The Five Stages of the Mind

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The Five Stages of the Mind

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SK
स्?म्बप�च्??इक्? र्?ज्?नक?र्?क्?एमर्?जक्?तय्? ??कय्? समेत्? पु??अन् देव्?नम्?तविसरैरिन्दुम्?स्र्?व्य सम्यग् भ्?भि? स्व्?भ्? रसयति रस? य? पर? नित्यमेव | क्???अ? क्???अ? पुनरपि च त? प्?रयत्येवम्?द्?ग् दोल्?ल्?लोल्लसितह्?दय? नौमि चिद्भ्?नुमेकम् || एतद्?वे?अवैव?यप्रोन्मि?अद्धि?अ?? वयम् | विम्???मो मन्?क्छ्र्?मत्स्?म्बप�च्??इक्?स्तुतिम् || सोऽय? पर्?म्?तरसो रसज्�ऐरिह रस्यत्?म् | ?यु?य्?ज्य्?म्?तस्पर्?अ? ?अतपद्य्? हि ??न्तये || समस्त्?गममह्?म्न्?यरहस्यविन्मह्?योग्?गिसहस्रस?प्रद्?य- स?प्?र्?अ? ?र्?व्?सुदेवस्य भगवत? पुत्र? ?र्?स्?म्ब? स्व्?त्मविवस्वत्स्तुति? जगतोऽनुग्रह्?य वक्तुमुपक्रमते - ?अब्द्?र्थत्वविवर्तम्?नपरमज्योत्?रुचो गोपते- रुद्ग्?थोऽभ्युदित? पुरोऽरु?अतय्? यस्य त्रय्?म??अलम् | भ्?व्यद्वर्?अपदक्रमेरिततम?सप्तस्वर्??वैर्विय- द्विद्य्?स्यन्दनमुन्नयन्निव नमस्तस्मै परब्रह्म?ए || १ ||
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तस्मै परस्मै सर्वोत्क्????य वि?वप्?र्??दिकर्त्रे च | अत एव च्?भ्?व??न्तब्रह्मचित्रब्रह्म्?दिसर्वब्रह्मक्रो??कर्त्रे ब्रह्म?ए ब्?हते व्य्?पक्?य ब्?ह??य च वि?वकर्त्रे चिद्?त्मने नम? | देह्?दिप्रम्?त्?त्?प्र?अमनेन तदेव्?वि??म्?त्यर्थ? | यस्य ब्रह्म?अ? सम्बन्धि ?र्ध्वम?ए?अवि?व्?भेद्?त्मतय्? उत्क्???अतय्? ग्?यते विम्??यत इत्युद्र्?थ? प्रथमोन्मे??त्म?अब्दब्रह्मर्?प? प्र?अवो ध्वनि? | देवत्?स्तुतिकर्मप्रध्?नस्?मर्ग्यजुर्वेद्?ख्य्? त्रय्येव ??ख्? प्रप�चक्रो??क्?तसमस्त्?म्न्?यव्?क्यैकव्?क्यत्?व्य्?प्त्य्? म??अलम् | अत?चैतत्सर्व्?स्?? विद्य्?न्?? मन्त्र??स्त्रविज्�?न्?न्?? स्यन्दनम्?स्पद? प्रसवक्?र?अ? च कर्मभ्?त? च वियत्पर्?क्??अमुन्नयन्नुल्ल्?सय?स्तन्मयत्वम्?प्?दयन्निव पुर? प्रथममरु?अतय्?ऽतिद्?प्तत्वेनोदित? स्वयमुन्मि?इत? | वियन्मयस्य्?प्यस्य द्?प्तस्योन्मे??व??अम्भपुर?सर? तथ्? स्फुर??दुन्नयन्निवेत्युक्तम् | एतच्च त्रय्?म??अल? भ्?स्वद्भि? प्रोद्ग्?थ्?रु?इम्न्? स्फुरितैर्वर्?अपदक्रमैरक्?अरव्?चकतद्?नुप्?र्व्?भिर्?रित? ध्वस्त? तमोऽज्�?न? येन त्?द्?क् | उच्च्?र?अपद्?र्थव्?क्य्?र्थप्रतिपत्ति?उ परमचिदभेदवि?र्?न्तिदमित्यर्थ? | केन वियदुन्नयन् | सप्त ये स्वर्?? स्वय? र्?जम्?न्? वि?व्?क्?एपि?ओ वर्??? प?यन्त्य्?दिप्रवर्तनप्र्??इतकल्प्?? ?अ?ज्?दिध्वनिविमर्??स्त एव सर्वत्र्??उस?च्?रित्व्?द?व्?स्तै? | यस्य ब्रह्म?अ? क्?द्??अस्य | गोपते? पर्?दिव्?क्प्रभोर्मर्?चिचक्रे?वरस्य च | अत एव ?अब्द्?र्थत्वेन न्?न्?लौकिकेतर?अब्दतदर्थतत्स?बन्धैर्विचित्रतय्? वर्तम्?न? स्व्?तन्त्र्य्?देतद्वैचित्र्य्?भ्?स्?त्म यत्पर? ज्योति? ??क्त? व्?र्य? तेन च रुग्द्?प्तिर्यस्य | ब्?ह्यस्य्?पि स्?र्यस्य ज्�?न?अक्ति? पर्? ह्ये?? तपत्य्?दित्यविग्रह्? इत्य्?म्न्?यन्?त्य्? परब्रह्मप्रतिबिम्बकल्पस्य प्र?अवव्य्?प्तिकोऽरु?अ? प्?र्वमुदित? | त्रय्?व्य्?प्तिक? म??अलमितरविद्य्?व्य्?प्तिक? स्यन्दन? च कर्मभ्?स्वद्वर्?ऐ? पदक्रमैर्देद्?प्यम्?नचर?अविन्य्?सैर्?रिततमसो ये सप्तस्वरव्य्?प्तिक्? अ?व्?स्तैर्वियदुत्क्?इपति | अथ च
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विचित्रव्?च्यव्?चक्?त्मजगद्व्?त्ते?चिच्चक्रे?वरस्योद्ग्?थ? ?अक्त्य?कुरोन्मे?ओ द्?प्तो ब्रह्मवि??उरुद्रज्?ग्रत्स्वप्नसु?उप्तिब्रह्मम्?लम्?य्????दित्रय्?- म??अलम् | वियद्व्य्?पकम् | वेदन्?न्?दिधर्मस्य परम्?त्मत्वबोधन्? इत्य्?द्य्?म्न्?यनिरुक्तोन्मन्??अक्त्य्?ख्य्? विद्य्?स्यन्दन? स्वरैर्विचित्रैर्मन्त्रैर्ध्वनिभिरुन्नयन्निव प्रथममुदित? | कि? क्?त्व्? ? भ्?स्वत्?? वर्??न्?म्?क्?र्?दिम्?त्र्???? पद्?न्?? बिन्द्व्?दिवि?र्?न्त्?न्?? क्रमे?अ परिप्??य्? ?रित? तम? समन्?न्त? प्??अज्?ल? यत्र || १ || एव? स्?म्?न्यव्य्?प्त्य्? परम्?र्क? स्तुत्व्? देहस्थमध्यन्???व्य्?प्त्य्? स्तौति - ओमित्यन्तनदति नियत? य? प्रतिप्र्??इ ?अब्दो व्??? यस्म्?त् प्रसरति पर्? ?अब्दतन्म्?त्रगर्भ्? | प्र्???प्?नौ वहति च समौ यो मिथो ग्र्?ससक्तौ देहस्थ? त? सपदि परम्?दित्यम्?द्य? प्रपद्ये || २ || त? परम्?दित्य? परब्रह्मस्वर्?पमेव देहस्थित? मध्यन्???गतप्र्??अब्रह्मनिवि??अम् ?द्य? वि?वचित्रभित्तिभ्?त? सपदि प्रपद्ये अभिसन्ध्यवध्?नेन सम्?वि??मि | क? तमित्य्?ह - य ओमिति?अब्द? क्रो??क्?त्??ए?अ?अब्दन्?त्मन्?दर्?पो मह्?प्र?अव? प्रतिप्र्??इ सर्वभ्?ते?उ नियतमविच्छिन्नप्रव्?हे??न्तर्नदति पर्?व्?ग्?त्मस्वर्?प? विम्??अन् स्थित? | यस्म्?च्च ?अब्दतन्म्?त्रगर्भ्? ?स्?त्रितक्रम्? ?दिक्??न्त?अब्दस्?म्?न्यम्?त्र्?ऽविभ्?गज्योतिर्मय्? पर्?द्वित्?य्? व्??? प?यन्त्? प्रसरत्युन्मि?अति | य?च मिथो ग्र्?ससक्त्?वन्योन्यकवलनपरौ समौ सम्?नभ्?मिक्?र्??हौ प्र्???प्?नौ वहति | उद्?नवह्न्य्?त्मनिजमह्?ज्योतिर्मयौ करोति || २ || एव? मह्?व्य्?प्त्य्? स्?क्?मव्य्?प्त्य्? च्?नवच्छिन्न? मध्यध्?मस्थ? च चिदर्क? नुत्व्? प्रप�चव्य्?प्त्य्?पि स्तौति - यस्त्वक्चक्?उ??रव?अरसन्?घ्र्??अप्??य?घ्रिव्???- प्?युपस्थस्थितिरपि मनोबुद्ध्यह?क्?रम्?र्ति? | ति??हत्यन्तर्बहिरपि जगद्भ्?सयन् द्व्?द??त्म्? म्?र्त??अ? त? सकलकर??ध्?रमेक? प्रपद्ये || ३ ||
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म्?त्?न्?? वेद्यैकर्?पतय्? ?अवप्र्?य्???म???न्?? देहप्र्???दिपि???न्?मयमनुप्र्??अको म्?र्त??अ?चिद्भ्?नुस्तमेकमद्वित्?यमपि प्रप�चव्य्?प्त्य्? सकल्?न्?? प्रम्?त्???? सकल्?नि कर??नि च त्रयोद?अकर??नि च ते??म्?ध्?रमनुप्र्??अकमविभिन्नम्??रय? प्रपद्ये | यस्त्वग्?द्यह?क्?र्?न्तस्व्?क्?तत्रयोद?एन्द्रियम्?र्ति? | अत?च्?न्तरह?क्?र्?त्म्? वेदग्र्?हकर्?प? बहि?च्?ध्यवस्?य्?दि व्य्?प्?रबुद्ध्य्?दिकर?अद्व्?द??त्म्? ग्र्?ह्यर्?प? जगद्भ्?सय?स्ति??हत्?ति स्थ्?लद्???र्थ? | रहस्यद्??? तु ग्?ह्?तसर्वेन्द्रियम्?र्तिरपि य? स्???य्?दिमर्?चिचक्रचित्रस?च्?रच्?तुर्य्?द्द्व्?द??त्म्? एक एव चिदर्कोऽन्तर्बहि?च जगत्क्?ल्?नल्?दि व्योमकल्?न्त? वि?व? भ्?सय?स्तुर्यध्?म्?त्मनिजभ्?स्? चक्रमयत्वम्?प्?दयन् सर्वकर??न्य्?ध्?रतय्? निजौजोज्वलनज्वलित्?न्य्??रित्य स्थितस्त? प्रकर्?ए?अ प्रपद्ये | निजव्युत्थ्?न? स्?क्??त्कुर्वन् स्थितोऽस्म्?त्यर्थ? || ३ || प्रप�चव्य्?प्त्य्?खिलेन्द्रिय्?ध्?रे स्तुतेऽपि भगवति प्रक्??अविमर्?अपरम्?र्थे तद्विमर्?अप्रसरसर?इ? व्???? स्तौति - य्? स्? मित्र्?वरु?असदन्?दुच्चरन्त्? त्रि?अ??इ? वर्??नत्र प्रक?अकर?ऐ? प्र्??अस?ग्?त् प्रस्?त्?न् | त्?? प?यन्त्?? प्रथममुदित्?? मध्यम्?? बुद्धिस?स्थ्?? व्?च? वक्त्रे कर?अवि?अद्?? वैखर्?? च प्रपद्ये || ४ ||
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अविभ्?ग्?त्तु प?यन्त्? सर्वत? स?ह्?तक्रम्? | स्वर्?पज्योतिरेव्?न्त? स्?क्?म्? व्?गनप्?यिन्? || इत्य्?दिन्? लक्?इत्?? प्रथमम्?द्?बुदित्?मुन्मि?इत्?? त्?? स्वर्?पज्योत्?र्?प्?? प?यन्त्य्?ख्य्?? तदनु त्?मेव बुद्धिस?स्थ्?? बुद्ध्यभ्य्?स? प्र्?प्त्?म् | केवल? बुद्ध्युप्?द्?न्?त् क्रमर्?प्?नुप्?तिन्? प्र्??अव्?त्तिमतिक्रम्य मध्यम्? व्?क् प्रवर्तते || इत्य्?दिलक्?इत्?म् | मध्ये भवत्व्?न्मध्यम्?? मध्येऽन्त?कर?ए वर्तम्?न्?म् | तदनु वक्त्रे वदने कर?ए?उ जिह्व्?म्?लजिह्व्?मध्यम्?दि?उ वि?अद्?? निर्मल्?म् | स्थ्?ने?उ विव्?ते व्?यौ क्?तवर्?अपरिग्रह्? | वैखर्? व्?क्प्रयोक्त्???? प्र्??अव्?त्तिनिबन्धन्? || इत्य्?दिन्? लक्?इत्?म् | विखरे ?अर्?रे भवत्व्?त्तद्?ख्य्?? व्?च? प्रपन्नोऽस्मि | क्?? त्?मित्य्?ह - य्? स्? मित्र्?वरु?असदन्?दग्न्??ओममय्?त्मन? पर्?व्?क्प्रध्?न्?न्मध्यध्?म्नोऽकर्?द्??स्त्रि?अ??इ? वर्??नुच्चरन्त्? ?स्?त्रितक्रमतय्? भेद्?भेद्?भ्य्?? भेदेन च विम्??अन्त्? | केनोच्चरन्त्? ? प्रक?ऐरन्तर्मुख्?भ्?वेन्?भिन्नस्फु?अप्रक्??ऐकमध्यम्?प्तै? कर?ऐ? सर्वेन्द्रियै? | क्?द्???न् वर्??न् ? प्र्??अस?ग्?त् प्रस्?त्?नुद्भ्?त्?न् | तत्र चिज्ज्योति?इ गु??भ्?तस्?क्?मप्र्??अस?ग्?त् प?यन्त्य्?? गु??भ्?तचित्स्?क्?मप्र्??अस?ग्?न्मध्यम्?य्?? स्थ्?लप्र्??अस?ग्?द्वैखर्य्?? वर्?? ज्?यन्ते | ते च त्रि?अ??इ? | तद्यथ्? - अ- इ- उ -? - वर्???चत्व्?रो ह्रस्वद्?र्घप्लुतभेद्? द्व्?द?अ ?क्?रस्य द्?र्घो न्?स्त्?ति ह्रस्वप्लुतभेद्?द् द्विविध? | स?ध्यक्?अर्???? ह्रस्व्? न सन्त्?ति द्?र्घप्लुतभेद्?द??अविध्?? | एव? स्वर्? द्व्?वि??अति? | क्?दयो म्?न्त्?? प�चवि??अति? स्पर्??? | अन्तस्थ्??चत्व्?र? | ??म्??अ?चत्व्?र? | कु? खु? गु? धु? इति यम्??चत्व्?र? | अनुस्व्?रविसर्गजिह्व्?म्?ल्?योपध्म्?न्?य्? अ? अ? / क / प इति चत्व्?र? | यथोक्तम् - स्वर्? द्व्?वि??अति?चैव स्पर्??न्?? प�चवि??अति? | य्?दय? ??दय?च्???औ चत्व्?र?च यम्?? स्म्?त्?? || अनुस्व्?रो विसर्ग?च / क / प इति पर्??रयौ | त एते गदित्? वर्??स्त्रि?अ??इरिह स्?रिभि? || इति |
