Dramatic Fragments (buddhist)

Dरमतिच् Fरग्मेन्त्स् (बुद्धिस्त्)

Dramatic Fragments (buddhist)

Dरमतिच् Fरग्मेन्त्स् (बुद्धिस्त्)

SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १ (IDP SHT १६/१) Tहे ओरिगिनल् इस् देपोसितेद् इन् Bएर्लिन्, Mउसेउम् füर् Aसिअतिस्छे Kउन्स्त् (MIK III २६); fअच्सिमिले इन् Lüदेर्स् १९११ तो थे समे fओलिओ बेलोन्ग्स् SHT १६/२; च्f. Lüदेर्स् १९११, प्. १७ र्१ /// + + + + य्. भवनिवर्त्तकेषु क्लेशेषु न किञ्चिद् अस्ति प्प्रहातव्यं यस्य नित्यम् अनित्य[ं] व्[आ] न क्[इ]ञ्च्[इ]द् अस्त्[इ] बोद्धव्य[ं] ─ त्(अ)म्(ओ) य्(ए)न्(अ) क्ष्(इ)प्त्(अं) .. .. .. .. [म्](अ)[य्]ऊख्(ऐ)र्. + .. [र्](अ)ज्(ओ) [य्](अ)स्य्(अ) [ध्]व्(अ)[स्]त्(अं) २ /// + + येनाव्⟨आ⟩प्तम् परमम् अमृतन् दुर्ल्लभम् ऋतं मनोबुद्धिस् तस्मिंन्न् अहम् अभिरमे शान्तिपरमे ─ धृति ─ अस्ति अस्ति तत् मत्प्रभावपरिगृहीतम् पुरुषस[ं]ज्ञकन् तेजः प्रादुर्भूत[ं] ─ ३ /// (पर)स्[प्]अरायत्तम् इ[द]न् द्वन्दम् इति _ यत्र ⟨⟨हि⟩⟩ बुद्धिर् अवतिष्ठते तत्र धृतिः स्थाघं रेअद्: स्थानं लभते _ यत्र च धृतिर् आधीयते तत्र बुद्धिर् विस्तीर्य्यते ─ कीर्त्[त्]इः ─ एवं गते युवाभ्याम् आय ४ (त्ताभ्याम्) /// (इ)[द्]आनी(ङ्) क्. .. .. .. .. ─ बुद्धिः ─ तथा तत्* अपि च ─ नित्यं स सुप्त [इ]व यस्य न बुद्धिर् अस्ति _ नित्यं स मत्त इव यो धृतिविप्रहीण(ः) + + + + + + स च य[स्]य्(अ) न्(अ) क्(ई) व्१ (र्त्तिर् अस्ति) /// तिष्[ठ्]अति य[स्]य कीर्त्(त्)⟨इ⟩ः ─ कीर्त्ति ─ क्व पुनर् इदानीं स पुरुषविग्रहो धर्मः संप्रति विहरति ─ बुद्धिः ─ स्वाधीनायाम् ऋद्धौ क्व पुनर् न विह(रति) + + (पक्षी)व व्योम्नि याति व्र २ (जति) /// + + (निः)स[ङ्]ग्(अ)[स्] त्(ओ)[य्](अव)द् गाम् प्रविशति बहुधा मूर्त्तिं विभ[जति] खे वर्षत्य् अम्बुधारां ज्वलति च युगपत् सन्ध्य्⟨आ⟩म्बुद इव स्वच्छन्दात् पर्व्व .. .. + + [व्]रजति च वि[धिव्](अ)द् ध्(अर्)म्म्(अ)ञ् च्(अ) [च] ३ (रति) /// + + [ङ्] गोचरः ─ धृतिः ─ तेन हि सर्व्वा येव तावद् एनं वासवृक्षीकुर्मः एष हि स महर्षिर् मगधपुरस्योपवने सम्प्रति ─ सोर्ण्णभ्र्[उ]स् तनुमृदुजालपाणिपा[द](ः) ४ /// + + + + वश्यात्मा विहरति निस्पृहः कृतार्[थ्]ओ ज्[ञ्]आनस्य प्प्रशमरसस्य चैव पूर्ण्ण[ः] ─ ततः प्रविशति प्रभामण्डलेन दीप्तेन .. र्. ब्[भ्].ः [परम] .. .ओ .. .. वेषो भग(वा)ं ⟨⟨श[र्मा]⟩⟩ +
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २ (IDP SHT १६/२) तो थे समे fओलिओ बेलोन्ग्स् SHT १६/१; च्f. Lüदेर्स् १९११ प्. १७ Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् Aअ अन्द् B२; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे Aब् Aअ /// + + + + + .. .. ///
SK
ब् /// .. [क्]आरणम् ई[र] + ///
SK
B१ /// .. + [अ]गणि[य्]. + ///
SK
२ /// + + + .. .[इ] .[ओ] ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३ (IDP SHT १६/३) र्१ [सिद्धम्*] .. पारिपार्श्विकः ─ प .. ///
SK
२ ॐ मत्तम् अमलिनम्. .. ///
SK
३ + .. .. .इ .ए [प्]. [क्]. [र]णे + ///
SK
व्१ त्. म्. .. .. + + [त्](अ)[त्](अ)[ः प्]र्(अ)[व्](इ)श्(अति) ///
SK
२ कय्यं पतिकय्य[ं] वा ─ + ///
SK
३ हकगोपिट्ठे ─ विदू ─ + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४ (IDP SHT १६/४); fओलिओ १३० /// (ओन् रेच्तो) र्१ स्थ्. धर्म [स्](अ)[र्]व्व्(आ)स्व् अवस्था(सु) + + + + + .य्. का(र्)य्यकार[णा]य [ज्]. + + /// + + + + + + + + + + + + + + + + + + + /// (मा) २ तृपितृपुत्रव[य्](अस्य) + + + + + .व्. .य्. .. [न्]त्[इ] मरणाद्ध्वनि .. .त्. + + /// + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
३ जितः ─ मग ─ .. .. पेक्खामि दस्सनं पि मे इमस्स दुल्लभ(ं) /// + .. [य्]. [अञ्]ञ्. ⟨⟨कि[ल]⟩⟩ + + + + + .. .. + + + + .. /// + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
४ नायकः स्मयति ─ मग ─ नङ् कहिन् ते गेहम्* ─ नाय ─ भव[त्]इ .. /// (गृ)[ह्](अ)न् त[त्]* _ लोके परिग्रहवताङ् ग्(ऋ)हिणाङ् ग्(ऋ)हा[ण्]इ [म्]. /// + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
व्१ मनसो गृहभूतम् एव ─ दुष्ट ─ हङ्घो कोमुदगन्ध _ देक्ख ताव .. + /// [ल्](ई)ल्(अ)म् मक्कटह्[ओ] ─ विदू ─ [ज्](इ)[ण्]णुय्(आ)न्. भ्. + .. ///
SK
२ .. [ट्]ठ्. [अ]च्छरियं ─ दु[ष्ट] (─) .. म् पेश्शेति _ अज्ज ते दाशीपुत्त हिमेन प[ल्]. /// ति ─ ततो वटि[य्]. .. + + + + + + + + + /// + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
३ दुनिते मक्कटन् ता .. + + + + .[इ] .. + .. .. रपटलन् ता .इ .. (─) .. /// + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
४ धावन्ति ─ मौद्ग ─ + + + + + (उ)त्(त्)इष्[ठ्]ओत्(त्)इष्[ठ्]अ ─ एते हु + + + /// + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५ (IDP SHT १६/५); fओल्. [१]३१ (ओन् रेच्तो) ओरिगिनल् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३२९ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] Lüदेर्स् र्१-२-३; व्१-२-३ र्२ विदू ─ न ///
SK
३ जन्मा वाद ///
SK
४ .इत्तिम् प[रि] ///
SK
व्१ + + ननन्न .. ///
SK
२ विदितवेदि + ///
SK
३ [र्मं] किम् इह .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६ (IDP SHT १६/६); fओल्. १३० (ओन् रेच्तो) रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४०९ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २११) मोस्त् पर्त् ओf थे ओरिगिनल् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् २५३ अन्द् ३४२ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] र्१ [आ] .व्. + ///
SK
२ वितो न .. ///Lüदेर्स् १९११: वित्तो (रेअदिन्ग् वितो प्रेfएरब्ले) ३ व्याधिमर .. व्१ + .. + .. ///
SK
२ नीलोप्पल्. ///
SK
३ तव्यम्* अहो ///
SK
४ ङ्. त्.ः [य्]. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७ (IDP SHT १६/७); fओल्. /// .. (ओन् रेच्तो) ओरिगिनल् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३६१, ५०० अन्द् ५३ [च्f. SHT X, XI (Eर्ग्.)] र्३ अन्द् व्१ रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४०९ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २११) र्१ .. ञ्च्. + + + + + + + + + + + .. .. + + + ///
SK
२ गुह्यङ् गूहति दुष्करा[णि क्]उरुते तत्सङ्गतै ///
SK
३ .. [धा]च् च न ब्भ्रश्यति ─ विदू ─ यदि एवं ल ///
SK
४ + + + + + + + _ परिचिततये मग्[ग्]अ ///
SK
व्१ + .[ध्]. बृहद्रथेनातिरथेन निर्मितं स्वलङ्कृत ///
SK
२ कोट्टे अवप्पपाकारप[र्]इखं _ नगरं निवे[स्]. ///
SK
३ [स्]अं म्. ग्. .. .. .. .. .. (प)रिणामितेनादै ///
SK
४ + + + + + + + + + + .. + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८ (IDP SHT १६/८) मिस्सिन्ग् पर्त्स् इन् इतलिच्स् र्१ /// .ईय[म्]आ[न]ं [अ] .इ[म्]. [त्]. [क्].ं [द्]. [क्].आम ─ ग[ण्]इ ─ नङ् किङ् करोथ ─ धानं ─ बहिर् यास्याम इति .. .. .. .. .. + + + + + + + ///
SK
