्वृत्तं सुगतो ऽदितम् / मुकुटस्पृष्टतत्पादपद्मः स्वभवनं ययौ // KAव्क्_४८.९७ //
4083 SK याते सविस्मयं राज्ञि कुमारः सह जायया / कथ्यमानं भगवता धर्मं शुश्राव शुद्धधीः // KAव्क्_४८.९८ //
4084 SK ततस्तौ जातवैराग्यौ क्षीणसंसारवासनौ / प्रव्रज्यया जितक्लेशौ शुद्धां बोधिमवापतुः // KAव्क्_४८.९९ //
4085 SK विततसुकृतपुण्याभ्यासयोगेन पुंसां भवति कुशलभाजां धर्मकामार्थसंपत् / अभिमतमथ भुक्त्वा तत्फलं सदारास्ते विघनगगनकान्तिं शान्तिमन्ते भजन्ते // KAव्क्_४८.१०० //
4086 SK इति क्षेमन्द्रविरचितायां बोधिसत्त्वावदानकल्पलतायां हस्तकावदानमष्टचत्वारिंशः पल्लवः //
Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Kṣemendra: Avadānakalpalatā (sa_kSemendra-avadAnakalpalatA.htm).
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