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मित्र? स्?र्योऽन्तर?ए?अद्वैतप्लो?अक्?रित्व्?दग्नि? | वरु?ओ ह्ल्?द्?प्य्?यक्?रित्व्?त् सोम? | वर्??नन्त? प्रक?अकर?ऐ? प्र्??अस?ग्?त् प्रस्?ते इति प्??ह्?न्तरे य्? पर्?व्?क्?अक्तिर्मित्र्?वरु?असदन्?दुच्चरन्त्? प्रम्??अप्रमेय्?त्मकस्?र्यचन्द्र्??रये??त्म्?क्???द्?र्ध्व? सरन्त्? सर्वोत्त्?र्?अ? निज? ध्?म प्रम्?त्?र्?प? स्रवन्त्? अस्ति | सैव्?न्त? प्रक?ऐरन्तरेव स्फु?ऐरिन्द्रियै? क्?त्व्? त्रि?अ??इ? वर्??न् प्र्??अस?ग्?द्धेतो? प्रस्?ते जनयत्?त्यन्वय? | इन्द्रिय्???? र्?प्?द्युपलब्ध्य्?नुमेयत्व्?द् बहि? स्फु?अत्व्?भ्?वेन्?न्त? प्रक??भ्?व? | एतदभिधेयपक्?ए उच्च्?र?अप्रस्?त्यो? क्रमे??नुव्?द्यविधेयभ्?व? || ४ || एव? व्?क्प्रसर्?न्त? भगवन्त? स्तुत्व्? मध्यमध्?मस्?फल्यमर्थयते - ?र्ध्व्?ध?स्थ्?न्यतनुभुवन्?न्यन्तर्? स?निवि??? न्?न्?न्??इप्रसवगहन्? सर्वभ्?त्?न्तरस्थ्? | प्र्???प्?नग्रसननिरतै? प्र्?प्यते ब्रह्मन्??? स्? न? ?वेत्? भवतु परम्?दित्यम्?र्ति? प्रसन्न्? || ५ || परम्?दित्यस्य चिद्भ्?नोर्ब्रह्मन्???र्?प्? य्? सेति दिव्य्? म्?र्ति? समुच्छ्रित्?क्?तिर्नोऽस्म्?क? प्रसन्न्? प्र?अस्त्? प्र?अमितप्र्???दिक्?लु?य्? अत एव ?वेत्? चिद्?नन्दघनतय्? स्फुरन्त्? अस्तु | क्?द्??? स्? ? य्? ?र्ध्वमध?च स्थित्?नि अतन्?न्यनल्प्?नि अन्??रित्?दिक्?ल्?ग्न्यन्तभुवने?अन्?न्?भुवन्?नि देहे बहि?च्?न्तर्? मध्ये स?निवि??? व्य्?प्य्?वस्थित्? | तथ्? न्?न्?न्???न्?? चक्?उर्?दिरोमरन्ध्र्?न्त्?न्?? सु?इर्???? प्रसवेन स्फ्?रे?अ गहन्? सर्वैर्दु?प्र्?प्? | सर्वे??? स्थ्?वर्?दिदेवयोनिभेद्?न्त्?न्?? भ्?त्?न्?मन्तरस्थ्? देहमध्ये वर्तम्?न्? | यत?चोक्तयुक्त्य्? गहन्? अत एव कै?चिदेव प्र्???प्?नयो? सर्वव्?हप्रसवप्रवे?अयोर्ग्रसननिरतैर्भक्?अ?अप्रगल्भै? प्र्?प्यते सम्?वि?यते || ५ || कि�च - न ब्रह्म्???अव्यवहितपथ्? न्?ति??तो??अर्?प्? नो व्? नक्त?दिवगममित्?त्?पन्?य्?पर्?हु? | वैकु??ह्?य्? तनुरिव रवे र्?जते म??अलस्थ्? स्? न? ?वेत्? भवतु परम्?दित्यम्?र्ति? प्रसन्न्? || ६ ||
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ब्रह्म?ओ ब्रह्मबिल्?वर?अनिवि??अस्य्???अ? गर्भ्?क्?तभ्?म्?लम्?य्???अप्रप�च?अक्त्य??अ? तेन न व्यवहित्? अपि तु समन्तत? क्रो??क्?र्? पन्थ्?? प्रसरम्?र्गो यस्य्??, तथ्? अति??त? सोम?, अत्यु??ओ वह्नि?, इय? तु द्वैतद्?ह्?दद्वैत्?नन्दस्यन्दित्व्?च्च नैव?र्?प्? | अपि तु समरस्?भ्?त्?ग्न्??ओम्?त्म्? | तथ्? नक्त?दिन? र्?त्रिदिन? यो गमो भ्रम?अ? तेन नो इत्? प्रमेयभ्?व? न प्र्?प्त्? तद्वत्? | तथ्? अत्?पन्?य्? परम्?ह्ल्?दप्रद्? | तथ्? अपगतो र्?हुर्?च्छ्?दनप्रध्?न? ??न्यप्रम्?त्? यस्य्?? स्? | कि�च, रवे?चिद्भ्?नोर्म??अले र?मिपरिवे?ए र्?जते द्?प्यते | ब्?ह्य्?र्कम्?र्तिस्तु ब्रह्म्???अव्यवहित्? स्वर्लोक्?न्तम्?त्र्?वभ्?सिक्? ?इ?इरग्र्??म्?द्?वति??तो??अर्?प्? अहर्नि?अ? भ्रमन्त्? सन्त्?पिक्? र्?ह्वभिभ्?त्? चेति व्यतिरेकध्वनि? | वैकु??हस्य वि??ओर्म्?र्तिरिवेत्युपम्? | स्?पि च बलिव�चन्?वसरे ब्रह्म्???ए ब्रह्म्????न्तर्निरुद्धम्?र्ग्? न केनचित् | अत एव न्?ति??तो??अर्?प्? | प्रक्???ह्ल्?दद्? भक्त्?न्?मित्यर्थ? | नक्त?दिवगमेन्?होर्?त्रपरिभ्रम?एन न मित्? | देव्?दिभिर्नेयत्तय्? परिच्छिन्नेत्यर्थ? | त्?पन्?य्? मह्?प्रत्?पवत्? | अपगतर्?हुरपक्र्?न्तरविम??अल्? चेति ?ले?अ? | एवमयमत्रोपम्??ले?ओ व्यतिरेकध्वनिन्? स?स्???अ? || ६ || अथ युगपदन्तर्बहि?च्?र्कम्?र्ति? स्तौति - यत्र्?र्??ह? त्रिगु?अवपु?इ ब्रह्म तद्बिन्दुर्?प? योग्?न्द्र्???? यदपि परम? भ्?ति निर्व्??अम्?र्ग? | त्रय्य्?ध्?र? प्र?अव इति यन्म??अल? च??अर?मे- रन्त?स्?क्?म? बहिरपि ब्?हन्मुक्तयेऽह? प्रपन्न? || ७ ||
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तच्च??अर?मे?चिद्द्?प्त्???ओर्म??अल? मुक्तये सम्?वे??त्मज्?वन्मुक्त्यर्थ? प्रपन्नोऽस्मि | क्?द्??अम् ? अन्त?चिद्भुवि स्?क्?मम्?द्योन्मे??त्म | योग्?न्द्रैरेव लभ्यम् | बहिरपि ब्?हन्मह्?परिम्??अम् | यत्र स्???इस्थितिस?ह्?रक्?रिरज?सत्त्वतमोनिवि??अब्रह्मवि??उरुद्र्?भिध्?य्यक्?रो- क्?रमक्?र्?ख्यह्रस्वद्?र्घप्लुतवर्?अत्रय्?त्मत्रिगु?अवपु?इ प्र?अवे वि?ववेद्य्?विभ्?गवेदन्?त्म्? बिन्दुरिति तदुपलक्?इतोन्मन्?न्त्?प्रमेयपरिप्???र्?प? यस्य त्?द्?ग् ब्रह्म ब्?हद् ब्??हक? च ??क्ततेज ?र्??हमत्युत्क्???अतय्? व्यवस्थितम् | यच्च परममस्?म्?न्यम् | योग्?न्द्र्???? मितयोग्यति??यिपरतत्त्वैकभ्?ज्?? निर्व्??अम्?र्गो ज्?वन्मुक्त्युप्?यो भ्?ति स्वप्रक्??अतय्? स्फुरति | त्रय्य्?? प्र्??निर्??त्?य्? ?ध्?र ??रय? | प्रकर्?ए?अ न्?यते उत्क्???अतय्? विम्??यते पर? प्?रमे?वर? स्वर्?प? येनेति क्?त्व्? प्र?अव इत्येतन्न्?म यत् | ब्?ह्येऽप्यर्कम??अले नवयोजनस्?हस्रो विग्रहोऽर्कस्य म??अलम् | त्रिगु?अम् इति स्वच्छन्द्?दि??अन्?त्य्? यत्र बिन्दुर्?पमिति सितवर्तुल्?क्?र? ब्रह्ममय? तदस्?म्?न्य? बिम्बम्?र्??हम् | तच्च योगिन्?? निर्व्??अम्?र्ग?, ते??? हि स्?र्यम??अलभेदनस्य ?रव??त् | तथ्? वक्?यम्??अद्??? स्?मर्ग्यजुर्मयध्?मम??अल्?क्?तित्व्?त् त्रय्य्?ध्?र? | प्रकर्?ए?अ न्?यम्?नत्व्?त्प्र?अवो वि?व ?अर्?त्व्?च्च प्र?अव? || ७ || यस्मिन् सोम? सुरपित्?नरैरन्वह? प्?यम्?न? क्???अ? क्???अ? प्रवि?अति यतो वर्धते च्?पि भ्?य? | यस्मिन् वेद्? मधुनि सरघ्?क्?रवद्भ्?न्ति च्?ग्रे तच्च?????ओरमितमम्?त? म??अलस्थ? प्रपद्ये || ८ ||
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चिद्भ्?नोर्म??अलस्थ? मध्यध्?मनिवि??अ? तत्परम्?नन्दर्?पममितमनल्पमम्?त? प्रपद्ये सम्??रये | यत्र्?म्?ते सोम? सर्वो मेयवर्ग? सुर्?दिभि? सर्वै? प्रम्?त्?भि? प्रतिदिन? कल्?ग्र्?सयुक्त्य्? प्?यम्?नत्व्?त् क्???अ? क्???अ? सन् पुन? पुन? प्रवि?अति ह्?द्वि?र्?न्त्यनन्तर? निमज्जति | यत एव म??अल्?द् भ्?योऽपि वर्धतेऽभिव्यज्यते मेयर्?प?चन्द्र? | यस्मि??च वेद्?? सर्व??स्त्र्??इ मधुनि म्?क्?इके सरघ्???? मधुकर्???म्?क्?र इव्?ग्रे भ्?न्ति पुर? स्फुरन्ति | यथ्? सरघ्? म्?क्?इक? स?चित्य परिव्?त्त्य सोल्ल्?सम्?सते, तथ्? सर्वे वेद्? व्?क्यैकव्?क्यतय्? पर्?द्वयमम्?तम्?म्??य भ्र्?जन्ते | ब्?ह्योऽपि सोम? क्???अपक्?ए?उ पित्?देवनरग्रस्तकल्?प�चद?अकोऽम्?व्?स्य्?य्?? स्?र्यम??अल? प्रवि?य वर्धते | वेद्??च्?र्कज्योतिर्लग्न्? ?सते || ८ || ऐन्द्र्?म्???? प्?थुकवपु?? प्?रयित्व्? क्रमे?अ क्र्?न्त्?? सप्त प्रक?अहरि?? येन प्?देन लोक्?? | क्?त्व्? ध्व्?न्त? विगलितबलिव्यक्तिप्?त्?लल्?न? वि?व्?लोक? स जयति रवि? सत्त्वमेवोर्ध्वर?मि? || ९ ||
SK
यो हि यस्म्?द् गु?ओत्क्???अ? स तस्म्?द्?र्ध्वमि?यते इति स्थित्य्? ?र्ध्व्? वि?वोत्क्???? र?मयो यस्य | अत एव सत्?? विद्यम्?न्?न्?म?ए????? भ्?व? सत्त्व? मह्?प्रक्???त्मर्?पम् | तदेव तत्परम्?र्थ? | तत?च प्रक्??अम्?नतय्? प्रक्???त्मन्येव वि?वस्य मग्नत्व्?त् प्रक्??ओ वि?व्?लोक? स एव रवि?चिद्भ्?नुर्जयति सर्वोत्कर्?ए?अ वर्तते | येनैन्द्र्?म्???? प्र्?च्योन्मे?अद??? प्?थुकवपु?? योगिगम्यस्?क्?म??क्तस्पन्द्?त्मन्? प्?रयित्व्? उन्मि?इतप्र्???दिस?कोचचित्प्र्?ध्?न्योच्छलित्?? क्?त्व्? ?इव्?दिसकल्?त्म्?न्त्?? ?अक्तिमन्त? प्रक्?र्तित्?? इति ?र्?प्?र्व्?दि??अन्?त्य्? ?इवमन्त्रमहे?वरमन्त्रे?वरमन्त्रविज्�?न्?कलप्रलय्?कलसकल्?ख्य्?? क्रम्?त्क्रम? प्र्???यतु?इस्थ्? निज?अक्तिसहित्?? सप्तलोक्?? प्?दोऽस्य वि?व्? भ्?त्?नि इति स्थित्य्? प्?देन निज्???अम्?त्रे??क्र्?न्त्?? क्रो??क्?त्य स्वज्योतिर्मय्?क्?त्?? | क्?द्??एन ? प्रक??? स्व्?त्म्?भ्?स्? र्?प्?दिवि?वहर??द्धरय?चक्?उर्?दि?अक्तयो यस्य | तदुक्त? ?रुतौ - युक्त्? ह्यस्य हरय? ?अत्? द?अ इति | नि?स?ख्य?अक्तिर्?त्मेति ह्यस्य्?र्थ? | कथ? क्र्?न्त्?? ? ध्व्?न्तम्?त्मन्यन्?त्मप्रत्?त्य्?त्म्?ज्�?न? विगलित्? बलिरन्?त्मन्य्?त्म्?भिध्?यिन्? व्यक्तिर्यस्य त्?द्?क् प्?त्?लल्?न? नि??ए?अप्र?अमित? क्?त्व्? | ब्?ह्येन्?प्यर्के?अ सप्त्??व्?र्??हेनैन्द्र्?? दि?अ? स्?क्?मर्?पे??प्?र्य भ्?र्?दिलोक्?? प्?देन मर्?चिभिर्ध्व्?न्त? ध्व?सयित्व्? क्रमे?अ क्र्?न्त्?? | प्रक?अहरि?? च न्?र्?य?एन विगलित्? बल्य्?ख्यस्य द्?नवेन्द्रस्य व्यक्तिर्यत्र तद्ध्व्?न्त? द्?नवकुल? प्?त्?लल्?न? क्?त्व्? भ्?र्?दिलोक्??चर?अविन्य्?सक्रमे??क्र्?न्त्?? | कि? क्?त्व्? ? प्?थुकवपु?? ब्?लव्?मन?अर्?रे?अ इन्द्र्?दिदिग्?प्?र?अ? क्?त्व्? | सोऽपि वि?व्?लोक? सत्त्वप्रध्?न?चेत्यत्र ?ले??ल?क्?र? | ?ले?ओपम्?ध्वनिस?स्???इरियम् || ९ || ध्य्?त्व्? ब्रह्म प्रथममतनु प्र्??अम्?ले नदन्त? द्???व्? च्?न्त? प्र?अवमुखर? व्य्?ह्?त्?? सम्यगुक्त्व्? | यत्तद्वेदे तदिति सवितुर्ब्रह्म?ओक्त? वरे?य? तद्भर्ग्?ख्य? किमपि परम? ध्?मगर्भ? प्रपद्ये || १० ||