२ /// + + .. .. [व्]. त्[इ] _ न ताव व्याकरणस्य कालः ─ गणि ─ किङ् खु दानि सुरदविमद्दक्ख[म्](अ) .. + .. ///
SK
३ /// .ई _ तस्मिन्न् अपराधे कन् दण्डम् अनुतिष्ठामि ─ गणि ─ कामङ् खु अदण्डारहो पियो तव तु मह ///
SK
४ /// (अ)[र्हे]स्सि दण्डं _ नाय ─ कः सन्देह [─] गणि ─ वयस्स तुवं सक्खी ─ धानं ─ बाढं म + + ///
SK
व्१ /// + + + अविक्खित्तेन हिदयेन _ आदंसो धारयितव्यो ─ नाय ─ प्रथमः कल्पः ─ ग[ण्](इ ─) ///
SK
२ /// [द्](आ)ऌ[इ]मविचूरितेन _ ससोवच्चलरुचकेन _ लवऌईफलावदँसं _ आसवम् बलकारेण पा[य] ///
SK
३ /// + + + + + + स्तु ─ धानं ─ मगधवति _ अतितीक्ष्णः खल्व् अयं दण्डः ─ शृण्वम् पुष्[प्]आ + + + ///
SK
४ /// .. व्. म्म्. हञ्ञ[न्]तु पुत्त्(आ) [च] न्(अ)त्त्(इ)का च ─
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९ (IDP SHT १६/९) अद्दितिओनल् fरग्मेन्त् नोत् एदितेद् ब्य् Lüदेर्स्, हेरे बोल्द् A१ /// प्रविशति नायको विदुष्. ///
SK
२ /// ह्निकक्क्रियः कृतो _ + + ///
SK
३ /// .ओ _ किन् [द्]आनि भवां _ .. + + ///
SK
B१ /// [ह्]. न्ति न प्प्रत्[इ]ग्रह्. + ///
SK
२ /// _ यत् खलु सोमदत्त + ///
SK
३ /// विस्स्रब्धं ये वि[ष्]अ ह्य् अ ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १० (IDP SHT १६/१०) A१ /// .. महती यश् चास्य प्रार्थितो ऽ[र्]त्थः स च हृदयगतः सन्दृश्य[त्]. .. ///
SK
२ /// पुञ्ञान्(आं) _ अञ्जलिम् पि करयमाना _ न जीवन्ति ─ धानं ─ शारद्वती + ///
SK
३ /// .. स्वन्तम् इव ─ धानं ─ न मे प्रियं _ यच् चक्क्रवाकमिथुनस्य + + ///
SK
४ /// भोति ─ नाय ─ शि दासीपुत्त्र ─ धानं ─ ननु को हेतुः कल[ह] + ///
SK
B१ /// .. प्त्. प्(अर्)ण्ण्(आ)न्त्(अ)र्(अ)न्[इ]ःसृतेन ग्(औ)[र्](ए)ण चित्त्रस् तनुनातपेन _ निघृष्ट .. ///
SK
२ /// [रम]णीयंङ् कारणं _ न खु वाकटेयी कलहस्स विय _ निस्सिरीका उ[प्]. ///
SK
३ /// य्. _ पारावतमिथुनस्य ब्ब्रूहि कथँ विग्ग्रहो जातः ─ नाय ─ शृणु + ///
SK
४ /// तिवाह्य ⟨⟨प्र्[ई]त्[इ]⟩⟩सँहृतवचनाम् एनान् [न्]इद्रावशगतां मन्न्यमानस् तूष्णी[म्]. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११ (IDP SHT १६/११) A१ /// + + + + .. ठ्. + + ध्. + + + ण्. .. .. ///
SK
२ /// _ त⟨ं⟩ येव अहं पेक्खितुं इच्छामि ─ निक्ख(न्तो) ///
SK
३ /// + + अयञ् चक्क्[र्]अवाकमिथ्[उ]नसहायो .इ ///
SK
B१ /// + + + मरणोद्वेगेन खल्व् अय[ं] प्रव्रज्(इ)त्(ओ) _ .. ///
SK
२ /// भामिनि _ श्रेयो ऽर्त्थविप्रयोगो ऽयन् न रो .ए + ///
SK
३ /// .. ⟨⟨[ति]⟩⟩ + + .. + .. + + + .इ .. + .. .. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १२ (IDP SHT १६/१२) A३ अन्द् B१ रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४१० (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २११) A१ /// .. यञ् च अट्ठमत्ता [क्]इ + .. .. .. .. + + + + + + ///
SK
२ /// र्म्(म्)अः _ परिपठितः _ मोक्षिके तु यत्त्रैव म[नस्]. ///
SK
३ /// _ अथ भवति वने ऽपि ब्(भ्र्)आन्(त्)अपञ्(च्)एन्(द्र्)इया(श्)[व्]ओ + ///
SK
B१ /// विय ─ नाय ─ धिक्* _ अभ्(इ)क्षुक्[ई]यम् अ(न्)उ(ष्)ठ्[इ](तम्) ///
SK
२ /// .. युक्तम् एवं हि कुर्व्वतो _ मोक्ष स्याद् अन्यथा .. + + ///
SK
३ /// [द्]इकल्पाज् जनयति + + + + + + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १३+१०३ (चोम्पोउन्द् फोतो इन् IDP SHT १६/१३) A३, ४ अन्द् B१,२ रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४१० (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २११) fरग्मेन्त् १०३ हेरे बोल्द् A१ /// + + + + + + + + .. [क्]उ[ट्]उम्ब्. + + .[ऋ] + + [यम्]. + + + + + .. म⟨⟨मि⟩⟩ष्ट .. .. + ///
SK
२ /// + + + + + + गृहविभूतीर् य्यस्य मित्रैस् ⟨⟨स्⟩⟩अही[य्]. [अ]मृतम् इव हि पीत्वा सा[ध्]. ///
SK
३ /// [का] ─ भट्ट इय(ं) म्हि ─ धानं ─ गतासि _ सोमदत्तस्स श्वशुरकुलं ─ चेटि ─ भ(ट्टा) ///
SK
४ /// [प्]अ[क्]ओ ब्(अ)ह्(उ)[क्]ई(ला)[ल्]ओलो वा त्ति ─ धानं ─ सुस्निग्धा सम्प्रति प[क्]तीः _ अथ स्नानोद[क्]. ///
SK
B१ /// .य्. म् अ[न्]उ[ष्]ठ्(ई)[य्](अ)[त्](आन् ता)[त्](अ) ─ ब्राह्म ─ भोस् तथा ─ निष्क्रान्तः ─ नाय ─ वयस्य गच्छ त्[व्](अम्) ///
SK
२ /// तत्रैव गच्[छ्]आमि ─ धानं ─ आर्त्थसिद्धये ─ विदू ─ भो धानञ्जय _ सिग्घं मिट्ठामिट्ठं ///
SK
३ /// + + + + + + + [ण्]आरूढके[न] _ निक्खन्ता सर्व्वे ─ प्रथ[म्]ओ (ऽङ्कः) % अतः वृ[क्]. ///
SK
४ /// + + + + + + + + + [ह्]ए .. .. + + .इ .. .. .. + + + + + + + + ⟨⟨[वा]⟩⟩ मेष्. [य्]ओ .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १४+१५+३२ (IDP SHT १६/१४+१५, ३२) एद्. H. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४०४ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २०५f.) fरग्म्. १४+१५ मोउन्तेद् तोगेथेर् बेत्wएएन् ग्लस्स् स्हेएत्स् अद्दितिओनल् अक्षरस् नोत् एदितेद् ब्य् Lüदेर्स्, हेरे बोल्द् र्१ + + + + + + + + + + + + .[र्]. .[थ्]. + + म्[आ]नेन _ सर्व्व⟨⟨त्र⟩⟩गते ख[ल्]उ [ज्]ञ्(आ)[न्](अ)[क्](ए)[त्]ऊ .. .. [ङ्] क्(अर्)[त्]त्(अ)[व्]य्(अं) + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
२ व्[इ]तव्यम्* _ अपर्[इ]म्[इ]तार्त्थम् अव्⟨आ⟩प्तुकामेन _ सत्सन्निकर्षे खलु प्प्[र्]अयतितव्यम्* _ मया हि ─ + + + [म्]. [ग्](अ)[त्](अ)[ध्](अर्)[म्]म्(ए) [स्](आ)[ध्]य्(अ)म्(आ)न्(ए) ऽथ्(अ) म्(आर्)ग्ग्(ए तद् अ)मृतम् उपलब्धम् भ्[इ]क्षुम् आसा[द्द्य] ///
SK
३ + [जादर्]ए[ण] स्(थ्)इतमतिभिर् अलब्[भ्](य्)अं यत् (सु)रैश् (च्)आसुरैश् च ─ वि(दू ─ भो उप)ज्झाय _ ए[त्]अस्स (पव)जितस्स वचनं सुणिय अपुरु(व)मुखवण्णेन _ अञ्[ञ्]अं विय ///
SK
४ + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ब्राह्मच(र्)[य्य्](अ) .. + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
५ + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + .. [गतय्]औ(वन) .. + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
व्१ + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + .. तम् प्रया + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
२ + + + + + + + + + + + + + + + + + म् [इ]यन् म्[ए] त .. + + + + + .. [ना]शनम[ल्ल्]आ व .. + [अ]ग्निर् हि म्[ए] शरणम् [आ]पदि सिन्धुर् उष्णे [म्](अर्)[ग्](अ)ः शिवो ऽद्ध्वनि म्(अ)ह्(आ)त्(अ)[म्](अ)स्(आ) [प्]प्र्(अविष्टे) ///
SK
३ .. उपदेसो _ एदिसस्स बम्भणजनस्स अनुग्गाहको भ्(आ)[त्](इ ─ शा)[र्](इ) ─ किञ् च वर्ण्णावरेणौ(षध)[म्] (उ)पदिष्टम् आतुरेभ्यो _ न रोगप्प्र[श्](अम)[न्]आय भवति _ किं वर्ण्णं त + + ///
SK
४ त्. न दहनकर्मा भवति _ आहो निकृष्टवर्ण्णेनाख्यातम् उष्णपरिगत्⟨आ⟩योदकन् न प्रह्लाद[म्] (आवहत्)इ + + + .[इ] + + + + + + + + .[इ] .. .. .ए .. .ए .इ .. + + + + ///
SK
५ + + + + + + + + + + + + .. + + .इतमहेन्(द्र्)आद् अबम्. .. + .ऐ + .. + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १५ (IDP SHT १६/१५) सेए SHT १६ fरग्मेन्त् १४+१५+३२