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ब्रह्म?? प्रज्?पतिन्? वेदे?उ प्र?अवमुखरमो?क्?रोच्च्?र?अप्?र्व तदित्य्?दि ग्?यत्र्य्?? सवितुर्वि?वप्रस्?तिहेतो?चिद्?दित्यस्य यत्तत्किमप्?त्यस्?म्?न्य? भर्ग इत्य्?ख्य्? यस्य तत्परम? सर्वोत्क्???अ? ध्?म परिस्फुरत्त्?त्म ??क्त? तेजो ब्?ह्यस्?र्यसोमवह्न्य्?दिध्?मक्रो??क्?रित्व्?द्ध्?मगर्भ? वरे?यमनुग्रहक्?रि उक्त तत्प्रपद्ये सम्?वि??मि | कि? क्?त्व्? ब्रह्म?ओक्तम् ? कि? क्?त्व्? च प्रपद्ये ? प्रथमम्?द्?वतनु अ?अर्?र? ?र्?भर्ग?इख्?दि??अन्?त्य्? अक्?रपर्?मर्??त्म व्?रे?वर्?ख्य? च ब्रह्म ब्?हद् ब्??हक? च पर? ??क्त? ध्?म प्र्??अम्?ले अप्र्???द्यस्फुरत्त्?ध्?म्नि ध्य्?त्व्? विचिन्त्य्?नन्तर? नदन्तमिति न्?द्?ख्य? परविमर्??त्म्?नमन्तरित्युक्त??क्तर्?पप्र्??इतकल्पतय्? स्थित? द्???व्? स्व्?त्मतय्? स्?क्??त्क्?त्य तन्न्?दविमर्??नुप्रवे??व??अम्भबलोन्मि?अत्प्र?अवोच्च्?र?अप्?र्वम् | तथ्? भ्?? स्व्?ह्? भुव? स्व्?ह्? स्व? स्व्?ह्? भुर्भ्?व? स्व? स्व्?ह्? इति च मन्त्रर्?प्? समग्रमेयम्?नप्रम्?त्???? सस?स्क्?र्???? परब्रह्ममयत्व्?मर्?इन्?र्व्य्?ह्?त्??चतस्र? सम्यगित्यन्तर्?मर्??व??अम्भ्??ऐथिल्येनोक्त्व्? उच्च्?र्य | अथ च सर्वव्यवह्?र्?नेकर्?प्?? कथ्? जप? इति ?इवस्?त्र्?दि??अन्?त्य्? तदभेद्?मर्?अप्रध्?नतय्? पर??क्तरसप्ल्?वित्?न् स?प्?द्य | ??क्तध्?मैक्?ग्र्यव??स्?दित??म्भवध्?म्?व??अम्भबलेन व्युत्थ्?नद??मपि तदभेदरसप्रोक्?इत्?? विध्?येत्यर्थ? | ध्?मगर्भमित्यत्र ध्?म?अब्दस्तन्त्रे?अ द्विरुक्त? | तथ्? प्र?अवमुखरमिति || १० || त्व्?? स्तो?य्?मि स्तुतिभिरिति मे यस्तु भेदग्रहोऽय? सैव्?विद्य्? तदपि सुतर्?? तद्विन्???य युक्त? | स्तौम्येव्?ह? त्रिविधमुदित? स्थ्?लस्?क्?म? पर? व्? विद्योप्?य? पर इति बुधैर्ग्?यते खल्वविद्य्? || ११ ||
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हे भगवन्, त्व्?? स्तुतिभि? स्तो?य्?म्?ति स्तोत्?स्तुत्यस्तुतिकल्पन्?त्म्? यो मे भेदग्रह ए?ऐव चिदद्वय्?प्रथन्?त्म्?विद्य्?, तथ्?पि तस्य्? अविद्य्?य्?? सुतर्?मति?अयेन विन्???य नि??ए?ओन्म्?लन्?य युक्तो नित्यस?बद्धस्त्व्?? स्तौम्येव देह्?दिप्रम्?त्?त्?निमज्जनेन सर्वोत्क्???अतय्? सतत? पर्?म्???मि, न तु क्?अ?अमप्युद्?स्?न ?से | त्व्?मेव चिदर्क? स्तौमि न तु परिमित्?? क्?�चन देवत्?म् | क्?द्??अ? त्व्?म् ? स्थ्?ल? ब्?ह्यप्र्???र्कर्?पम् | स्?क्?म? मध्यन्???गत? प्र्??अब्रह्मर्?पम् | पर? च्?नवच्छिन्न? वि?व्?त्मचिद्?नन्दघनम् | तदिति प्र्?क्तनव्?क्यव्य्?वर्?इतमेकमेव | नित्योदित? च | व्??अब्द?च्?र्थे | युक्त? चैतत् | यतो बुधैस्तत्त्वज्�ऐरविद्यैव विद्योप्?य? पर इत्युक्त? | स्तोत्रस्तुत्य्?दिविभ्?गकल्पन्?त्म्?विद्यय्? समस्त्?विद्य्?ब्?जदेह्?दिप्रम्?त्?त्व्?भिम्?नप्र?अमनेन चिद्?नन्दघनपरम्?त्मोत्कर्?अपर्?मर्??त्म्? स्तुति? परमसम्?वे?अप्रदेत्यर्थ? || ११ || स्तौम्येवेत्युक्ति? प्रप�चयति - योऽन्?द्यन्तोऽप्यतनुरगु?ओऽ?ओर??य्?न् मह्?य्?न् वि?व्?क्?र? सगु?अ इति व्? कल्पन्?कल्पित्??ग? | न्?न्?भ्?तप्रक्?तिविक्?त्?र्दर्?अयन् भ्?ति यो व्? तस्मै तस्मै भवतु परम्?दित्य नित्य? नमस्ते || १२ ||
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हे परम्?दित्य चिदर्क, तस्मै तस्मै इति परस्?क्?मस्थ्?लर्?प्?य वि?व्?त्मने तुभ्य? नित्य? नम? | सर्वक्?ल? देह्?दिप्रह्वतय्? पर्?म्??अ?स्त्व्?मेव सम्?वि??म्?त्यर्थ? | क्?द्???य तस्मै ? यो अन्?द्यन्तो दे?अक्?ल्?द्यनवच्छिन्न? | अतनुर्?क्?र्?नियन्त्रित? | अत?च स्?र्वज्�?दिगु??स्प्???अ? | अ?ओरत्यन्तस्?क्?मर्?पतय्? योगिद्??य्?त् परम्??ओरप्य??य्?नतिस्?क्?म? न कस्य्?पि वेद्य? | अपि तु स्वप्रक्??अचिदेकर्?प? न तु दे?अत? स?कुचित? | परम्??ओ? स्?क्?मस्य वेद्यत्व्?द् द्??यत्व्?च्च | मह्?य्?न् व्य्?पक? | अत?च वि?वक्रो??क्?रित्व्?द्वि?व्?क्?र? | स्?र्वज्�?दिगु?अयोग्?त् सगु?अ? | इत्येव? प्रक्?रय्? कल्पनय्? कल्पित्?नि प्?थक्प्?थगुल्लिखित्?न्य?ग्?नि तत्तद्धर्मर्?प्? अवयवभ्?ग्? यस्य त्?द्?ग् वेत्यनयोक्त्य्?ऽवच्छिन्नवस्तुवि?अय?अब्दविकल्प्?स?स्प्???अ? परमेक? स्वर्?पमनवच्छिन्नमिति ध्वनयति | न्?न्?भ्?त्?नि विचित्र्?? स्थ्?वर्?दिब्रह्म्????न्त्?? प्र्??इनस्ते??? प्रक्?त्?र्म्?य्?प्रक्?ति?उक्र?ओ?इत्?दिक्?र??नि, विक्?त्?? कल्?बुद्धिदेह्?दिक्?न् दर्?अयन् य ?भ्?ति | स?कुचितसर्व्?भ्?सोल्ल्?सकतय्? व्? य? स्फुरत्?त्यर्थ? || १२ || तत्त्व्?ख्य्?ने त्वयि मुनिजन्? नेति नेति ब्रुवन्त? ?र्?न्त्?? सम्यक् त्वमिति न च तैर्?द्??ओ वेति चोक्त? | तस्म्?त्तुभ्य? नम इति वचोम्?त्रमेव्?स्मि वच्मि प्र्?यो यस्म्?त्प्रसरतितर्?? भ्?रत्? ज्�?नगर्भ्? || १३ || यस्म्?त्त्वत्तो भ्?रत्? प?यन्त्य्?दिव्?क् ज्�?नगर्भ्? स्व्?वभ्?सस?वित्प्रध्?न्? प्रसरति तस्मै तुभ्य? नम इति वचोम्?त्रमेव, न त्वतिरिक्त? स्तुतिव्?क्य्?दि वच्मि | ज्�?नस्य सर्वव्?क्प्रसरहेतोरनवच्छिन्नस्य विभिन्नस्तुतिव्?ग्भि? स्तोतुम?अक्यत्व्?त् | नम??अब्देन तु देह्?दिप्रह्वत्?? तुर्?यकस्वचित्प्रकर्?अपर्?मर्?अनस्य कर्तु? ?अक्यत्व्?त् | युक्त? चैतत् | यस्म्?न्मुनयोऽपि त्वयि त्वद्वि?अये तत्त्व्?ख्य्?ने अ?उर्न मह्?न् न ह्रस्व? द्?र्घ? नेत्य्?दि ब्रुवन्त? ?र्?न्त्?? क्लि???? | न च तैस्त्वमित्येव?विधोऽस्?ति एत्?द्??ओ वेति एतत्तुल्यो वेति सम्यगुक्त? | व्?गगोचरत्व्?देवेत्यर्थ? || १३ ||
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सर्व्??ग्??अ? सकलवपु??मन्तरे योऽन्तर्?त्म्? ति??हन् क्???हे दहन इव नो द्??यसे युक्ति??न्यै? | य?च प्र्???र?इ?उ नियतैर्मथ्यम्?न्?सु सद्भि- र्द्??य? ज्योतिर्भवसि परम्?दित्य तस्मै नमस्ते || १४ || हे परम्?दित्य चिदर्क, तस्मै निर्वि?ए??य ते तुभ्य? नम? | यस्त्व? स्थ्?वर्?दिदेवयोन्यन्त्?न्?? रुद्रक्?एत्रज्�?न्?? च सर्वे??? सर्व्??गे?उ भवो व्य्?पक? सकलवपु??मन्तरे मितग्र्?हक्?त्मनि स्वर्?पे योऽन्तर्?त्म्? परम्?नन्दत्व्?त् ?त्म्? चैव्?न्तर्?त्म्? च इति ?र्?स्वच्छन्द्?दि??अपुर्य??अकप्रम्?त्? ति??हन्नवस्थ्?स्नुरपि युक्त्य्? योगेन ??न्यैरपि न द्??यसे | यथ्? क्???हेऽग्निस्ति??हन्नपि युक्ति??न्यैरर?इमथन्?नभिज्�ऐर्न द्??यते तत्क्???हकवल्?क्?रिज्वलद्र्?पतय्? नोपलभ्यते | य?च त्व? प्र्???र?इ?उ सर्वव्?हम्?र्गोदय वि?र्?न्तिपदे?उ सद्भिर्योगिभिर्नियतैरभियुक्तैर्मथ्यम्?न्?सु - ?र्ध्व?अक्तिनिप्?त्?च्च अध??अक्तिनिकु�चन्?त् | रुद्र?अक्तिसम्?वे?अ? यो ज्?न्?ति स प??इत? || इत्य्?म्न्?य्?दि??अयुक्त्य्?ऽनवरत्?न्दोलनत? प्र?अमितमरुद्व्य्?पिक्?सु द्??य? ज्योतिर्भवसि स्वप्रक्??अचिद्र्?प? स्फुरसि | अत्र पर्य्?ये?अ प्र्???प्?न्?वुर्ध्व्?धर्?र?इर्?पौ | योगिप्रयत्नो मथनक्???हम् || १४ || स्तोत्? स्तुत्य? स्तुतिरिति भव्?न् कर्त्?कर्मक्रिय्?त्म्? क्र्??अत्येकस्तव नुतिविध्?वस्वतन्त्रस्ततोऽहम् | यद्व्? वच्मि प्र?अयसुभग? गोपते तच्च तथ्य? त्वत्तो ह्यन्यत्किमिव जगत्?? विद्यते तन्म्??? स्य्?त् || १५ ||
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हे गोपते चिन्मर्?चिचक्रे?वर, भव्?नेकोऽद्वित्?य? स्तोत्र्?दिर्?पतय्? क्र्??अति स्वस्व्?तन्त्र्य्?त्तत्तद्र्?पतय्? स्फुरति | यदुक्त? मयैव भैरव्?नुकर?अस्तोत्रे - स्तोत्? स्तुत्य? स्तुतिरिति यदपि विभिन्न? न कि�चिदस्त्?ह | म्??असि यथ्? यद्र्?प? चिद्र्?पतय्? भवस्येतत् || इति | यतोऽहमिति भवत्कल्पितमेव | ततोऽहमिति स?कोचप्रध्?नो म्?य्?प्रम्?त्? त्वत्स्तोत्रकर?एऽस्वतन्त्रस्त्व्?मेव चिद्?त्म्?न? स्तौमि | न त्वह? न्?म्?न्य? क?चिदित्यर्थ? | यच्च कि�चित्त्वद्?त्मैव्?ह? प्र?अयसुभग? प्र्?र्थन्?सुन्दर? वच्मि तत्सर्व? तथ्य? त्वत्परम्?र्थमेव | यतस्त्वत्त?चिद्?त्मनो व्यतिरिक्त? जगत्?? किमिव विद्यते ? न कि�चिदस्ति | यदि व्? तथ्?पि कि�चित्स?कल्प्यते तन्म्??? स्य्?त् | नैव भवेत् | चिद्?त्मत्?? विन्? कस्यचिदपि चेतन्? चेति तस्य स?कल्पविकल्पवि?अयत्वस्य्?प्ययोगेन गगनकुसुमतोऽपि निक्???अत्व्?त् | इत्थ? युक्तितस्त्वदभेदस्?रैव स्तुति? || १५ || प्र्?त्?तिकक्रमे?अ तु यद्यपि भेदस्तथ्?प्?त्थ? त्वम्?र्?ध्योऽस्म्?कमित्य्?ह - ज्�?न? न्?न्त?कर?अरहित? विद्यतेऽस्म्?द्विध्?न्?? त्व? च्?त्यन्त? सकलकर??गोचरत्व्?दचिन्त्य? | ध्य्?न्?त्?तस्त्वमिति न विन्? भक्तियोगेन लभ्य- स्तस्म्?द्भक्ति? ?अर?अमम्?तप्र्?प्तयेऽह? प्रपन्न? || १६ || ऐन्द्रियकज्�?नवत्?? म्?य्?प्रम्?त्???मस्म्?कमिन्द्रिय्?गोचरो भव्?नचिन्त्यत्व्?द्ध्य्?नवि?अयो न भवत्?ति देह्?दिमितप्रम्?त्?त्?मज्जनोन्मज्जनचिदर्कभजन्?त्मकभक्तियोग- स?प्?दन्?यत्व्?द्भगवतो भक्तिमेव ??क्तस्फ्?र्?वे?अमय्?म्?तप्र्?प्तयेऽस्म्य्??रित? | उक्त? च विज्�?नभैरवे - भक्त्युद्रेक्?द्विरक्तस्य य्?द्??? ज्?यते द?? | स्? ?अक्ति? ???कर्? नित्य? भ्?वयेत्त्?? तत? ?इव? || इति || १६ || ह्?र्द? हन्ति प्रथममुदित्? य्? तम?स??रित्?न्?? सत्त्वोद्रेक्?त्तदनु च रज? कर्मयोगक्रमे?अ | स्वभ्यस्त्? च प्रथयतितर्?? सत्त्वमेव प्रपन्न्? निर्व्???य व्रजति ?अमिन्?? तेऽर्क भक्तित्रय्?व || १७ ||
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हे अर्क, तव भक्ति? प्रपन्न्? सम्??रित्? सत्? ?अमिन्?? ??न्तर्?ग्?दिकल?क्?न्?? निर्व्???य मोक्??य व्रजति ज्?वच्छिवत्व्?भिव्यक्तये घ?अते | त्रय्? यथ्? | स्?पि हि क्?म्यकर्म परिह्?त्य्?नु??ह्?यम्?न्? त्रय्यन्तविद्?मपवर्गहेतु? | तथ्? चै?? प्रथममुदित्? समुन्मि?इतम्?त्र्? ह्?र्द? प्रक्???नन्द्?त्मह्?द्भव? तमस्त्वभेद्?ख्य्?तिर्?पम्??अव? मल? स??रित्?न्?? भक्तिभ्?ज्?? हन्ति न्??अयति | तदनु सत्त्वस्य प्रक्??अस्योद्रेक्?त्प्रकर्??त्कर्मयोगक्रमे?अ स्व्?त्मदेवत्?वि?र्?न्तिफल??र्?रकर्म्?नु??ह्?नेन क्?र्ममलर्?प? रजो हन्ति | तथ्? सु??हु अभ्यस्त्? परि??लनेन स्व्?क्?त्? सतो भ्?व? सत्त्व? प्रक्??ऐकघनत्वमेव प्रक्??अम्?ने सर्वत्र प्रथयतितर्?म् | न तु प?उवन्म्?य्?यमल्?त्मभिन्नवेद्यप्रथ्?क्?त् | त्रय्यपि त्रय्यन्तविद्?? तन्नि??ह्?न्?? सत्त्व? प्रथयति || १७ || त्?म्?स्?द्य ?रियमिव ग्?हे क्?मधेनु? प्रव्?से ध्व्?न्ते भ्?ति? ध्?तिमिव वने योजने ब्रह्मन्??इम् | न्?व? च्?स्मिन् वि?अमवि?अयग्र्?हस?स्?रसिन्धौ गच्छेय? ते परममम्?त? यन्न ??त? न चो??अम् || १८ || त्?? भक्तिम्??रित्य चिदर्कस्य ते सम्बन्धि परममम्?त? पर? ??क्त? ध्?म गच्छेय? सम्?वि?एयम् | यच्छै?इरग्रै?मब्?ह्य्?र्कध्?मवैलक्?अ?य्?च्छ्?तमु??अ? च न भवति | अपि तु मोहद्?हप्रक्???ह्ल्?दक्?दग्नि?ओम्?त्म | क्?द्???? त्?म् ? ग्?हे ??न्ये वे?मनि ?रियमिव | सम्प्?र्?अभोगप्रदत्व्?त् | प्रव्?से रिक्तबन्धुदे?ए क्?मधेनुमिव चिन्तितम्?त्र्?भ्???अफलप्रदत्व्?त् | ध्व्?न्ते ग्??हतमसि भ्?तिमिव | प्?र्?अप्रथ्?हेतुत्व्?त् | वने गहनपर्वत्?दौ ध्?तिमिव | वि?र्?न्तिहेतुत्व्?त् | योजने पर?इव्?त्मैक्य्?वे?ए ब्रह्मन्??इ? सु?उम्??म् | परमोप्?यत्व्?त् | वि?अमवि?अय्? एव ग्र्?ह्? भ्??अ?? जलचर्? यत्र त्?द्??ए स?स्?रसमुद्रे न्?वमिव | उत्त्?रकत्व्?त् || १८ || अग्न्??ओम्?वखिलजगत? क्?र?अ? तौ मयुखै? सर्ग्?द्?ने स्?जसि भगवन् ह्र्?सव्?द्धिक्रमे?अ | त्?वेव्?न्तर्वि?उवति समौ जुह्वत्?म्?त्मवह्नौ द्व्?वप्यस्त? नयसि युगपन्मुक्तये भक्तिभ्?ज्?म् || १९ ||
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हे भगवन्, अखिलस्य ब्?ह्यस्य न्?लसुख्?देर्ग्र्?ह्यर्?पस्य्?न्तरस्य च ग्र्?हकर्?पस्य देह्?देर्जगतो य्?वग्न्??ओमौ सर्वव्?हव्?ह्? प्र्??ओऽप्?न?च प्रक्??अन्?वस्थ्?नहेतुत्व्?त्क्?र?अम् | तौ प्रसिस्?क्??प्रविविक्??त्मसर्ग्?द्?नसमये वस्त्व्?भ्?सनविमर्??त्मस्???य्?दौ तन्निमित्त? च ह्र्?सव्?द्धिक्रमे?अ द्व्?द?अ?ओ?अ?अकल्?कलनपर्य्?यतो मयुखै? स्???य्?दि देव्य्?त्मनिजमर्?चिभि? स्?जसि मुहुर्मुहुर्निर्मिम्??ए | त्?वेव च भक्तिभ्?ज्?मन्तर्वि?उवति सम्य्?नयन्?त्मसम्?नमरुत्प्रध्?ने कुम्भके समौ सोमस्?र्यकल्?न्योन्यस?घर्?अमि?रितौ सन्त्?व्?त्मवह्न्?वुद्?नवह्नौ जुह्वत्?? मुक्तये ?इव्?त्मभेदप्रथ्?र्?प्??अव्?दिमलत्रयप्लु??ओपलक्?इत?इव्?द्वैतप्र्?प्तये द्व्?वपि युगपत्क्रम? मय्?खैरेव्?स्त? नयसि वि?व्?त्मकव्य्?नव्य्?प्तिम्?वि?य ज्�?नक्रिय्?त्मपर्?ग्न्??ओमर्?पस्व्?त्ममयौ स?प्?दयसि || १९ || स्थ्?लत्व? ते प्रक्?तिगहन? नैव लक्?य? ह्यनन्त? स्?क्?मत्व? व्? तदपि सदसद्व्यक्त्यभ्?व्?दचिन्त्यम् | ध्य्?य्?म्?त्थ? कथमविदित? त्व्?मन्?द्यन्तमन्त- स्तस्म्?दर्क प्र?इयिनि मयि स्व्?त्मनैव प्रस्?द || २० || हे अर्क, ते तव स्थ्?लत्व? वि?वव्य्?पकत्व? प्रक्?त्य्? गहनत्व्?न्नैव लक्?अयितु? ?अक्यम् | यस्म्?दनन्त? दिक्क्?ल्?क्?रैरनवच्छिन्नम् | स्?क्?मत्वमपि व्? अ?ओर??य्?न् इत्येतद्व्य्?ख्य्?न्?वसरव्य्?क्?तयुक्त्य्? परप्रम्?त्र्?त्म यत्तदपि सदसद्व्यक्त्यभ्?व्?द्भ्?व्?भ्?वर्?पत्वेन्?प्रत्?तेरचिन्त्यम् | तदित्थमन्?द्यन्तत्व्?दविदित? त्व्?? कथमन्त? स्व्?न्ते चिन्तय्?मि न कथ�चित् | तस्म्?न्मयि प्र?अयिनि त्वत्प्र्?र्थन्?वहिते स्वयमेव प्रस्?द प्र?अमितदेह्?दिप्रम्?त्?त्?भिम्?नक्?लु?य? प्रस्फुर || २० || यत्तद्वेद्य? किमपि परम? ?अब्दतत्त्व? त्वमन्त- स्तत्सद्व्यक्ति? जिगमि?उ ?अनैर्ल्?ति म्?त्र्?कल्?? खे | अव्यक्तेन प्र?अववपु?? बिन्दुन्?दोदित? स- च्छब्दब्रह्मोच्चरितकर?अव्य�जित? व्?चक? ते || २१ ||
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यत्किमप्यस्?म्?न्य? त्व? तदन्तरित्यन्तर्मुख्?नवच्छिन्नप्रक्???त्मनि पदे | ?अब्दतत्त्वमिति ??स्त्र? ?अब्द्?त्मक? सर्व? ?अब्दो ह?स? प्रक्?र्तित? इति ?र्?स्वच्छन्द्?दि???न्?हतभ???रकर्?पम् | परममिति परमोत्क्???अम् | यदुक्त? ?र्?क्?लोत्तरे - न्?द्?ख्य? यत्पर? ब्?ज? इति | वेद्यमिति सुप्रक?असुस्फुरत्त्?त्मकत्व्?दनपह्नवन्?यम् | न तु विदिक्रिय्?कर्म्?त्मकम् | यदुक्त? ?र्?स्वच्छन्दे - यस्य र्?प? ?अर्?र? व्? न्?स्ति वर्?अ? क्रिय्? तथ्? | स कथ? ग्?ह्यते स्?क्?मो ह्यग्र्?ह्यो नित्यमव्यय? || इति | ?र्?भर्ग?इख्?य्?मपि - नै?अ वर्?ओ न व्? ?अब्दो न चैव्?य? कल्?त्मक? | केवल? परम्?नन्दो व्?रो नित्योदितो रवि? || न्?स्तमेति न चोदेति न ??न्तो न विक्?रव्?न् | सर्वभ्?त्?न्तरचरो भ्?नुर्भर्ग इति स्म्?त? || इति | तदेतत्परब्रह्म्?त्म?अक्तिमद्र्?पम् | सद्व्यक्ति? जिगमि?विति | ओ? तत्सदिति निर्दे?ओ ब्रह्म?अस्त्रिविध? स्म्?त? इति स्थित्य्? ?अक्त्य्?त्मब्रह्मर्?पत्?? जिघ्?क्?उ खे सु?उम्??ध्?म्नि अक्?रोक्?रमक्?र्?दिम्?त्र्?र्?प्?? कल्? विमर्?अ?अक्त्?? ?अनै? ?अनै? क्रमे?अ ल्?ति ग्?ह्??ति | इत्थ? ?अक्तिमच्चिदर्क्?वभ्?सित?अब्दब्रह्मभित्तौ प्र?अववपु?? ओ?क्?र्?त्मन्? अव्यक्तेन प?यन्त्?व्?क्प्रध्?नेन र्?पे?अ न तु व्यक्तेन मध्यम्?दिव्?ग्भ्?मिक्?स्प्??? | प्र?अव? सर्ववेदे?उ इति स्थित्य्? क्रो??क्?त्??ए?अव्?च्यव्?चकस्फ्?र? ?अब्दब्रह्मोच्चरति स्वय? प्रवर्तते | न त्?च्च्?र्यते | क्?द्?क् ? बिन्दुन्?द्?भ्य्?? समस्तवेद्य्?भेदिवेदनसमस्तव्?चक्?भेदिपर्?मर्?अर्?प्?भ्य्?मुदितम् | सर्वोत्क्???अगगन्?र्??ह? सत्कथ? समुच्चरति अत्र्?गमिक्?? युक्ति? स्म्?रयति - कर?एन दिव्यकर?अबन्धेन न तु जिह्व्?म्?लमध्य्?दिन्? व्य�जित? प्रक??क्?तम् | यदुक्त? ?र्?स्वच्छन्दे - दिव्य? तु कर?अ? क्?त्व्? तत्त्वस्योच्च्?र?अ? कुरु इत्य्?दि | यच्चैतच्छब्दब्रह्मतत्त्व?अक्तिस्वर्?प्?मर्?अनमुखेनैव ते व्?चक? तत्स्वर्?प्?मर्?अकम् || २१ ||
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प्र्?त? सन्ध्य्?रु?अकिर?अभ्?ग्??मय? र्?जस? यन्मध्ये च्?पि ज्वलदिव यजु? ?उक्लभ्?? स्?त्त्विक? व्? | स्?य? स्?म्?स्तमितकिर?अ? यत्तमोल्ल्?सिर्?प? स्?ह्न? सर्गस्थितिलयविध्?व्?क्?तिस्ते त्रय्?व || २२ || हे भगव??चिदर्क अह्न? स्?र्वजन्?नस्य प्र्??अदिनस्य सर्गस्थितिलयविधौ ते सम्बन्धिन्? स्? क्?ति? क्रो??क्?त्??ए?अस्???य्?दिस्तुर्य्?ख्य्? ?अक्तिर्विज्?म्भत इत्यर्थ? | क्? स्? इत्य्?ह - प्र्?त? ह्?दुन्मे??त्मनि प्रभ्?ते गु??भ्?तप्र्???प्?नव्?त्त्?? ?इव?अक्तिस?घ???त्म्? य्? सन्ध्य्? तत्र येऽरु?अकिर?? अनुन्मि?इतवैचित्र्य्?द्दिप्त्?? ?अर्?र्?दय?चक्?उर्?दिप्रक्???स्त्?न् भजते यदत एव र्?जस? वि?वर्?ज्?न? वि?वप्रसर्?स्?त्र?अ? च ??मयम् | यच्च परध्?म्?मर्?अन्?त्म्? स्तुतिक्?च्च मध्ये मध्यध्?म्नि यजु?चिद्देवत्?प्?ज्?त्मक्रिय्??अक्तिप्रध्?नम् | द्वैतेन्धनप्लो??दिव ज्वलत् | ह्ल्?द्?त्मसोमव्य्?प्त्युन्मज्जन्?च्छुक्लभ्?? अमलम्?त्मभ्??स्वर्?पम् | स्?त्त्विक? च सत्?? भ्?व? सत्त्व? प्रक्??अम्?नत्व? तस्येद? सम्प्?दकम् | स्वप्रक्???वे?एन वि?वप्रक्??अकमित्यर्थ? | स्?यम्?र्ध्वतु?यर्धेऽस्तमितकिर?अ? गलितप्र्???दिस?स्क्?रक्?अय्?त् प्र??न्तसितोज्ज्वलितमर्?चिनिचयम् | अत?च नि?स?स्क्?रद्वैत्?द्वैतकवलन्?त्तदपेक्?अयैव तमोवस्तुवि?र्?न्त्यैकरसत्व्?त् स्?म | एतत्त्रिविध? स्थ्?लस्?क्?मपरस्वर्?प? यल्ल्?सि ग्?ह्??सि स्? तव्?क्?तिस्त्रय्?व ?ग्यजु?स्?म्?न्?व | तथ्?हि - प्र्?तरर्कदेवत्?स्तुतिप्रध्?न्? ?ग्वेदव्य्?प्ति? | मध्ये कर्म्?नु??ह्?न्?त्म्? यजुर्वेदोदय? | स्?य? वि?र्?न्तिहेतुग्?तप्रध्?न्? स्?मवेदप्रध्?नतेति प्रतिदिन? स्थिति? || २२ || ये प्?त्?लोदधिमुनिनगद्व्?पलोक्?धिब्?ज- च्छन्दोभ्?तस्वरमुखनदत्सप्तसप्ति? प्रपन्न्?? | ये चैक्??व? निरवयवव्?ग्भ्?वम्?त्र्?धिर्??ह? ते त्व्?मेव स्वरगु?अकल्?वर्जित? य्?न्त्यन?वम् || २३ || अतल्?द्?नि सप्त प्?त्?ल्?नि | क्??र्?द्य्?? सप्तोदधय? | अत्र्य्?द्य्?? सप्त मुनय? | महेन्द्र्?द्य्?? सप्त पर्वत्?? | जम्ब्व्?द्?नि सप्त द्व्?प्?नि | भ्?र्?द्य्?? सप्त लोक्?? |