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १६ (IDP SHT १६/१६) A१ २ अन्द् B३ ४ रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४१० (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २१२) A१ /// + + + .त्. [क्]. [त्]. + + + .. + .ख्. [स्]स्. ति ─ निर्व्वर्ण्ण[य्](अति) ///
SK
२ /// .. ग्रामम् प्रस्थिता ─ नाय ─ एष पन्था गम्यताम्* ─ + + ///
SK
३ /// + + + [ती]र्ण्णकेन उपसृप्ता ─ गणि ─ सोमदत्त + + + ///
SK
४ /// + + .. मस् तत्र मगधवत्या श्रूयताञ् चात्र भू + + + ///
SK
B१ /// + + .. .व्(ए)ष श्रूयते _ अ .. क्. क्. तकम् उक्त्वा ─ .. ///
SK
२ /// + .. .स्. पि पवहणं _ आगच्छति _ निर्व्वर्ण्णि[य्](अ) ///
SK
३ /// दृष्ट्वा च प्रीतिर् आगता _ दुःखे खल्व् आन्तरे वर्त्ते रो[ष्]. ///
SK
४ /// .इ .. .. .. .आ + + .इ + (धा)नं ─ अयङ् किल ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १७ (IDP SHT १६/१७) A१ /// .. नन् धिग् अशनन् धिक् तत् सु[ख्]. + + + + + + ///
SK
२ /// यया वनं _ शान्तम् अपास्य [द्]उःखिनः + + + ///
SK
३ /// शा[र्]ई(रध्)आरणार्त्थम् अवश्यकर्त्तव्यश् चाहारो न चा ///
SK
४ /// + + (शार्)[ई]रं ह्य् आहारो ⟨⟨नियत इह ध ///⟩⟩ विकलम् उपचारै + + ///
SK
५ /// + + + + + .. .. .इ[श्]ए .ओ[म्]ए _ .. .इ + + + ///
SK
B१ /// + + + + + [ग्](अ)च्छ्(अ)त्(इ) ─ न्[आ]य ─ श .य्. + + ///
SK
२ /// + + + .उशत्त्रुभूतं⟨⟨म्*⟩⟩ _ द्रव्यं हि मत्सरि .. + ///
SK
३ /// .. नां [अ]ञ्चितचरणकण्टकिलानां _ असन् .इवि .. ///
SK
४ /// चयो न मांसम् पीती _ के(व)लं ⟨⟨अध⟩⟩ _ अ + + + + ///
SK
५ /// व प्राणहिंसा महद + + + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १८ (IDP SHT १६/१८) A१ /// [म्]. र्. य्. _ अप्प्(आ)व्(अ)क्क्(अ)य्(अ)क्(अ)स्स + ///
SK
२ /// [ष्]व् अहिंस्रो भवेत् सर्व्वे हि क्[र्]इम[य्]ओ ///
SK
B१ ///.. द् भदन्तः प्रशान्तेन वेषेण ─ [म्]उ ///
SK
२ /// .. .. .. .ए .. .इ .आ .. .. .इ[द्]आ[म्]. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १९ (IDP SHT १६/१९) A१ /// + सोमदत्तो .. .. ///
SK
२ /// .. यादिसा _ ल + ///
SK
B१ /// .. मन्दो ऽपि भव .य्. ///
SK
२ /// [स्]अप्पतु _ [अय्]ए ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २० (IDP SHT १६/२०) A१ /// + + + + + + + + + + .. म्. ङ्क्. र्[ओ] + + + + ///
SK
२ /// + + + + + +.. [धर]णितलातो _ जि + + + ///
SK
३ /// + + .स्. .त्. .. (दा)[स्](ईप्)उ[त्]त्(अ) _ एतञ् जन .ग्. + .. ///
SK
४ /// .. नदीकूलदुर्ब्बले शरीरे _ विस्रम्भः _ अ[पि] ///
SK
५ /// .. ष्[ट्]आनिधव[ग्]. .. न स्वस्थम् अपि वा _ तथा .. ///
SK
B१ /// + .उत्ता ⟨⟨रागा⟩⟩ य्. .. + य्. _ यव[ङ्]कुरप्[ई]तकेन + ///
SK
२ ///..ं _ अम्बवल्लरिङ् कण्ठे लगिय मदनघुण्णम .. ///
SK
३ /// + .इर् ब्[ब्]अन्[ध्](अ)ः _ [अ]हो मोहात्[म्]अकस्य मनसो _ .. ///
SK
४ /// + + + + + + + + [प्]. हरति द्वेष + + + + ///
SK
५ /// + + + + + + .. .इ[य्]. _ अज्[ज्]अ [ज्]इ + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २१ (IDP SHT १६/२१) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ एत्च्. A१ /// + ष्वा[र्]थ्[ए]⟨⟨षु⟩⟩ प्रवर्त्तमानः _ ///
SK
२ /// [त्]इ भयं श्रमञ् च ─ विदू ─ ///
SK
३ /// ..ं _ ओवुट्ठकेसरभरि[त्]. ///
SK
४ /// + .. _ एकं महिसं मि .. ///
SK
B१ /// + + + + + .. .. + + + ///
SK
२ /// + मृत्[ए] हि नश्यति प्रजा [स्]. ///
SK
३ /// .गुणै देवः कुतः ─ ⟨⟨इह हि⟩⟩ .. + + ///Lüदेर्स् रेअद् ३ /// .तुणै ४ /// .. न् धारयति ─ ⟨⟨[गृ]हम् इव ─ //⟩⟩ दृष्ट्वा ─ न ///
SK
५ /// .. _ [प्]इ यत्(न्)आद् [ब्](र्)आह्[म्]अ(ण) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २२ (IDP SHT १६/२२) A१ /// + _ व्[इ]दू ─ किम् पुन वि[च्]छ[ड्]ड[म्]. + + ///
SK
२ /// .[इ]ट्ठा खु _ अहकं न वुत्ते _ विच्छड्[ड्]. ///
SK
३ /// + [ग्]इ(र्)इ(यग्ग)[स]माजङ् [ग]मिस्.इ + + ///
SK
B१ /// .. न्. क्. [बम्]भणा भोन्ति ─ वि[दू] + ///
SK
२ /// .. [स]न्देसेन ─ दुष्ट ─ मा ताव मा ताव ///
SK
३ /// + म्[म्]अकेन _ आलपियति _ ए[व]ं ///
SK
४ /// + + + + + + + .. .. + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २३+५०+८९+११२+ओने नेw fरग्मेन्त् नोत् येत् fओउन्द् (हेरे बोल्द्/इतलिच्स्) (IDP SHT १६/२३, ५०, ८९, ११२) एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्प्. ३९३f. = K IV (= Pहिल्.Iन्द्., प्. १९६) अद्दितिओनल् fरग्मेन्त् नोत् एदितेद् ब्य् Lüदेर्स्, हेरे बोल्द् र्१ ///(fरग्म्. २३) + + + [ध्]य्. + .. ///(fरग्म्. ११२) + .. प ⟨⟨.. रत्[आ]⟩⟩ र स्र्[ओ]त्. + + + + ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) (नि)म्नङ् गतम् भव[त्](इ) + + + + .र्. + + र्. + + ///
SK
२ ///(fरग्म्. २३) + (बुद्ध्)इस्रोतसो [व्](अ)(fरग्म्. ११२)[र्](त्त)[म्]आनस्य भग[व्](अता) ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) (हेत्)उकस्य नोत्पद्य[त्](ए) _ बीजोदकं _ पृथिव्यर्त्. ///
SK
३ ///(fरग्म्. २३) (अस्मि)न् (व्)इनष्(ट्)ए म्(उ)[क्](त) ///(fरग्म्. ११२) [इ]ति निश्(च्)अयः क्(ऋ)तः ///(fरग्म्. ८९) [क्](अर्)[म्](अक्)ष्(एत्)र्(अम्) ब्(ईजम्) उ(त्)[प्](अत्)त्(इचेतस्). .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. ///(fरग्म्. ५०) + एवं लोक[ः] सस्यवज् जायमानो ज्ञाना[द्]इ ///
SK
४ ///(fरग्म्. २३) + + + + + + + ///(fरग्म्. ११२) + + + + + + + + ///?.. .. .. .. .. .. [ग]तेन मार्ग्गे[ण] .. .. .. .. .. .. .. .. ///(fरग्म्. ८९) .. ण कृतपरिकर्मणोः _ [अ] ///(fरग्म्. ५०) + [द्](ऋ)[ष्](ट्)इ[श्](अ)[ल्](य)[य्]ओ(ः) + + + + .इ + + ///
SK
५ ///(fरग्म्. २३) + + + + + + + ///(fरग्म्. ११२) + + + + + + + + ///?.. .. .. .. .. .र्. .. ए .. .. ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
व्१ ///(fरग्म्. २३) + + + + + + ///(fरग्म्. ११२) + + + + + + + + + ///?.. .. .. .. .. य[व्]. .. .. .. .. .. .. ///(fरग्म्. ८९) .य्. र्. .. .. .. + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) + + + + + + + + + + + + + + + + + ///
SK
२ ///(fरग्म्. २३) + .. + + + + ///(fरग्म्. ११२) + + + + + + + + + ///? .. .. .. .. .. व्यम् इति अ .. .. .. .. .. ///(fरग्म्. ८९) यमानेनास्[म्]इ श्रेष्[ठ्]इपुत्[र्]ए(ण) ///(fरग्म्. ५०) + .. .. [श्]. ष्. .. [स्]. .. .. .. + + .य्. .. .. [स्]. + ///
SK
३ ///(fरग्म्. २३) .. द् इदानीन् तत्रै(व) (fरग्म्. ११२) गच्छामि _ परिक्क्रम्य ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) (म)हन्तो खु आमोदो गणिकाकुले _ सबहु ///
SK
४ ///(fरग्म्. २३) + तन्ति धीति[क्]. ///(fरग्म्. ११२) .. [क्]. .. .. ─ द .. .. .. ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) + नि[ह]स्तै(ः) सं[व्]इ[हा]पयन्ति _ वन्धकीम् अ ///
SK
५ ///(fरग्म्. २३) + + + + + + ///(fरग्म्. ११२) + गणिका वि + + + + ///(fरग्म्. ८९) + + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ५०) .. ङ् किल उपा[स] + + + + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २४ (IDP SHT १६/२४) A१ /// यमतिकंतं रू .. ///