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मोहो मद?च गर्व?च वि??द? क्रोध एव च | भय? च हर्?अ?अ? चैव देहे सप्त्?धय? स्म्?त्?? || इत्युक्त्? मोह्?द्य्?? सप्त्?धय? | यव्?द्?नि सप्तब्?ज्?नि | ग्?यत्र्य्?द्?नि सप्तच्छन्द्??सि | भ्?त्?? प्र्?प्त्?? | एतद्?म्??अत्व्?त् | ?द्?ग्वि?वप्रप�चर्?प्? ये ?अ?ज्?द्य्?? सप्त स्वर्?स्ते मुखे?उ ये??? ते तन्मुख्?स्त्?नेव्?र्थ्?न्नदन्तो ध्वनन्त? सप्त सप्तयो मनोबुद्ध्?न्द्रिय्?त्म्?नोऽ?व्? यस्य त्?द्??अ? त्व्?? प्रपन्न्?? | ये च निरवयव्? व्?क् प?यन्त्? तस्य्? भ्?व? सत्त्? तन्म्?त्र्?धिर्??ह? मध्यध्?मोन्मि?अत्प?यन्त्य्?मर्?अपरिमर्?इतम् | अत?चैक्??व? च त्व्?? बुद्ध्व्? ये प्रपन्न्??, उभयेऽपि ते त्व्?मेव्?न?व? चिदर्क? पर? ब्रह्म य्?न्तित्वदेकत्?म्?प्नुवन्ति | क्?द्??अम् ? स्वरै? ?अ?ज्?दिभि? गु?ऐ? सत्त्व्?दिभि? कल्?भिरक्?र्?दिभिर्वर्जित? निरुप्?धिप्रक्???नन्दघनम् | स्??वोप्?सन्?न?वप्र्?प्तिहेतुरिति विरोध्?भ्?स? || २३ || दिव्य? ज्योति? सलिलपवनै? प्?रयित्व्? त्रिलोक्?- मेक्?भ्?त? पुनरपि च तत्स्?रम्?द्?य गोभि? | अन्तर्ल्?नो वि?असि वसुध्?? तद्गत? स्?यसेऽन्न? तच्च प्र्???स्त्वमिति जगत्?? प्र्??अभ्?त् स्?र्य ?त्म्? || २४ ||
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हे भगवन्, त्व? ज्योति?सलिलपवनै?चित्प्रक्??अकरन्ध्र- प्रवि?अच्छ्?क्त्?म्?तप्र्??अमरुद्भिस्त्रिलोक्?? ज्?गरस्वप्नसु?उप्तित्रय्?? प्?रयित्व्? तस्य्?मेव त्रिलोक्य्?मेक्?भ्?त? स्?मरस्य? प्र्?प्त? दिव्य? स्?र? तुर्य्?नन्दघन? गोभिरनुत्तरैर्मर्?चिभि? पुनरिति पुन? पुनर्?द्?य चमत्क्?त्य अन्तरिति अन्तर्मुखे पदे ल्?नो वसुध्?? पर्?? भ्?मि? वि?असि तन्मयतय्? स्फुरसि तद्गत?च्?न्नमदनवि?अय? वेद्यज्?त? स्?यसे ??य्?न्?भ्?य तद्र्?पतय्? स्फुरसि | तच्च्?न्न? प्र्???प्?न्?वस्थितिहेतुस्त्वमेव न त्वन्यत् कि�चिदिति | अनय्? युक्त्य्? स्?र्य? प्र्??अभ्?द्?त्म्? च कथ्यसे | यद्?ह ?रुति? - अहमन्नमहमन्नदोऽहमन्न्?द?च इति | ब्?ह्योऽपि स्?र्यो भ्?र्भुव?स्वस्त्रय्?? ज्योति?सलिलपवनैस्तत्र तत्र समय ?प्?र्य समरस्?भ्?त? दिव्य? त्रिलोक्य्?? रसर्?प? स्?र? र?मिभिर्ग्र्??म्?द्?व्?द्?य पुनरपि भ्?मिमन्तस्त्?पनयुक्त्य्? ल्?न? सन् वि?अति | तद्गत?च्?न्नमो?अध्य्?ख्य? प्र्???वस्थितिहेतु? जनयति | तत? स एव्?न्नमन्नदोऽन्न्?द?च || २४ || अग्न्??ओमौ प्रक्?तिपुरु?औ बिन्दुन्?दौ च नित्यौ प्र्???प्?न्?वपि दिननि?ए ये च सत्य्?न्?ते द्वे | धर्म्?धर्मौ सदसदुभय? योऽन्तर्?वे?य योग्? वर्तेत्?त्मन्युपरतमतिर्निर्गु?अ? त्व्?? वि?एत् स? || २५ || यो योग्? नित्यौ सततव्?हिनौ प्र्???प्?न्?वेव कवलन्?प्य्?यनहेतुत्व्?दग्न्??ओमौ ज्�?नक्रिय्??अक्तिप्र्?ध्?न्य्?त् प्रक्?तिपुरु?औ वेदनविमर्?अत्व्?द् बिन्दुन्?दौ प्रसरवि?र्?न्तिपदत्व्?द् दिननि?ए विक्?सस?कोचनिमित्तत्व्?त् सत्य्?न्?ते ?र्ध्व्?धोगतिक्?र?अत्व्?द् धर्म्?धर्मौ ब्?ह्य्?न्?? सत्त्?सत्तयोर्ज्�?पकत्व्?त् सदसदुभयमन्तरुद्?नध्?म्नि ?वे?य विल्?प्य्?त्मनि चिद्ध्?म्नि वर्तेत्?वति??हेत स त्व्?? निर्गु?अ? सत्त्व्?दिगु??त्?त? परम्?दित्य? वि?अत्येव || २५ || गर्भ्?ध्?नप्रसवविधये सुप्तयोरिन्दुभ्?स्? स्?पत्न्येन्?भिमुखमिव खे क्?न्तयोर्मध्यस?स्थ? | द्य्?व्?प्?थ्व्योर्वदनकमले गोमुखैर्बोधयित्व्? पर्य्?ये??पिबसि भगवन् ?अ?रस्?स्व्?दलोल? || २६ ||
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हे भगव??चिद्भ्?नो ! द्य्?व्?प्?थ्व्यो? सर्वद्व्?द??न्त्?त्म्?न्तरिक्?अदेहभ्?म्यो? क्?न्तयोर्निजविज्�?नेनैव रम??यत्?? प्र्?पितयोर्वदनकमले ?अक्तिनलिने गोमुखैरनुत्तरैर्मर्?चिभिर्बोधयित्व्? विक्?स्य अस्?म्?न्य??क्त्?नन्द्?स्व्?दनलम्प?अ? सन् पर्य्?ये?अ विचित्रोन्मे?अनिमे?अक्रमैर्?पिबसि चमत्कुरु?ए | क्?द्??अ? ? मध्यस?स्थोऽग्न्??ओम्?धिर्??ह? | किमर्थम् ? गर्भे स्व्?न्तर्यद्?ध्?न? प्रक्?एपोऽर्थ्?द्वि?वस्य प्रसवस्तदौचित्येन भ्?सन? तद्विध्?न्?र्थम् | क्?द्??योर्द्य्?व्?प्?थिव्यो? ? खे ??न्यप्रम्?तरि सुप्तयो? कलोद्वलितमेतच्च चित्तत्त्व? कर्त्?त्?मयम् | अचिद्र्?पस्य ??न्य्?देर्मित? गु?अतय्? स्थितम् || इति न्?त्य्? ??न्यप्रध्?नत्??रये?अ निमज्जितप्?रम्?र्थिकस्वर्?पयोरभिमुख्?वस्थितयो? | कथ? सुप्तयो? ? स्?पत्न्येन परस्परप्रतियोगितयैव्?भिमुख? क्?त्व्? | उभय्?नुक्?लत्व्?द्?भिमुख्यम्??रित्येत्यर्थ? | ब्?ह्योऽप्यर्को द्य्?व्?प्?थिव्यो र्?त्र्?बिन्दुभ्?स्? सुप्तयोर्म्?लितस्वर्?पयोरभिमुख्?वस्थितयोर्मध्य गोभिर्वदननलिने विक्?स्य तद्?यविचित्ररस्?स्व्?दलोल ?पिबति भौम्?न्तरिक्??न् रस्?न् | गर्भ्?ध्?न्?य ग्र्??म्?दौ कर्?अ?य्?दिनिजर?म्यन्तर्निवे?अन्?य | प्र्?व्???दौ च प्रसव्?य वर्?अ?य्?दिमर्?चिविसर्गतो न्?नौ?अध्युप्तये | अथ च स्?पत्न्येन्?भिमुखयो? सुप्तयोरिन्दुभ्?सोपलक्?इतयो? कर्प्?र्?छ्हुरितयो? क्?न्तयोर्मध्यस?स्थो न्?यको वैदग्ध्य्?द् गोमुखैर्वक्त्रपद्मे पर्य्?ये?अ युगपद् बोधयित्व्? लोचनपरिचुम्बनपुर?सरमुन्निद्रे विध्?य वक्त्र्?सव्?म्?तलम्प?ओ गर्भस्य्?ध्?नप्रसवनिमित्तम्?पिबति रतयेऽत्यर्थ? परिचुम्बत्?ति ?ले??᳚?क्?र? ?ले?अध्वनिस?स्???अ?च || २६ || सोम? प्?र्??म्?तमिव चरु? तेजस्? स्?धयित्व्? क्?त्व्? तेन्?नलमुखजगत्तर्प?अ? वै?वदेवम् | ?म्?वस्य? विघसमिव खे तत्कल्??ए?अम?नन् ब्रह्म्????न्तर्ग्?हपतिरिव स्व्?त्मय्?ग? करो?इ || २७ ||
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हे चिदर्क ! ब्रह्मरन्ध्र्?वस्थित??क्तब्रह्मोपलक्?इतस्य्???अस्य अन्तरिति धर्?म्?लम्?य्??अक्त्य??अचतु??अयस्य मध्ये ग्?हे स्व्?त्मय्?ग? करो?इ | कि? क्?त्व्? ? सोम? र्?प्?दिप�चद??त्मकमेव? तेजस्? निजमर्?चिविस्फुर?एन प्?र्??म्?त? चरुरिव स्?धयित्व्? एकैकत्र च तत्त्वेऽपि ?अ?त्रि??अत्तत्त्वर्?पत्? इति क्?त्व्? वि?व्?त्मनिज??क्त्?म्?त्?भ्?समय? स्वस?निवि??अ? विध्?य | अनल उद्?नवह्निर्मुख? प्र्?प्त्युप्?यो यस्य ब्रह्म्?द्यन्??रित्?न्तक्?र??धि??हितधर्?दि?इवतत्त्व्?न्त्?ध्व- विस्फ्?रमयस्य जगतस्तस्य तर्प?अ? यत्तदेव वै?वदेव? य्?ग? तेन सोमेन चरु?? विध्?य तस्य सोमस्य कल्??ए?अ? जगत्तर्प?ओपयुक्तकल्?प�चद??व?इ??अम्?र्ध्वतु?य्?र्ध्?ख्य्?म्?वस्य्?- सम्बन्धि अम्?ख्यकल्?र्?प? विघसमिव कवलित्??ए?अस?स्क्?रकल्पमिव्??नन् | अम्?त? चन्द्रर्?पे?अ द्विध्? ?ओ?अ?अध्? पुन? | पिबन्ति च सुर्?? सर्वे द?अ प�च पर्?? कल्?? || अम्??ए?अगुह्?न्त?स्थ्?म्?वस्य्? वि?वतर्पि?? || इति ?र्?क्?लिक्?क्रम्?दि??अन्?त्य्? वि?वदेवत्? परम्?र्थे स्व्?त्मनि चमत्कुर्वन् | क्?द्?क् त्वम् ? ग्?हपतिरिव | सोऽपि हि प्?र्??म्?तकल्पम्?म्?वस्य? चरु? प्रस्?ध्य तेन्?ग्निप्रमुखसर्वजगत्तर्प?अ? वै?वदेव? च क्?त्व्? तच्छे?अम?नन् स्व्?त्मदेवत्?य्?ग? करोति | ब्?ह्योऽपि स्?र्य? स्वर?मित्?पप्रद्र्?वितसोमकल्?प�चद?अकेन देवर्?इनर्?त्मजगत्तर्प?अ? विध्?य्?म्?ख्यकल्?चमत्कर??त्म?व्?त्मय्?ग? ब्रह्म्???अस्य्?न्तर्विधत्ते || २७ || क्?त्व्? नक्त? दिनमिव जगद्ब्?जम्?व्यक्तिक? यत् तत्रैव्?न्तर्दिनकर तथ्? ब्र्?ह्ममन्यत्ततोऽल्पम् | दैव? पित्र्य? क्रमपरिगत? म्?नु?अ? च्?ल्पमल्प? कुर्वन् कुर्वन् कलयसि जगत् प�चध्?वर्तन्?भि? || २८ ||
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हे दिनकर वि?वोदयक्?रिदिवसस?प्?दक चिद्भ्?नो, जगत? सद्??इव्?न्तस्य वि?वस्य यद् ब्?जम्?रम्भ्?वस्?नयोरुदय्?पवर्गक्?र?अ? ?र्?स्वच्छन्द्?दि??अविततपर्?र्ध्?त्मक्?लर्?पमहोर्?त्र? तत्क्?त्व्?भ्?स्य तत्रैव्?न्तर्जगत? कल्?दिक्?इत्यन्तस्य्??उद्ध्?ध्वर्?पस्य ब्?ज? म्?येयमहोर्?त्र? तदन्तरप्य्?व्यक्तिक? प्र्?क्?त? तदन्तरपि ब्र्?ह्म? तत्र्?पि दैव? तत्र्?पि पित्र्य? पित्?सम्बन्धि तत्र्?पि म्?नु?अ? क्रमे??ल्पमल्प? कुर्वन् कुर्वन्निव वैचित्र्यसहस्रैर्?भ्?सयन्निव जगद्वि?व? प�चध्?वर्तन्?भिर्विचित्रज्?गर्?दिद??प�चकपर्?वर्तनै? कलयसि अन्तरवस्थित? बहि? क्?इपसि | निर्मिम्??ए निर्मित? च कलयसि | इदमित्थमिदमिदमिति स?ख्य्?नेन स्थ्?पयसि | स्थ्?पितमपि कलयसि अन्त?स?हरसि | स?ह्?तमपि कलयसि स?स्क्?रग्?लनेन विम्??असि | विम्???अमपि कलयसि स्व्?त्म्?भेदेन ज्?न्??ए स्वप्रक्??ऐक्?त्म्यम्?प्?दयसि | तथ्? पुनरपि स्वर्?प्?त् कलयसि नव? नवमुल्ल्?सयसि | इत्येव? सर्गस्थितिस?ह्?तिविल्?पनस्व्?त्मैक्य्?भ्?सनपरस्पर्?न्दोलनल्?ल्?क्र्?न्त? करो?इ | अत्र जगद्ब्?जम्?वर्त्य द्विर्योज्यम् | अल्पमल्पमिति व्?प्स्?य्?म् | अयम्??अय? - यद्यस्य य्?वदहोर्?त्र? तत्तद्?ये प्र्??अच्?रे तद?????अक्?स्वपि व्? ?र्?स्वच्छन्द्?दि??अम्?सोदय्?दि?अ??यब्दोदय्?न्तप्रक्रियय्? योगिज्�?न्?पेक्?अय्?तिपरिमितम्?भ्?सयति भगव्?न्, तत्र्?प्यन्तर्वि?वैक्?त्म्यप्रथन्?त् स्?द्??इव्?न्तक्?लकलन्?म?ए??म्?भ्?सयत्?त्य्?भ्?सम्?नोऽय? क्?लो न त्वस्य व्?स्तव? कि�चित्तत्त्वमस्ति | अत एव कुर्वन्निवेत्?व?अब्देन्?यमेव्?र्थ? स्प??अ? | वस्तुतो ह्येत्?वद्वि?वोदय्?वस्थ्?नविल्?पन्?द्य्?त्म्? परमे?वर एवेति स्फुरति | न तु चिदेकवपु?अस्ततोऽतिरिक्त? किमप्यस्ति | अत्र च म्?नु??द्यहोर्?त्रप्रम्??अ? ?र्?स्वच्छन्दे चोक्तम् | तद्यथ्? - मुह्?र्त्?स्तु तथ्? त्रि??अदहोर्?त्रस्तु म्?नु?अ? | दक्?इ?अ? च्?यन? र्?त्रिरुत्तर? च्?यन? दिनम् || पित्???? तदहोर्?त्रमनेन्?ब्द? तु प्?र्ववत् | एव? देवैस्त्वहोर्?त्र? ........................................... || इति |