SK
२ ///.. कृष्टेब्भ्य इव गौ + ///
SK
B१ /// स्स _ अवत्थानेन .. ///
SK
२ /// र्.. वति _ स देशः ⟨⟨सुदेशः⟩⟩ .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २५ (IDP SHT १६/२५) A१ /// [क्]आ अङ्गुले[यि] ///
SK
२ /// (धा)नं ─ भोः + ///
SK
३ /// + [त्]आ[ग्]. [र्]ए + ///
SK
B१ /// + [अ]भ्. .प्. + ///
SK
२ /// + सोमदत्[त्]अ ///
SK
३ /// ण्टार्थनं हि [स्]. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २६(+६४)+६८+७५+१०१+(२ fरग्मेन्त्स् एद्. ब्य् Lüदेर्स् SBAW १९११ fओर् थे fइर्स्त् तिमे: ११९+१२०); (IDP SHT १६/२६+६४, ६८, ७५, १०१, ११९, १२०) एद्. H. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्प्. ३९२f. = K I (= Pहिल्.Iन्द्., प्. १९५) fरग्म्. २६+६४ मोउन्तेद् तोगेथेर् बेत्wएएन् ग्लस्स् स्हेएत्स् fरग्म्. १०१ fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् १८३ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)], अक्षरस् इन् इतलिच्स्/बोल्द् स्तिल्ल् मिस्सिन्ग् (प्रोबब्ल्य् रेस्तोरेद् fरोम् SHT ५७अ र्२ ओर् ५७ब् र्२?) र्१ ///(fरग्म्. १०१) + [क्]ऋत्. स्व्. ─ म्(औद्ग ─ उपतिष्य) ///(fरग्म्. १२०) .. .. त्र्. ⟨⟨(उप)तिष्य⟩⟩ .. .म्. + + ///(fरग्म्. ६८) .. .. .. .. .. .. .[त्]. .. ///
SK
२ ///(fरग्म्. २६) + + .[य्]. [क्]. + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ११९)ञ् च वायो(fरग्म्. १०१)ः _ आत्मेश्वरध्[य्]आनब(fरग्म्. १२०)लेन कुर्य्युर् न्न [य्]. ///(fरग्म्. ६८) .. .. + .. .. .. [र्].. ///
SK
३ ///(fरग्म्. २६) + र्य्यं _ मुनिच(fरग्म्. ६४)र्य्यम् अनिवार्य्यम् ⟨आ⟩[र्य्य](म्). ///(fरग्म्. १२०) + + + [य] दं श ///
SK
४ ///(fरग्म्. २६) [प]तये ─ मौद्ग (fरग्म्. ६४) ─ मोहान्धस्य जनस्य ///(fरग्म्. ७५) नष्टस्य स ///
SK
५ ///(fरग्म्. २६) + + + + + + (fरग्म्. ६४) [क्](अ)[र्](अं) ─ ब्(उ)द्(ध्)अ ─ स्(व्)आगतं .. ///(fरग्म्. ७५) + .. + + ///
SK
व्१ ///(fरग्म्. २६) + + + + .. .. + + (fरग्म्. ६४) [ब्]उ[द्]ध्[अः] ─ उ[प्](अ)[त्](इ)[ष्]य्(अ) [य्]. ///
SK
२ ///(fरग्म्. २६) [द्] (व्)[इ]शुद्धस्य ⟨⟨..⟩⟩ मनसो (fरग्म्. ६४) रागम् अल्पेन यत्नेन .. ///(fरग्म्. ७५) .व्(इ)शुद्धे ऽद्ध्याश[य्](ए) ///
SK
३ ///(fरग्म्. २६) + + .. परि # + .इ(fरग्म्. ६४)शैस् तैस् तैः स्वजनगत[म्].///(fरग्म्. १२०) + + + .. र्य्यन्ति ///
SK
४ ///(fरग्म्. २६+६४) + + .. .. + + + + + + + + + + ///(fरग्म्. ११९) [र्द]वाग्निप(fरग्म्. १०१)रिगतम् इव न्[ई]ऌअ[द्]रु[म्]अ(fरग्म्. १२०)ङ् गगनतल[व्]इ ///
SK
५ ///(fरग्म्. १०१) [ष्]. त्. सुखान्[आ](ं) ///(fरग्म्.१२०) .. [दा]नां _ [स्]. .इ ///(fरग्म्. ६८) .. [म्](अ)[ध्]उ[घ्]ऋत्(आ)[म्](ए)[द्ध्]य्(अ) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २७ (IDP SHT १६/२७) A१ /// + + + + + + + + + + + + .. चुण्णयमानो ─ ना[य] ///
SK
२ /// + + + + + + + + + + + .र्. [ह्]. .र्. .[य्]. ⟨⟨ह्यं⟩⟩ न विशेषेषु _ प्र ///
SK
३ /// + + + + + + + ध्. कुतः ─ पश्यत्त्य् अस्यान्न्य[च]क्षुर् .इ + + + ///
SK
४ /// [ये] प्प्रद्वेषम् अपि वा तद् वार्य्यङ् गोचरेब्भ्यो मन इह चल + + ///
SK
B१ /// नि⟨⟨[व्]असिय⟩⟩ _ अज्ज राजगहविसयं आगता _ इमिना येव _ सज + + ///
SK
२ /// + + + + + + + + + .. समाधानम् उत्पद्यते ज्ञानञ् च .र्. .. .. .. ///
SK
३ /// + + + + + + + + + + + + + + .. स्[य्]अ (श्)र्(ई)वियुक्तम् पुरं स्यात्* ///
SK
४ /// + + + + + + + + + + + + + + + + उम्मांसेन _ सरीरेण ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २८ (IDP SHT १६/२८) A१ /// त्या गतो ऽस्मि कु .. ///
SK
२ /// + .. भो भ्. द्. .. ///
SK
B१ /// + .. _ अनुव .त्त्. ///
SK
२ /// .. कङ् गृहस्थस्.ऐ + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् २९ (IDP SHT १६/२९) अन् अद्दितिओनल् fरग्मेन्त् fओर् A१ अन्द् B४ रेस्पेच्तिवेल्य्, एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४१० (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २१२) A१ /// + (प)र्य्याकुल _ आजीविक(ः) + + + + + ///
SK
२ /// + (द्)उक्खो ⟨⟨खु⟩⟩ पियविनाभावो ─ धान्[अं] ─ [श्]. + + ///
SK
३ /// (ना)य ─ न समीपस्थेष्व् अन्⟨आ⟩स्था _ दूरस्थे .. ///
SK
४ /// + [ण]म् पुच्छथ _ सुणिय यदि कुप्पित .. ///
SK
B१ /// .. .. गिलायमानं _ आजीव्[इ]कसम(णं) ///
SK
२ /// .. ष्ट्वा ─ विदू ─ ऐ किलेसो _ गम्भीरवटु[म्]. ///
SK
३ /// + कयानकेनागच्छति ─ [नाय] (─) + ///
SK
४ /// + + [ग]च्छति ─ गणि ─ कहि(ं) ..
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३०+३१+४२+१०५ (चोम्पोउन्द् फोतो इन् IDP SHT १६/३०) A१ /// + यो पि ताव _ त[स्]स धानञ्जयो यस्स पसादेन _ अज्झ[य्]. /// + + + + + ऌअकेन _ यो .. [नि]रुस्सासं करिय इदानि कथञ्चि उस्ससति ─ + ///
SK
२ /// .. गच्छमाने _ न्[इ]लु⟨⟨लु⟩⟩स्सासङ् कलेति ─ विदू ─ कथं कथं निलुस्सा(सं) + /// .. न् नाम _ मा ताव मा ताव _ दासीपुत्त _ अकितञ्ञ _ यं विनीतचपलमधुर .. ///
SK
३ /// .[ई]यं _ पवहणपोतकं वाहयमा + + + + + + + /// + + + .. + + .इं [व्]इच्छड्डयमानो विय _ सहका + + + + + + + + ///
SK
४ /// .इ [प्]आ[ट]यमानो विय म्[उ]ह्[उ]त्तेन रा + + + + + + + /// + + + + + + + + + के _ सस्सिरीकं प्(उ)ञ्ञाऌईम्. .. + + + + + + + + + + + ///
SK
B१ /// त्. .. स्. .. ण्. न्[ईल्](अ)[क्]उ[वल]यदाम व्[इय्](अ) + + + + + /// + + + + + + + + + र्. स्[ए]क[जनि]ता _ दुगुण[ब्]उ[भ्]उ[क्]ख्(आ) + + + + + + + + + ///
SK
२ /// दिसिट्ठनिट्ठानं सोत्तियकुलसभावस + + + + + + /// + + + + .. + त्. सोमदत्तेन _ न भुत्तं भुञ्जमानो + + + + .. .. .. + + ///
SK
३ ///.. गोबं ─ इच्छामि पुप्फा येव भट्टिदालके _ नलकग्गा + /// .. के _ पलिनततालफलवन्नीकाहि _ भुज्[ज्]इताहि _ कुसलवा तम् अच्छ(लियं) ///
SK
४ /// .. _ पच्चग्गक[क्ख]तुदन्तपोनतित्तकेन _ पोट्टीकलसं[नि] /// + + + (न)[व]मालिकाकुसु[म]पण्डलाकं _ कऌअमोदनाकं _ भुंजितये + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३१ (IDP SHT १६/३०) सेए fरग्मेन्त् ३०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३२ (IDP SHT १६/३२) सेए fरग्मेन्त् १४+१५+३२
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३३ (IDP SHT १६/३३) A१ /// + + (भ्)ऊय[ः] सम्म्(ओ)हमा + ///
SK
२ /// ञ् [ज्]अनयति _ व्याहन्ति प्री .इ ///
SK
B१ /// .. यमाना व्[इ]य _ मेघा ///
SK
२ /// + + दुवारे _ हसन्ते ⟨⟨केडमानं च⟩⟩ म्पे ///
SK
३ /// + + + .. .. .. .. र्.इ .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३४ (IDP SHT १६/३४) A१ /// + .व्. + + + + .ट्. + + + + + + + + + ///
SK
२ /// .. ऌआ विय _ स⟨र्⟩व्वका[ल]ं + .. + + .. + + ///
SK
३ /// .. .[ई]ये ─ ताप ─ एकन् तु इच्छामि _ भग[व] + ///
SK
४ /// + [ङ्] काहाम त्ति ─ विदू ─ आम यथा तुव[न्] ध्. ///
SK
B१ /// + यः स्वस्थो ऽध्वानञ् चराम्य् अपरिग्रहः _ ज ///
SK
२ /// .. [न्न्]ओ ऽद्ध्वानञ् चरामि बुभुक्खितोः _ बहु दधि पि + ///
SK
३ /// [व्]आ _ सङ्कीर्ण्ण⟨⟨देश⟩⟩परित्यागार्त्[थ्]अं [व्]आ _ [एष्]आ .. + + ///
SK
४ /// याश्[व्]ऐर् अपहृतमत[यो] + + + + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३५ (IDP SHT १६/३५) A१ /// यो ⟨⟨यो⟩⟩ _ अत्थी त्ति _ .. ///
SK
२ /// + _ अती[न्]द्रि[य्]. .. ///
SK
३ /// + .. वान् सुखार्त्थं [य्]. ///
SK
B१ /// + .. जर्[आ]व्याधिज[नि] ///
SK
२ /// + [सा]न् धर्म्म[म] .. + ///
SK
३ /// दैन्[य्]एन भया + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३६ (IDP SHT १६/३६) A१ /// + .. .. _ न्[इ]ख्[इ]ऌअ .. .. + .. ///
SK
२ /// (इ)दानिम् आचार्य्यशुश्र्. + + ///
SK
३ /// + + + [न]सो _ विब्[भ्]. .. + + ///
SK
B१ /// + .. .. यन्तेलिका .. + ///
SK
२ /// .. .इ ─ विदू ─ एतं सदिसं ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३७ (IDP SHT १६/३७) A१ /// (म)ग ─ साधु अल[ं] _ अ ///
SK
२ /// .. _ टीयति ─ .. + ///
SK
३ /// [म्]आना होतु ─ + + ///
SK
B१ /// .. यैः ─ अ .. + + ///
SK
२ /// + लद्धे कण्ठे [व्]इ[द्ध्]. ///
SK
३ /// + [द्]उष्ट ─ न नि .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३८ (IDP SHT १६/३८) A१ /// .. .. .. + [क्]. .. न्द्. न्. .. + ///
SK
२ /// (म्)आध ─ किंन् नु खु दिट्ठपुरु[वो] + ///
SK
३ /// + + कथा[ः _ मगध](वती) ///
SK
B१ /// + .. [म्]मु .. + .. + .. + ///
SK
२ /// .सृष्ट्[आ] _ न वैमुख्येन _ [दु] ///
SK
३ /// + .इ + + + .. .. .ए .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ३९ (IDP SHT १६/३९) A१ /// + + + .. ष्टः ─ .. + ///
SK
२ /// .. नमरोषणकिङ्[क्]इ .. ///
SK
B१ /// [ये] ─ गण्[इ]का ⟨⟨+ +⟩⟩ म् उपसृ(त्य) ///
SK
२ /// + + + .. [ह्]. द्[ध्]ई .. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४० (IDP SHT १६/४०) A१ /// + + + + + .. ⟨⟨[श्ल्].⟩⟩ न्. क्ख्. + ///
SK
२ /// .. _ प्रव्रज्या{{श्या}}घ .. ///
SK
३ /// + + .. .. .. .. .. _ .. ///
SK
B१ /// श्रम ─ न खु ए[के] .. ///
SK
२ /// + + + + .. नि .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४१ (IDP SHT १६/४१) A१ /// म्याḫ पुरे ऽस्मिन् नरा⟨⟨ः⟩⟩ स्वस्थ्. + ///
SK
२ /// .. हणारूढकेन _ [ग]णि[क्]आ + ///
SK
३ /// ..ः सरूप⟨⟨क्ष⟩⟩वृक्षो ऽफलशकटा ///
SK
४ /// .. .. गेहे _ [न]ट्.अवारो ति ///
SK
B१ /// [उ]च्च्(अ)कुल्(अ)य्(औ)व्(अ)न्(अ)रूप्(अ)[म्]. + ///
SK
२ /// [व्]इजानन्तो वा#वत्तकाय्यो ─ ///
SK
३ /// .. भवतीम् अनुदर्शयामि + ///
SK
४ /// .. विनिक्खित्ते _ सिलाप + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४२ (IDP SHT १६/३०) सेए fरग्मेन्त् ३०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४३ (IDP SHT १६/४३) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ एत्च्. A१ ///+ + + + + + .. .. + + ///
SK
२ /// तेन ⟨⟨रूपेण⟩⟩ पव्वजिस्सिति ─ ///
SK
३ /// .आ[द्]इ[स्]ए .. + + + + ///
SK
B१ /// + ह आवुस्(ओ) [अब्]भु .. ///
SK
२ /// .. श्रेयो धर्म्मपरिग्रह ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४४ (IDP SHT १६/४४) A१ /// .. त्. क्(अर्)[म्]म्(आ)[ण्](इ) [अन्]उ[व्](अर्)त्त्(अ)य्(अ) ─ ग[ण्](इ ─) ///
SK
२ /// + + उर _ इयं सखीवि[त्](त्)आ [म्](अ)[ग्](अधवती) B१ /// + + + + + .. .ट्. + + + + + ///
SK
२ /// .. ज्जुके दिढङ् खु _ अप्पा + .. ///
SK
३ /// .इ _ .. [च्]ए[ट्]इ (─) .. .. [थ्]आ _ [अति]ण्. प ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४५ (IDP SHT १६/४५) A१ /// + + + स्. + + .. + + + + + + २ /// .. _ [म]ण्डपं पविसति .. + + + + + ३ /// + _ [न्]इक्[ख्]अन्ता उभये २ % अतः ४ /// + + + विषयेषु जगत् प्रमत्तङ् .इ .ओ B१ /// + + + + _ गिरियग्गसमाजस्स .. + २ /// + + .. ङ् कलेमि _ न जिम्[भ्]आये ─ विदू ─ ३ /// (दु)ष्(ट) ─ [क्]इश्श कालना ─ वि[दू] + + + + + ४ /// + + .इ + .इ + + .इ + + + + + +
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४६+९७ (चोम्पोउन्द् फोतो इन् IDP SHT १६/४६) एद्. H. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४११ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २१२) मोस्त् प्रोबब्ल्य् fरग्मेन्त् ४७ बेलोन्ग्स् तो थे समे fओलिओ A१ /// [ण्]ठा ─ उपा ─ एवम्* ताव ब्राह्म[ण्]. + ///
SK
२ /// .. द् (उ)पैति भाग[म]हतो य .न्. + + ///
SK
३ /// + + + + + + तो अयन् तस्स प .. ///
SK
B१ /// + + + + + वोपशमरस्{{य्}}अस्य ///
SK
२ /// + + + + .ट्. .. .. तिकय्य[क्]इ[या] + ///
SK
३ /// ति मयाभिहितं _ मद इ[व्]. +
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४७ (IDP SHT १६/४७) मोस्त् प्रोबब्ल्य् fरग्मेन्त् ४६ बेलोन्ग्स् तो थे समे fओलिओ A१ /// .. [ण्]. स्य _ ब्राह्मणजनस्य _ परिल //
SK
२ /// [न]रकं लोके च गर्हाम् [प्]अरान् तस्मान् . + ///
SK
३ /// + [ध]र्[म्](म्)आ(त्)* [पर्]आङ्[म्](उ)खी + + + + + + + ///
SK
B१ /// + + .. .. .. .. [म्]. त्थ्. + + + + + + + ///
SK
२ /// उपा ─ भवति _ नाहम् एकान्तत + ///
SK
३ /// + भवती ─ सन्तो ऽर्त्थं विसृजन्ति धर्म्(म्)अ ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४८ (IDP SHT १६/४८) A१ /// + + [त्]. .. .य्. .. .. .. + .. .. + + ///
SK
२ /// .. + .. [म्]. एतस्स मग्गस्स _ यथाव .. ///
SK
B१ /// (अ)भिमुखा गमिस्[स्]आम ─ ताप ─ कि ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ४९ (IDP SHT १६/४९) A१ /// + त्तानम् पियञ् च ///
SK
२ /// .. तति _ त[त्]ओ ///
SK
३ /// [श्र]मणः _ .. ///
SK
B१ /// + कुञ्च्[इ]त्[ओष्]ठ्. + ///
SK
२ /// .. _ यो मे त्. ///
SK
३ /// [न्]. कुप्पति _ चि ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५० (IDP SHT १६/५०) सेए fरग्मेन्त् २३+५०+८९+११२
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५१ (IDP SHT १६/५१) A१ [अन्]उकम्पाय्(ए) _ ह्. म्. .. + + + .. .त्. + ///
SK
२ [य्]इ .. [क्]आ[म्]आ [क्]आटीयति ─ मग ─ अनियुत्ता ///
SK
B१ प्रव्(इ)ष्टः [अह्](अ)म् भवान् न्(आ)त्र्(अ) {:} प्रविविक्षामि ─ ना[य] ///
SK
२ [भ्]इḫ [प्](र्)अ[त्]ईग्(ऋ)हीतामिषस्(य) + + .ओ .. .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५२ (IDP SHT १६/५२) A१ /// .व्. गः कष्टम्* ─ + + ///
SK
२ /// + जगत्* ─ विदू ─ भो उ .. ///
SK
B१ /// + पदुमरागं _ उत्तरा[य्]. ///
SK
२ /// ⟨⟨भमति⟩⟩ .. न्तपतितो ─ ना[य] + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५३ (IDP SHT १६/५३) एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४११ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २१२f.) A१ /// + + [कण्]ठबद्धे _ कण्ठविट्ठित्(आला)न्(ए) श(ं)वुत्त्[ए] ─ २ /// (शोम)[द]त्तेन _ शह शमागच्छ[तु] _ हि B१ /// + न्तन्तेन च तन् न चार्च्छति ततस् तद् धेतु २ /// ⟨⟨परिवारा हसन्ती धीरोद्⟨आ⟩त्त⟩⟩ ३ /// अवस्थिता च मग[ध्]अ(व)[त्]ई .. .इ ..