SK
यत्त्विह दैव? पित्र्य? प्?थगुक्त? तत्पित्?सम्बन्ध्यहोर्?त्रो ज्�एय? | ते??? ?उक्लक्???अर्?पो हि स? | कि�च - कल्पो ब्रह्मदिन? प्रोक्त? चतुर्युगसहस्रकम् | ?अ?त्रि??अत्तु सहस्र्??इ ब्रह्म?अ? प्रलयोद्भव? || अव्यक्तस्थे?उ रुद्रे?उ दिनर्?त्रि?च त्?वत्? | प्र्?ध्?निकपर्?र्धेन द?अध्? गु?इतेन तु | म्?य्? स?हरते सर्व? पुन?चैव स्?जेज्जगत् || इति | तथ्? - ?अक्तिर्क्?लपर्?र्धस्य को?इध्? गु?इतस्य च | अन्??रितस्य देवस्य दिनमेतत् प्रक्?र्तितम् || इत्येवम्?दि | तथैकत्र प्र्??अच्?रे घ?इकोदय्?त् प्रभ्?ति ?अ??यब्दोदय्?न्त? वितत? तत्र्?दि??अ? ग्रन्थगौरवभय्?न्न दर्?इतम् | एवमहोर्?त्रक्?त्त्वेन जगद्विपरिवर्तकत्व? भगवत उक्तम् || २८ || ये त्वहोर्?त्रप्र?अमे र्??ह्?स्ते लोकोत्तर्? एवेत्य्?ह - तत्त्व्?लोके तपन सुदिने ये पर? स?प्रबुद्ध्? ये व्? चित्तोप?अमरजन्?योगनिद्र्?मुपेत्?? | तेऽहोर्?त्रोपरमपरम्?नन्दस?ध्य्?सु सौर? भित्त्व्? ज्योति? परमपरम? य्?न्ति निर्व्??अस?ज्�अम् || २९ || हे तपन मह्?प्रक्??अर्?प, ये योगिनस्तत्त्व्?लोक्?त्मनि ?ओभनेऽनि?ओदितेऽनस्तमिते दिने प्?रम्?र्थिके सर्वद??नुस्य्?ते सर्वतोमुखे चित्प्रक्??ए सम्यक् प्र्???य्?म्?द्य्?य्?स? विन्? विमर्?अयुक्त्य्? प्रबुद्ध्? गलित्?ख्य्?तित्?मिस्र्?? | ये च्?न्ये चित्तोप?अम एव सर्वब्?ह्य्?भ्य्?सनिव्?त्तिहेतुत्व्?द् रजन्?, तस्य्?? योगनिद्र्?मुपेत्?? | प्र?अमितविकल्पसविकल्पप्रक्??ऐक्यम्?पन्न्?? | उभयेऽपि ते प्र्?ग्वर्?इतसमस्त्?होर्?त्रोपरम एव परम्?नन्दर्?प्?? सन्ध्य्? निमज्जत्प्र्???प्?नव्य्?प्ति?इवस्?मरस्यभुव? सर्वतोदिक्कमुदित्?स्त्?सु सौरमिति प्र्???यमपरममिति स्थ्?ल? ज्योति? स?कुचित? प्रक्??अ? भित्त्व्? नि?स?स्क्?र? विल्?प्य पर? निर्व्??अम्?र्ग? य्?न्ति सद्? पर? ??क्त? ध्?म्??लि?यन्ते || २९ || न केवल्?? चित्र्?? क्?लकलन्?मक्?लकलितस्वर्?पसम्?पत्ति? च दर्?अयसि, य्?वज्जगदुदय्?प्?य्?वप्?त्य्?ह -
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? ब्रह्मेद? नवमिव जगज्ज?गमस्थ्?वर्?न्त? सर्गे सर्गे विस्?जसि रवे गोभिरुद्रिक्तसोमै? | द्?प्तै? प्रत्य्?हरसि च लये तद्यथ्?योनि भ्?य? सर्ग्?न्त्?दौ प्रक?अविभव्?? दर्?अयन् र?मिल्?ल्?म् || ३० || ?ब्रह्म?अ? ??क्त्?द्र्?प्?द्?ब्रह्म निज? पर? ??क्त? र्?प? वर्जयित्व्? इद? सर्व? स्?द्??इव्?दिक्?इत्यन्त? ज?गमस्थ्?वरे अन्तौ भ्?गौ यस्य त्?द्?ग् जगत्सर्गे सर्गे प्रथमेच्छोन्मे??त्मन्य्?दिसर्गे भ्?यो भ्?य उद्रिक्तसोमै? स्फ्?त??क्त्?म्?तैर्गोभिर्मर्?चिभिर्विस्?जसि ??य्?न्?भ्?त? निजर?मिर्?प? प्रक?अयसि | भ्?यो द्?प्तैरग्निप्रध्?निर्गोभिस्तज्जगद्यथ्?योनि प्रत्य्?हरसि स्वस्व्?तन्त्र्य्?वभ्?सिततत्तत्क्?र?अनिवे?अपुर?सर? लये स्वचिदैक्य्?भ्?सन्?त्मनि स?ह्?रे प्रत्?पम्?हरसि चिदेकमयमेव करो?इ | कि? कुर्वन् ? सर्गस्य स्???एर्?दौ अन्ते प्रक?अविभव्?? स्फु?अम्?ह्?त्म्य्?? र?मिल्?ल्?? प्रक?अयन्निजमर्?चिविल्?सम्?भ्?सयन् || ३० || ?रित्व्? नित्योपचितमुचित? ब्रह्मतेज?प्रक्??अ? र्?प? सर्गस्थितिलयमुच्? सर्वभ्?ते?उ मध्ये | अन्तेव्?सि?विव सुगुरु?? य? परोक्?अ? प्रक्?त्य्? प्रत्यक्?ओऽसौ जगति भवत्? दर्?इत? स्व्?त्मन्?त्म्? || ३१ || हे भगवन्, य? प्रक्?त्य्? स्वभ्?वेन परोक्?ओऽक्??गोचर ?त्म्? असौ जगति सर्वभ्?ते?उ मध्ये भवत्?ऽन्तेव्?सि?उ अनुग्र्?ह्ये?उ ?त्मनैव प्रत्यक्?ओ दर्?इत? स्वप्रक्??अतय्? प्रक??क्?त? | कि? क्?त्व्? ? नित्योपचित? सद्? परिप्?र्?अमुचित? चिद्?नन्दघन? र्?प? ?रित्व्? देह्?दिनिमज्जनेनोन्मग्न? विध्?य | क्?द्?ग् र्?पम् ? ब्रह्मतेज?प्रक्??अ? ब्?हत्त्व्?द् ब्??हकत्व्?च्च ब्रह्म द्वैतद्?हित्व्?त्तेजो यस्य त्?द्??अ? प्रक्??अ? प्रथ्? यस्य | क्?द्??एन भवत्? ? सर्गस्थितिलयमुच्? जनन्?दि??न्येन यथ्?न्तेव्?सि?उ ?इ?ये?उ ?ओभनेन द्???अतत्त्वेन गुरु?? ?त्म्? दर्?यते चिन्मय्? सत्त्? प्रक??क्रियते, तथ्? त्वय्?न्त? परम्?त्मतय्? बहि?च तेजो वि?वर्?पतय्? स्वयम्?त्म्? प्रक??क्रियते || ३१ ||
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लोक्?? सर्वे वपु?इ नियत? ते स्थित्?स्त्व? च ते??- मेकैकस्मिन् युगपदगु?ओ वि?वहेतोर्गु??व | इत्थ?भ्?ते भवति भगवन्न त्वदन्योऽस्मि सत्य? किन्तु ज्�अस्त्व? परमपुरु?ओऽह? प्रक्?त्यैव च्?ज्�अ? || ३२ || हे भगवन् पर्?नन्द्?त्मक स्व्?तन्त्र्य?अक्तिस्वर्?पपर्?व्?ग्?लि?गितम्?र्ते, ते तव वि?वहेतोर?ए?अक्?र?अस्य वपु?इ प्रक्???नन्दघने स्वर्?पे सर्वे लोक्? लोक्यम्?न्?? पद्?र्थ्??, लोकयित्?र?च रुद्रक्?एत्रज्�अर्?प्?? प्रम्?त्?र? स्थित्?? | त्वच्चिद्?त्मिक्?? सत्त्?? विन्? हि कथमेते त्वत्तो वि?वहेतोरुदियु? | ते??? च लोक्?न्?? स?बन्धिन्येकैकस्मिन् वपु?इ त्व? युगपदक्रमे?ऐव स्थित? | अन्यथ्? ते त्वत्प्रक्??अत्?? विन्? हि कथ? प्रक्??एरन् | अत?च त्व? सत्त्व्?दिगु?अह्?नोऽपि वि?व्?त्मत्?भ्?सगु??द् गु??व्?भ्?सि | इत्थमुपवर्?इते वि?व्?त्मनि भवति सति सत्यमस्मि न्?न्य? | किन्तु त्वमेव?भ्?त? परम? पुरु?ओ ज्�अ? परिप्?र्?अ? स्?र्वज्�य्?दिधर्म? | अहमिति त्वयैव देह्?दि?उ ग्र्?हितप्रम्?त्?भ्?व? प्रक्?त्य्? त्वन्म्?य्?म्?ह्?त्म्य्?दज्�अ? | अत?च देह्?दिप्रम्?त्?त्?निमज्जनेन्?ज्�अत्?? प्र?अमय्य नित्य? स्व्?त्मसम्?वे?एन ज्�अत्?? ममोन्मज्जयेत्यर्थ्?दुक्त? भवति || ३२ || स?कल्पेच्छ्?द्यखिलकर?अप्र्??अव्??यो वरे?य्?? स?पन्न्? मे त्वदभिनवन्?ज्जन्म चेद? ?अर?यम् | मन्ये च्?स्त? जिगमि?उ ?अनै? पु?यप्?पद्वय? तद् भक्ति?रद्धे तव चर?अयोरन्यथ्? नो भवेत्?म् || ३३ ||
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इत्थमज्�अस्य्?पि मे त्वदभिनवन्?च्चिद्?त्मत्वद्?भिमुख्यप्रव्?त्तत्वत्पर्?मर्??त्मस्तुतिव??त् | स?कल्प? स्थ्?लेच्छ्? | इच्छ्? स?कल्पक्?र?अभ्?त्? स्?क्?मविकल्पपर्?मर्??त्म्? | ?दि?अब्द्?त् प्रयत्नस्तदनन्तरम्?लोचन्?द्?न्?दिप्रव्?त्त्?नि व्?ग्वर्ज्?न्यखिल्?नि कर??नि सत्सहव्?त्ति? प्र्??अ?, सर्वत्र्?त्र स्?क्?मपर्?मर्?अर्?पतय्? व्य्?पकत्वेन स्थित्? व्??? चेत्येते मम वर?ए पर्?नुग्रहे स्?धवो वरे?य्? ज्?त्??, तथेदमिति प?चिमजन्म ?अर?य? ?अर?ए स्?धु अनुग्र्?ह्य्?नुग्रहैकपर? सम्पन्नम् | अह? हि सर्वद??सु चिदर्कपर्?मर्?अपर? पर्?नप्यनुग्?ह्?अन् स्थित? | कि�च, मन्ये स्व्?नुभवेनैवैतच्चेतये यत्पु?यप्?पद्वय? सुक्?त्?सुक्?तज्?त? सर्व? तदित्यनन्तजन्म्?र्जित? ?अनैरस्त? जिगमि?उ हिमविल्?य? विल्?यम्?न? स्थितम् | प्र्?क्स?चितसर्वकर्म??? हि ध्व?सेऽपि देह्?रम्भककर्म??? ध्व?सोन्मुखत्व्?ज्जिगमि?वित्युक्तम् | अन्यथेति | यदि नैव? स्य्?त्तत्कथ? भवच्चर?अयोर्भक्ति?रद्धे भवेत्?म् | नैव स्य्?त्?म् | यदुक्त? नन्दि?इख्?य्?म् - यद्? ?इवेऽभिल्??ओ वै ज्?यते च न्???? सद्? | तद्? ?इव्?भिम्?न्?स्ते ज्?यन्ते परम्??अव? || मुक्त्?स्तदैव ते द्?क्??? प्र्?प्नुवन्ति गुरोस्तत? || इति || ३३ || सत्य? भ्?यो जननमर?ए त्वत्प्रपन्ने?उ न स्त- स्तत्र्?प्येक? तव नुतिफल? जन्म य्?चे तदित्थम् | त्रैलोक्ये?अ? ?अम इव पर? पु?यक्?योऽप्ययोनि? स?स्?र्?ब्धौ प्लव इव जगत्त्?र??य स्थिर? स्य्?म् || ३४ ||
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हे देव, यद्यपि त्वत्प्रपन्ने?उ त्वत्सम्?वि??ए?उ स?स्?रहेतुसर्वव्?सन्?द्?ह्?द् भ्?यो जननमर?ए न स्त?, तथ्?पि त्वन्नुतिस्त्वत्स्तुतिरेव फल? यस्य त्?द्?गिदमेक? प?चिमजन्म य्?चे | यथ्? भवदवमर्??त्मचमत्क्?र्?ध्?यि एतन्म्?ग्?त् | तदित्थमनेनैव त्वन्नुतिरस्?वि??एन प्रक्?रे??स्मिन्नेव देहे पर? ?अम इव ??म्यत्यस्मिन् वि?वमिति व्युत्पत्त्य्? पर? ?अ?कर्?त्मस्वभ्?व इव ज्?ग्रत्स्वप्नसु?उप्त्?त्मनि त्रैलोक्ये ??अ? प्रभु? | न तु परतन्त्र? | अत एव पु?यो दर्?अनस्पर्?अन्?दिन्? पर्?नुग्र्?ह्? क्?यो यस्य त्?द्?क् | अयोनिरिति नित्योदितचिद्?नन्दैकघन? सन् जगतो वि?वस्य त्?र??य स?स्?र्?ब्धिमध्ये प्लव इव पोत इव स्थिर? स्य्?? चिरक्?ल? भ्?य्?सम् || ३४ || सौ?उम्?एन त्वमम्?तपथेनैत्य ??त्???उभ्?व? पु???स्यग्रे सुरनरपित्?न् ??न्तभ्?भि? कल्?भि? | प?च्?दम्भो वि?असि विविध्??चौ?अध्?स्तद्गतोऽपि प्र्???स्येव? त्रिभुवनमतस्ते जगन्मित्रत्?र्क || ३५ ||
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हे अर्क ! अतो हेतोस्ते जगतो मित्रत्? यौगिकमित्र?अब्द्?भिधेयत्वम्, यतस्त्व? सौ?उम्?एन मध्यमेन्?म्?तपथेन्?प्य्?यिन्? म्?र्गे?अ ??त्???उभ्?वमप्?नचन्द्रत्वमेत्य्?गत्य्?ग्रे प्रथम? सुर्?द्?न् सर्व्?न् प्रम्?त्?न् पु???सि लब्ध्?वस्थित्?न् करो?इ | केन ??न्तम्?भिरन्तर्मुख्?भ्?वेनोपस?ह्?तब्?ह्यप्रथ्?भि? कल्?भिर्?दिविसर्ग्?न्तस्व्?भ्?विमर्?अ?अक्तिभि? | प?च्?दनन्तरमम्भ इति बहि? प्रसरप्रव्?त्त्?न् सर्वव्?ह्?न् वि?असि स्व्?म्?त्?च्छुरित्?न् करो?इ | विविध्??चौ?अध्?र्वि?असि स्थ्?वर्?दिसर्वब्?ह्य्?भ्?स्?न् स्वप्रक्???प्?रित्?न् विधत्से | तद्गतो मेयप्रप�च्?त्मतय्? स्फुरितोऽपि त्रिभुवन? वि?वमेवमिति तद्?भ्?सनविमर्?अनयुक्त्यैव चन्द्रत्वमेत्य प्?र्वोक्तन्?त्य्? सुर्?द्?न् प्र्???सि तर्पयसि | ब्?ह्योऽप्यर्क? सु?उम्??म्?र्गे??म्?तस?क्रम?अयुक्त्य्? चन्द्रत्वमेत्य प्?र्वोक्तन्?त्य्? सुर्?द्?न् पु???ति | ??न्तभ्?भिर्निव्?त्तद्?प्तिभि? कल्?भि? ?अक्तिभिरम्भो वि?अति दक्?इ??यने ?स्?रर्?पत्?? स्व्?करोति | ओ?अध्??च वि?अति सरस्?? करोति | तद्गत?च वै?वदेवय्?ग्?नुय्?गक्रमे?अ त्रिभुवन? पु??अन् जगन्मित्रत्वमेव दर्?अयति || ३५ || मन्द्?क्र्?न्ते तमसि भवत्? न्?थ दो??वस्?ने न्?न्तर्ल्?न्? मम मतिरिय? ग्??हनिद्र्?? जह्?ति | तस्म्?दस्त?गमिततमस्? पद्मिन्?व्?त्मभ्?स्? सौर्?त्ये?? दिनकर पर? न्?यत्?म्??उ बोधम् || ३६ || हे न्?थ दिनकर स्व्?मिन् चिदर्क, त्वय्? तमस्यज्�?ने मन्द्?क्र्?न्ते निर्म्?लन्?य्?घ्र्?ते सति इय? मद्?य्? मतिर्ध्? र्?गद्वे????मवस्?ने ज्?तेऽपि अन्तर्ल्?न्?न्तर्मुख्?भ्?त्?पि ग्??हनिद्र्?? त्वदभेद्?ख्य्?ति? न जह्?ति | तस्म्?दे?? त्वय्? अस्त?गमित? तमो यय्? त्?द्??य्?त्मभ्?स्? स्वद्?प्त्य्? क्?र?अभ्?तय्? ??वविलम्बितमेव पर? बोध? प्र??न्त्?ख्य्?तिनिजज्योतिर्?त्मत्?? न्?यत्?? प्र्?प्यत्?म् | स्?र्यो देवत्? यस्य्?? स्? सौर्?ति क्?त्व्? पद्मिन्?व नलिन्?व | स्?पि त्वय्? दो??वस्?ने प्रभ्?ते तमसि मन्द्?क्र्?न्तेऽन्तर्ल्?न्? कर्?इक्?स??लि??अदल्? ग्??हनिद्र्?? न जह्?त्?त्यस्त?गमिततमस्? स्व्?त्मभ्?स्? ग्??ह्?भ्?तज्योति?? प्रबोध्यते त्वय्? || ३६ ||
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येन ग्र्?स्?क्?तमिव जगत्सर्वम्?स्?त्तदस्त? ध्व्?न्त? न्?त्व्? पुनरपि विभो तद्दय्?घ्र्?तचित्त? | धत्से नक्त?दिनमपि गत्? ?उक्लक्???ए विभज्य त्र्?त्? तस्म्?द्भवपरिभवे दु?क्?ते मेऽपि भ्?नो || ३७ || हे विभो भ्?नो चिन्मर्?चिम्?लिन्, येन तमस्?ऽज्�?नेन जगदिद? ग्र्?स्?क्?तम्?स्?त्, तदनुग्?ह्?त्?न् प्रत्यस्त? न्?त्व्? विन्??य तद्दय्?घ्र्?तचित्त इव तदनुकम्पयैव ?उक्लक्???अगत्? विभज्य व्युत्थ्?न्?वसरे प्र्???प्?नभ्?मिक्?मवरुह्य तद् ध्व्?न्त? पुनरपि धत्से पु???सि | निर्व्युत्थन? सम्?धि? झगिति न वितरस्?त्यर्थ? | यथ्? ब्?ह्यो भ्?नुर्ग्र्?स्?क्?तजगत्तिमिर? विन्??य पुनर्दययेव नक्त?दिन? नि??दिने विभज्य धत्ते पु???त्?ति ?ले?ओपम्? | यत एव? दुर्?त्मनि तमस्यपि त्वमनुकम्प्?व्?निव ततो मे मम परिभवे व्युत्थ्?न्?त्मनि क्ले?एऽपि त्र्?त्? रक्?इत्? भव | क्?द्??ए परिभवे ? दु?क्?ते दु??अ? क्?त? कर?अ? वि?अयह्?न्?द्?न्?दिपरिभवो यत्र | निर्व्युत्थ्?नसम्?वे?अरस्?स्व्?दिन? म्?? कुर्वित्यर्थ? || ३७ || व्युत्थित? सम्?वे?अमप्र्?प्नुवन् व्युत्थ्?नद??निर्भर्त्सनपर? सम्?वे?अपर? भगवन्त? प्र्?र्थयितुम्?ह - ?स?स्?रोपचितसदसत्कर्मबन्ध्??रित्?न्?- म्?धिव्य्?धिप्रजनमर?अक्?उत्पिप्?स्?र्दित्?न्?म् | मिथ्य्?ज्�?नप्रबलतमस्? न्?थ च्?न्ध्?क्?त्?न्?? त्व? नस्त्र्?त्? भव करु?अय्? यत्रतत्रस्थित्?न्?म् || ३८ || सत्पु?यम् | असत्प्?पम् | यत्रतत्रस्थित्?न्?मिति दे?ए क्?लेऽवस्थ्?वैचित्र्ये च त्र्?त्? सम्?वे?अप्रथनेन रक्?अक? | ?इ??अ? स्प??अम् || ३८ || सत्य्?सत्यस्खलितवचस्?? ?औचलज्जोज्झित्?न्?- मज्�?न्?न्?मफलसफलप्र्?र्थन्?क्?तर्???म् | सर्व्?वस्थ्?स्वखिलवि?अय्?भ्यस्तकौत्?हल्?न्?? त्व? नस्त्र्?त्? भव पित्?तय्? भोगलोल्?र्भक्???म् || ३९ ||
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भोगे?उ वि?अयसुखे?उ लम्प??न्?मस्म्?कमर्भक्???? ब्?ल्?न्?मिव त्व? पित्?तय्? जनकत्वेन त्र्?त्? भवेति प्र्?ग्वत् | त्व? ह्यस्म्?क? तत्त्वद्???य्? जनक? | सत्य्?सत्येत्युभयत्र समम् | स्खलित? प्रम्?दि एकत्र, अन्यत्र्?ऽस्प??अवर्?अत्वम् | एव? ?औच? चैत्त? ??र्?र? च | अफल्? सफल्? च य्? प्र्?र्थन्? तय्? क्?तर्???मध्?र्???म् | यत्तत्प्र्?र्थयम्?न्?न्?मिति | सुबोधमन्यत् || ३९ || य्?वद्देह? जरयति जर्? न्?न्तक्?देत्य द्?त्? नो व्? भ्?मस्त्रिफ?अभुजग्?क्?रदुर्व्?रप्??अ? | ग्??ह? क??हे लगति सहस्? ज्?वित? लेलिह्?न- स्त्?वद्भक्त्?भयद सदय? ?रेयसे न? प्रस्?द || ४० || हे भक्त्?भयद, य्?वद्व्युत्थित्?मर??वस्?न्?? दुर्द??? न्?प्नुमस्त्?वन्नोऽस्म्?क? प्रस्?द देह्?दिस?स्क्?रक्?लु?यप्र?अमनेन निर्मल्?भव | निर्व्युत्थ्?नप्रक्???नन्दघनपरमसम्?वे??- म्?तरस्?स्व्?दसुखित्?नस्म्?न् स?प्?दयेत्यर्थ? | स्प??अमन्यत् || ४० || वि?वप्र्??अग्रसनरसन्??ओपकोपप्रगल्भ? म्?त्योर्वक्त्र? दहननयनोद्द्?मद???र्?कर्?लम् | य्?वद् द्???व्? व्रजति न भिय्? प�चत्?मे?अ क्?य- स्त्?वन्नित्य्?म्?तमय रवे प्?हि न? क्??दि??क्?न् || ४१ || म्?त्योरन्तकस्य वक्त्र? द्???व्? य्?वदे?अ क्?य इति सपुर्य??अको देहो भिय्? भ्?त्य्? प�चत्?? म्?त्यु? न व्रजति त्?वदेव रवे चिदर्क नित्य्?म्?तमय अनस्तमितपरम्?नन्दैकघनस्वभ्?व नोऽस्म्?न् क्??दि??क्?न् व्युत्थ्?ने त्वत्सम्?वे?अप्र्?प्ति? विन्? क्?? दि?अ? क्?यत? क्? दिक्क्? दिगस्म्?कमिति क्रन्दत? प्?हि निर्व्युत्थनसम्?वे??न् स?प्?दय | क्?द्?? म्?त्योर्वक्त्रम् ? वि?वे??? प्र्??अग्रसनो ज्?वितभक्?अको रसन्??ओपो लोलरसन्?व्य्?प्?रो यस्य त्?द्??इ कोपे प्रगल्भ? प्रौ?हम् | तथ्? दहन्?नि प्लो?अक्??इ नयन्?नि यस्य त्?द्?क् | तथ्? उद्द्?म्?भिर्?र्जित्?भिर्द???र्?भि? कर्?लम् || ४१ || ?अब्द्?क्?र? वियदिव वपुस्ते यजु?स्?मध्?म्न? सप्तच्छन्द्??स्यपि च तुरग्? ??मय? म??अल? च | एव? सर्व?रुतिमयतय्? मद्दय्?नुग्रह्?द्व्? क्?इप्र? मत्त? क्?प?अकरु??क्रन्दम्?कर्?अयेमम् || ४२ ||
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हे भगवन्, ते तव निर्??तद्??? स्?मवेद्?त्मक? ध्?म तेजो यस्य त्?द्??अ? | यजुर्वेद्?त्मक? ?अब्द्?क्?र? वपु? ?अर्?र? वियदिव व्य्?पकम् | तदपि ?अब्द्?क्?रमिति ?अब्द्?न्?करोति समस्त?अब्द्??रय? | अपि च ग्?यत्र्य्?दि सप्तच्छन्द्??सि ते तुरग्?? | म??अल? प्रभ्? परिवे?ओऽपि ?ग्वेदमय इत्येव? सर्व?रुतिमयत्व्?त् | यद्व्? अनुकम्प्?प्रध्?न्?दनुग्रह्?न्मत्तो मत्सक्???दुक्तवक्?यम्??अप्र्?र्थन्?परत्व्?त् क्?प?अ? विरस? स?स्?रविभ्?वकत्व्?च्च करु?अ? करु?अरसप्रध्?नमिमम्?क्रन्द? त्वत्प्रस्?दप्र्?र्थन्?पर? प्रलपित? क्?इप्रमुद्?र??नन्तरमेव्?कर्?अय करु?अय्?ऽस्मदनुजिघ्?क्?अय्?ऽवध्?रय || ४२ || न्??अ? न्?स्मच्चर?अ?अर?? य्?न्त्यपि ग्रस्यम्?न्? देवैरित्थ? सितमिव य?ओ दर्?अयन् स्व? त्रिलोक्य्?म् | मन्ये सोम? क्?अततनुमम्?गर्भव्?द्ध्य्? विवस्वन् ?उक्लच्छ्?य्?? नयसि ?अनकै? स्व्?? सु?उम्????उभ्?स्? || ४३ || हे भगवन् विवस्वन् चिद्भ्?नो अस्मच्चर?अ?अर?? देवैरपि ग्रस्यम्?न्? न्??अ? न य्?न्ति इत्येव? सित? ?उभ्र? य?अस्त्रिलोक्य्?? दर्?अयन्निव सोम? क्?अततनु? देवैरपि ग्रस्तसमस्तकल? सु?उम्??ख्यमध्यन्??य्? अ??अवो मर्?चयस्तद्भ्?स्? द्?प्त्य्? हेतुभ्?तय्? अम्?ख्यकलय्? गर्भेऽन्तर्य्? व्?द्धिस्तय्? स्व्?? ?उक्ल्?? छ्?य्?? स?प्?र्?असित्?? क्?न्ति? नयसि प्र्?पयस्?ति मन्ये ज्?न्?मि | अत्र रहस्यद्??? देव्? इन्द्रिय्??इ सोमोऽप्?नयुक्त्य्?न्त?प्रवि??अ? ?ओ?अ?अकल्?र्?प्?त्म्? मेयवर्ग? सर्वव्?होल्ल्?सयुक्त्य्? कल्?ग्र्?सेन क्???अकल? सन् सु?उम्????उभ्?स्? मध्यध्?मस्फ्?रे?ओन्मि?अच्छुभ्?ख्यतुर्यप्रक्??अद्?प्त्य्? अम्?य्? अन्ततु?यर्धस्फुरच्छक्तेर्गर्भेऽन्तर्य्? व्?द्धि? प्र्???दिप्र्?ध्?न्यनिमे?ओन्मि?अच्छ्?क्तव्?र्यभ्?भि? स्फुरित्?, तय्? ?उक्ल्?? चिदेकघन्?? नयसि प्र्?पयस्?त्यर्थ? | ब्?ह्यस्तु स्प??अ? || ४३ || ?स्त्?? जन्मप्रभ्?ति भवत? सेवन? तद्धि लोके व्?च्य? केन्?परिमितफल? भुक्तिमुक्तिप्रक्?रम् | ज्योतिर्म्?त्र? स्म्?तिपथमितो ज्?वित्?न्तेऽपि भ्?स्वन् निर्व्???य प्रभवसि सत्?? तेन ते क? समोऽन्य? || ४४ ||
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हे भ्?स्वन्, जन्मप्रभ्?ति यत्त्वत्सेवन? तदपरिमितफल? केन व्?च्य? केन वक्तु? ?अक्यम्, इयत्तय्? परिच्छेद्यत्व्?भ्?व्?त् | तद्यस्म्?द् भुक्तिमुक्तिप्रक्?र? भुक्तिर्वि?अयभोग एव स्व्?त्म्?नन्दवि?र्?न्तिदत्वेन ज्?वच्छिवत्व्?भिव्यक्त्?त्म्? मुक्तिरेव च चिच्चमत्क्?र्?वे?अर्?प्? भुक्ति?, न तु वि?अय्?सक्तिर्?प्? | त्?? भुक्ति? मुक्ति? प्रक्??अयति सेवक्??स्तन्मय्?न् स?प्?दयति ज्?वित्?न्ते निर्व्???वसरेऽपि ज्योतिर्म्?त्र्?त्म्? त्व? सत्?? स्म्?तिपथ? प्र्?प्तो निर्व्???य मुक्तये प्रभवसि | अतस्ते सम? कोऽन्य? | अस्?म्?न्यमहिम्?ऽस्?त्यर्थ? || ४४ || अप्रत्यक्?अत्रिद?अभजन्?द्यत्परोक्?अ? फल? तत् पु?स्?? युक्त? भवति हि सम? क्?र?एनैव क्?र्यम् | प्रत्यक्?अस्त्व? सकलजगत्?? यत्समक्?अ? फल? मे यु?मद्भक्ते? समुचितमतस्तत्तु य्?चे यथ्? त्व्?म् || ४५ || अप्रत्यक्?एन्द्र चन्द्र्?दिदेवत्?र्?धन्?द्?र्?धक्?न्?? यत्स्वर्गप्र्?प्त्य्?दि परोक्?अ? क्?ल्?न्तरे भ्?वि फल? तद्युक्तम् | यतो म्?द इव म्??मयो घ?अ? क्?र?ओचितमेव सर्वत्र क्?र्य? भवति | त्व? तु चिदर्क? सर्वे??? प्रत्यक्?अ? स्वप्रक्??अ?, चिदर्कस्वप्रक्???त्मत्?? विन्? कस्य्?प्यप्रक्???दिति | त्वद्भक्तेर्हेतोर्मम नित्योदितत्वत्सम्?वे??त्मफल? समुचितम् | अतो हेतोस्तत्फल? य्?चे प्र्?र्थये | यथ्? क्?तिमत्??उ देवत्?सु सत्??उ त्व्?मेव य्?चे तथ्? निर्व्युत्थ्?नसम्?वे??त्मैव फल? य्?चे | न तु मित? कि�चित् || ४५ || ये च्?रोग्य? दि?अति भगव्?न् सेवितोऽप्येवम्?हु- स्ते तत्त्वज्�? जगति सुभग्? भोगयोगप्रध्?न्?? | भुक्तेर्मुक्तेरपि च जगत्?? यच्च प्?र्?अ? सुख्?न्?? तस्य्?न्योर्क्?दम्?तवपु?अ? को हि न्?म्?स्तु द्?त्? || ४६ ||