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५४ (IDP SHT १६/५४) B१ रे-एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४०७ (= Pहिल्.Iन्द्., प्. २०९) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ एत्च्. A१ /// + + + + + + + .. .. + + .. + .. .. + + + ///
SK
२ /// + .त्. + + .. + वा नैतद् आश्चर्य्यंम् भगवत्. .. ///
SK
३ /// [स्]आद्⟨⟨ध्य्⟩⟩अम् अस्ति ─ ततः प्रविशन्ति _ श्रमण .. .इ ///
SK
४ /// + .. र्. ञ्. म्. .. + .. .. [ये] .. [क्]ई[तौ] + + ///
SK
B१ /// + + स्करोत्[इ] वि[दु](षो) ज्ञ्[आ]नस्य जान[न्]. + ///
SK
२ /// .. तौ शारिपुत्रमौद्गल्यायनौ श्रमणेन्. ///
SK
३ /// + + + + + था _ यथा आसनीभ्. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५५ (IDP SHT १६/५५) A१ /// ─ कौण्[डि] ─ अ .. ///
SK
B१ /// .. च्. त्. + + ///
SK
२ /// .. .इर् .इ ..ं ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५६ (IDP SHT १६/५६) रे-एद्. wइथ् त्wओ अद्दितिओनल् fरग्मेन्त्स् Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ४०७ (= Pहिल्.Iन्द्., प्प्. २०८f.) मिस्सिन्ग् पर्त्स् इन् इतलिच्स् A१ /// .. .. .. .. .. .. .. .. द्धतः ─ [क्](औ)ण्डि ─ भगवन्* _ एत्(औ) ख्(अलु) ///
SK
२ /// ⟨⟨चरतां //⟩⟩ क्[इ]ञ्च्[इ]द् अत्य्. .. (आगच्छ)त इति [पश्](य्)आ[म्]इ _ .. + .. + + + .. + ///
SK
३ /// .. .. .. .. .. .. .. .. य्. .. + + + + + + + + + + + + ///
SK
B१ /// .. [क्](अ)[म्](अ)[ल्](अ)[स्](अ)[द्]ऋ[श्](अ) .. .. .. .. .. ल्व्. न्. य्. + + + + + + + + + + ///
SK
२ /// .. [ग्]औ[र]वे[ण्]. .. .. .. .. .. मानौ _ न्यस्त्. [द्]. न्. त्. .. + + + + + ///
SK
३ /// .. .. .. .. .. .. .. .. ⟨⟨वनस्य //⟩⟩ .. दाह .. ..ः शीलाम्. षो भास्(व्)अर(ः) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५७ (IDP SHT १६/५७) A१ /// न्ति हि यञ् च ते हेत्थ + + .. .. + ///
SK
२ /// + प्प्रव्रज्या # संवर्त्तेत ─ [क्]आमं ///
SK
३ /// .. येषु प्रियेष्(उ) + + + + ///
SK
४ //// + ब्. हति ते .. + + + + + ///
SK
B१ /// (प)[व्]व्(अ)जित _ अत्त + + + + + ///
SK
२ /// .. स्सिताये ─ त[व] + + + + ///
SK
३ /// .. ─ स्निग्धम् प्रियं स्[व्]अजनम् अश्रु ///
SK
४ /// .. पृच्छेमस् ताव[त्*] ─ _ .. + .. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५८ (IDP SHT १६/५८) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ एत्च्. A१ /// .. .. + + + + ///
SK
२ /// [त]ः ─ शारि ─ [अ] ///
SK
३ /// [ज्]आयब .. + ///
SK
B१ /// .. .. + .. + .छ्. ///
SK
२ /// .. स्योद्याने _ ///
SK
३ /// .. .. .इ .इ .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ५९ (IDP SHT १६/५९) A१ /// .. ये उभयत्थ द्[इ]स्सत्(इ) ─ नाय ─ हन्त .. ///
SK
२ /// .. तस्[य] _ याथात्म्(य)तो भवति नापि ग्(ऋ)ह्(अ)न् (न) + ///
SK
B१ /// + [आ]वु[स्](ओ) [न्](अ) [र्]ऊ[प्](अ)[ल्](अ)क्ख्(अ)णान्(इ) _ [अ](न्)उ(वत्)त्(अन्)त्(इ) + + ///
SK
२ /// .. ङ् किञ्चित् (कु)लव्(य्)असनम् अद्[ऋष्ट्](व्)आ _ मनस्(व्)इजनद्[उ]र्वि ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६० (IDP SHT १६/६०) A१ /// + .. परिहिताये परिवा .इ .. ///
SK
२ /// .. गृहीतम् भवता ─ वि[द्](उ ─) + + ///
SK
B१ /// दि भवति पुरे [प्](अ)क्ष्(अ)न् त + + + ///
SK
२ /// .. हिमयो _ कोशिकी मह .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६१ (IDP SHT १६/६१) A१ /// + .. ─ एतद् [ई](द्)ऋश्(अ)न् दृष्ट्व्(आ) स्. २ /// (प्र)पञ्[च्]ओ न्याय्योः _ दृष्(ट्)ई मा ते B१ /// .. .. + .. .. .र्. .य्. + .य्. २ /// व्[इ]दू ─ सुट्ठु भवाम् भणाति ३ /// .इधानम् अ .इ ..ं [र्]. [त्]. सा
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६२+११४ (चोम्पोउन्द् फोतो इन् IDP SHT १६/६२) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ एत्च्. A१ /// .. न्त्. [आ] + .. + .. + .. + + .. .. + + त्. + ///
SK
२ /// .. व्वताऌइं _ आलोकेम _ अज्जाप्[इ] च _ राजगहं ///
SK
३ /// .. .. .इ[म्]अ[त्]आ _ .. [म्]ए .ई .. + + + + + + ///
SK
B१ /// .. + + .. + + .. + + + + + + + + + + ///
SK
२ /// .. [म् म्]अलिनयति कुलं वृत्तन् त्[उ]लयते _ तद्रा ///
SK
३ /// + धम्.ओ .इ _ .. .. .. + [य्]ओ + + .इ .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६३ (IDP SHT १६/६३) A१ /// [य]त् कृत्वा व्यसनम् परस्य ल ///
SK
२ /// + + + + + .. [श्]. [क्]इभि[क्]. ///
SK
B१ /// .. स्. + त्. [क्]. ⟨⟨ऌअ⟩⟩ [ट्]उम्बज्झत्[इ] _ .. ///
SK
२ /// .. [घ्]ऋणश् च एष समासः [─] ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६४ (IDP SHT १६/६४) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६५ (IDP SHT १६/६५) A१ /// + [वा]गतश् चायम् प्रतिपन्नश् चा(श्च)[र्य्]यस्रोतः _ ///
SK
२ /// .. स् तथायं शयित इव सद्⟨अ⟩श्वो घट्टितश् चोत्थि ///
SK
३ /// .. स्ते गर्ब्भवासस्याशुचेः पर्[य्](य्)आ(य)ः द्. [ख्]. .ए + ///
SK
४ /// .. _ चक्क्[र्]अम् अपहृतम् भ[ग] + + + + + + + ///
SK
B१ /// + यः पश्य व्युदयव्यय .च्. + + + + + + ///
SK
२ /// [य्]आत् कृत्वापि चित्राः कथाः ─ श + .. .य्. .. .र्. .य्. ///
SK
३ /// [अ]श्वभिनिवेशयिता श्रेयसि गृहीतो भवा[न्]* ///रेअद् आश्व् अभिनिवेशयिता? ४ /// + + [य]तनम् उपशमायतन(म् प्र)शस्यपुरु(षः) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६६ (IDP SHT १६/६६) A१ /// [द्]उ[ष्]ट _ ///
SK
२ /// [व्]इ[द्](ऊ) ─ .. ///
SK
B१ /// [ञ्] ज्(इ)[ण्]णु[य्](आन) ///
SK
२ /// + + .. .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६७ (IDP SHT १६/६७) A१ /// ─ विदू ─ ///
SK
२ /// त अदि ///
SK
३ /// रतो र ///
SK
B१ /// + .. .. ज्. ///
SK
२ /// + प्प्[इ]नि[व्]. ///
SK
३ /// + हमन ///
SK
४ /// .. दस्या जा ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६८ (IDP SHT १६/६८) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ६९ (IDP SHT १६/) अद्दितिओनल् fरग्मेन्त् नोत् एदितेद् ब्य् Lüदेर्स्, हेरे बोल्द् A१ /// (वि)दू ─ दुक्करकर्[ए] .. २ /// .. .[ए] .. .. .. ///
SK
B१ /// .. य्. [स्]स्. क्. .. + ///
SK
२ /// (अ)हम् अन्[उ]जा[न्](आमि) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७० (IDP SHT १६/७०) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ एत्च्. A१ /// .. .. + .. + + .. ///
SK
२ /// [श्](अ)यितो भवान्* ─ ///
SK
३ /// [य]ः प्[र्]आद्[उ]र्ब्[भू]तः ///
SK
B१ /// + .. .. .. ⟨⟨त्तक⟩⟩ + + .. ///
SK
२ /// (ध्)आनं ─ वयस्य ///
SK
३ /// परस्परजनि ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७१ (IDP SHT १६/७१) A१ /// _ स्. + + + + ///
SK
२ /// [म्]आध ─ [ह्]. [त्]उ[म्]. ///
SK
३ /// + तके .. + + + ///
SK
B१ /// + + भेन्. + + + ///
SK
२ /// (प)[रि]ग्गेण्[ह्]इय _ [अ] ///
SK
३ /// + .. [प्]. ता + + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७२ (IDP SHT १६/७२) A१ /// + [त्]. [उ] .व्. ///
SK
२ /// (धा)नं ─ न ///
SK
B१ /// + + .च्. + ///
SK
२ /// [ल्]. गोकुल ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७३ (IDP SHT १६/७३) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ A१ /// .. न्(अ) स्(अ)र्(ई)र्(ए)ण्(अ) _ [म्]. ///
SK
२ /// .आव[द्]. + + + + + ///
SK
B१ /// .. .. + + + ///
SK
२ /// विमृशत्(इ) _ ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७४ (IDP SHT १६/७४) A१ /// नि एत्थ वि[क्]. ///
SK
२ /// + शे ─ .. .इ ///
SK
B१ /// + च्. .. + + + ///
SK
२ /// .. मलं रु[द्]. त्. ///
SK
३ /// पित्[य्]अन्तो _ नत्. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७५ (IDP SHT १६/७५) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७६ (IDP SHT १६/७६) A१ /// [य्]. हतः ─ ///
SK
B१ /// इदम् अमरे[ष्](व्) इ ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७७ (IDP SHT १६/७७) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ A१ /// ⟨⟨त्.⟩⟩ + + .य्. ///
SK
२ /// हङ्घो + ///
SK
B१ /// .. + + + ///
SK
२ /// .इ प्[उ]न दा ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७८ (IDP SHT १६/७८) A१ /// म् अप्[इ] तस्[म्]ऐ _ ///
SK
२ /// .. .. .. + + ///
SK
B१ /// .ज्. पि खु नं .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ७९ (IDP SHT १६/७९) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१ अन्द् B१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ अन्द् हिस् B१ इस् हेरे B२ A१ /// + + + .. .. + + ///
SK
२ /// .. त्. क्ख्[उ] गहीतन् ना[म्]. ///
SK
B१ /// + + .. .[र्]. + + .. ///
SK
२ /// पञ्चेन्द्रियाश्वो ना ///
SK
३ /// + + + + .इ .. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८० (IDP SHT १६/८०) A१ /// .. वितर्क्कितम् ए .. ///
SK
२ /// .. .. [न्]. पा[द्]. + .. + ///
SK
B१ /// .. [र्]उतम्* + + + ///
SK
२ /// त्र्[इ]यादावा .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८१ (IDP SHT १६/८१) A१ /// + + न्त्. .. .. .त्. + ///
SK
२ /// गता म्हि _ पुच्छि ///
SK
३ /// + .. .ई .. + + + ///
SK
B१ /// + .. [स्]व्. .. + + + ///
SK
२ /// .. विहापेह्[इ] _ .. ///
SK
३ /// + .. र्. .. + + + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८२ (IDP SHT १६/८२) A१ /// .. त्ति ─ विदू ─ ///
SK
२ /// + [ग्]ओ _ .. ///
SK
B१ /// _ आसोहि .. ///
SK