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येऽपि च केचिदविम्???असम्?वे??त्ममुख्यफल्? भगव्?न्सेवित ?रोग्य? दि?अत्?त्य्?हुस्तेऽपि जगति तत्त्वज्�??च सुभग्??च | यतो भोगयोगप्रध्?न्? भोग्?य योग्?य च्?रोग्य? व्?�चन्ति | युक्त? चैतत् | यतोऽम्?तवपु?अ? पर्?नन्दप्रक्??अघन्?च्चिदर्क्?दन्य? को न्?म भोगमो?अयोस्तद्??रयस्य प्?र्?असुख्?त्मन ?रोग्यस्य च द्?त्? | न क?चित् | प्?र?अगु?असुहित्?र्थ इति त्?प्त्यर्थै? सह ?अ??ह्?सम्?सनि?एध्?ज्ज्�?पक्?त् सुख्?न्?? प्?र्?अमित्यत्र ?अ??ह्? || ४६ || हित्व्? हित्व्? गुरुचपलत्?मप्यनेक्?न्निज्?र्थ्?- न्यैरेक्?र्थ्?क्?तमिव भवत्सेवन? मत्प्रिय्?र्थम् | ते??मिच्छ्?म्युपक्?तिमह? स्वेन्द्रिय्???? प्रिय्???- म्?दौ तस्म्?न्मम दिनपते देहि तेभ्य? प्रस्?दम् || ४७ || हे दिनपते चिद्भ्?नो, यैरिन्द्रियैरन्तर्बहि?कर?ऐर्गुर्व्?? चपलत्?? महत्?मनवस्थिति? पुन? पुन? प्रव्?त्त्?मपि तथ्?ऽनेक्?न्निज्?र्थ्?न् वि?अयवि?र्?न्त्य्?त्मक्?नि न्?न्?स्वप्रयोजन्?नि हित्व्? त्यक्त्व्? भवत्सेवनमन्तर्मुख्?भ्?वयुक्त्य्? त्वत्परि??लन? मम प्रिय्?र्थमेवैक्?र्थ्?क्?तमभिनिवे?एन्??रितम् | ते??? प्रिय्???? स्वेन्द्रिय्???महमुपक्?रमिच्छ्?मि | तस्म्?न्मम्?दौ तेभ्य? प्रस्?द? देहि म्?य्?यदेहपरिह्?रे?अ निजमर्?चिचक्र्?त्मत्?? प्रक?अयेत्यर्थ? || ४७ || कि? तन्न्?मोच्चरति वचन? यस्य नोच्च्?रकस्त्व? कि? तद्व्?च्य? सकलवचस्?? वि?वम्?र्ते न यत् त्वम् | तस्म्?दुक्त? यदपि तदपि त्वन्नुतौ भक्तियोग्?- दस्म्?भिस्तद्भवतु भगव?स्त्वत्प्रस्?देन धन्यम् || ४८ || हे वि?वम्?र्ते अनवच्छिन्न, त्वन्नुतिवि?अये इदन्त्?वच्छेदप्रध्?नतय्? असम�जसप्र्?य? किमप्यस्म्?भिस्त्वद्भक्तित उक्त? तद्वि?वस्य व्?च्यव्?चक्?त्मनस्तव प्रस्?द्?दन्तर्नैर्मल्यप्र्?प्तेर्धन्यमस्तु त्वद्र्?पतयैव स्फुरतु || ४८ || य्? पन्थ्?न? दि?अति ?इ?इर्?द्युत्तर? देवय्?न? य्? व्? क्???अ? पित्?पथमथो दक्?इ?अ? प्र्?व्???द्यम् | त्?भ्य्?मन्य्? वि?उवदभिजिन्मध्यम्? क्?त्य??न्य्? धन्य्? क्?चित्प्रक्?तिपुरु??वन्तर्? मेऽस्तु व्?त्ति? || ४९ ||
SK
प्रक्?तिपुरु?औ व्?मदक्?इ?अब्?हौ अन्तर्? तन्मध्ये क्?चिदस्?म्?न्य्? धन्य्? स?पन्मय्? मे व्?त्ति? स्थितिरस्तु | क्?द्??? ? वि?उ? व्य्?प्तिमर्हत्?ति वि?उवत् | अभिजयति द्वैतप्र?अमन्?त् सर्वोत्कर्?ए?अ वर्तत इत्यभिजित् | सर्वमध्यवर्तित्व्?न्मध्यम्? | स्व्?नन्दवि?र्?न्तिस्?रत्व्?त् क्?त्यै? सौम्यक्र्?र्?दिभि? क्?र्यै? ??न्य्? | तथ्? देवप्र्?तिक्?रित्व्?द्देवय्?न? ह्?दो द्व्?द??न्त? य्?वत् प्रसर?अर्?प? ?इ?इरवसन्तग्र्??मस्वभ्?वमुत्तरपन्थ्?नमुत्तर्?य?अ? य्? प्र्???ख्य्? व्?त्तिर्दि?अति प्रथयति, य्? व्? अप्?न्?ख्य्? व्?त्तिर्द्व्?द??न्त्?द्ध्?त्प्रवे?अर्?प्? प्र्?व्???अरद्धेमन्तर्?प? दक्?इ?अ? पन्थ्?न? दक्?इ??यन? भोगप्रदत्व्?त् क्???अ? पित्?प्र्?तिहेतुत्व्?त्पित्?पथ? दि?अति त्?भ्य्?मन्य्? व्यतिरिक्त्? ज्?वन्मुक्तिप्रद्? | उन्मन्?ख्येत्यर्थ? | ?अ?त्रि??अद?गुलेऽ?गुल?अ?के ह्?द?प्रभ्?ति मकर्?दिर्??युदय इत्यर्थ? ?र्?स्वच्छन्द्?दि ??स्त्रे?वस्ति || ४९ || स्थित्व्? कि�चिन्मन इव पिबन् सेतुबन्धस्य मध्ये प्र्?प्योपेय? ध्रुवपदमथो व्यक्तमुद्द्?ल्य त्?लु | सत्य्?द्?र्ध्व? किमपि परम? व्योम सोम्?ग्नि??न्य? गच्छेय? त्व्?? सुरपित्?गत्? च्?न्तर्? ब्रह्मभ्?त? || ५० || सुरपित्?गत्? अन्तर्? ?र्ध्व्?ध?प्रवे??त्मनिर्??तदेवपित्?म्?र्गयोर्मध्ये चक्?र्?त् सर्वव्?ह्?न्?मप्यन्तर्ब्रह्मभ्?तोऽनवच्छिन्नत्?? प्र्?प्तस्त्व्?? गच्छेय? परतत्त्व्?त्मचिदर्कर्?प? स्य्?म् | क्?द्??अ? त्व्?म् ? सत्य्?द्वि?वसत्त्?प्रद्?त् स्?मरस्य्?द्ध्?म्न ?र्ध्वमुत्क्???अ? प्रक्???नन्दैकघन? किमपि परम? व्योमेत्यनुत्तरचिद्?क्??अर्?प? सोम्?ग्नि??न्य? प्र??न्तप्र्???प्?नस?स्क्?रम् | कि? क्?त्व्? ? त्?लुलम्बिक्?ख्यरौद्रग्रन्थिध्?मव्यक्ति? क्?त्व्? | दिव्यकर?अबन्ध्??रयत उद्द्?ल्य निर्भिद्य | अथो अनन्तर? ध्रुवपद? प्र्?प्य समस्तवेद्य्?विभ्?गप्रक्???त्मबिन्दुस्थ्?नम्?स्?द्य | सेतुबन्धस्य मध्य इति निरोधकोर्ध्व?अक्त्य्? त?अद्वय्?न्तर्व्?हिप्र्???प्?न्?द्युत्तर?ओप्?यन्?दन्?द्?त्मस्???इनिरुद्ध- समस्तकरन्ध्रम्?र्गे स्थित्व्?ऽधिरुह्य कि�चिन्मन? पिबन्निव समन्?न्तसविकल्पकमन?स?स्क्?र? प्र?अमयन् || ५० ||
SK
सर्व्?त्मत्व? सवितुरिति यो व्??मन?क्?यबुद्ध्य्? र्?गद्वे?ओप?अमसमत्?योगमेव्?रुरुक्?उ? | धर्म्?धर्मग्रसनर?अन्?मुक्तये युक्तियुक्त्?? स ?र्?स्?म्ब? स्तुतिमिति रवे? स्वप्र??न्त्?? चक्?र || ५१ || ?रयन्त्येत्?? योगिन इति ?र्?स्तय्? मोक्?अलक्?म्य्? सहित? स्?म्बो भगवद्व्?सुदेवसुत इत्येव?र्?प्?? रवे?चिदर्कस्य स्तुति? स्वप्र??न्त्?म्?त्मवि?र्?न्तिपर्?मकरोत् | सुप्रति??ह्?म् इति व्? प्??ह? | क्?द्???? स्तुतिम् ? युक्त्य्? परस्वर्?पवि?र्?न्त्य्?त्मन्? योगेन युक्त्?म् | तत्ख्य्?पयित्र्?मित्यर्थ? | स इत्यस्य वि?अय? दर्?अयति - य्?? सवितुर्वि?वक्?र?अस्य चिद्भ्?नो? सर्व्?त्मत्व? वै?वर्?प्यमेव योगमेकत्वमिच्छति | वस्तुनोऽन्येन वस्तुन्? इत्य्?म्न्?यद्??? योग? परैक्यमित्युक्तद्???रो?हुमिच्छु? स्व्?चिक्?र्?उ? | न त्वन्यत्कि�चित् | क्?द्??अ? योगम् ? सर्वदो?अम्?र्धन्ययो र्?गद्वे?अयोरुप?अमे सति य्? समत्? स्?म्य? तद्र्?पम् | केन ? व्??मन? - क्?यसहितय्? बुद्ध्य्? | व्?च्? स्तुतिभि?, मनस्?ऽनुस?ध्?नत?, क्?येन क्?यप्र्?ध्य्?न्येन निमज्जन्?त्मकप्र??मेन, बुद्ध्य्?ऽध्यवस्?येन | किमर्थमिम्?? स्तुतिमकरोदित्य्?ह - धर्म्?धर्म्?भ्य्?? यद्ग्रसनमर्थ्?दबुद्धस्य जगतस्तदेव र?अन्? बन्धनरज्जुस्तस्य्? मुक्तये | एतत्स्तोत्रप्??ह्?वमर्??भ्य्?? जन्? ज्?वन्मुक्तिम्?य्?न्त्वित्य्??अय्?दित्यर्थ? || ५१ || भक्ति?रद्ध्?द्यखिलतरु??वल्लभेनेदमुक्त? ?र्?स्?म्बेन प्रक?अगहन? स्तोत्रमध्य्?त्मगर्भम् | य? स्?वित्र? प?हति नियत? स्व्?त्मवत् सर्वलोक्?न् प?यन् सोऽन्ते व्रजति ?उकवन्म??अल? च??अर?मे? || ५२ ||
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इदमध्य्?त्मगर्भ? क्रो??क्?तरहस्यम्, प्रक?अ? ब्?ह्य्?र्थद्???, गहन? च्?ध्य्?त्मक्?र्थयोग्?त्, स्?वित्र? चिद्भ्?नुसम्बन्धि स्तोत्र? ?र्?स्?म्बेनोक्त? य? क?चित् स्व्?त्म्?नमिव सर्वलोक्?न् प?य??चिदभेद्?त्मवि?व? स्तोत्र्?र्थ? भ्?वयन्नियत? नि?चयेन प?हति अनवरत? विम्??अति, सोऽन्ते च??अर?मेर्द्वैतग्र्?सिन?चिदर्कस्य म??अल? ल्??हवि?वसमरस्?भ्?तमर्?चिचक्रमेति | तन्मयो ज्?यते | ?उकवद् भगवद्व्य्?ससुतवत् | क्?द्??एन स्?म्बेन ? भक्ति?रद्धे ?द्? य्?स्?? तत्त्व्?र्थचिन्त्?द्?न्?? त्? एव्?खिल्?स्तरु?यो नवनव्?? सुन्दर्यस्त्?स्?? वल्लभेन क्?अ?अमपि परिहर्तुम?अक्येन प्रेयस्? | न तु र्?पल्?व?य्?ति?अयम्?त्र्?त् समस्तब्?ह्यरम??स्प्?ह??येन | इत्यनेन व्यतिरेकलभ्येन्?र्थेन भगवद्व्?सुदेवसुतत्वम्?त्मन? प्रक?अयति || ५२ || उपस?ह्?रभ?ग्य्? जन्?ननुजिघ्?क्?उर्???स्ते - इति परमरहस्य?लोकप�च्??अदे?? तपननवनपु?य्? स्?गमब्रह्मचर्च्? | हरतु दुरितमस्मद्वर्?इत्?कर्?इत्? वो दि?अतु च ?उभसिद्धि? म्?त्?वद्भक्तिभ्?ज्?म् || ५३ || इत्युक्तक्रम्?न्मह्?रहस्य्?र्थयुक्त्? स्थित्व्? कि�चिन्मन इव पिबन् इत्यन्त?लोक्?न्?? प�च्??अदे?? तपनस्य वि?वविचित्र्?ख??इतप्रत्?पस्य भगवत?चिदर्कस्य नवनेन स्तुत्य्? पु?य्? पवित्र्? | तथ्? स्?गम्? वि?वोपनि?अद्र्?पम्?हे?वर??स्त्र्?र्थसतत्त्वगर्भ्? ब्रह्मचर्च्? पर्?द्वयविमर्?ओ यस्य्?? त्?द्??? अस्मद्वर्?इत्? सत्? ?कर्?इत्? वो यु?म्?क? सर्वे??? दुरित? हरतु किल्वि?अ? दुरध्यवस्?य? च न्??अयतु | भक्तिभ्?ज्?? च ?उभसिद्धि? दि?अतु अभ्????? भोगमोक्?अलक्?म्?? घ?अयत्?मिति ?इवम् || ५३ || क?चिच्छैव? पर?इवसम्?वे?अग्??ह्?नुर्?गो- द्रेकस्फ्?र्जन्नभिनवद??वे?अवैव?य??ल्? | सत्स्तोत्रेऽस्मिन् विव्?तिरचन्?? क्?एमर्?जो न्ययु?क्ते- त्येतन्नैव? झ?इति घ?इत? दर्?अन्?य? हि सद्भि? || इति मह्?म्?हे?वर्?च्?र्यवर्य?र्?मदभिनवगुप्तप्?दपद्मोपज्?विर्?ज्?नक ?र्?क्?एमर्?जप्र??तविव्?तिसमेत्? ?र्?स्?म्बप�च्??इक्? सम्?प्त्? | || सम्?प्तोऽय? ग्रन्थ? ||

Sanskrit e-text from the Muktabodha Indological Research Institute Digital Library (https://muktabodha.org/), CC BY-NC 4.0. �s?mbapa�c??ik? with the commentary of k?emar?ja [�M00076].

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