२ /// + + + .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८३ (IDP SHT १६/८३) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ A१ /// + .. + + + .[र्]. ///
SK
२ /// जराभयकाय ///
SK
B१ /// .. सदृश .. .. य्. ///
SK
२ /// .. र् ब्(ब्)अह्(उ)[व्]इधैर् . + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८४ (IDP SHT १६/८४) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ एत्च्. A१ /// क्[इ]म्* _ अयं जानाति तहिम् उ ///
SK
२ /// + .इदीये _ गिरिकग्ग .. + ///
SK
B१ /// + + + + + + .. + + + ///
SK
२ /// .व्. .. धावति ─ विदू ─ [ह] .. ///
SK
३ /// .. मानो मौद्गल्यायनश् च स ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८५ (IDP SHT १६/८५) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१ अन्द् B१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ अन्द् हिस् B१ इस् हेरे B२ A१ /// .. .. + + + .. + + ///
SK
२ /// [प्](र्)अविशति _ नाय(कः) ///
SK
B१ /// .. .. + + + .. + ///
SK
B२ /// _ न शक्कन् तहिङ् ग .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८६ (IDP SHT १६/८६) A१ /// (अ)ल्पम् अनल्प(ं) + + ///
SK
२ /// + दर्शितम् आचा(र्)[य्य्](एण) ///
SK
B१ /// .[य्]. दा ─ अनादेः ///
SK
२ /// [श]मम् अमृत .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८७ (IDP SHT १६/८७) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ A१ /// .[व्]. + + + + + + ///
SK
२ /// .आवङ् गमिस्[स्]आम ─ ///
SK
B१ /// + + .. .. .व्. .. + + ///
SK
२ /// [य]ः _ राग्⟨आ⟩न्[ध्]आ स्[व्]. कु .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८८ (IDP SHT १६/८८) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् A१; थेरेfओरे हिस् A१ इस् हेरे A२ A१ /// + + .. .. + + .. + + + ///
SK
२ /// + विपयोगो सन्ताप्[ए] + ///
SK
३ /// (वि)द्(ऊ) ─ न हि उपज्(झ्)आ(य) ///
SK
B१ /// (दु)[ष्]ट ─ श्(आ)प्(अ)मह्[इ]मा .. + + ///
SK
२ /// + हाये _ जिण्णपोक्ख(रिणी) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ८९ (IDP SHT १६/८९) सेए fरग्मेन्त् २३+५०+८९+११२
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९० (IDP SHT १६/९०) Lüदेर्स् दिद् नोत् रेअद् B१; थेरेfओरे हिस् B१ इस् हेरे B२ एत्च्. A१ /// (उ)पज्झाय _ यथा + ///
SK
२ /// + _ यद्य् एष भ[व्]. ///
SK
B१ /// + + + + + .य्. + ///
SK
२ /// (मौ)द्ग ─ इत्थ[ं] श्रेय ///
SK
३ /// एष दुष्करो न म ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९१ (IDP SHT १६/९१) Sइदे B दिffएरेन्त् स्च्रिबे A१ /// रं बंम्भण २ /// हिमाये B१ /// .. बन्धनेन २ /// मि भोती न
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९२ (IDP SHT १६/९२) A१ /// + तम्* _ प[श्य्]. ///
SK
२ /// द्ध्. पव्वजित्(ए) ///
SK
B१ /// .. थ _ एते ///
SK
२ /// (पु)ण्यक्ष[य्](अ) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९३ (IDP SHT १६/९३) A१ /// + + .. .. जनपरि ///
SK
२ /// स्[व्]अभावस्(य्)अ च कः _ .उ ///
SK
B१ /// .. .. .. क्र्. + + .. .. ///
SK
२ /// + .ए[न्]अ [व्]आ _ सिद्धार्त्थो .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९४ (IDP SHT १६/९४) fरग्मेन्त् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३४६ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] A२, B१: Tहे अक्षरस् [ष्](ट) अन्द् दु[ष्](ट) अरे मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअच्सिमिले प्लते V A१ /// च्छ _ छिज्जिस्[स्]इ ///
SK
२ /// ⟨⟨..⟩⟩ ये ─ [द्](उ)[ष्](ट) ///
SK
B१ ///.. रुह्. स्स्. ─ दु[ष्](ट ─) ///
SK
२ /// .. _ आयुश् च व .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९५ (IDP SHT १६/९५) A१ /// हिही _ अहो सम्. ///
SK
B१ /// धर्. ना(र्)त्थः _ तच् चाव .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९६ (IDP SHT १६/९६) मोस्त् पर्त् ओf fरग्मेन्त् ९६ fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३२५ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] थे अक्षर ओf B३ इस् मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअच्सिमिले प्लते VI A१ /// + + [क्]. स्स + + ///
SK
२ /// (दु)[ष्]ट ─ ब[म्]भ(ण) ///
SK
३ /// + यवतु सा + ///
SK
B१ /// त्थितापि मुनि ///
SK
२ /// .. सहक + ///
SK
३ /// + .. म .. + ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९७ (IDP SHT १६/९७) सेए fरग्मेन्त् ४६+९७
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९८ (IDP SHT १६/९८) ओरिगिनल् इस् मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअचिमिले प्लते VI A१ /// नजनो _ परिज[ने] ///
SK
B१ /// .. [र्](अ)क्षति _ भ्रष्ट ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ९९ (IDP SHT १६/९९) fरग्मेन्त् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३५४ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] A१ /// .. म् आत्मनो व्युप ///
SK
B१ /// रः ─ अतः प्र[वि](शति) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०० (IDP SHT १६/१००) अक्षरस् इन् इतलिच्स् अरे मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअच्सिमिले प्लते VI A१ /// हि वयङ् (क्)अल्[ल्]अं येव ///
SK
B१ /// + + + .. .व्. .थ्. + .. + + .. ///
SK
२ /// (उप)ज्झाय _ यथा तथा ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०१ (IDP SHT १६/१०१) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०२ (IDP SHT १६/१०२) A१ /// .व्. + + + + ///
SK
२ /// जिके नृत्त .. ///
SK
३ /// .इ .. .. .. ///
SK
B१ /// .. [त्]उ[त्]. _ .. + ///
SK
२ /// परिवत्तन्[त्]इ ///
SK
३ /// + .. .. .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०३ (IDP SHT १६/१०३) सेए fरग्मेन्त् १३+१०३
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०४ (IDP SHT १६/१०४) मोस्त् पर्त् ओf fरग्मेन्त् १०४ fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ३३९ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] थे अक्षरस् इन् इतलिच्स् अरे मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए प्लते VI A१ /// (प)रिणतशुभक(र्म) ///
SK
B१ /// .. [प्]र्(आ)[प्]त्(अच)[क्]षु[र्]. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०५ (IDP SHT १६/३०) सेए fरग्मेन्त् ३०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०६ (IDP SHT १६/१०६) अक्षरस् इन् इतलिच्स् अरे मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअच्सिमिले प्लते VI A१ /// + + .. योजिय _ [स्]ए .. ///
SK
२ /// [म्]. त्.ः [क्]ए .आ .इ + .. ///
SK
B१ /// [खल्]उ + + + + + ///
SK
२ /// + + [हृ]दयः शी[ल्]. ///
SK
३ /// + + .. .इ .. .. .. .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०७ (IDP SHT १६/१०७) A१ /// .. म्. ह्. .य्. ///
SK
२ /// ल्[ओ]कः स्वस्.ए ///
SK
B१ /// _ साटकेन्. ///
SK
२ /// [स्]ओ नच्चति ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०८ (IDP SHT १६/१०८) A१ /// + द् एते हि भ ///
SK
२ /// .. ति च न ति ///
SK
B१ /// .. धर्म्मो वृतो .. ///
SK
२ /// स्. रोयन .. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १०९ (IDP SHT १६/१०९) ओरिगिनल् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ५३८ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] A१ /// ..ः [य]⟨⟨तः⟩⟩ २ /// .. _ आगमनं B१ /// .. पतितुञ् चरा २ /// श्रम ─ प्रज्(ञ्)आतो .इ +
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११० (IDP SHT १६/११०) ओरिगिनल् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ४६९ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] A१ /// [स्य्]अ न दुःखिना ///
SK
B१ /// .. हति ─ ना(य ─) ..
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १११ (IDP SHT १६/१११) A१ /// .. सर्व्व्. लज्(ज्)अरिकं मल्ल्यानुलेपना ///
SK
२ /// .. + + + + + + + .. .आ .ई ///
SK
B१ /// + + + + + + + + .. ह्. त्. + ///
SK
२ /// म् [इ]व मल्[इ]नम् इव _ वद्ध्[य्]अम् इव ///
SK
३ /// + + + + + + + + + + ⟨⟨अपिता⟩⟩ ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११२ (IDP SHT १६/११२) सेए fरग्मेन्त् २३+५०+८९+११२
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११३ (IDP SHT १६/११३) A१ /// णपरिश्रम इत्[इ] ─ ///
SK
B१ /// .. वो एसो _ तुम्(ह्)आक्(अं) ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११४ (IDP SHT १६/६२+११४) सेए fरग्मेन्त् ६२+११४
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११५ (IDP SHT १६/११५) मोस्त् पर्त् ओf थे fरग्मेन्त् fओउन्द् उन्देर् SHT ८१० fरग्मेन्त् ४२७ [च्f. SHT X (Eर्ग्.)] अक्षरस् इन् इतलिच्स् अरे मिस्सिन्ग् तो दते, बुत् सेए fअच्सिमिले प्लते VI A१ /// त्. राजगृ[ह्]. .. B१ /// (क)लुषय + ///
SK
२ /// .. तितम्. ///
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११६ (IDP SHT १६/११६): Aश्वघोष, Śआरिपुत्रप्रकरण बेलोन्ग्स् तो SHT ५७अ; सेए थेरे, थिर्द् fरग्मेन्त् (इन् इतलिच्स्)
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११७ (IDP SHT १६/११७) ओरिगिनल् इस् मिस्सिन्ग् A१ .. कम् पेक्ख ─ .. B१ .. ङ् कप्पथ ─ ..
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११८ (IDP SHT १६/११८) ओरिगिनल् इस् मिस्सिन्ग् A१ .. हम्. .. २ .. ऐ भो .. B१ .. त्. केन .. २ .. य ─ ..
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् ११९ (IDP SHT १६/११९) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT १६ fरग्मेन्त् १२० (IDP SHT १६/१२०) सेए fरग्मेन्त् २६+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०
SK
SHT ५७: Aश्वघोष, Śआरिपुत्रप्रकरण, एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्प्. ३९० ३९२ (= Pहिल्.Iन्द्., प्प्. १९२ १९५)
SK
SHT ५७अ + SHT १६ fरग्मेन्त् ११६ (इन् इतलिच्स्) (Lüदेर्स् SBAW १९११, प्प्. ३९०f.: C१ (= Pहिल्.Iन्द्., प्प्. १९२f.); रेस्तोरेद् तेxत् अच्चोर्दिन्ग् तो SHT १६/२६(+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०); fओल्. .. .. (ओन् रेच्तो) अक्षरस् इन् बोल्द् नोत् रेअद् ब्य् Lüदेर्स् र्१ + + + + .य्. + + + + .. च्[आ]न्न्यदृ[ष्]टि[तो] दे[ह्]. + + (बुद्)ध्(अ ─) [उ](पतिष्य) /// + .. .. + + + + + + + + .. + + + + २ .. भावः अ[थ] + + + + + [ष]या बुद्धितपसाम् ऋद्धयः // + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + (ञ् च वायोः) [आ]त्मे(श्वरद्ध्)यानबलेन कुर्य्युर् न योगिना[ं] ३ दुष्करम् अस्ति (क्)इ(ञ्चित् ─) [श्]आरि ─ तस्माद् आत्मसं(स्)आ(र)स्य क + + + + + + + + + (बुद्धः) [// उ](पतिष्)य्(अ) .. + + + + [र्य्]यम् उत्त(मव्)आर्य्यं मुनिचर्य्यम् अविनिवार्य्यवी ४ र्य्यम् आर्यम्* [व्]इग[त] .. + + + भयदं शरणम् अह[म्] अ[र] .. + + + + + + + + + [म]ति ─ बुद्ध ─ स्वाग[त]ं + + + + नौẖकर्ण्[ण्]अधाराय भविष्यते धर्मसेनपत[ये] व्१ मौद्ग // मोहान्धस्य (जनस्य) [द्](अ)[र्]शनकरं नष्टस्य स[ंज्]ञ्[आक्](अ)[र्]. + + + + + + + + + [स्]य संवि[त्]करम्* मृ + + + + .. क्ष्. .. .. .. (ज्)ञ्(आ)न्(अ)प्प्र्(अ)त्(इ)ष्ठ्(आ)क्(अ)र्(अं) व्(अ)न्द्(ए) .. .. (शा)[री] ─ २ [क]बोधनकरं श्[र्]एय .. + + .. रम्* ⟨─⟩ बुद्ध ─ स्वागतं भा[व्]इ[ने] वि .. + + + + + + + [ऋ]द्[ध्]इविकल्पेश्वराय + + + + ष ─ तृ[भ्]इश् शिष्यैḫ परिवृतः शोभते मुनिचन्द्रमाः ३ .. .. .. [न्]. त्र्[इ] .. + + + + + [य्]उक्त इव चन्द्रमाः बु(द्)ध्(अ ─) उपति[ष्](य) + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + [न्]आम ज्. .. + .. ब्भ्यन्तरं वर्षशतान् न भविष्यतीत्य् ए ४ + + .. [प्र्]. .. .. .. .. + + + .. ब्भ्य एतान् तावद् विशुद्धस्य मनसो रा(गम् अल्पेन यत्नेन) + + + + + + + + + + + + + नासं .ए + क्षात् परांमुखीभूतः प्रतिपद्यते श्रे ५ + + + + + + + + + + + .. य्[उवाभ्या]ं .. .. + + + .. .. + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + .. .. + + + + + .. .. .. .. .ओ .ए .. + + +
SK
SHT ५७ब् एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्. ३९१: C२ (= Pहिल्.Iन्द्., प्प्. १९३f.) रेस्तोरेद् तेxत् अच्चोर्दिन्ग् तो SHT १६/२६(+६४+६८+७५+१०१+११९+१२०) बोल्द् अक्षर मर्क्स् थे बेगिन्निन्ग् ओf थे लिने र्१ .. .. .. .. .. + + + + + + + + + + .. .. .. + + + + + + .. .. .. .. खि .. + + + + + + + + + + + २ (र् दवाग्निपरिगतम् इव) [नीऌअ]द्रु[म](ं ग)[गनत](ल)विप्प्[र](स्थि)[तस्य] शकुनेर् आदीप्तं त्रै(लो)क्य्(अ)म् .. .. .य्. .ओ .. क्व + + + + + रिनिष्प .. [स्]. .. ३ + + रेव .. .. .. .. .. .. .. (सु)[खा](ना)[म् अतृप्तिकर]णां परिदाहा[त्मकानाम् आ] .. .. + + + + .. चरितः ─ .. ४ .. .. .. मधुघृता[मेद्ध्यपय्]. + + + + + + + .. स्पृष्टं [यत् तत् प्रिय]म् अपि दहत्य् अप्रिय .. + + + + [ह्]. त्त्य् एव विष .. ५ .. [न] एव विष[य्]. + + + + + + + + + + + + [शर्]ई[र्]ए .. [प्रदहति मदाजि] .. [म] .. .. + + + + + .. .. .आम्. .. व्१ .. .य्. .. .. .. + + + + + + + + + + .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. + + + + + .. .. .. .. .. .. २ .. [य] .[एन] सम्य[ग् अ]भिहितम्* + + + + + [ह्]. भृगु[स]त्तम्[ओ] .. [निभृतैर् यत्ता] .. .. .ऐ .. + + + + + .. .. .. .. .. .. ३ .. .. [क्]ऋ[त]ं भृशविषै स्पृ(ष्)ट्(अं यथा)शीविषैः ─ बुद्ध ─ .. .. .. .. .. .. .. .. .. + + + + + .. .. .. .. .. .. ४ .. .. .. द्धि .ऋ .. [एतद्] अपि पू(र्व)[कर्म्मसं]स्कृत[योर् अनहङ् कृत]योर् युवयोर् अ + + + + + + .आ .. .. .. .. ५ .. [त्प]त्ति .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. नो .. .. .. .. .. + + + + + + .. .. .. .. ..
SK
A स्मल्ल् fरग्मेन्त् मोउन्तेद् बेत्wएएन् थे ग्लस्स् प्लतेस् अत् थे रिघ्त् सिदे: Aअ /// .. .. .[ओ] .. ///
SK
Bअ /// .. [व्]. [ग्]. .. ///
SK
ब् /// + + .. + ///
SK
SHT ५७च् एद्. Lüदेर्स् SBAW १९११, प्प्. ३९१f.: C४ (= Pहिल्.Iन्द्., प्प्. १९४f.); fओल्. .. ७ (ओन् रेच्तो) ओरिगिनल् इन् Mउसेउम् füर् Aसिअतिस्छे Kउन्स्त् (III २७); fअच्सिमिले इन् Lüदेर्स् SBAW १९११ बोल्द् अक्षर मर्क्स् थे बेगिन्निन्ग् ओf अ लिने र्१ व .. .. न्नो भावात्* सो .. [क्षि] .. य्. .. नोपा .. .. .. ए[वं हि] सति [इ](द)[न्] तु यत्[न्]एन ज्ञा[यतां] .. .. .. .. .. .. हे कि(ञ्)च्. + .. + .. .. य्य्. .. .. न [हि] + + + .. .. .. .. .. .. .. + २ (श)री[र]निर्मुक्तम् आ[त्म]स[ं]ज्ञकम् बुद्धिस्[औ]क्ष्म्यं तत्* ─ सूक्ष्मत्वाच् चैव दोषाणाम् अव्यापाराच् च चेतसः (द्)[⟨ई⟩](र्घत्वा)[द् आ]युषश् चैव मोक्ष(स् तु) [प]रिकल्प्यते ─ शारि ─ (भग)वन्* अस्य धर्मस्य + ३ .. .. .. थात्म[#]ग्राहे सत रेअद् सति न नैष्ठिकी निर्वृत्तिर् रेअद् निर्वृतिर् भवति नैरात्म्यादर्शनाच् च भवति तद्यथा [नदी]स्रोतसो वर्त्तमान[स्य] प्र[त्]यु .. [श्य] .ए .. .. द्ध्य + (अ)स्मिन्न् उपरते ऽस्यो + ४ .. प्राप्तं तच् च यथा निम्नगतम् भवति तत्रादौ स्रोत उपरतं विनष्[ट्]अम् इति [भव]ति [एवम् अ]स्. .. .आ ..ं शरी[र्]एन्द्रिय्. + बुद्धिस्रोतसो वर्त्तमा[न](स्य) भगवताधि[ग] + ५ वे कल्यं क्रियत तत्कृतो ऽहेतुकस्य नोत्पद्यते बीज्⟨ओ⟩दक⟨ं⟩ प्[ऋ]थिव्(य)र्(त्).ं .ऐ .. .. .[एव]ङ्.. ..[ः] तस्मिन् न .. .. .[य]मान्. .. .. .. .. + + + [अ]स्मिं वि(नष्टे मुक्त इति निश्चयः कृतः) व्१ कर्म्मा रेअद् कर्म्म क्षेत्रम् बीजम् उत्पत्तिचेतस् तृष्णा क्लेदच्छादनञ् चा[प्]य् [अव](न्ध्)य(ं) [ए](वं लो)[क्](अः) [स्](अस्)य्(अ)[व्](अ)ज् ज्[आ]यमानो ज्ञानादित्ये + + + + + + त्. ─ [ब्](उद्धः ─) + (गतेन मार्गेण) २ विनीतयोर् य[त्]इ#धर्म्मेण कृतपरिकर्म्मणोः अस्मात् सिद्धान्तप्प्रतिवेधाद् उद्धृतविविधदृष्[ट्]इ[श]ल्ययो[ः] श्[उ]द्[ध]मनसोर् युव(यो)ः यद् ए ..ं + धवा[दि]ज्ञा[नस्या] .. रेअदिन्ग् धवा[वि]ज्ञा[नस्या] इस् अल्सो पोस्सिब्ले ३ शिष्टं दुẖखं स्रो#तसि निर्व्वाणस्य वर्त्तते तत्* ─ अतः परं ज्ञानम् इदं यतेन्द्रियौ निरन्तरम् भावयतुं रेअद् भावयितुं विमुक्तये शि .. सु भिक्ष्⟨आ⟩म् अखिलाम् अक + + निरामय्[औ पा]तु + ४ सर्वे & // शारिपुत्रप्रकरणे नवमो ऽङ्कः ९ आर्य्यसुवर्ण्णाक्षिपुत्रस्यार्य्याश्वघोषस्य कृतिश् शारद्वतीपुत्रप्प्रकरणं समाप्तं [स]माप्तानि चाङ्कानि नव + .. ग्यम् अनु[ष्टुभे] च्छ ..

Sanskrit e-text from (Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages), CC BY-NC-SA 4.0. Dramatic Fragments (buddhist) (sa_dramatic-fragments-buddhist.htm).

Source